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जिस सरकारी स्कूल में पढ़ाता था मुजाहिद हुसैन, उसके क्लासरूम को ही ₹30000 में बेचा: दूसरे कमरे को भी बेचने की कर रहा था तैयारी

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (Muradabad, Uttar Pradesh) से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहाँ का एक शिक्षक जिस सरकारी स्कूल में पढ़ाता है, उसी स्कूल के एक क्लासरूम अपना बताकर 30 हजार रुपए में बेच दिया। इस मामले में शिक्षक मुजाहिद हुसैन पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

मामला जिले के कुंदरकी ब्लॉक के पीतपुर नैय्याखेड़ा गाँव का है। मुजाहिद हुसैन गाँव के प्राथमिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाता है। इसमें साल 2010 में एक अतिरिक्त कमरे का निर्माण कराया गया था। उस क्लासरूम को उसने तीस हजार रुपए में बेच दिया।

क्लासरूम खरीदने वाले व्यक्ति ने उसे तुड़वा दिया और अपना घर बनाने की तैयारी करने लगा। यह बात खंड शिक्षा अधिकारी को पता चली तो वह हैरान रह गए। उन्होंने मौके पर पहुँचकर घटना की जाँच की। घटना को सही पाने के बाद अधिकारी ने इसकी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दी।

मुजाहिद हुसैन इतने पर नहीं रूका। उसने स्कूल के दूसरे क्लासरूम को भी बेचने की तैयारी कर ली। मुजाहिद को ऐसा करता देख गाँव के प्रधान मोहिसिन अख्तर से उसका विवाद हो गया। इसके बाद प्रधान ने इसकी शिकायत ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर से कर दी।

शिकायत मिलने के बाद खंड शिक्षा अधिकारी विष्णु गुरुवार (4 अगस्त 2022) को गाँव पहुँच कर मामले की जाँच शुरू की और इसे सही पाया। प्रधान बताया कि मुजाहिद बच्चों को पढ़ाने नहीं जाता है और अक्सर स्कूल से कई-कई दिनों तक गायब रहता है।

प्रधान का कहना है कि इसकी शिकायत कई बार अधिकारियों से की जा चुकी है। वहीं, मंडलायुक्त समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश के बाद शिक्षक मुजाहिद हुसैन का कई बार वेतन भी काटा जा चुका है। हालाँकि, उस पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।

अब इस घटना के सामने आने के बाद मुजाहिद पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी बुद्धप्रिय सिंह ने बताया जाँच के दौरान ये प्रकरण सामने आया है और दोषी टीचर के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

 

सोनिया गाँधी, नेशनल हेराल्ड से लेकर पार्थ, राउत और नवाब मलिक तक: ED के 10 हाई-प्रोफाइल मामले जो 2022 में सुर्खियों में रहे

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भारत में वित्तीय गबन व धोखाधड़ी की जाँच करने वाली केंद्रीय एजेंसी है। प्रवर्तन निदेशालय इस साल 10 हाई-प्रोफाइल मामलों के कारण सुर्खियों में रहा। आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए ईडी कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी से लेकर, राहुल गाँधी, राकांपा के नवाब मलिक और शिवसेना के संजय राउत पर शिकंजा कस चुकी है। आइए जानते हैं वो 10 हाई-प्रोफाइल मामले कौन हैं।

1 – सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी

नेशनल हेराल्ड न्यूजपेपर (National Herald) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) कई बार कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को तलब कर चुकी है। नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया और राहुल गाँधी दोनों आरोपित हैं। इस मामले में देश भर में 12 ठिकानों पर छापेमारी की गई। इसमें नेशनल हेराल्ड का दफ्तर भी शामिल है। दोनों नेताओं पर सेक्शन 120 (B)(आपराधिक षडयंत्र) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत केस दर्ज हैं।

2- पार्थ चटर्जी और अर्पिता मुखर्जी

पार्टी से सस्पेंड कर दिए गए TMC नेता पार्थ चटर्जी (Partha Chatterjee) और अर्पिता मुखर्जी करोड़ों रुपए के एसएससी भर्ती घोटाले को लेकर ईडी की हिरासत में हैं। ममता सरकार में मंत्री रहे पार्थ की करीबी अर्पिता मुखर्जी के अलग-अलग फ्लैटों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापेमारी में अब तक 50 करोड़ रुपए से ज्यादा कैश और 5 किलो सोना बरामद कर चुका है।

3- सत्येंद्र जैन

इस साल 6 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ‘आप’ नेता सत्येंद्र जैन के घर सहित उनके 7 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। इस दौरान ईडी ने 2.82 करोड़ की अघोषित नकदी व 1.80 किग्रा सोना बरामद किया था। इसके बाद ईडी ने 9 जून को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जैन को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया था।

4- संजय राउत

ईडी को संजय राउत के बैंक अकाउंट में पहले 1 करोड़ 6 लाख रुपए के ट्रांजेक्शन की जानकारी मिली थी। इसके बाद दो और ट्रांजेक्शन (1.08 करोड़ रुपए और 1.15 करोड़ रुपए) का भी पता चला है। इस मामले में ईडी ने संजय राउत को पहले ही अरेस्ट कर लिया। 

5- राणा कपूर

यस बैंक के सह-संस्थापक राणा कपूर (Rana Kapoor) ने इस साल अप्रैल में प्रवर्तन निदेशालय (ED: Enforcement Directorate, ईडी) के सामने बड़ा खुलासा किया था। राणा कपूर ने ईडी को बताया कि उन्हें कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा से एमएफ हुसैन (MF Husain) की एक पेंटिंग खरीदने के लिए मजबूर किया गया था।

6- नवाब मलिक

ED ने इस साल अप्रैल में नवाब मलिक की करोड़ों की संपत्ति जब्त थी। एक कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, उस्मानाबाद में 147.794 एकड़ एग्रीकल्चर लैंड, कुर्ला में तीन फ्लैट और बांद्रा में दो आवासीय फ्लैट शामिल हैं।

7- पूजा सिंघल

आईएएस अफसर पूजा सिंघल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस साल मई में गिरफ्तार किया था। पूजा पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। इसके अलावा मनरेगा, कोयला ब्लॉक, खदान, खनिज विभागों में घोटाले का भी आरोप है।

