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डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद भारत नहीं खरीद रहा रूसी तेल, ऐसा नरेटिव गढ़ रहा था रॉयटर्स समेत वेस्टर्न मीडिया: लेकिन इस प्रोपेगेंडा की खुल गई पोल, जानिए – क्या है सच्चाई

भारत और अमेरिका में टैरिफ को लेकर जारी तनातनी के बीच रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने एक हफ्ते से रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है। 31 जुलाई को प्रकाशित की गई इस रिपोर्ट में सीधे तौर पर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का ज़िक्र किया गया था। साफ है कि रिपोर्ट का मकसद यह दिखाना था कि भारत, अमेरिका या ट्रंप की धमकियों के जवाब में झुक गया है।

हालाँकि, रॉयटर्स का यह प्रोपेगेंडा केवल कुछ ही घंटों तक टिक पाया। समाचार एजेंसी एएनआई ने अब सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि भारतीय तेल रिफाइनरियाँ अभी भी रूस से तेल खरीद रही हैं। एएनआई की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनियों के आपूर्ति संबंधी फैसले कीमत, कच्चे तेल की श्रेणी, भंडार, लॉजिस्टिक्स और अन्य आर्थिक कारकों के आधार पर ही तय किए जाते हैं।

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में भी तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव ना होने का दावा किया है। इसका मतलब साफ है कि भारत को तेल खरीदना है या नहीं, यह फैसले बाहरी दबाव के बजाय भारत के हितों के आधार पर लिया जाता है।

रॉयटर्स का क्या था दावा?

रॉयटर्स ने दावा किया था कि इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और मंगलौर रिफाइनरी पेट्रोकेमिकल लिमिटेड ने पिछले एक हफ्ते से रूसी तेल नहीं खरीदा है। रिपोर्ट में कहा गया कि रूस से नियमित तेल खरीदने वाली ये कंपनियाँ अब मध्य पूर्वी देशों जैसे अबू धाबी के मुरबान क्रूड और पश्चिम अफ्रीकी तेल की खरीद कर रही हैं। इस रिपोर्ट में ट्रंप की रूसी कच्चा तेल खरीदने पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी का भी ज़िक्र किया था।

एएनआई की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

युद्ध की आशंकाओं और अमेरिकी टैरिफ के बाद मची खलबली के बीच एएनआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस चुनौतीपूर्ण समय में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पूरी तरह से पालन करते हुए सस्ती ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अपने स्रोतों को रणनीतिक रूप से अपने हिसाब से ढाला है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता भारत अपनी ऊर्जा पूर्ति के लिए 85% कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है।

एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ने रियायती रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदा होता तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें मार्च 2022 के 137 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के शिखर से कहीं ज्यादा बढ़ सकती थी जिससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ने का खतरा था। गौरतलब है कि रूसी तेल पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है और ना ही अमेरिका या यूरोपीय संघ द्वारा इसे अभी भी प्रतिबंधित किया गया है।

वहीं, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शनिवार को दो वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत की तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाल से दावा किया गया है कि सरकार ने तेल कंपनियों को रूस से आयात कम करने का कोई निर्देश नहीं दिया है।

ट्रंप ने दी थी भारत को धमकी

ट्रंप ने पिछले हफ्ते कहा था कि अगर भारत रूसी कच्चे तेल का आयात बंद नहीं करता है तो वह उस पर एक अतिरिक्त जुर्माना लगाएंगे। इसके कुछ दिनों बाद ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सुना है कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर रहा है। ट्रंप का दावा था कि अगर ऐसा होता है तो यह अच्छा कदम होगा।

भारत के हितों के आधार पर फैसला: विदेश मंत्रालय

भारतीय विदेश मंत्रालय ने रूसी तेल खरीदने को लेकर अपने रूख को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के हिसाब से फैसला करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत अपनी ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए बाजार में जो भाव मिलता है और वैश्विक हालात को देखकर ही फैसला किया जाता है।”

जिस RSS कार्यकर्ता पर मालेगाँव ब्लास्ट का लगाया गया इल्जाम, वो 17 साल से नहीं लौटे अपने घर: सुहागन पत्नी कर रही ‘रामजी कलसांगरा’ का इंतजार, पूर्व अधिकारी का दावा- हिरासत में हो चुकी हत्या

मुंबई के स्पेशल एनआईए कोर्ट ने बीते दिनों मालेगाँव ब्लास्ट केस में पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी 7 आरोपितों को बरी कर दिया था। हालाँकि, इस केस से जुड़े कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं और इनमें ही एक सवाल इस केस के एक आरोपित रामजी कलसांगरा की गुमशुदगी का भी है।

17 वर्षों से सुहागन की तरह जी रहीं कलसांगरा की पत्नी

दरअसल, कलसांगरा पिछले करीब 17 वर्षों से लापता हैं। कलसांगरा की पत्नी लक्ष्मी कलसांगरा ने दैनिक भास्कर से बातचीत करते हुए कहा कि जाँच एजेंसियों को बताना चाहिए कि उनके पति जीवित हैं या मर चुके हैं। वह पिछले 17 वर्षों से सुहागन का जीवन जी रही हैं।

उन्होंने कहा, “हर तीसरे दिन एनआईए और एटीएस के अधिकारियों ने जाँच के नाम पर परेशान किया। उन्होंने ऐसे सूलूक किया जैसे हम अपराधी हों।”

लक्ष्मी बेशक सुहागन की तरह जी रही हैं लेकिन उनका कहना है कि ये सिर्फ जाँच एजेंसी को ही पता है कि कलसांगरा जीवित हैं या नहीं। वह बताती हैं कि पति के लापता होने के बाद उन्होंने खेती-बाड़ी की और मजदूरी तक करनी पड़ी तब जाकर अपने तीनों बेटों का पालन-पोषण कर सकीं। उन्हें आज भी अपने पति के लौटने का इंतजार है।

रामजी कलसांगरा के बेटे देवव्रत ने क्या कहा?

रामजी कलसांगरा के बेटे देवव्रत कलसांगरा का कहना है कि उन्हें अब भी न्याय का इंतजार है। उन्होंने इस मामले की जाँच करने वाले एटीएस अधिकारियों से सवाल किया है कि क्या उनकी माँ को खुद को विवाहित महिला मानना चाहिए या विधवा।

देवव्रत भावुक होते हुए बताते है कि 9 अक्टूबर 2008 को उन्होंने आखिरी बार पिताजी के साथ गाँव में दशहरा मनाया था और उसके बाद फिर अपने पिता को कभी नहीं देखा।

पिता के लापता होने के बाद की तकलीफों को लेकर देवव्रत ने कहा कि उनके लापता होने के बाद जाँच एजेंसी के अफसर घर आकर उनकी माँ को परेशान करते थे और समाज में हमारे परिवार को हीन नजरों से देखा जाता था।

वे बताते हैं कि 2011 में इस मामले की जाँच के दौरान अधिकारी उनके घर आए और उनके पिता के साथ के बचपन के फोटो और अन्य सामान ले गए। आज उनके पास पिता की कोई तस्वीर भी नहीं है।

देवव्रत ने अपने पिता के लापता होने की जाँच की माँग की है। उनका आरोप है, “उनके पिता को अवैध रूप से एटीएस ने हिरासत में लिया होगा और उस दौरान उनके साथ कुछ अप्रिय घटना घटी होगी।” देवव्रत और उनके पूरे परिवार को अभी भी अभी रामजी कलसांगरा के बारे में कोई ठोस खबर मिलने की उम्मीद है।

देवव्रत ने अपने चाचा को लेकर बताया कि मालेगाँव केस में उनके चाचा शिवनारायण कलसांगरा को भी एटीएस ने गिरफ्तार किया था। 2008 में उन्हें हिरासत में लेने के 15 दिन बाद उनकी गिरफ्तारी दिखाई गई। देवव्रत बताते हैं कि उनके चाचा को टॉर्चर किया गया। वो 2014 तक जेल में रहे फिर साल 2017 में एनआईए ने उन्हें बरी कर दिया था।

कौन हैं रामजी कलसांगरा?

