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‘क्या अपने पक्ष में चाहते थे जाँच रिपोर्ट’: सुप्रीम कोर्ट ने ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा से पूछा, कहा- दायर ही नहीं होनी चाहिए थी आपकी याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने ‘घर से निकले जले नोट’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा को सोमवार को जमकर लताड़ लगाई। जाँच रिपोर्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा, “अगर जस्टिस वर्मा को जाँच प्रक्रिया में दिक्कत थी, तो समिति के सामने पेश क्यों हुए। क्या अपने पक्ष में रिपोर्ट चाहते थे?”

सुप्रीम कोर्ट की इन हाउस कमेटी ने जस्टिस वर्मा को इस मामले में दोषी पाया था। इसके खिलाफ जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, “ये याचिका दायर ही नहीं होनी चाहिए थी।”

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की खंडपीठ ने कहा कि याचिका में माँगी गई राहत दरअसल सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ही है।

कोर्ट ने पूछे जस्टिस वर्मा के वकील से सवाल

जस्टिस दत्ता ने कहा, “अगर जस्टिस वर्मा को जाँच प्रक्रिया में दिक्कत थी, तो जाँच कमेटी के सामने क्यों पेश हुए, क्या आप जाँच के पूरा होने और रिपोर्ट के आने का इंतजार कर रहे थे। क्या आप अपने पक्ष में रिपोर्ट चाहते थे। आप उस वक्त ही कोर्ट की शरण में क्यों नहीं आए?”

जस्टिस ने कहा कि याचिका में असली आपत्ति सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया पर है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से ऐसी चूक कैसे हो गई? कोर्ट से साफ किया है कि वह रिकॉर्ड से बाहर के किसी दस्तावेज पर विचार नहीं करेंगे। जस्टिस दत्ता ने कहा, ” अगर आप रिपोर्ट पर बहस करना चाहते हैं तो उसे रिकॉर्ड में लाना जरूरी है।”

समिति की प्रक्रिया पर कोर्ट ने साफ किया, “समिति ने प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखी है। ये सिर्फ एक अनुशंसा है, फैसला नहीं।”

जस्टिस वर्मा की दलीलें

जस्टिस वर्मा के वकील कपिल सिब्बल ने जब संविधान का हवाला दिया, तो टॉप कोर्ट ने पूछा, ” क्या कहीं ये लिखा है कि इन हाउस समिति जाँच नहीं कर सकती है।”

जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की थी, जो असंवैधानिक और उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। सुनवाई के दौरान ये भी तर्क कपिल सिब्बल ने दिया कि अगर नकदी बरामद हुई थी तो ये किसकी थी? कितनी थी और उसे जस्टिस वर्मा के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है?

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही किसी बड़े ज्यूडिशियल ऑफिसर को इसकी जानकारी दी थी।

महिला डॉक्टर ने पढ़ रखी थी ‘गीता’, इसलिए ब्रेनवॉश नहीं कर पाया आगरा का ‘मुस्लिम गैंग’: फिर ‘दोस्त’ जुनैद ने किया रेप, काजी के पास ले जाकर जबरन धर्मांतरण-निकाह

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह के जाल में हरियाणा की हिंदू डॉक्टर भी फँस चुकी है। अब्दुल रहमान के शागिर्द जुनैद ने डॉक्टर संग धोखे से निकाह किया। इसके बाद भी डॉक्टर उसकी बातों में पूरी तरह नहीं आई तो रेप किया। अब गिरोह का खुलासा होने पर डॉक्टर ने सामने आकर आपबीती सुनाई। अब कोर्ट में बयान दर्ज किए जाएँगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के झज्जर निवासी 25 वर्षीय युवती होम्योपैथी की पढ़ाई करने ओडिशा गई थी। पिता मजदूरी कर जैसे-तैसे पढ़ाई का खर्च उठा रहे थे, इसीलिए युवती ने अपने खर्च के लिए नौकरी की तलाश शुरू की, तब उसकी मुलाकात गिरोह की आयशा उर्फ एसबी कृष्णा से हुई।

आयशा ने ही युवती को जुनैद से मिलवाया। दोनों का ग्रुप बनाकर बातचीत शुरू करवाई। इस दौरान जुनैद ने युवती का ब्रेनवॉश करने की कोशिश की, लेकिन युवती को गीता का ज्ञान होने के चलते जुनैद अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ। युवती ने बताया कि एक रोज जब वह अपने घर हरियाणा जा रही थी, तब जुनैद ने उसे दिल्ली में मिलने बुलाया।

युवती के मुताबिक, दिल्ली में जुनैद उसे एक काजी के घर ले गया। यहाँ धोखे से निकाह भी कर लिया। काजी के घर से बाहर निकले तो जुनैद ने युवती से कहा, “अब तुम मेरी बेगम बन गई हो। हमारा निकाह हो गया है।”

युवती ने इसका विरोध किया, लेकिन जुनैद युवती को अपने साथ रखने का दबाव बनाने लगा। युवती को बदनाम करने की धमकी देने लगा। युवती ने बताया कि जुनैद ने उसका रेप भी किया और वीडियो बनाकर धर्मांतरण के लिए ब्लैकमेल करने लग गया।

युवती भी जुनैद के चंगुल से पीछा छुड़ाना चाहती थी। इसी बीच आगरा से जुड़े धर्मांतरण गैंग का खुलासा हुआ। तब पुलिस ने युवती से संपर्क किया और अपनी आपबीती सुनाई। पुलिस ने युवती और उसके पिता को आगरा बुलाकर बयान दर्ज कराए हैं। जल्द ही कोर्ट में भी युवती के बयान दर्ज कराए जाएँगे।

बता दें कि आगरा पुलिस ने धर्मांतरण गिरोह से जुड़ी जाँच में ही जुनैद कुरैशी को जयपुर से गिरफ्तार किया था। फिलहाल जुनैद 10 दिन की पुलिस कस्टडी में है। जुनैद ने हरियाणा की डॉक्टर समेत अन्य हिंदू लड़कियों को फँसाया है। जुनैद गैंग के सरगना अब्दुल रहमान का शागिर्द है।

जानें पूरा मामला

19 जुलाई 2025 आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया, जिन्हें कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेसक्यू किया गया।

मामले में पुलिस ने 10 आरोपितों को अलग-अलग राज्य से गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ के बाद गिरोह के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद से ही धर्मांतरण गैंग से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

इनमें गोवा से आयशा उर्फ एसबी कृष्णा, कोलकाता से शेखर रॉय उर्फ अली हसन, कोलकाता से ओसामा, आगरा से रहमान कुरैशी, मुजफ्फरनगर अब्बू तालीब, देहरादून से अबुर रहमान, कोलकाता से रित बानिक उर्फ इब्राहिम, जयपुर से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से मुस्तफा उर्फ मनोज, जयपुर से मोहम्मद अली, दिल्ली से सरगना अब्दुल रहमान, दिल्ली से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को गिरफ्तार किया है।

इनमें से 11 को 10 दिन की पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है। वहीं, जुनैद कुरैशी, अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को जेल भेजा जा चुका है।

‘महाराज बहुत हो गया अब रोक दीजिए’: राजनाथ सिंह ने संसद से बताया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से कैसे पाकिस्तान कर रहा था बाप-बाप, इधर कश्मीर में ‘ऑपरेशन महादेव’ में पहलगाम अटैक का मास्टरमाइंड ढेर

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले पर सरकार का पक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक सफलता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 6-7 मई 2025 की रात भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, जिसका उद्देश्य पहलगाम हमले का बदला लेना और आतंकवाद की नर्सरियों को नष्ट करना था। इस कार्रवाई में 100 से अधिक आतंकी और उनके हैंडलर मारे गए।

रक्षामंत्री ने कहा कि पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में आतंकियों ने पर्यटकों से धर्म पूछकर 26 लोगों की हत्या की थी, जिसमें ज्यादातर हिंदू थे। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी।

इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने सेना को निर्णायक कार्रवाई की छूट दी। भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में सिर्फ 22 मिनट में सभी आतंकी हमलों को हिट किया और 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया।

इसके बाद पाकिस्तान की ओर से हमले 7 मई से 10 मई की रात 1 बजकर 30 मिनट तक मिसाइल और लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया। उसके निशाने पर हमारे सैन्य अड्डे थे। हमारा डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम कर दिया और पाकिस्तान किसी भी टार्गेट को हिट नहीं कर पाया। भारत के रक्षा तंत्र ने सभी हमलों को विफल कर दिया।

राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान एक भी लक्ष्य को हिट नहीं कर पाया। इसके जवाब में 10 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयरफील्ड पर करारा प्रहार किया, जिसके बाद पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत से संपर्क कर कार्रवाई रोकने की अपील की।

रक्षामंत्री ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन को केवल पॉज किया गया है और यदि पाकिस्तान ने फिर उकसाया तो इसे दोबारा शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन युद्ध छेड़ने के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद को खत्म करने के लिए था, जिसमें भारत ने अपने सभी लक्ष्य हासिल किए।

ऑपरेशन महादेव में हासिम मूसा समेत 3 आतंकी ढेर, जारी है एनकाउंटर

वहीं, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन महादेव के तहत श्रीनगर के लिदवास में 28 जुलाई को सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों सुलेमान साहा, अबु हमजा और यासिर को मार गिराया। चिनार कॉर्प्स के अनुसार, मुठभेड़ सुबह 11:30 बजे शुरू हुई, जब 24 राष्ट्रीय राइफल्स और 4 पैरा ने आतंकियों को घेर लिया।

मारे गए आतंकी सुलेमान साहा को मीडिया रिपोर्ट्स में हासिम मूसा बताया जा रहा है, जो पहलगाम आतंकी हमले का मास्टरमाइंड था।

आतंकियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और ग्रेनेड बरामद हुए। माना जा रहा है कि ये आतंकी पहलगाम हमले से जुड़े थे, जिसके लिए एनआईए ने पहले दो आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ऑपरेशन अभी जारी है, क्योंकि एक अन्य आतंकी की तलाश चल रही है।

रक्षामंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि वे सही सवाल नहीं पूछ रहे। उन्होंने जोर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक शक्ति का प्रतीक है। भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता पर किसी भी हमले का करारा जवाब देगा।

राजनाथ सिंह ने कॉन्ग्रेस पर तंज करते हुए कहा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को दोनों देशों की डायलॉग प्रॉसेस से 2009 की सरकार ने डीलिंक कर दिया था। साल 2006 में यह मान लिया गया था कि पाकिस्तान आतंक से पीड़ित है। इसने भारत की रणनीति को कमजोर किया। हमारे डेलिगेशन ने दुनिया के देशों में जाकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत के स्टैंड को प्रभावी तरीके से रखा।

रक्षामंत्री ने कहा, “पीएम मोदी ने भी कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर रुका है, समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान अगर फिर कोई हरकत करता है, तो हम और भी कठोर कार्रवाई करेंगे। पाकिस्तान के मन में गलतफहमी थी, उसे हमने ऑपरेशन सिंदूर से दूर कर दिया। अगर कुछ बचा होगा तो उसे भी दूर कर देंगे।”

SIR से अभी ‘पूर्ण स्वच्छ’ नहीं हुआ है बिहार का वोटर लिस्ट? चुनाव आयोग ने 65 लाख ‘मुर्दा-फ्रॉड-घुसपैठिए’ पहचाने, IIM प्रोफेसरों के रिसर्च ने 77 लाख ‘फर्जी मतदाताओं’ का लगाया है अनुमान

बिहार में चुनाव आयोग की ओर से चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान का पहला चरण पूरा हो चुका है। 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चले इस अभियान के दौरान राज्य के कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने अपने फॉर्म जमा किए, जो कुल का 91.69% है।

लेकिन इस प्रक्रिया में करीब 65 लाख मतदाताओं के नामों पर सवाल उठे हैं, जिनमें से 36 लाख का कोई अता-पता नहीं है, 22 लाख की मौत हो चुकी है और 7 लाख नामों में दोहराव पाया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये आँकड़े अंतिम नहीं हैं, क्योंकि 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे और आपत्तियाँ स्वीकार की जाएँगी।

इसी बीच, आईआईएम के दो प्रोफेसरों की हालिया स्टडी ने दावा किया है कि बिहार की वोटर लिस्ट में असली फर्जीवाड़ा 77 लाख तक हो सकता है, जो SIR के नतीजों से भी ज्यादा है। इससे सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग ने अब तक कोई कड़ा कदम उठाया है?

चुनाव आयोग की प्रेस नोट के मुताबिक, SIR का मुख्य उद्देश्य सभी योग्य मतदाताओं को शामिल करना और कोई भी पात्र व्यक्ति को छूटने न देना था। राज्य में 38 जिलों, 243 विधानसभा क्षेत्रों और 77,855 पोलिंग बूथों पर यह अभियान चलाया गया।

चुनाव आयोग ने दिए ये आँकड़े (फोटो साभार: चुनाव आयोग)

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) बिहार, जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) और बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) की टीम ने घर-घर जाकर फॉर्म बांटे और कम से कम तीन बार विजिट की। इसके अलावा 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के 1.60 लाख बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। BLA की संख्या SIR के दौरान 18% बढ़ गई, जो दलों की भागीदारी को दर्शाता है।

आयोग ने विशेष रूप से प्रवासी, शहरी और युवा मतदाताओं पर फोकस किया। प्रवासियों के लिए हिंदी में पूरे देश के 246 अखबारों में विज्ञापन दिए गए, जिनकी कुल सर्कुलेशन 2.60 करोड़ थी। साथ ही, CEO बिहार ने अन्य राज्यों के CEO को पत्र लिखकर बिहार के प्रवासियों तक पहुँचने का अनुरोध किया। प्रवासियों ने ऑनलाइन पोर्टल voters.eci.gov.in या ECI ऐप के जरिए 16 लाख फॉर्म भरे, जबकि 13 लाख ने फॉर्म डाउनलोड किए।

हरी इलाकों में विशेष कैंप लगाए गए और युवाओं (18-19 साल) को शामिल करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए। कुल 5.7 करोड़ मोबाइल नंबरों पर SMS भेजे गए और राजनीतिक दलों के साथ कई मीटिंग्स हुईं। BLO ने BLA के साथ बूथ लेवल मीटिंग्स कीं और BLA को प्रति दिन 50 फॉर्म जमा करने की अनुमति दी गई।

आईआईएम के 2 प्रोफेसरों के रिसर्च पेपर में आँकड़े अलग

लेकिन SIR के इन नतीजों से ठीक पहले जुलाई 2025 में आईआईएम कलकत्ता के पूर्व छात्र और वर्तमान प्रोफेसर डॉ. विदु शेखर (एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च) और डॉ. मिलन कुमार (आईआईएम विशाखापत्तनम) की स्टडी ने बड़ा खुलासा किया। “Estimating Legitimate Voter Numbers in Bihar (2025): A Demographic and Migration-Based Reconstruction” नाम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार में असली योग्य मतदाताओं की संख्या सिर्फ 7.12 करोड़ हो सकती है, जबकि आधिकारिक रोल में 7.89 करोड़ हैं। यानी 77 लाख (9.7%) का अंतर है।

यह स्टडी डेमोग्राफिक और माइग्रेशन डेटा पर आधारित है, जिसमें 2003 के वोटर लिस्ट से सर्वाइवर्स, 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स और 2003-2025 के बीच पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन को कैलकुलेट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 में 4.6 करोड़ वोटर्स थे, जिनमें से 2025 तक सिर्फ 4.1 करोड़ जिंदा बचे हैं (मोर्टैलिटी रेट को ध्यान में रखकर)। 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स 4.83 करोड़ हैं। लेकिन पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन (अन्य राज्यों में स्थाई रूप से बस जाना) 1.12 करोड़ है, जो मुख्य रूप से रोजगार, शादी और फैमिली मूवमेंट के कारण है।

फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

स्टडी ने 2011 की जनगणना, जीवित बचे लोगों की अनुमानित संख्या और अन्य सरकारी विभागों के डेटा का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट कहती है कि वोटर लिस्ट में इन्फ्लेशन की वजहें हैं- माइग्रेंट्स का नाम नहीं हटना, डुप्लिकेट एंट्रीज और अनडॉक्यूमेंटेड रजिस्ट्रेशन। स्टडी ने कंजर्वेटिव एस्टिमेट्स इस्तेमाल किए, जैसे माइग्रेशन रेट को 2011 के बाद नहीं बढ़ाया, ताकि आँकड़ा ज्यादा न लगे।

SIR के 65 लाख संदिग्ध नामों और आईआईएम स्टडी के 77 लाख के अंतर को जोड़कर देखें, तो साफ है कि समस्या गहरी है। SIR में 36 लाख लापता, 22 लाख मृत और 7 लाख डुप्लिकेट पाए गए, लेकिन स्टडी कहती है कि ये संख्या और बड़ी हो सकती है, क्योंकि माइग्रेशन को पूरी तरह अकाउंट नहीं किया गया।

उदाहरण के लिए, बिहार से हर साल लाखों लोग दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे राज्यों में जाते हैं, लेकिन उनका नाम लिस्ट से नहीं हटता। इससे डबल रजिस्ट्रेशन होता है और चुनाव में फ्रॉड का खतरा बढ़ता है।

फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

बिना आदेश के नहीं हटाए जाएँगे नाम

बता दें कि चुनाव आयोग ने SIR के 10 उद्देश्यों का जिक्र किया है, जिनमें सभी मतदाताओं की भागीदारी, कोई पात्र न छूटे, प्रवासियों और युवाओं को शामिल करना शामिल है। आयोग ने दावा किया कि हर शिकायत का व्यक्तिगत समाधान किया गया, चाहे वो प्रिंट, टीवी या सोशल मीडिया से आई हो। अब 1 अगस्त को ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल जारी होगा, जो सभी दलों को प्रिंट और डिजिटल फॉर्म में दिया जाएगा। CEO की वेबसाइट पर भी यह उपलब्ध होगा।

1 अगस्त से 1 सितंबर तक कोई भी व्यक्ति या दल फॉर्म भरकर नाम जोड़ने या हटाने की अपील कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई नाम ड्राफ्ट रोल से बिना नोटिस और ERO/AERO के स्पष्ट आदेश के नहीं हटाया जा सकता। अगर कोई असंतुष्ट होता है, तो वो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या CEO के पास अपील कर सकता है। अपील के लिए स्टैंडर्ड फॉर्म तैयार किया जा रहा है और वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग दी जाएगी।

चुनाव आयोग ने SIR को एक बड़ा कदम बताया है, लेकिन अब तक कोई हार्ड स्टेप नहीं दिख रहा। जैसे, मृतकों और लापता वोटर्स को तुरंत हटाने के लिए कोई सख्त डेडलाइन नहीं है।

रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि डेमोग्राफिक मॉडलिंग को इलेक्टोरल प्रशासन में शामिल किया जाए। राजनीतिक दलों ने भी SIR की सराहना की, लेकिन कुछ ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में BLO की पहुँच कम थी। विपक्षी दलों ने माँग की है कि ड्राफ्ट रोल में पारदर्शिता बरती जाए।

