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सेक्स चाहिए या शिक्षा… 16-18 साल के बच्चे खुद करें तय: फर्जी लिबरलपंती में न हों बर्बाद, जानें क्या हो सकते हैं दुष्परिणाम

भारत में ‘सहमति से सेक्स’ करने की उम्र 18 से कम करके 16 करने को लेकर चर्चा लंबे समय से चल रही थी। मामला इतना गंभीर था कि देश की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा सिंह ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में उठाया और कोर्ट ने भी सुनवाई करते हुए इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब माँग लिया।

केंद्र हाल में इसी मामले पर अपना जवाब दिया और कहा है कि किसी कीमत पर सेक्स करने की आयु 18 से 16 नहीं हो सकती। सरकार ने इसके पीछे कई तर्क दिए। बताया कि कैसे इस कदम से अपराध होने पर बच्चों को दोषी बताया जा सकता है। कैसे बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले को को संरक्षण मिल सकता है आदि-आदि।

केंद्र सरकार ने यह जवाब देश में युवाओं की स्थिति को देखकर दिया है, लेकिन प्रश्न यह है कि उन्हें ये जवाब देने की जरूरत पड़ी ही क्यों और ये विचार कि सहमति से सेक्स की उम्र 18 से भी कम की जाए ये जहन में आया ही कैसे? क्या जिसने ये सवाल उठाया उनके लिए किशोरों के शिक्षित होने के अधिकार से ज्यादा जरूरी कम उम्र में सेक्स करने का अधिकार पाना लगता है?

हो सकता है बुद्धिजीवी वर्ग इसे भी मौलिक अधिकार बताकर जस्टिफाई कर लें और अंतर पूछ लें कि शिक्षा और सेक्स का आखिर क्या लेना-देना होता है? तो चलिए उनके इस प्रश्न का उत्तर देते हैं लेकिन उससे पहले ये समझते हैं कि जिन युवाओं को ये लोग शिक्षा लेने की उम्र में सेक्स का अधिकार दिलवा रहे हैं, उनके सामने चुनौतियाँ क्या हैं।

बात सिर्फ भारतीय परिदृश्य को मद्देनजर में रखकर आगे करेंगे।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के अनुसार, एक लड़का-लड़की अगर रेगुलर स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करता है तो उसकी 10वीं पूरी होते-होते उसकी उम्र 15 हो जाती है। फिर 12वीं करते-करते वो 17 साल के होते हैं और इसके बाद आती है वो 18 की उम्र, जो सरकार ने लड़की को बालिग मानने के लिए तय कर रखी है।

अब जो लोग इस उम्र से नीचे वाले लड़के/लड़कियों के लिए चाहते हैं कि उन्हें कैसे भी करके कम उम्र में सहमति से सेक्स करने का अधिकार मिले, उन्हें ये बात तो बतानी पड़ेगी कि उनके लिए शिक्षा ऊपर है या सेक्स। ये तुलना सिर्फ इसलिए क्योंकि सेक्स और प्रोफेशनल लाइफ एक उम्र के बाद जरूरत समांतर चल सकती है मगर किशोरवस्था में इसके दुष्परिणाम होते हैं।

आमतौर पर एक किशोर के भीतर हार्मोनल बदलाव 12-13 साल की उम्र से आता है। लड़का और लड़की दोनों ही इस समय में अपने शरीर से जूझ रहे होते हैं। अपने भीतर होने वाले बदलावों को समझ रहे होते हैं। उनके सामने बॉलीवुड की वो फिल्में होती हैं जो उन्हें बताती हैं कि वो बचपन में पढ़ाई में मन न भी लगे तो ठीक, लेकिन प्रेम समय से हो जाना चाहिए।

इसके बाद कभी दोस्ती के नाम पर उनको ठगा जाता है तो कभी आकर्षण को प्रेम का नाम देकर धोखा होता है। कुछ लोग इस उम्र में गलत राह पर जाने से बच जाते हैं, मगर कुछ को इसके अलावा कुछ नहीं समझ नहीं आता।

अगर खासतौर पर लड़कियों को देखते हुए बात की जाए, तो ये मानना होगा कि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ कुछ लोग अब भी मानते हैं ‘माहवारी’ आते ही लड़की जवान हो जाती है और जल्द से जल्द उसका विवाह/निकाह करवा देना चाहिए…. ये समाज अगर किसी से थोड़ा बहुत डरता है तो वो वही कानून है जो 18 की उम्र के बाद किशोरों को बालिग करार देता है और उसके बाद हुई शादी को ही वैध मानता है।

अगर बुद्धिजीवियों की लड़ाई आज ये ही रह गई है कि सहमति से सेक्स करने की उम्र 18 से 16 होनी चाहिए तो क्या मान लिया जाए कल को उन्हें इस बात से भी समस्या नहीं होगी कि छोटी उम्र में बच्चों की शादी क्यों हो रही है? क्योंकि जब सेक्स का अधिकार मिल सकता है तो शादी कर लेने का क्यों नहीं।

लड़कियों की शादी की उम्र आज के समय में सरकार 18 से बढ़ाकर 21 करना चाहती है ताकि लड़कियाँ सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तीनों तरह से परिपक्व हो सकें। उनके पास अकादमिक क्षेत्र में हासिल की गई तमाम डिग्रियों के साथ उन अनुभवों का भी अंबार हो, जो उन्हें इतना समझदार बना सके कि वो अपने लिए फैसले लेने में समर्थ दिखें। उन्हें पता रहे कि उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है। वो किसके साथ सहज हैं और किसके साथ नहीं। उन्हें क्या पसंद करना है और क्या नहीं। उन्हें क्या ग्रहण करना है क्या नहीं।

कायदे से ये सारे साल लड़के या लड़की के निजी विकास के होने चाहिए, जिसमें वो खुद को समझें। अगर ये समझने के बाद उसे लगता है कि उसके लिए सेक्स ही है तो वो उसे चुने। लेकिन ये निर्णय उनका तब खुद का हो, जब उन्हें ये पता हो कि शिक्षा लेकर समृद्ध हुआ जा सकता है या सेक्स के नाम पर डिस्ट्रैक्ट होकर… इस मामले में उन्हें ऐसे वर्ग से इन्फ्लुएंस नहीं होना चाहिए जो माने कम उम्र में सेक्स कर पाना ही आजादी की शुरुआत है।

हम चाहे मानें न मानें लेकिन कम उम्र में यौन इच्छाओं का भीतर प्रबल होना ‘डिस्ट्रैक्शन’ के अलावा कुछ नहीं है। अगर ये बात मनगढ़ंत लगती हैं तो लोगों को इंटरनेट पर पड़े युवाओं के उन सवालों को पढ़ना चाहिए जहाँ वो साफ तौर पर सेक्स और स्टडी के बीच उलझे दिखते हैं।

पूरा इंटरनेट आज ऐसे सवालों से भरा पड़ा है जहाँ छोटे बच्चे किसी आभासी मेंटर से सवाल करते हैं कि उनके भीतर यौन इच्छाएँ इतनी प्रबल हो रही हैं कि वो पढ़ाई नहीं कर पाते, अपने लक्ष्य से भटकते हैं… उन्हें क्या करना चाहिए।

कोरा जैसी सवाल-जवाब वाली साइट पर यदि आप जाएँगे तो ऐसे सवालों की वहाँ भरमार देखने को मिलेगी। युवा वहाँ अपनी स्थिति खुलकर बताते है। साफ-साफ सवाल पूछा जाता है कि वो ऐसी स्थिति में क्या करे…।

तमाम ऐसी साइट्स हैं, ऐसी स्टडीज हैं जिसका आधार सिर्फ यही है कि ऐसी स्थिति में फोकस को कैसे सही जगह पर लगाए। अगर आज के युवा के लिए ये चुनौती नहीं होती तो इंटरनेट पर ऐसे सवाल नहीं होते।

हमारे समाज में युवा वर्ग के जीवन में चैलेंज पहले से ज्यादा व्यापक हो चुके हैं। उन्हें अब सिर्फ रूढ़िवादी सोच और समाज की पिछड़ी मानसिकता से नहीं लड़ना, उन्हें अब खुद की अस्मिता बचाने के लिए अश्लीलता करने को उकसाने वाले तत्वों से भी लड़ना है और साथ ही लड़ना है उस बुद्धिजीवी वर्ग से भी जो शिक्षा के ऊपर सेक्स को बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

अंत में, जिस उम्र में बच्चों को सेक्स का अधिकार देने की बात हो रही है, उस उम्र को लेकर बुद्धिजीवियों को थोड़ा शोध भी करना चाहिए और समझना चाहिए कि इस उम्र में होने वाली गलतियों को सुधारने के लिए क्या बच्चे तैयार हैं? क्या उन्हें पता है कि यौन शोषण और प्रेम के स्पर्श में अंतर क्या है? क्या उन्हें पता है कि 18 से कम उम्र में सेक्स की आजादी मिलने का फायदा कभी कोई अपराधी नहीं उठाएगा? क्या एक 16 की लड़की जानती है कि गर्भवती होने पर उसे क्या करना है? क्या 18 साल के लड़के को पता है कि ऐसी स्थिति से डील करना है…. या सिर्फ यौन इच्छाओं की पूर्ति ही बच्चों के लिए क्रांति माना जाएगा।

सहमति से सेक्स का अधिकार मिल भी जाए तो होगा क्या?