रामचंद्र उर्फ रामजी कलसांगरा लापता होने से पहले इंदौर में रहते थे और वे इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टर थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रामजी 15 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए थे और उन्होंने 1992 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या जाकर कारसेवा में भी हिस्सा लिया था।

कलसांगरा पर आरोप था कि उन्होंने मालेगाँव में भीकू चौक पर शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट नाम की दुकान के बाहर बम बँधी हुई बाइक रखी थी। उन पर समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में शामिल होने का भी आरोप था।

कोर्ट ने बेशक सात लोगों को बरी कर दिया हो लेकिन कलसांगरा को अभी भी राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने वॉन्टेड आरोपित के तौर पर दिखाया है। यानी अगर इन्हें अभी भी गिरफ्तार किया जाता है तो इन्हें मुकदमे का सामना करना पड़ेगा

कलसांगरा की हत्या किए जाने का दावा

मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच कर रही महाराष्ट्र एटीएस की टीम में शामिल रहे और बाद में सस्पेंड कर दिए गए पुलिस अधिकारी महबूब मुजावर दिसंबर 2016 में सोलापुर की एक अदालत में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि रामजी कलसांगरा और उनके साथी संदीप डांगे की 2008 में कस्टडी में ही हत्या कर दी गई थी

उन्होंने अपने हलफनामे में दावा किया कि दोनों के शवों को मुंबई 26/11 के आतंकी हमलों के ‘अज्ञात पीड़ितों’ के रूप में पेश किया गया था। मुंबई आतंकी हमला डांगे और कलसांगरा को कथित हिरासत में लिए जाने के कुछ महीनों बाद हुआ था।

मुजावर ने दावा किया था कि कलसांगरा और डांगे को एटीएस ने भोपाल से पकड़ा था लेकिन 26 नवंबर 2008 को (मुंबई आतंकी हमले के दिन) दोनों को मुंबई में गोली मार दी गई थी। मुजावर का दावा था कि मारे जाने से पहले उन्हें कालाचौकी स्थित एटीएस ऑफिस में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।

मुजावर ने दावा किया कि उन्हें लापता आरोपितों की तलाश में कर्नाटक भेजा गया था लेकिन वे दोनों मारे जा चुके थे। उनका कहना था कि वह इन हत्याओं के खिलाफ थे और उन्हें चुप कराने के लिए उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत एक फर्जी केस दर्ज किया गया था।

देवव्रत का कहना है कि मुजावर ने कोर्ट में एफिडेविट देने और उनकी हत्या की खबर को सुनने के बाद हमने जाँच एजेंसी और कोर्ट से स्पष्टीकरण माँगा था। देवव्रत ने कहा, “हमने उनसे गुजारिश की थी कि यदि मेरे पिता का शव उनके पास है तो वह हमें दे दें, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।”

इन हमलों के 17 वर्ष बाद जब सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है और कथित ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी भरभराकर गिर गई है तो ऐसे में कलसांगरा के परिवार की माँगों की भी जाँच किए जाने की जरूरत है। उनके परिवार को इंतजार है, उम्मीद है लेकिन सच कहीं फाइलों में दर्ज है या शायद उसे एक गुमनाम मौत बना दिया गया है।

जो दुनिया में नहीं, उन अरुण जेटली पर भी झूठे आरोप लगाने से नहीं चूके राहुल गाँधी: कहा – कृषि कानून के लिए मुझे धमकाया था, बेटे रोहन लगाई क्लास

राहुल गाँधी यूँ तो जब तब अपनी बातों से हँसी के पात्र बनते ही रहते हैं लेकिन शनिवार (2 अगस्त 2025) को उन्होंने इतना बेतुका बयान दे दिया कि उस पर विवाद खड़ा हो गया है।

शनिवार को दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित वार्षिक लीगल कॉन्क्लेव-2025 में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कहा कि जब वे कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ रहे थे, तब केंद्र सरकार ने उन्हें धमकाने के लिए अरुण जेटली को भेजा था।

राहुल गाँधी के अनुसार, जेटली ने उनसे कहा था, “अगर तुम सरकार का विरोध करते रहे, तो हमें तुम्हारे खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ेगी।” राहुल ने इसके जवाब में कहा, “मुझे नहीं लगता कि आपको पता है आप किससे बात कर रहे हैं।”

राहुल गाँधी के इस बयान पर तुरंत विवाद खड़ा हो गया क्योंकि अरुण जेटली का निधन 24 अगस्त 2019 को हुआ था, जबकि कृषि कानूनों को जून 2020 में अध्यादेश के रूप में लाया गया और सितंबर 2020 में संसद में पारित किया गया।

राहुल गाँधी इस दौरान चुनाव आयोग की निष्पक्षता और 2024 के लोकसभा चुनावों में कथित धांधली पर सवाल उठा रहे थे। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के पास 70 से अधिक सीटों पर गड़बड़ी के सबूत हैं, जिन्हें जल्द ही सार्वजनिक किया जाएगा।

रोहन जेटली का तीखा पलटवार

राहुल गाँधी के बयान पर अरुण जेटली के बेटे रोहन जेटली ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि राहुल गाँधी का दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि उनके पिता की विरासत का भी अपमान है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रोहन ने लिखा, “मेरे पिता का निधन 2019 में हुआ था, जबकि कृषि कानून 2020 में पेश किए गए थे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे पिता का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वे किसी विरोधी विचार रखने वाले को धमकी दें।”

रोहन ने आगे लिखा, “अरुण जेटली एक कट्टर लोकतांत्रिक थे, जो हमेशा सहमति बनाने और खुले तौर पर संवाद में विश्वास रखते थे। अगर कभी राजनीतिक मतभेद होता भी, तो वे सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकालने की कोशिश करते थे। यही उनका स्वभाव था और यही उनकी आज की विरासत है।”

रोहन जेटली ने लिखा कि राहुल गाँधी उन नेताओं के बारे में बोलते समय सावधानी बरतें जो अब हमारे बीच नहीं हैं। इससे पहले राहुल गाँधी ने पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के अंतिम दिनों को भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी, जो उतना ही असंवेदनशील था।

लोगों ने राहुल को लिया आड़े हाथ

रोहन जेटली के पोस्ट के बाद नेटिजन्स ने राहुल के खिलाफ जमकर गुस्सा निकाला है। राहुल के बयान के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर अरुण जेटली का नाम ट्रेंड करने लगा। कई यूजर्स ने कहा कि राहुल के खिलाफ शिकायत की जानी चाहिए।

फोटो साभार- x

कहीं कुछ यूजर्स ने कहा कि राहुल की झूठ बोलने की आदत हो गई है। ऐसे में उन पर मानहानि का मुकदमा किया जाना चाहिए।

