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UP में 130 अवैध मस्जिद-मदरसों पर चला CM योगी का बुलडोजर, 198 सील: नेपाल से सटे 7 जिलों में 60 दिन में हुई कार्रवाई, जाँच में निकला- खाड़ी देशों से मिल रही थी करोड़ों की फंडिंग

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नेपाल सीमा से सटे सात जिलों में अवैध मजहबी ढाँचों के खिलाफ अभियान चलाया है। बीते 60 दिनों में सरकार ने श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी जैसे जिलों में 298 अवैध मस्जिद, मदरसे, मजार और ईदगाह चिन्हित किए।

इनमें से 223 को नोटिस जारी किए गए, 198 को सील करते हुए 130 ढाँचों को पूरी तरह समतल कर दिया गया। ये कार्रवाई सिर्फ अवैध कब्जों के खिलाफ नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग, धर्मांतरण और डेमोग्राफिक बदलाव की आशंकाओं के चलते की जा रही है।

इन इलाकों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से बढ़ती जा रही है, संदिग्ध फंडिंग और जनसंख्या संतुलन में बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन चुका है।

जिलेवार कार्रवाई और आँकड़े: कौन सा जिला सबसे आगे?

योगी सरकार की सबसे सख्त कार्रवाई श्रावस्ती जिले में हुई जहाँ 149 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए, जिनमें से 140 को सील किया गया और 37 को गिराया गया। इसके बाद महराजगंज में 45 अवैध निर्माण पाए गए, जिनमें से 24 सील और 31 ध्वस्त किए गए।

बलरामपुर में 41 निर्माण चिन्हित हुए, जिनमें 19 को सील और 21 को ढहाया गया। सिद्धार्थनगर में 23 अवैध निर्माणों में से 21 को ध्वस्त किया गया, वहीं बहराइच में 25 चिन्हित में से 15 को गिरा दिया गया। लखीमपुर खीरी में 13 अवैध निर्माण का पता चला, जिनमें 10 को सील किया गया और 3 गिराए गए।

पीलीभीत में 2 अवैध निर्माण चिन्हित हुए और दोनों पर सीधा बुलडोजर चला। इन सात जिलों की कुल 570 किलोमीटर लंबी सीमा नेपाल से जुड़ी है, जो संवेदनशील मानी जाती है। इस कार्रवाई से पहले सभी ढाँचों को नोटिस देकर कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी।

विदेशी फंडिंग, डेमोग्राफिक बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा

आयकर विभाग और गृह मंत्रालय की रिपोर्टों ने खुलासा किया है कि नेपाल सीमा से सटे इलाकों में मजहबी ढाँचों के निर्माण के लिए दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु) और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हुई है।

यह फंडिंग नकद और UPI जैसे डिजिटल माध्यमों से की गई, जिसमें एक मामले में एक व्यक्ति के खाते में 12 करोड़ रुपए पाए गए। रिपोर्टों में लगभग 150 करोड़ रुपए की संदिग्ध फंडिंग का पता चला है, जिसका इस्तेमाल मस्जिदों, मदरसों और मजारों के निर्माण व धर्मांतरण में किया गया।

इसके साथ ही सीमा के आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी में तेजी से बढ़ोतरी और हिंदू आबादी में गिरावट देखी गई है। SSB की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2021 के बीच मस्जिदों की संख्या 738 से बढ़कर 1000 और मदरसों की संख्या 500 से बढ़कर 645 हो गई।

नेपाल की ओर भी इसी तरह मुस्लिम आबादी 20 साल में दोगुनी हो चुकी है। उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़, चम्पावत और ऊधमसिंह नगर भी अब इस खतरे से अछूते नहीं हैं। इन सारी गतिविधियों को देखते हुए यह आशंका गहराई है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बसाने की कोशिश की जा रही है, जो बांग्लादेश से शुरू होकर पाकिस्तान तक फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकती है।

अमेरिका चाहे न करे बात, चीन-भारतीय साथ-साथ… टैरिफ विवाद के बीच चीनी मीडिया के बदले सुर: ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- PM मोदी का करते हैं स्वागत, अगर दोनों देशों के रिश्ते सुधरे तो दुनिया देखेगी

भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहा विवाद अभी थमा नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप अपनी खीझ निकालने के लिए मीडिया में कह रहे हैं कि वो भारत पर लगाए गए टैरिफ के बारे में अभी बात नहीं करेंगे। वहीं दूसरी तरफ चीन है जो इस समय सामने से भारत के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है। चीन के प्रमुख मीडिया संस्थान ग्लोबल टाइम्स ने इसे लेकर ट्वीट भी किया है।

अपने ट्वीट में ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने हिंदू कहावत का जिक्र करते हुए हिंदी-चीनी को भाई-भाई बताया। ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक्स पर पोस्ट किया- “जैसा कि हिंदू कहावत है कि अगर आप अपने बंधु की सहायता करेंगे तो आपकी मदद अपने आप हो जाएगी… एक अच्छे भारतीय-चीन संबंध क्षेत्र में और विश्व में सकारात्मक प्रभाव लाएँगे।”

आगे पोस्ट में ये भी लिखा है- “हम शुभेच्छा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में स्वागत करते हैं ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो और एक नया अध्याय शुरू हो जहाँ भारतीय और चीनी भाई-भाई बनकर साथ-साथ रहें।”

इस पोस्ट के साथ ग्लोबल टाइम्स ने एक संपादकीय शेयर किया है। जिसका शीर्षक है- आखिर क्यों पीएम मोदी की चीन आने की खबर ने खींचा वैश्विक ध्यान? इस आर्टिकल में भारत और चीन की प्राचीन सभ्यता, बढ़ती जनसंख्या, उभरती अर्थव्यवस्था की बात है। साथ ही इसमें ये भी कहा गया है कि दोनों ही देश इस समय उस पड़ाव पर हैं कि वे वैश्विक ध्यान अपनी ओर खींच सकते हैं।

संपादकीय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर के चीन दौरे की चर्चा है। साथ ही ये भी लिखा है कि अगर मोदी इस बार चीन आते हैं तो चीन-भारत के सकारात्मक संबंधों को धार मिलेगी।

दिलचस्प बात ये है कि चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स जो पिछले कुछ सालों से लगातार सिर्फ भारत विरोधी बात करने के लिए कुख्यात रहा, उसने अपने इस आर्टिकल में पश्चिमी मीडिया को भी घेरा है जो टैरिफ विरोध को अमेरिका के विरुद्ध दिखा रहे हैं। लेख में कहा गया है कि चीन और भारत के बीच सुधरते हालात अमेरिका अपनी ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के तहत भारत को चीन के विरुद्ध करना चाहता है।