8- फारूक अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (JKCA) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 26 जुलाई, 2022 को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला (Farooq Abdullah) के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।

9- कार्ति चिदंबरम

चीनी नागरिकों को रिश्वत के बदले वीजा के मामले में सीबीआई के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम पर मामला दर्ज कर जाँच तेज करने का फैसला लिया था। ईडी ने सीबीआई से कुछ दस्तावेजों की डिटेल माँगी था, ताकि जाँच में शामिल किया जा सके। ये दस्तावेज सीबीआई को कार्ति के ठिकानों पर छापेमारी में मिले थे।

10- भूपिंदर सिंह उर्फ हनी

अवैध तरीके से रेत खनन करने के मामले में गिरफ्तार किए गए पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) के भतीजे भूपिंदर सिंह उर्फ हनी (Bhupinder Singh) को अदालत ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। वह ED के सामने अपना अपराध कबूल चुका था।

‘रणवीर सिंह सॉलिड मर्द, मुझे उनसे प्यार हो गया है’: करण जौहर ने कहा- फिल्म की शूटिंग के दौरान मैंने उन्हें बहुत करीब से देखा

अपने बयानों के लिए विवादों में रहने वाले बॉलीवुड डायरेक्टर करण जौहर (Bollywood director karan Johar) का एक बयान फिर चर्चा में है। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड ऐक्टर रणवीर सिंह (Actor Ranveer Singh) से उन्हें प्यार हो गया है।

सोशल मीडिया पर करण ने लिखा, “तो… आज कोई मौका नहीं है… कोई मार्केटिंग एजेंडा नहीं है… कोई नया लॉन्च भी नहीं है! कुछ भी नहीं है! मेरे अंदर बस एक फीलिंग है, जो मैं आज सबके साथ शेयर करना चाहता हूँ! मुझे रणवीर सिंह से प्यार हो गया है! उस मर्द से! उस व्यक्ति से!”

उन्होंने आगे लिखा, “उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को इतना खास महसूस कराने की उनकी क्षमता … वह जो प्यार करता है जो वह देता और उसका अस्तित्व खास बनाता है और उसका आभामंडल… प्यार के हर छोटे भाव को व्यक्त करने का उसका जुनून…।”

करण जौहर का कहना है कि रणवीर सिंह जिस तरह अपना प्यार हर किसी के लिए जाहिर करते हैं, वह बहुत स्पेशल है। वह ऐसे स्टार हैं, जिनसे जो भी मिलता है वह इम्प्रेस हो जाता है। बॉलीवुड ही नहीं, साउथ में भी उन्हें सभी पसंद करते हैं। जिस किसी से भी पूछो वह रणवीर सिंह तारीफ ही करता है।

अपने पोस्ट में जौहर ने आगे लिखा, “अपनी फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ की शूटिंग के दौरान मैंने रणवीर को बहुत नजदीक से देखा और पता चला कि वे कितने सॉलिड हैं। पर्सनल लेवल पर मैं कभी किसी इंसान से इतना इम्प्रेस नहीं हुआ। आई लव यू रणवीर। जैसे ‘अच्छे बच्चे’ की तरह आपको पाला है, आप वैसे ही रहना।”

बता दें कि हाल ही में करण जौहर ने रणवीर सिंह के साथ ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ फिल्म की शूटिंग पूरी की है। वे अपने शो कॉफी विद करण-7 में भी रणवीर के साथ नजर आए थे। इस दौरान फिल्म की ऐक्ट्रेस आलिया भट्ट भी उनके साथ ही। इसके साथ ही उनके शो में आ चुके सामंथा रुथ, करीना कपूर खान, अक्षय कुमार जैसे कई कलाकारों ने रणवीर सिंह की तारीफ की है।

‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ के अलावा रणवीर सिंह फिल्म ‘सर्कस’ में भी नजर आने वाले हैं। फिल्म सर्कस को डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने बनाया है। इस फिल्म में रणवीर सिंह के साथ जैकलीन फर्नांडिस और पूजा हेगड़े लीड रोल में हैं।

गायों में तेजी से फैल रही है लम्पी स्किन बीमारी, राजस्थान में अब तक 1 लाख 21 हजार से ज्यादा गौ वंश चपेट में: CM गहलोत ने मोदी सरकार से माँगी मदद

भारत के कई हिस्सों में में गौ वंश लम्पी स्किन रोग नामक का शिकार हो रहे हैं। इस रोग से पीड़ित गौ वंश को बुखार आते हैं। बाद में उनके शरीर पर धब्बे पड़ने लगते हैं। हालत गंभीर होने पर बहुत सी गायों की मौत भी हो गई है। इस बीमारी का सबसे अधिक प्रकोप राजस्थान में दिखाई दिया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस पर चिंता जताई है और केंद्र की मोदी सरकार से सहायता की माँग की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अशोक गहलोत ने बताया कि गौ वंश को लम्पी रोग से बचाने के लिए राज्य सरकार सभी प्रयास कर रही है। उन्होंने पशुधन को किसानों की जीवन रेखा बताया। केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता की माँग के साथ गहलोत ने गौशाला चलाने वालों, स्वयंसेवी संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों से इस बीमारी को रोकने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया है।

जानकारी के मुताबिक यह बीमारी राजस्थान के अलावा गुजरात, तमिलनाडु, ओडिशा, कर्नाटक, केरल, असम, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेष और मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में पाँव पसार रही है। राजस्थान में यह खास तौर पर जैसलमेर, जालौर, बाड़मेर, पाली, सिरोही, नागौर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जोधपुर, चुरू, जयपुर, सीकर, झुंझुनू, उदयपुर, अजमेर व बीकानेर जिलों में फैली है। अकेले राजस्थान में इस रोग से प्रभावित होने वाले पशुओं की संख्या 1 लाख 21 हजार तक बताई जा रही है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक लंपी स्किन एक वायरल बीमारी है। इसका कोई सटीक इलाज नहीं है। यह मछर की कुछ प्रजातियों और खून चूसने वाले कीड़ों के काटने से फ़ैल रहा है। एक पशु से दूसरे पशु में यह तेजी से फैलता है। पशु डॉक्टर इस रोग का इलाज लक्षणों के आधार पर करते हैं। बीमारी द्वारा पशुओं के अधिक नुकसान होने पर पशुओं की मौत भी हो जाती है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक इस बीमारी के इंसानों में फैलने की आशंका न के बराबर बताई जा रही है। डॉक्टरों ने पशुओं को छूने के बाद हाथ धोने की सलाह भी दी है। बताया गया है कि गौ वंश के अलावा यह बीमारी भैंस, बकरी और भेड़ों में भी तेजी से फ़ैल सकती है। इस बीमारी से पशुओं के बचाव के लिए समय पर उनके टीकाकरण की सलाह दी गई है।

अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान, जहाँ किया जाता है लाभ का दुरुपयोग… न्यायिक सुधारों की भी आवश्यकता: डॉ. अतुल कोठारी

देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली को लेकर लंबे समय तक बहस चलती रही है। खासकर इतिहास के पाठ्यक्रमों में इस्लामी आक्रांताओं का जिस तरह से महिमामंडन किया गया है, उसको लेकर भारतीय जनमानस में हमेशा से विरोध के स्वर उठते रहे हैं। शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अनुषांगिक संगठन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने दीनानाथ बत्रा और डॉक्टर अतुल कोठारी के नेतृत्व में लंबी लड़ाई लड़ी है।

पाठ्य-पुस्तकों में किस तरह के बदलाव की आवश्यकता है, इसको लेकर न्यास की ओर से सरकार को पूरा रोडमैप दिया गया। हालाँकि, पहले की सरकारों ने इस पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया। बाद में ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ के तहत एक लंबा संघर्ष किया गया। सरकार बदलने के साथ ही इनमें से कई बिंदुओं पर काम हुआ है और कई पर काम हो रहा है। इन्हीं सब मुद्दे पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुलभाई कोठारी से ऑपइंडिया के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर गहलोत ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश:

अभी हाल ही में राजस्थान के एक स्कूल से यह बात सामने आई कि वहाँ Father का अर्थ अब्बू, Mother का अर्थ अम्मी पढ़ाया जा रहा है। घर से बिरयानी बनाकर लाने के लिए कहा जा रहा है। पाठ्यक्रमों के इस्लामीकरण को लेकर आप क्या कहेंगे?

झारखंड, बिहार की जो बात आई है, वो एक अलग बात है। वहाँ क्या हुआ है कि झारखंड में जिस जिले में मुसलमानों की संख्या बढ़ गई है, वहाँ उन्होंने दबाव बनाकर वहाँ के विद्यालयों में उर्दू के बोर्ड लगा दिए, प्रार्थना बदल दी, खान-पान सब बदल दिया। ये सारी बातें उन्होंने की। यह बात जब प्रकाश में आई तो और भी कई जगहों की बातें सामने आईं। बिहार में भी किशनगंज और कुछ जिलों में कुछ वर्षों से इसी प्रकार चल रहा है। ये बातें बिल्कुल उचित नहीं हैं, क्योंकि सरकारी विद्यालयों में इस प्रकार की बातें होना गैर-कानूनी है। झारखंड में सरकारी वक्तव्य आया है कि ये सब सब बंद कर दिया जाएगा।

ये एक अलग मुद्दा है। जहाँ उनकी संख्या है, वहाँ ये दबाव बना रहे हैं, लेकिन जहाँ उनका दबदबा नहीं है, वहाँ भी ऐसा हो रहा है। राजस्थान का स्कूल कॉन्वेंट स्कूल है। वहाँ ऐसी किताबें पढ़ाई जा रही हैं। किताब CBSE पैटर्न पर है और हैदराबाद से छपती है। क्या कहेंगे इस पर?

कुछ वर्षों ऐसा सारा कुछ हुआ है, अभी बाहर आ रहा है। राजस्थान में जो पढ़ाई जा रही है और हैदराबाद में जो छपी है, वो प्राइवेट पब्लिकेशन की किताब है। ये प्राइवेट पब्लिकेशन वाले क्या करते हैं कि NCERT की किताब तो छापते हैं, लेकिन इसमें इस तरह के छोटे-मोटे बदलाव करके छापते हैं। ये बिल्कुल अनुचित है। कई वर्षों से ये सब चल रहा था, अभी ये बाहर आ रहा है, जब परिस्थिति बदली है, वातावरण बदला है, सरकारें बदली हैं।

इस्लामीकरण की यह प्रक्रिया कुछ-कुछ मदरसों की लाइन पर है। कई वीडियो सामने आ चुके हैं, जिनमें मदरसों में बच्चों को बताया जा रहा है कि हिंदू उनके दुश्मन हैं। सरकार मदरसों को फंडिंग कर रही है। मदरसों के पाठ्यक्रमों में बिना बदलाव के अगर सरकार उन्हें फंडिंग करे तो इससे किस तरह के उद्देश्य की पूर्ति होगी?

मदरसे दो-तीन प्रकार के देश में हैं। एक मदरसे, जिनकी सरकार फंडिंग करती है। एक मदरसे ऐसे हैं, जिन्होंने प्रयास किया, लेकिन उन्हें सरकार की फंडिंग नहीं मिल रही है और तीसरे ऐसे हैं, जिन्होंने प्रयास ही नहीं किया सरकार की फंडिंग का। जो सरकार की फंडिंग नहीं लेते हैं, उनमें ये सब ज्यादा हो रहा है, क्योंकि उन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। दुर्भाग्य से, पूर्व की सरकारों में सरकारी फंडिंग वाली मदरसों में भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था।

उत्तर प्रदेश और असम जैसे कई ऐसे राज्य हैं, जहाँ मदरसों को अनुदान दिया जाता है, वहाँ शिकंजा कसा जा रहा है। वहाँ पहले राष्ट्रगान नहीं होता था, वहाँ सरकारी परंपरा के तहत काम नहीं होता था। ये सब अब धीरे-धीरे होने शुरू हुए हैं।

