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‘तमिलनाडु की चुनावी प्रक्रिया में दखल दे रहे बिहारी’: P चिदंबरम ने दिखाई कश्मीर के 370 वाली सोच, बिहारियों के खिलाफ घृणा पर कॉन्ग्रेस की साथी RJD ने साधी चुप्पी

कॉन्ग्रेस के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने एक ट्वीट करके तमिलनाडु में रहने वाले ‘बाहरियों’ खासकर बिहार के लोगों को नीचा दिखाने का काम किया है। उन्होंने तमिलनाडु में रहने वाले बिहारी प्रवासी मजदूरों को ‘बाहरी’ बताकर उनके वोटर बनने के हक पर सवाल उठाए। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘गैरकानूनी और खतरनाक’ है।

चिदंबरम ने बिहार में 65 लाख वोटरों के नाम कटने का खतरा होने की बात कही। उनके ट्वीट का लहजा ऐसा है, जैसे बिहारी मजदूर तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही न हो।

चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर और उनके ‘स्थाई घर’ को बिहार बताकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाई। ये बातें सुनने में तो चुनावी नियमों की चिंता जैसी लगती हैं, लेकिन असल में ये बिहारियों को बाहरी और खतरे के रूप में दिखाने की कोशिश थी। वैसे भी, यह कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काकर वोट की राजनीति करता रहा है। चिदंबरम का ये बयान उसी पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसे कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी चुपचाप बढ़ावा देते रहे हैं।

चिदंबरम ने की बिहारियों को नीचा दिखाने की कोशिश

चिदंबरम ने रविवार (3 अगस्त 2025) को X पर ट्वीट किया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘खतरनाक और गैरकानूनी’ है। उन्होंने सवाल उठाया कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों बन रहे हैं, जब उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है। उन्होंने छठ पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि ये मजदूर बिहार लौटते हैं, तो फिर तमिलनाडु में वोटर बनने का क्या हक? चिदंबरम ने इसे चुनाव आयोग की साजिश बताकर तमिलनाडु के ‘चुनावी चरित्र’ को बदलने का आरोप लगाया।

ये बातें सुनने में तो तकनीकी लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद बिहारियों को तमिलनाडु में बाहरी और अनचाहा दिखाना था। चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर उनकी पहचान को सिर्फ मजदूरी तक सीमित कर दिया, जैसे वे तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही नहीं हैं। यह न सिर्फ बिहारियों का अपमान है, बल्कि भारत के संविधान का भी उल्लंघन है, जो हर नागरिक को देश में कहीं भी रहने, काम करने और वोट देने का हक देता है। चिदंबरम का ये बयान बिहारियों को दोयम दर्जे का नागरिक बताने की कोशिश है।

बिहारी क्यों नहीं, जब राहुल को हक है?

चिदंबरम का बयान और कॉन्ग्रेस की नीति तब और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम राहुल गाँधी की बात करते हैं। राहुल गाँधी दिल्ली के स्थाई निवासी हैं, लेकिन वे केरल के वायनाड और उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ चुके हैं। अगर राहुल गाँधी दिल्ली में रहकर दूसरे राज्यों में वोटर बन सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं, तो बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों नहीं बन सकते? क्या नियम सिर्फ बिहारियों के लिए अलग हैं?

भारत का कानून साफ कहता है कि कोई भी नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। इसके लिए फॉर्म 6 भरना होता है, जिसमें निवास स्थान बदलने की अर्जी दी जाती है। और ये जरूरी नहीं कि आपके पास अपना मकान हो। किराए के घर में रहने वाला भी वोटर बन सकता है।

चिदंबरम और कॉन्ग्रेस ये बात अच्छे से जानते हैं, लेकिन फिर भी बिहारियों को ‘स्थायी रूप से बसे हुए’ कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। ये लोग भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों से बिहारियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहारी इतने भोले नहीं हैं।

जेडीयू के प्रवक्ता और विधान परिषद के सदस्य नीरज कुमार ने चिदंबरम के ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नीरज कुमार ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी का आज जो हश्र है, वो क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान न करने की वजह से है। क्षेत्रीय भावनाओं के उभार के साथ कॉन्ग्रेस का समर्थन कम होता गया। कॉन्ग्रेस ने अपने राज्य में असमान विकास किया। बिहार के साथ भेदभाव किया। अब इनकी स्थिति ये है कि ये देश में संविधान को खतरा बनाते हैं। ये चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जो लोग तमिलनाडु या किसी भी अन्य राज्य में रहते हैं, वो वहाँ के वोटर बनते हैं। ये सामान्य है। बिहार में रहने वाली तमिलनाडु की नर्सें भी वोटर रही हैं, लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। ये तो इंडी गठबंधन सुविधा की बात हुई। राहुल गाँधी कहीं से भी चुनाव लड़ लें… आरजेडी किसी को हरियाणा से लाकर राज्यसभा भेज देती है। लेकिन बिहार का नाम आते ही ये लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।”

नीरज कुमार ने आगे कहा, “बिहार SIR में तेजस्वी यादव के नाम 2 EPIC नंबर मिले हैं। अब उन्होंने चुप्पी साध ली है। क्या राहुल गाँधी का यही परमाणु बम था, तेजस्वी यादव ने अपने सर पर फोड़ा।” उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस का मूल चरित्र सुविधा के हिसाब से बदलने का है। बिहार बोझ किसी का नहीं है, वो बोझ उठाने वाले लोग हैं। चंपारण के सत्याग्रह से लेकर आजादी की लड़ाई में बिहार का योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि चिदंबरम जैसे लोग जो कह रहे हैं, वो बैकवर्ड राज्यों के लिए उनकी घृणा दिख रही है।

इंडी गठबंधन का बिहार विरोधी रवैया

चिदंबरम का बयान कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों को निशाना बनाकर राजनीति करता रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने बिहारी प्रवासियों को बीजेपी का समर्थक बताकर बंगाली अस्मिता के खिलाफ खड़ा किया। ममता बनर्जी ने हिंदी भाषी प्रवासियों खासकर बिहारियों को ‘बाहरी’ कहकर बंगाल की जनता को भड़काया। इस दौरान बिहारियों के योगदान को नजरअंदाज किया गया, जो कोलकाता से लेकर छोटे शहरों तक मेहनत करके बंगाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र में इंडी गठबंधन का हिस्सा शिवसेना ‘मराठी माणूस’ के नाम पर बिहारियों को निशाना बनाती रही है। 2000 के दशक में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई और अन्य शहरों में बिहारी मजदूरों पर हमले किए, उन्हें नौकरियाँ छीनने वाला बताया। मारवाड़ी और गुजरातियों को भी निशाना बनाया गया, लेकिन बिहारी सबसे आसान शिकार थे। कॉन्ग्रेस ने इन हमलों पर चुप्पी साधे रखी। यह दिखाता है कि कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी बिहारियों के खिलाफ नफरत को चुपचाप बढ़ावा देते हैं।

आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) चिदंबरम के बयान पर चुप्पी साधे हुए है। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी RJD जो सामाजिक न्याय की बात करती है, वो इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ने पी चिदंबरम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “चिदंबरम का बयान बिहारियों के लिए अपमानजनक है। वे हमें दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं। कॉन्ग्रेस को माफी माँगनी चाहिए और आरजेडी की चुप्पी बिहार के गौरव के साथ धोखा है।” उन्होंने कहा कि बिहारी मजदूर देश भर में मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार अपमान सहना पड़ता है।

जदयू के मुख्य प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बिहार के लोगों ने देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने खून पसीने से सींचा है। अगर वो तमिलनाडु में लंबे समय से हैं, और वहाँ की वोटिंग प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इससे चिदंबरम या किसी को तकलीफ क्यों हो?”