किसानों के हित से नहीं करेंगे समझौता- पीएम मोदी

बता दें कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार डील को लेकर हो रहे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को साफ बताया है कि वो अपने देश के किसानों के हित विरुद्ध नहीं जाएँगे। उनके लिए देश के किसानों का हित ही सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी कीमत पर भारत अपने देश के किसानों, मछुआरों और डेयर कृषकों के साथ समझौता नहीं करेगा।

पीएम मोदी ने यह भी कहा है कि वो अच्छे से जानते हैं कि इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन वो इसके लिए तैयार हैं और कोई भी दबाव पड़ने पर पीछे नहीं हटेंगे।

जब तक नहीं सुलझेगा मामला नहीं होगी बात- डोनाल्ड ट्रंप

वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओवल ऑफिस में पीसी के दौरान सवाल पूछे जाने पर कहा है कि वो अभी नए सिरे से बिलकुल बात नहीं करेंगे। कम से कम तब तक तो नहीं जब तक वो इस मामले को नहीं सुलझा लेते।

जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने चीन पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। वहीं पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जो 7 अगस्त से लागू हो गया। बाद में घोषणा की 25% अतिरिक्त टैक्स लगेगा जिसके बाद ये टोटल 50% हो गया।

ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, भारत रूस से तेल की खरीद करता है और ट्रंप के दिमाग में ये है कि इसी कमाई को रूस, यूक्रेन के विरुद्ध हथियार खरीदने में लगाता है।

आज सत्ता में आने पर चुनाव आयोग को देख लेने की धमकी दे रहे हैं राहुल गाँधी, कभी केरल में फेक वोटर कार्ड के साथ पकड़े गए थे यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त) को चुनाव आयोग पर वोटर फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें राहुल गाँधी ने सबूतों के नाम पर सिर्फ एक लोकसभा सीट के एक क्षेत्र का डेटा दिखाकर खानापूर्ति करने की कोशिश की और चुनाव आयोग के अधिकारियों को परिणाम भुगतने की धमकी दी। राहुल गाँधी फर्जी वोटरों के जैसे आरोपों के जरिए चुनाव आयोग को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही एक मामले में 2023 में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को फर्जी वोटर कार्ड के साथ गिरफ्तार किया गया था।

EC के अधिकारियों को धमकाते हुए क्या बोले राहुल गाँधी?

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कई ऐसे दावे किए जिनका तथ्यों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। हालाँकि, चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने अधिकारियों को धमकाते हुए कहा कि आयोग को अब उन्हें और देश के लोगों को जानकारी देनी ही होगी।

राहुल ने आगे कहा, “अगर वे जानकारी नहीं देते हैं तो उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इसमें शामिल हर पोलिंग अधिकारी को परिणाम भुगतने होंगे, चाहे वो सीनियर हो या जूनियर। एक दिन विपक्ष सत्ता में आएगा और तब आप देखेंगे कि हम क्या करेंगे।”

जब फर्जी वोटर आईडी के साथ गिरफ्तार हुए यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के केंद्र में फर्जी वोटरों से जुड़ा मुद्दा ही रहा। हालाँकि, जैसे फर्जी वोटरों के मामले में राहुल गाँधी चुनाव आयोग को अब घेरना चाहते हैं, वैसे ही एक मामले में उनकी पार्टी की युवा इकाई यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।

नवंबर 2023 में केरल में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता विक्रम, फैनी और बिनिल बीनू को पुलिस ने गिरफ्तार किया गया था। इन तीनों ने यूथ कॉन्ग्रेस के संगठन के चुनावों में मोबाइल ऐप की मदद से फर्जी वोटर आईडी कार्ड बनाए थे। यह ऐप यूथ कॉन्ग्रेस के नेता जैसन द्वारा बनाई गई थी और उसने भी पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था।

इन संगठन चुनावों में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता राहुल ममकोटातिल को राज्य इकाई का अध्यक्ष चुना गया था। बाद में पुलिस ने उससे भी पूछताछ की थी। पुलिस ने यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं के कब्जे से लैपटॉप, मोबाइल फोन और चुनाव के फर्जी आईडी कार्ड जब्त किए थे। चुनाव आयोग के एक अधिकारी की शिकायत पर यह केस दर्ज किया गया था।

पुलिस ने रेड के दौरान तब 24 फर्जी आईडी कार्ड बरामद किए थे जिनमें तमिल ऐक्टर अजित का फर्जी वोटर आईडी कार्ड भी शामिल थी। बीजेपी ने तब आरोप लगाया था कि इस मामले की जानकारी केसी वेणुगोपाल जैसे बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं को भी थी।

खंडहर को मदरसा बता डकारी लाखों की स्कॉलरशिप, मुस्लिम छात्रों के नाम पर 27 मदरसे-स्कूल मिले संदिग्ध: इंदौर में रफीक, शबनम, शहनाज समेत 5 घोटालेबाजों पर FIR

मध्य प्रदेश के इंदौर में मुस्लिम छात्रों के नाम से मिलने वाली छात्रवृत्ति में बड़ा घोटाला सामने आया है। इस मामले में 27 मदरसों और स्कूलों को घोटाले के लिए संदिग्ध माना गया है और 5 के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। क्राइम ब्रांच की जाँच में सामने आया है कि मदरसों और स्कूलों के संचालक खंडहर और खाली मैदान को ही शिक्षण संस्थान बताकर लाखों रुपए की छात्रवृत्ति ले रहे थे।

नई दुनिया की खबर के मुताबिक, क्राइम ब्रांच ने फर्जीवाड़ा करने वाले संचालकों की तलाश शुरू कर दी है और सरकार को इस मामले की रिपोर्ट भेजी जा रही है। दरअसल, क्राइम ब्रांच ने पिछड़ा वर्ग एवँ अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सहायक संचालक अनिल कुमार सोनी की शिकायत पर 17 जून 2025 को केस दर्ज किया था और इस मामले की जाँच कर रही थी।

रिपोर्ट में डीसीपी(क्राइम) राजेश कुमार त्रिपाठी के हवाले से बताया गया है कि पुलिस ने जब एक आरोपित आफताब खान के ठिकाने पर दबिश दी पर वह मोबाइल बंद कर फरार हो गया। आफताब का सेंट जेवियर कॉन्वेंट नाम से सब्जी मंडी खजराना में स्कूल था और उसने 7 लाख से ज्यादा की स्कॉलरशिप ली थी। हालाँकि, जब इस स्कूल की जाँच करने टीम पहुँची तो उस जगह पर कुछ नहीं मिला।

शिकायत के बाद निरीक्षक माधवसिंह भदौरिया ने जाँच की और केयर वेल स्कूल के संचालक मोहम्मद रफीक खान, मदरसा साफिया की संचालिक शबनम शाह, मदरसा उस्मानिया की संचालिका शहनाज खानम, सेंट जेवियर कान्वेंट के संचालक आफताब खान और जेआर डीआरडी मेमोरियल स्कूल के संचालक आफताब के खिलाफ केस दर्ज किया है।