बता दें कि एक ऐसे समाज में, जहाँ लोग यौन संबंधों पर खुलकर बात भी न करते हों, इसे पर्दे के पीछे रखने का विषय माना जाता हो… उसमें कम उम्र में सहमति से सेक्स की आजादी देना लड़के-लड़की दोनों पर बुरा प्रभाव डालेगा। वो भावनात्मक तौर पर कभी परिपक्व नहीं हो पाएँगे। एक समय आए शायद उन्हें ग्लानि में जीवन गुजारना पड़े, उन्हें डिप्रेशन से गुजरना पड़े या आत्महत्या तक के ख्याल आएँ।

इसके अलावा अनचाही प्रेगनेंसी, यौन संबंधी रोग, शारीरिक विचार में रोक वो स्वास्थ्य पहलू हैं जिन्हें ये अधिकार माँगने से पहले नकारा जा रहा है। साथ ही वो माहौल को भी नजरअंदाज कर रहे हैं जो ऐसा करने पर एक आम भारतीय के घर में देखा जा सकता है। हो सकता है कि बुद्धिजीवी वर्ग किशोरों को कानूनी रूप से आजादी दिलवा भी दें, लेकिन क्या उनके परिवार इसे स्वीकार कर पाएँगे। नतीजा यहाँ तक हो सकता है कि बच्चों को अपनी शिक्षा तक से समझौता करना पड़े। इसके बाद वो स्थिति भी न भूली जाए जिसमें ये समझना मुश्किल हो जाएगा कि बच्चे ने सच में सहमति से संबंध बनाया या फिर वो किसी यौन अपराध का शिकार हुआ है।

शुभांशु शुक्ला से लेकर मराठा किलों तक, पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में बताई देश की उपलब्धियाँ: कहा- देश त्योहारों की रौनक से सजने जा रहा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर 124वीं बार ‘मन की बात’ के जरिए देशवासियों से दिल से दिल की बात की। इस बार उन्होंने खेल, विज्ञान, संस्कृति और देश के गौरवशाली इतिहास की बात की। सरल और आम बोलचाल की भाषा में उन्होंने देश की उपलब्धियों को गर्व के साथ सामने रखा और भविष्य के लिए प्रेरणा दी।

अंतरिक्ष में भारत की उड़ान, बच्चों में नई जिज्ञासा पर की बात

पीएम मोदी ने अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला की धरती पर सुरक्षित वापसी की तारीफ की। उन्होंने कहा कि जैसे ही शुभांशु धरती पर उतरे, देशवासियों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई। चंद्रयान-3 की सफलता को याद करते हुए पीएम ने बताया कि इसने बच्चों में अंतरिक्ष और विज्ञान के प्रति नई जिज्ञासा जगाई है। बच्चे अब अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनने के सपने देख रहे हैं।

इंस्पायर-मनक अभियान और स्पेस स्टार्टअप्स का जिक्र

पीएम मोदी ने ‘इंस्पायर-मनक’ अभियान का जिक्र किया, जिसमें स्कूलों के बच्चे नए-नए आइडिया लाते हैं। चंद्रयान-3 के बाद इस अभियान से जुड़ने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई है। देश में स्पेस स्टार्टअप्स भी तेजी से बढ़ रहे हैं। पाँच साल पहले जहां 50 से कम स्टार्टअप थे, आज 200 से ज्यादा हैं। पीएम ने 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ मनाने की बात कही और लोगों से इस मौके पर अपने आइडिया नमो ऐप पर भेजने की अपील की।

विज्ञान और गणित ओलंपियाड में भारत का जलवा

पीएम मोदी ने बताया कि हाल ही में इंटरनेशनल केमिस्ट्री ओलंपियाड में भारत के चार छात्रों देवेश पंकज, संदीप कुची, देबदत्त प्रियदर्शी और उज्ज्वल केसरी ने मेडल जीते। गणित में भी भारत ने ऑस्ट्रेलिया में हुए इंटरनेशनल मैथमेटिकल ओलंपियाड में 3 गोल्ड, 2 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज मेडल हासिल किए। अगले महीने मुंबई में होने वाले एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स ओलंपियाड में 60 से ज्यादा देशों के छात्र हिस्सा लेंगे।

मराठा किलों को यूनेस्को की मान्यता मिलने पर जताई खुशी

पीएम मोदी ने खुशी जताई कि यूनेस्को ने 12 मराठा किलों को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में शामिल किया है। इनमें महाराष्ट्र के 11 और तमिलनाडु का एक किला शामिल है। सल्हेर, शिवनेरी, खानदेरी, प्रतापगढ़ और विजयदुर्ग जैसे किलों की कहानियाँ सुनाते हुए पीएम ने कहा कि ये किले सिर्फ पत्थरों के ढाँचे नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इतिहास के प्रतीक हैं। उन्होंने देशवासियों से इन किलों को देखने और इतिहास को समझने की अपील की।

आजादी के दीवानों को किया याद

अगस्त को क्रांति का महीना बताते हुए पीएम ने खुदीराम बोस की वीरता को याद किया, जिन्होंने 18 साल की उम्र में देश के लिए फाँसी स्वीकार की। उन्होंने 1 अगस्त को लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि, 8 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन और 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का जिक्र किया। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने की बात कही।

स्वदेशी और हथकरघा को बताया देश की ताकत

7 अगस्त को ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ की बात करते हुए पीएम ने स्वदेशी आंदोलन को याद किया। उन्होंने बताया कि हथकरघा और टेक्सटाइल सेक्टर देश की ताकत बन रहा है। महाराष्ट्र की कविता धवले, ओडिशा की आदिवासी महिलाएँ और बिहार के नवीन कुमार जैसे लोगों की कहानियाँ सुनाईं, जो हथकरघा को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहे हैं। पीएम ने ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा दोहराया और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की।

तमिलनाडु, ओडिशा, असम, झारखंड का किया जिक्र

ओडिशा के क्योंझर में राधाकृष्ण संकीर्तन मंडली की कहानी सुनाते हुए पीएम ने बताया कि यह टोली भक्ति गीतों के जरिए जंगल की आग से बचाव का संदेश दे रही है। तमिलनाडु के मणि मारन की तारीफ की, जो तमिल पांडुलिपियों को सहेज रहे हैं। पीएम ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ की भी बात की, जिसके तहत प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटाइज किया जाएगा।

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में हुए ग्रासलैंड बर्ड सेंसस का जिक्र करते हुए पीएम ने बताया कि वहाँ 40 से ज्यादा पक्षी प्रजातियों की पहचान हुई। तकनीक और एआई के इस्तेमाल से बिना पक्षियों को परेशान किए यह काम हुआ। पीएम ने ऐसी पहलों को बढ़ावा देने की बात कही।

झारखंड के गुमला में ओमप्रकाश साहू की कहानी सुनाई, जिन्होंने माओवादी हिंसा छोड़कर मछली पालन शुरू किया। ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ की मदद से आज 150 से ज्यादा परिवार इस काम से जुड़े हैं। पीएम ने इसे बदलाव की मिसाल बताया।

पीएम मोदी ने वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स में भारत के 600 मेडल जीतने की तारीफ की। पीएम ने बताया कि 2029 में यह आयोजन भारत में होगा। ‘खेलो भारत नीति 2025’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसका लक्ष्य भारत को खेलों में महाशक्ति बनाना है।

पीएम मोदी ने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को जन-आंदोलन बताया, जो 11 साल बाद भी उतना ही जरूरी है। भोपाल की ‘सकारात्मक सोच’ टीम, लखनऊ की गोमती नदी टीम और गोवा के पणजी जैसे उदाहरणों से साफ हुआ कि स्वच्छता अब देश की आदत बन रही है।

पीएम मोदी ने दी त्योहारों की शुभकामनाएँ

अंत में पीएम मोदी ने हरियाली तीज, नाग पंचमी, रक्षाबंधन और जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने देशवासियों से अपने विचार नमो ऐप और मायगव पर साझा करने की अपील की। पीएम ने कहा कि अगले महीने फिर मिलेंगे, नई उपलब्धियों और प्रेरणाओं के साथ। उन्होंने सभी से अपना ध्यान रखने और देश के लिए योगदान देने की बात कही।

नहीं, दक्षिणपंथी यूँ ही नहीं कर रहे Special Ops-2 पर बवाल, सीरीज में भरपूर है प्रोपगेंडा का माल: सुधीर-चड्ढा-सुब्रमण्यम ‘दगाबाज’, फारूक-सुलेमान-रुहानी ‘पक्के देशभक्त’

देशभक्ति दिखाने के लिए कोई मजहब जरूरी नहीं होता, लेकिन अगर फिल्म में प्रोपगेंडा दिखाना हो तो उसमें मजहब का छौंक एक महत्वपूर्ण इंग्रीडिएंट है। आपने 1980 में आई ‘शान’ फिल्म में एक गाना सुना होगा- ‘नाम अब्दुल है मेरा सबकी खबर रखता हूँ’ अब समय बदला है, दुनिया ‘शान’ से ‘स्पेशल ऑप्स के सीजन 2’ तक पहुँच गई है, तो कैरेक्टर के हिसाब से गाना भी अलग होना चाहिए। 

जैसे-

  • नाम फारूक है मेरा- देश की रक्षा करता हूँ।
  • नाम सुलेमान है मेरा- मैं वतन से प्यार करता हूँ।
  • नाम रुहानी है मेरा- देश की सुरक्षा में हरदम सूटकेस तैयार रखती हूँ।
  • नाम अब्बास है मेरा- वाइन छोड़कर देश के लिए काम करता हूँ।
  • नाम साहिल है मेरा-बेबस बनकर बीवी पर नजर रखता हूँ।

इन नए गानों की लाइन सुन अगर आपके मन में कोई सवाल आए तो आपको जाकर स्पेशल ऑप्स का सीजन-2 देखना चाहिए। ‘साइबर अटैक’ को फोकस में रखकर बनाई गई एक सीरीज- जिसमें लाचार, बेचारा, हारा, बहादुर और सबसे ईमानदार अगर कोई दिखाया गया है तो वो यही कुछ कैरेक्टर हैं।

सीरीज में जितना इन कैरेक्टर्स को ‘देशभक्त’ दिखाया गया है उतना तो मेकर्स ‘विलेन’ को भी विलेन दिखाना भूल गए। कहने को सीरीज ‘साइबर वारफेयर’ और ‘न्यूक्लियर धमाके’ का प्लॉट देकर निर्मित की गई है, मगर तकनीकी समस्याएँ इतनी हैं कि कोई भी समझ जाए असली फोकस कहाँ और क्या प्लॉट सेट करने में था।

सीरीज में साइबर वायरफेयर का खतरा दिखाने का प्रयास हुआ है वो भी फिक्शनल लाइन और आभासी तथ्य पर। शुरू में दिखाया जाता है कि भारत 2014 में एक साइबर अटैक हुआ था लेकिन उस समय भारत ने उसे जैसे-तैसे करके रोक लिया और जब जाँच हुई तो पता चला कि इसके पीछे चीन का हाथ था। आगे कहानी बढ़ती है और पता चलता है कि चीन तो छोटा दुश्मन है, असली लड़ाई तो भारत की एक भारतीय जिसका नाम ‘सुधीर अवस्थी’ है उससे है।

सुधीर अवस्थी अपने आपको ‘ग्लोबल सिटिजन’ बताता है और देश की अर्थवस्वस्था को हिलाने के लिए चीन से सौदा करके बैठा है। उसने देश के महान वैज्ञानिक डॉक्टर पीयूष भार्गव को भी किडनैप कर लिया है और अब देश की आन अगर कोई बचा सकता है तो वो सिर्फ एक अंडर कवर एजेंट फारूक ही है। फारूक- हिम्मत सिंह का सबसे काबिल असेट है और नेपाल में किसी ने उसे पकड़ लिया है।