उन्होंने कहा कि चिदंबरम और कॉन्ग्रेस का मकसद चुनाव को बिहारी वर्सेज बाहरी बनाने की है। जो कि पूरी तरह से गलत है। ऐसा कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार कर रही है। उन्होंने कहा कि SIR पर कॉन्ग्रेस और सहयोगी दल ऊल-जलूल बयानबाजी करके सिर्फ राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं, जबकि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में है और सुप्रीम कोर्ट ने खुद SIR को हरी झंडी दी है।

राजीव रंजन ने कहा, “चिदंबरम का बयान कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति को दिखाता है। ये लोग गरीबों की बात करते हैं, लेकिन बिहारी मजदूरों को राजनीतिक बोझ मानते हैं। आरजेडी की चुप्पी बताती है कि वे बिहार के लोगों से ज्यादा राहुल गाँधी के वफादार हैं।”

आरजेडी की चुप्पी इसलिए और दुखद है, क्योंकि ये वही पार्टी है जो बिहार में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के हक की बात करती है। लेकिन जब उनके अपने लोग, बिहारी मजदूर, अपमानित हो रहे हैं, तो आरजेडी राहुल गाँधी के सामने सिर झुकाए खड़ी है। ये बिहार के लोगों के साथ गद्दारी है।

हालाँकि बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ ने चिदंबरम के बयान का ये कहकर बचाव किया कि चुनाव आयोग आरएसएस के इशारे पर ऐसे काम कर रहा है, जिसमें गैर-कानूनी तरीके से बाहरी लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाता है। कुछ खास वर्ग के लोगों के नाम हटाए जाते हैं, जबकि कुछ खास लोग हर चुनाव में राज्य बदलते हैं।

असित नाथ ने कहा कि बिहार के मजदूर धान की रोपाई-कटाई या खेती के कामों से बाहर जाते हैं, लेकिन बाद में लौट आते हैं। किसके पास इतनी फुरसत है कि वो वहाँ का वोटर बने? असित नाथ ने SIR की गड़बड़ियाँ भी गिनाई। उन्होंने ये भी कहा कि खुद उनकी पत्नी का नाम SIR की लिस्ट में नहीं है, जबकि लोकसभा चुनाव में उन्होंने वोट डाला था। अगर आखिरी लिस्ट में पत्नी का नाम नहीं आता, तो वो कोर्ट का रुख करेंगे। हालाँकि उन्होंने चिदंबरम के बिहार के मजदूरों को लेकर दिए बयान पर सीधे-सीधे कोई विरोध नहीं किया, भले ही वो बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता हैं।

बिहारी मजदूर है देश की रीढ़, फिर भी निशाना

बिहारी प्रवासी मजदूर देश के हर कोने में मेहनत करते हैं। 2018 में गुजरात में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म की अफवाह के बाद बिहारी मजदूरों पर हमले हुए। करीब 50,000 मजदूरों को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा। 2023 में तमिलनाडु में भी ऐसी अफवाहें फैलीं कि बिहारी मजदूरों पर हमले हो रहे हैं। हालाँकि डीएमके सरकार ने इन अफवाहों को खारिज किया और मजदूरों को सुरक्षा का भरोसा दिया, लेकिन चिदंबरम का ताजा बयान फिर से बिहारियों को निशाना बनाने का काम कर रहा है।

तमिलनाडु में करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं, जिनमें ज्यादातर बिहारी हैं। ये लोग टेक्सटाइल उद्योग, निर्माण कार्य और छोटे-मोटे व्यवसायों में योगदान देते हैं। बिहारी मजदूर सिर्फ मजदूर नहीं हैं; कई उद्यमी, शिक्षक और कुशल पेशेवर भी हैं। फिर भी चिदंबरम जैसे नेता उन्हें सिर्फ ‘मजदूर’ कहकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। यह न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि देश की एकता के लिए भी खतरनाक है।

चिदंबरम का तर्क कानूनी और नैतिक रूप से भी गलत

चिदंबरम का ये कहना कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर नहीं बन सकते क्योंकि उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है, कानूनी रूप से गलत है। भारत का संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 कहता है कि कोई भी भारतीय नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। अगर कोई बिहारी मजदूर सालों से तमिलनाडु में रह रहा है, तो वह वहाँ वोटर बनने का हकदार है। चिदंबरम का इसे ‘गैरकानूनी’ कहना कानून की गलत व्याख्या है।

छठ पूजा का जिक्र करके चिदंबरम ने बिहारियों को अस्थाई निवासी दिखाने की कोशिश की। लेकिन छठ पूजा के लिए बिहार लौटना कोई सबूत नहीं कि वे तमिलनाडु में स्थायी रूप से नहीं रहते। क्या तमिलनाडु कोई अलग देश है, जहाँ बाहरी लोग बस नहीं सकते? यह तर्क जम्मू-कश्मीर के पुराने आर्टिकल 370 जैसा लगता है, जो बाहरी लोगों को वहाँ बसने से रोकता था।

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे पी चिदंबरम

चिदंबरम का बयान ऐसे समय में आया है, जब बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। लेकिन चिदंबरम ने इसे तमिलनाडु बनाम बिहार का मुद्दा बनाकर 2026 के तमिलनाडु चुनावों के लिए क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काने की कोशिश की। यह रणनीति न सिर्फ बिहारियों को तमिलनाडु में अलग-थलग कर सकती है, बल्कि राज्यों के बीच तनाव भी बढ़ा सकती है।

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी की अगुवाई वाला इंडी गठबंधन बार-बार ऐसी राजनीति करता है, जो देश को बाँटने का काम करती है। एक तरफ वे ‘एकता में विविधता’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ चिदंबरम जैसे नेता बिहारियों को बाहरी बताकर नफरत फैलाते हैं। आरजेडी की चुप्पी इस बात का सबूत है कि वह बिहार के हितों से ज्यादा गठबंधन की राजनीति को तरजीह दे रही है।

जहर फैलाने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत

पी. चिदंबरम का बयान सिर्फ चुनाव आयोग की आलोचना नहीं, बल्कि बिहारी मजदूरों को अपमानित करने की कोशिश है। उन्हें तमिलनाडु में बाहरी और खतरे के रूप में दिखाकर वह क्षेत्रीय नफरत को हवा दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस का ये दोहरा चरित्र, जहाँ राहुल गाँधी खुद दूसरे राज्यों से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन बिहारियों को वोट देने का हक नहीं दिया जाता.. बेहद शर्मनाक है। इंडी गठबंधन का बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काने का इतिहास और आरजेडी की चुप्पी इस बात को और गंभीर बनाती है।

बिहारी मजदूर देश की रीढ़ हैं। वे करदाता हैं, वोटर हैं और भारत के विकास में हिस्सेदार हैं। उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, न कि अपमान। चिदंबरम और कॉन्ग्रेस को अपने बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए। आरजेडी को भी फैसला करना होगा कि वह बिहार के लोगों के साथ है या राहुल गाँधी की गुलामी करेगी। भारत की एकता को बनाए रखने के लिए ऐसे नेताओं को जवाबदेह बनाना जरूरी है।

मालेगाँव ब्लास्ट में लो योगी-मोदी का नाम, मोहन भागवत को भी केस में फँसाओ: साध्वी प्रज्ञा से लेकर ATS अधिकारी के बयान से समझें- कैसे रची गई थी देश से हिंदू नेतृत्व को खत्म करने की साजिश?