कुल मिलाकर SIR एक सकारात्मक कदम है, लेकिन आईआईएम स्टडी से साफ है कि बिहार की वोटर लिस्ट में सुधार की जरूरत और गहरी है। अगर 77 लाख फर्जी नाम रह गए, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। आयोग को अब माइग्रेशन डेटा को लिंक करने और Aadhaar जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। 1 अगस्त का ड्राफ्ट रोल देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि ये तय करेगा कि बिहार के लोकतंत्र में कितने ‘भूत’ वोटर्स बचे हैं।

बिहार में विदेशी फंडिंग के दम पर चल रहे अवैध मदरसे, नेपाल सीमा पर घुसपैठियों की भरमार: फर्जी कागजातों पर एडमिशन, बनाए जा रहे जिहादी; NHRC बोला- ले रहे एक्शन

बिहार में भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में चल रहे अवैध और बिना पंजीकरण वाले मदरसों के नेटवर्क का खुलासा किया है। मीडिया रिपोर्ट के सामने आते ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इसका संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरूकर दी है। रिपोर्ट में इन मदरसों में जिहादी ट्रेनिंग, फर्जी पहचान पत्र, विदेशी फंडिंग और जाकिर नाइक के भड़काऊ वीडियो दिखाने जैसी गंभीर गतिविधियों का खुलासा हुआ है।

NHRC ने तुरंत लिया संज्ञान

NHRC के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने शनिवार (26 जुलाई 2025) को कहा कि आयोग ने रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। उन्होंने रविवार (27 जुलाई 2025) को सोशल मीडिया पर बताया कि इन मदरसों में बांग्लादेशी घुसपैठियों को फर्जी भारतीय पहचान पत्र दिलवाए जा रहे हैं, बच्चों को ब्रेनवॉश कर कट्टरपंथी बनाया जा रहा है और हवाला के जरिए विदेशी फंडिंग हो रही है।

रिपोर्ट में क्या-क्या आया सामने?

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के कुछ मदरसों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। मुजफ्फरपुर जिले के ‘जामिया नूरिया मिराजुल उलूम’ मदरसे में एक शिक्षक ने कैमरे पर यह कबूल किया कि उन्हें हवाला के जरिए पैसे मिलते हैं और वहाँ बच्चों को ‘जिहादी सोच’ सिखाई जाती है।

वहीं, सीतामढ़ी में स्थित ‘मदरसा इस्लामिया महमूदिया’ बिना किसी पंजीकरण और सुविधा के टिन की छत के नीचे संचालित हो रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, इस मदरसे में बांग्लादेशी बच्चों को फर्जी पहचान पत्रों के माध्यम से दाखिला दिया जाता था।

इन संस्थानों में कट्टरपंथी मौलाना ज़ाकिर नाइक के वीडियो दिखाकर बच्चों में गैर-मुसलमानों के प्रति नफरत भरी विचारधारा भरी जा रही है। इसके अलावा, पढ़ाई में इस्तेमाल होने वाली पुस्तक ‘तालीम-उल-इस्लाम’ में गैर-मुसलमानों को ‘काफिर’ बताया गया है, जो इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने वाला माना जा रहा है।

वही जाँच में पता चला कि नेपाल की सीमा के भीतर भी ऐसे ही इस्लामी संस्थानों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है, जो बिना किसी नियंत्रण के चल रहा है। वही इस नेटवर्क को विदेशों से भी फंडिंग मिलती है।

NHRC उठा रहा सख्त कदम

प्रियंक कानूनगो ने स्पष्ट किया है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और NHRC इस पर कड़ी जाँच और उचित कार्रवाई कर रहा है। सरकार से भी इन मदरसों की सतर्कता से जाँच की माँग की गई है।

यह रिपोर्ट केवल बिहार या उससे सटे सीमावर्ती क्षेत्रों की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए सावधान करने वाली चेतावनी है कि किस तरह शिक्षा के नाम पर नफरत और आतंक की विचारधारा बच्चों के दिमाग में बोई जा रही है।

कौन थे राजेंद्र चोल, जिन्होंने कंबोडिया-इंडोनेशिया तक फहराई सनातन की विजय पताका: PM मोदी ने तमिलनाडु के जिस मंदिर में की पूजा, क्यों पड़ा गंगईकोंडा चोलपुरम उसका नाम

तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह हुआ। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का उत्सव मनाया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

यह आयोजन न केवल चोल साम्राज्य की समृद्ध विरासत को याद करने का मौका था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था। आइए, गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, चोल वंश और राजेंद्र चोल की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

गंगईकोंडा चोलपुरम एक ऐतिहासिक नगरी

गंगईकोंडा चोलपुरम तमिलनाडु के अरियालुर जिले में जयकोंडम के पास एक छोटा सा गाँव है, जो कभी चोल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। इसे 1025 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने अपनी राजधानी बनाया और लगभग 250 वर्षों तक यह चोल साम्राज्य का केंद्र रहा।

इस नगरी का नाम गंगा नदी की विजय के प्रतीक के रूप में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘गंगा को जीतने वाले चोल की नगरी’। आज यह गाँव अपनी प्राचीन भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, खासकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त बृहदेश्वर मंदिर के लिए।

चोल वास्तुकला का अनमोल रत्न है बृहदेश्वर मंदिर

गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को गंगईकोंडा चोलेश्वरम मंदिर भी कहा जाता है। ये चोल वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण 1035 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने करवाया था। यह मंदिर तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित है, जिसे उनके पिता राजराजा चोल ने बनवाया था। हालाँकि गंगईकोंडा का मंदिर तंजावुर के मंदिर से छोटा है, लेकिन इसकी मूर्तिकला और बारीक नक्काशी इसे और भी खास बनाती है।

मंदिर की विशेषताएँ

वास्तुकला: मंदिर द्रविड़ शैली में निर्मित है और इसका आधार वर्गाकार है। इसका विमान (मंदिर का शिखर) 55 मीटर ऊँचा है, जो तंजावुर के मंदिर से 3 मीटर छोटा है। इतिहासकारों का मानना है कि राजेंद्र ने अपने पिता के मंदिर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इसे थोड़ा छोटा रखा। विमान का आकार थोड़ा अवतल (कर्व्ड) है, जो इसे तंजावुर के मंदिर से अलग बनाता है। इसमें आठ स्तर हैं, जिनमें पौराणिक कथाओं, शिव, विष्णु, और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और नक्काशी उकेरी गई हैं।

शिवलिंग: मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ 4 मीटर ऊँचा और 18 मीटर परिधि वाला एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।

मूर्तिकला: मंदिर की दीवारों पर करीब 50 मूर्तियाँ और राहतें हैं, जिनमें नटराज, सरस्वती, और शिव द्वारा भक्त को माला पहनाने वाली मूर्ति सबसे प्रमुख हैं। एक विशेष मूर्ति में राजेंद्र चोल को छोटे रूप में दर्शाया गया है, जिसमें शिव और पार्वती उन्हें विजय की माला पहना रहे हैं।

नंदी मूर्ति: मंदिर के प्रांगण में एक विशाल नंदी (शिव का वाहन बैल) की मूर्ति है, जो गर्भगृह की ओर 200 मीटर की दूरी पर अक्षीय रूप से संरेखित है।

अन्य मंदिर और संरचनाएँ: मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर, गोपुरम और नौ ग्रहों की एकाश्म (मोनोलिथिक) मूर्तियाँ हैं। एक शेर के आकार का कुआँ भी 19वीं सदी में जोड़ा गया।

चोल गंगा झील: राजेंद्र ने गंगा नदी का जल उत्तर भारत से लाकर इस मंदिर के पास एक कृत्रिम झील में डाला, जिसे चोल गंगा झील कहा जाता है। इसे ‘विजय का तरल स्तंभ’ भी कहा गया।

यूनेस्को विश्व धरोहर

2004 में यूनेस्को ने गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और दारासुरम के ऐरावतेश्वर मंदिर के साथ ‘ग्रेट लिविंग चोल मंदिर’ के रूप में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। ये मंदिर आज भी सक्रिय हैं और इनमें पूजा-अर्चना होती है। मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में देखरेख की जाती है।

मंदिर में उत्सव और पूजा

मंदिर में चार बार दैनिक पूजा होती है: कालसंधि (सुबह 8:30 बजे), उचिकालम (दोपहर 12:30 बजे), सायरक्षाई (शाम 6:00 बजे), और अर्धजामम (रात 7:30-8:00 बजे)। प्रमुख त्योहारों में शिवरात्रि (मासी माह, फरवरी-मार्च), ऐप्पसी पूर्णिमा (ऐप्पसी माह, अक्टूबर-नवंबर) और तिरुवदिराई (मार्गझी माह, दिसंबर-जनवरी) शामिल हैं। ऐप्पसी उत्सव के दौरान भगवान शिव की मूर्ति का चावल से अभिषेक किया जाता है।

दक्षिण भारत का स्वर्णिम युग था चोल युग

चोल वंश दक्षिण भारत का एक शक्तिशाली तमिल राजवंश था, जिसने 9वीं से 13वीं सदी तक दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य, आर्थिक, और सांस्कृतिक शक्ति का परचम लहराया। चोलों का मूल क्षेत्र कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी था, लेकिन उनके साम्राज्य ने तुंगभद्रा नदी तक और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों को शामिल किया। आज के कंबोडिया, थाईलैंड, जावा-सुमात्रा जैसे द्वीपीय इलाकों यानी इंडोनेशिया और मलेशिया तक चोलों का प्रभुत्व रहा, जिसका असर आज भी देखने को मिलता है।