सीरीज में हिंदू गद्दार

अब फारूक को छुड़ाने के लिए ‘हिम्मत सिंह’ पाकिस्तानी की मदद लेते हैं। (इस सीरीज में इस पाकिस्तानी से एक नहीं बल्कि दो बार मदद लेते हुए दिखाया गया है। एक बार फारूक को छुड़ाने के लिए और दूसरी बार एक लोकेशन की जानकारी लेने के लिए।)

खैर… हिम्मत सिंह के पाकिस्तानी नेटवर्क की मदद से नेपाल में फँसे फारूक को छुड़ाते हैं और इसके बाद फारूक काम पर लगता है।

यहाँ गौर करने वाली बात है- फारूक को बचाना किसे है- डॉक्टर पीयूष को। फारूक को सामना किसका करता है- सुधीर अवस्थी का। फारूक ईमानदार किसके लिए- हिम्मत सिंह के लिए और फारूक लड़ किसके लिए रहा है- भारत के लिए।

अजीब बात ये नहीं है कि भारत को बचाने के लिए ‘फारूक’ ही सबसे बेहतर विकल्प हिम्मत सिंह को दिखता है। अजीब ये है कि उससे बेहतर किसी को सीरीज में दिखने नहीं दिया जाता। सीरीज में एक कैरेक्टर अभय सिंह का है, जो उन ‘विनोद शेखावत’ के बेस्ट हैंड थे जिन्होंने साइबर फ्रॉड रोकने का काम संभाला था। बाद में उन्हें गोली मार दी गई तो अभय सिंह ने दोषियों से बदला लेने की कोशिश की। सीरीज में वहाँ भी यही दिखाया गया कि अभय सिंह की बेवकूफी के कारण फारूक डॉ पीयूष को नहीं बचा पाया। अगर अभय सिंह गलती नहीं करते तो फारूक बस डॉक्टर पीयूष को बचा ही लेता। यहाँ निर्माता चाहते तो अभय के ‘इमोशन्स’ का इस्तेमाल करके उन्हें आगे रखा जा सकता था। मगर नहीं, हाईलाइट तो किसी और को ही करना था।

अब बात अगले कैरेक्टर की। आपने सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप को देखा गया जिसमें सुलेमान को वतन से मोहब्बत पर पैसे भेजने को कहा जाता है और फिर एक गाली होती है। असल में इस एक क्लिप को देख आप जैसा सोच रहे हैं वैसा नहीं है। सीरीज में ‘सुलेमान’ को लेकर असल में ये दिखाया गया है कि वो भले ही धंधा गलत कर रहा है लेकिन देखा जाए तो उसकी वतनपरस्ती उस पीएमओ के अधिकारी नरेश चड्ढा से कहीं ज्यादा है जो सुधीर अवस्थी के हाथों बिक गया है।

आगे बचा रुहानी का कैरेक्टर। रुहानी वही खास एजेंट है जिसे फारूक के साथ जिम्मेदारी दी गई है कि वो देश के महान वैज्ञानिक को बचाए। इस काम के लिए उसे अचानक एक कॉल आती है और दिखाया जाता है कि वो अपने बिस्तर से उठकर अपना सूटकेस उठाकर चल देती है देश की रक्षा में। 

ये सब उसके लिए सहज है नहीं है- इस पर कहीं कोई बात नहीं होती। उलटा इस सीरीज में एक कैरेक्टर को इतना नर्म और मासूम दिखाया गया है कि आपको देखकर लगे कि कोई ‘साहिल’ आपके जीवन में भी हो तो आपके लिए भी चीजें आसान हो जाएँगी।

साहिल है रुहानी का शौहर। सीरीज के सीन में दिखाया जाता है कि रुहानी को जब देश के लिए ऑपरेशन में शामिल होने के लिए कॉल आती है तो रुहानी रातोंरात उठकर निकल जाती है और शौहर से सिर्फ इतना ही कहती है कि वो क्लाइंट से मिलने जा रही है।

सवाल ये है कि आज के समय में जब चीजें इतनी स्पष्ट हैं तो उन्हें इतना हवा-हवाई रखने का क्या अर्थ हो सकता है। क्या किसी सामान्य घर की महिला के लिए खासकर मुस्लिम परिवार की महिला के लिए रातोंरात क्लाइंट से मिलने के लिए निकलना इतना आसान है?

मुस्लिम दंपति को आदर्श दंपति दिखाने में मेकर्स को इतनी तसल्ली नहीं मिली कि उन्होंने आगे सीन में ये भी दिखाया कि साहिल जो है रुहानी का पीछा करते हुए आता है और उसे दूसरे मर्द के साथ देखकर भी मासूमियत से सवाल करता है।

सात समंदर पार से तीन तलाक देने वाली खबरों से जहाँ मीडिया भरा पड़ा है, वहाँ सीरीज में दिखाया जा रहा है कि एक शौहर अपनी बीवी की चिंता में सात हैदराबाद छोड़कर जॉर्जिया आ गया और हकीकत जानने के बाद चुपचाप केवल बर्गर खाता है और एक शब्द नहीं कहता। किसको इस दृश्य में साहिल में सबसे मासूम जीवनसाथी नहीं दिखेगा?

न्यूक्लियर प्लांट पर फर्जीवाड़ा

सीरीज में मुस्लिम कैरेक्टर्स को ऐसे परोसा गया है कि फिल्ममेकर्स भूल गए हैं कि जो फिल्म को साइबर वॉर पर बना रहे हैं उसमें कोई तकनीकी चीजों का ध्यान भी उन्हें रखना था। मेकर्स की सबसे बड़ी गलती ये है कि उन्होंने एक फिक्शनल कहानी को बूम करने के लिए अपनी क्रिएटिव बुद्धि लगाई, मगर वैज्ञानिक सिद्धांतों की पुष्टि करने में कोताही कर दी। अगर न्यूक्लियर प्लांट जैसा एंगल डालनेसे पहले वो थोड़ा सा वैज्ञानिक पक्ष समझते तो उन्हें पता चला कि उन्होंने फिल्म के जरिए कितना गलत विज्ञान परोसने की कोशिश की है।

दरअसल, फिल्म में ये दिखाया जाता है कि अगर डॉक्टर पीयूष ने भारतीयों का डेटा सुधीर को नहीं दिया तो फिर वो न्यूक्लियर की कूलिंग डाउन कर सकता है जिससे विस्फोट होगा और भारत में नरसंहार होगा। ऐसा दिखाया जाता है कि इस नरसंहार से तो बेहतर है भारतीय कंगाल ही हो जाएँ।

सुधीर अवस्थी यही तर्क देकर डॉक्टर पीयूष भार्गव से भारतीयों के बैंक डेटा को माँगता है और डॉक्टर भी नरसंहार की कल्पना करके ये मानने को तैयार हो जाते हैं। अब क्या इतनी रिसर्च करके बनाई गई सीरीज में वैज्ञानिक गलती बताने वाला कोई नहीं था कि कूलिंग डाउन होने से क्या होता है।

ऑपइंडिया अंग्रेजी के अनुराग इस तकनीकी समस्या पर अपने लेख में बात करते हैं। वह बताते हैं कि आखिर कैसे ये पूरा सीन ही एक फॉल्टी सीन है और दर्शकों को भ्रमित करने का प्रयास है।

समझिए अनुराग के लेख से कि जो सीरीज में दिखाया गया उससे ज्यादा से ज्यादा क्या होने की संभावना थी।

जब किसी न्यूक्लियर पावर प्लांट की कूलिंग सिस्टम फेल हो जाती है, तब बम जैसी विस्फोटक स्थिति नहीं, बल्कि मेल्टडाउन का खतरा होता है। रिएक्टर बंद होने के बाद भी फ्यूल रॉड्स 5–6% डिके हीट पैदा करते हैं। बिना ठंडक के यह गर्म होकर हाइड्रोजन और खतरनाक कोरियम बनाते हैं।

Source: Dall-E

चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाओं में भी परमाणु विस्फोट नहीं हुआ। आज के आधुनिक रिएक्टर्स में पासिव कूलिंग, ऑटोमैटिक शटडाउन और कंटेनमेंट सिस्टम होते हैं, जो बिजली या मानव त्रुटि के बावजूद काम करते हैं। इसलिए, आधुनिक रिएक्टर “चेर्नोबिल-प्रूफ” माने जाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले बता दें कि “चेर्नोबिल-प्रूफ” एक अनौपचारिक शब्द है जिसका उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि आधुनिक परमाणु रिएक्टर इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वे चेर्नोबिल जैसी दुर्घटना के दोबारा  होने की संभावना को लगभग खत्म कर देते हैं।

Source: MIT

इसकी खासियत होती है:

बेहतर डिज़ाइन: आधुनिक रिएक्टरों में ऐसे डिज़ाइन फीचर्स होते हैं जो फेल-सेफ होते हैं- यानी अगर कोई सिस्टम काम करना बंद कर दे) हो जाए तो भी रिएक्टर सुरक्षित रहता है।
निगेटिव टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, रिएक्शन धीमी हो जाती है, जिससे फिसन रिएक्शन खुद रुकने लगती है।
कंटेनमेंट डोम: चेर्नोबिल घटना के वक्त RBMK रिएक्टर में यह नहीं था, लेकिन आधुनिक रिएक्टरों में मोटा कंक्रीट का डोम होता है जो रेडियोएक्टिव मटेरियल को बाहर नहीं निकलने देता।
पासिव कूलिंग सिस्टम: बिजली कटने या ऑपरेटर की गलती के बावजूद ये सिस्टम अपने आप काम करते हैं और रिएक्टर को ठंडा रखते हैं।
ऑटोमैटिक शटडाउन: इमरजेंसी में कंट्रोल रॉड्स अपने आप गिर जाती हैं और रिएक्शन को रोक देती हैं।

Source: MIT

अब इस गलती के बारे में जानकर तो लगता है कि सीरीज का पूरा प्लॉट जिस आधार पर सेट किया गया है यानी वो ही फुस्स है। न्यूक्लियर प्लांट में जब ब्लास्ट होने ही वाला नहीं था तब आखिर डॉक्टर पीयूष भार्गव को डरा-सहमा दिखाने का क्या अर्थ। क्या ये भारत के वैज्ञानिकों की बौद्धिक क्षमता पर संदेह उठाने जैसा नहीं है कि कोई भी अपनी बातों में फँसाकर भारतीय वैज्ञानिकों से भारतीयों के डेटा को ले सकता है?