2008 के मालेगाँव विस्फोट के मामले में पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी 7 लोगों को बरी कर दिया गया है। इस हमले से जुड़ी कई साज़िशों का खुलासा होना बाकी है, जाँच एजेंसियाँ उसमें लगी हैं। इस ब्लास्ट की साज़िश के अलावा इस पूरे केस से जुड़े लोगों के बयानों को जोड़कर देखने से एक बात नजर आती है कि संभवतः इस ब्लास्ट की आड़ में देश से हिंदू नेतृत्व खत्म करने का भी प्रयास हो रहा था।

ऐसा कहने के पीछे कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि लोगों के एक के बाद एक कई बयान हैं। इस बयानों से पता चलता है कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज में काम कर रहीं एजेंसियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(तब गुजरात के मुख्यमंत्री) , आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ (तब सांसद) को किसी भी तरह मालेगाँव विस्फोट के मामले में फंसाने के लिए लोगों पर दबाव बनाया था। इस केस से जुड़े कुछ लोगों के बयानों के ज़रिए समझते हैं कि किस तरह एजेंसियाँ लोगों पर दबाव बना रही थीं।

जबरन मोदी, योगी, भागवत का नाम लेने को कहा गया: साध्वी प्रज्ञा

मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भी आरोपित बनाया गया था। अब प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कहा है कि जाँच एजेंसियों ने उन पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत आरएसएस और बीजेपी के कई नेताओं का नाम लेने का दबाव बनाया था।

साध्वी प्रज्ञा ने कहा कि उस वक्त वह सूरत में रह रहीं थीं तो उनसे नरेंद्र मोदी का नाम लेने को कहा गया था। उन्होंने कहा, “मुझसे विशेष तौर पर नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत, राम माधव, योगी आदित्यनाथ, इंद्रेश कुमार और कई अन्य बड़े नेताओं के नाम लेने को कहा गया था। मैंने वो नाम नहीं लिए इसलिए मुझे प्रताड़ित किया गया था।”

साध्वी प्रज्ञा ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन UPA सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इस पूरे झूठे मामले के पीछे कॉन्ग्रेस थी। उन्होंने कहा कि यह मामला भगवा और सशस्त्र बलों को बदनाम करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा था।

मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के लिए कहा गया: पूर्व ATS अधिकारी

साध्वी प्रज्ञा ऐसे दावा करने वालीं इकलौती नहीं है। मालेगाँव विस्फोट केस की जाँच में शामिल रहे महाराष्ट्र ATS के रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने भी ऐसा ही दावा किया था। मुजावर ने कहा कि उस वक्त उन्हें कुछ खास लोगों को गिरफ्तार करने के गुप्त आदेश दिए गए थे, जिनमें RSS प्रमुख मोहन भागवत का नाम भी शामिल था।

मुजावर ने दावा किया कि इनका मकसद ‘भगवा आतंकवाद’ की झूठी कहानी गढ़ना था। हालाँकि, उन्होंने यह आदेश मानने से इंकार कर दिया था। उनका कहना है कि आदेश न मानने के बाद, उनके ऊपर आईपीएस अधिकारी परमवीर सिंह ने एक झूठा केस डाल दिया जिससे उनकी 40 साल की पुलिस सेवा खत्म हो गई।

कर्नल पुरोहित पर बनाया गया योगी का नाम लेने का दबाव

इस मामले में आरोपित बनाए गए लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित ने मई 2024 में कोर्ट में बताया था कि उन पर RSS, VHP के नेताओं और योगी आदित्यनाथ का नाम लेने का दबाव बनाया गया था।

कर्नल पुरोहित ने मुंबई के एक कोर्ट को बताया, “मेरे साथ युद्ध बंदी से भी बदतर व्यवहार किया गया। हेमंत करकरे, परमबीर सिंह और कर्नल श्रीवास्तव लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि मैं मालेगाँव बम धमाके के लिए खुद को जिम्मेदार बता दूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं RSS, VHP के वरिष्ठ नेताओं और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लूँ। उन्होंने मुझे 3 नवम्बर, 2008 तक यातनाएँ दीं।”

हिंदू लीडरशिप को खत्म करने की थी साज़िश!

कॉन्ग्रेस राज में जिन लोगों का नाम लेने के लिए आरोपितों और जाँच अधिकारियों पर दबाव बनाया गया उनमें RSS के बड़े नेता, BJP के नेता और नई उभरती लीडरशिप के अलावा RSS से जुड़े अन्य संगठनों के लोग भी शामिल हैं। इन कड़ियों को जोड़ने से अंदेशा होता है कि किस तरह पूरे देश में हिंदू लीडरशिप को खत्म करने की साज़िश की जा रही थी।

अगर तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार अपनी इस साज़िश में कामयाब हो जाती तो देश में हिंदू हितों की आवाज उठाने वाले नेताओं को शायद वर्षों के लिए जेलों में डाल दिया जाता। अगर नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार कर लिया जाता तो शायद वो 2014 में कभी देश के प्रधानमंत्री ना बन पाते, जो बदलाव आज देश में हमें नज़र आते हैं वैसा शायद कभी ना हो पाता।

वहीं, अगर मोहन भागवत को गिरफ्तार किया जाता तो कॉन्ग्रेस का अगला निशाना RSS ही होता और पहले तीन बार की तरह एक बार फिर शायद RSS को बैन कर दिया जाता। योगी आदित्यनाथ के गिरफ्तारी के जरिए शायद बीजेपी की भावी पीढ़ी को खत्म करने और संत समाज को बदनाम करने की साजिश की जाती।

मोटे तौर पर समझ आता है कि अगर यह साज़िश सफल होती तो RSS और BJP को वैचारिक तौर पर कमजोर कर हिंदुत्व की विचारधारा को सार्वजनिक विमर्श से बाहर करने की कोशिश सफल हो जाती। हिंदू जनमानस जो संगठित नजर आने लगा था, उसमें शायद फिर टूट पड़ जाती और अयोध्या में भव्य श्रीराम का मंदिर देखना लोगों का सपना ही रह जाता।

सिर्फ इतना ही नहीं दुनिया भर के मंचों पर मुस्लिम आतंकवाद के बराबर ही हिंदू या भगवा आतंकवाद को खड़ा कर दिया जाता। अगर हिंदू आतंकवाद के कुचक्र की एक बार शुरुआत हो जाती तो यह कहाँ तक जाता इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

ऐसा सिर्फ एक घटना तक ही सीमित नहीं था लेकिन मुख्य तौर पर इसके बाद से ही हिंदू और भगवा को आतंकवाद बताने की साजिश शुरू हो गई थी। सितंबर 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट के बाद मुंबई में 26 नवंबर 2008 को बड़ा आतंकी हमला हुआ था।

इस हमले में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हिंदू धर्म को बदनाम करने की साज़िश रची थी। हमले में शामिल आतंकी अजमल कसाब हाथ पर कलावा बाँधकर आया था और लश्कर-ए-तैयबा का प्लान था कि कसाब की अगर इस हमले में मौत हो जाए तो उसे हिंदू आतंकी घोषित कर दिया जाए।

मुंबई पुलिस कमिश्नर रहे राकेश मारिया ने अपनी किताब में दावा किया था कि ‘कसाब के पास समीर दिनेश चौधरी नाम का पहचान पत्र था जो बेंगलुरू के पते पर था’। अब अगर देश में हिंदू आतंकवाद की थ्योरी फैलाई जाती तो पाकिस्तान के अलावा इस केस को बनाने के लिए भारत के लोगों का भी इसमें शामिल होने ज़रूरी होता लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

कसाब को जिंदा पकड़ा गया और जाँच में यह सामने आया कि वह पाकिस्तान का रहने वाला था। इतने सब के बाद भी 26/11 के हमले के लिए RSS को बदनाम करने की साज़िश खत्म नहीं हुई। RSS के खिलाफ पुस्तक लिखी गई और उसके विमोचन में कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह पहुंचे।

पत्रकार अजीज बर्नी ने ’26/11: RSS की साज़िश’ की साज़िश नाम से किताब लिखकर लश्कर को क्लीन चिट देने की कोशिश हुई और RSS को इन हमलों का ज़िम्मेदार बताने की कोशिश हुई और इस किताब के विमोचन में कांग्रेस के बड़े नेता दिग्विजय सिंह तक शामिल हुए थे।

‘इंडियन पॉलिसी फाउंडेशन’ के एक डॉक्यूमेंट में इस किताब के कुछ अंशों को प्रकाशित किया गया है। इसमें लिखा गया है, “मुंबई के 26/11 हमलों के लिए भाजपा और संघ जिम्मेदार हैं और इसकी जाँच में देरी के खिलाफ भाजपा ने आवाज़ नहीं उठाई थी।”

