शांति दूत बनने की होड़ में आगे बढ़ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब रूस को धमकी दे डाली है। हर देश में संघर्ष रुकवाने का श्रेय लेने वाले ट्रंप ने कहा है कि अगर 50 दिन के अंदर रूस यूक्रेन के साथ शांति समझौता नहीं करता है तो इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो (NATO) के सेक्रेटरी जनरल मार्क फ्रूट से नाटो के ओवल कार्यालय में बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा है कि शांति समझौता न करने पर रूस के सामानों पर 100% तक टैरिफ लगाया जाएगा।
इसे लेकर व्हाइट हाउस की ओर से भी एक बयान जारी हुआ है। इस बयान में सेकेंड्री टैरिफ की बात को भी शामिल किया गया है। असल में सेकेंड्री टैरिफ से मतलब उन देशों पर है जो रूस से तेल समेत अन्य सामान आयात करते हैं।
ट्रंप ने कहा है कि रूस से तेल समेत अन्य व्यापार करने वाले देशों पर सेकेंड्री टैरिफ चुकाना होगा। गौरतलब है कि इन देशों में भारत भी शामिल है। अमेरिका को भारत के रूस से तेल लिए जाने पर पहले भी आपत्ति रही है। हालाँकि भारत ने इस आपत्ति को दरकिनार करते हुए रूस से तेल आयात करना जारी रखा है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, यदि 50 दिनों के अंदर रूस, यूक्रेन के साथ अपने संघर्षों पर कोई समझौता नहीं कर पता है तो न केवल रूस पर बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी बड़े और कड़े टैरिफ लगाए जाएँगे।
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार कोशिश हो चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है। इसके बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने अपना ‘टैरिफ बम’ फोड़ा है।
बताते चलें कि अमेरिका की ओर से अब तक 25 देश पर टैरिफ की घोषणा की जा चुकी है। कई देशों में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने टैरिफ की बात पत्र लिखकर भेजी है। ट्रंप के टैरिफ की नई दरें 1 अगस्त 2025 से लागू की जाएँगी।
हालाँकि इनमें कई देश ऐसे भी हैं जिनको टैरिफ की सूची से अब तक बाहर रखा गया है जिसमें रूस भी अब तक शामिल था। ट्रंप की इस नई शर्त के सामने रूस क्या प्रतिक्रिया देगा, यह जानना दिलचस्प होगा क्योंकि इससे पहले भी ट्रंप की बात को खारिज कर दिया था।
किन देशों पर लगे हैं टैरिफ
ट्रंप ने अपने ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ के तहत कई देशों पर 20 से 50% तक टैरिफ लगाया है। इसके तहत जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, कजाकिस्तान, ट्यूनीशिया, ब्रुनेई, माल्दोवा पर 25% टैरिफ, श्रीलंका, लीबिया, अल्जीरिया, दक्षिण अफ्रीका, इराक, हर्जेगोविना के साथ यूरोपीय यूनियन के देशों में 30% टैरिफ, इंडोनेशिया पर 32% टैरिफ, कनाडा, बांग्लादेश और सर्बिया पर 35% टैरिफ, थाईलैंड और कंबोडिया पर 36% टैरिफ, म्यांमार और लाओस पर 40% और ब्राजील में 50% तक टैरिफ की दरें शामिल की गई हैं।
रूस को धमकी, यूक्रेन को हथियार
एक तरफ रूस को टैरिफ की धमकी देकर ट्रंप दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ दोस्ती प्रगाढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को आर्थिक और तकनीकी यहयोग देने की बात कही है।
President Trump on Ukraine: "We make the best equipment, the best missiles… the European nations know that… We've made a deal today where we're going to be sending them weapons and they're going to be paying for them. The United States will NOT be having any payment made." pic.twitter.com/oKYzkKW4Is
अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा, ‘नाटो के जरिए कई हजार करोड़ डॉलर के अमेरिकी हथियार यूक्रेन के युद्धक्षेत्र में पहुँच रहे हैं। इसमें एयर डिफेंस, मिसाइल और ड्रोन टेक्नोलॉजी शामिल हैं।’
ट्रंप के विशेष दूत कीथ कैल्लॉग भी कीव पहुँचे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात को ‘प्रोडक्टिव’ बताया और कहा कि अब अमेरिका, यूरोप और यूक्रेन मिलकर डिफेंस प्रोडक्शन और खरीद में भी साझेदारी करेंगे।
एअर इंडिया हादसे की शुरूआती जाँच रिपोर्ट के बाद लगातार एक्शन और आदेशों का दौर जारी है। भारत से लेकर देश-विदेश तक एयरलाइन अपने विमानों की जाँच में जुटी हैं। सरकारें भी उन्हें कील-कांटे दुरुस्त करने को कह रही हैं। लेकिन इस बीच कहानी का एक हिस्सा पहले दिन से अभी तक एक जैसा ही है। यह है किसी तरह पायलटों को दोषी बताने का। चाहे AAIB की जाँच रिपोर्ट के सामने आने से पहले आई विदेशी मीडिया की खबरों की बात हो या फिर जाँच रिपोर्ट के तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना, यह प्रयास अब भी जारी हैं।
इस मामले में सामने आई AAIB की जाँच रिपोर्ट ने बताया था कि एअर इंडिया की फ्लाईट AI 171 के क्रैश होने का कारण फ्यूल कंट्रोल स्विच का बंद हो जाना था। रिपोर्ट में बताया गया था कि इसके चलते इंजनों को तेल नहीं पहुँचा और यह बंद हो गए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि फ्यूल कंट्रोल स्विच के बंद होने को लेकर पायलटों की आपस में बात हुई थी। इस बातचीत में एक पायलट ने स्विच बंद करने को लेकर दूसरे से पूछा और दूसरे पायलट ने इससे इनकार कर दिया।
अब इस मामले में अमेरिकी विमान नियामक FAA और विमान निर्माता बोइंग ने दावा किया है कि उसके विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच एकदम सही हैं। FAA ने कहा है कि फ्यूल कंट्रोल स्विच को रोकने के लिए लगाए जाने वाले लॉक को लेकर कोई भी निर्देश जारी करने की जरूरत अभी नहीं दिखाई पड़ती है। FAA के आदेश का अर्थ यह है कि बोइंग के किसी भी विमान में वर्तमान में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर जाँच करने की जरूरत नहीं है और बोइंग के हिस्से पर कोई गड़बड़ नहीं है।
FAA की यह एडवायजरी ऐसे समय में आई है जब भारत से लेकर दक्षिण कोरिया और एतिहाद जैसी एयरलाइन अपने विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। FAA की एडवायजरी एक तरह से बोइंग का बचाव भी करती है। लेकिन यह कोई नया प्रयास नहीं है। ऐसा लगता है कि बोइंग को बचाने की पटकथा शुरुआत से ही लिखी जा रही थी। इसका पहला प्रमाण विदेशी मीडिया की रिपोर्ट लगी थीं।
दरअसल, अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं। यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई।
यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने नहीं किया था। वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था। इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी।
यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया। AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। अब इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई है जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई है।
ऐसे में लगता है कि सारा दोष पायलटों पर मढ़ के बोइंग की साख को बचाने के लिए किया जा रहा है। पायलटों को बलि का बकरा बनाना वैसे भी बोइंग की पुरानी आदत रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2019 और 2020 में हुए 737 मैक्स विमान के हादसे हैं। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के विमानों के साथ हुए थे। इन हादसों में 346 लोग मारे गए थे।
इन हादसों के बाद न्यू यॉर्क टाइम्स के साथ एक बातचीत में बोइंग के CEO डेविड कोल्हान ने कहा था,”वहाँ (एशिया और अफ्रीका) के पायलटों का अनुभव, अमेरिकी पायलटों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।” उन्होंने सीधे तौर पर पायलटों को कम अनुभव वाला और हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था। इन्हीं हादसों को लेकर डेविड कोल्हान से पहले बोइंग के CEO रहे डेनिस मुलिनबर्ग ने भी ऐसी ही टिप्पणी की थी।