जब हमने शिक्षा बचाओ आंदोलन के द्वारा साल 2004 में काम शुरू किया था तो हमने कई मदरसों के पाठ्यक्रमों का अध्ययन किया था। हमने मँगाए थे। उर्दू में थे। इसका अनुवाद करके हमने एक किताब भी छापी थी, छोटी सी। उन मदरसों में इस प्रकार के पाठ्यक्रम सारे पढ़ाए जाते थे और आज भी पढ़ाए जाते होंगे। जो मदरसे सरकारी नियमों का पालन नहीं करते हैं, ऐसे हजारों मदरसे हैं देश में, जो सरकारों के संज्ञान में भी नहीं हैं शायद। ऐसे मदरसों में ये सारी बातें हो रही हैं। 

जब ऐसे मदरसों के होने की बात सामने आ चुकी हैं, जो सरकार से संबद्ध नहीं हैं, उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? हाल के दिनों में कट्टरवाद ज्यादा बढ़ा है और कर्नाटक, राजस्थान जैसे राज्यों में गला काटने की घटनाएँ बढ़ी हैं। ये सब देखने के बाद भी सरकार की क्या बाध्यता है? क्या संविधान वजह या कुछ और?

इसके पीछे दो-तीन कारण हैं। एक तो संविधान के अनुच्छेद 29-30 के तहत अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, वो एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। CBSE से संबद्ध मध्य प्रदेश के एक अल्पसंख्यक स्कूल की बात आई तो वहाँ के अधिकारियों ने ये कहा कि हमारे हाथ बँधे हुए हैं, क्योंकि ये संवैधानिक प्रावधान है। इसलिए उसमें ज्यादा कुछ नहीं कर पाते हम लोग। 

दूसरी बात क्या है कि जंप लगाकर एकदम से ऊपर वाली मंजिल पर नहीं पहुँच सकते है। अभी जो सरकार ने काम शुरू किया है तो पहली सीढ़ी से काम शुरू किया है कि कम से कम जो मदरसे सरकारी अनुदान लेते हैं, इनको तो पहले ठीक किया जाए। क्योंकि, ये बहुत व्यापक समस्या है। सरकार ने इस पर क्रमबद्ध काम शुरू किया है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) भी इस पर काम कर रहा है। उन्होंने इस पर काफी बड़ा सर्वे करके एक किताब लिखी है। उसमें उन्होंने सारी बातें लिखी हैं कि जो सरकार की अनुमति लिए बिना मदरसे चल रहे हैं, उसके कारण अल्पसंख्यक बच्चों का काफी बड़ा नुकसान हो रहा है। उन्हें मिड डे मिल आदि नहीं मिल रहा है। 

वास्तव में जो व्यवस्था वर्षों से स्थापित हो जाती हैं वो असत्य भी सत्य के रूप में स्थापित हो जाती है। जैसे दिल्ली में सेंट स्टीफंस और दिल्ली विश्वविद्यालय की लड़ाई चल रही है। देश में सेंट्रल एडमिशन सिस्टम शुरू हुआ, उसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी भी भाग ले रही है, लेकिन उसको सेंट स्टीफंस कॉलेज मानने के लिए तैयार नहीं है। वर्षों से एक ऐसा मानस तैयार हो गया है कि इनके लिए तो सब छूट है। 

कर्नाटक में यह बात आई है कि अगर मुस्लिम महिलाओं को हिजाब में स्कूल-कॉलेजों में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी तो वे अपना अलग स्कूल-कॉलेज खोलेंगे, जहाँ हिजाब आदि की अनुमति होगी। ऐसे में जिस कट्टरता को रोकने के लिए सरकार ने स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध का निर्णय लिया, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। सरकार क्या करेगी?

सरकार तो इसे वैधानिक तरीके से नहीं रोक पाएगी, इसलिए मूल बात पर ही क्रेंद्रित होने की आवश्यकता है। ये संविधान की धारा 29-30 है, उस पर प्रश्न उठाने की जरूरत है। आज अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान किस प्रकार के हैं? मान लें कि 7 संस्था हैं उनके पास तो उसमें से चार को अल्पसंख्यक संस्थान बना दिए। इसको मान्यता अल्पसंख्यक आयोग दे देता है। उसमें बच्चे भी अल्पसंख्यक नहीं हैं और ना ही अल्पसंख्यक शिक्षक बहुमत में हैं। अल्पसंख्यक सिर्फ एक दिखावा है। इस अल्पसंख्यक के लाभ का दुरुपयोग किया जाता है। 

इसी तरह धारा 29-30 है, उसमें अल्पसंख्यक की सही रूप से व्याख्या नहीं की गई है। कई बार लगता है कि हमारे न्यायालय भी बचते हैं इससे। सुप्रीम कोर्ट में एक केस आया था, जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उस समय हस्तक्षेप किया था। शायद 2001-02 की बात है। उस केस में मूल बात थी कि देश भर में अल्पसंख्यक संस्थानों के खिलाफ अलग-अलग कई राज्यों में केस थे तो एक सुप्रीम कोर्ट में लाया गया। लेकिन, निर्णय क्या आया कि सेल्फ फाइनेंस के संदर्भ में निर्णय आ गया। तो सेल्फ फाइनेंस में जो 50% पेमेंट सीट थी, उस संदर्भ में जजमेंट दे दिया गया कि ये गलत है।

यानी आप न्यायिक सुधारों की भी बात कर रहे हैं?

आवश्यकता है। एक तो मूल बात है कि ये जो वातावरण होता है, उसमें सब लोग बहते हैं। तो कोई उसमें हाथ डालना नहीं चाहता है। जब नूपुर शर्मा के बारे में स्टेटमेंट आया तो एक पूर्व माननीय न्यायाधीश ने जिस प्रकार प्रतिक्रिया दी, जबरदस्त प्रतिक्रिया थी। इन सारी बातों का विचार करना पड़ेगा।

शिक्षा बचाओ आंदोलन जब शुरू किया गया था, उसमें बहुत सारे इतिहास में बदलाव की बात हो रही थी। अकबर को महान बताना, टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी बताना, मुगलों को महिमामंडित करना आदि मुद्दा था। दीनानाथ बत्रा जी ने भी बहुत गंभीरता से इसे उठाया, लेकिन कुछ खास बदलाव नहीं दिख रहा है। क्या वजह है?