‘किसी चीज को बनाने में भारतीय का पसीना बहा, तो वो स्वदेशी’: पीएम मोदी ने वाराणसी में दिलाया देश को संकल्प, कहा – देश को अब सजग रहना होगा

काशी से तीसरी बार सांसद बने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को 51वीं बार अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने 2,200 करोड़ रुपए  से अधिक की 52 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया।

उन्होंने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना की 20वीं किस्त जारी कर देशभर के 9.7 करोड़ से ज्यादा किसानों को 20,500 करोड़ रुपए की सहायता राशि ट्रांसफर की।

प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी इच्छा थी कि सावन के पवित्र महीने में बाबा विश्वनाथ की पूजा करें, लेकिन श्रद्धालुओं को असुविधा न हो, इसलिए उन्होंने वहीं मंच से भोलेनाथ और माँ गंगा को नमन किया।

उन्होंने पहलगाम की घटना को याद करते हुए कहा कि इस दर्दनाक हादसे के बाद उनका मन भारी हो गया था और उन्होंने बाबा विश्वनाथ से पीड़ितों को हिम्मत देने की प्रार्थना की। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर के जरिए मैंने अपनी बहन-बेटियों के सिंदूर का बदला लेने का वादा पूरा किया।’

मोदी ने वाराणसी से देश को न सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता का संदेश दिया, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प का स्वर भी बुलंद किया। पीएम मोदी ने संकल्प दिलाया है कि अब हर खरीद देशहित को ध्यान में रखकर हो। अब हर भारतीय नागरिक स्वदेशी को ही अपनाए। उन्होंने कहा, “भारत को अब सजग रहना होगा। कौन सी चीज खरीदनी है, इसका सिर्फ एक ही तराजू होगा- वो जिसमें भारत के किसी नागरिक का पसीना बहा हो। हम वही चीजें खरीदेंगे जो भारत में बनी हों। भारतीय कौशल से बनी हों, भारतीय हाथों से बनी हों। यही हमारे लिए असली स्वदेशी है।”

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि आपने मोदी को काम पर लगाया है और मोदी लगातार काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने 55 करोड़ से ज्यादा लोगों के बैंक खाते खुलवाए, जिनमें से कई लोगों ने पहले कभी बैंक का दरवाजा भी नहीं देखा था।

उन्होंने कहा कि 10 साल बाद खातों की केवाईसी जरूरी होती है, लेकिन सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि बैंक कर्मचारी कैंप लगाकर लोगों के घर तक पहुँचें, ताकि उन्हें किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘लखपति दीदी अभियान’ का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि हमारा लक्ष्य तीन करोड़ लखपति दीदी बनाना है और अब तक 1.5 करोड़ महिलाएँ यह मुकाम हासिल कर चुकी हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि ये आंकड़े सुनकर ‘सपा वाले तो साइकिल लेकर ही भाग जाएंगे।’

विकास परियोजनाओं की बात करें तो प्रधानमंत्री ने वाराणसी-भदोही मार्ग और छितौनी-शूल टंकेश्वर मार्ग के चौड़ीकरण का उद्घाटन किया। हरदत्तपुर में रेलवे ओवरब्रिज के निर्माण से मोहनसराय-अदलपुरा मार्ग पर ट्रैफिक की समस्या कम होगी। इसके अलावा दालमंडी, लहरतारा-कोटवा, गंगापुर और बाबतपुर में सड़क उन्नयन कार्यों की आधारशिला रखी गई।

बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 880 करोड़ रुपए की परियोजनाएँ शुरू की गई हैं, जिनमें स्मार्ट वितरण प्रणाली और ओवरहेड केबलों को भूमिगत करना शामिल है। इससे शहर की बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और टिकाऊ होगी।

पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री ने नदी किनारे के आठ कच्चे घाटों के पुनर्विकास, शिवपुर स्थित रंगीलादास कुटिया के तालाब और घाट के सौंदर्यीकरण तथा दुर्गाकुंड के जीर्णोद्धार का उद्घाटन किया।

इसके अलावा, कर्दमेश्वर महादेव मंदिर, स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मस्थली करखियाँव और मुंशी प्रेमचंद के लमही स्थित पैतृक घर को संग्रहालय में बदलने की आधारशिला भी रखी गई।

न कोई शिकायत दी, न जवाब… बस रोए जा रहे वोट चोरी का रोना- राहुल गाँधी के आरोपों को सुन भड़का चुनाव आयोग: कहा- उनकी ‘धमकियाँ’ तथ्यहीन, अधिकारी कॉन्ग्रेस नेता को करें नजरअंदाज

चुनाव आयोग ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के वोट चोरी से जुड़े आरोपों का खंडन करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी के बयान को भ्रामक, तथ्यहीन और धमकाने वाला बताते हुए कहा कि आयोग इस तरह के निराधार आरोपों को नजरअंदाज करता है।

आयोग ने अपने बयान में कहा, “चुनाव आयोग रोजाना लगाए जा रहे ऐसे निराधार आरोपों को नजरअंदाज करता है और हर दिन धमकियाँ दिए जाने के बावजूद आयोग सभी चुनाव अधिकारियों से ऐसे गैर-जिम्मेदार बयानों को नजरअंदाज कर निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करने का अनुरोध करता है।”

चुनाव आयोग का कहना है कि राहुल गाँधी मीडिया में चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ बयानबाजी तो कर रहे हैं लेकिन उन्होंने अपने आरोपों पर चुनाव आयोग के पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया है। साथ ही, उन्होंने लगातार आरोप लगाने के बावजूद चुनाव आयोग में कोई औपचारिक शिकायत भी दर्ज नहीं कराई है।

चुनाव आयोग ने बताया कि उन्होंने राहुल गाँधी को बीते 12 जून को एक मेल भेजा था और अपनी शिकायत दर्ज करने को कहा था लेकिन उन्होंने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आयोग का कहना है कि उस दिन उन्होंने राहुल गाँधी को एक पत्र भी भेजा लेकिन उस पर भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है।

चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि उन्हें राहुल गाँधी की तरफ से किसी भी मामले पर कोई भी शिकायत या पत्र नहीं मिला है। आयोग ने राहुल के आरोपों को निंदनीय बताया और कहा कि बहुत आश्चर्यजनक बात है कि राहुल गाँधी बेतुके आरोप लगा रहे हैं और अब तो उन्होंने चुनाव आयोग और उसके कर्मचारियों को धमकाना भी शुरू कर दिया है।

इससे पहले राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के सीधे तौर पर वोट चोरी में शामिल होने का दावा किया था। उन्होंने चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाते हुए कहा था कि वो अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं और रिटायर होने के बाद भी उन्हें ढूंढकर निकालेंगे।

राहुल गाँधी ने संसद के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था, “हम हमारे पास स्पष्ट सबूत हैं कि वोट चोरी हो रही है और चुनाव आयोग वोटों की चोरी में शामिल है। मैं यह बात हल्के तौर पर नहीं बोल रहा हूँ बल्कि 100% सबूतों के आधार पर बोल रहा हूँ। जैसे ही हमने ये (सबूत) जारी किए तो देश को पता चल जाएगा कि चुनाव आयोग बीजेपी के लिए मतदाताओं की चोरी करा रहा है।”