उन्होंने हादसों के बाद अमेरिकी संसद के सामने कहा था कि उनके विमान (737 मैक्स) एकदम ठीक थे लेकिन पायलटों ने सारे कदम नहीं उठाए, जिसके चलते विमान हादसे का शिकार हो गए। इन दोनों की बातें आगे चलकर एकदम झूठ साबित हुई थीं। यह दोनों विमान हादसे बोइंग की ही एक गलती के चलते हुए थे। बोइंग ने अपने 737 मैक्स में MCAS नाम का एक सॉफ्टवेयर लगाया था जो विमान के आगे के हिस्से को अधिक ऊपर उठने से रोकता था।
इसके विषय में बोइंग ने पायलटों को नहीं बताया था। यह सॉफ्टवेयर खुद ही काम करता था। बोइंग के पायलटों को इस विषय में ना बताने के पीछे कारण था कि यह विमान खरीदने वाली एयरलाइंस को उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती जो बड़ा खर्च होता। इसके अलावा इस सिस्टम का प्रमाणन भी बोइंग को करवाना पड़ता, यह भी एक खर्चीली प्रक्रिया है। बोइंग की बेइमानी का परिणाम यह हुआ कि यह दोनों हादसे हो गए। इन दोनों हादसे में विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह नीचे की तरफ गोते खाने लगा और अंत में जाकर क्रैश हो गया।
इसके पीछे कारण था कि MCAS सॉफ्टवेयर लगातार इन दोनों में विमानों को नीचे की तरफ दबाता रहा और पायलट चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए। बोइंग ने पहले तो अपनी गलती स्वीकार ही नहीं की और इन दोनों एयरलाइंस के पायलट पर ही दोष मढ़ दिया। बाद में हुई जाँच में सच्चाई खुली और बोइंग को लगभग ₹20 हजार करोड़ का जुर्माना झेलना पड़ा था और MCAS में गड़बड़ी की बात भी स्वीकार करनी पड़ी थी।
भारत-नेपाल सीमा पर मस्जिद-मदरसे बनाने और धर्मांतरण के खेल के लिए दक्षिण भारत की से फंडिंग हो रही थी। यह फंडिंग सैकड़ों करोड़ में है। नकद के अलावा यह फंडिंग UPI के जरिए भी हुई है। आयकर विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
आयकर विभाग ने गृह मंत्रालय को यह विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में फंडिंग के अलावा रिपोर्ट में नेपाल से सटे जिलो में मुस्लिम आबादी बढ़ने की भी जानकारी है। इनमें श्रावस्ती, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर जैसे जिले शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कई जिलों के गाँवों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है तो वहीं हिंदू आबादी घटी है।
नेपाल सीमा के जिलों की डेमोग्राफी बदलने का यह अभियान बीते एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है। इसमें कई एंगल से जाँच चल रही है।
आयकर विभाग की छापेमारी में मिले फंडिंग के सबूत
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल से सटे रक्सौल, रुपैडीहा, बढ़नी आदि इलाकों में ₹2000 के नोट अवैध तरीके से बदले जा रहे थे। इसकी सूचना पर आयकर विभाग अलर्ट हुआ और छापेमारी की। विभाग ने बड़े स्तर पर बैंक खातों में ट्रांजेक्शन की जाँच की, जिसमें UPI के जरिए संदिग्ध खातों में करोड़ो रुपए के लेन-देन की जानकारी लगी।
आयकर विभाग की शुरुआती जाँच में ₹150 करोड़ की फंडिंग के सुराग भी मिले हैं। इसका इस्तेमाल अवैध धर्मांतरण के साथ मस्जिद, मदरसे और मजारें बनाने में किया जा रहा है। जाँच में एक मुस्लिम व्यक्ति के बैंक खाते में करीब ₹12 करोड़ पहुँचे थे, जो कि तमिलनाडु की एक संस्था द्वारा भेजे गए थे।
योगी सरकार ने अवैध मस्जिद-मदरसों पर लगातार की कार्रवाई
आयकर विभाग की रिपोर्ट में अब साफ हो गया है कि नेपाल से सटे जिलों में इस्लामिक कट्टरपंथी अपनी पैंठ जमाने में लगे हैं। ये बात कोई नई नहीं हैं, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लगातार इसके खिलाफ ऑपरेशन चलाए हुए हैं। इन जिलों में अवैध मस्जिद-मदरसों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है।
उत्तर प्रदेश और नेपाल के बीच 7 जिलों की 570 किलोमीटर की सीमा पर रोज अवैध ढाँचे समतल किए जा रहे हैं। महाराजगंज से लेकर सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत और लखीमपुर में इन कब्जों को चिन्हित किया जा रहा है। लगातार 2025 में ऐसे सैंकड़ों अवैध ढाँचे गिराए गए हैं।
ऑपइंडिया ने बताई थी नेपाल सीमा पर बदलती डेमोग्राफी की सच्चाई
नेपाल से सटे जिलों के गाँवों में डेमोग्राफी बदलने कोई नई बात नहीं है। यह अभियान सालों से चला आ रहा है। ऑपइंडिया इस समस्या को परखने के लिए जमीनी स्तर पर पहुँचा थे। ग्राउंड रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे भी हुए। नेपाल सीमा के आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी कई गुना बढ़ी है।
साल 2022 की इस ग्राउंड रिपोर्ट में नेपाल की सीमा से 15 किलोमीटर के दायरे में सैंकड़ों से अधिक मस्जिद और मदरसे पाए गए। अकेले बलरामपुर जिले में बॉर्डर से 15 किलोमीटर 150 मदरसे चल रहे हैं। इसके अलावा इसी क्षेत्र में नेपाल सीमा से 15 किलोमीटर क्षेत्र में मस्जिदों की संख्या 200 से अधिक है।
इन दोनों के अतिरिक्त लगभग 10 स्थान ऐसे भी हैं, जहाँ मस्जिद के ही अंदर मदरसे चल रहे हैं। हाल ही में पकड़ा गया छांगुर पीर इसी बलरामपुर का है। उसे भी विदेशी फंडिंग का खुलासा हुआ था। इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि कई गाँव जो पहले हिन्दू बहुल हुआ करते थे वो अब मुस्लिम बहुल हो चुके हैं।
नेपाल में 20 साल में मुस्लिम आबादी दोगुना
केवल नेपाल सीमा से सटे भारत के जिलों में ही नहीं बल्कि उस पार भी मुस्लिम आबादी बढ़ी है। इसकी पुष्टि नेपाल के सांसद अभिषेक सिंह तक ने भी की थी। साल 2022 में ऑपइंडिया से बातचीत में सांसद ने कहा था कि पहले भी मुस्लिम आबादी बढ़ी, लेकिन तब इसका एहसास नहीं हुआ लेकिन अब जब सब सामने नजर आने लगा तब हम लोग चिंतित हैं।
सांसद ने कहा कि पिछले 20 साल के भीतर नेपाल में मुस्लिम आबादी दोगुना हो गई है। उन्होंने बताया कि 20 साल पहले 4.5% मुस्लिम आबादी वाले नेपाल में अब 9% से अधिक मुस्लिम आबादी है। इसी के साथ सांसद ने आने वाले 20 वर्षों में मुस्लिम आबादी कई गुना और बढ़ जाने की आशंका जताई।
केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार (14 जुलाई, 2025) को श्रीनगर की एक मजार पर जाकर फूल चढ़ाए हैं। उन्होंने यहाँ फातिहा भी पढ़ा है। यहाँ पहुँचने के लिए उन्होंने पुलिस से लड़ाई झगड़ा, दीवाल फांदी और श्रीनगर के भीतर काफी हंगामा किया।
उमर अब्दुल्ला ने ‘नक्शाबाद साहिब’ कही जाने वाली इस मजार पर फूल चढ़ाने और इन कथित शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक्स (पहले ट्विटर) पर भी खूब बवाल किया और दावा किया कि उन्हें नजरबन्द किया गया है। उनकी सरकार में शामिल कई और लोगों ने भी यही दावे किए।
This is the physical grappling I was subjected to but I am made of sterner stuff & was not to be stopped. I was doing nothing unlawful or illegal. In fact these “protectors of the law” need to explain under what law they were trying to stop us from offering Fatiha pic.twitter.com/8Fj1BKNixQ
यह सभी इस ‘शहीदों’ वाली मजार पर श्रद्धांजलि देना चाहते थे। इससे पहले उन्होंने जिला प्रशासन से इसकी अनुमति माँगी थी, जिसके लिए इनकार कर दिया गया था। जिस मजार पर उमर अब्दुल्ला ने यह फूल चढ़ाए हैं, उन्हें वह ’13 जुलाई के शहीद’ कहते हैं जबकि असल में यह दंगाई थे। यह लोग 1931 में मारे गए थे।
क्यों हो रहा 13 जुलाई पर बवाल?