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरी सीरीज में एक कहानी साथ-साथ और चल रही है। एक पूर्व अधिकारी सुब्रमणयम की, जिनकी बीवी बीमार थी और वो चाहकर भी बैंक से पैसे नहीं निकाल पा रहे थे क्योंकि कोई दिनेश ढोलकिया नाम का बिजनेसमैन बैंक से धोखा करके बाहर भाग गया था। सीरीज में दिखाया जाता है कि गुजरात का एक बिजनेसमैन इतना बड़ा धोखेबाज है कि वो भारतीयों के पैसे लेकर भाग गया है और सुब्रमण्यम, जिनकी पत्नी का देहांत हो चुका है, वो किसी भी कीमत पर चाहते हैं कि ढोलकिया को पकड़कर लाया जाए। इसके लिए वो हिम्मत सिंह को बोलते हैं और धमकी देते है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो संसद का साउथ ब्लॉक उड़ा देंगे।

इस कहानी… एक अधिकारी पर कितना प्रेशर होता है, उसे कितने केस एक साथ देखने पड़ते हैं, उसे अपने ही धमकी देते हैं, वो किस जद्दोजहद में होता है…. किस कारण से जोड़ी गई है, ये भी शायद मेकर्स ही समझा पाएँगे… क्योंकि एक बिंदु को छोड़कर वो पूरी सीरिज में हर प्वाइंट समझाने में विफल रहे हैं। सीरीज के मुख्य किरदार ‘हिम्मत सिंह’ को अगर दो मिनट भी किनारे कर दिया जाए तो आपको समझ आएगा कि सीरीज आपके दिमाग में ये डाल रही है कि देश से गद्दारी ‘सुधीर अवस्थी, चड्ढा ‘ करते हैं और देश को बचाने का काम ‘फारूक-रुहानी’ करते हैं।

क्यों न हों दक्षिणपंथी नाराज?

कुछ लोगों का मानना है कि इस फिल्म को इन कैरेक्टर्स के कारण दक्षिणपंथियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है जो कि बेवजह है, लेकिन वो ये नहीं मान रहे कि फिल्म में चालाकी से दिखाए जाने वाले नैरेटिव के दिन चले गए हैं। अब दर्शक समझदार हैं। उन्हें मालूम चलता है कि फिल्मों में पंडित ‘ढोंगी’ और मौलवी ‘साहब’ क्यों दिखाए जाते हैं। कैरेक्टर बैलेंस करने की बात थी तो फिक्शनल कहानियों में तो कुछ भी जोड़ा जा सकता था, फिर इसमें क्यों नहीं।

हमें भी पता है कि देशभक्त होने के लिए किसी का धर्म और मजहब नहीं देखा जाता और न कभी धर्म-मजहब देखकर देशभक्ति को आँकना चाहिए। इसीलिए ये देश कभी भारतीय सेना के जवान औरंगजेब के बलिदान को नहीं भूलता, उनके भाइयों के भारतीय सेना में शामिल होने के जज्बे को सलाम भी करता है और ज्योति मल्होत्रा जैसे जासूसों का समय आने पर खुलकर विरोध भी करता है। लेकिन, पर्दे पर एक नैरेटिव गढ़ने लिए मेकर्स विलेन वाली पंक्ति में किसे खड़ा कर रहे हैं, किसे हीरो बना रहे हैं, दर्शकों के मन पर क्या छाप छोड़ रहे है… ये सब उनकी मंशा पर जरूर सवाल उठाता है। साथ ही आज के उनकी कैरेक्टर बैंलेंसिंग करने की रिवायत से संदेह भी होता है।

ममता राज के 14 साल में 6600+ कंपनियों ने बंगाल को कहा ‘बाय’, UP-दिल्ली जैसे राज्यों में बनाया ठिकाना: जानिए कैसे उद्योग-धंधों का कब्रिस्तान बन रहा ‘शोनार बांग्ला’

केंद्र सरकार ने हाल ही में बताया है कि बीते डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल से 6 हजार से अधिक कंपनियों ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा है। इनमें से 2 हजार से अधिक कंपनियाँ बीते 5 वर्षों में राज्य छोड़ कर गई हैं। यह भी सामने आया है कि इस दौरान यह कंपनियाँ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को गई हैं। 

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का यह पलायन तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के राज में हुआ है। पश्चिम बंगाल में जहाँ एक ओर कंपनियाँ राज्य छोड़ कर जा रही हैं, वहीं नए निवेश भी नाममात्र को हो रहे हैं। देश के चौथे सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए यह स्थिति गंभीर और चिंताजनक है।

यह आँकड़े भले ही चौंकाने वाले हों, लेकिन उद्योग-धंधों का पलायन और पश्चिम बंगाल का पुराना रिश्ता है। देश के बड़े कारोबारी घरानों के अपना मुख्यालय शिफ्ट करने से बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री बंद करने तक यही हाल बीते कई सालों से है। इसमें एक कारण ममता बनर्जी सरकार का उद्योग विरोधी रुख और राज्य की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था है।

कभी एशिया की बड़ी औद्योगिक ताकतों में से एक गिने जाने वाले कोलकाता के अवसान की यह पटकथा ममता बनर्जी के राज से पहले वामपंथियों ने लिख दी थी। लेकिन ममता बनर्जी ने इस पटकथा को अंतिम रूप दिया है और उद्योग-धंधों में इजाफा करने के बजाय उनके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कसर पूरी कर दी है।

कितनी कंपनियों ने बंगाल को कहा बाय-बाय

राज्यसभा में मानसून सत्र के दौरान भाजपा के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल पर एक प्रश्न पूछा। उनके उत्तर में केन्द्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने बताया है कि वर्ष 2011-12 से वर्ष 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल से 6688 कंपनियाँ राज्य छोड़ कर गई हैं।

मंत्रलाय के उत्तर के अनुसार, इनमें से एक तिहाई यानी 2200 से अधिक कंपनियाँ वर्ष 2019 के बाद से राज्य छोड़ कर गई हैं। यह ट्रेंड 2011 में TMC के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी है। मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 6688 कंपनियों में से 110 कंपनियाँ ऐसी थीं जो शेयर बाजार में भी सूचीबद्ध थीं।

मंत्रालय का डाटा बताता है कि 2017-18 के दौरान सबसे अधिक 1027 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल छोड़ा है। 2015-16 और और 2016-17 के दौरान क्रमशः 869 और 918 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से कारोबार समेटा है।

कहाँ गईं यह कंपनियाँ

कॉर्पोरेट मंत्रालय के उत्तर के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली कंपनियाँ दूसरे राज्यों में जा रही हैं। इनका पलायन ऐसे राज्यों में हो रहा है, जहाँ उद्योग को लेकर नीतियाँ सरल हैं और उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। 2011-25 के बीच पश्चिम बंगाल छोड़ कर सर्वाधिक कंपनियाँ महाराष्ट्र गईं हैं।

इसके अलावा दिल्ली और उत्तर प्रदेश उनकी पसंदीदा लोकेशन में शामिल हुए हैं। कॉर्पोरेट मंत्रालय का उत्तर बताता है कि पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 1300 से अधिक कंपनियाँ 2011-25 के बीच महाराष्ट्र गईं हैं। वहीं 1297 ने दिल्ली को चुना है। इसके अलावा 879 कंपनियाँ पश्चिम बंगाल छोड़ कर उत्तर प्रदेश में गई हैं।

छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान भी 1000+ कंपनियाँ पश्चिम बंगाल से छीनने में सफल रहे हैं। हालाँकि, इस सबका तृणमूल सरकार पर कोई असर नहीं दिखाई पड़ता है। वह उद्योग धंधों को राज्य में लाने के बजाय उन्हें और राज्य निकाला देने पर तुली दिखाई पड़ती है।

उद्योग-धंधों पर नीति भी बदली

पश्चिम बंगाल में दशकों से व्यापार करने वाली कंपनियाँ एक ओर राज्य छोड़ रही हैं तो वहीं हाल ही में बनर्जी की सरकार ने कुछ ऐसा किया है, जिससे यह पलायन और तेज हो सकता है। अप्रैल, 2025 में राज्य की ममता सरकार ने उद्योगों को लाभ पहुँचाने वाली सभी सरकारी योजनाओं को बंद कर दिया था।

उद्योग-धंधों को लुभाने के लिए 1993 से लेकर 2021 तक बनाई गई सभी नीतियाँ एक झटके में राज्य सरकार ने खत्म कर दी थीं। इसका असर यह होगा कि राज्य में कोई भी उद्योग स्थापित करने पर किसी कारोबारी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। चाहे वह जमीन से जुड़ा हो, बिजली से जुड़ा हो या फिर अन्य किसी एंगल से।

एक रिपोर्ट बताती है कि ममता सरकार ने उद्योग धंधों को यह फायदे देने इसलिए बंद किए थे, ताकि वह ‘सामाजिक कार्यों’ के लिए और पैसा सरकारी खजाने से मुक्त कर सके। इसका अर्थ है कि ममता सरकार उद्योग धंधों को बंद करके लोगों को और खुद पर निर्भर करना चाहती है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के इस कदम से कई सीमेंट कंपनियाँ बड़ा झटका झेलेंगी। इनमें डालमिया जैसे देश के पुराने और विशाल कारोबारी घराने भी शामिल हैं। यह नुकसान ₹500 करोड़ तक का बताया गया था।

उद्योग धंधों को कोई भी लाभ ना देने का यह कदम पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसे समय में उठाया है जब बाकी राज्य उनके लिए बाँहें खोल कर खड़े हैं। कहीं ₹1 में जमीन दी जा रही है तो कहीं पूरे-पूरे नए शहर बनाए जा रहे हैं, ताकि उद्योग-धंधे उनके यहाँ आ सकें।

ऐलान बड़े, निवेश नहीं

पश्चिम बंगाल में पुरानी कंपनियाँ तो बाहर जा रही हैं, नया निवेश भी सिर्फ घोषणाओं और कागजों में ही आ रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया था कि जनवरी-नवम्बर 2024 में पश्चिम बंगाल में ₹39 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे। उन्होंने दावा किया था कि यह देश में तीसरा सर्वाधिक है।

केंद्र सरकार के एक और विभाग की एक रिपोर्ट इस दावे की सच्चाई खोलती है। भले ही राज्य में बड़े-बड़े निवेश के वादे किए गए हो लेकिन असल में यह वादों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। DPIIT की IEM रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2024 में नवम्बर माह तक ₹3735 करोड़ के निवेश ही हुए थे जबकि वादा कहीं अधिक था।