उन्होंने कहा, “हमें मध्य प्रदेश के चुनाव और विधानसभा चुनाव में शक था, जो महाराष्ट्र में थोड़ा और पुख्ता हुआ। हमें लगा कि राज्य स्तर पर वहाँ चोरी हुई है। एक करोड़ वोटर जोड़े गए थे और 6 महीने तक गहराई से जाँच कराने पर जो हमें मिला है वो एटम बम है। फटेगा तो चुनाव आयोग भारत में दिखेगा नहीं।”

राहुल ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाते हुए कहा, “मैं गंभीरता से बोल रहा हूँ कि चुनाव आयोग में जो भी ये काम कर रहे हैं, ऊपर से नीचे तक, आप लोग याद रखिए, आपको हम छोड़ेंगे नहीं चाहे कुछ भी हो जाए। आप हिंदुस्तान के खिलाफ काम कर रहे हो और यह देशद्रोह है। आप कहीं भी हों चाहे रिटायर हो गए हों हम आपको ढूँढकर निकालेंगे।”

राहुल गाँधी बीते कई वर्षों से कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की हार के बाद से ही चुनाव आयोग पर लगातार हमला करते रहे हैं। वह बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी का यह बयान X पर भी शेयर किया था जिस पर चुनाव आयोग ने जवाब दिया है। चुनाव आयोग ने कहा कि लोकसभा चुनाव 2024 के बाद एक भी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार द्वारा कोई याचिका नहीं दायर की गई थी। आयोग ने कहा, “लोकसभा चुनाव 2024, आज से एक वर्ष से अधिक समय पूर्व सम्पन्न हुए थे। चुनाव परिणामों के विरुद्ध कुल 10 Election Petitions दायर की गईं लेकिन इन में से एक भी याचिका किसी भी हारे हुए कॉन्ग्रेस उम्मीदवार द्वारा दायर नहीं की गई थी।”

आयोग ने कहा कि एक साल बाद लाखों चुनाव कर्मियों पर बेबुनियाद आरोप लगाना, बार-बार डराना-धमकाना और वोट चोरी जैसे शब्दों का उपयोग करना एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीका है।

यह पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी के बयानों का चुनाव आयोग ने फैक्ट चेक किया है। इससे पहले भी राहुल गाँधी के बयानों पर आयोग ने लगातार प्रतिक्रिया दी है और चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह के धांधली के आरोपों को खारिज किया है।

‘सेवा से सौदा करते हैं ईसाई मिशनरी’: छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर बोले CM साय; जंगलों में होमस्टे से लेकर ‘बस्तर ओलंपिक’ तक – बताया जनजातीय समाज का कैसे हो रहा उत्थान

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने शुक्रवार (1 अगस्त, 2025) को अपने दिल्ली प्रवास के दौरान ‘छत्तीसगढ़ सदन’ में पत्रकारों के साथ संवाद किया। काफी हल्के-फुल्के माहौल में हुई इस चर्चा में छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान और ईसाई धर्मांतरण से लेकर जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ने और राज्य के खाद्य व लकड़ी के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराए जाने संबंधित विषयों पर चर्चा हुई।

1989 में गाँव के पंच से लेकर दिसंबर 2023 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले विष्णुदेव साय 3 अलग-अलग बार राज्य में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं, इससे समझा जा सकता है कि राज्य में पार्टी के लिए उनका क्या योगदान है। वो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में भी मंत्री रहे हैं। वो भाजपा के जनजातीय चेहरों में से भी एक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार छत्तीसगढ़ की स्थापना की रजत जयंती समारोह में भी शामिल होने वाले हैं, सीएम साय ने उन्हें निमंत्रण दे दिया है।

अमित शाह ने कुछ यूँ बढ़ाया जवानों का हौसला, लाखों करोड़ के निवेश प्रस्ताव

नक्सलवाद पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने डेढ़ वर्ष में कई बार बस्तर आकर सुरक्षाबलों का हौसला बढ़ाया। जवानों के साथ उठना-बैठना, उनसे संवाद करना – इसका फ़ायदा हुआ। डेढ़ साल के निरंतर अभियान ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है और अब यह संकट अंतिम साँसें ले रहा है। उन्होंने दोहराया कि छत्तीसगढ़ एक अत्यंत समृद्ध राज्य है, जहाँ लोहा, कोयला, सोना, हीरा, टीना और दुर्लभ लिथियम जैसी खनिज संपदाएँ मौजूद हैं। राज्य का 44% हिस्सा जंगलों से ढँका है और यहाँ के मेहनती किसान इसकी असली ताकत हैं। उन्होंने कहा कि “छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया” हैं और अब राज्य को लेकर लोगों की जो नकारात्मक छवि है, उसे दूर करना होगा।

उन्होंने विधानसभा में घोषित स्पेशल टेक्निकल रीजन डेवेलपमेंट ज़ोन का ज़िक्र किया, जिसमें रायचूर के आसपास के इलाके शामिल होंगे। रायपुर में मेट्रो प्रोजेक्ट की योजना है, और सेमीकंडक्टर चिप्स तथा AI-बेस्ड डेटा सेंटर के प्रोजेक्ट शुरू हो चुके हैं। नई उद्योग नीति के अंतर्गत, एक बार आवेदन करने के बाद सभी दस्तावेज ऑनलाइन उपलब्ध होंगे और व्यक्ति को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। 1000 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाले उद्यमियों को विभिन्न इंसेंटिव्स मिलेंगे।

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य को 6.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिन पर काम शुरू हो गया है। 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए एक नया विज़न डॉक्यूमेंट तैयार किया गया है। इसके लिए राज्य के एक लाख युवाओं, किसानों, महिलाओं, व्यापारियों और मजदूरों से सुझाव लिए गए। वर्तमान में राज्य की GSDP 5 लाख करोड़ रुपए है जिसे 2047 तक 75 लाख करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।

जनजातीय समाज के उत्थान पे विशेष ध्यान

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी प्रयास हो रहे हैं। जगदलपुर में 200 करोड़ रुपए की लागत से सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बन रहा है। राज्य ग्रीन एनर्जी की दिशा में अग्रसर है, जहाँ सौर ऊर्जा सहित अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। बस्तर में होमस्टे परियोजना शुरू की गई है और पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है। अबूझमाड़ के 5000 वर्ग किमी के जंगलों में गांवों में होमस्टे बनाए जा रहे हैं। पहले जहां राशन कार्ड भी नहीं बनते थे, अब वहाँ के लोग एयरपोर्ट, मॉल और स्टेशन देखने रायपुर तक आ रहे हैं। इन जनजातीय युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए रायपुर लाकर घुमाया जा रहा है, इससे पहले वो अपने इलाक़े से निकले तक नहीं थे।

नक्सल विरोधी अभियान की सफलता का प्रमाण माओवादी सेंट्रल कमेटी के नेता बसवराज का मारा जाना है। मुख्यमंत्री ने बताया कि अब माओवादी बिखर चुके हैं, डिफेंसिव पोजीशन में हैं और छिपने को मजबूर हैं। कुख्यात हिड़मा के गाँव में भी अब पुलिस कैंप खोल दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सुरक्षा बल नहीं, बल्कि विकास से ही विश्वास पैदा होगा। बस्तर ओलंपिक में 1.65 लाख लोगों ने भाग लिया। वहां नृत्य-गान और जनजातीय संस्कृति का भव्य प्रदर्शन हुआ। अब ये ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ के नाम से आयोजित होगा।