इस पूरे बवाल की जड़ 9 दशक पहले की एक तारीख 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है। दरअसल, 13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बार महाराजा हरि सिंह की सेना ने 21 इस्लामी दंगाइयों को गोली मार दी थी। यह इस्लामी दंगाई जेल पर हमला करने आए थे और महाराजा हरि सिंह का तख्तापलट करना चाहते थे।
1948 में जब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य की सत्ता में आई तो इन्हें शहीद का दर्जा दे दिया गया। इस दिन राज्य में छुट्टी भी घोषित की गई। इनको ‘लोकतंत्र’ के लिए आंदोलन करने वाला क्रांतिकारी बताया गया। इनके लिए एक सूफी संत की मजार के पास एक स्मारक भी बनाया गया था।
अब इसी स्मारक पर उमर अब्दुल्ला श्रद्धांजलि देना चाहते थे, जिसकी अनुमति न मिलने पर हंगामा हुआ।
क्या है 13 जुलाई के शहीदों की सच्चाई
कश्मीर में कट्टर मानसिकता वाले लगातार 13 जुलाई की घटना को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ क्रान्ति और जनआंदोलन करार देते हैं। इसे ‘कश्मीर शहीद दिवस’ बताते हैं। कहा जाता है कि यह महाराजा के कथित क्रूर शासन के खिलाफ एक विद्रोह था। जबकि असल में यह एक ‘काफिर’ हिन्दू शासक के खिलाफ लड़ाई थी।
इस सम्बन्ध में कश्मीरी पंडित एक्टिविस्ट सुशील पंडित ने एक लेख में काफी अच्छे से समझाया था। वो मानते हैं कि आधुनिक कश्मीर का पहला नरसंहार तभी हुआ था, वो भी पूरी साजिश के साथ। सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई, ज़िंदा जला दिया गया, विकलांग बना दिया गया और नदी में फेंक दिया गया।
महिलाओं का यौन शोषण और बलात्कार हुआ। कइयों के घर लूट लिए गए तो कइयों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने बताया है कि कैसे जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनमें से कुछ की मौत हो गई, जिसके बाद उनके गिरोह द्वारा उन्हें ‘शहीद’ बता दिया गया।
स्वतंत्र भारत में जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने उन आतंकियों के कृत्यों को ‘पवित्र’ बनाने के लिए नायकों की तरह उनका सम्मान करते हुए 13 जुलाई को उन्हें याद किया जाने लगा। आइए, अब जानते हैं कि असल में उस दिन हुआ क्या था। उस समय जम्मू कश्मीर के स्वायत्त राजा थे हरि सिंह।
तब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख, गिलगिट-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद-मीरपुर और अक्साई चीन के अलावा शक्सगाम घाटी के इलाके भी उनके क्षेत्र का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन, अंग्रेज उनसे कुछ इलाके छीनना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह उन दुर्लभ राजाओं में से एक थे, जिनका शासन मुस्लिम बहुल इलाके में था। इसीलिए, अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत पेशवर के एक अहमदी अब्दुल क़दीर को खानसामा के वेश में श्रीनगर में स्थापित कर दिया।
इसके बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ के शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को भी लाया गया। वो एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति हुआ करता था, जिसकी पुश्तें आज भी जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझती हैं। ख़ानक़ाह मोहल्ला स्थित ‘शाह-ए-हमदान’ में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ अब्दुल क़दीर ने एक भड़काऊ भाषण दिया। महाराजा के विरुद्ध जंग के लिए कुरान का हवाला दिया गया। उसने भड़काया कि एक ‘काफिर’ कैसे मुस्लिमों के ऊपर राज कर सकता है, इसकी इस्लाम में सख्त मनाही है।
कानून के अनुसार जिस गोहत्या पर प्रतिबंध था, उसके लिए उसने मुस्लिमों को खुल कर उकसाया। उसे जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो दंगे भड़क गए। कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिशें हुईं। मज़बूरी में जेल परिसर में ही सुनवाई होती थी। 13 जुलाई को भी एक ऐसी ही सुनवाई थी। लेकिन, भीड़ ने वहाँ हमला कर दिया और जज के चैंबर में घुसने की कोशिश करने लगे। भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और आगजनी शुरू कर दी।
जैसा कि आज भी होता है, जम कर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। जेल के कैदियों ने भी वहाँ से भागने का प्रयास शुरू कर दिया। पुलिस बल ने सारे पैंतरे आजमा लिए, लेकिन मुस्लिम भीड़ तितर-बितर नहीं हुई। कुछ कैदियों को भगा भी दिया गया। इसके बाद स्थानीय DM ने गोली चलाने के आदेश दिए। हरि पर्वत किले की तरफ भी भीड़ चल पड़ी थी। लाठीचार्ज का कोई असर नहीं हो रहा था। महराजगंज तब व्यापारियों का अड्डा हुआ करता था, जहाँ जम कर लूटपाट मचाई गई।
सुशील पंडित लिखते हैं कि इसके बाद भोरी कदल से लेकर आईकदल तक एक लंबी दूरी में हिन्दुओं की दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया और चीजें लूट ली गईं। सफाकदल, गंजी, खुद और नवाकदल जैसे इलाकों में भी जम कर लूटपाट हुई। बाजार में बही-खातों को जला दिया गया और हिन्दू दुकानदारों में भगदड़ मच गई। लाखों के सामान लूट लिए गए, ये सड़कों पर तहस-नहस कर के फेंक दिए गए। हालाँकि, इस दौरान किसी मुस्लिम के दुकान में घुस कर लूटपाट की कोई खबर नहीं आई।
श्रीनगर के विचारनाग में मुस्लिम भीड़ अलग से जुटी हुई थी। वहाँ समृद्ध हिन्दुओं के साथ अत्याचार किया गया और उनकी महिलाओं का यौन शोषण हुआ। जब तक सेना आई, तब तक मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं का बड़ा नुकसान कर दिया था। इसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ गिरोह काम पर लगा और उसने इसे ‘सामंती सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक विद्रोह’ नाम दे दिया। याद कीजिए, मोपला मुस्लिमों द्वारा केरल में किए गए बड़े स्तर के नरसंहार को भी ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह’ कह दिया गया था।
जबकि, असल में कश्मीर में 13 जुलाई, 1931 को जो भी हुआ, वो एक हिन्दू राजा के विरुद्ध इस्लामी जंग था। शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह का भी इन दंगों को भड़काने में बड़ा हाथ था। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। हालाँकि, अगले ही साल महाराजा ने उसे माफ़ी दे दी और उसने ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ का गठन कर के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। मीरपुर में हिन्दुओं ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की। बाद में उनमें से सैकड़ों को शरणार्थी बन कर रहना पड़ा।
हिन्दुओं के गाँव जलाए, मंदिर तोड़े
उस समय इस घटना को देखने वाले बुजुर्गों ने बताया था कि कैसे कइयों को बेरहमी से मार डाला गया और इस्लाम अपनाने को भी कइयों को मजबूर किया गया। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आईं। गुरुग्रंथ साहिब सहित कई पवित्र सनातनी पुस्तकों को जला दिया गया और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किया गया। इसे ’88 ना शौरांश’ कहते हैं, अर्थात 88 का नरसंहार। विक्रम संवत के हिसाब से तब 1988 चल रहा था।
उस घटना के बाद के सैकड़ों परिवार और उनकी पुश्तें दशकों तक पुनर्वास के लिए संघर्ष करती रहीं। खुद अंग्रेजी रिकार्ड्स की मानें तो 31 मंदिरों-गुरुद्वारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। 600 के आसपास जबरन इस्लामी धर्मांतरण के मामले सामने आए। सुक्खचैनपुर और संवल (मीरपुर) के हिन्दुओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अंग्रेज लिखते हैं कि जहाँ भी दंगाई पहुँचे, स्थानीय मुस्लिम जनसंख्या ने उनका साथ दिया।
कुछ हिन्दुओं के गाँवों को तो एकदम से वीरान ही बना दिया गया, ऐसी लूटपाट और तबाही मचाई गई। इसके बाद 18 जनवरी, 1932 को भी हिन्दुओं के 50 गाँवों पर हमला हुआ और 300 घरों को लूटा गया। इनमें से 40 को आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं, 40 हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। थन्ना गाँव में 20 जनवरी, 1932 को फिर से 36 घरों में लूटपाट हुई और 8 को फूँक दिया गया। सोहाना गाँव में 84 घरों में लूटपाट हुई और एक अन्य गाँव में 28 जनवरी को लूटपाट हुई।
जिस कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानों के चंगुल से छुड़ाया था और फिर डोगरा राजाओं ने हिन्दू शासन की स्थापना की, वहाँ के गैर-मुस्लिमों को सदियों के अत्याचार से राहत मिली। लेकिन, इस घटना के बाद से पुनः कश्मीर में पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया। वहाँ भारत का संविधान स्वतंत्रता के बाद भी लागू नहीं हो पाया और मुट्ठी भर अलगाववादियों के अलावा अब्दुल्लाह-मुफ़्ती मिल कर यहाँ इस्लामी शासन चलाते रहे।
मोदी सरकार में रुका गद्दारों का सम्मान
जुलाई 2020 में ऐसा पहली बार हुआ, जब कश्मीर में दंगाइयों को श्रद्धांजलि नहीं दी गई। मोदी सरकार के कारण ये संभव हो पाया। आधुनिक कश्मीर में हिन्दुओं को संगठित तरीके से खदेड़ना के कार्य तभी शुरू हुआ था। अंग्रेजों के षड्यंत्र और इस्लामी भीड़ की हिंसा ने एक हिन्दू सत्ता को उखाड़ने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार किया और बाद में ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे एक अलग रंग दिया। महाराजा हरि सिंह ने इन घटनाओं की जाँच के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बरजोर दलाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को दी।
महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भारतीय एकता की बात की थी, उसी के बाद अंग्रेज सेनाधिकारी मेजर बोट ने अब्दुल कदीर नाम के पठान को वहाँ लाकर बसाया। ये सब एक साजिश का हिस्सा था। ब्रिटिश ने सत्ता सँभालने के बाद अब्दुल कदीर को 1.5 साल में ही रिहा कर दिया, जबकि उसे 5 साल की जेल हुई थी।
कादियाँ नगर के अहमदिया समुदाय ने इस पूरे मामले में अंग्रेजो की खासी मदद की। इस रिपोर्ट में पता चला कि अंग्रेज अधिकारी वेकफील्ड जानबूझ कर उस दिन जेल के पास स्थिति को काबू करने नहीं गया, जबकि सुरक्षा का नियंत्रण उसके पास ही था।
4 जुलाई, 1931 को कुरान की बेअदबी की खबर सामने आई, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन, वेकफील्ड ने जाँच के बाद कुरान के तौहीन की बात प्रचारित की और मुस्लिमों को भड़काया। श्रीनगर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ भड़काऊ सामग्रियाँ भेजी गईं। वेकफील्ड की जगह प्रधानमंत्री बनाए गए हरि कृष्ण कौल ने मुस्लिम दंगाइयों से राज्य का समझौता कराया, लेकिन दंगे नहीं रुके। देश के कई हिस्सों में इस्लामी दंगों का पैटर्न यही रहा है, आज भी यही है।
मशहूर वकील उज्ज्वल निकम आजकल सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रहे हैं। वजह? 26/11 मुंबई हमलों में आतंकी अजमल कसाब को फाँसी की सजा दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले उज्जवल निकम को राष्ट्रपति ने राज्यसभा का नामित सदस्य बनाया है। राष्ट्रपति ने उन्हें ये सम्मान दिया, लेकिन विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस समर्थक और कुछ मुस्लिम एक्टिविस्ट इस बात से भड़के हुए हैं। उज्जवल निकम की पुरानी बात को उठाकर कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ट्रोल कर रहा है, जिसमें निकम ने कहा था कि कसाब को जेल में बिरयानी दी गई।
हालाँकि बाद में निकम ने खुद माना कि ये बात उन्होंने गढ़ी थी, ताकि कसाब के लिए जनता में हमदर्दी न बढ़े। लेकिन अब ट्रोलर्स इसे बीजेपी की साजिश और निकम का झूठ बताकर हमला बोल रहे हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों में कई तरह के लोग शामिल हैं। सबसे ज्यादा सक्रिय हैं कॉन्ग्रेस के लोग, उसके समर्थक और कुछ ऐसे एक्टिविस्ट जो मुस्लिम वोट बैंक से जुड़े मुद्दों पर बोलते रहते हैं।
इसी में से एक हैं कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता और मुंबई हमलों के समय पत्रकार रही सुप्रिया श्रीनेता। सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर लिखा, “निकम ने कसाब को बिरयानी की फर्जी कहानी फैलाई, जिसे बीजेपी ने प्रचार के लिए इस्तेमाल किया और अब निकम को राज्यसभा सीट देकर इनाम दिया गया। इनका कहना है कि निकम ने कॉन्ग्रेस को बदनाम किया।”
यह उज्जवल निकम हैं
राज्यसभा में नॉमिनेट हुए हैं
इससे पहले मुंबई से BJP ने लोक सभा टिकट भी दिया था, लेकिन हार गए थे
तो इन्होंने ऐसा क्या तीर मारा कि यह राज्य सभा पहुँच गए? यहाँ पढ़िये?