ऐसा नहीं है। हमारा पहले से ही मानना है कि आंदोलन तो एक मजबूरी होती है, तभी उसे किया जाता है। वैचारिक दृष्टि से हमारी यही मान्यता है कि समन्वय से कोई समाधान निकलता है जब तक, तब तक संघर्ष नहीं होना चाहिए। शिक्षा बचाओ आंदोलन के माध्यम से भी हमने किए कुछ सुधार। हमने शुरुआत तो समन्वय से किया। हमने तात्कालिक मानव संसाधन विकास मंत्री से कई बार मिलने का प्रयास किया। हमने हर स्तर पर अपनी बात लिखित रूप में दी, हमने आवेदन दिए, हमने बातचीत का प्रयास किया। लेकिन, जब सुनवाई नहीं हुई कहीं तो तब हमें उस मार्ग पर जाना पड़ा। 

तो आज जब सुनवाई हो रही है, जैसे कुछ समय पूर्व सरकार ने इन पाठ्यक्रमों के लिए एक राज्यसभा की समिति गठित की थी, विनय सहस्त्रबुद्धे जी की अध्यक्षता में। उस समय उन्होंने हमें बुलाया था। उन्होंने हमारी बात सुनी। हमने लिखित में भी सारा कुछ दिया। वो सारा रिकॉर्ड में आया और उन्होंने सारा कुछ NCERT को भेजा। NCERT में भी एक व्यक्ति की नियुक्ति हुई इसके लिए।

अभी जो नया पाठ्यक्रम तैयार हो रहा है, इसमें हमें बदलाव होने की संभावना लग रही है। बीच में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित नहीं हुई थी, तो उस समय NCERT ने देश भर से सुझाव माँगे थे कि अभी जो पुस्तकें हैं इसमें क्या सुधार होना चाहिए। उस समय हमने भी दिए थे। उस समय कुछ बदलाव किए गए। बहुत ज्यादा नहीं हुआ, लेकिन कुछ किए गए। सरकार ने एक समग्र शिक्षा नीति घोषित की है और उसमें हर स्तर पर पाठ्यक्रमों में बदलाव शुरू हो गया है। 

पाठ्यक्रम बदलना एक बड़ा काम है, अकादमिक काम है। जो वर्षों से चला आ रहा है, उसको एकदम से बदलना आसान नहीं है। उसमें समय लगता है। इस सरकार ने लोकतांत्रिक रवैया अपनाते हुए राज्य सरकरों की SCERT से भी सुझाव माँगे और इस प्रक्रिया में सबको शामिल किया।

CBSE और राज्य बोर्ड की परीक्षाओं में नंबर देने को लेकर भी संतुलन नहीं होता। इसका क्या उपाय है?

शिक्षा समवर्ती सूची में है। कुछ विषयों पर केंद्र का अधिकार है, कुछ पर राज्य का और कुछ पर दोनों का। इसलिए इस पर सरकार कुछ दबाव नहीं दे सकती। ये संवैधानिक व्यवस्था है।  

यूपी-बिहार जैसे राज्य में किसी को 70-80 प्रतिशत नंबर आते हैं तो वह टॉप कर जाता है। वहीं, CBSE में 98% भी आते हैं। जब देश के सर्वोच्च विश्वविद्यालयों में नामांकन की बारी आती है तो कम नंबर वाले बच्चे पिछड़ जाते हैं। इसका क्या समाधान है?

वास्तव में यह बहुत बड़ा प्रश्न है, क्योंकि इसमें कुछ अंश में CBSE भी जिम्मेदार है। ये बहुत वर्षों पहले से हुआ है कि सीबीएसई में बहुत अधिक मार्क्स दिए जाते हैं और राज्यों में इस प्रकार नहीं होता था। अब कुछ राज्यों में भी होने लगा। 

फिर तो राज्य बोर्डों के बीच प्रतिस्पर्धा चल पड़ेगी अपने छात्रों को अधिक नंबर देने की। ऐसा मामला आ भी चुका है। क्या इससे शिक्षा का स्तर प्रभावित नहीं होगा?

इसके लिए शीर्ष विश्वविद्यालयों या संस्थानों पर दबाव को कम करना पड़ेगा। हर राज्यों में ऐसे विश्वविद्यालय खड़े करने की जरूरत है। जब दबाव कम होगा तो इस समस्या का समाधान भी निकलेगा।

नई शिक्षा नीति में इस प्रश्न पर भी विचार किया गया है। उसमें छात्रों पर परीक्षा को लेकर जो दबाव है, उसको कम करने की भी बात आई है। नई शिक्षा नीति अपने आप में समग्र है। इसमें कौशल विकास से लेकर नैतिक संस्कार एवं चरित्र निर्माण पर भी ध्यान दिया गया है।  

‘नेशनल हेराल्ड मामले में मोतीलाल वोहरा वित्तीय फैसला लेने के कोई दस्तावेज नहीं’: ED, सोनिया और राहुल गाँधी ने किया था दावा

नेशनल हेराल्ड (National Herald) केस की जाँच कर रही ED (प्रवर्तन निदेशालय) के मुताबिक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि आर्थिक फैसले मोतीलाल वोहरा द्वारा लिए जाते थे। बताया जा रहा है कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने पूछताछ में सभी फैसले मोतीलाल वोहरा द्वारा लेना बताया था जिसके लिए ये दोनों लोग लिखित प्रमाण नहीं दे पाए। मोतीलाल वोहरा कॉन्ग्रेस पार्टी में सबसे लम्बे समय तक कोषाध्यक्ष रहे थे जिनकी साल 2020 में मृत्यु हो गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ED से हुई पूछताछ में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने बताया कि एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड और यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सभी आर्थिक फैसले मोतीलाल वोहरा लेते थे। कॉन्ग्रेस पार्टी के मल्लिकार्जुन खड़गे और पवन कुमार बंसल जैसे कुछ अन्य नेताओं ने भी इसी बात का दावा ED के आगे किया था। सोनिया और राहुल की तरह बाकी अन्य नेता भी अपने दावों का कोई सबूत ED के आगे पेश नहीं कर पाए।