जब सवाल आया कि कुछ लोग बस्तर में अंबानी-अडानी के नाम पर विकास का विरोध कर रहे हैं, तो मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार सच में विकास चाहती है, जमीन बेचने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने ‘उंब्रेला योजना’ का जिक्र किया जिसके अंतर्गत कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है, महिलाओं को सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से सशक्त बनाया जा रहा है। इंद्रावती और महानदी को जोड़ने की योजना की समीक्षा की जा रही है और 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था की जाएगी।

राज्य सरकार पशुपालन, मत्स्यपालन, बकरी, सुअर और मुर्गी पालन पर भी ज़ोर दे रही है। राष्ट्रीय विकास बोर्ड (NDB) के साथ समझौता हुआ है ताकि हर परिवार को एक गाय मिल सके। बीमार गायों की देखभाल, ट्रेनिंग और वनोपज आधारित योजनाएँ 6 जिलों में पायलट के रूप में शुरू की गई हैं, जो सफल होने पर आगे बढ़ाई जाएँगी। दंतेवाड़ा में मिलेट्स और जशपुर में महुआ की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। महिलाओं द्वारा महुआ से लड्डू, देशी घी और अचार बनाए जा रहे हैं। कोविड काल में महुआ से सैनिटाइज़र भी बनाया गया। स्थानीय मशरूम और गोंद जैसे उत्पादों पर भी काम हो रहा है।

ईसाई धर्मांतरण और मिशनरियों पर बरसे CM साय

ऑपइंडिया के संपादक अजीत झा ने ईसाई धर्मांतरण की समस्या की ओर सीएम का ध्यान केंद्रित किया। छत्तीसगढ़ में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर चुके अजीत झा के सवालों पर ईसाई धर्मांतरण के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने गंभीर चिंता जताई। जशपुर से आने वाले विष्णुदेव साय ने बताया कि उस इलाक़े में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च है जहाँ स्वास्थ्य और शिक्षा पर मिशनरियों के एकाधिकार की स्थिति बनी हुई थी। उन्होंने स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों का उल्लेख किया जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल को यहाँ काले झंडे दिखाए गए थे। उन्होंने इलाक़े की स्थिति ठीक करने के लिए रमाकांत देशपांडे को DO बनाकर भेजा।

कई वर्षों तक काम करने के बाद रमाकांत देशपांडे ने सरकारी सेवा छोड़कर एक पेड़ के नीचे छह बच्चों के साथ स्कूल शुरू किया, जो वनवासी कल्याण आश्रम की नींव बनी। वो बालासाहब देशपांडे के नाम से जाने गए। सीएम साय ने बताया कि कैसे जशपुर राजघराने के दिलीप सिंह जूदेव ने घर वापसी अभियान चलाया और अब उनके पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव, अमेरिका से लौटकर, इस अभियान को चला रहे हैं। उन्होंने राजपरिवार को जनजातीय समाज के लिए कार्य करने और धर्मांतरण विरोधी अभियान चलाने का श्रेय दिया।

मुख्यमंत्री ने ईसाई मिशनरियों की सच्चाई बताते हुए कहा कि सेवा के नाम पर सौदा हो रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पहले जब ग़रीब को कोदो और महुआ खाकर जीने को मज़बूर थे, तब अमेरिका से उनके लिए लाल गेहूँ, सेकंड हैंड कपड़े, तेल और पाउडर लाए जाते थे; आज भी वही किया जा रहा है। उन्होंने नारायणपुर की तीन आदिवासी लड़कियों के धर्मांतरण और मानव तस्करी के एक मामले में 2 ननों की गिरफ़्तारी के मुद्दे पर भी सवालों के जवाब दिए। उन्होंने जानकारी दी कि सुखमन मंडावी नामक एक युवक इन लड़कियों को लेकर स्टेशन पहुँचा था, जहां दो नन भी थीं। लड़कियाँ रो रही थीं, सूचना पर पुलिस पहुँची और मामला दर्ज हुआ। फ़िलहाल कोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी है।

हस्तकला और कारीगरी को उपलब्ध कराया जा रहा बाजार

सीएम साय ने बताया कि बस्तर की हस्तकला और संस्कृति को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। सागवान की लकड़ी से बनी आकृतियाँ, बेल मेटल की मूर्तियाँ और गोंडागाँव की कारीगरी को विदेशी एग्जीबिशन में प्रदर्शित किया जा रहा है। ‘बस्तर पांडुम’ जैसे उत्सवों में पारंपरिक वेशभूषा, व्यंजन, 200 प्रकार के लकड़ी के वाद्ययंत्र और सलखी रस जैसे स्थानीय उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। मुख्यमंत्री ने बताया कि छत्तीसगढ़ सदन में भी लोकल व्यंजन परोसे जा रहे हैं और ‘गढ़ कलेवा’ जैसे स्टॉल जगह-जगह खुले हैं।

उन्होंने अंत में छत्तीसगढ़ की भोजन संस्कृति की चर्चा की। वारसी को ‘धान का कटोरा’ बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां सुबह, शाम और रात – हर वक्त चावल खाया जाता है। रात में चावल और पानी खाकर उसे सुबह तक खट्टा कर लिया जाता है, जिसमें नींबू, मिर्ची और प्याज साथ लिया जाता है जिससे गर्मी नहीं लगती। इसपर पत्रकारों ने उन्हें जानकारी दी कि इसे आजकल फिटनेस ट्रेनर डायट प्लान में भी शामिल कर रहे हैं और ये ख़ासा लोकप्रिय होता जा रहा है।

‘हम तय करेंगे रोहिंग्या- शरणार्थी हैं या घुसपैठिए’ : मोदी सरकार के ‘ऑपरेशन पुशबैक’ के बीच आया सुप्रीम कोर्ट, जानें ‘नागरिकता’ देना किसका अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (31 जुलाई 2025) को कहा कि वह यह तय करेगा कि भारत में रह रहे अवैध रोहिंग्या ‘शरणार्थी’ माने जाएँगे या ‘अवैध घुसपैठिए’। कोर्ट में रोहिंग्या से जुड़े कई मामलों की सुनवाई हो रही है। जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और एन. कोटिश्वर सिंह की तीन जजों की पीठ ने कहा कि यह मामला अब तीन दिनों तक विस्तार से सुना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जिन प्रमुख मुद्दों पर विचार करने की बात कही, वे हैं:

  1. क्या रोहिंग्या लोगों को ‘शरणार्थी’ घोषित किया जा सकता है? अगर हाँ, तो उन्हें किस प्रकार की सुरक्षा और अधिकार मिलेंगे?
  2. अगर रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में घुसे हैं, तो क्या भारत सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें कानून के अनुसार देश से बाहर निकाला जाए?
  3. अगर रोहिंग्या को अवैध घुसपैठिया मान भी लिया जाए, तो क्या उन्हें अनिश्चित समय तक हिरासत में रखा जा सकता है? या फिर उन्हें कुछ शर्तों के साथ जमानत दी जानी चाहिए?
  4. जो रोहिंग्या हिरासत में नहीं हैं और शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं, क्या उन्हें पीने का पानी, स्वच्छता, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ मिल रही हैं? क्या यह सब संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के अनुसार है?