पश्चिम बंगाल औद्योगिक निवेश के मामले में भी बाक़ी राज्यों के सामने कहीं नहीं ठहरता। यही रिपोर्ट बताती है कि 2020-24 के बीच जहाँ उत्तर प्रदेश में ₹71 हजार करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है तो वहीं इस दौरान पश्चिम बंगाल मात्र ₹15 हजार करोड़ का ही निवेश आकर्षित करने में सक्षम रहा। निवेश आकर्षित करने के मामले में वह झारखंड तक से पीछे है।

बड़े ब्रांड छोड़ रहे बंगाल

पश्चिम बंगाल छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी ही रहा है। 2024 में राज्य में ब्रिटानिया ने अपनी दशकों पुरानी बिस्किट फैक्ट्री को ताला लगा दिया था। यह फैक्ट्री कोलकाता के पास स्थापित थी। इसी तरह कई जूट मिलें भी राज्य में बंद हो चुकी हैं, या फिर अंतिम साँसे गिन रही हैं।

ब्रांड्स के बंगाल छोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है। असल में ममता बनर्जी के राजनैतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ यही एक कारण रहा है। 2008 में राज्य को टाटा मोटर्स ने छोड़ा था, वह सिंगूर में में नैनो की फैक्ट्री लगा रहा था। लेकिन ममता बनर्जी के लगातार विरोध के चलते उसे बनी-बनाई फैक्ट्री उखाड़नी पड़ी और गुजरात भागना पड़ा।

ममता बनर्जी इसी सिंगूर के आंदोलन के बाद ही राज्य में बड़ी जीत हासिल कर पाईं और सत्ता में तीन दशक से अधिक से जमे बैठे कम्युनिस्टों की जगह ली। हालाँकि, जिस नेता के सत्ता में आने का कारण ही किसी उद्योग का विरोध रहा हो, उससे उद्योग समर्थक नीति की उम्मीद करना बेईमानी है।

बताते हैं कि इसी बंगाल में कभी आदित्य बिरला को उनकी गाड़ी से खींच कर सड़क पर पीटा गया था और नंगा कर बेईज्जत किया गया था। इसके बाद उन्होंने अपना कारोबार समेट लिया। यही हाल और भी उद्योग घरानों का हुआ।

क्यों चिंता की बात है बंगाल से उद्योग का पलायन

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का पलायन राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल देश में चौथा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है लेकिन इसका देश के औद्योगिक आउटपुट में मात्र 3.5% हिस्सा है। इसमें पीछे होने के चलते राज्य में भारी बेरोजगारी की समस्या है।

अवैध घुसपैठियों का पश्चिम बंगाल में आना इस समस्या को और भीषण बनाता है। राज्य में आए दिन होते दंगे और बहुसंख्यक आबादी पर हमले भी ब्रांड्स के घटते विश्वास का कारण बने हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था की दयनीय स्थिति के चलते कोई बड़ी कम्पनी निवेश नहीं करना चाहती।

यही कारण है कि 1960 के दशक में जिस पश्चिम बंगाल का देश की जीडीपी में 10% से अधिक योगदान था, वह अब मात्र 5% तक आकर टिक गया है। उससे छोटे राज्य उससे आगे निकलने वाले हैं। यदि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार का यही रवैया रहा तो इससे बाकी देश भी प्रभावित होगा।

उसकी धीमी आर्थिक विकास की गति देश को पीछे खींचेगी।

2050 तक भारत को इस्लामी मुल्क बनाना चाहता था ‘धर्मांतरण गैंग’, यूट्यूब से फंडिंग उठाते थे गुर्गे… फिलिस्तीन को भी भेजे: ‘दावा’ देकर हिन्दुओं को मुस्लिम बनाते थे

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह ने 2050 तक पूरे देश में इस्लाम फैलाने का टारगेट सेट किया था। इसके लिए नए लोगों को जोड़ने में लगे थे। गिरोह का नेटवर्क पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में भी था। इसके अलावा सोशल मीडिया को गिरोह ने हथियार बनाया हुआ था। इसके जरिए पाकिस्तान में बैठे लोगों से बात करते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के छात्र भी गिरोह से जुड़े हैं। छात्र स्लीपर सेल का काम करते हैं। उनका काम सिर्फ हिंदुओं को जाल में फँसाना होता है। आगरा की दो सगी बहनों को भी जम्मू-कश्मीर की ही छात्रा साइमा ने फँसाया था। बाकी गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया का सहारा लेकर हिंदुओं को फँसाते हैं।

गिरोह का पहला काम हिंदुओं से दोस्ती करना होता है। चाहे वह पहचान छिपाकर हो या बताकर हो। फिर ‘दावा’ के लिए न्यौता दिया जाता है। यहाँ दावा का अर्थ है, इस्लाम की ओर खींचना है। इस दौरान हिंदुओं को इस्लाम की अच्छाइयाँ और हिंदू धर्म की बुराइयाँ की जाती हैं। इस ब्रेनवॉश से सामने वाला युवक या युवती आसानी से इस्लाम को मानने लगेगा।

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह में ब्रेनवॉश किए हिंदू युवक और युवतियों को पाकिस्तान के लोगों से जोड़ा जाता है। इस्लाम की किताबें पढ़ने को कहा जाता है। फिर इससे संबंधित सवाल-जवाब करते हैं। जाँच एजेंसी के मुताबिक, इस गिरोह में अब तक जिन युवतियों का धर्मांतरण हुआ है। उन्हें पाकिस्तान के तनवीर अहमद और साहिल अदीम से जोड़ा गया। जाँच एजेंसियाँ इनकी तलाश कर रही हैं।

रहमान कुरैशी फिलिस्तीन को भेजता था फंड

रिपोर्ट्स के मुताबिक, धर्मांतरण गिरोह में अब तक 14 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इनमें से एक है सराय ख्वाजा निवासी रहमान कुरैशी। रहमान धर्म परिवर्तन करने के लिए यूट्यूब चैनल चला रहा था। इसके जरिए क्राउड फंडिंग भी करता था और उन पैसों को फिलिस्तीन की मदद के लिए भेजता था। यह मदद क्रिप्टो करंसी और डॉलर में पहुँचाई जाती थी। पुलिस इसके माध्यम की जाँच में जुटी है।

जानें पूरा मामला

हाल ही में आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया, जिन्हें कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेसक्यु किया गया।

मामले में पुलिस ने 10 आरोपितों को अलग-अलग राज्य से गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ के बाद गिरोह के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद से ही धर्मांतरण गैंग से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

इनमें गोवा से आयशा उर्फ एसबी कृष्णा, कोलकाता से शेखर रॉय उर्फ अली हसन, कोलकाता से ओसामा, आगरा से रहमान कुरैशी, मुजफ्फरनगर अब्बू तालीब, देहरादून से अबुर रहमान, कोलकाता से रित बानिक उर्फ इब्राहिम, जयपुर से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से मुस्तफा उर्फ मनोज, जयपुर से मोहम्मद अली, दिल्ली से सरगना अब्दुल रहमान, दिल्ली से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को गिरफ्तार किया है। इनमें से 11 को 10 दिन की पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है। वहीं, जुनैद कुरैशी, अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को जेल भेजा जा चुका है।

‘अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा’, एफिडेविट ने खोले शब्बीर अहमद के सारे राज: कॉन्ग्रेस ने बनाई 3 वकीलों की टीम, धर्मांतरण के आरोपित का करेगी कानूनी बचाव

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर से धर्मांतरण रैकेट का मामला सामने आया है, जिसमें एक हिंदू युवक को नौकरी की आड़ में धर्मांतरित करने की कोशिश की गई। उसका फर्जी एफिडेविट भी बनवा लिया गया और लगातार उस पर दबाव डाला गया। इस मामले में अल फारुक इंटर कॉलेज के मैनेजर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस बीच, पीड़ित हिंदू युवक के हाथ वो एफिडेविट लगा है, जिससे शब्बीर अहमद के सारे हथकंडे बाहर आ गए हैं। पीड़ित के नाम से बने इस एफिडेविट में लिखा है, ‘अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा।’

मैनेजर मोहम्मद शब्बीर अहमद पर जबरन धर्म बदलवाने का आरोप लगाने वाले अखंड प्रताप सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि 2020 में उन्होंने वहाँ 8-10 दिन बाबू की नौकरी की थी। उस दौरान मैनेजर ने 100 रुपये के खाली एफिडेविट पर एग्रीमेंट के नाम पर उनके हस्ताक्षर करवा लिए।

कुछ दिन बाद मैनेजर ने अखंड प्रताप को एक एफिडेविट दिखाया, जिसमें धर्म बदलने की बात लिखी थी। यह देखकर वे हैरान रह गए और नौकरी छोड़कर चले गए। इसके बाद भी मैनेजर द्वारा लगातार अखंड प्रताप सिंह पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता रहा।  

इंटर कॉलेज से बाबू की नौकरी छोड़ने के बाद अखंड प्रताप सिंह कहते हैं कि वह फर्जी एफिडेविट को लेकर बेहद चिंतित थे और उस एफिडेविट को पाने की जुगत में लग गए। किसी तरह कॉलेज से एफिडेविट उनके हाथ लगा, जिसे पढ़ने के बाद अखंड प्रताप सिंह के पैरों तले जमीन खिसक गई। इंटर कॉलेज के मैनेजर मोहम्मद शब्बीर अहमद द्वारा अखंड प्रताप सिंह के नाम से बनाया गया ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इस एफिडेविट में लिखा था…

  1. मैं कहता हूँ कि मैं धर्म से हिंदू हूँ।
  2. मैं इस्लाम की शिक्षा से बहुत प्रभावित हूँ।  
  3. मैं इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं में आस्था रखता हूँ।
  4. मैंने इस्लाम धर्म अपनी इच्छा से अपनाया है मेरे ऊपर किसी का कोई दबाव नहीं है।
  5. अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा।

15-16 हिंदुओं का धर्मांतरण करा चुका है शब्बीर

आगे ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़ित अखंड प्रताप सिंह ने दावा किया कि इसी तरह मैनेजर शब्बीर अहमद पिछले कुछ वर्षों में 15-16 हिंदुओं का धर्मांतरण करा चुका है। इतना ही नहीं 2018 में ही गोल्हौरा थाना क्षेत्र के निवासी एक यादव के बेटे का शब्बीर ने धर्मांतरण कराया था। आज वह लड़का कहाँ है किसी को नहीं पता। अखंड प्रताप सिंह को आशंका है कि स्कूल में पढ़ाने वाले अन्य हिंदुओं ने भी शब्बीर के प्रभाव में आकर इस्लाम मजहब को अपना लिया है।