इस किताब में नरेंद्र मोदी की मुंबई हमलों में भूमिका तक को लेकर दावा किया गया और इसमें लिखा गया, “संघ परिवार के हमले की साजिश में मोसाद और सीआइए ने मदद की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमलावर को मुंबई पहुंचाने और होटल में रुकवाने में मदद की (पृः 41)।”

इस किताब में ऐसे और भी कई मनगढ़ंत दावे किए गए थे और दिग्विजय सिंह जैसे कॉन्ग्रेस के नेता इन दावों को बढ़ाने-चढ़ाने की पूरी कोशिश में लगे थे। ऐसा दिग्विजय सिंह केवल अपनी मर्जी से नहीं कर रहे होंगे इसमें बड़े नेताओं की भी भूमिका होगी क्योंकि इस विषय पर बड़े कॉन्ग्रेसी नेता खामोश ही रहे हैं इसका कोई विरोध उन्होंने नहीं किया है।

भगवा और हिंदू को आतंकवाद बनाने की साजिश

दिग्विजय सिंह के अलावा गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने भी भगवा और हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। पी. चिदंबरम ने गृह मंत्री रहते हुए 2010 में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘भगवा आतंक’ का बम धमाकों से संबंध का पता चला है।

चिदंबरम ने पुलिस महानिदेशकों से कहा था, “भारत में युवा पुरुषों और महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आई है। हाल ही में भगवा आतंकवाद की घटना का पर्दाफाश हुआ है, जिसकी अतीत में हुए कई बम विस्फोटों में संलिप्तता पाई गई है। मेरी आपको सलाह है कि हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए।”

चिदंबरम के अलावा सुशील कुमार शिंदे ने भी गृह मंत्री रहते हुए जनवरी 2013 में कहा था कि बीजेपी और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।”

शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था, “रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं।समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

कई वर्षों बाद शिंदे ने स्पष्ट किया कि भगवा आतंकवाद शब्द कहने के लिए उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस ने बोला था। शिंदे ने कहा कि वे इस शब्द का इस्तेमाल करना नहीं चाहते थे, लेकिन मजबूरी में उन्हें इसका इस्तेमाल करना पड़ा।

यह वर्षों का सिलसिला अब तक भी खत्म नहीं हुआ है। सबूतों के नाम पर कोर्ट में भगवा आतंकवाद की थ्योरी फेल हो गई लेकिन कांग्रेस के नेता अब भी इससे जुड़ा नैरेटिव बनाने में जुटे हैं।

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता पृथ्‍वीराज चव्‍हाण ने शनिवार (2 अगस्त) को कहा कि आतंकवादियों के लिए ‘भगवा’ शब्द का प्रयोग न करके ‘सनातन’ या ‘हिंदुत्ववादी’ शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

हिंदू को आतंकवादी साबित करने की थ्योरी असल में किसी और को बचाकर तुष्टिकरण करने की रणनीति है। लेकिन अब यह थ्योरी फ्लॉप हो गई है, होनी ही थी। जिस विचार में पेड़, पहाड़, जल, जंगल, जीव सबको पवित्र और पूजनीय माना गया है उस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने की कोशिश करना यकीनन बेईमानी ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता अब भी हिंदू धर्म को बदनाम करने के नए-नए बहाने ढूंढते हैं लेकिन ‘सनातन’ को बदनाम करते-करते पार्टी खुद कहाँ पहुँच गई है, ये सब भी हमारे सामने है। देश के मूल विचार को बदनाम करने की साजिश और कोशिश पर हर तरह से लगाम लगाए जाने की जरूरत है।

‘हम ही छाती पीट कर कह रहे पाकिस्तान जिम्मेदार’: पहलगाम हमले पर कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने दी आतंकी मुल्क को क्लीन चिट, गृह मंत्री ने दे दिए थे हमलवारों के पाकिस्तानी वोटर नम्बर तक

कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट दे दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को हमले में दोषी ठहराना भारत सरकार की अपनी सोच है। कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मणिशंकर अय्यर ने कहा, “शशि थरूर और उनकी डेलिगेशन टीम ने 33 देशों के दौरान पहलगाम आतंकी हमले का जिम्मेदार पाकिस्तान को नहीं ठहराया है। यहाँ तक की UN और अमेरिका ने भी पाकिस्तान को हमले का जिम्मेदार नहीं ठहराया।”

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे कहा, “हम (भारत) ही छाती पीट कर कह रहे हैं कि इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है, लेकिन कोई भी हमारी बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं है।” अय्यर ने यह भी कहा, “हम ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाए हैं, जिससे लोगों को यकीन हो सके कि किस पाकिस्तानी एजेंसी ने इस हमले को अंजाम दिया है।”

मणिशंकर का यह बयान तब सामने आया जब हाल ही में ऑपरेशन महादेव के तहत POK में पहलगाम आतंकी हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी ताहिर हबीब को भारतीय सेना ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया। इसके बाद रावलकोट में उसका जनाजा निकला, जिसमें खाई गाला के पूर्व पाकिस्तानी फौजी भी शामिल हुए।

इससे आतंकी ताहिर का पाकिस्तान से कनेक्शन साफ हो गया है। यह भी स्पष्ट हो गया कि 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ है। इतना ही नहीं गृह मंत्री अमित शाह तो संसद में तक पाकिस्तान कनेक्शन का प्रमाण दे चुके हैं।

‘ऑपरेशन महादेव’ को लेकर बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, “02 अगस्त 2025 को ऑपरेशन में तीन आतंकवादी- सुलेमान, अफगान और जिबरान मारे गए। जो लोग उन्हें खाना पहुँचाते थे, उन्हें पहले ही हिरासत में ले लिया गया था। जब इन आतंकवादियों के शव श्रीनगर पहुँचे तो हिरासत में लिए गए लोगों ने इनकी पहचान की।”

गृह मंत्री ने आगे कहा, “पहलगाम में धर्म पूछकर मारने वाले इन तीनों आतंकवादियों को मार गिराया गया है। इसके सबूत भी हमारे पास हैं। तीन में से दो आतंकियों के पाकिस्तानी वोटर नंबर मिले हैं। इनके पास से मिली राइफलें और चॉकलेट्स भी पाकिस्तान निर्मित हैं। इससे पुष्टि हुई है कि इन्हीं लोगों ने पहलगाम में निर्दोष लोगों पर हमला किया था।”

इन सबूतों के बाद भी विपक्ष पाकिस्तान को क्लीन चिट देने में लगी हुई है। आए दिन कॉन्ग्रेस नेता सरकार पर पहलगाम आतंकी हमले के अपराधियों पर सवाल खड़ा करते हैं। यहाँ तक की हमले में पाकिस्तान की भूमिका के सबूत माँगते हैं।

70% मुस्लिम आबादी वाले किशनगंज में घटे 145000 वोटर, SIR से 11.8% नाम लिस्ट से कटे: पुनरीक्षण चालू होते ही 5x बढ़े थे डोमिसाइल के आवेदन, जिले में जनसंख्या के मुकाबले 126% हैं आधार

बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद संशोधित वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। नए ड्राफ्ट में लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। वह वोटर हटाए गए हैं जिनकी या तो मौत हो चुकी या फिर वह दिए गए पते पर मिले नहीं।

इस SIR प्रक्रिया में बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज में 1.45 लाख मतदाता के नामों को नई सूची से हटा दिया गया है। यह आँकड़ा जिले के कुल मतदाताओं की संख्या का करीब 11.8% है। विधानसभा चुनावों में जहाँ 4-5% वोटों की संख्या पर हार-जीत तय हो जाती है, वहाँ इस आँकड़े के महत्व को समझना कोई बड़ी बात नहीं है।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में किशनगंज में मुस्लिमों की आबादी करीब 70% है और यहाँ अवैध घुसपैठ बड़ी समस्या है। यह जिला पश्चिम बंगाल से सीमा भी साझा करता है। यह तेजी से डेमोग्राफी बदलाव की बात भी पहले सामने आ चुकी है।

किशनगंज में बचे कितने वोटर?

पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इस जिले में 4 विधानसभा क्षेत्र हैं। चुनाव आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि SIR की प्रक्रिया किए जाने से पहले 24 जून 2025 को जिले में मतदाताओं की संख्या 12,31,910 थी। इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग को 10,86,242 गणना प्रपत्र ही प्राप्त हुए। यानी अब जो नया ड्राफ्ट चुनाव आयोग ने जारी किया है उसमें 1,45,668 मतदाताओं के नाम कट गए हैं। यानी वोटर लिस्ट से 11% से अधिक वोटर कम हो गए हैं।

SIR से पहले ही शुरू हुआ फर्जी वोटर बनाने का खेल?

चुनाव आयोग द्वारा SIR की प्रक्रिया शुरू किए जाने से पहले ही किशनगंज में नए निवास प्रमाण पत्र बनवाने वालों लोगों की कई गुना तक बढ़ गई थी। इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी को वोटर लिस्ट में गड़बड़ी किए जाने की आशंका से भी जोड़कर देखा जा रहा था।

बिहार के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कुछ हफ्तों पहले दावा किया था कि किशनगंज में 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से 28 हजार तक आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए आ रहे थे लेकिन जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन आ गए।

सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पैन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में समय और प्रमाण लगते हैं जबकि निवास प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा था।

किशनगंज में 100 की आबादी पर 126 आधार कार्ड

किशनगंज में फर्जी वोटर बनाए जाने से जुड़ा शक केवल निवास प्रमाण पत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि कुछ दिनों पहले सामने आए आधार कार्ड सैचुरेशन के आँकड़ों से भी ऐसे कई सवाल खड़े हुए थे।

बिहार के कई मुस्लिम बहुल ज़िलों में आधार कार्ड सैचुरेशन 100% से भी ज्यादा था और किशनगंज में यह आँकड़ा 126% था। यानी यहाँ 100 लोगों की आबादी पर 126 आधार कार्ड जारी किए गए हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से देखें तो किशनगंज की आबादी 20,26,541 है लेकिन वहाँ 21,31,172 आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं। मतलब यहां आबादी से 1 लाख से भी ज्यादा आधार कार्ड बनाए गए।

जाहिर है कि ये आँकड़े बताते हैं कि या तो फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं या अवैध घुसपैठियों को आधार कार्ड जारी किए गए हैं। किशनगंज की सीमा नेपाल से लगी हुई है और जिस सीमांचल क्षेत्र में यह स्थित है उसमें लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या रही है।

किशनगंज में बड़ी समस्या है अवैध घुसपैठ

पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा किशनगंज देश की आजादी के वक्त हिंदू बहुल जिला हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यहां की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, किशनगंज में मौजूदा वक्त में मुस्लिम की आबाद करीब 70% है।

सम्राट चौधरी तक यह दावा कर चुके हैं कि किशनगंज जैसे जिलों में अवैध घुसपैठियों की संख्या बहुत अधिक है।

किशनगंज से बांग्लादेश की दूरी भी बहुत ज्यादा नहीं है और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि जब से बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया है, तब से अवैध घुसपैठ में तेज़ी आ गई है।

जुलाई महीने में ही किशनगंज में अलग-अलग जगहों पर 4 बांग्लादेशियों को पकड़ा गया है। ये लोग अवैध घुसपैठ कर यहां पहुँचे और लोगों के घरों में काम कर यहीं स्थाई तौर पर बसने का प्लान बना रहे थे। यहाँ बसने के लिए बांग्लादेशी अपना नाम तक बदल लेते हैं और फर्जी कागजात बनवाते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, SIR की प्रक्रिया के दौरान भी किशनगंज में ऐसे बहुत लोग मिले जो नेपाल, बांग्लादेश या म्यांमार से यहाँ आए थे और अब इन लोगों ने यहीं पर आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं।

शिवम बन ले गया हुक्का बार, फिर गन्दी वीडियो बनाई … अरबाज ने हिन्दू लड़की पर बनाया इस्लाम कबूलने का दबाव: भाई को दे रहा जान से मारने की धमकी, UP के बदायूँ का मामला

उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान ने शिवम बनकर हिंदू युवती से रेप किया। अश्लील वीडियो बनाकर युवती को धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया। युवती को जबरन इस्लामी किताबें और नमाज पढ़ने को मजबूर करता था। ऐसा ना करने पर अरबाज ने युवती के भाई को जान से मारने की भी धमकी दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने आरोपित अरबाज के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया कि जुलाई 2022 में वह अपने सहेली के साथ नई सराय पुलिस चौकी के पास स्थित हुक्काबार गई थी। यहाँ माथे पर तिलक लगाए अरबाज मिला, जिसने अपना असली नाम शिवम उर्फ बॉबी बताया।

अरबाज ने पीड़िता को जबरन हुक्का पिलाया और बेहोशी हालत में पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो बनाए। इसके बाद पीड़िता की सहेली आए दिन हु्क्काबार ले जाने लगी, जिससे पीड़िता को नशे की आदत लग गई। हर बार अरबाज मिलता और पीड़िता की बेहोशी हालत का फायदा उठाकर वीडियो बनाया करता था।

इन्हीं वीडियो के सहारे ब्लैकमेल कर अरबाज 14 सितंबर 2022 को पीड़िता को दिल्ली ले गया। दिल्ली में पीड़िता का रेप किया और अपनी असली पहचान उजागर की। अरबाज ने बताया कि वह हाईकोर्ट के जज का ड्राइवर है। पीड़िता ने जब चंगुल से भागना चाहा तो अरबाज ने पीड़िता के इकलौते भाई को जान से मारने की धमकी दी।

पीड़िता ने बताया कि अरबाज बदायूं में इस्लामी स्थलों पर ले जाता था, यहाँ इस्लाम से जुड़ी किताबें पड़ने का दबाव डालता था। अरबाज ने पीड़िता से धर्मांतरण कर निकाह करने का भी दबाव डाला। इसके बाद फरवरी 2025 में पीड़िता ने अरबाज से दूरी बना ली, लेकिन अब अरबाज फिर उसे ब्लैकमेल करने लगा।

पीड़िता ने शनिवार (02 अगस्त 2025) को अरबाज और उसके साथी फैज खान, रियान पठान, अदनान के खिलाफ तहरीर दी है। कोतवाल प्रवीण सिंह ने बताया कि अरबाज अली खान के खिलाफ हिंदू लड़की से दुष्कर्म, धर्मांतरण और ब्लैकमेल का केस दर्ज किया गया है। पुलिस आरोपित की तलाश में जुटी हुई है।

लड़कियों को ड्रग्स देकर अश्लील वीडियो के आरोप में पहले भी जा चुका जेल

साल 2022 में भी बदायूं के हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान जेल जा चुका है। अरबाज और उसके भाइयों पर नाबालिग लड़कियों को नशा देकर छेड़छाड़ का वीडियो वायरल करने का केस दर्ज किया गया था। इसमें कई वीडियो पुलिस के हाथ लगी थीं, जिनमें अरबाज हुक्का पीते और बार में लड़कियों के साथ डांस करते हुए दिखा। कुछ वीडियो में अरबाज तमंचों के साथ भी नजर आया था।

GDP में रिकॉर्ड लो, बेरोजगारी चरम पर… कपड़े की फैक्ट्रियाँ बंद: बांग्लादेश इकॉनमी की मोहम्मद यूनुस ने लगाई ‘माचिस’, हसीना के दौर में ‘एशियन टाइगर’ बनने की राह पर था

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुए एक वर्ष पूरा होने को है। हसीना की जगह पर मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। वह ‘अंतरिम सरकार’ के ‘मुख्य सलाहकार’ हैं। इस एक वर्ष में बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ा है। हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों का भी जीना मुहाल हो गया है। लेकिन इन सबसे इतर बांग्लादेश एक और फ्रंट पर भी फेल हो रहा है। यह फ्रंट है अर्थव्यवस्था का। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बीते एक वर्ष में अराजकता के चलते बड़े नुकसान झेलने पड़े हैं।