माधवसिंह भदौरिया ने इस मामले को लेकर बताया कि 9वीं और 10वीं के लिए अपात्र विद्यार्थियों का सबसे पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन किया गया फिर संस्थाओं ने अपने लॉग-इन का इस्तेमाल कर अपात्र छात्रों का रजिस्ट्रेशन आगे भी बढ़ा दिया था। इस जाँच में कुल 27 शिक्षण संस्थानों को संदिग्ध बताया गया है। इस फर्जीवाड़े की जाँच की जा रही है और दोषी पाए जाने पर इन संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

OpIndia एक्सक्लूसिव: ‘न्याय’ के लिए दिल्ली पुलिस की चौखट पर पहुँची रोहिणी, कहा- जो (चंद्रशेखर) दलित हितैषी बन रहा, उसने ही दलित बेटी का किया शोषण

उसकी नजर में बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं है। मुझसे झूठ बोल कर उसने संबंध बनाए। मैं उसका बैकअप प्लान थी।

यह बात डॉ रोहिणी घावरी ने ऑपइंडिया से विशेष बातचीत में कही हैं। वह स्विटरलैंड लौटने के बाद नगीना से लोकसभा के सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के खिलाफ शिकायत करने दिल्ली पुलिस के पास पहुँची।

दिल्ली पुलिस ने उनका बयान दर्ज कर लिया है। उल्लेखनीय है कि रोहिणी घावरी वही महिला हैं, जिन्होंने चंद्रशेखर पर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें धमकियाँ भी मिली हैं।

चंद्रशेखर ने मेरा इस्तेमाल किया- डॉ. रोहिणी घावरी

डॉ. रोहिणी घावरी ने कहा, “चंद्रशेखर ने अपने स्वार्थ के लिए मेरा इस्तेमाल किया। मैं उसके लिए बैकअप प्लान थी। अगर भारत की राजनीति में नहीं चमक पाया तो मुझसे शादी कर स्विट्जरलैंड में सेटल हो सकता है। लेकिन वह पहले से शादीशुदा है, इस बात की मुझे जानकारी नहीं थी। अगर पता होता तो कभी इस रिश्ते में नहीं आती। मैं अब इस पूरे ‘जाल’ को समझ चुकी हूँ।”

घावरी कहती हैं, “दलितों का मसीहा बनता है। मैंने जिंदगी में ऐसा कोई मसीहा नहीं देखा जो महिलाओं का सम्मान ही नहीं कर पाया। जिस पर महिला उत्पीड़न के केस है, वह महिला सम्मान कैसे कर सकता है? नेता वो होता है जो समाज को सही दिशा दिखाए, जो नेता खुद महिला उत्पीड़न करता है, वह क्या दिशा दिखाएगा”

वह आगे कहती हैं, “उसने कभी त्याग और संघर्ष तक नहीं किया। अगर जेल नहीं जाता तो समाज को संघर्ष की कोई कहानी भी नहीं सुना पाता। उसने समाज को न्याय नहीं दिलाया बल्कि युवाओं का भविष्य बर्बाद करने का काम किया है।”

उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखर आजाद नेता बनने के लायक नहीं है। भारत में दलित समाज की आबादी कही अधिक है। ऐसे समाज को दिशा दिखाने के लिए एक ईमानदार नेता की जरूरत है, जो खून बहाने को भी तैयार हो जाए। घावरी कहतीं हैं, “मैं दलित समाज के मासूम लोगों को समझाऊँगी कि आप चंद्रशेखर जैसे नेता पर भरोसा ना करें, क्योंकि ऐसे नेता आपको बचाने नहीं आएँगे।”

बेटी को न्याय दिलाने के लिए डॉ. घावरी के साथ आए उनके माता-पिता ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “चंद्रशेखर आजाद ने मेरी बेटी का मानसिक और शारीरिक शोषण किया है। आज मैं अपनी बेटी को न्याय दिलाने मध्य प्रदेश से आई हूँ। मेरी बेटी को न्याय जरूर मिलना चाहिए।”

वहीं, पीड़िता के पिता, जो खुद दलितों के हक की लड़ाई लड़ते हैं और सक्रिय समाजसेवी हैं। उन्होंने कहा, “बेटी ने हमें 8 महीने तक उस पर पीड़ा के बारे में नहीं बताया। हमें भी एक्स के जरिए मामले की जानकारी लगी। वह बताया करती थी कि चंद्रशेखर के साथ मिल कर भीम आर्मी के लोगों की मदद कर रही हूँ।”

पिता ने यह भी कहा, “चंद्रशेखर ने बेटी से शादी करने का झूठा वादा कर मानसिक शोषण किया। जो दलित का हितैषी बन रहा था, उसने ही दलित बेटी का शोषण कर दिया।”

उधर, डॉ. रोहिणी घावरी के साथ शारीरिक शोषण मामले में उनकी वकील ने कहा कि यह मामला हाइप्रोफाइल जरूर है, लेकिन चंद्रशेखर को सांसद न देखते हुए एक आम इंसान के खिलाफ अपराध के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “केस को राजनीतिक एंगल नहीं दिया गया। पूरा विश्वास है कि दिल्ली पुलिस उचित कार्रवाई करेगी। कानूनी प्रक्रिया के तहत ही न्याय दिलाएँगे।”

जानें डॉ. रोहिणी घावरी का पूरा मामला

यह मामला भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ शारीरिक शोषण का है। स्विट्जरलैंड में रहने वाली दलित समाज की Ph.D स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी ने महिला आयोग से चंद्रशेखर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता इंदौर के बीमा अस्पताल में काम करने वाले सफाईकर्मी की बेटी है।

पीड़िता ने शिकायत में बताया था कि साल 2019 में वह एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप लेकर हायर एजुकेशन की पढ़ाई करने स्विट्जरलैंड गई थी। तभी चंद्रशेखर से डॉ. रोहिणी की मुलाकात हुई थी। साल 2021 में दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और चंद्रशेखर ने डॉ. रोहिणी को शादी करने का भरोसा दिलाकर शारीरिक संबंध बनाए।

डॉ. रोहिणी ने बताया कि भारत आने पर चंद्रशेखर ने कई बार उन्हें होटल और द्वारिका स्थित निवास पर बुला कर शारीरिक संबंध बनाए। चंद्रशेखर के साथ वह राजनीतिक अभियानों में भी हिस्सा लेती थीं। चंद्रशेखर ने खुद को अविवाहित बताकर पीड़िता को शादी का वादा भी किया। लेकिन बाद में सामने आया कि वह पहले से शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता भी है।