अखंड प्रताप सिंह ने दावा किया कि विदेश की धरती से व्हाट्सऐप कॉल पर बात कर रहे मौलाना ने उन्हें इस्लाम में आने की दावत दी थी साथ ही कहा था कि इस्लाम अपनाने पर आपको गाड़ी, गुजरात में रहने के लिए मकान और 20 लाख रुपए की रकम दी जाएगी, लेकिन मौलाना के इस लालच को अखंड प्रताप सिंह ने ठुकरा दिया।

जीप चलाने वाला शब्बीर कुछ वर्षों में बन गया करोड़पति

पहला पार्ट: सिद्धार्थनगर के अल फारुक कॉलेज का मैनेजर शब्बीर अहमद गिरफ्तार, नौकरी के नाम पर करवा रहा था धर्मांतरण: छांगुर पीर से निकला कनेक्शन, शिकायतकर्ता बोला- ₹20 लाख का लालच भी दिया

अखंड प्रताप सिंह का दावा है कि एनजीओ के नाम पर चला रहे इंटर कॉलेज की आड़ में शब्बीर अहमद खाड़ी देशों से चंदा इकट्ठा करता है और फिर उस पैसे से धर्मांतरण के साथ दूसरों के नाम पर अपना बिजनेस करता है। प्रताप सिंह की मानें तो करीब 15-20 वर्ष पहले शब्बीर इटवा-बांसी रोड पर जीप चलाने का काम करता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ही शब्बीर अहमद देखते ही देखते करोड़पति हो गया। अब अखंड प्रताप सिंह ने यूपी पुलिस से शब्बीर अहमद के खातों और संपत्ति की भी जाँच करने की माँग की है।

कॉन्ग्रेस पार्टी लड़ेगी धर्मांतरण के आरोपित शब्बीर अहमद का केस

जबरन धर्मांतरण के आरोप में जेल में बंद शब्बीर अहमद के केस को लेकर उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी(विधि विभाग), लखनऊ ने एक पत्र जारी कर कहा है कि मौलाना शब्बीर अहमद को धर्मांतरण के झूठे केस में गिरफ्तार किया गया है। इनके मुकदमे की पैरवी इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ में एड. रवीन्द्र सिंह, एड. इमरान आसिम खान और एड. सहोदर त्रिपाठी करेंगे।

कॉन्ग्रेस पार्टी लड़ेगी शब्बीर के लिए कानूनी लड़ाई

बता दें कि जबरन धर्मांतरण के मामले में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से छांगुर पीर की गिरफ्तारी के बाद सिद्धार्थनगर के अखंड प्रताप सिंह की शिकायत पर यूपी पुलिस ने अल फारुक इंटर कॉलेज के मैनेजर शब्बीर अहमद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। अब यूपी पुलिस शब्बीर अहमद के छांगुर पीर के कनेक्शन की तलाश कर रही है।

फेसबुक पर फाँसता था आगरा धर्मांतरण गैंग, तीसरी-चौथी बीवी बन जिंदगी सँवारने का देता था लालच: देहरादून की सृष्टि ने खोला राज, आयशा-अब्दुल रहमान का रैकेट कैसे करता है काम

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक बड़े अवैध धर्मांतरण रैकेट का पर्दाफाश हुआ है, जो हिंदू लड़कियों को निशाना बनाकर उन्हें धोखे, लालच और दबाव के जरिए इस्लाम में परिवर्तित करने की साजिश रचता था। इस रैकेट के तार आतंकी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआईएस से जुड़े होने का संदेह है। देहरादून की 21 वर्षीय सृष्टि, जिसका नाम इस गिरोह ने मरियम रखा था, उसने अपनी आपबीती के जरिए इस स्लीपर सेल की पूरी कार्यप्रणाली को उजागर किया है।

सृष्टि ने आज तक से बातचीत में इस रैकेट के हर किरदार और उनकी साजिश का खुलासा किया। आगरा पुलिस ने सात राज्यों में छापेमारी कर 11 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिसमें मास्टरमाइंड अब्दुल रहमान कुरैशी, आयशा उर्फ कृष्णा और अन्य शामिल हैं। यह रिपोर्ट सृष्टि की गवाही के आधार पर इस रैकेट की कार्यप्रणाली, लड़कियों को फँसाने के तरीके और विदेशी फंडिंग के खेल को विस्तार से उजागर करती है।

पढ़ें – सृष्टि की आपबीती, फेसबुक से शुरू हुआ जाल

देहरादून की रहने वाली एक साधारण 21 वर्षीय लड़की सृष्टि साल 2020 में इस रैकेट के जाल में फँसी। उसने बताया, “सब कुछ तब शुरू हुआ जब फेसबुक पर मुतालिब नाम के एक शख्स ने मुझसे संपर्क किया। उसने पहले दोस्ती की और फिर अपने धर्म की बातें शुरू कीं। मुझे इस्लाम के बारे में बताया और धीरे-धीरे मेरे मन में उत्सुकता जगाई।” मुतालिब ने सृष्टि को अपनी बहन सुमैया और शफीया से मिलवाया, ताकि वह उन पर भरोसा करे। इसके बाद सृष्टि का संपर्क आयशा (उर्फ कृष्णा) और दिल्ली के अब्दुल रहमान से करवाया गया।

पुलिस जाँच में पता चला कि यह रैकेट सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म जैसे लूडो के जरिए लड़कियों को निशाना बनाता था। कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि और भावनात्मक रूप से कमजोर लड़कियों को पहले दोस्ती के जाल में फँसाया जाता था। फिर उन्हें इस्लामिक वीडियो, प्रचार सामग्री और वॉयस नोट्स भेजकर रेडिकलाइज किया जाता था।

सृष्टि ने बताया, “मुझे व्हाट्सएप ग्रुप्स में जोड़ा गया, जहाँ जावेद, अब्दुल रहमान उर्फ रूपेंद्र प्रताप और दिल्ली के एक अन्य अब्दुल रहमान जैसे लोग थे। मुझे बार-बार इस्लाम अपनाने और शादी के लिए दबाव डाला गया।”

बेहतर जिंदगी का लालच देकर देते थे झाँसा

सृष्टि ने खुलासा किया कि आयशा ने उसकी आर्थिक स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की। “आयशा ने मुझसे मेरे घर की हालत के बारे में पूछा और फिर लालच दिया कि अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ और किसी की दूसरी, तीसरी या चौथी पत्नी बनने को तैयार हो जाऊँ, तो मुझे बेहतर घर, सुरक्षा और पैसा दिया जाएगा। उसने कहा कि मेरे ऊपर तभी ‘इन्वेस्ट’ किया जाएगा, जब मैं उनकी शर्तें मानूँ।”

यह रैकेट सुनियोजित तरीके से लड़कियों को आर्थिक मदद का लालच देता था। सृष्टि को बताया गया कि अगर वह शादी के लिए तैयार नहीं होती, तो उसकी कोई मदद नहीं की जाएगी। उसे कई लोगों से मिलवाया गया, जिनमें जावेद, अब्दुल रहमान (उर्फ रूपेंद्र), और दिल्ली के एक अन्य अब्दुल रहमान शामिल थे। इन लोगों ने सृष्टि को बार-बार यही कहा कि इस्लामिक नियमों का पालन और शादी ही उनकी मदद की शर्त है।

पुलिस के अनुसार, यह रैकेट लड़कियों को पहले मानसिक रूप से तैयार करता था। उन्हें इस्लामिक नाम चुनने, कलमा पढ़ने और हिजाब पहनने जैसे नियमों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाता था। सृष्टि का नाम बदलकर मरियम रखा गया और उसे वॉयस नोट्स रिकॉर्ड करने को कहा गया, जिसमें वह खुद को कट्टर मुस्लिम बताए। इन नोट्स का इस्तेमाल विदेशों से फंडिंग जुटाने के लिए किया जाता था। खुद सृष्टि ने ये बात स्वीकार की है।

घर से बाहर निकालने की पूरी योजना

इस रैकेट का एक बड़ा हिस्सा लड़कियों को उनके घरों से निकालना था। सृष्टि ने बताया, “झारखंड के अयान ने मुझे कहा कि अगर मैं घर छोड़ना चाहती हूँ, तो मुझे देहरादून के किसी चौक तक अकेले जाना होगा। वहाँ से एक कैब मुझे दिल्ली ले जाएगी। दिल्ली में एक लड़का मुझे 10-12 घंटे की यात्रा के बाद किसी ‘सुरक्षित जगह’ पर छोड़ेगा।”

इस प्रक्रिया में सृष्टि को अपने फोन और सिम को तोड़ने की हिदायत दी गई। आयशा ने उसे सेकेंड-हैंड कीपैड फोन और 4,000-5,000 रुपये की फर्जी सिम दी, ताकि उसकी पहचान और लोकेशन गुप्त रहे।

सृष्टि ने बताया, “मुझे फोन तोड़कर पानी में डुबाने की पूरा तरीका सिखाया गया। मैंने यह सब किया, लेकिन मैं डर गई और घर से नहीं निकली। इसके बाद उन्होंने मेरी मदद बंद कर दी।” जब सृष्टि ने घर छोड़ने से इनकार किया, तो अब्दुल रहमान (उर्फ रूपेंद्र) ने उस पर दबाव डाला कि वह तीसरी या चौथी पत्नी बनने को तैयार हो, वरना कोई मदद नहीं मिलेगी। सृष्टि ने इस दबाव को ठुकरा दिया। इसके बाद रैकेट ने उसे बताया कि उनके पैसे किसी अन्य लड़की पर खर्च हो गए, जो उनके साथ चली गई।

कई देशों से फंडिंग का खेल

आगरा पुलिस की जाँच में सामने आया कि इस रैकेट को अमेरिका, कनाडा, लंदन और दुबई से फंडिंग मिल रही थी। सृष्टि ने बताया, “एक लड़के ने मुझसे मेरी पूरी कहानी लिखने को कहा, ताकि वह उसे सोशल मीडिया पर स्टेटस के रूप में डाल सके और फंड जुटा सके। वह आयशा का फंड मैनेजर था और दूसरी लड़कियों की कहानियाँ भी शेयर करता था।” इन कहानियों और वॉयस नोट्स को विदेशों में प्रचारित कर यह दिखाया जाता था कि लड़कियाँ हिंदू से मुस्लिम बन चुकी हैं, जिसके आधार पर फंडिंग जुटाई जाती थी।