तख्तापलट आंदोलन ने किया अरबों का नुकसान

शेख हसीना और आवामी लीग को बांग्लादेश की सत्ता से बेदखल करने के लिए जून-जुलाई से हिंसा चालू हो गई था। इस दौरान बांग्लादेश भर में पहले बंद बुलाए गए। फैक्ट्रियों पर ताले डलवाए गए। पूरे देश में हिंसा हुई और पुलिस को तक निशाना बनाया गया। इस दौरान वह फैक्ट्रियाँ भी निशाने पर रहीं, जिनके मालिक आवामी लीग से जुड़े हुए थे। इस दौरान बांग्लादेश अर्थव्यवस्था के केंद्र ढाका और चटगाँव आदि पूरी तरह बंद रखे गए और यहाँ भी खूब बवाल हुआ।

2 महीने से ज्यादा चले इस बवाल के चलते बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को 10 बिलियन डॉलर (₹85 हजार करोड़) का नुकसान हुआ। यह बांग्लादेश की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 2%-2.5% तक था। बांग्लादेश में इस हँगामे के दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, इससे हजारों लोग बेरोजगार हुए। एक रिपोर्ट कहती है कि इस दौरान बांग्लादेश में लगभग 1.3 लाख कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वालों को अपनी नौकरी खोनी पड़ी। इसके अलावा इस दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद होने के चलते बांग्लादेश के निर्यात भी गोता लगा गए।

एक और रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त तक के इस हंगामे के चलते 800 मिलियन डॉलर (₹7000 करोड़) के आयातों का नुकसान हुआ। इसी दौरान ₹32 हजार करोड़ के से भी अधिक विदेशी आर्डर बांग्लादेशी कपड़ा निर्माताओं के हाथ से निकल गए। यह ऑर्डर उन देशों में गए जहाँ स्थिरता थी। बड़ी मात्रा में कपड़ो के ऑर्डर भारत और विएतनाम जैसे देशों में गए। इससे बांग्लादेश में बेरोजगारी तो हुई ही, उसको विदेशी मुद्रा का नुकसान भी हुआ।

आंदोलन के बाद भी हालात सही नहीं

आंदोलन के दौरान जहाँ बांग्लादेश को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ तो वहीं आंदोलन के बाद भी कोई हालात नहीं बदले। एक साल के भीतर बांग्लादेश की इकॉनमी संघर्ष कर रही है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वर्तमान में काफी धीमे बढ़ रही है। बांग्लादेश में GDP वृद्धि डर 2024-25 में 4% से भी नीचे आ गई जबकि इससे पहले के सालों में यह औसतन 6.5% रही थी। बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर सफल देश माना जाने लगा था।

बांग्लादेश की सबसे तेज आर्थिक वृद्धि प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में ही हुई। 2010-24 के बीच बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई। जहाँ 2010 में यह (लगभग) 1300 डॉलर (₹1.12 लाख) से 2600 डॉलर (₹2.25 लाख) के पास पहुँच गई थी। बांग्लादेश को नए एशियन टाइगर का ख़िताब दिया जाने लगा था। लेकिन यह आर्थिक वृद्धि का सिलसिला 2024 में आकर रुक गया। बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति को इस्लामी हिंसा और कट्टरपंथ की नजर लग गई।

मई, 2025 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में वर्तमान में बेरोजगारी ऐतिहासिक ऊँचे स्तर पर है। यह अक्टूबर-दिसम्बर 2024 की तिमाही में 4.63% के स्तर पर पहुँच गए। इस दौरान बांग्लादेश में 27 लाख से अधिक लोग बेरोजगार थे। इसके पीछे का सीधा कारण बांग्लादेश में हुई हिंसा और उसके बाद आई अस्थिरता समझ आता है। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियाँ भी यूनुस सरकार ने नहीं निकाली हैं। इससे बड़ी संख्या में फैक्ट्रियाँ बंद हुईं तो लोग बेरोजगार हुए।

इसके अलावा बांग्लादेश में अंतरिम सरकार होने के चलते कई गतिविधियाँ रुकी हुई हैं। यह स्थिति आगे और गंभीर हो सकती है। बेरोजगारी का यह आँकड़ा 5% तक पहुँच सकता है, यह आंशका जताई गई है। बांग्लादेश में तख्तापलट के पहले हुई हिंसा के चलते बाहरी निवेशकों का भी विश्वास भी डगमगाया है। यह बांग्लादेश के लिए चिंता का सबब है। बांग्लादेश की इ समस्या में और भी बढ़ावा विएतनाम जैसे देश हैं, जो कपड़ों से लेकर बाकी सामानों में उसे कई बाजारों में पटखनी दे रहे हैं।

भारत से रिश्ते बिगाड़ कुछ नहीं हुआ हासिल

भारत से रिश्ते बिगाड़ने के चलते बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर नुकसान भी झेलना पड़ा है। भारत ने मई, 2025 में बांग्लादेश से आने वाले रेडिमेड कपड़ों, प्रोसेस्ड फ़ूड और फ्रूट ड्रिंक्स आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भारत ने बांग्लादेश से आने वाले प्लास्टिक और लकड़ी के सामान पर भी कई तरह के प्रतिबन्ध लगाए थे। भारत ने कहा था कि वह अब बांग्लादेश से आने वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स और कन्फेक्शनरी सामान को असम, मेघालय, त्रिपुरा-मिजोरम और पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं देगा।

भारत द्वारा लगाए इन प्रतिबन्धों के चलते बांग्लादेश को वार्षिक तौर 770 मिलियन डॉलर (₹6500 करोड़+) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था। यह बांग्लादेश के भारत को कुल निर्यातों का लगभग 42% बनता है। भारत व्यापार के मामले में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा पार्टनर है। हालाँकि, इसकी शुरुआत बांग्लादेश की तरफ से हुई थी। बांग्लादेश ने अप्रैल, 2025 में भारत मछली, कपड़े समेत कई उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी। उसने रास्ते के लिए भी भारत से 1.8 टका प्रति टन का शुल्क लेना चालू कर दिया था।

हिंसा, अराजकता और लोकतंत्र के गिरावट का रहा एक साल

बांग्लादेश जहाँ आर्थिक मोर्चे पर यूनुस सरकार के एक वर्ष के दौरान गोते लगा रहा है तो वहीं इसी समय में हिंसा भी जम कर हुई है। लोकतंत्र का भी गला यूनुस सरकार ने घोंटा है। बांग्लादेश में तख्तापलट के एक वर्ष के भीतर हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों पर 2400 से अधिक हमले हुए हैं। इनमें कई हमले बहुचर्चित रहे हैं। हाल ही में एक हिन्दू महिला का BNP के एक नेता घर में घुस कर रेप किया था और इसका वीडियो भी वायरल कर दिया था।

इस्लामी कट्टरपंथियों को तो छोडिए, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुद ढाका में रेलवे की जमीन पर बता कर एक पुराना हिन्दू मंदिर ढहा दिया। हिन्दुओं के लिए जिन्होंने आवाज उठाई, उनका भी इस एक वर्ष में बुरा हाल किया गया। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जारी अत्याचार के चलते चटगाँव में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसका नेतृत्व संत चिन्मय दास ने किया। चिन्मय दास से चिढ़े इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगा दिया। उनको महीनों तक सुनवाई भी नहीं मिली। उनके वकील तक पर हमला हुआ।

जब आखिर में उनको जमानत भी मिली तो फिर इस्लामी कट्टरपंथी भड़के और उन्होंने जमानत पर रोक लगवा दी। इसके अलावा मोहम्मद यूनुस सरकार विपक्ष का दमन भी कर रही है। वह लोगों की स्मृतियों से तक उसे मिटा देना चाहती है। मोहम्मद यूनुस सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास को टूटने दिया। दंगाइयों ने उस धानमंडी घर की ईंट-ईंट तक तोड़ दी, जिससे बांग्लादेश को आजादी मिली।