इस संबंध में डॉ. रोहिणी ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स/ट्वविटर पर एक पोस्ट भी जारी किया था। पोस्ट में लिखा, “उसके लिए बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं… भरोसे में आकर बहुत बड़ी गलती कर दी। अब किसी भी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी।” उन्होंने खुद को विक्टिम नंबर-3 बताया था। अब चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए डॉ. रोहिणी स्विट्जरलैंड से भारत आई हैं।

बार-बार फर्जी रेप केस दर्ज कराने वालों का बने डेटाबेस, ऐसे मामलों की हो जाँच: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए सख्ती बरतने के निर्देश, कहा – लोग कानून का गलत फायदा उठा रहे

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और राज्य सरकार से कहा कि जो लोग बार-बार रेप की झूठी शिकायत करते हैं, उनकी जाँच की जाए। हालाँकि, कोर्ट ने खुद इस मामले में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये काम पुलिस और सरकार का है और उन्हें पता है कि इसे कैसे करना है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जज तुषार राव गेडेला ने साफ-साफ कहा, “ये याचिका है या कोई सुझाव? ये उनका काम है। पुलिस को बेहतर पता है कि पुलिसिंग कैसे करनी है।”

यानी कोर्ट ने याचिका पर कोई फैसला नहीं दिया, बल्कि साफ किया कि ये काम पुलिस और सरकार का है, कोर्ट का नहीं।

याचिका में क्या था?

ये जनहित याचिका शोनी कपूर नाम की एक महिला ने दायर की थी। उनके वकील थे शशि रंजन कुमार सिंह। याचिका में माँग थी कि पुलिस हर जिले में एक डेटाबेस बनाए, जिसमें उन लोगों की जानकारी हो जो बार-बार रेप या ऐसे ही अपराधों की शिकायत करते हैं।

याचिका में ये भी कहा गया कि ऐसी शिकायतों के लिए शिकायतकर्ता से पहचान पत्र जरूर लिया जाए। साथ ही ये आरोप लगाया गया कि कई बार रेप के कानून का गलत इस्तेमाल होता है और कोर्ट को भी इस बात की चिंता रही है।

हाई कोर्ट में आगे क्या हुआ

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 3 मार्च को दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दूसरे अधिकारियों को एक शिकायत पत्र भेजा था। 17 अप्रैल को RTI से जवाब मिला कि ये मामला बड़े अधिकारियों के पास विचार के लिए है।

इस पर कोर्ट ने कहा, “चूँकि याचिकाकर्ता ने पहले ही अधिकारियों को शिकायत दे दी है, तो हम इस याचिका को खत्म करते हैं। लेकिन हम आदेश देते हैं कि अधिकारी जल्दी से इस शिकायत पर ठोस फैसला लें।”

फर्जी मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

आजकल कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ कुछ महिलाएँ पुरुषों पर झूठे रेप के इल्जाम लगा देती हैं। जब जाँच होती है, तो पता चलता है कि सारे इल्जाम बेबुनियाद हैं।

आज के समय में जब महिलाएँ अपने हक के लिए खुलकर बोल रही हैं और रेप जैसे गंभीर मामलों पर आवाज उठा रही हैं, तब कुछ लोग इन कानूनों का गलत फायदा उठाते हैं। इससे असली पीड़ितों की लड़ाई कमजोर पड़ती है।

ऐसा ही एक मामला, 64 साल के रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर कैप्टन राकेश वालिया के साथ ऐसा ही हुआ। एक 39 साल की शादीशुदा महिला, जिसके दो बच्चे हैं… ने उनके खिलाफ रेप का केस दर्ज कराया। उसने कहा कि उसकी मुलाकात वालिया से फेसबुक पर हुई थी। वालिया ने उसे मॉडलिंग के बहाने बुलाया, नशीला पदार्थ देकर सुनसान जगह ले गए और रेप किया।

केस दर्ज हुआ, लेकिन जाँच में चौंकाने वाली बात सामने आई। इस महिला ने 2014 से अब तक 9 अलग-अलग पुरुषों के खिलाफ रेप, छेड़छाड़ और धमकी जैसे लगभग एक जैसे इल्ज़ाम लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि महिला ने हर बार FIR में अपना नाम, उपनाम और दूसरी जानकारी बदल-बदलकर दी, ताकि वो नया व्यक्ति लगे।

इसके अलावा, FIR दर्ज कराने के बाद उसने जाँच में कोई मदद नहीं की और कोर्ट में भी नहीं आई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘कानून का गलत इस्तेमाल’ बताया और सवाल किया कि जब इतने फर्जी मामले पहले से दर्ज थे, तो निचली कोर्ट ने पहले क्यों नहीं कुछ किया।

कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ एक महिला की बात पर किसी बेगुनाह को सजा नहीं दी जा सकती, खासकर जब सारे सबूत उसकी बेगुनाही की तरफ इशारा कर रहे हों।

एक और फर्जी केस का उदाहरण

एक महिला ने अपनी 5 साल की बेटी के साथ रेप का झूठा इल्ज़ाम कुछ लोगों पर लगाया। ये केस पोक्सो एक्ट की धारा 5 (गंभीर यौन अपराध) के तहत दर्ज हुआ। अतिरिक्त सत्र जज सुशील बाला डागर ने जाँच में पाया कि महिला ने गुस्से और प्रॉपर्टी के झगड़े की वजह से ये झूठा केस किया था। उसका मकसद प्रॉपर्टी हड़पना था। कोर्ट ने इसे कानून और न्याय व्यवस्था का गलत इस्तेमाल बताया।

कोर्ट ने कहा कि कई लोग जमीन, शादी, राजनीति या निजी फायदे के लिए पोक्सो जैसे सख्त कानूनों का गलत इस्तेमाल करते हैं। इससे कानून का असली मकसद कमजोर होता है। इसलिए कोर्ट को ऐसे मामलों में सख्त और सावधान रहना चाहिए।

पोक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत कोर्ट ने महिला पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और एक महीने में इसे भरने को कहा। अगर जुर्माना नहीं भरा, तो उसे 3 महीने की जेल होगी। कोर्ट ने साफ कहा कि महिला ने कानून को गुमराह किया और इसका गलत इस्तेमाल किया, जो गंभीर अपराध है।

जिसे राहुल गाँधी बता रहे थे ‘एटम बम’, उसका ‘SIR’ ही उपचार… महाराष्ट्र की तरह ही कर्नाटक पर भी हुए फुस्स: चुनाव आयोग को ‘चोर’ दिखाने चले थे, खुद ‘पप्पू’ दिखे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि उनके पास चुनाव आयोग के खिलाफ सबूतों का ‘एटम बम’ है। इसी कथित बम को चलाने के लिए राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को एक घंटा 11 मिनट लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन यह एटम बम उनके पहले कई दावों की तरह फुस ही निकला।