पुलिस ने पाया कि अब्दुल रहमान का भतीजा लंदन से फंडिंग को री-रूट करता था। यह रैकेट आईएसआईएस की तर्ज पर काम करता था, जिसमें अलग-अलग मॉड्यूल थे। एक मॉड्यूल फंडिंग जुटाने का काम करता था, दूसरा रेडिकलाइजेशन का और तीसरा लड़कियों को छिपाने और उनके धर्मांतरण के बाद निकाह की व्यवस्था करता था। जाँच में यह भी संदेह जताया गया कि रैकेट के तार पीएफआई और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं।

जिहादी टीचर आयशा की भूमिका

आयशा उर्फ कृष्णा इस रैकेट की अहम कड़ी थी। सृष्टि ने बताया, “आयशा 18 साल से ऊपर की लड़कियों को निशाना बनाती थी। वह जिहाद का पाठ पढ़ाकर उनका ब्रेनवॉश करती थी। आयशा कई नंबरों का इस्तेमाल करती थी और सेकेंड-हैंड फोन खरीदती थी।” आयशा की गिरफ्तारी गोवा से हुई और उसके फोन से जिहाद से संबंधित वीडियो और प्रचार सामग्री बरामद हुई।

आयशा न केवल लड़कियों को रेडिकलाइज करती थी, बल्कि उन्हें फर्जी सिम और फोन देकर उनकी पहचान छिपाने में मदद करती थी। सृष्टि ने बताया, “मुझे सिखाया गया कि घर से निकलने से पहले फोन तोड़कर पानी में डुबाना है। मुझे एक फर्जी सिम दी गई थी, लेकिन मैंने घर छोड़ने से मना कर दिया।”

कार्रवाई में जुटी आगरा पुलिस, सृष्टि की गवाही अहम

मार्च 2025 में आगरा के सदर बाजार थाने में दो बहनों की गुमशुदगी की शिकायत ने इस रैकेट का पर्दाफाश किया। साइबर सेल की मदद से पुलिस ने कोलकाता में इन बहनों को रेस्क्यू किया और रैकेट के नेटवर्क का पता लगाया। पुलिस आयुक्त दीपक कुमार की अगुआई में 100 सदस्यीय टीम ने सात राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, राजस्थान और झारखंड में छापेमारी कर 11 आरोपितों को गिरफ्तार किया। इनमें अब्दुल रहमान कुरैशी, आयशा, मोहम्मद अली और ओसामा शामिल हैं।

पुलिस ने अब्दुल रहमान के घर से धर्मांतरण से जुड़ी किताबें और मौलाना कलीम सिद्दीकी की लिखी प्रचार सामग्री बरामद की। सृष्टि की गवाही ने इस रैकेट के हर किरदार को बेनकाब किया। उसने बताया, “मुझे कलमा पढ़ने और इस्लामिक नाम चुनने के लिए मजबूर किया गया। दिल्ली के अब्दुल रहमान ने मुझसे वॉयस नोट माँगा, जिसमें मुझे कहना था कि मैं कट्टर मुस्लिम हूँ और हिजरत करना चाहती हूँ। यह नोट विदेशी फंडिंग के लिए इस्तेमाल होता था।”

खतरनाक स्तर पर सक्रिय हैं धर्मांतरण गिरोह के स्लीपर सेल

पुलिस ने सात राज्यों में दर्जनों लड़कियों को ट्रेस किया, जिनमें से कई इतनी रेडिकलाइज हो चुकी हैं कि काउंसलिंग का असर नहीं हो रहा। एक पीड़िता की तस्वीर AK-47 के साथ सामने आई, जो इस रैकेट की खतरनाक मंशा को दर्शाती है। यह रैकेट न केवल धर्मांतरण बल्कि आतंकी गतिविधियों के लिए भी लड़कियों को तैयार करता था।

सृष्टि ने कहा, “मैं इस जाल से बाहर निकल पाई, लेकिन कई लड़कियाँ अभी भी फँसी हैं। मैं चाहती हूँ कि लोग इस साजिश को समझें और ऐसी गलती न करें।” उसकी गवाही न केवल इस रैकेट को तोड़ने में मददगार रही, बल्कि उन लड़कियों को खोजने में भी सहायक होगी, जो इस गिरोह के चंगुल में गायब हो चुकी हैं।

आगरा धर्मांतरण रैकेट का खुलासा देश में फैले स्लीपर सेल नेटवर्क की गंभीरता को उजागर करता है। यह रैकेट सोशल मीडिया, विदेशी फंडिंग और संगठित मॉड्यूल के जरिए हिंदू लड़कियों को निशाना बनाता था। सृष्टि की साहसी गवाही और आगरा पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने इस साजिश को बेनकाब किया।

यूपी एटीएस और पुलिस अब इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों और फंडिंग के स्रोतों की तह तक जाने के लिए जाँच कर रही है। यह मामला समाज के लिए एक चेतावनी है कि सोशल मीडिया पर अनजान लोगों से सावधान रहें और किसी भी लालच में न आएँ।

सुंदरवन की डेमोग्राफी बदली, हिन्दू भी करने लगे मुस्लिम ‘देवी’ की पूजा: मुर्शिदाबाद हिंसा की दिल दहला देने वाली तस्वीरों की प्रदर्शनी, ये है ग्राउंड की सच्चाई

नई दिल्ली स्थित कंस्टीटूशन क्लब में शुक्रवार (25 जुलाई, 2025) को Organiser मीडिया संस्थान द्वारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अप्रैल 2025 में हुई हिंसा की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई गई। इसका उद्देश्य था कि लोग इस हिंसा को भूलें नहीं और न्याय मिलने की दिशा में बहस आगे बढ़े। पत्रकार निशांत आज़ाद वहाँ ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए थे और ये तस्वीरें उन्होंने ही वहाँ से लाईं। ख़तरा मोल लेकर इस तरह की बहादुरी भरी रिपोर्टिंग के लिए लोगों ने उनकी प्रशंसा की।

मुर्शिदाबाद में इस्लामी हिंसा की तस्वीरें, कब मिलेगा न्याय?

इस अवसर पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता, पूर्व राज्यसभा सांसद व पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता, लेखक एवं ‘द प्रिंट’ में कंट्रिब्यूटिंग एडिटर दीप हलदर और Organiser के संपादक प्रफुल्ल केतकर के अलावा आसनसोल (दक्षिण) विधानसभा क्षेत्र की विधायक व पश्चिम बंगाल भाजपा की जनरल सेक्रेटरी अग्निमित्रा पॉल मौजूद थीं।

इन तस्वीरों में हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की विधवाओं और उनके घर के बच्चों की हृदय विदारक तस्वीरें भी शामिल थीं। साथ ही हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों की तस्वीरें भी थीं। इसके अलावा हिंसक इस्लामी भीड़ ने किस तरह गाड़ियों को जलाया, ये भी लोगों ने देखा।

कंस्टीटूशन क्लब में आयोजित इस प्रदर्शनी के दौरान वक्ताओं ने पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा, बदलती जनसांख्यिकी और राजनीतिक चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए। वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने कहा, “पश्चिम बंगाल पश्चिम बांग्लादेश बनने की कगार पर है। अगर आज भी लोग चुप रहे तो आने वाले समय में बंगाल का स्वरूप पहचानना मुश्किल हो जाएगा।”

प्रफुल्ल केतकर, संपादक, Organiser ने कहा, “यह मामला केवल टीएमसी बनाम बीजेपी या पहले का टीएमसी बनाम सीपीएम तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाएँ और अनुसूचित जाति के लोग हैं। हिंदू समाज, जो देश की धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक माना जाता है, आज हिंसा का सबसे बड़ा शिकार बन गया है।”

मंदिरों का ध्वस्तीकरण, मूर्तिकारों की हत्या

आसनसोल (दक्षिण) की विधायक अग्निमित्रा पॉल ने अपने संबोधन में कहा कि “मुर्शिदाबाद में 9 हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। यह वही भूमि है जो शक्ति की भूमि कहलाती है – माँ दुर्गा, माँ काली की मूर्तियों को अपवित्र किया गया। जलापूर्ति के स्रोतों को काट दिया गया और जलाशयों को जहर देकर दूषित किया गया। शमशेरगंज के ओसी शिव प्रसाद घोष ने कोई कार्रवाई नहीं की और बीएसएफ को निष्क्रिय बैठा दिया गया।”

उन्होंने आगे बताया कि “मूर्ति बनाने वाले हरगोविंद दास और चंदन दास की नृशंस हत्या कर दी गई। यह हमला न इसलिए हुआ कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े थे या उन्होंने विरोध किया था, बल्कि इसलिए कि वे हिंदू थे। यह हिंसा अचानक नहीं हुई, बल्कि यह टीएमसी नेता इनामुल हक की साजिश के तहत पूर्व-नियोजित थी। कोलकाता हाईकोर्ट ने भी इस पर सख्त टिप्पणियाँ की हैं।”

वक्ताओं ने इस हिंसा की तुलना कश्मीर के हालात से करते हुए कहा कि बंगाल और कश्मीर में हिंसा का तरीका लगभग एक जैसा है। मस्जिदों से भीड़ को भड़काया गया और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करवाई गई। हम नहीं चाहते कि आसनसोल भी अनंतनाग बन जाए। यह विधानसभा चुनाव का मुद्दा नहीं है, यह अस्तित्व का सवाल है।

कंचन गुप्ता ने जनसांख्यिकी में हो रहे बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा, “पश्चिम बंगाल की जनगणना में हिंदू आबादी का अनुपात तेजी से घट रहा है। 1/4, 1/3, 1/2 के आँकँड़े यह संकेत देते हैं कि मुर्शिदाबाद बंगाल के पतन का एक और मील का पत्थर है। पुलिस की थोड़ी भी सक्रियता से हालात बदले जा सकते थे। लेकिन प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद रही।”

सुंदरबन की डेमोग्राफी बदली, ‘बोनबीबी’ की पूजा

कंचन गुप्ता ने कहा कि सुंदरबन की जनसांख्यिकी पूरी तरह बदल चुकी है और हिन्दू भी अब मुस्लिम ‘देवी’ बोनबीबी की पूजा कर रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि कैसे तबलीगी जमात लगातार सुंदरबन, सिलीगुड़ी और झारखंड में कैंप लगा रही है। बांग्लादेश से समुद्री रास्तों और मुहानों से घुसपैठ हो रही है। ममता बनर्जी अब बंगाली बनाम बीजेपी शासित राज्यों का नैरेटिव खड़ा कर रही हैं। बंगाल की भाषा उर्दू असर में आ रही है। यहां तक कि उनके आधिकारिक लेटरहेड पर बंगाली नहीं बल्कि उर्दू और अंग्रेज़ी प्रमुख हो गई है। उन्होंने पूछा कि क्या यही बंगाली अस्मिता है?