▪️मुंबई हमलों में अजमल कसाब को पकड़ा गया था. तब यह Public Prosecutor थे
पप्पू यादव ने लिखा कि मोदी जी ने निकम को झूठ बोलने का इनाम दिया, क्योंकि बिरयानी की बात फर्जी थी।
मोदी जी का मानना है “मेरा झूठ सबसे मज़बूत”
आज उन्होंने UPA सरकार को बदनाम करने के लिए कसाब को बिरयानी परोसने का झूठ बोलने वाले उज्जवल निकम को झूठ का इनाम राज्यसभा सीट के रूप में दिया! pic.twitter.com/eXuGGMoxU3
शेख शफीक अंसारी ने निकम के बयान को कोट किया कि कसाब ने बिरयानी मांगी थी, और बाद में निकम ने खुद माना कि ये झूठ था। इन्हें लगता है कि निकम ने ये सब सांप्रदायिक माहौल बनाने के लिए किया।
उज्वल निकम ने मीडिया से कहा था:
"अजमल कसाब ने जेल में बिरयानी खाने की ज़िद की थी।"
लेकिन कुछ साल बाद उज्ज्वल निकम ने खुद स्वीकार किया कि:
“कसाब ने कभी बिरयानी नहीं मांगी थी, मैंने जनता का ग़ुस्सा बनाए रखने और सहानुभूति को रोकने के लिए यह बात कही थी।” pic.twitter.com/0OIvMt11vb
कॉन्ग्रेस समर्थक पत्रकार ने लिखा कि निकम ने बिरयानी की झूठी कहानी फैलाई, जिससे बीजेपी और संघ को कॉन्ग्रेस के खिलाफ प्रचार का मौका मिला। अब निकम को राज्यसभा सीट सांप्रदायिक सोच के लिए मिली, न कि कानूनी योग्यता के लिए।
उज्ज्वल निकम वहीं वकील हैं जिन्होंने ये झूठ फैलाया कि कसाब को जेल में बिरियानी खिलाई जा रही है। पूरे देश ने उसे सच मानकर मनमोहन सरकार की निंदा की। इससे संघी दुष्प्रचार को मसाला मिला। उसने अपने सांप्रदायिक अभियान में इसका जमकर इस्तेमाल किया। लेकिन असली थू थू तो उज्ज्वल निकम की… https://t.co/mIE9p0aawlpic.twitter.com/eJWAqkSVlw
वैसे, मुकेश कुमार की मानें तो उज्जवल निकम कोई ज्ञानी वकील नहीं हैं और न ही उन्हें कानून से कुछ लेना देना है। खैर, इन हास्यास्पद बातों पर क्या लिखें, ये सोचने का भी मन नहीं करता।
बहरहाल, उज्जवल निकम की ट्रोलिंग की वजह है – बिरयानी वाली बात। 26/11 के मुंबई हमलों के बाद, जब कसाब को पकड़ा गया था, निकम पब्लिक प्रॉसीक्यूटर थे। उन्होंने मीडिया में कहा कि कसाब ने जेल में बिरयानी माँगी थी। ये बात आग की तरह फैली। बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाया और कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार पर हमला बोला कि वो आतंकियों को बिरयानी खिला रही है। बाद में निकम ने माना कि ये बात झूठ थी। उन्होंने ये इसलिए कहा था ताकि कसाब के लिए जनता में कोई हमदर्दी न बढ़े, क्योंकि कुछ लोग कसाब को ‘बेचारा’ दिखाने की कोशिश कर रहे थे।
ट्रोलर्स अब यही बात पकड़कर कह रहे हैं कि निकम ने देश को गुमराह किया, कॉन्ग्रेस को बदनाम किया और अब बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा सीट देकर झूठ का इनाम दिया। लेकिन असल में ये सिर्फ बहाना है। असली वजह है राजनीति और वोट बैंक। ट्रोलर्स खासकर कॉन्ग्रेस समर्थक और कुछ मुस्लिम एक्टिविस्ट इस मुद्दे को उठाकर दो चीजें कर रहे हैं-
बीजेपी को घेरना : निकम को बीजेपी से जोड़ा जा रहा है, क्योंकि बीजेपी ने उन्हें 2024 में मुंबई से लोकसभा टिकट दिया था (हालाँकि वो हार गए) और अब राज्यसभा सीट दी। ट्रोलर्स इसे बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति से जोड़ रहे हैं।
मुस्लिम वोट बैंक को खुश करना : कसाब एक पाकिस्तानी आतंकी था, जिसने 150 से ज्यादा लोगों की जान ली। फिर भी कुछ लोग उसे ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश करते हैं। बिरयानी वाली बात को उठाकर ट्रोलर्स ये दिखाना चाहते हैं कि कसाब के साथ गलत हुआ। ये मुस्लिम वोटर्स को लुभाने की रणनीति है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि कसाब जैसे मुद्दों पर सॉफ्ट कॉर्नर दिखाने से वोट मिलते हैं।
ट्रोलिंग के पीछे की असली वजह क्या है?
वोट की राजनीति : कॉन्ग्रेस और उसके समर्थक जानते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक उनके लिए अहम है। कसाब को लेकर हमदर्दी दिखाकर या निकम को झूठा बताकर वो मुस्लिम कम्युनिटी में ये मैसेज देना चाहते हैं कि वो उनके साथ हैं। उन्हें निकम से कोई खास दिक्कत नहीं है, न ही कॉन्ग्रेस से कोई प्यार – बस बीजेपी को घेरना है और वोट लेना है।
पुरानी हार का बदला : 2008-2012 में कॉन्ग्रेस की सरकार थी, तब निकम सरकारी वकील थे। बिरयानी वाली बात उस समय कॉन्ग्रेस के लिए भी फायदेमंद थी, क्योंकि वो आतंक के खिलाफ सख्त रुख दिखाना चाहते थे। लेकिन अब, जब निकम बीजेपी के साथ जुड़े, तो कॉन्ग्रेस को मौका मिला पुराने हिसाब चुकाने का। वो निकम को निशाना बनाकर बीजेपी पर हमला कर रहे हैं।
ये ट्रोलिंग गलत क्यों है?