हार की हताशा में डूबे राहुल गाँधी लगातार देश के चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं लेकिन तथ्यों और सबूतों से अक्सर दूर ही भागते नज़र आते हैं और इस बार भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने कई पुराने आरोप दोहराए और कई मनगढ़ंत दावे भी किए। लेकिन अपने कथित सबूतों के अंत तक आते-आते राहुल गाँधी खुद ही सवालों के घेरे में आ गए हैं।

राहुल के मनगढ़ंत दावों की असलियत

बीजेपी को एंटी इनकंबेसी नहीं लगती: राहुल गाँधी

देश के चुनाव आयोग को पानी पी-पीकर कोसने वाले राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेस का पहला आरोपी एंटी इनकंबेसी को लेकर था। उन्होंने कहा कि बीजेपी को ऐंटी इनकंबेसी नहीं लगती है। यानी अगर देश के मतदाता बीजेपी को चुन रहे हैं तो इसमें गलती ना तो कॉन्ग्रेस के कर्मों की है, ना राहुल गाँधी की मेहनत में कमी है। बल्कि चुनाव आयोग ही सबसे बड़ी गड़बड़ी कर रहा है। वोट चोरी के गंभीर आरोपों के बीच इस तरह की हल्की बात करना राहुल गाँधी की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।

UPA के 10 वर्षों के दौरान गुजरात के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने वापसी की थी, मध्य प्रदेश में भी इस दौर में लगातार बीजेपी जीतती रही। तो क्या तब भी एंटी इनकंबेसी ना होने का जिम्मेदार चुनाव आयोग था?

एग्जिट पोल्स पर राहुल गाँधी का दावा

राहुल गाँधी ने अपने दावे के दौरान कहा कि ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स का डेटा अलग-अलग रहता था। एक पूरी विस्तृत करोड़ों वोटरों वाली चुनावी प्रक्रिया को ओपिनियन या एग्जिट पोल्स के आधार पर गलत ठहरा देना एक हास्यास्पद तर्क से ज्यादा क्या ही हो सकता है?

एग्जिट पोल्स पीछे 10 वर्षों से तो शुरू हुए नहीं है। माना जाता है कि 80 के दशक में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और सर्वे के आधार पर हार-जीत का अनुमान लगाया जाता रहा है। लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो 2004, 2009 में अधिकतर एग्जिट पोल्स सही साबित नहीं हुए।

साल 2014 के एग्जिट पोल्स में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा शायद एक भी बड़े एग्जिट पोल ने नहीं किया था और 2024 के एग्जिट पोल्स में जितनी सीटें एनडीए को मिलने का दावा किया गया था वो भी गलत ही साबित हुआ। तो क्या ये सभी चुनावों को गलत ठहरा दिया जाए?

अलग-अलग चरणों में चुनाव पर भी सवाल

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेस के दौरान कहा कि कागज से वोट एक दिन में पड़ते थे लेकिन ईवीएम से महीनों लग जाते हैं। चुनाव के शेड्यूल को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था, हजारों-लाखों ईवीएम को लाना ले जाना, हजारों जवानों का चुनाव की सुरक्षा के लिए पहुँचना, यकीनी तौर पर यह एक दिन में करना मौजूदा परिस्थितियों में लगभग नामुमकिन है। राहुल का दावे को लेकर भी कई सवाल हैं। देश के पहले आम चुनाव से ही बात करें तो पहले आम चुनाव दिसंबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए थे। जाहिर है ये एक दिन में नहीं हो गए।

अलग-अलग चरणों में चुनाव से बीजेपी को फायदा होता है तो ऐसा 2004 के आम चुनावों में भी होना चाहिए था तब भी आम चुनाव 4 चरणों में हुए थे। अगर चुनाव के चरणों के आधार पर ही कोई पार्टी हारती है तो कॉन्ग्रेस को 2009 का लोकसभा चुनाव हार जाना चाहिए था क्योंकि तब भी चुनाव 5 चरणों में हुए थे।

किसी भी पार्टी का इस आधार पर चुनाव हारना या जीतना कि कितने चरणों में चुनाव हो रहे हैं ये बेतुका तर्क ही लगता है। अलग-अलग चरणों में चुनाव कराए जाने की वजह लॉजिस्टिक की जरूरतें, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को उपलब्धता के आधार पर तय होती आई है ना कि किसी पार्टी की हार और जीत के लिए।

‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं पर सवाल

राहुल गाँधी ने कहा, “चुनाव जीतने पर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि लाडली बहना, पुलवामा, सिंदूर के कारण चुनाव जीते।” लाडली बहना जैसी योजनाओं को राहुल गाँधी सिर्फ नैरेटिव का हिस्सा बताकर खारिज कर देना चाहते हैं लेकिन तथ्य इसके खिलाफ हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट मिलना कोई नई बात नहीं है।

सबसे ताज़ा उदाहरण ही देखें तो आने वाले कुछ दिनों में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव के लिए खुद कॉन्ग्रेस ने ‘माई बहिन मान योजना’ का एलान किया है। इसमें कॉन्ग्रेस की सरकार बनने पर ज़रूरतमंद महिलाओं को 2500 रुपए महीना की सम्मान राशि दिए जाने की बात है। ऐसा ही वादा कॉन्ग्रेस ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी किया था।

राहुल गाँधी को अब लगता है कि ऐसी बीजेपी की किसी योजना के नाम पर वोट नहीं मिलते तो क्यों उनकी पार्टी ऐसी घोषणाएँ कर रही है, जाहिर है इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है और राहुल गाँधी सिर्फ अपनी तरफ से फर्जी नैरेटिव गढ़ रहे हैं।

अंदरूनी सर्वे पर टिके हैं राहुल के दावे

राहुल गाँधी चुनाव में फर्जीवाड़े के जो सब दावे कर रहे हैं उनमें उनका आधार पार्टी के कुछ अंदरूनी सर्वे में हैं। कॉन्ग्रेस के अंदरूनी सर्वे ने राहुल गाँधी को बताया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कर्नाटक में 16 सीटें जीतने जा रही है लेकिन जब कॉन्ग्रेस 16 सीटें ना जीत पाई तो यह चुनावी धोखाधड़ी हो गई। अब यूँ तो बीजेपी भी चुनाव से पहले 400 पार की बात कर रही थी तो क्या ऐसे में बीजेपी को भी सड़क पर उतरकर हल्ला-हंगामा शुरू कर देना चाहिए कि उनका अनुमान या सर्वे गलत साबित हो गया तो पूरा इलेक्शन ही गड़बड़ है।