दावा इस बात का भी किया जा रहा है कि खड़गे को संसद सत्र के दौरान ED द्वारा पूछताछ के लिए तलब करना ही एकमात्र रास्ता था क्योंकि खड़गे यंग इंडिया के एकलौते स्टाफ हैं। यंग इंडिया का जो ऑफिस कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा संचालित न्यूज़ पेपर नेशनल हेराल्ड के दिल्ली स्थित परिसर में है उसे ED ने सील कर दिया है। ऐसा कदम यंग इंडिया कम्पनी के खिलाफ लगे मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की ED द्वारा हो रही जाँच में सबूतों से किसी संभावित छेड़छाड़ रोकने के चलते उठाया गया है।

क्या है पूरा मामला

इस मामले में सबसे पहले साल 2012 में भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने एक अदालत में यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में वित्तीय गड़बड़ियों के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। स्वामी के मुताबिक इस पूरे मामले में आरोपितों ने लगभग 2000 करोड़ का अवैध लाभ कमाया था। उस समय मोतीलाल वोहरा कॉन्ग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष थे और दावा किया जा रहा है कि इस पूरे मामले में सक्रिय तौर पर शामिल थे। साल 2008 में नेशनल हेराल्ड अखबार को बंद करने की घोषणा करने वाले समझौते पर भी उनके दस्तखत थे।

बालपन की कुछ सफेद कहानियाँ और काले कपड़ों वाली कॉन्ग्रेस…

एक परिवार। इतना सशक्त कि स्वतंत्र भारत में उसके सामने खड़े होने की कोई कल्पना न कर सके। जो चुनौती दे उसका अस्तित्व ही मिट जाए। या फिर उसे पिछलग्गू बन शेष जीवन गुजारना पड़े। आज उसे ईडी के सामने हाजिरी लगानी पड़ रही है। हेराफेरी के आरोपों में कब गिरफ्तारी हो जाए, कहा नहीं जा सकता।

एक पार्टी। इतनी ताकतवर कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक उसके सामने किसी का वजूद न दिखे। वह आज खुद वजूद के संकट से जूझ रही है।

जो मनमर्जी से मुख्यमंत्री बदलते रहे हैं, पर्दे के पीछे से प्रधानमंत्री को हाँकते रहे हैं, हर संवैधानिक संस्था को कुचलने के आदी रहे हैं, आज उसके वारिस को इस देश का आम आदमी ‘पप्पू’ समझे तो तड़पना स्वभाविक है।

यही कारण है कि शुक्रवार (5 अगस्त 2022) को कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार ने अपने समर्थकों के साथ काले कपड़ों में संसद से सड़क तक जो हंगामा किया वह बेअसर ही रही। मीडिया के लिए भी कमोबेश यह एक सियासी नौटंकी ही थी, जो नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय के कसते शिकंजे से उपजा था।

कॉन्ग्रेस की इस बौखलाहट से बचपन की कुछ कहानियॉं स्मृतियों में तैरने लगी। ये वे कहानियॉं हैं जो बताती हैं कि कॉन्ग्रेस की दुर्गति होनी ही थी, उसके शीर्ष परिवार का अहंकार टूटना ही था। एक दिन इस देश और उसकी जनता के सामने उसे नग्न होना ही था।

पहली कहानी: उल्लू (कॉन्ग्रेस) और बंदर (जनता)

जंगल में एक उल्लू रहता। उसे दिन में कुछ दिखाई नहीं देता। वह दिनभर घोंसले में छिपा रहता। एक दिन भयंकर गर्मी में कहीं से कोई बंदर उस घोंसले के पास आया और कहा कि आज सूर्य किसी आग के गोले की तरह चमक रहा। यह सुन उल्लू बोल उठा- तुम झूठ बोलते हो। सूर्य कुछ होता नहीं। चंद्रमा कहते तो मैं भी मान लेता। बंदर ने समझाने का काफी प्रयास किया। लेकिन उल्लू सुनने को तैयार नहीं। उलटा अपने साथियों के संग बंदर का मजाक उड़ाने लगा। बंदर को मारने पर उतावले हो गया। आखिर में बंदर ने भागकर जान बचाई।

ठीक इसी कहानी की तरह कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार ने जनपथ की कोठरी में खुद को कैद कर लिया। जनता की आवाज को अनसुना किया। मुस्लिम तुष्टिकरण की आड़ में हिदू भावनाओं की उपेक्षा की। बहुमत के बल पर सत्य को असत्य बताती रही। मानती रही कि उसका कहा ही अंतिम सत्य है। लिहाजा जब भारत की नई पीढ़ी ने अंगड़ाई ली, सोशल मीडिया ने उनकी मुखरता को आवाज दी तो कॉन्ग्रेस को पता ही नहीं चला कि उसके पैरों के नीचे से जमीन कब खिसक गई।

दूसरी कहानी: मेंढक (कॉन्ग्रेस) और बैल (जनता)

तालाब में एक मेंढक अपने परिवार के साथ रहता। खुद को बड़ा बताने और ताकतवर दिखाने के लिए अपने ही बच्चों को झूठी कहानियाँ सुनाता। एक दिन मेंढक के बच्चे तालाब से बाहर निकल गए। एक बैल को देखा। उसका कद-काठी और ताकत देख अचंभित हो उठे। तालाब में लौट पिता को बैल के बारे में बताया। कुंठित मेंढक बच्चों को प्रभावित करने के लिए अपने शरीर को फुलाते गया और आखिर में फटकर छितरा गया।

जमीन से कट चुकी कॉन्ग्रेस ने तालाब को ही पूरा देश मान लिया। मान लिया कि नेहरू-गाँधी परिवार से न कोई बड़ा, न कोई ताकतवर। लिहाजा जब जनता ने अपना बल दिखाया तो फटना ही उसकी नियति थी।

तीसरी कहानी: कौवा (कॉन्ग्रेस) और बगुला (जनता)

सूखा पड़ा। मनुष्य से लेकर पशु पक्षी तक खाने-पीने को तरस गए। कई दिनों से भोजन की तालाश कर रहे कौवे ने जब एक तालाब में बगुले को चुन-चुनकर मछली खाते देखा तो उसे यह बड़ा आसान लगा। वह तालाब के किनारे पहुँचा तो बगुले ने मदद की पेशकश की। आगाह किया कि तालाब में जाना उसके लिए जानलेवा हो सकता है। लेकिन कौवा अपनी गुमान में। मछली का शिकार करने खुद तालाब में उतर गया। कीचड़ में उलझ गया। कुछ देर बाद दम घुटने से मर गया।