अवैध रोहिंग्याओं को निर्वासित कर रहा भारत

भारत सरकार ने देश में अवैध रूप से घुसे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर निकालने (डिपोर्ट) की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का कहना है कि ये अवैध रोहिंग्या देश की कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और डेमोग्राफी के लिए खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से केंद्र सरकार लगातार इन्हें पहचानकर वापस भेजने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ कुछ विदेशी फंडिंग पाने वाले मानवाधिकार संगठन और NGO सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। उन्होंने रोहिंग्याओं को भारतीय नागरिकों के बराबर अधिकार देने और उनकी देश से वापसी रोकने की माँग की।

लेकिन मई 2025 में, जब सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हुई तो अदालत ने स्पष्ट और संतुलित रुख अपनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस माँग को खारिज कर दिया जिसमें वे चाहते थे कि इस मामले को तुरंत प्राथमिकता के साथ सुना जाए। कोर्ट ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और सरकार की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अवैध घुसपैठियों के मामले में कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से गंभीरता जरूरी है।

गैर सरकारी संगठन उन अवैध रोहिंग्याओं की करना चाहते हैं रक्षा जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हैं खतरा

याचिकाकर्ता चाहते हैं कि भारत सरकार रोहिंग्या मुस्लिमों के मामले में ‘मानवीय दृष्टिकोण’ अपनाए, लेकिन यह भी सच है कि कई अवैध रोहिंग्या नागरिक गंभीर आपराधिक गतिविधियों, जैसे मानव तस्करी में शामिल पाए गए हैं। ये अवैध प्रवासी उस देश के संसाधनों पर दावा ठोक रहे हैं, जिसकी आबादी पहले से ही बहुत बड़ी है।

फिर भी, तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनके पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि रोहिंग्या धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गए हैं। इनमें से कई लोगों ने फर्जी आधार कार्ड और अन्य स्थानीय पहचान पत्र भी बना लिए हैं, जिसका फायदा उन्हें तुष्टिकरण की राजनीति से मिला।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के आँकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर 2024 तक भारत में 95,000 से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिम रह रहे हैं। इनमें से लगभग 22,500 लोग शरणार्थी और शरण की माँग करने वाले हैं। इन्हें संयुक्त राष्ट्र ने ‘राज्यविहीन’ माना है।

भारत अवैध रोहिंग्याओं को रखने के लिए कानूनी रूप से नहीं है बाध्य

1951 शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो यह तय करती है कि शरणार्थी किसे कहा जाता है और इस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की शरणार्थियों और शरण की माँग करने वालों के प्रति क्या जिम्मेदारियाँ होती हैं। इस संधि के अनुसार, किसी भी देश को शरणार्थियों को उस देश में वापस नहीं भेजना चाहिए जहाँ उन्हें उत्पीड़न या खतरा हो सकता है।

हालाँकि, भारत ने इस 1951 सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए भारत इस संधि के नियमों से कानूनी रूप से बँधा नहीं है। इसका मतलब यह है कि भारत को शरणार्थियों को अपने देश में रखना जरूरी नहीं है और वह अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों को निर्वासित कर सकता है।

संविधान संसद को नागरिकता पर निर्णय लेने का देता है अधिकार

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट अब रोहिंग्या शरणार्थियों की कानूनी स्थिति से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा है, लेकिन इस विषय पर निर्णय लेने का असली अधिकार संसद के पास है। संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता से जुड़े सभी मामलों, जैसे नागरिकता प्राप्त करना, छोड़ना और समाप्त करना आदि के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।

नागरिकता से जुड़े कानूनों को लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है। संसद ने भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया है, जो नागरिकता प्राप्त करने, छोड़ने और नागरिकता वापस लेने से जुड़े नियम तय करता है। हालाँकि रोहिंग्या शरणार्थी, जो अवैध रूप से भारत में आए हैं, इस कानून के अंतर्गत नहीं आते।

भारत सरकार का यह स्पष्ट रुख है कि रोहिंग्या लोग अवैध प्रवासी हैं और उन्हें देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए सरकार उन्हें वापस भेज रही है। सरकार का यह मानना है कि अगर ऐसे तत्वों को भारत में रहने दिया गया, तो यह देश की कानून-व्यवस्था और लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे गंभीर मामलों का निर्णय संसद जैसे संस्थान के हाथ में होना चाहिए, क्योंकि यह जनता के प्रति जवाबदेह होता है।

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को अपने हाथ में लिया है, तो यह उम्मीद की जाती है कि वह केवल कानूनी तर्कों और सूखी व्याख्या तक सीमित न रहकर, देश और जनता के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखेगा।

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

रूस के पूर्व राष्ट्रपति बोले- ‘हम ईरान या इजरायल नहीं’, ट्रंप ने लगा दीं 2 परमाणु पनडुब्बियाँ: शीत युद्ध के 17 साल बाद फिर से तैनात हुए न्यूक्लियर वेपन, मेदवेदेव के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति का चल रहा वाकयुद्ध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बीच चल रहे वाकयुद्ध में ट्रंप ने एक नई घोषणा की है। इसके तहत अमेरिका ने रूस के पास दो परमाणु पनडुब्बियों को तैनात करने का आदेश दिया है।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया हैंडल ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट साझा की है। इसमें उन्होंने लिखा है, “रूस के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान में रूसी सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव के भड़काऊ बयानों के आधार पर मैंने दो परमाणु पनडुब्बियों को उपयुक्त क्षेत्रों में तैनात करने का आदेश दिया है- इस आशंका के तहत कि कहीं ये मूर्खतापूर्ण और उकसाने वाले बयान केवल शब्दों तक सीमित न रह जाएँ।”

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ट्रंप ने आगे लिखा, “शब्द बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, और अक्सर अनजाने में गंभीर परिणामों की ओर ले जाते हैं। मैं आशा करता हूँ कि यह मामला ऐसा न हो। इस विषय पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।”

दोनों नेताओं के बीच चल रहा वाकयुद्ध

दोनों देशों के नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी के बाद ट्रंप ने ये कदम उठाया है। इस सप्ताह की शुरुआत में ट्रंप ने रूस को एक अल्टीमेटम दिया था कि 10 दिनों के अंदर रूस यूक्रेन में युद्धविराम पर सहमति दे अन्यथा रूस और उसके तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाए जाएँगे।

इसके बाद 28 जुलाई 2025 को मेदवेदेव ने ट्रंप के लिए लिखा कि वह रूस के साथ अल्टीमेटम का खेल खेल रहे हैं: 50 या 10 दिन… उन्हें दो बातें याद रखनी चाहिए। पहली ये कि रूस ‘इजरायल या ईरान’ नहीं है और दूसरी ये कि ट्रंप का हर नया अल्टीमेटम ‘युद्ध की ओर एक कदम’ माना जाएगा और ये युद्ध यूक्रेन-रूस के बीच नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ होगा।

रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बेहद खास माने जाते हैं। मेदवेदेव ने ट्रंप की घोषणा को उकसावे की कार्रवाई बताया

ट्रंप की युद्ध रोकने की कोशिश में पलट गई बाजी

असल में ट्रंप का ये अल्टीमेटम ट्रंप की एक व्यापक दबाव रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसके तहत वे रूस और यूक्रेन के बीच तीन साल से चल रहे युद्ध को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले महीने, ट्रंप ने दोनों दोनों देशों को शांति समझौता करने के लिए 50 दिन का समय दिया था। इस महलत के साथ ट्रंप ने चेतावनी भी दी थी कि अगर बातचीत सफल नहीं होती है तो रूस और उसके साथ व्यापार करने वाले देशों पर कई गुना टैरिफ लगाए जा सकते हैं।