महाराष्ट्र को लेकर दोहराए आरोप

महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी ने फिर वही पुराने आरोप दोहराते हुए महाराष्ट्र में 40 लाख वोटर बढ़ने पर सवाल उठाए। राहुल गाँधी ने इस बीच एक महत्वपूर्ण बात कही कि उनके पास महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद चुनाव में धाँधली से जुड़ा कोई सबूत नहीं था और बाद में उन्होंने इसकी पड़ताल की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे, राहुल गाँधी की बात मानें तो ये सब आरोप और सवाल बिना किसी सबूत के उठाए जा रहे थे।

महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच वोटरों का बढ़ना कोई नई बात नहीं है और पहले भी ऐसा कई बार देखा जा चुका है। महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी के दावों का हम पहले भी फैक्ट चेक कर चुके हैं जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि लोगों को महाराष्ट्र के चुनाव में गड़बड़ नजर आई थी। महाराष्ट्र के चुनाव में अगर लोगों को गड़बड़ी लगती तो जाहिर तौर पर प्रदर्शन किए जाते, चुनाव आयोग के दफ्तर का लोग घेराव करते लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जैसे राहुल गाँधी पहले बिना सबूतों के आरोप लगा रहे थे, वैसे ही इस बार लोगों के कँधे पर बंदूक रखकर अपनी बात सही साबित करने पर तुले हैं।

राहुल गाँधी के सबूत में कितना दम?

अपनी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के नाम पर राहुल गाँधी ने कर्नाटक की एक लोकसभा सीट (बेंगलौर सेंट्रल) के अंतर्गत आने वाली एक विधानसभा सीट (महादेवपुरा) का डेटा दिया। यानी जिस बम को फोड़ने की बात राहुल गाँधी कर रहे थे वो बिना बारूद वाला ही निकला। इस लोकसभा सीट पर बीजेपी ने 32,707 वोटों पर जीत दर्ज की थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इस सीट पर 1,00,250 फर्जी वोटर थे, इनमें उन्होंने डुप्लिकेट वोटर, फेक एड्रेस और गलत फोटो जैसे चीजें बताई।

चुनाव में डेटा एंट्री में गड़बड़ियाँ होती हैं, मतदाता सूची में गलतियाँ रहती हैं और कई बार लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने पर अपना नाम नहीं कटवा पाते या जानबूझकर एक से अधिक जगहों पर वोट डालते हैं।

ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनके बारे में लोगों को पता है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोगों को इस बात का बखूबी अंदाजा है लेकिन ऐसे मुद्दों को राहुल गाँधी ने एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बता दिया है। जो बचकाना आरोपी ही लगता है।

राहुल गाँधी ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर जो सवाल उठाए हैं वो लंबे वक्त से चले आ रहे हैं। एक घर में कई वोटरों का होना, फोटो सही ना होना, कई जगहों पर एक ही व्यक्ति के वोट होना समस्याएँ हैं और इन्हीं के सुधार के लिए चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रिया शुरू की है। बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है और इस पर भी राहुल गाँधी समेत अन्य विपक्षी दल हंगामा कर रहे हैं।

यह विशुद्ध हंगामा इसलिए हैं कि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कमियों पर आपत्ति माँगी हैं लेकिन कई दिनों बाद भी एक भी राजनीतिक दल की और से कोई भी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई है। जब राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और अन्य दलों के पास अपनी बात सही साबित करने का मौका है तो वे खामोश हैं।

उल्टा अब सवाल राहुल गाँधी पर ही हैं कि अगर वोटिंग लिस्ट में असंगतियाँ होती हैं, जिनका एक लंबा इतिहास है तब भी क्यों वे SIR जैसी प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। राहुल गाँधी और अन्य दलों को ऐसी जाँच के बाद खुलकर चुनाव आयोग का समर्थन करना चाहिए।

कर्नाटक में भी नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में कॉन्ग्रेस को वोटर लिस्ट दी गई थी लेकिन अब तक कॉन्ग्रेस ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने 7 अगस्त को राहुल गाँधी को पत्र लिखा है। आयोग ने राहुल से कहा कि अगर उनके पास वोटर लिस्ट में फर्जी नामों की जानकारी है, तो वे प्रक्रिया के तहत शपथ पत्र के साथ शिकायत दर्ज करें।

राहुल तो ठहरे राहुल, उन्होंने इसका जवाब बाहुबली फिल्म के अंदाज में देते हुए कहा, “मैं राजनेता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता। मेरे शब्द ही शपथ हैं।” इतने गंभीर विषय पर जवाब देने के बजाय फिल्मी अंदाज में बाद करना ये बताता है कि वो अपने ही आरोपों को लेकर कितने गंभीर हैं।

अमेरिका के आगे झुकने का सवाल ही नहीं उठता, आपदा में भी अवसर खोज लेना पीएम मोदी की आदत: ‘स्वावलंबी भारत’ खुद दे रहा ‘टैरिफ ट्रंप’ को जवाब

आत्मनिर्भरता भारत, मेक इन इंडिया, आपदा में अवसर पीएम मोदी के ऐसे मंत्र हैं जिनके दम पर भारत दुनिया की पाँच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो पाया है। चाहे अमेरिका-चीन जैसे ट्रेड वॉर हो या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी, पीएम मोदी ने हमेशा इन चुनौतियों को अवसर में बदल कर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता दिखाया है।।

जब अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ की घोषणा की, तो मोदी सरकार ने न केवल इसका मुकाबला करने की बात कही, बल्कि घरेलू उद्योगों को और मजबूत कर आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया। अब जब अमेरिका ने टैरिफ 50 फीसदी तक बढ़ा दी है। ऐसे में भारत के लिए आत्मनिर्भरता के लिए उठाए गए कदम बेहद जरूरी लग रहे हैं।

भारत ने अमेरिकी एक्सट्रा 25 फीसदी टैरिफ को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अपनी स्थिति साफ कर दी है। भारत ने कहा है कि हमारा आयात बाजार पर आधारित है। इसमें भारत के 140 करोड़ लोगों का हित जुड़ा है। पीएम मोदी के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है। इसलिए रूस से कच्चे तेल का आयात भारत जारी रखेगा

टैरिफ बन रहा अमेरिकी हथियार

वैश्विक व्यापार युद्धों में टैरिफ एक प्रमुख हथियार बन गया है। अमेरिका भी यही कर रहा है। 2025 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने पर ‘दंड’ देते हुए 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया। यह भारत- अमेरिकी रिश्तों को एक बड़ा झटका भी है। भारत पर अब 50 फीसदी टैरिफ लग चुका है, लेकिन मोदी सरकार ने इसे चुनौती के रूप में लिया है। सरकार ने साफ किया है कि वह किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी ने कहा, ” भारत किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, मुझे इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूँ। “