दोगलापन : जब कसाब का केस चल रहा था, तब महाराष्ट्र और दिल्ली में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने ही निकम को पब्लिक प्रॉसीक्यूटर बनाया था। निकम ने जो बिरयानी वाली बात कही, वो सरकारी इशारे पर ही कही गई होगी, ताकि कसाब को सजा दिलाने में मदद मिले। उस समय कॉन्ग्रेस ने इसका विरोध नहीं किया। कसाब को फाँसी भी 2012 में कॉन्ग्रेस सरकार ने ही दी। अब वही लोग निकम को झूठा बता रहे हैं, क्योंकि वो बीजेपी के साथ हैं। ये दोगलापन है।
आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करना : निकम ने कसाब को फांसी दिलाकर देश की सेवा की। 26/11 के हमलों में 150 से ज्यादा लोग मरे थे। निकम ने न सिर्फ कसाब को सजा दिलाई, बल्कि ये भी सुनिश्चित किया कि आतंकी के लिए कोई हमदर्दी न बने। लेकिन ट्रोलर्स अब उसी बात को पकड़कर निकम को बदनाम कर रहे हैं। ये आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करता है।
कसाब के लिए हमदर्दी : ट्रोलर्स की बातों से ऐसा लगता है जैसे वे कसाब को बेचारा दिखाना चाहते हैं। बिरयानी वाली बात को बार-बार उठाकर वो ये मैसेज दे रहे हैं कि कसाब के साथ गलत हुआ। ये गलत है, क्योंकि कसाब एक आतंकी था, जिसने बेगुनाहों का खून बहाया।
देश के हीरो का अपमान : निकम ने अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर आतंकियों के खिलाफ केस लड़ा। उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, न कि ट्रोलिंग। ट्रोलर्स सिर्फ पॉलिटिकल स्कोरिंग के लिए एक हीरो को निशाना बना रहे हैं।
दरअसल, 26/11/2008 को मुंबई हमले के बाद पूरा देश गुस्से में था। कसाब को पकड़ा गया और लोग चाहते थे कि उसे सख्त से सख्त सजा मिले। लेकिन कुछ लोग, खासकर लेफ्ट-लिबरल और कुछ एक्टिविस्ट कसाब को ‘बेचारा’ दिखाने की कोशिश कर रहे थे। वे कहते थे कि कसाब गरीब था, मजबूरी में आतंकी बना। ऐसे में निकम ने बिरयानी वाली बात कही, ताकि जनता का गुस्सा बना रहे और कसाब के लिए हमदर्दी न बढ़े। ये एक रणनीति थी और उस समय कॉन्ग्रेस को भी इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन अब, जब निकम बीजेपी के साथ हैं, वही बात ट्रोलर्स के लिए हथियार बन गई।
निशाना निकम नहीं, बल्कि भाजपा और मुस्लिम वोटबैंक
ट्रोलर्स का मकसद निकम को बदनाम करना नहीं, बल्कि बीजेपी को घेरना और मुस्लिम वोट बैंक को लुभाना है। वे कसाब के लिए हमदर्दी दिखाकर ये मैसेज देना चाहते हैं कि बीजेपी सांप्रदायिक है और कॉन्ग्रेस मुस्लिम समुदाय की हितैषी है। लेकिन सच ये है कि कसाब को फाँसी कॉन्ग्रेस सरकार में ही हुई। अगर निकम ने झूठ बोला, तो उस समय कॉन्ग्रेस ने क्यों नहीं रोका? अब निकम को ट्रोल करना सिर्फ पॉलिटिकल गेम है।
बता दें कि उज्ज्वल निकम एक मशहूर वकील हैं, जो मुंबई में कई बड़े केस लड़ चुके हैं। 1993 के मुंबई ब्लास्ट, गुलशन कुमार मर्डर, प्रमोद महाजन हत्याकांड और सबसे बड़ा – 26/11 का कसाब केस। कसाब ने 166 लोगों की जान ली थी, और निकम ने बतौर पब्लिक प्रॉसीक्यूटर (सरकारी वकील) उसे फाँसी दिलाई। पद्मश्री मिला, Z+ सिक्योरिटी मिली। 2024 में बीजेपी ने उन्हें मुंबई से लोकसभा टिकट दिया, लेकिन वो हार गए। अब राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा में भेजा है। लेकिन ये बात अब कॉन्ग्रेसियों को पच नहीं रही।
उज्ज्वल निकम एक ऐसे वकील हैं, जिन्होंने देश के लिए बड़ा काम किया। कसाब जैसे आतंकी को सजा दिलाकर उन्होंने लाखों लोगों का गुस्सा शांत किया। बिरयानी वाली बात एक रणनीति थी, जिसे उस समय की सरकार ने भी सपोर्ट किया था। अब उसे बहाना बनाकर ट्रोल करना गलत है। ट्रोलर्स को न निकम से दिक्कत है, न कॉन्ग्रेस से प्यार – वे सिर्फ वोट की राजनीति और बीजेपी को घेरने के लिए ये सब कर रहे हैं। ये दोगलापन है। देश को निकम जैसे लोगों का सम्मान करना चाहिए, न कि उन्हें ट्रोल करना। कसाब जैसे आतंकियों के लिए हमदर्दी दिखाना देश के साथ गद्दारी है। हमें अपने हीरोज का साथ देना चाहिए, न कि पॉलिटिकल गेम में उन्हें नीचा दिखाना।
हिन्दुओं ने सावन माह के पहले सोमवार (14 जुलाई, 2025) को हरियाणा के नूहं में ब्रजमंडल अभिषेक यात्रा निकाली है। इस शोभायात्रा का आयोजन हर साल विश्व हिंदू परिषद (VHP) द्वारा किया जाता है। 80 किलोमीटर लंबी यह शोभायात्रा दोपहर 12 बजे शुरू हुई। इस शोभायात्रा के लिए पुलिस ने इंटरनेट बंद करने समेत तमाम सुरक्षा व्यवस्था की है। यहाँ हजारों जवान भी रास्ते में लगाए गए हैं। इसके अलावा स्कूलों में भी छुट्टी घोषित की गई है। हालाँकि, इस यात्रा के आयोजन से मीडिया के धड़े को समस्या हो गई है।
आजतक की पत्रकार को यात्रा से समस्या
आजतक की एंकर नेहा बाथम ने ब्रज मंडल जलाभिषेक यात्रा की तैयारियों पर रिपोर्टिंग के दौरान एक विवादित बयान दिया। नेहा बाथम ने चैनल के लाइव प्रसारण के दौरान ऑन-ग्राउंड रिपोर्टर से बात करते हुए सवाल किया कि जब सांप्रदायिक तनाव की आशंका थी, तो जुलूस निकालने की इजाज़त क्यों दी गई।
उन्होंने कहा, “जब ऐसी घटना 2023 में होगी, तो जुलूस निकालने की क्या ज़रूरत थी? आख़िरकार, शांति ही पहली प्राथमिकता है।” हैरानी की बात यह है कि रिपोर्टिंग के दौरान, ऑन-ग्राउंड रिपोर्टर अनमोल वली और नेहा ने यह नहीं बताया कि 2023 में निकली ब्रजमंडल यात्रा पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था
तथ्यों से भी की छेड़छाड़
अनमोल ने बताया कि हिन्दू कार्यकर्ता बिट्टू बजरंगी को जुलूस में शामिल होने से रोका गया है। अनमोल ने दावा किया कि उस पर दंगे भड़काने का आरोप लगाया गया था। अनमोल ने यह भी बताया कि जुलूस में ‘त्रिशूल’, ‘बेसबॉल बैट’ जैसे हथियारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
अनमोल ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया कि 2023 में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने ही हिंदुओं, पुलिसकर्मियों और होमगार्डों पर हमला किया था। अनमोल ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया कि मुस्लिमों ने पथराव किया था और हिंदुओं पर लाठियों और डंडों से हमला किया था तथा उन पर गोलियाँ चलाई थीं।
आज तक के पत्रकारों ने उन अभिषेक का ज़िक्र करना नज़रअंदाज़ कर दिया, जिनकी इस हिंसा में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। अभिषेक को पहली गोली मारी गई थी और उनका गला रेत दिया गया था। उनके चेहरे को पत्थरों से कुचल दिया गया था।
आजतक के पत्रकारों ने यह भी बताने से इनकार कर दिया कि कैसे नूंह और आसपास के इलाकों में इस दौरान हिंदुओं की दुकानों को चुन-चुनकर लूटा और आग लगा दी गई।
2023 में मुस्लिमों ने बनाया था हिन्दुओं को निशाना
गौरतलब है कि 31 जुलाई 2023 को इसी नूहं में निकाली गई ब्रजमंडल यात्रा पर इस्लामी कट्टरपंथी हमलावर हो गए थे। उन्होंने हिन्दुओं की गाड़ियों को निशाना बनाया था और यहाँ तक कि मंदिर पर हमला भी किया था। इस हिंसा में सात लोगों की जान चली गई थी और कई घायल हुए थे। कई पुलिस वाहनों को आग लगा दी गई थी।
इस दौरान दुकानों को लूटा और जला दिया गया था। हमले में शिव मंदिर परिसर में मुस्लिम भीड़ ने अभिषेक नाम के एक हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या कर दी थी। उसे गोली मार दी गई थी और उसका सिर कुचल दिया गया था, जिससे बचने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
अपनी तीन साल की बेटी के साथ घर जा रही एक महिला जज पर मुस्लिमों ने हमला किया था। उनकी गाड़ी को आग लगा दी गई थी और वह किसी तरह से बच कर निकल सकीं थी।
ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी शानदार युद्धक क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान की चूलें हिला दी। क्षमता का प्रदर्शन किया, जिसके बाद वैश्विक स्तर पर इसकी माँग में तेजी आई है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ के ब्रह्मोस एयरोस्पेस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की भूमिका के बाद 14-15 देशों ने भारत से इस मिसाइल की माँग की है। उन्होंने एक कार्यक्रम में भी यही बात दोहराई है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह संख्या बढ़कर 17 तक पहुँच गई है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के देश शामिल हैं।
राजनाथ सिंह ने कहा कि यह फैसिलिटी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाएगी और रोजगार सृजन करेगी, साथ ही उत्तर प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को गति देगी। आइए, हम ब्रह्मोस मिसाइल की हर छोटी-बड़ी बात को विस्तार से समझते हैं। साथ ही ये भी जानते हैं कि भारत का इसके साथ भविष्य का प्लान क्या है और दुनिया इसे क्यों चाहती है।
ब्रह्मोस मिसाइल क्या है?