हालाँकि ये तनाव तब और बढ़ गया जब मेदवेदेव ने ट्रंप के सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट के जवाब में एक बयान दे दिया। ट्रुथ सोशल पर किए गए पोस्ट के जवाब में पूर्व राष्ट्रपति ने अपने टेलीग्राम चैनल पर लिखा, “जहाँ तक भारत और रूस की ‘डेड इकोनॉमी’ और ‘खतरनाक क्षेत्र में दाखिल होने’ का सवाल है, तो ट्रंप को अपनी पसंदीदा ‘द वॉकिंग डेड’ जैसी फिल्में याद रखना चाहिए। उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि डेड हैंड कितना खतरनाक हो सकता है।”

इसके बाद से दोनों देशों के नेताओं के बीच वाकयुद्ध का दौर बढ़ता चला गया।

17 साल बाद फिर तैनात हुए परमाणु हथियार

गौरतलब है कि अमेरिका ने 2008 के बाद पहली बार ब्रिटेन में परमाणु हथियार तैनात किए हैं। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने यूरोप में सामरिक परमाणु हथियार तैनात किए थे ताकि सोवियत संघ के प्रभाव पर संतुलन बनाए रखा जा सके। तब ब्रिटेन का एयरबेस RAF Lakenheath अमेरिका के परमाणु मिशन का केंद्र था जहाँ पर B61 श्रृंखला के परमाणु बम रखे जाते थे।

शीत युद्ध (Cold War) एक वैचारिक, राजनीतिक और सामरिक तनाव की अवधि थी जो 1945 से 1991 यानी लगभग 46 वर्षों तक चली। इसमें अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख गुटों के रूप में आमने-सामने थे, लेकिन उन्होंने कभी भी आमने-सामने आकर युद्ध नहीं लड़ा।

2008 में रूस के साथ तनाव कम होने पर ओबामा सरकार ने ब्रिटेन से ये हथियार हटा लिए थे। बताते चलें कि B61-12 थर्मोन्यूक्लियर बम हैं। ये अधिक सटीक और आधुनिक हैं। ये F-35A जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों से छोड़े जा सकते हैं।

ट्रंप की पनडुब्बी तैनात करने की घोषणा के बाद से RAF Lakenheath में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। साथ ही ‘surety dormitory’ नामक परमाणु हथियारों के सुरक्षित भंडारण की सुविधा बनाई गई है।

ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि परमाणु पनडुब्बियाँ कहाँ तैनात की जा रही हैं। लेकिन उनका बयान यूक्रेन युद्ध को लेकर चल रही शांति कोशिशों के बीच एक गंभीर तनाव के तौर पर उभरा है।

‘ऑपरेशन महादेव’ में मारे गए लश्कर आतंकियों के पास से मिले पाकिस्तानी पहचान पत्र-हथियार-कम्युनिकेशन सेट, 3 साल पहले देश में घुसे: गृहमंत्री ने खुद लिया अपडेट, पहलगाम हमले में शामिल थे सुलेमान-हमजा-जिबरान

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के तीन पाकिस्तानी आतंकियों को सुरक्षा बलों ने शुक्रवार, 28 जुलाई 2025 को ‘ऑपरेशन महादेव’ के तहत मार गिराया।

मुठभेड़ के बाद मौके से मोबाइल फोन, दो लोरा कम्युनिकेशन सेट, पाकिस्तानी नादरा कार्ड की तस्वीरें, आधार कार्ड, गोप्रो हार्नेस, सोलर चार्जर, सूखा राशन और अन्य संदिग्ध सामान बरामद हुआ। ये सभी चीजें आतंकियों की गहरी साजिश और पाकिस्तान से सीधा संबंध होने के पक्के सबूत मानी जा रही हैं।

बताया गया है कि ये तीनों आतंकी तीन साल पहले भारत में घुसपैठ कर चुके थे और लंबे समय से बड़े हमले की योजना बना रहे थे। सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई ने न केवल आतंकियों का अंत किया, बल्कि क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करने की दिशा में एक बड़ी सफलता भी हासिल की।

जानकारी के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यह पक्का करना चाहते थे कि ऑपरेशन महादेव में मारे गए तीनों आतंकी वही हैं जो पहलगाम हमले में शामिल थे, इसी वजह से उन्होंने सोमवार रातभर जागकर ऑपरेशन की जानकारी लेते रहे।

वे चंडीगढ़ फॉरेंसिक साइंस लैब के वैज्ञानिकों से फोन और वीडियो कॉल के जरिए लगातार संपर्क में रहे, क्योंकि वहाँ पर ही ऑपरेशन महादेव के बाद बरामद हुई बंदूकों और गोलियों का मिलान किया जा रहा था।

दाचीगाम में पनाह के मिले सबूत

रिपोर्ट के अनुसार, तीनों आतंकवादी पहलगाम हत्याकांड के बाद श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित दाचीगाम के ऊपरी जंगलों में छिपे हुए थे। यह क्षेत्र दो दिशाओं से निकलने के रास्तों के चलते रणनीतिक रूप से अहम है।

एक अनंतनाग के पहलगाम से जुड़ता है और दूसरा गांदरबल जिले से। सुरक्षा बलों ने इनकी वायरलेस गतिविधियों को 22 मई से ट्रैक करना शुरू किया और 22 जुलाई को अंतिम लोकेशन पकड़कर ऑपरेशन शुरू कर दिया।

राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) अब बरामद हुए उपकरणों की तकनीकी जाँच कर रहा है ताकि पाकिस्तान से मिले सैन्य समर्थन और स्थानीय संपर्कों की जानकारी जुटाई जा सके।

तीन साल की साजिश, दो ग्रुप सक्रिय

मार गिराए गए आतंकियों में सुलेमान उर्फ फैजल जट्ट, हमजा अफगानी और जिबरान शामिल थे। ये तीनों 2021 में ही भारत में घुसपैठ कर चुके थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल ये दो समूहों में बँट गए थे।

सुलेमान ने एक ग्रुप की अगुवाई की, जबकि दूसरे ग्रुप की कमान मूसा नामक आतंकी के पास थी। सुलेमान गांदरबल जिले के गगनगीर में सात लोगों की हत्या में भी शामिल था। पहलगाम हमले के लिए इन आतंकियों ने कई महीनों तक जंगल में रहकर ट्रेनिंग ली और हर गतिविधि को सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया।

सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि इन आतंकियों के साथ जम्मू क्षेत्र में सक्रिय लश्कर के एक और ग्रुप का भी कनेक्शन हो सकता है, जो हाल के महीनों में कई हमले कर चुका है। मोबाइल और लोरा सेट से मिले डेटा के आधार पर और गिरफ्तारियाँ संभव हैं।

SSC परीक्षा में गड़बड़ी-पेपर लीक, दिल्ली के जंतर मंतर पर अभ्यर्थियों का प्रदर्शन: परीक्षा करवाने वाली कंपनी पहले भी हुई है Blacklist, फिर भी मिल गया टेंडर

देश में एक बार फिर स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) की परीक्षाओं में पेपर लीक होने के आरोप लगे हैं। इन आरोपों को लेकर अभ्यर्थियों ने गुरुवार (31 जुलाई, 2025) को दिल्ली में जोरदार प्रदर्शन किया। ये प्रदर्शन जंतर-मंतर और SSC मुख्यालय के आसपास आयोजित किया गया। छात्रों ने परीक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग उठाई है। इस प्रदर्शन में छात्रों पर पुलिस की ओर से लाठीचार्ज किया जिससे कई छात्र और शिक्षक घायल हुए।