चोल वंश का इतिहास

शुरुआती चोल वंश: चोलों का उल्लेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है। शुरुआती चोल छोटे क्षेत्रों तक सीमित थे, लेकिन 9वीं सदी में विजयालय चोल ने इसे पुनर्जीवित किया।

मध्यकालीन चोल: 9वीं सदी के मध्य से 13वीं सदी की शुरुआत तक चोल साम्राज्य अपने चरम पर था। इस दौरान राजराजा चोल प्रथम, राजेंद्र चोल प्रथम, राजाधिराज और कुलोत्तुंग चोल जैसे शासकों ने साम्राज्य का विस्तार किया।

साम्राज्य का विस्तार: चोलों ने पांड्य, चेर और श्रीलंका के अनुराधापुरम साम्राज्य को जीता। राजेंद्र चोल ने दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय, केदाह और तम्रलिंगम पर विजय प्राप्त की।

प्रशासनिक सुधार: चोलों ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ नामक लोकतांत्रिक प्रणाली शुरू की, जिसमें गाँव स्तर पर चुनाव होते थे। जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में भी उनकी विशेषज्ञता थी।

सांस्कृतिक योगदान: चोलों ने कला, वास्तुकला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया। तमिल साहित्य में तिरुमुरई, कंबन रामायण और मुवर उला जैसे कार्य इस युग की देन हैं।

चोलों की अद्वितीय नौसैनिक शक्ति

चोल साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत उनकी नौसेना थी। राजराजा चोल ने इसकी नींव रखी, जिसे राजेंद्र ने और मजबूत किया। चोल नौसेना ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अभियान चलाए। उनकी नौसैनिक शक्ति ने व्यापार और कूटनीति को बढ़ावा दिया, जिससे चोल साम्राज्य वैश्विक मंच पर एक शक्ति बन गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम उर्फ गंगईकोंडा चोल

राजेंद्र चोल-प्रथम (971-1044 ईस्वी) चोल साम्राज्य के सबसे महान सम्राटों में से एक थे। उनके शासनकाल (1014-1044) में चोल साम्राज्य ने दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने चरम को छुआ।

प्रारंभिक जीवन और सत्ता में आगमन

जन्म और परिवार: राजेंद्र का जन्म 971 ईस्वी में तंजावुर में हुआ था। उनके पिता राजराजा चोल प्रथम और माता वनति (तिरिपुवाना मादेवियार) थीं। उनकी जन्म नक्षत्र तिरुवदिराई (अर्द्रा) थी। उनके कई भाई-बहन थे, जिनमें उनकी बहन कुंदवाई, चालुक्य राजा विमलादित्य की रानी थीं।

सह-शासक (को-रीजेंट): 1012 में राजेंद्र को उनके पिता ने सह-शासक नियुक्त किया। 1014 में राजराजा की मृत्यु के बाद राजेंद्र पूर्ण सम्राट बने। 1018 में उन्होंने अपने बेटे राजाधिराज को सह-शासक बनाया।

सैन्य विजय

राजेंद्र की सैन्य उपलब्धियाँ चोल साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक थीं। उनकी प्रमुख विजय इस प्रकार हैं-

दक्षिण भारत: राजेंद्र ने चेर, पांड्य और अनुराधापुरम (श्रीलंका) पर विजय प्राप्त की। 1017 में उन्होंने श्रीलंका के दक्षिणी भाग रुहुना को जीता और वहाँ के राजा महिंद V को बंदी बनाकर भारत लाए।

उत्तर भारत: 1019-1023 के बीच राजेंद्र ने गंगा नदी तक अभियान चलाया। उन्होंने कलिंग, बंगाल और पाल साम्राज्य को हराया। इस अभियान में उन्होंने पाल राजा महिपाल और चंद्र वंश के गोविंदचंद्र को परास्त किया। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम की स्थापना की और चोल गंगा झील बनवाई।

दक्षिण-पूर्व एशिया: 1023-1025 में राजेंद्र ने श्रीविजय (सुमात्रा), केदाह (मलेशिया), और तम्रलिंगम पर हमला किया। उन्होंने श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगवर्मन को बंदी बनाया। इस अभियान ने चोलों को दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार और प्रभाव का केंद्र बनाया।

मालदीव और लक्षद्वीप: 1018 में राजेंद्र ने मालदीव और लक्षद्वीप पर कब्जा किया, जिसे उन्होंने ‘मुन्निर पलंतिवु पन्निरायिरम’ (12,000 द्वीपों का समुद्र) नाम दिया।

सांस्कृतिक और प्रशासनिक योगदान

गंगईकोंडा चोलपुरम: राजेंद्र ने इस नई राजधानी की स्थापना की, जिसमें बृहदेश्वर मंदिर, चोल गंगा झील और कई अन्य मंदिर बनवाए। यह शहर व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।

शैव धर्म का प्रचार: राजेंद्र शैव धर्म के अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को भी प्रोत्साहन दिया। उन्होंने श्रीविजय में चूडामणि विहार बनवाने में मदद की।

जल प्रबंधन: राजेंद्र ने चोल गंगा झील और अन्य जलाशय बनवाए, जो सिंचाई और जल प्रबंधन के लिए उपयोगी थे। मधुरंतक वडवरु नहर भी उनके समय की देन है।

साहित्य और कला: राजेंद्र के शासनकाल में तमिल साहित्य और कला फली-फूली। मूवर उला और कालिंगत्तुपरानी जैसे साहित्यिक कार्य उनके समय में लिखे गए।

मृत्यु : राजेंद्र की मृत्यु 1044 में ब्रह्मदेसम (वर्तमान तिरुवन्नमलई जिला, तमिलनाडु) में हुई। उनकी रानी वीरमहादेवी ने उनके साथ सती प्रथा का पालन किया। उनके भाई मधुरंतक परकेसरी वेलन ने उनकी स्मृति में एक जलाशय बनवाया।

चोल साम्राज्य का पतन

13वीं सदी के अंत तक चोल साम्राज्य कमजोर होने लगा। पांड्यों ने चोलों को हराया और गंगईकोंडा चोलपुरम को नष्ट कर दिया। इसके अलावा, 1311 में दिल्ली सल्तनत के मलिक काफूर, 1314 में खुसरो खान और 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के आक्रमणों ने शहर को और नुकसान पहुँचाया। हालाँकि बृहदेश्वर मंदिर किसी तरह बच गया। 1378 में विजयनगर साम्राज्य ने इस क्षेत्र को पुनः हिंदू शासकों के अधीन लाया और मंदिरों की मरम्मत की।

चोल विरासत का आधुनिक महत्व

चोल साम्राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत आज भी जीवित है। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर और तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोलों की स्थापत्य कला और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक हैं। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि चोलों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँधा था। उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन पर काम कर रही है।

चोलों से प्रेरणा लेता आधुनिक भारत

सांस्कृतिक संरक्षण: पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। विदेशों से 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ वापस लाई गई हैं, जिनमें 36 तमिलनाडु की हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा: पीएम ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाया गया कदम है, जो चोलों की सैन्य शक्ति की याद दिलाता है।

मूर्तियाँ और स्मारक: तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी।

गंगईकोंडा चोलपुरम और राजेंद्र चोल की गाथा भारत के गौरवशाली इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। चोल साम्राज्य ने न केवल सैन्य और प्रशासनिक क्षेत्र में बल्कि कला, वास्तुकला, और साहित्य में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। गंगईकोंडा चोलपुरम का बृहदेश्वर मंदिर आज भी उस युग की भव्यता और शिल्प कौशल का प्रतीक है।

पीएम मोदी का यह दौरा न केवल चोल विरासत को सम्मान देने का अवसर था, बल्कि यह भारत की एकता और आधुनिक विकास के संकल्प को भी दर्शाता है। यह समारोह ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को साकार करता है और हमें अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड-मालदीव यात्रा से देश को फायदे ही फायदे: CETA समझौते, आर्थिक मदद और रणनीतिक रिश्ते हुए मजबूत, वैश्विक ताकत बनने की ओर भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड (यूनाइटेड किंगडम) और मालदीव की यात्रा ने भारत को वैश्विक मंच पर एक नई ऊँचाई दी है। इन दोनों देशों के साथ हुए ऐतिहासिक समझौतों ने भारत के आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव को और मजबूत किया है। यह यात्रा भारत की ‘पड़ोसी पहले’ और ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) नीति का एक शानदार उदाहरण है।

आइएविस्तार से जानते हैं कि इन दौरों से भारत को क्या-क्या फायदे हुए, कौन-कौन से समझौते हुए और इनका भारत के भविष्य पर क्या असर होगा।

पीएम मोदी की इंग्लैंड यात्रा के दौरान CETA समझौता

24 जुलाई 2025 को पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड यात्रा के दौरान भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता तीन साल की कठिन मेहनत और 14 दौर की जटिल बातचीत का नतीजा है। भारत की ओर से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और यूके की ओर से बिजनेस एंड ट्रेड सेक्रेटरी जोनाथन रेनॉल्ड्स ने हस्ताक्षर किए।

इस ऐतिहासिक मौके पर पीएम मोदी, यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और यूके की चांसलर रैचेल रीव्स भी मौजूद थे। यह समझौता भारत को वैश्विक व्यापार में एक नया मुकाम दिलाने वाला है।

CETA से जुड़ी अहम बातें

CETA की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब ब्रेक्जिट के बाद यूके नए व्यापारिक साझेदारों की तलाश में था। भारत भी ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के अपने मिशन को गति देना चाहता था। तीन साल की बातचीत में कई मुश्किल मुद्दों पर चर्चा हुई, जैसे टैरिफ कटौती, वीजा नियम, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा। 6 मई 2025 को दोनों देशों ने सैद्धांतिक सहमति जताई, और 22 जुलाई 2025 को भारत की यूनियन कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी। आखिरकार, 24 जुलाई 2025 को यह समझौता हस्ताक्षरित हुआ।