इससे पहले 2018 से ही पीएम मोदी ने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए थे। इससे घरेलू उद्योगों को आगे बढ़ने का मौका मिला और रोजगार के अवसर भी बढ़े। मोदी सरकार की ट्रेड पॉलिसी हमेशा संतुलित रही है। अमेरिका के साथ व्यापार डील में भारत ने बोरबॉन व्हिस्की और मोटरसाइकिल जैसे उत्पादों पर टैरिफ घटाए जिससे द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा।

पीएम मोदी की कूटनीति का कमाल है कि ट्रंप जैसे ‘ट्रू फ्रेंड’ के साथ भी रिश्ते मजबूत रखते हुए भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को संरक्षित किया। टैरिफ वॉर में पीएम मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जो वैश्विक दबावों का सामना कर घरेलू हितों की रक्षा कर सकते हैं।

दुनिया के अन्य देशों से बढ़ेगा व्यापार

अमेरिकी टैरिफ जो अब तक 2.6 फीसदी था, वो 27 अगस्त 2025 से 50 फीसदी होने वाला है। इसका असर ये होगा कि अमेरिका में भारत का सामान जो पहले 102.6 रुपए में वो अब 150 रुपए में मिलेगा। इसके मुकाबले वियतनाम, चीन के सामान सस्ते मिलेंगे। इसका असर भारत के सामानों की खपत पर पड़ेगा। भारत इससे मुकाबले के लिए तैयार है। भारत की ब्रिटेन के साथ खुला व्यापार समझौता हो चुका है। यूरोपीय यूनियन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2024 में भारत के कुल व्यापार का 11.5 फीसदी हिस्सा यूरोपीय यूनियन के साथ हुआ। इसमें और बढ़ोतरी होने की संभावना है। यानी भारत दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ा कर अमेरिकी ‘टैरिफ बम’ को फुस्स कर सकता है।

आत्मनिर्भर भारत से निकलेगा समाधान

2020 में शुरू की गई आत्मनिर्भर भारत अभियान देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिस पर चल कर भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ रहा है। इस अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया गया, जिसमें एमएसएमई सेक्टर के लिए 3 लाख करोड़ रुपए की कोलैटरल-फ्री लोन स्कीम शामिल थी। एमएसएमई में विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर सरकार ने लघु, मध्यम और सुक्ष्म उद्योंगो को बढ़ावा दिया है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत लगातार निवेश हो रहा है। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इसे 2023 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है।

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पांच हैं जरूरी

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पाँच अहम बिंदू हैं जिनका मजबूत होना जरूरी है। ये हैं- अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड। कृषि में सप्लाई चेन रिफॉर्म्स से किसानों को लाभ हुआ। फसल बीमा का फायदा किसानों को मिल रहा है। वहीं प्रवासी मजदूरों के लिए ‘वन नेशन वन राशन स्कीम’ फायदेमंद साबित हो रही है।

मिनरल सेक्टर में टैक्स सिस्टम में सुधार से निवेश बढ़ा है। वहीं ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ब्रह्मोस, तेजस जैसे फाइटर एयरक्राफ्ट का कई देशों से ऑर्डर मिला है। ये हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। डिजिटल इंडिया का फायदा भी हमें मिल रहा है। यूपीआई की डिमांड भी विदेशों में हो रही है।

आपदा में अवसर तलाशता रहा है भारत

पीएम मोदी की सबसे बड़ी खासियत है आपदाओं को अवसर में बदलना। कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया की अर्थव्यवस्था हिलोरे मार रही थी। उस वक्त भारत की ग्रोथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा थी। 2020 में जब दुनिया लॉकडाउन में थी, तो पीए मोदी ने घोषणा की कि इस संकट को आत्मनिर्भर भारत बनाने का अवसर बनाएँ। इस दौरान सरकार ने 22.6 बिलियन डॉलर का स्टिमुलस पैकेज लॉन्च किया, जो जीडीपी का 10% था और मेक इन इंडिया को बूस्ट दिया।

इस दौरान भारत ने वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया। कोवैक्सीन और कोविशील्ड के जरिए न केवल खुद को बचाया बल्कि कई देशों की मदद की। इस दौरान कृषि क्षेत्र, टैक्स और श्रम कानूनों में भी बदलाव किए गए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कोविड से लड़ाई में भारत की भूमिका की तारीफ की।

दुनिया को हर आपदा में दी सहायता

चाहे सुनामी हो या साइक्लोन, भारत ने हमेशा राहत कार्यों को तेज किया है और पुनर्निर्माण में मदद की। यहाँ तक कि पड़ोसी मालदीव के कड़वे फैसलों का घूँट पीकर भी भारत मुश्किल घड़ी में उसकी मदद करने सामने आया है। पीएम मोदी ने मालदीव दौरा कर उसे करोड़ों रुपए की आर्थिक सहायता दी। एक समय ऐसा था जब भारत पेट भरने के लिए विदेशों पर निर्भर था। अनाज से लेकर दूध तक विदेशों से आते थे। लेकिन अब भारत इन मामलों में पूरी तरह आत्मनिर्भर है।

देश भर में 8.72 लाख वक्फ प्रॉपर्टी, लेकिन सरकार को नए पोर्टल पर मिले सिर्फ 69 के डाटा: आखिर क्यों WAMSI पर दर्ज जानकारी UMEED पर नहीं दे पा रहे मुस्लिम समाज के लोग?

केंद्र सरकार द्वारा वक्फ संपत्तियों के मैनेजमेंट के लिए 2 महीने पहले शुरू किए गए UMEED पोर्टल पर अब तक केवल 69 वक्फ निर्माताओं (संपत्ति वक्फ करने वाले) ने अपनी संपत्तियों का डेटा अपलोड किया है।

इस पोर्टल पर सारी वक्फ संपत्तियों का ब्यौरा इसके शुरू होने के 6 महीने के भीतर अपलोड किया जाना है। एक और जहाँ पुराने WAMSI पोर्टल पर 8.72 लाख संपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर वक्फ से जुड़ी संपत्तियों के अपलोड करने में हो रही देरी पर अब सवाल उठने लगे हैं।

केवल 663 ने शुरू की डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया है कि अब तक सिर्फ 663 वक्फ निर्माताओं ने डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया शुरू की है जिसमें सबसे ज्यादा 163 ओडिशा से हैं ।

रिजिजू द्वारा पेश किए गए आँकड़ों के मुताबिक, अब तक 4 संपत्तियों को खारिज किया जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश की 3 और ओडिशा की एक संपत्ति शामिल है। वहीं, अब तक एक भी अनुमोदनकर्ता के अनुमोदन को स्वीकृत नहीं किया गया है।

कैसे काम करता है UMEED पोर्टल?