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने मिलकर बनाया है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी से लिया गया है। ये नाम दोनों देशों के बीच दोस्ती और सहयोग का प्रतीक है। ये मिसाइल इतनी तेज, सटीक और घातक है कि इसे रोकना लगभग असंभव है। इसे जमीन से, समुद्र से, हवा से और यहाँ तक कि पनडुब्बी से भी छोड़ा जा सकता है। ये सिर्फ आम हथियार ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर परमाणु हथियार भी ले जा सकती है, जो इसे रणनीतिक तौर पर बहुत खास बनाता है।
ये मिसाइल 1998 में भारत और रूस के बीच हुए एक समझौते से शुरू हुई थी। भारत का डीआरडीओ (डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) और रूस का एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया इस प्रोजेक्ट में साथ आए। भारत के मशहूर वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। 2001 में इसका पहला टेस्ट चाँदीपुर तट पर हुआ, और तब से ये लगातार बेहतर होती गई। आज ये भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना का अहम हिस्सा है।
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने दिखाया जलवा
बता दें कि 10 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस ने पहली बार असल जंग में अपनी ताकत दिखाई। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। इनमें रफीकी, मुरिद, नूर खान, रहीम यार खान, सुक्कुर और चुनियाँ जैसे हवाई अड्डे शामिल थे। स्कर्दू, भोलारी, जैकोबाबाद और सरगोधा के हवाई ठिकानों को भी भारी नुकसान हुआ। सियालकोट और पासरूर के रडार स्टेशन भी निशाने पर थे। इन हमलों में ब्रह्मोस ने SCALP और Hammer जैसे हथियारों के साथ मिलकर काम किया और अपनी सटीकता से दुश्मन को हैरान कर दिया।
11 मई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में ब्रह्मोस की नई फैसिलिटी के उद्घाटन के दौरान इसकी तारीफ की थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि इस ऑपरेशन के बाद 14-15 देशों ने ब्रह्मोस खरीदने की इच्छा जताई। ये पहला मौका था जब ब्रह्मोस को युद्ध में इस्तेमाल किया गया, और इसने दुनिया को दिखा दिया कि ये कितना दमदार हथियार है।
ब्रह्मोस की खासियतें बनाती हैं इसे बेमिसाल
ब्रह्मोस की कई ऐसी खूबियाँ हैं, जो इसे दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में शुमार करती हैं। आइए, इन खूबियों को एक-एक करके विस्तार से समझते हैं –
तेज रफ्तार (सुपरसोनिक स्पीड) : ब्रह्मोस की रफ्तार ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना, यानी मैक 2.8 से मैक 3 तक है। अगर आप इसे आसान भाषा में समझें, तो ये इतनी तेज है कि दुश्मन को इसका जवाब देने का समय ही नहीं मिलता। उदाहरण के लिए, अमेरिका की टॉमहॉक मिसाइल सबसोनिक है, यानी ध्वनि की गति से कम तेज। लेकिन ब्रह्मोस की रफ्तार इसे पलक झपकते टारगेट तक पहुँचा देती है। इसकी वजह से दुश्मन के डिफेंस सिस्टम, जैसे मिसाइल शील्ड इसे रोकने में नाकाम रहते हैं।
फायर एंड फॉरगेट सिस्टम : इसका मतलब है कि ब्रह्मोस को एक बार छोड़ने के बाद उसे और कोई निर्देश देने की जरूरत नहीं। ये अपने आप टारगेट को ढूँढ लेती है। ये सिस्टम इसे बहुत तेज और सुरक्षित बनाता है, क्योंकि छोड़ने वाला प्लेटफॉर्म (जैसे जहाज या विमान) फौरन वहाँ से हट सकता है, जिससे उस पर हमले का खतरा कम हो जाता है।
छुपने की खूबी (स्टील्थ डिजाइन) : ब्रह्मोस का डिजाइन ऐसा है कि इसे रडार से पकड़ना बहुत मुश्किल है। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन बहुत छोटा है, और इसमें स्टील्थ मटेरियल का इस्तेमाल हुआ है। आसान भाषा में कहें, तो ये मिसाइल दुश्मन के रडार की नजरों में कम आती है, जिससे इसे ट्रैक करना और रोकना मुश्किल हो जाता है।
कई जगह से छोड़ने की क्षमता (मल्टी-प्लेटफॉर्म) : ब्रह्मोस को आप जमीन पर मोबाइल लॉन्चर से, समुद्र में युद्धपोत या पनडुब्बी से या हवा में सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू विमान से छोड़ सकते हैं। ये लचीलापन इसे हर तरह की जंग में उपयोगी बनाता है। मिसाल के तौर पर अगर समुद्र में दुश्मन का जहाज है, तो नौसेना इसे जहाज या पनडुब्बी से छोड़ सकती है। अगर जमीन पर कोई ठिकाना निशाने पर है, तो सेना या वायुसेना इसे हिट कर सकती है।
हर मौसम में काम करने की ताकत : चाहे भारी बारिश हो, धुंध हो, रात हो या दिन, ब्रह्मोस हर हाल में अपना काम बखूबी करती है। ये खराब मौसम में भी टारगेट को सटीक निशाना बना सकती है। ये खासियत इसे उन मिसाइलों से अलग करती है, जो मौसम की वजह से कमजोर पड़ जाती हैं।
बेहद सटीक निशाना : ब्रह्मोस की सटीकता इतनी जबरदस्त है कि ये 1-2 मीटर के दायरे में टारगेट को हिट कर सकती है। यानी अगर आप किसी बिल्डिंग की खिड़की को निशाना बनाना चाहें, तो ये उसी खिड़की को हिट करेगी। इसकी तेज रफ्तार और सटीकता मिलकर इसे भारी तबाही मचाने वाला हथियार बनाते हैं।
लंबी रेंज: ब्रह्मोस की सामान्य रेंज 290 किलोमीटर है, लेकिन नए वेरिएंट में ये 450 किलोमीटर तक जा सकती है। कुछ खबरों की मानें, तो 800 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन भी टेस्टिंग में है। इतनी दूरी तक मार करने की क्षमता इसे रणनीतिक तौर पर बहुत अहम बनाती है।
कई रास्तों से टारगेट तक पहुँचना: ब्रह्मोस अलग-अलग रास्तों से टारगेट तक पहुँच सकती है। जैसे ये समुद्र के ऊपर सिर्फ 3-10 मीटर की ऊँचाई पर उड़ सकती है (जिसे सी-स्किमिंग कहते हैं) या फिर ऊँचाई से गोता लगाकर हमला कर सकती है। ये रास्ते बदलने की खूबी इसे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम से बचाती है।
जैमिंग और चकमा देने की ताकत : इसमें एडवांस्ड सेंसर जैसे इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और जीपीएस हैं, जो इसे सटीक रास्ता दिखाते हैं। साथ ही, इसमें जैमिंग तकनीक है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस को भटका देती है। ये मिसाइल उड़ान के दौरान रास्ता बदल सकती है, जिससे इसे पकड़ना और मुश्किल हो जाता है।
दो चरणों वाला इंजन : ब्रह्मोस में दो चरणों का प्रणोदन सिस्टम है। पहला चरण सॉलिड प्रणोदक बूस्टर है, जो इसे शुरुआती तेज रफ्तार देता है। दूसरा चरण लिक्विड रैमजेट इंजन है, जो इसे लगातार सुपरसोनिक स्पीड देता है। ये इंजन इसे लंबी दूरी तक तेज उड़ान भरने में मदद करता है।
भारी विस्फोटक ले जाने की क्षमता : ये मिसाइल 200-300 किलो का वॉरहेड ले जा सकती है। इतना भारी विस्फोटक किलेबंद ठिकानों, जैसे बंकर या सैन्य इमारतों को भी आसानी से नष्ट कर सकता है। इसकी तेज रफ्तार की वजह से विस्फोट का असर और बढ़ जाता है।
फोटो साभार: AI Dall-E
हर जरूरत के लिए तैयार रहता है ब्रह्मोस
ब्रह्मोस के कई वेरिएंट हैं, जो अलग-अलग कामों के लिए बनाए गए हैं। आइए, इन्हें समझते हैं:
जहाज से छोड़ा जाने वाला वर्जन : भारतीय नौसेना के युद्धपोत, जैसे INS राजपूत, इस वर्जन का इस्तेमाल करते हैं। ये समुद्र और जमीन दोनों पर हमला कर सकता है। इसे एक बार में 8 मिसाइलों के सैल्वो (समूह) में छोड़ा जा सकता है, जो दुश्मन के जहाजों या ठिकानों को तबाह कर देता है।
जमीन से छोड़ा जाने वाले वर्जन: भारतीय सेना के पास 4-6 मोबाइल लॉन्चर वाले ब्रह्मोस कॉम्प्लेक्स हैं। ये तीन तरह के कॉन्फिगरेशन में काम करते हैं-
ब्लॉक I: सटीक हमले के लिए।
ब्लॉक II: सुपरसोनिक डाइव के साथ टारगेट चुनने की क्षमता।
ब्लॉक III: पहाड़ी इलाकों में हमले के लिए।
ये लॉन्चर न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल और केमिकल (NBC) हमलों से बचाने वाले एयर-कंडीशंड कम्पार्टमेंट के साथ आते हैं।