यह समझौता इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यह वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा, और पेशेवर गतिशीलता को कवर करता है। यह भारत के लिए आर्थिक विकास, रोजगार सृजन, और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक बड़ा कदम है।

CETA से भारत को होने वाले फायदे

99% एक्सपोर्ट पर शून्य टैरिफ

  • भारत से यूके जाने वाले 99% सामानों पर अब कोई टैरिफ नहीं लगेगा। इससे कपड़ा, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण, खिलौने, और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों में निर्यात को भारी बढ़ावा मिलेगा।
  • किसानों और मछुआरों को लाभ: 95% कृषि उत्पादों पर शून्य टैरिफ से भारतीय चाय, कॉफी, हल्दी, काली मिर्च, दालें, आम, नारंगी, जैकफ्रूट, और मिलेट्स जैसे जैविक उत्पादों को यूके के 375 अरब डॉलर के कृषि बाजार में आसान पहुँच मिलेगी। मछुआरों को 99% समुद्री उत्पादों पर शून्य टैरिफ से आय में 20-30% की बढ़ोतरी होगी।
  • संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी, सेब, और खाद्य तेल जैसे क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा, ताकि स्थानीय किसानों और उद्योगों को नुकसान न हो।
  • अनुमानित वृद्धि: इन क्षेत्रों से निर्यात में 10-15% की सालाना वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे तिरुपुर, कानपुर, और कोलकाता जैसे टेक्सटाइल और चमड़ा हब में लाखों नौकरियाँ पैदा होंगी।

रोजगार सृजन और MSMEs को बढ़ावा

  • यह समझौता भारत में लाखों नौकरियाँ पैदा करेगा, खासकर मेहनत आधारित क्षेत्रों जैसे टेक्सटाइल, चमड़ा और ज्वैलरी में।
  • छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs), कारीगरों और बुनकरों को वैश्विक बाजार में जगह मिलेगी। बौद्धिक संपदा और भौगोलिक संकेतक (GI टैग) प्रोटेक्शन से भारतीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलेगी।
  • उदाहरण के लिए तिरुपुर के टेक्सटाइल उद्योग और कानपुर के चमड़ा उद्योग को नया बाजार मिलेगा, जिससे स्थानीय कारीगरों और महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

सस्ते आयातित उत्पाद

  • यूके से भारत आने वाली व्हिस्की, कारें (जैसे जगुआर, लैंड रोवर), चॉकलेट, कॉस्मेटिक्स, और मेडिकल उपकरण जैसे ईसीजी और एक्स-रे मशीनें सस्ती होंगी।
  • व्हिस्की पर टैरिफ 150% से घटकर 75% और अगले 10 साल में 40% तक होगा। कारों पर टैरिफ 100% से 10% तक कम होगा।
  • इससे भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलेंगे, और यूके की कंपनियों को भारत जैसे बड़े बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिलेगा।

सर्विस सेक्टर में नए अवसर

  • यूके ने पहली बार इतनी बड़ी प्रतिबद्धताएँ दी हैं। भारतीय आईटी/आईटीईएस, वित्तीय सेवाएँ, शिक्षा, टेलीकॉम, आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग कंपनियों को यूके के बाजार में आसान पहुँच मिलेगी।
  • डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC): 75,000 भारतीय कर्मचारियों को यूके में सामाजिक सुरक्षा भुगतान से 3 साल की छूट मिलेगी। इससे उनकी सैलरी बढ़ेगी और कंपनियों की लागत 20-30% कम होगी।
  • 36 सेवा क्षेत्रों में ‘इकोनॉमिक नीड्स टेस्ट’ की जरूरत नहीं होगी और 35 यूके क्षेत्रों में भारतीय पेशेवर 24 महीने तक बिना स्थानीय कार्यालय के काम कर सकेंगे।
  • हर साल 1,800 से ज्यादा भारतीय शेफ, योग प्रशिक्षक और संगीतकार यूके में काम कर सकेंगे।

शिक्षा क्षेत्र में क्रांति

  • यूके की पाँच मशहूर यूनिवर्सिटी साउथेम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क, एबरडीन और ब्रिस्टल भारत में कैंपस खोलेंगी। साउथेम्पटन ने गुरुग्राम में कैंपस शुरू कर दिया है और बाकी बेंगलुरु और मुंबई में खुलेंगे।
  • इससे भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा घर बैठे मिलेगी और विदेश जाने की लागत बचेगी। यह भारत के शिक्षा क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएगा।

निवेश और स्टार्टअप्स

  • यूके से 6 अरब पाउंड (लगभग 65,000 करोड़ रुपये) का निवेश भारत में आएगा, जो मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देगा।
  • भारतीय स्टार्टअप्स को यूके के निवेशकों और इनोवेशन हब्स तक पहुँच मिलेगी, जिससे वैश्विक विस्तार में मदद मिलेगी।

आर्थिक विकास और वैश्विक नेतृत्व

  • वर्तमान में भारत-यूके का द्विपक्षीय व्यापार 56 अरब डॉलर (लगभग 4.7 लाख करोड़ रुपये) का है। CETA का लक्ष्य इसे 2030 तक 120 अरब डॉलर (10 लाख करोड़ रुपये) तक ले जाना है।
  • 2040 तक 2.8 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यापार होगा, जो भारत की GDP को 0.5-1% बढ़ाएगा।
  • यह समझौता भारत के ‘मेक इन इंडिया’ मिशन को तेज करेगा और भारत को वैश्विक व्यापार में लीडर बनाएगा।

CETA की खासियतें

  • वस्तु और सेवा व्यापार: यह समझौता वस्तुओं, सेवाओं, निवेश और बौद्धिक संपदा को कवर करता है।
  • सतत विकास: पर्यावरण, नवाचार, और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने पर जोर।
  • महिलाओं और MSMEs के लिए प्रावधान: व्यापार वित्त और वैश्विक साझेदारी के लिए विशेष सुविधाएँ।
  • पेशेवर गतिशीलता: भारतीय पेशेवरों को यूके में काम करने के लिए आसान वीजा नियम।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए कहा, “यह समझौता भारत के किसानों, कारीगरों और छोटे व्यवसायियों के लिए नए दरवाजे खोलेगा। यह भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में ले जाएगा।”

मालदीव यात्रा: भारत-मालदीव संबंधों में नया युग

25 जुलाई 2025 को पीएम नरेंद्र मोदी मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के निमंत्रण पर हुई इस यात्रा ने दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण दौर के बाद रिश्तों को नई मजबूती दी। मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान और चीन की ओर झुकाव के बाद यह यात्रा एक सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है।

मालदीव के साथ रिश्तों की पृष्ठभूमि

भारत और मालदीव के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते रहे हैं। 1965 में मालदीव की आजादी के बाद भारत पहला देश था, जिसने इसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। 1988 में ऑपरेशन कैक्टस, 2004 की सुनामी और 2014 के जल संकट में भारत ने मालदीव की मदद की। कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारत ने टीके और आर्थिक सहायता दी।

हालाँकि 2023 में राष्ट्रपति मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद ‘इंडिया आउट’ अभियान ने रिश्तों में खटास ला दी थी। मुइज्जू ने भारत की सैन्य मौजूदगी को संप्रभुता के लिए खतरा बताया और चीन के करीब जाने की कोशिश की। लेकिन भारत की आर्थिक और रणनीतिक मदद ने मालदीव को भारत की अहमियत समझा दी। 2024 में मालदीव के विदेश और रक्षा मंत्रियों की भारत यात्रा और भारत की 400 मिलियन डॉलर की करेंसी स्वैप सुविधा ने रिश्तों को सुधारा।

मालदीव यात्रा के दौरान हुए समझौते और भारत को फायदे

आर्थिक सहायता और ऋण राहत

  • भारत ने मालदीव को 4,850 करोड़ रुपये की ऋण सहायता (एलओसी) दी, जिससे बुनियादी ढाँचा, आवास और सामुदायिक विकास परियोजनाएँ शुरू होंगी।
  • मालदीव के वार्षिक ऋण चुकौती दायित्वों को कम किया गया, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी।
  • 400 मिलियन डॉलर (3,320 करोड़ रुपये) की करेंसी स्वैप सुविधा और 50 मिलियन डॉलर (415 करोड़ रुपये) के ट्रेजरी बिल को आगे बढ़ाया गया।
  • 69 मिलियन डॉलर (572.7 करोड़ रुपये) की अनुदान सहायता का वादा।
  • फायदा: भारत मालदीव का सबसे भरोसेमंद आर्थिक साझेदार बनकर उभरेगा। यह हिंद महासागर में भारत के प्रभाव को बढ़ाएगा और चीन के प्रभाव को संतुलित करेगा।

मुक्त व्यापार समझौता (IMFTA)

  • भारत-मालदीव मुक्त व्यापार समझौते (IMFTA) पर बातचीत शुरू हुई। यह मछली, जलीय कृषि, और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में व्यापार बढ़ाएगा।
  • फायदा: भारतीय मछुआरों और व्यापारियों को मालदीव में नया बाजार मिलेगा। मालदीव को भारतीय उत्पाद सस्ते मिलेंगे, जिससे दोनों देशों का व्यापार बढ़ेगा।