यह सब इसलिए होने दिया गया क्योंकि इसका कनेक्शन शेख हसीना से है। गुरु रबीन्द्र नाथ टैगोर के घर को तोड़ा गया। मोहम्मद यूनुस सरकार देखती रही। सत्यजित रे का घर भी गिरते-गिरते बचा। इस पर भी मोहम्मद यूनुस सरकार ने बेशर्म रवैया दिखाया। कहानी यहीं तक नहीं रुकती बल्कि शेख मुजीब से जुड़ा हर एक चिन्ह मिटाने का प्रयास लगातार किया गया। चाहे उनकी जयंती पर होने वाले समारोह को रोका जाना हो या फिर नोटों पर से उनका फोटो हटाना।

बांग्लादेश की सरकार इस विरासत मिटाने का हर प्रयास कर रही है। मोहम्मद यूनुस की सरकार के इन क़दमों के पीछे उसका इस्लामी कट्टरपंथ का एजेंडा है, जो मुजीब को नहीं देखना चाहता। यह सब करने के बाद के बाद मोहम्मद यूनुस बिना चुने ही बांग्लादेश को हमेशा के लिए अपने शासन तले रखना चाहते हैं। मोहम्मद यूनुस को जब सत्ता सौंपी गई थी, तब ही उसका कोई संवैधानिक आधार नहीं था। उन्हें अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में लाया गया था।

मोहम्मद यूनुस को सत्ता पर काबिज हुए 1 वर्ष हो गया है। लेकिन चुनाव का नाम लेते ही वह बिदक जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश में इसी को लेकर एक संकट तक पैदा हो गया था। आखिर में मोहम्मद यूनुस ने 2026 के मध्य तक चुनावों की बात किसी तरह कही। उनके इन सब क़दमों से लगता है कि वह स्वयं ही बांग्लादेश के बिना चुने तानाशाह बनना चाहते हैं।

कौशांबी में शादीशुदा हिंदू महिला से गैंगरेप कर बनाया अश्लील वीडियो, धर्मांतरण का डालने लगे दबाव: मोहम्मद कैफ गिरफ्तार, इरफान-शाह आलम और मौलाना इमरान की तलाश जारी

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के पश्चिम शरीरा थाना क्षेत्र में एक शादीशुदा हिंदू महिला के साथ गैंगरेप, अश्लील वीडियो वायरल करने और जबरन धर्मांतरण का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पुलिस ने मुख्य आरोपित मोहम्मद कैफ को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना गढ़ी बाजार की है, जहाँ पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि दो साल पहले उसकी मुलाकात कैफ से हुई थी। उसने प्रेमजाल में फंसाकर उसका भरोसा जीता। पाँच महीने पहले पीड़िता की शादी हो गई, लेकिन कैफ ने उसे धमकाना शुरू कर दिया। वह उससे मिलने और शादी तोड़ने की धमकी देता था।

पीड़िता ने बताया कि कैफ की बहन ने उसे अपने घर बुलाकर भाई को समझाने की बात कही। लेकिन जब वह वहाँ पहुँची, तो कैफ, इरफान और शाह आलम ने उस पर निकाह का दबाव बनाया। इंकार करने पर तीनों ने उसके साथ मारपीट की और बारी-बारी से दुष्कर्म किया। इस दौरान उन्होंने उसकी अश्लील वीडियो बनाई।

इसके बाद कैफ, इरफान और शाह आलम ने एक मौलाना इमरान को बुलाकर पीड़िता को इस्लाम अपनाने और कुरान की आयतें पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। उसे बुर्का पहनने का भी दबाव डाला गया। डर और धमकी के बीच पीड़िता किसी तरह घर पहुँची और अपने परिवार को आपबीती बताई।

इसके बाद कैफ ने पीड़िता को बदनाम करने के लिए उसकी अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। पीड़िता के पिता ने 26 जुलाई को पश्चिम शरीरा थाने में शिकायत दर्ज की। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शुक्रवार (1 अगस्त 2025) रात पुनवार नहर के पास से कैफ को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस ने आईपीसी, आईटी एक्ट और धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

कौशांबी डीएसपी जेपी पाण्डेय ने बताया कि जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है। पीड़िता के बयान और बरामद बुर्के के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

छत्तीसगढ़ NIA कोर्ट ने दी केरल की ननों को मानव तस्करी-धर्मांतरण केस में सशर्त जमानत: गिरफ्तारी के बाद बचाव में उतरा पूरा वामपंथी-कॉन्ग्रेसी-मिशनरी इको-सिस्टम

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में विशेष NIA कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को केरल की दो कैथोलिक ननों, प्रीति मेरी और वंदना फ्रांसिस और एक जनजातीय युवक सुकमन मंडावी को सशर्त जमानत दे दी।

इन तीनों को 25 जुलाई को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर सरकार रेलवे पुलिस (GRP) ने गिरफ्तार किया था। उन पर मानव तस्करी और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप था, जो एक स्थानीय बजरंग दल कार्यकर्ता की शिकायत पर आधारित था।

शिकायत में दावा किया गया था कि तीनों नन तीन आदिवासी लड़कियों को नारायणपुर से आगरा ले जा रहे थे और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश कर रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, जमानत पर रिहा हुई आरोपित प्रीति मेरी, वंदना फ्रांसिस (दोनों असीसी सिस्टर्स ऑफ मैरी इमैक्युलेट – एएसएमआई) और सुकमन मंडावी को कोर्ट ने कई सख्त शर्तों के साथ राहत दी है।

उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा, 50-50 हजार रुपये का जमानत बांड भरना होगा और दो-दो जमानतदार पेश करने होंगे। कोर्ट ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि तीनों बिना NIA कोर्ट की अनुमति के देश नहीं छोड़ सकते।

NIA कोर्ट के जज सिराजुद्दीन कुरैशी ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और FIR मुख्यतः संदेह के आधार पर दर्ज की गई थी। अदालत के अनुसार, आरोपितों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और तीनों कथित पीड़ित लड़कियों के माता-पिता ने अपने हलफनामों में स्पष्ट किया है कि उनकी बेटियों को ननों ने न तो बहलाया और न ही जबरन धर्म परिवर्तन कराया।

लड़कियों ने अपने बयानों में पुलिस को बताया कि वे वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रही हैं और वे अपनी मर्जी से आगरा जा रही थीं, जहाँ उन्हें काम के लिए ले जाया जा रहा था।

निचली अदालतों से पहले जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी। दुर्ग की फास्ट ट्रैक सत्र अदालत ने इस आधार पर याचिका खारिज की थी कि मामला NIA कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके बाद आरोपित ने बिलासपुर स्थित विशेष अदालत का रुख किया।

इस मामले पर केरल में व्यापक विरोध देखने को मिला था। चर्च संगठन, एलडीएफ सरकार और विपक्षी कॉन्ग्रेस समेत कई दलों ने गिरफ्तारी की निंदा की थी। सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे ‘संविधान की जीत’ बताया और कहा कि एफआईआर को रद्द कराने के लिए लड़ाई जारी रहेगी।

वहीं सीपीएम नेता वृंदा करात ने जनजातीय समुदाय की आवाज को मान्यता मिलने पर खुशी जताई और बजरंग दल तथा हिंदू वाहिनी पर झूठी शिकायत दर्ज कराने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की।

मामले पर केरल और छत्तीसगढ़ भाजपा इकाइयों में भी टकराव देखने को मिला। केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने गिरफ्तारी को गलतफहमी बताया था और कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार जमानत का विरोध नहीं करेगी।

फिलहाल,आरोपितों की रिहाई के बाद मिशनरी और वामपंथी खेमे में खुशी की लहर है। छत्तीसगढ़ में समर्थक उन्हें रिसीव करने पहुँचे, जबकि कानूनी प्रक्रिया अब NIA अदालत की निगरानी में आगे बढ़ेगी।

बांग्लादेश में बंगबंधु के समर्थकों को लगातार निशाना बना रही यूनुस की कट्टरपंथी सरकार, अब ढाका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नीलिमा को नौकरी से हटाया: नरसंहार-आतंक के खिलाफ बोलने पर सजा देने का आरोप