प्रदर्शन का क्या है कारण

SSC की परीक्षा 24 जुलाई-1 अगस्त 2025 के बीच होनी थी इसमें कई पेपर्स लीक होने की बात सामने आई है जिसके बाद कुछ परीक्षा रद्द कर दी गई है। इसके बाद गुरुवार को जंतर‐मंतर से शुरू होकर SSC मुख्यालय के समक्ष सुबह से ही हजारों छात्र और कुछ शिक्षक जमा हुए। उनका आरोप था कि सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स में परीक्षा के पेपर्स पहले ही वायरल हो गए थे।

प्रदर्शन की शुरुआत दोपहर के समय हुई, जब छात्र मुख्य गेट पर धरना देने लगे और पुलिस ने सुरक्षाबंधन कर मार्ग बंद कर दिया। शाम होते-होते जंतर‐मंतर मुख्य धरना स्थल बन गया, जहाँ NSUI और अन्य छात्र संगठन भी पहुँचकर समर्थन में बड़ी संख्या में शामिल हुए।

करीब छह बजे प्रदर्शनकारियों ने DoPT (Department of Personnel and Training) को याचिका सौंपने की कोशिश की, तब अचानक दिल्ली पुलिस ने उन्हें हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। इस कार्रवाई में दस से पंद्रह अभ्यर्थी, दो-तीन शिक्षक और कुछ प्रदर्शनकारी समर्थक घायल हो गए। इन्हें प्राथमिक उपचार के लिए पास के अस्पताल ले जाया गया।

अभ्यर्थियों ने पुलिस की इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। उनका कहना है कि वे सिर्फ अपनी माँगों को लिखित रूप में DoPT अधिकारियों को सौंपना चाहते थे। लेकिन पुलिस ने किसी समझौते की गुंजाइश नहीं छोड़ी और बल प्रयोग किया।

इस मामले में पुलिस का तर्क था कि कुछ छात्र बैरिकेड तोड़ने का प्रयास कर रहे थे, जिसके कारण सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख माँगों में पेपर लीक की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा की तिथि घोषित करना शामिल था। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा स्थल और वेंडर की जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जाँच आयोग बनाया जाए और पुलिस लाठीचार्ज के लिए मुआवजा व माफी दी जाए। इन माँगों को लेकर अभ्यर्थी और शिक्षक एकजुट दिखे।

परीक्षा में केंद्रों और टेंडर की क्या है भूमिका

SCC की Phase-13 परीक्षा के दौरान पेपर लीक और बार-बार सर्वर डाउन होने की शिकायतें सामने आईं। छात्रों ने ऑनलाइन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। पिछली बार की परीक्षा TCS iON ने करवाई थी। TCS के पास परीक्षा करवाने का टेंडर 2018 से था। हालाँकि उस पर परीक्षा संचालन में तकनीकी गड़बड़ियों और सुरक्षा मामलों में लापरवाही का आरोप लगा।

इसके बाद SSC ने नई कंपनियों से ई-प्रोकेयोरमेंट के माध्यम से नया टेंडर निकालने की प्रक्रिया अपनाई। नए टेंडर में एडुक्विटी कैरियर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को SSC की फेज-13 की परीक्षा की जिम्मेदारी दी गई।

हालाँकि नए टेंडर के बाद भी परीक्षा परीक्षा केंद्रों पर सिस्टम क्रैश, माउस खराब, और सर्वर डाउन जैसी समस्याएँ आईं। कई छात्रों को दूर-दराज के या गलत केंद्र दिए गए, जिससे उन्हें यात्रा और आवास पर खर्च करना पड़ा। प्रदर्शन में छात्रों ने आरोप लगाया कि SSC का यह नया परीक्षा वेंडर भी निष्पक्ष और सुचारू परीक्षा अनुभव देने में असफल रहा।

छात्रों को परीक्षा में क्या परेशानियाँ हुईं?

इंदौर समेत कई परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा के दौरान सर्वर अचानक क्रैश हो गया। छात्र परीक्षा दे रहे थे तभी कंप्यूटर सिस्टम बंद हो गए और 10–15 मिनट तक कोई समाधान नहीं मिला। कई छात्रों ने शिकायत की कि परीक्षा के दौरान माउस काम नहीं कर रहा था या स्क्रीन फ्रीज हो रही थी।

SSC ने 24–26 जुलाई 2025 की Phase-13 परीक्षा को तकनीकी खामियों के कारण कई केंद्रों पर रद्द कर दिया। हालाँकि छात्रों को इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। परीक्षा केंद्र पर पहुँचकर उन्हें पता चला कि परीक्षा नहीं होगी।

छात्रों का आरोप है कि जब उन्होंने केंद्रों पर शिकायत की तो उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। छात्रों ने ये आरोप भी लगाए कि शिकायत करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ।

पहले भी विवादों में रही परीक्षा कराने वाली कंपनी

एडुक्विटी पहले भी MP पटवारी परीक्षा, शिक्षक पात्रता परीक्षा और महाराष्ट्र CET जैसी परीक्षाएँ आयोजित करवा चुकी है। इनमें भी पेपर लीक और तकनीकी गड़बड़ियों के आरोप लगे थे।इस कंपनी को 2020 में डायरेक्ट्रेट जनरल ऑफ ट्रेनिंग (DGT) ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था। हालाँकि बाद में इसे फिर से सरकारी परीक्षाओं के लिए अनुबंध दिए जाने लगे।

इस पूरे मामले पर पर SSC या DoPT की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालाँकि गृह मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि सभी आरोपों की निष्पक्ष जाँच होगी। फिलहाल प्रदर्शन जारी है और अदालत से राहत की उम्मीद जताई जा रही है।

TCS पर क्यों लगा आरोप

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक परीक्षा केंद्र के प्रभारी ने शिकायत दर्ज की है जिसमें उसने आरोप लगाया कि TCS के अधिकारियों ने परीक्षा के दिन जानबूझकर परेशानियाँ खड़ी करवाईं। आरोप में कुछ केंद्रों को देर से खोलने के निर्देश देने, छात्रों को देरी से प्रवेश देने या प्रवेश से रोकने की कोशिश समेत अन्य अव्यवस्था फैलाने के आरोप लगे।

हालाँकि बाद में उसने शिकायत को वापस ले लिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र के प्रशासक ने एसएससी को एक आधिकारिक माफी जारी की है। इसमें स्वीकार किया गया है कि आरोप ठोस सबूत या उचित कार्रवाई के बिना लगाए गए थे।

TCS ने भी इन सभी आरोप को निराधार बताया। कंपनी का कहना है कि SSC परीक्षा में उनकी कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि उनका पुराना अनुबंध समाप्त हो चुका है और वे अब परीक्षा संचालन में शामिल नहीं हैं। TCS पर आरोप लगने के बाद केंद्र सरकार ने SSC परीक्षाओं को अपने नियंत्रण में ले लिया है। साथ ही TCS की भूमिका पर भी जाँच शुरू की गई है।

SSC परीक्षाओं समेत हाल के वर्षों में हुई तमाम परीक्षाओं में गड़बड़ियों को बाद ये सवाल उठता है कि क्या सार्वजनिक सेवाओं में निजी कंपनियों की भूमिका पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए? इसके अलावा टेंडर प्रक्रिया में क्या सिर्फ लागत को प्राथमिकता देना सही है? इन सब के साथ परीक्षा पारदर्शी और निर्बाध बनाना सबसे जरूरी कदम होना चाहिए।