हवा से छोड़ा जाने वाला वर्जन: सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान से छोड़ा जाता है। 2017 में बंगाल की खाड़ी में इसका पहला टेस्ट हुआ था। ये वर्जन लंबी दूरी से हमला करने में सक्षम है।
पनडुब्बी से छोड़ा जाने वाला वर्जन : 2013 में विशाखापट्टनम तट से इसका टेस्ट हुआ। ये 50 मीटर गहराई से छोड़ा जा सकता है, जो इसे स्टील्थ अटैक के लिए आदर्श बनाता है।
ब्रह्मोस-NG (नेक्स्ट जेनरेशन) : ये छोटा, हल्का और ज्यादा स्टील्थ वाला वर्जन है, जो राफेल और नौसैनिक जरूरतों के लिए बन रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स होंगे, जो इसे और खतरनाक बनाएँगे।
हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-II : ये भविष्य का वर्जन है, जो मैक 8 की रफ्तार और 1500 किमी रेंज के साथ आएगा। ये दुनिया की सबसे तेज मिसाइलों में से एक होगी।
ब्रह्मोस के एक्सपोर्ट पर दुनिया की नजर
मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के नियमों के कारण, भारत एक्सपोर्ट के लिए 290 किमी रेंज वाला वर्जन देता है, जो खास तौर पर जहाजों को निशाना बनाने (एंटी-शिप) के लिए है। भारत अपने लिए 300 से 450 किमी और भविष्य में 800 किमी रेंज वाले वर्जन रखता है। चूँकि ये भारत-रूस का जॉइंट वेंचर है, इसलिए एक्सपोर्ट के लिए रूस की मंजूरी भी जरूरी है।
फिलीपींस ने ब्रह्मोस खरीदने का सौदा किया है। इसके अलावा वियतनाम, थाईलैंड, सिंगापुर, ब्रुनेई, ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना, वेनेजुएला, मिस्र, सऊदी अरब, यूएई, कतर और ओमान जैसे देशों ने इसमें रुचि दिखाई है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन देशों का भरोसा और बढ़ गया, क्योंकि इसने असल जंग में अपनी ताकत साबित की।
भविष्य के लिए ब्रह्मोस को और ताकतवर बना रहा है भारत
भारत का ब्रह्मोस को लेकर बड़ा और महत्वाकांक्षी प्लान है। लखनऊ में नया प्लांट मास प्रोडक्शन के लिए बनाया गया है, ताकि भारत अपनी और वैश्विक मांग को पूरा कर सके। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ये प्लांट न सिर्फ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा, बल्कि उत्तर प्रदेश में रोजगार और उद्योग को भी बढ़ावा देगा। वहाँ की बेहतर कानून-व्यवस्था और इन्फ्रास्ट्रक्चर (एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, मेट्रो) की वजह से निवेश बढ़ रहा है।
भारत के कुछ खास प्लान
800 किमी रेंज वाला वर्जन: एक एक्सटेंडेड-रेंज वर्जन टेस्टिंग में है, जो भारत की रणनीतिक ताकत को और बढ़ाएगा।
पनडुब्बी वर्जन का टेस्ट: P75I प्रोग्राम के तहत पनडुब्बियों से ब्रह्मोस को और बेहतर किया जाएगा। जल्द ही इसका टेस्ट होगा।
हल्का और छोटा वर्जन: राफेल और अन्य लड़ाकू विमानों के लिए ब्रह्मोस-NG बन रहा है, जो छोटा, हल्का और ज्यादा स्टील्थ होगा।
हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-II : मैक 8 की रफ्तार और 1500 किमी रेंज वाला ये वर्जन भविष्य में गेम-चेंजर होगा।
एक्सपोर्ट बढ़ाना : भारत ब्रह्मोस को बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट करने की योजना बना रहा है। फिलीपींस के बाद वियतनाम और अन्य देशों से बातचीत चल रही है।
लखनऊ प्लांट भारत की आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
लखनऊ-कानपुर हाईवे पर बना ब्रह्मोस एयरोस्पेस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी भारत की आत्मनिर्भरता का बड़ा कदम है। ये प्लांट बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए बनाया गया है, ताकि भारत न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करे, बल्कि दुनिया की माँग को भी पूरा कर सके। राजनाथ सिंह ने कहा कि ये सुविधा उत्तर प्रदेश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देगी और हजारों नौकरियाँ पैदा करेगी। भारत का प्लान है कि सबसे एडवांस्ड वर्जन अपने पास रखे और कम रेंज वाले वर्जन एक्सपोर्ट करे। लेकिन ये कम रेंज वाले वर्जन भी दुनिया के ज्यादातर मिसाइल सिस्टम से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं।
दुनिया क्यों चाहती है ब्रह्मोस?
ब्रह्मोस की मैक 3 की रफ्तार और 1-2 मीटर की सटीकता इसे बेजोड़ बनाती है। ये दुश्मन के लिए बड़ा खतरा है। ब्रह्मोस को हर प्लेटफॉर्म जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से छोड़ा जा सकता है, जो इसे हर तरह की जंग के लिए उपयोगी बनाता है। स्टील्थ डिजाइन, कम रडार सिग्नेचर और चकमा देने की क्षमता इसे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम से बचाती है। ये मिसाइल न सिर्फ पारंपरिक जंग के लिए है, बल्कि परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता इसे रणनीतिक तौर पर अहम बनाती है।
ब्रह्मोस मिसाइल भारत की सैन्य ताकत और तकनीकी प्रगति का एक चमकता सितारा है। ऑपरेशन सिंदूर में इसकी सफलता ने दुनिया को दिखा दिया कि ये कितना घातक और भरोसेमंद हथियार है। लखनऊ का नया प्लांट और भारत का एक्सपोर्ट प्लान इसे वैश्विक रक्षा बाजार में और मजबूत करेगा। भविष्य में हाइपरसोनिक और एक्सटेंडेड-रेंज वर्जन के साथ ब्रह्मोस भारत को और ताकतवर बनाएगा। ये न सिर्फ भारत की रक्षा को मजबूत करता है, बल्कि दुनिया में भारत का कद भी बढ़ाता है।
उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हिंदू युवती से दुष्कर्म करने वाले नावेद उर्फ कासिब पठान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। नावेद के फोन से अश्लील तस्वीरें और वीडियो मिली हैं। नावेद ने अब तक 18 हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फँसाया है। इसमें नावेद का भाई कैफ भी शामिल था।
पुलिस ने बताया कि नावेद के फोन में अलग-अलग लड़कियों के साथ फोटो मिली हैं। इसके अलावा 4 विभिन्न नामों से इंस्टाग्राम आईडी भी मिली हैं, इनमें लगभग 1900 फोटो पोस्ट किए गए हैं।
दरअसल, शनिवार (12 जुलाई 2025) को एक हिंदू युवती ने चौक कोतवाली थाने में नावेद उर्फ कासिब पठान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। युवती ने बताया कि 2 साल पहले ‘शिव वर्मा’ नाम से नावेद ने सोशल मीडिया पर दोस्ती की। फिर शादी का झाँसा देकर दुष्कर्म किया।
नावेद और उसका भाई कैफ हिंदू लड़कियों को बनाते निशाना
नावेद और उसका भाई हिंदू लड़कियों को निशाना बनाकर फँसाते है। फिर दुष्कर्म कर वीडियो भी बनाते है। उसी वीडियो से ब्लैकमेल कर धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं। नावेद ने भी इसे कबूल कर लिया है। इस रैकेट का सरगना आकिल है।
वहीं, शाहजहाँपुर में पीड़िता ने भी शिकायत में बताया कि नावेद के साथ-साथ उसका भाई कैफ ने भी पीड़िता से दुष्कर्म किया। साथ ही गर्भवती होने पर नावेद, उसके भाई कैफ, अब्बा आलम, अम्मी उजमा और बहन समन ने गर्भपात के लिए मजबूर किया। पीड़िता ने विरोध किया तो नावेद ने पेट पर लात मारकर गर्भपात करा दिया।
माथे पर तिलक और हाथ में कलावा बाँधकर युवती से मिलता
शिकायत करने वाली युवती ने बताया कि नावेद माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में कलावा बाँधकर उससे मिलता था। शुरू में वह खुद को हिंदू बताता था। हिंदू देवी-देवताओं की कसम भी खाता था। इंस्टाग्राम पर शिव वर्मा नाम से आईडी बनाई थी। वहीं युवती से दोस्ती की थी। इसके अलावा अन्य हिंदू युवतियों को भी फँसाया था।
युवती ने बताया कि 11 जुलाई 2025 को नावेद को फोन देखा तो असलियत सामने आई। उसका असली नाम नावेद उर्फ कासिब पठान है। वह पहले सदर बाजार क्षेत्र के मोहल्ला तारीन बहादुरगंज में रहता था। युवती ने नावेद के फोन में अश्लील वीडियो भी देखे।