किरेन रिजिजू ने 6 जून को दिल्ली से UMEED पोर्टल की शुरुआत की थी। सरकार के मुताबिक, यह पोर्टल वक्फ संपत्तियों की वास्तविक समय पर अपलोडिंग, सत्यापन और निगरानी के लिए एक सेंट्रल डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। सरकार को उम्मीद थी कि इससे देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।

जानकारी के मुताबिक, इस पोर्टल में 3-स्तरों वाली सत्यापन प्रणाली ‘निर्माता-जांचकर्ता-स्वीकृतकर्ता’ है। इसके तहत एक मुतवल्ली संपत्ति के विवरण को ‘निर्माता’ के रूप में दर्ज करता है जिसके बाद वक्फ बोर्ड के अधिकारियों द्वारा इसका सत्यापन और निर्धारित सरकारी प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड की जांच के बाद स्वीकृति दी जाती है।

रिजिजू ने लोकसभा में बताया कि देश के विभिन्न वक्फ बोर्ड्स द्वारा इस पोर्टल से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए एक हेल्पलाइन भी बनाई गई है। उन्होंने बताया कि 28 जुलाई 2025 तक देश भर से करीब 140 शिकायतें या सुझाव उन्हें मिले और इसके समाधानों को पोर्टल पर ही अपलोड कर दिया गया है।

पुराने पोर्टल पर हैं 8.72 लाख संपत्तियाँ?

अभी तक वक्फ की सभी संपत्तियों का ब्यौरा ‘वक्फ असेट्स मैनेजमैंट सिस्टम ऑफ इंडिया‘ (WAMSI) के पोर्टल पर होता है। WAMSI पर मौजूद डेटा के मुताबिक, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 32 वक्फ बोर्ड के पास 8,72,985 अचल संपत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों में 1.5 लाख से अधिक कब्रिस्तान, 1.4 लाख कृषि भूमि से जुड़ी संपत्तियाँ और 1.19 लाख मस्जिदें शामिल हैं।

वहीं, अगर राज्यों की बात करें तो पोर्टल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में सर्वाधिक 2.17 लाख संपत्तियाँ रजिस्टर्ड हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड और पंजाब वक्फ बोर्ड में क्रमश: 80,922 और 75,965 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं।

संपत्तियाँ दर्ज कराने से क्यों बच रहे हैं वक्फ बोर्ड?

वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और कई जगहों को वक्फ के काम पर जबरन कब्जाने को लेकर लगातार शिकायती सामने आ रही थीं। राज्यों को वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी सामने आए जिसके बाद वक्फ के प्रबंधन को और बेहतर करने के लिए मोदी सरकार ने काम करने शुरू किया। इसके लिए सरकार द्वारा नया वक्फ संशोधन कानून भी बनाया गया है।

UMEED पोर्टल भी इसी कड़ी की एक हिस्सा था जिससे वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन बेहतर हो उनसे जुड़े सही रिकॉर्ड्स भी सरकार तक पहुँच सकें। WAMSI जैसे पोर्टल जहाँ संपत्तियों को दर्ज करने के लिए ज्यादा कानूनी पेचीदगों की जरूरत नहीं हैं, वहाँ लाखों की संख्या में सपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर संपत्तियाँ दर्ज करने से बोर्ड बचते नजर आ रहे हैं। इसे लेकर ही कई सवाल उठने लगे हैं।

वक्फ कानून को लेकर लगातार हंगामा हुआ था और देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन किए गए थे, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वक्फ बोर्ड से जुड़े लोगों को इस कानून के वापस होने का भरोसा तो नहीं है जिससे ये वक्फ संपत्तियों के विवरण देने से बच सकें।

दूसरी और कई जगहों पर संपत्तियों को अवैध तरह से कब्जा करने के बाद उन्हें जबरन वक्फ घोषित करने जैसे आरोप भी लगाए गए थे तो क्या ऐसा भी संभव है कि बहुत बड़ी संख्या में संपत्तियों से जुड़े कागजात ही बोर्ड्स के पास ना हों और वे अब इनका ब्यौरा देने से बच रहे हों।

रक्षाबंधन पर सीएम योगी का तोहफा, 1.23 करोड़ बहनों को मुफ्त बस यात्रा: ₹101 करोड़ खर्च कर बाखूबी निभा रहे भाई का फर्ज

रक्षाबंधन पर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बहनों को मुफ्त बस यात्रा का जो तोहफा दिया है, उसका लाख 1.23 करोड़ महिलाएँ उठा चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में रक्षाबंधन के समय 3 दिनों तक महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की योजना साल 2017 में शुरू हुई थी। बीते साल 2024 तक 1.23 करोड़ महिलाएँ इस योजना का फायदा उठा चुकी थी। इस दौरान सरकार ने ₹101.42 करोड़ रुपये खर्च किए।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2017 में यह योजना शुरू की थी, जिसमें रक्षाबंधन के अवसर पर रोडवेज की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है। इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित, सुविधाजनक और सम्मानजनक यात्रा उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने भाइयों के पास राखी बांधने बिना किसी आर्थिक चिंता के जा सकें।

इस योजना की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब 11,16,332 महिलाओं ने इसका लाभ उठाया और सरकार ने ₹6.08 करोड़ की टिकट लागत वहन की। अगले वर्ष 2018 में यह संख्या बढ़कर 11,69,226 हो गई और ₹7.41 करोड़ खर्च किए गए।

2019 में 12,04,085 महिलाओं को ₹7.68 करोड़ की टिकट राशि दी गई। हालाँकि 2020 में कोविड-19 के कारण लाभार्थी संख्या घटकर 7,36,605 रह गई और टिकट पर ₹4.82 करोड़ खर्च हुए। 2021 में यह संख्या फिर बढ़कर 9,63,466 हो गई और सरकार ने ₹8.91 करोड़ खर्च किए।

इसके बाद योजना ने रफ्तार पकड़ी और 2022 में 22,32,322 महिलाओं को ₹18.98 करोड़ का लाभ मिला। 2023 में यह योजना सबसे अधिक प्रभावी रही, जब 29,29,755 महिलाओं ने मुफ्त यात्रा की और टिकट पर ₹27.66 करोड़ खर्च हुए।

वहीं 2024 में अब तक 19,78,403 महिलाएँ इसका लाभ ले चुकी हैं और सरकार ने ₹19.87 करोड़ की टिकट लागत वहन की है। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि योजना का प्रभाव हर वर्ष बढ़ता गया और महिलाओं में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

इस योजना से खासतौर पर ग्रामीण इलाकों, पिछड़े वर्गों और निम्न आय वर्ग की महिलाएँ लाभान्वित हुई हैं। उनके लिए यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि ‘सम्मान का तोहफा’ है।

यह योजना दिखाती है कि सरकार केवल घोषणाएँ नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर ठोस काम कर रही है। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सुविधा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता इस योजना से साफ नजर आती है।