आवास और बुनियादी ढाँचा

  • हुलहुमाले में 3,300 सामाजिक आवास इकाइयों का हस्तांतरण।
  • अड्डू शहर में सड़क और जल निकासी प्रणाली परियोजना का उद्घाटन।
  • 6 उच्च प्रभाव वाली सामुदायिक विकास परियोजनाएँ शुरू, जैसे जल आपूर्ति और सीवरेज सुविधाएँ।
  • फायदा: भारत की मदद से मालदीव में रहन-सहन का स्तर सुधरेगा। यह भारत की सॉफ्ट पावर को बढ़ाएगा और मालदीव में भारत की सकारात्मक छवि बनाएगा।

रक्षा और सुरक्षा सहयोग

  • माले में रक्षा मंत्रालय भवन का उद्घाटन।
  • 72 भारी वाहनों और दो भीष्म हेल्थ क्यूब सैट का हस्तांतरण।
  • मालदीव की राष्ट्रीय रक्षा सेना (MNDF) को 4 मिलियन डॉलर (33.2 करोड़ रुपये) की ग्रांट।
  • फायदा: मालदीव की रक्षा क्षमता बढ़ने से हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन में भारत-मालदीव सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ाएगा।

डिजिटल और तकनीकी सहयोग

  • यूपीआई और रूपे पेमेंट सिस्टम की शुरुआत, जिससे मालदीव में पर्यटन और खुदरा व्यापार बढ़ेगा।
  • भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान और मालदीव मौसम विज्ञान सेवा के बीच समझौता।
  • डिजिटल परिवर्तन के लिए जनसंख्या स्तर पर डिजिटल समाधानों को साझा करने का समझौता।
  • फायदा: भारतीय डिजिटल कंपनियों को मालदीव में नया बाजार मिलेगा। भारतीय पर्यटकों के लिए मालदीव में लेन-देन आसान होगा, जिससे पर्यटन बढ़ेगा।

स्वास्थ्य और मत्स्य पालन

  • मालदीव ने भारतीय फार्माकोपिया (आईपी) को मान्यता दी, जिससे भारतीय दवाएँ मालदीव में आसानी से उपलब्ध होंगी।
  • मत्स्य पालन और जलीय कृषि में सहयोग के लिए समझौता।
  • फायदा: भारतीय फार्मा कंपनियों को मालदीव में बाजार मिलेगा। मछुआरों को मालदीव में व्यापार के अवसर बढ़ेंगे।

सांस्कृतिक और राजनयिक मजबूती

  • भारत-मालदीव राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ पर संयुक्त डाक टिकट जारी।
  • ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत पीएम मोदी और राष्ट्रपति मुइज्जू ने पौधरोपण किया।
  • फायदा: सांस्कृतिक और लोगों के बीच संबंध मजबूत होंगे। मालदीव में भारत की छवि एक भरोसेमंद दोस्त के रूप में और मजबूत होगी।

मालदीव के साथ रिश्तों में सुधार

  • पिछले दो सालों में मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान ने भारत के खिलाफ माहौल बनाया था। राष्ट्रपति मुइज्जू ने शुरू में भारत से दूरी बनाई और चीन की ओर झुकाव दिखाया। लेकिन भारत की आर्थिक और रणनीतिक मदद ने मालदीव को भारत की अहमियत समझा दी।
  • 2024 में आर्थिक सहायता: 400 मिलियन डॉलर की करेंसी स्वैप सुविधा और 28 द्वीपों पर जल आपूर्ति और सीवरेज परियोजनाएँ।
  • 2025 में अतिरिक्त सहायता: 69 मिलियन डॉलर की अनुदान सहायता और 50 मिलियन डॉलर के ट्रेजरी बिल को आगे बढ़ाया।
  • उच्चस्तरीय यात्राएँ: मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला खलील और रक्षा मंत्री घस्सान मौमून की भारत यात्रा ने रिश्तों को नया आयाम दिया।

राष्ट्रपति मुइज्जू ने पीएम मोदी की यात्रा के दौरान कहा, “भारत हमारा सबसे करीबी और मूल्यवान साझेदार है। IMFTA हमारी आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करेगा।” यह दर्शाता है कि मालदीव अब भारत के साथ सहयोग को प्राथमिकता दे रहा है।

भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक महत्व

  • हिंद महासागर में प्रभाव: मालदीव हिंद महासागर में एक महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग पर है। भारत की मदद से मालदीव की रक्षा और आर्थिक स्थिति मजबूत होने से भारत का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ेगा।
  • चीन के प्रभाव को संतुलित करना: मालदीव में चीन का बढ़ता प्रभाव एक चुनौती था। भारत की आर्थिक और रक्षा सहायता ने मालदीव को भारत के करीब लाया।
  • पर्यटन और व्यापार: यूपीआई और रूपे जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम से भारतीय पर्यटकों के लिए मालदीव की यात्रा आसान होगी। इससे पर्यटन और व्यापार बढ़ेगा।
  • सॉफ्ट पावर: आवास, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढाँचे में भारत की मदद से मालदीव में भारत की छवि एक भरोसेमंद दोस्त के रूप में मजबूत हुई।

दोनों देशों के लिए साझा लाभ

इंग्लैंड

  • यूके को भारत जैसे बड़े बाजार में प्रवेश मिलेगा। उनकी व्हिस्की, कारें, और मेडिकल उपकरण भारत में सस्ते होंगे, और उनकी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ेगी।
  • 90% ब्रिटिश उत्पादों पर भारत में टैरिफ कटौती से यूके को 6 अरब पाउंड का निवेश और निर्यात लाभ मिलेगा।
  • यूके में हजारों नौकरियाँ सुरक्षित होंगी, खासकर व्हिस्की, ऑटोमोबाइल और वित्तीय सेवा क्षेत्रों में।
  • मालदीव
  • भारत की आर्थिक मदद से मालदीव की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 4,850 करोड़ रुपये की ऋण सहायता और ऋण चुकौती में राहत से मालदीव की वित्तीय स्थिति सुधरेगी।
  • आवास, सड़क और रक्षा परियोजनाएँ मालदीव के लोगों के जीवन को बेहतर करेंगी।
  • यूपीआई और IMFTA जैसे समझौते मालदीव के पर्यटन और व्यापार को बढ़ाएंगे।

भारत

  • दोनों देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ने से भारत की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।
  • हिंद महासागर में भारत का रणनीतिक प्रभाव बढ़ेगा, और ‘मेक इन इंडिया’ को नया प्रोत्साहन मिलेगा।
  • किसानों, कारीगरों, युवाओं और MSMEs को नए अवसर मिलेंगे, जिससे भारत की सामाजिक और आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।

पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड और मालदीव यात्रा ने भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत किया है। यूके के साथ CETA समझौते ने भारत के लिए व्यापार, रोजगार और शिक्षा के नए दरवाजे खोले हैं। मालदीव के साथ समझौतों ने भारत की सॉफ्ट पावर और हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। ये दोनों दौरे भारत की ‘पड़ोसी पहले’ और ‘सागर’ नीति के तहत क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।

यह सिर्फ व्यापारिक और रणनीतिक समझौते नहीं हैं, बल्कि भारत की तरक्की की नई कहानी हैं। किसानों को नए बाजार, युवाओं को नौकरियाँ और MSMEs को वैश्विक पहचान मिलेगी। पीएम मोदी का नेतृत्व और उनकी दूरदर्शी नीतियाँ भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह पर तेजी से ले जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बहराइच में लव जिहाद की शिकायत पर दो हिंदू युवकों की बेरहमी से पिटाई, शहाबुद्दीन, अनस और जीशान गिरफ्तार: अपहरण-धर्मांतरण का आरोप

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में लव जिहाद का मामला दर्ज कराने पर दो हिंदू युवकों के साथ दिल दहला देने वाली बर्बरता का मामला सामने आया है। यह घटना बुधवार (23 जुलाई 2025) को रामगाँव थाना क्षेत्र के बरुआ घाट इलाके में हुई, जब चंदन मौर्य और उसका चचेरा भाई मोहित वहाँ मौजूद थे।

रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ितों का आरोप है कि शहाबुद्दीन नामक युवक ने उन्हें बंदूक की नोक पर जबरन अपनी कार में बैठा लिया। बाद में अनस और जीशान भी उसके साथ आ गए। तीनों आरोपितों ने दोनों युवकों को एक सुनसान जगह पर ले जाकर उनके कपड़े उतरवा दिए और लोहे की रॉड व डंडों से बेरहमी से पीटा।

आरोप है कि हमलावरों ने उन्हें पानी के बदले  पेशाब पीने के लिए मजबूर किया और बंदूक की नोक पर इस्लाम जिंदाबाद के नारे लगाने को भी कहा। पीड़ित चंदन मौर्य ने घटना की शिकायत रामगाँव थाने में दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया और अपहरण में इस्तेमाल की गई कार को भी जब्त कर लिया है।

पुलिस ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़ितों को मटेरा क्षेत्र से सुरक्षित बरामद कर लिया गया है और घटना की जाँच जारी है। इस अमानवीय कृत्य से इलाके में तनाव फैल गया है और प्रशासन ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है।

मुस्लिम पुरुषों ने फर्जी आईडी का इस्तेमाल कर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाया

चंदन ने अपनी शिकायत में बताया कि मुस्लिम युवकों ने उस पर और उसके चचेरे भाई मोहित पर पुरानी रंजिश के चलते हमला किया। उसने आरोप लगाया कि हमलावरों की योजना थी कि वे दोनों को नेपाल ले जाकर मार डालें।

चंदन ने यह भी बताया कि हमलावर बाबा गुरुअप नाम के एक इंस्टाग्राम ग्रुप से जुड़े हुए हैं। इस ग्रुप के सदस्य व्हाट्सएप पर फर्जी हिंदू नामों से अकाउंट बनाकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं। चंदन के मुताबिक, ये लोग महंगी गाड़ियाँ और गैजेट्स दिखाकर लड़कियों को आकर्षित करते हैं और जिसके लिए उन्हें विदेशों से फंडिंग मिलती है।