दीप हलदर, लेखक और ‘द प्रिंट’ में कंट्रिब्यूटिंग एडिटर, ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अगर ‘पंचायत’ सीरीज बनती तो उसका नाम ‘मिर्ज़ापुर’ हो जाता क्योंकि वहाँ हिंसा से पंचायत चुनाव भी अछूता नहीं है। यह मज़ाक नहीं, बल्कि भयावह यथार्थ है। बंगाल और बांग्लादेश में एकमात्र फर्क यह है कि बांग्लादेश का बौद्धिक वर्ग अब जागरूक है, जबकि यहां चुप्पी साधी हुई है।”

कार्यक्रम के अंत में विहिप प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा, “अब बंगाली हिंदुओं को पलायन की नहीं, पराक्रम की आवश्यकता है। उन्हें अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए संगठित होना होगा।”

अंग्रेजी नहीं बोल पाते, ADM की जिम्मेदारी संभाल कैसे पाएँगे: याचिका का जवाब हिंदी में देने पर उत्तराखंड HC ने PCS अधिकारी पर उठाया सवाल, मुख्य सचिव और SEC को मिले उनकी काबिलियत जाँचने के निर्देश

नैनीताल के ADM और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के तौर पर कार्यरत PCS अधिकारी उत्तराखंड हाई कोर्ट में अंग्रेजी नहीम बोल पा रहे थे। उन्होंने कोर्ट से हिंदी में बातचीत की गुजारिश की और अंग्रेजी बोलने में असमर्थता जताई। इसके बाद कोर्ट ने उनकी काबिलियत की जाँच करने के आदेश दे दिए हैं।

दरअसल यह मामला पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ा था जिस पर PCS अधिकारी जवाब दे रहे थे। इसमें केवल परिवार रजिस्टर के आधार पर नाम जोड़ने की वैधता पर सवाल उठे हैं।

चीफ जस्टिस जी नरेंद्र और जस्टिस आलोक माहरा की खंडपीठ ने अंग्रेजी न बोल पाने के मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए राज्य निर्वाचन आयुक्त (SES) और उत्तराखंड के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे जाँच करें कि क्या अंग्रेजी में बात न कर पाने वाला कोई अधिकारी कार्यकारी जिम्मेदारियाँ प्रभावी ढंग से निभा सकता है। इस प्रकरण की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होनी है।

अदालत में क्या हुआ?

मामला पंचायत मतदाता सूची में प्रविष्टियों को लेकर दायर एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें केवल परिवार रजिस्टर के आधार पर नाम जोड़ने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया।

कोर्ट को बताया गया कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा नामांकन के लिए बूथ स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर परिवार के किसी प्रतिनिधि से सदस्यों के नाम इकट्ठा करते हैं और बिना किसी अतिरिक्त दस्तावेज या सत्यापन के उन्हें मतदाता सूची में दर्ज कर लेते हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया कि इस प्रक्रिया में कोई वैधानिक दस्तावेजी साक्ष्य या क्रॉस वेरिफिकेशन नहीं होता, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका बढ़ जाती है। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या नाम जोड़ने से पहले परिवार रजिस्टर की एंट्री की सत्यता की पुष्टि के लिए कोई प्रमाण या साक्ष्य इकट्ठा किए जाते हैं?

इसके जवाब में अधिकारियों ने बताया कि परिवार रजिस्टर को ही अंतिम प्रमाण मानकर उसी के आधार पर नाम दर्ज किए जा रहे हैं। जब ADM अदालत में पेश हुए तो उन्होंने हिंदी में जवाब दिया।

अंग्रेजी दक्षता का मुद्दा

अदालत ने अंग्रेजी में बात न करने की वजह पूछे जाने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अंग्रेजी समझ सकते हैं लेकिन बोलने में समस्या होती है। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि क्या इस स्तर का अधिकारी, जो अंग्रेजी में बात करने में सक्षम नहीं है, वह उच्च स्तर के प्रशासनिक या संवैधानिक कार्यों को प्रभावी रूप से संचालित कर सकता है?

इसके साथ ही याचिका पर बेंच ने टिप्पणी दी कि यदि यह तरीका राज्य भर में अपनाया जा रहा है, तो यह मतदाता सूची की पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाता है।

कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई में वीडियो कॉल के जरिए मौजूद होकर इस मुद्दे पर अपनी बात रखें और हलफनामे के माध्यम से कोर्ट को अपनी ओर से जवाब दें।

यह मामला न केवल प्रशासनिक दक्षता बल्कि चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ है, जिसे उच्च न्यायालय ने गंभीरता से लिया है।

झारखंड में ST महिलाओं को नौकरी का झाँसा देकर किया जा रहा रेप, फिर डाला जाता है धर्मांतरण का दबाव: आफताब अंसारी गिरफ्तार, साहिबगंज में पहला नहीं है ऐसा मामला

झारखंड में आफताब अंसारी नाम के व्यक्ति ने जनजातीय महिला को नौकरी का झाँसा दिया। इसके बाद दुकान पर बुलाकर उसके साथ रेप किया। इसके बाद उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाकर धमकी भी दी।

जानकारी के अनुसार, आफताब अंसारी ने एक शादीशुदा जनजातीय महिला को अच्छी नौकरी दिलाने का झाँसा देकर अपने जाल में फँसाया। इसके लिए उसने उसे अर्शी गारमेंट्स नाम की एक दुकान पर बुलाया था।

जब महिला दुकान पर पहुँची तो आफताब ने खुद को दुकान का मालिक बताया। इसके बाद वह उसे दुकान के पीछे लेकर गया। महिला के वहाँ पहुँचते ही उसने दरवाजा बंद कर उसके साथ रेप किया और उसका वीडियो भी बनाया। इसके बाद आरोपित आफताब ने महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। जब उसने इनकार किया, तो उसने उसके परिवार वालों को धमकियाँ दी।

झारखंड में इस तरह का मामला कोई पहला नहीं है बल्कि इस तरहल के मामले वहाँ जब तब सामने आ ही जाते हैं। पत्रकार शुभी विश्वकर्मा ने इस तरह के मामलों के लिए लगभग 8 महीने पहले ग्राउंड रिपोर्टिंग कर वहाँ के स्थानीय लोगों से बात की। उन्होंने एक्स पर एक जानकारी साझा की है।

शुभी ने लिखा, “झारखंड के साहिबगंज इलाके में गए, जहाँ ऐसे मियाँ भाइयों द्वारा आदिवासी महिलाओं को फँसाना आम बात है। यहाँ पर जिनमें ज्यादातर महिलाएँ शादीशुदा हैं। इसके बावजूद उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं और हिंदू बस्तियों के बाहर बस जाते हैं। दिन-ब-दिन जमाई लोगों की ये बस्तियाँ बढ़ती जा रही हैं, जबकि जनजातीय आबादी घटती जा रही है।

अपनी रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने पंचायत अध्यक्ष से मुलाकात की। इस बारे में शुभी ने लिखा, “हमारी मुलाकात मोनिका किस्कू से हुई, जो एक पंचायत अध्यक्ष थीं और जिन्हें उमेद ने सबसे पहले अपने जाल में फँसाया था। उनके निधन के बाद, उनके भाई अली ने उनसे शादी कर ली। एक छोटी सी बस्ती में, अली और उनके परिवार का एक बड़ा सा घर है, जो इस बात को सही ठहराता है कि ये मियाँ भाई राजनीतिक ताकत, जमीन हड़पने और पहचान की चोरी के लिए जनजातीय महिलाओं से शादी करते हैं।”

शुभी ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) पार्टी पर सवाल करते हुए लिखा, “मोनिका के मामले में, उन्होंने अपना नाम नहीं बदला है, क्योंकि नाम बदलने से उन्हें जनजातीय महिला होने के नाते मिलने वाले सभी लाभ और सबसे बढ़कर आदिवासी सीट से चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित होना पड़ेगा। अली एक स्थानीय झामुमो (JMM) नेता हैं। अब आप गणित समझ गए होंगे। यह सब चुपचाप, हर दिन होता रहा है।”

गौरतलब है कि जनजातीय महिलाओं के साथ झारखंड में होने वाली ये घटनाएँ नई नहीं हैं। इससे पहले झारखंड के सरायकेला- खरसावाँ में एक मुस्लिम युवक को अपने से 13 वर्ष छोटी जनजातीय लड़की का धर्मांतरण करवाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। मुस्लिम युवक ने लड़की का धर्मांतरण करवाने के बाद उसे पश्चिम बंगाल ले जाकर निकाह भी कर लिया था।

स्थानीय लोगों ने बताया था कि 32 साल के तस्लीम आलम ने 19 वर्षीय जनजातीय समाज की लड़की का अपहरण किया। इसके बाद जबरन उसका धर्मांतरण करवाया गया। शिकायत के बाद पुलिस ने तस्लीम को गिरफ्तार कर लिया था। साल 2023 झारखंड की राजधानी रांची में इरशाद अंसारी नामक युवक के ब्लैकमेल से परेशान हो एक जनजातीय महिला ने आत्महत्या कर ली थी।

इरशाद अंसारी ने महिला के साथ बलात्कार कर उसका वीडियो बना लिया था। इसके बाद वह महिला को वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहा था। इससे परेशान होकर महिला ने 29 जुलाई 2023 को अपने घर में फाँसी लगा ली थी।

मृतक महिला के देवर ने पुलिस को बताया था कि करीब ढाई महीने पहले उसकी भाभी को कुत्ते ने काट लिया था। इसी को लेकर आरोपित इरशाद अंसारी उन्हें रेबीज का इंजेक्शन लगवाने के लिए हॉस्पिटल ले गया था। इसी दौरान उसने बलात्कार कर उनका अश्लील वीडियो बना लिया था। इसके बाद से वह मृतक महिला को लगातार परेशान कर रहा था।

इस तरह रेप कर धर्मांतरण के कई मामले सुर्खियों में आ चुके हैं। इन पर लागातार कार्रवाई की माँग भी उठती रही है लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कदम उठते नजर नहीं आ रहे हैं।