यह कहानी हमें बताती है कि कुछ भी बैठे-बैठे हासिल नहीं होता। उसके लिए लगातार श्रम की आवश्यकता होती है। केवल नकल भर से वांछित परिणाम हासिल नहीं किया जा सकता। 2014 में जब लगातार जमीनी श्रम की वजह से भाजपा उभरी, हिंदू भावनाओं के रथ पर सवार हो भारतीय राजनीति के पटल पर नरेंद्र मोदी छा गए, उसके बाद भी कॉन्ग्रेस मुगालते से बाहर नहीं निकली। उसे लगा कि वह हिंदुओं को मूर्ख बनाकर सत्ता फिर से हासिल कर लेगी। लिहाजा जब-जब चुनाव आते हैं उसके युवराज ‘हिंदू’ बन जाते हैं। चुनाव खत्म होते ही विदेश निकल जाते हैं। राजनीति पूर्णकालिक कार्य है। यहाँ नकल से भी नतीजे तभी मिलते हैं जब आप लगातार जमीन पर सक्रिय रहें।

बालपन की ऐसी कई कहानियाँ हैं जिन्हें हम बढ़ती उम्र के साथ भूल जाते हैं। लेकिन इनमें जीवन भर के सबक होते हैं। शायद इन कहानियों से कोई रास्ता भी निकलता हो जो मृत्यु शय्या पर पड़ी पार्टी को कुछ जीवन दे जाए। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए जिस पार्टी ने देश को सही इतिहास नहीं पढ़ने दिया, क्या उस पार्टी के नेताओं ने कभी ये नैतिक कहानियाँ पढ़ी होंगी?

IPL खेलने के लिए फैक्ट्री में काम, पैसे बचाने के लिए कई KM पैदल चलना: 9 साल 3 महीने बाद परिवार से मिले मुंबई इंडियंस के खिलाड़ी कार्तिकेय सिंह

मुंबई इंडियंस के खिलाड़ी कार्तिकेय सिंह (Kartikeya Singh) की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। दरअसल, कार्तिकेय अपने परिवार से पूरे 9 साल 3 महीने बाद मिले हैं। उन्होंने अपने माता-पिता की भावुक मुलाकात की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं।

अपनी माँ की गोद में लेटे हुए फोटो शेयर करते हुए कार्तिकेय सिंह ने लिखा, “एक अरसे बाद जब मिला आपसे, लगा दुनिया की भीड़ में जन्नत का रास्ता मिल गया। मानो बचपन में खोया मैं कहीं, फिर आहिस्ता से आपके पल्लू का छोर मिल गया।”

कार्तिकेय पहली बार तब सुर्खियों में आए, जब उन्हें इंडियन प्रीमियर लीग 2022 में मुंबई इंडियंस ने मोहम्मद अरशद खान की जगह अपनी टीम में शामिल किया था। बताया जाता है कि आईपीएल के 15वें सीजन के लिए जब नीलामी हुई उस वक्त कार्तिकेय का कोई खरीददार नहीं मिला था।

हालाँकि, वह समय भी आया जब 20 लाख के बेस प्राइज में नीलामी के बाद उन्हें इस लीग में खेलने का मौका मिल गया। कार्तिकेय सिंह का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा है। बाएँ हाथ के स्पिनर ने क्रिकेट की दुनिया में अपना सिक्का जमाने के लिए जी तोड़ मेहनत की। इस दौरान लगभग नौ वर्षों तक वह अपने घर भी नहीं गए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार्तिकेय रणजी ट्रॉफी 2021-22 सीजन में दूसरे सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज रहे हैं। इसमें उन्होंने 11 पारियों में तीन बार पाँच विकेट लेते हुए कुल 32 विकेट चटकाए। इसके पहले उन्हें 2018 में रणजी के लिए चुना गया था।

24 वर्षीय गेंदबाज कार्तिकेय ने कहा, “मेरे पास घर जाने का समय था, लेकिन जब मैंने पापा से आखिरी बार बात की थी तो उन्होंने कहा था कि अब जब तुम चले गए, कुछ हासिल करो और तभी वापस आना। मैंने सिर्फ एक शब्द कहा, हाँ। हाँ मैंने इसीलिए कहा, क्योंकि मैं कुछ हासिल करने के बाद ही घर जाना जाता था।”

बता दें कि क्रिकेट के लिए कार्तिकेय महज 15 साल की उम्र में अपने होमटाउन कानपुर को छोड़ कर दिल्ली आ गए थे। कार्तिकेय ने पैसों की तंगी के बावजूद कभी भी अपने माता-पिता से मदद नहीं माँगी। कार्तिकेय को पैसों की इतनी तंगी थी कि उन्हें गाजियाबाद में मजदूरी करनी पड़ी।

कार्तिकेय सिंह क्रिकेट एकेडमी से लगभग 80 किलोमीटर दूर मजदूरी करने जाते थे। इस दौरान वह कई-कई किलोमीटर पैदल भी चलते थे, ताकि बिस्कुट खाने के लिए वह 10 रुपए बचा सकें। इस बीच फैक्ट्री के पास ही उन्हें रहने की एक जगह मिल गई थी। वह रात में फैक्ट्री में काम करते थे और दिन में क्रिकेट खेलते थे।

3 फीट से ऊँची न हो भगवान गणेश और माँ दुर्गा की मूर्ति, वरना जब्त करेगी पुलिस: राजस्थान सरकार ने मूर्तिकारों को भेजा नोटिस, POP पर भी रोक

राजस्थान की कोटा (Kota, Rajasthan) पुलिस ने आगामी गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा के लिए मूर्तियाँ बनाने वालों को कुछ प्रतिबंधों के साथ दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इन निर्देशों में प्रतिमाओं की ऊँचाई 3 फीट से अधिक नहीं होने की बात भी कही गई है। 4 अगस्त 2022 (गुरुवार) को भेजी गई नोटिस में कहा गया है कि इन आदेशों का पालन नहीं करने वालों की मूर्तियाँ कर ली जाएँगी।