फोटो साभार – इंडिया टुडे

चंदन ने अपनी शिकायत में बताया कि मुस्लिम युवकों का एक गिरोह फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके हिंदू लड़कियों को फंसाता है। उन्होंने कहा कि ये लोग पहले लड़कियों की जाति और धर्म की जानकारी निकालते हैं और फिर उन्हीं के मुताबिक नकली सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर उनसे दोस्ती करते हैं।

बाद में वे लड़कियों को प्रेम संबंधों में फँसाकर इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डालते हैं। चंदन ने दावा किया कि इन लोगों ने उनके गाँव की हिंदू लड़कियों को भी निशाना बनाया है।

चंदन के मुताबिक, करीब दो महीने पहले उन्होंने पुलिस को इस पूरे गिरोह की जानकारी दी थी और उनकी गतिविधियाँ रोकने की कोशिश की थी। उन्होंने बाबा गुरुअप नाम के इंस्टाग्राम ग्रुप का जिक्र किया, जिसके सदस्य व्हाट्सएप के जरिए लड़कियों को फँसाने का काम करते हैं और विदेशों से पैसे मिलने का भी आरोप लगाया।

चंदन ने बताया कि इन आरोपितों से उनका झगड़ा भी हुआ था, लेकिन जब उन्होंने पुलिस से शिकायत की, तो पुलिस ने उल्टा उन्हें ही समझौता करने के लिए मजबूर किया और उनके मोबाइल से सारे सबूत भी मिटा दिए।

चंदन ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, ‘पुलिस ने मेरी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की, उल्टा मेरे फोन से सबूत हटवा दिए और समझौता कराने की कोशिश की।’ वहीं, एडिशनल एसपी दुर्गा प्रसाद तिवारी ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह मामला आपसी रंजिश का लग रहा है।

उन्होंने कहा कि तीन आरोपितों शहाबुद्दीन, अनस और जीशान को गिरफ्तार कर लिया गया है और केस दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ितों को मजहबी नारे लगाने के लिए मजबूर करने की बात मूल शिकायत में नहीं थी, बल्कि बाद में जोड़ी गई।

हिन्दुओं पर 2000+ हमले, महिलाओं का रेप… आवामी लीग का दमन: तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में बिन चुनाव के ‘तानाशाह’ बनने की ओर अग्रसर हैं मुहम्मद यूनुस

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुए एक वर्ष पूरा होने को है। इस एक वर्ष में बांग्लादेश में बहुत कुछ बदल चुका है। बांग्लादेश का यह एक वर्ष का सफ़र हिन्दुओं के उत्पीड़न से लेकर विपक्ष का मुंह बंद करने तक और पहचान बदलने का रहा है। इस दौरान लोकतंत्र के नाम पर हंगामा करके सत्ता में आए मोहम्मद यूनुस खुद तानाशाह बनने की कगार पर हैं। बिना चुनाव के सत्ता पर बैठे मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश की आर्थिक नैया भी डुबाई है।

बांग्लादेश में जून-जुलाई से छात्रों के नाम पर चालू हुए प्रदर्शन असल में एक रिजीम चेंज ऑपरेशन था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था कि कैसे शेख हसीना को सत्ता से हटाया जाए। छात्र आंदोलन के मुखौटे का सच तो तभी सामने आ गया था जब इस आंदोलन ने हिंसक रूप लिया था। 5 अगस्त, 2025 को आखिरकार दंगाइयों के चलते शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। वह भारत आ गईं थीं। उनके पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों ने सत्ता हथिया ली थी और इसका मुखौटा मोहम्मद यूनुस को बना दिया।

जबसे शेख हसीना सत्ता से बाहर हुई हैं, तब से बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों को हिन्दुओं को मारने का लाइसेंस मिला हुआ है। हिन्दू महिलाओं का घर में घुस कर रेप हो रहा है, उनके वीडियो बनाए जा रहे हैं और वायरल किए जा रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की सरकार ही हिन्दू मंदिरों को गिरा दे रही है। हिन्दू साधु-संत गिरफ्तार हो रहे हैं और उनकी सुनवाई तक नहीं हो रही है। यह सब कुछ 1 वर्ष में ही मोहम्मद यूनुस ने अपने नाम कर लिया है।

1 साल में हिन्दुओं पर 2000+ हमले

शेख हसीना के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन में भी हिन्दू ही निशाना थे। इस्लामी कट्टरपंथी लगातार सत्ता विरोधी हिंसा के दौरान हिन्दू पुलिस और सुरक्षाकर्मी निशाना बनाए गए। ASI संतोष साहा को बीच सड़क मार कर लटका दिया गया। उनके शव के साथ तक बर्बरता हुई। शव को उदाहरण बनाया गया कि बाकी हिन्दू भी डरे रहें। जब बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता चली गई तो यह हमले और तेज हो गए।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्था बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने जुलाई में दी गई एक रिपोर्ट में बताया था कि 4 अगस्त, 2024 से 30 जून, 2025 के बीच अल्पसंख्यकों पर 2400 से अधिक हमले हुए। इनमें से लगभग 2000 हमले तो 4 अगस्त, 2024 से 20 अगस्त, 2024 के बीच हुए जबकि 100 से अधिक घटनाएँ बाकी 2024 में हुई। 2025 में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। 2025 में 300 से अधिक हमले अल्पसंख्यकों पर हुए हैं।

अधिकांश अल्पसंख्यक विरोधी हमलों का शिकार हिन्दू ही हैं क्योंकि वह बांग्लादेश में सबसे बड़ी माइनॉरिटी हैं। और यह सिर्फ आँकड़ों की बात नहीं है। बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी हिंसा का सबसे पहला शिकार महिलाएँ हो रही हैं। हाल ही में बांग्लादेश में BNP के नेता फजोर अली ने एक हिन्दू महिला का घर में घुस कर रेप किया था। उसका वीडियो भी वायरल किया था। इसके बाद केस वापस तक लेने का भी दबाव बनाया। इसी तरह एक और नाबालिग का रथ यात्रा से वापस आते समय रेप किया गया।

जिस समय यह लेख मैं लिख रहा हूँ, तभी एक हिन्दू दुकानदार की हत्या की बात बांग्लादेश में सामने आई है। मोहम्मद आबिर ने यह हत्या गला रेत कर की। इससे पहले बांग्लादेश में मंदिरों पर हमलों की असंख्य घटनाएँ सामने आई। इस्लामी कट्टरपंथियों को तो छोडिए, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुद ढाका में रेलवे की जमीन पर बता कर एक पुराना हिन्दू मंदिर ढहा दिया। हिन्दुओं के लिए जिन्होंने आवाज उठाई, उनका भी इस एक वर्ष में बुरा हाल किया गया।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जारी अत्याचार के चलते चटगाँव में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसका नेतृत्व संत चिन्मय दास ने किया। चिन्मय दास से चिढ़े इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगा दिया। उनको महीनों तक सुनवाई भी नहीं मिली। उनके वकील तक पर हमला हुआ। जब आखिर में उनको जमानत भी मिली तो फिर इस्लामी कट्टरपंथी भड़के और उन्होंने जमानत पर रोक लगवा दी। मैं जो बता रहा हूँ, वह चर्चित मामले हैं। ना जाने कितने हिन्दुओं की पीड़ा सामने तक नहीं आ पाई है।

हिन्दुओं पर हमले को लेकर बांग्लादेश की महम्मद यूनुस सरकार का रवैया भी महा बेशर्मों की तरह रहा है। वह पहले तो मानने से इनकार करती रही कि बांग्लादेश में हिन्दुओं को इस्लामी कट्टरपंथ का निशाना बनाया जा रहा है। इसके बाद उसने बेहरमी बेशर्मी से तर्क पेश किया कि असल में यह हमले हिन्दुओं पर इसलिए नहीं हो रहे क्योंकि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ पैर पसार चुका है, बल्कि इसलिए हो रहे हैं कि वह कथित तौर पर अवामी लीग के समर्थक थे। बांग्लादेश में सिर्फ हिन्दू ही एक पीड़ित नहीं हैं।

विपक्ष का भी यूनुस सरकार ने किया दमन

शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वालों का कहना था कि देश में लोकतंत्र की हालत खराब है। मोहम्मद यूनुस ने भी कई बार यही बात दोहराई। लेकिन विडंबना यह है कि मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद लोकतंत्र को ताखे में सजा कर रख दिया गया है। मोहम्मदद यूनुस की सरकार ने अपना सबसे पहला लक्ष्य अवामी लीग का खात्मा बनाया था। एक वर्ष के भीतर आवामी लीग के हजारों नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

सत्ता बदलते ही यूनुस सरकार ने 1100 से अधिक मामले आवामी लीग के 300+ नेताओं पर ठोंके थे। शेख हसीना के अलावा जो भी आवामी लीग के नेता तख्तापलट के समय बांग्लादेश से नहीं निकल पाए थे, उन्हें गिरफ्तार किया गया। चाहे वह पूर्व मंत्री दीपू मोनी हों या फिर अनिसुल हक़। आवामी लीग के किसी नेता को नहीं छोड़ा गया। एक अभियान चला कर आवामी लीग को तोड़ने का प्रयास किया गया। इसको ऑपरेशन डेविल हंट का नाम दिया गया। इसक इसके अंतर्गत 1000+ लोग गिरफ्तार हुए, इनमें से अधिकांश आवामी लीग से थे।