इस बारे में जब पीड़िता ने उससे पूछा तो नावेद ने कहा कि हिंदू लड़कियों से संबंध बनाना हमारे लिए सवाब का काम है। नावेद ने युवती को खूब पीटा और जबरन धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाने लगा।
नावेद और उसका भाई हिंदू युवतियों को निशाना बनाते थे। सोशल मीडिया पर फर्जी हिंदू नाम से अकाउंट बनाकर लड़कियों को प्रेमजाल में फँसाते थे। इसमें आशंका जताई जा रही है कि ये दोनों भाई बलरामपुर में सामने आया छांगुर के धर्मांतरण गैंग से मिले हो सकते हैं। नावेद अब तक 18 हिंदू युवतियों को फँसा चुका है।
धर्मांतरण गैंग चलाने वाला छांगुर पीर 1000 मुस्लिम लड़कों को हिन्दू लड़कियों फँसाने के लिए फंडिंग देता था। उसने उन जिलों को टारगेट बनाया था जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक हैं। उसने इनका सर्वे करवाया था। इसके लिए भी उसने हजारों लड़के लगा रखे थे।
सर्वे करवा बना रहा था टारगेट
छांगुर पीर का धर्मांतरण नेटवर्क 579 जिलों में फैला हुआ था। उसने इसके लिए देश भर में एक सर्वे करवाया था। उसे पता चला था कि देश के 600 से अधिक जिलों में से यही 579 जिले हैं जहाँ हिन्दू बहु संख्यक हैं। उसने यहाँ धर्मांतरण के लिए 3000 से अधिक गुर्गों को प्रशिक्षण दिया था कि वह हिन्दुओं का धर्मांतरण करवाएँ।
उसका यह नेटवर्क नेपाल के सीमावर्ती जिलों में सक्रिय था। इनकी कमान छांगुर पीर की करीबी नीतू रोहरा उर्फ नसरीन संभालती थी। ये सब बातें छांगुर पीर ने आतंकवाद निरोधी दस्ता (एटीएस) की रिमांड के चौथे दिन की पूछताछ में कबूली हैं।
रविवार (12 जुलाई 2025) को छांगुर पीर और नीतू उर्फ नसरीन को आमने-सामने बिठाकर सवाल-जवाब किए गए। एटीएस के अधिकारियों के अनुसार, छांगुर पीर से धर्मांतरण के बारे में जब भी पूछा गया, तो उसने एक ही रट लगाई कि एक भी अवैध धर्मांतरण नहीं कराया। उसने दावा किया कि सबने अपनी मर्जी से ही इस्लाम कबूल किया।
जब छांगुर से पैसे देकर धर्मांतरण की बात पूछी गई तो उसने गोलमोल जवाब दिए। उधर, जब बैंक खातों का ब्यूरो पूछा गया तो छांगुर ने जवाब दिया कि उसको सिर्फ अपने खाते के बारे में पता है। वहीं नसरीन ने कहा कि सारे खातों का हिसाब छांगुर ही रखता था। नसरीन ने कहा कि वह केवल अपने 8 खातों के बारे में जानती है।
1000 मुस्लिम लड़कों का गिरोह तैयार किया
जाँच में यह भी सामने आया है कि छांगुर ने हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फँसाने के लिए 1000 मुस्लिम लड़कों को तैयार किया था। ये गिरोह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल के 7 जिलों में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाता था। इसके लिए छांगुर मुस्लिम लड़कों को मोटी रकम देता था।
यह लड़के हिन्दू लड़कियों को निशाना बनाने के लव जिहाद जैसी ट्रिक्स का इस्तेमाल करते थे। इनका भी पता लगाया जा रहा है। इसके लिए फंडिंग का कैसे इस्तेमाल हुआ था, यह भी ढूंढा जा रहा है। इसके लिए ATS के साथ ही NIA कार्रवाई कर रही है।
ED भी कर रही है जाँच
धर्मांतरण का नेटवर्क चलाने वाले छांगुर पीर के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को अहम सबूत मिले हैं। ईडी ने छांगुर पीर के 30 बैंक में 18 बैंक खातों को खंगाल लिया है। इन खातों में लगभग 68 करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ है। बीते तीन महीने में ही इन खातों में 7 करोड़ रुपए जमा कराए गए हैं।
जाँच एजेंसी के अधिकारियों का कहना है कि यह रकम विदेशी फंडिंग नेटवर्क के इकट्ठा किया गया है। इसका इस्तेमाल कर देशभर के विभिन्न जिलों में धर्मांतरण का नेटवर्क चलाया गया और कई प्रॉपर्टी खरीदी गई हैं। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में छांगुर पीर की आलीशान कोठी की कीमत भी करोड़ो आंकी गई थी, यह कोठी भी विदेशी फंडिंग के पैसों से खरीदी गई थी।
इसके अलावा ईडी को बैंकों में संदिग्ध लेन-देन का ब्योरा मिला है, जिनमें NGO, ट्रस्ट और निजी खातों का नेटवर्क शामिल है। ईडी इन सभी संस्थाओं से भी पूछताछ कर सकती है। वहीं, ईडी की टीम बैंक खातों के अलावा छांगुर पीर की प्रॉपर्टीज, आयकर रिटर्न और जमीनों से जुड़ी हर डिटेल खंगाल रही है
1000 मुस्लिम लड़कों का गिरोह तैयार किया
जाँच में यह भी सामने आया है कि छांगुर ने हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फँसाने के लिए 1000 मुस्लिम लड़कों को तैयार किया था। ये गिरोह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल के 7 जिलों में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाता था। इसके लिए छांगुर मुस्लिम लड़कों को मोटी रकम देता था।
धर्मांतरण नेटवर्क चलाने को छांगुर ने बनाए कोडवर्ड्स
छांगुर पीर हिंदू लड़कियों को फँसाकर ब्रेनवॉश करता और फिर धर्मांतरण कर निकाह करा देता था। इसके लिए कोडवर्ड्स का इस्तेमाल किया जाता था।। इसमें लड़कियों को ‘प्रोजेक्ट’ कहा जाता था। ब्रेनवॉश की प्रक्रिया को ‘काजल करना’, लड़की को छांगुर से मिलाने को ‘दीदार करना’ कहा जाता था।
इसी तरह धर्मांतरण को ‘मिट्टी पलटना’ कहते थे। इन कोड्स में छांगुर और उसका गैंग आपस में बातचीत करता था। ताकि किसी को उनके नेटवर्क के बारे में पता न लगे।
अहमदाबाद विमान दुर्घटना की जाँच के बीच बोइंग का कहना है कि उसके ईंधन स्विच लॉक सुरक्षित हैं। फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफएए और विमान निर्माता कंपनी बोइंग ने बयान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि विमान के फ्यूल स्विच लॉक पूरी तरह सुरक्षित हैं।
एफएए ने 11 जुलाई को जारी अपने सर्कुलर में कहा कि फ्यूल कंट्रोल स्विच का डिजाइन और लॉकिंग फीचर्स दूसरे बोइंग विमान की तरह ही हैं। इसलिए बोइंग 787 समेत किसी विमान के लिए एयरवर्थिनेस डायरेक्टिव जारी करने की जरूरत नहीं है।
बोइंग ने एफएए की इस सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा है कि कंपनी किसी भी अतिरिक्त कार्रवाई की सिफारिश नहीं कर रही है। हालाँकि एफएए ने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार किया है।
एएआईबी ने एफएए के एडवाइजरी का जिक्र किया
भारत में अहमदाबाद विमान हादसे की जाँच कर रहा एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट में 2018 के एफएए के एक एडवाइजरी दस्तावेज का उल्लेख है, जिसमें सिफारिश की गई थी कि बोइंग अपने 787 समेत तमाम मॉडल के फ्यूल कटऑफ स्विच की लॉकिंग की जाँच करवाए। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं था।
एअर इंडिया ने कहा है कि उसने इस सिफारिश के मद्देनजर कोई जाँच अभी नहीं की है। जाँच में ये भी पाया गया है कि दुर्घटनाग्रस्त विमान के थ्रॉटल कंट्रोल मॉड्यूल यानी टीसीएम को 2019 और 2023 में बदला गया था। टीसीएम में फ्यूल स्विच भी आता है।
एएआईबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुर्घटनाग्रस्त विमान ने सभी जरूरी निर्देशों का पालन किया था। इसके बावजूद फ्यूल कैसे कटऑफ तक चला गया इसको लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई है।
पायलटों की कोई गलती नहीं- पायलट संघ
भारतीय पायलट संघ यानी एएलपीए इंडिया ने जाँच को पारदर्शी और तथ्यपरक रखने की माँग की है। संघ ने विमान की दुर्घटना में पायलटों की गलती को सिरे से खारिज कर दिया है।
अमेरिका के दो सिक्योरिटी एक्सपर्टस ने भी पायलट संघ की माँग का समर्थन किया है। वहीं एयर इंडिया के प्रवक्ता ने भी कहा है कि कंपनी संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के प्रोटोकॉल का पालन कर रही है और उसे एएआईबी की जाँच पर पूरा भरोसा है।
अहमदाबाद एयरपोर्ट से 12 जून को एयर इंडिया का विमान टेकऑफ करते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिससे 260 लोगों की मौत हो गयी थी।