बताया जा रहा है कि यह आदेश कोटा शहर के थाना जवाहर नगर के SHO ने मूर्तिकार मृत्युंजय विश्वास को दिया है। इस आदेश के विषय में ‘POP (प्लास्टर ऑफ़ पेरिस) की प्रतिमाएँ न बनाने को कहा गया है। इससे मूर्तिकार परेशान हो गए हैं। उनकी कई प्रतिमाएँ पहले ही बन चुकी हैं, जिनकी ऊँचाई अधिक है।

नोटिस में आगे लिखा गया है, “गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा और अनंत चतुर्दशी में बनी प्रतिमाओं का विसर्जन चंबल नदी और किशोर सागर तालाब में किया जाता है। इससे जल प्रदूषण होता है और जलीय जंतुओं को खतरा पैदा होता है। अगर कोई प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्ति बनाता पाया गया तो उसकी मूर्ति जब्त कर ली जाएगी।” नोटिस के अंत में मोटे-मोटे शब्दों में लिखा गया है कि मिट्टी की मूर्तियों की ऊँचाई 3 फीट से अधिक नहीं होगी।

ट्विटर यूजर सुजीत स्वामी ने अपने हैंडल shibbu87 से आदेश की कॉपी को शेयर किया है। सुजीत ने इस ट्वीट में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री कार्यालय, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कोटा एवं राजस्थान पुलिस के तमाम अधिकारियों को टैग किया है।

सुजीत ने अपने ट्वीट में लिखा है, “मुगल शासन भी ऐसा ही होगा। गजानन 3 फुट से ज्यादा के न हों। जल प्रदूषित होता है। सिर्फ हिंदू त्योहार से ही जल, वायु, अग्नि, ध्वनि, भूमि, प्रदूषण होता है क्या?”

दैनिक भास्कर के मुताबिक, प्रशासन द्वारा ये नोटिस कड़े निर्देश के साथ कई मूर्तिकारों को भेजी गई हैं। मूर्ति बनाने वालों को इस आदेश से काफी परेशानी हो रही है और वो मूर्तियों की ऊँचाई पर लगे प्रतिबंध को हटाने की माँग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सैकड़ों मूर्तियाँ पहले ही बनाई जा चुकी हैं।

ऑपइंडिया ने इस नोटिस की पुष्टि के लिए कोटा शहर के जवाहर नगर थाने के SHO से बात की। उन्होंने नोटिस भेजना स्वीकार करते हुए कहा, “ये आदेश अकेले मैंने नहीं दिया। ये आदेश मुझे मेरे वरिष्ठों ने दिया है, जिसका मैं अपने क्षेत्र में पालन करवा रहा हूँ।”

बच्चे डर से छोड़ चुके थे स्कूल, औरतें भी पूरे शरीर को… : अफगानिस्तान से भारत आया 28 शरणार्थी सिखों का जत्था, कहा- पहली बार चैन की नींद सोए

अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आने के बाद वहाँ के बचे-खुचे सिखों ने पलायन कर दिया है। इस बीच काबुल में मौजूद गुरूद्वारे को भी आतंकियों द्वारा निशाना बनाया गया। पलायन करने वाले सिख परिवारों को दिल्ली में पश्चिम दिल्ली के महावीर नगर में बसाया गया है। 28 सिखों का सबसे अंतिम दस्ता बुधवार (3 अगस्त 2022) को भारत आया है। यहाँ आ कर उन्होंने अफगानिस्तान में गैर मुस्लिमों के भयावह हालातों के बारे में बताया है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के मुताबिक अफगानिस्तान से आए तरण सिंह ने बताया कि तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद उनके बच्चे डर से स्कूल नहीं जा रहे थे। उनके परिवार वाले जिस प्रकार से दिल्ली में स्वतंत्र हो कर घूम रहे हैं ऐसा अफगानिस्तान में सम्भव ही नहीं था। तरण सिंह अपने अवनीत नाम के बच्चे का एडमिशन दिल्ली के एक स्कूल में करवाना चाहते हैं।

तरण सिंह की अफगानिस्तान के जलालाबाद में एक छोटी सी कॉस्मैटिक्स की दुकान थी। उनके बेटे अवनीत को दिल की बीमारी भी है। इसका अस्थाई इलाज उन्होंने पाकिस्तान के पेशावर में इसलिए करवाया था क्योंकि उनको इलाज के लिए भी भारत का वीजा नहीं मिल पाया था। वहीं अफगानिस्तान में आतंकी हमला झेल चुके एक अन्य सिख सरदार गुरमीत के मुताबिक भारत में बिताई गई पहली रात वो बेहद चैन से बिना किसी के डर के सोए।

गुरमीत की पत्नी मनमीत कौर के मुताबिक उनकी शादी को 1 साल हो गया था लेकिन वो जब बहुत ही जरूरी हुआ तब ही घर से बाहर निकल पाईं। घर से निकलने के लिए भी उनको मुस्लिम महिलाओं की तरह सिर से पैर तक खुद को ढकना पड़ा था। अपने भविष्य की चिंता करते हुए 18 साल की मनमीत कौर ने खुद को भारत में सुरक्षित बताया जहाँ वो अपनी धार्मिक मान्यताओं को बिना रोकटोक पूरा कर रही हैं।

110 सिख अभी भी अफगानिस्तान में फँसे

जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान में अभी भी 110 सिख फँसे हुए हैं। वो भारत आना चाह रहे हैं। इन 110 सिखों में 60 को अभी तक वीजा नहीं मिल पाया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी ने भारत सरकार से इन सभी को जल्द से जल्द भारत लाने की माँग की है।

एसजीपीसी के समन्वयक सुरिंदर पाल सिंह समाना ने कहा, “अफगान-सिखों को बुधवार को सुरक्षित निकाल लिया गया और वे वर्तमान में तिलक नगर स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु अर्जन देव में रह रहे हैं। उन्हें जल्द ही गुरुद्वारा समिति द्वारा आवास की सुविधा प्रदान की जाएगी। हम अपनी ओर से हरसंभव सहायता प्रदान कर रहे हैं।”