मोहम्मद यूनुस ने आवामी लीग पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उसकी रैलियाँ नहीं आयोजित होने दी और यहाँ तक कि कार्यकर्ताओं की हत्याओं के सैकड़ों प्रयास हुए। जगह-जगह आवामी लीग के दफ्तरों में ताले लटकाए गए।

विरासत मिटाने का भी हो रहा प्रयास

बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार सिर्फ विपक्ष को दबाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह लोगों की स्मृतियों से तक उसे मिटा देना चाहती है। मोहम्मद यूनुस सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास को टूटने दिया। दंगाइयों ने उस धानमंडी घर की ईंट-ईंट तक तोड़ दी, जिससे बांग्लादेश को आजादी मिली। यह सब इसलिए होने दिया गया क्योंकि इसका कनेक्शन शेख हसीना से है। गुरु रबीन्द्र नाथ टैगोर के घर को तोड़ा गया। मोहम्मद यूनुस सरकार देखती रही।

सत्यजित रे का घर भी गिरते-गिरते बचा। इस पर भी मोहम्मद यूनुस सरकार ने बेशर्म रवैया दिखाया। कहानी यहीं तक नहीं रुकती बल्कि शेख मुजीब से जुड़ा हर एक चिन्ह मिटाने का प्रयास लगातार किया गया। चाहे उनकी जयंती पर होने वाले समारोह को रोका जाना हो या फिर नोटों पर से उनका फोटो हटाना। बांग्लादेश की सरकार इस विरासत मिटाने का हर प्रयास कर रही है। मोहम्मद यूनुस की सरकार के इन क़दमों के पीछे उसका इस्लामी कट्टरपंथ का एजेंडा है, जो मुजीब को नहीं देखना चाहता।

तानाशाह बनने की तरफ अग्रसर हैं मोहम्मद यूनुस

यह सब करने के बाद के बाद मोहम्मद यूनुस बिना चुने ही बांग्लादेश को हमेशा के लिए अपने शासन तले रखना चाहते हैं। मोहम्मद यूनुस को जब सत्ता सौंपी गई थी, तब ही उसका कोई संवैधानिक आधार नहीं था। उन्हें अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में लाया गया था। यह नहीं पता चल पाया कि यह अंतरिम सरकार है कौन। खैर, वह जब सत्ता आए थे तो यह उम्मीद जताई गई थी कि पहले की तरह बांग्लादेश में अब चुनाव होंगे।

मोहम्मद यूनुस को सत्ता पर काबिज हुए 1 वर्ष हो गया है। लेकिन चुनाव का नाम लेते ही वह बिदक जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश में इसी को लेकर एक संकट तक पैदा हो गया था। आखिर में मोहम्मद यूनुस ने 2026 के मध्य तक चुनावों की बात किसी तरह कही। उनके इन सब क़दमों से लगता है कि वह स्वयं ही बांग्लादेश के बिना चुने तानाशाह बनना चाहते हैं।

चोल साम्राज्य के महान राजा के नाम पर PM मोदी ने किया सिक्का जारी, धूमधाम से मनी जयंती: महादेव की आराधना के बाद बोले प्रधानमंत्री- चोल विरासत एकता-गौरव का प्रतीक

तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का जश्न मनाया। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण की शुरुआत की स्मृति में भी यह उत्सव आयोजित किया गया।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित एक प्रदर्शनी का अवलोकन किया। यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत को याद करने का अवसर था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था।

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पीएम मोदी ने की पूजा-अर्चना

प्रधानमंत्री का स्वागत पारंपरिक तमिल रीति-रिवाजों के साथ किया गया। मंदिर के पुजारियों ने ‘पूर्ण कुंभम’ के साथ उनका अभिनंदन किया। पीएम मोदी ने वेष्टि (धोती), सफेद कमीज और गले में अंगवस्त्र पहनकर मंदिर की परिक्रमा की और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा करते पीएम मोदी

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, वो चोल वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की भव्यता और इसके नक्काशीदार गलियारे, मूर्तियाँ और प्राचीन शिलालेख आज भी दुनिया भर में प्रशंसा का विषय हैं।

समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन, वित्त मंत्री टी. थेनारासु, हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ निधि मंत्री पी.के. शेखर बाबू और परिवहन मंत्री एस.एस. शिवशंकर सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा आयोजित चोल शैव धर्म और वास्तुकला पर आधारित प्रदर्शनी का भी दौरा किया। इस प्रदर्शनी में चोल साम्राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को दर्शाया गया था। इसके बाद पीएम मोदी को चोल मंदिर की तस्वीर और स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में सिक्का जारी

समारोह का एक मुख्य आकर्षण था राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में एक स्मारक सिक्के का विमोचन। इस सिक्के के जरिए चोल साम्राज्य के इस महान सम्राट की उपलब्धियों को सम्मान दिया गया। राजेंद्र चोल-प्रथम (1014-1044 ई.) ने अपने शासनकाल में चोल साम्राज्य को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तारित किया था। उनकी समुद्री यात्रा और सैन्य विजयों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया था। गंगईकोंडा चोलपुरम को उन्होंने अपनी शाही राजधानी बनाया और वहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी उनकी दूरदर्शिता और स्थापत्य कौशल का प्रतीक है।

आदि तिरुवथिरई महोत्सव में शामिल हुए पीएम मोदी

यह समारोह आदि तिरुवथिरई महोत्सव का हिस्सा था, जो 23 जुलाई से शुरू हुआ और 27 जुलाई को समाप्त हुआ। यह उत्सव तमिल शैव भक्ति परंपरा का प्रतीक है, जिसे चोल शासकों ने विशेष रूप से प्रोत्साहित किया था। इस परंपरा को 63 नयनमार संतों और उनकी भक्ति कविताओं ने और समृद्ध किया।

इस साल यह उत्सव और भी खास था क्योंकि यह राजेंद्र चोल की जन्म नक्षत्र तिरुवथिरई (अर्द्रा) के साथ मेल खाता था। समारोह में शिवाचार्य और ओथुव (शिव भजनों में पारंगत गायक) ने भक्ति भजनों के साथ पीएम मोदी का स्वागत किया, जिससे माहौल और भी आध्यात्मिक हो गया।

पीएम मोदी ने चोल विरासत को बताया भारत की एकता का सूत्र

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में चोल साम्राज्य को भारत के स्वर्णिम युगों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि राजेंद्र चोल और उनके पिता राजराजा चोल ने भारत की सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

चोल साम्राज्य ने न केवल भारत में, बल्कि श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार और कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। पीएम ने इस बात पर जोर दिया कि चोल शासकों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया था और उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन के साथ उसी दिशा में काम कर रही है।

उन्होंने काशी-तमिल संगमम और सौराष्ट्र-तमिल संगमम जैसे आयोजनों का जिक्र किया, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का प्रयास हैं।

पीएम मोदी ने यह भी बताया कि नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान तमिल शैव परंपरा के संतों ने आध्यात्मिक नेतृत्व किया था और तमिल संस्कृति से जुड़े पवित्र सेंगोल को संसद में स्थापित किया गया। यह क्षण भारत की सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।

चोल साम्राज्य की प्रेरणा से सैन्य और प्रशासनिक सुधार

प्रधानमंत्री ने चोल साम्राज्य की सैन्य और प्रशासनिक उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने बताया कि राजराजा चोल ने एक शक्तिशाली नौसेना की नींव रखी, जिसे राजेंद्र चोल ने और मजबूत किया। चोल साम्राज्य ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ प्रणाली के जरिए लोकतांत्रिक चुनाव की शुरुआत की थी, जो उस समय की वैश्विक मान्यताओं से कहीं आगे थी।

पीएम मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि चोल शासकों ने जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को महत्व दिया था। राजेंद्र चोल ने गंगा जल को उत्तर भारत से दक्षिण भारत लाकर चोल गंगा झील (अब पोन्नेरी झील) में स्थापित किया था, जिसे आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रतीक माना जाता है।

पीएम मोदी ने आधुनिक भारत को चोल विरासत से जोड़ा

पीएम मोदी ने कहा कि चोल साम्राज्य की आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धियाँ आज भी भारत को प्रेरित करती हैं। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ अपनी सरकार के प्रयासों का जिक्र किया।

पीएम मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए मिशन मोड में काम किया है। विदेशों से चुराई गई 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ भारत वापस लाई गई हैं, जिनमें से 36 तमिलनाडु की हैं। इनमें नटराज, लिंगोद्भव, दक्षिणामूर्ति और अर्धनारीश्वर जैसी मूर्तियाँ शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि भारत की शैव दर्शनशास्त्र वैश्विक मंच पर भी मान्यता प्राप्त कर रहा है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भारत की सफल लैंडिंग के बाद उस स्थान को ‘शिव-शक्ति’ नाम दिया गया, जो भारत की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रतीक है।

पीएम ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने भारत की संप्रभुता के खिलाफ किसी भी खतरे का जवाब देने की ताकत को दिखाया है। यह ऑपरेशन दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत अपने दुश्मनों के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं छोड़ेगा।

तमिलनाडु में स्थापित होंगी राजाराजा चोल और राजेंद्र चोल की मूर्तियाँ

प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी, जो भारत के ऐतिहासिक गौरव को दर्शाएँगी। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को डॉ. कलाम और चोल शासकों जैसे लाखों युवाओं की जरूरत है, जो शक्ति और समर्पण से देश के सपनों को साकार करें।

गंगईकोंडा चोलपुरम में आयोजित यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत का उत्सव है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा तमिलनाडु के लोगों के लिए एक यादगार पल रहा, जिसमें उन्होंने चोल शासकों की उपलब्धियों को नमन किया और भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के अपने विजन को दोहराया। यह समारोह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के मंत्र को और मजबूत करने का एक शानदार अवसर साबित हुआ।