बांग्लादेश की ढाका विश्वविद्यालय में एक वरिष्ठ प्रोफेसर नीलिमा अख्तर को फेसबुक पोस्ट पर मोहम्मद युनुस सरकार की आलोचना करने और बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु को पसंदीदा इंसान बताने पर यूनिवर्सिटी से बर्खास्त कर दिया गया है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस की तानाशाही के कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं। इस मामले में भी उनका अड़ियल रवैया सामने आया है। नीलिमा अख्तर ने अपने पोस्ट्स में डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की आलोचना की थी। साथ ही गोपालगंज नरसंहार, 5 अगस्त के बाद हुई हिंसा, और जिया-उर-रहमान के शासनकाल में 1300 सैनिकों की हत्या जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए थे।

डॉ. नीलिमा अख्तर ने विश्वविद्यालय में जमात-शिबिर समर्थित समूहों द्वारा फैलाए जा रहे भीड़-आतंक के खिलाफ एक लिखित बयान जारी किया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इन बयानों के बाद उन्हें सोशल मीडिया पर विरोध का सामना भी करना पड़ा। छात्रों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए उन्हें सत्ता समर्थक और छात्र आंदोलनों की विरोधी बताया। छात्रों ने विभाग की दीवारों पर विरोध संदेश लिखे और उनकी बर्खास्तगी की माँग की।

फोटो साभार- https://en.bddigest.com/

ढाका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नीलिमा अख्तर भी 20 वर्षों से कार्यरत थीं। अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर रहीं नीलिमा विश्वविद्यालय की शिक्षक राजनीति में सक्रिय थीं और 2022 में ढाका यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के चुनाव में ब्लू पार्टी की ओर से विजयी हुई थीं। ये पार्टी आमतौर पर आवामी लीग समर्थक मानी जाती है।

5 अगस्त के बाद जब भी प्रो. नीलिमा अख्तर ने बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की विचारधारा, मुक्ति संग्राम की भावना, और छात्रों की सुरक्षा के पक्ष में खुलकर आवाज उठाई थी। उन्होंने लगातार विश्वविद्यालय में जमात-शिबिर के प्रभाव और आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ बोलना जारी रखा, जिसे उनकी बर्खास्तगी का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

यह घटना सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन और आलोचना का विषय बन गई है। समर्थकों ने डॉ नीलिमा की पुनः नियुक्ति और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की पारदर्शी जाँच की माँग की है।

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट की मानें तो प्रो नीलिमा को हाल की किसी पोस्ट के कारण नहीं बल्कि 17 जुलाई 2024 को की गई उनकी फेसबुक पोस्ट के कारण हटाया गया है। इस पोस्ट में उन्होंने एक आंदोलन को विरोधी ताकतों द्वारा पोषित बताया था। साथ ही इसमें बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर का उपयोग किया था।

रिपोर्ट के अनुसार, 1995 में भोर कागोज को दिए गए थे इंटरव्यू में उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान को अपना पसंदीदा शख्सियत बताया था। इसके बाद अब उन्हें इस सोशल मीडिया पोस्ट के कारण बर्खास्त किया गया है।

इंडिगो फ्लाइट में मुस्लिम यात्री पर हमला, हमलावर भी मुस्लिम: वामपंथी-इस्लामी हैंडलों ने हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक नैरेटिव फैलाकर फेक न्यूज की वायरल, अब खुल चुकी है पोल

सोशल मीडिया पर शुक्रवार (1 अगस्त 2025) को एक इंडिगो फ्लाइट में हुए झगड़े को लेकर झूठी खबरें फैलाई गईं। दावा किया गया कि एक हिंदू व्यक्ति ने एक मुस्लिम यात्री पर हमला किया। यह अफवाह खासतौर पर एक्स पर कुछ वामपंथी और इस्लामी हैंडलों द्वारा फैलाई गई, जिन्होंने इसे मुस्लिम पीड़ित की तरह पेश किया।

इन दावों में मुस्लिम पहचान को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया और हमलावर को ‘हिंदू’, ‘संघी’ जैसे शब्दों से जोड़ा गया। लेकिन सच यह है कि झगड़े में शामिल दोनों व्यक्ति मुस्लिम थे। इसके बावजूद, एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए हमलावर की असल पहचान को नजरअंदाज कर दिया गया।

एक्स पर प्रमुख वामपंथियों और इस्लामवादियों द्वारा किए गए ट्वीट्स का स्क्रीनशॉट

यह मामला बताता है कि कैसे सोशल मीडिया पर गलत जानकारियों के जरिए सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिश की जाती है, जबकि हकीकत कुछ और होती है।

असल में क्या था मामला

कोलकाता से मुंबई जा रही इंडिगो की एक फ्लाइट में हुसैन अहमद मजूमदार नाम के एक यात्री के साथ मारपीट हुई। हुसैन, जो असम के कछार जिले का रहने वाला है, उसको उड़ान के दौरान घबराहट का दौरा पड़ा।

इसी वजह से फ्लाइट में देरी हुई, जिससे नाराज होकर एक अन्य यात्री हफीजुल रहमान ने उसे थप्पड़ मार दिया। इस घटना का एक वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक सहयात्री हमलावर को टोकते हुए कहता है, ‘तुमने उसे थप्पड़ क्यों मारा? तुम्हें किसी को मारने का कोई अधिकार नहीं है।’ इस दौरान हुसैन रोते हुए नजर आते हैं।

घटना के बाद आरोपित हफीजुल रहमान को कोलकाता में विमान से उतार दिया गया और CISF ने उसे हिरासत में ले लिया।

इंडिगो एयरलाइन ने शुक्रवार (1 अगस्त 2025) को इस मामले पर बयान जारी करते हुए कहा, ‘हमारी फ्लाइट में मारपीट की घटना घटी है, जिसे हम पूरी तरह से अस्वीकार्य करते हैं। हम यात्रियों और क्रू की सुरक्षा और सम्मान को सबसे ऊपर रखते हैं। हमारे स्टाफ ने तय नियमों के तहत कार्रवाई की और आरोपित को ‘अनियंत्रित यात्री’ मानते हुए उसे सुरक्षा एजेंसियों को सौंप दिया गया।’

एयरलाइन ने यह भी कहा कि घटना की जानकारी सभी संबंधित नियामक एजेंसियों को दे दी गई है और वे सभी उड़ानों में सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। फिलहाल, पीड़ित हुसैन अहमद मजूमदार घटना के बाद से लापता है, जिससे चिंता और बढ़ गई है।

मुस्लिम पीड़ित बनाम वास्तविकता की कहानी

जैसे ही घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, कुछ जान-पहचान वाले हैंडल्स ने तुरंत मान लिया कि हमला करने वाला व्यक्ति हिंदू है। उन्होंने इस एक घटना के आधार पर भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और देश के भविष्य को लेकर तरह-तरह की नकारात्मक बातें कहने लगे।

हालांकि, उनका ये झूठा और भड़काऊ नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं सका। ‘द हिंदू’ की पत्रकार जागृति चंद्रा ने सबसे पहले सच्चाई सामने लाई और बताया कि इस झगड़े में शामिल दोनों व्यक्ति एक ही धर्म से हैं, यानी आरोपित और पीड़ित दोनों मुस्लिम हैं। इस खुलासे ने उन लोगों के एजेंडे की सच्चाई को सामने ला दिया, जो इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने अपनी जानकारी का स्रोत इंडिगो को बताया।

बाद में, अन्य पत्रकारों ने अपराधी का नाम हफीजुल रहमान बताया।

जब यह साफ हो गया कि हमला करने वाला व्यक्ति मुस्लिम है, तो वामपंथी और इस्लामवादी हैंडल्स ने इस मुद्दे पर बात करना अचानक बंद कर दिया।

उन्होंने पहले जिस तरह इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था, अब उसी पर चुप्पी साध ली और पीड़ित बनने की नई कहानियाँ गढ़ने के लिए किसी और मुद्दे की तरफ ध्यान मोड़ लिया। यानी जब उनकी बनाई गई झूठी कहानी टिक नहीं पाई, तो उन्होंने चुपचाप रास्ता बदल लिया।