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राहुल गाँधी पर वीडियो बनाने वाले कलाकार रतन रंजन पर हमला, दिल्ली में स्कॉर्पियो से कुचलने की कोशिश: कॉन्ग्रेस नेता के खिलाफ शिकायत, ऑपइंडिया को बताया- गाड़ी में खींच रहे थे

हास्य कलाकार रतन रंजन का दिल्ली में अपहरण करने की कोशिश की गई। अपहरणकर्ताओं ने इसमें नाकाम रहने पर उनके ऊपर गाड़ी चढ़ाकर उन्हें जान से मारने की कोशिश की, लेकिन इसमें भी वो विफल रहे। इस बीच, रंजन ने शोर मचाया और काफी मशक्कत के बाद खुद को बचाने में कामयाब रहे।

इस दौरान, रतन के दाहिने अँगूठे में अंदरूनी चोट आई है। हमलावर की पहचान दिल्ली यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा के रूप में हुई है। यह घटना तब हुई कि जब रतन रंजन केजरीवाल बनकर मिंटो ब्रिज के पास कुछ यूट्यूबरों को इंटरव्यू देकर आईटीओ की ओर पैदल लौट रहे थे।

इस मामले में पीड़ित रतन रंजन ने दिल्ली डीसीपी के पास कॉन्ग्रेस यूथ के प्रदेश अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा के खिलाफ नामजद तहरीर दी है।

ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़ित रतन रंजन से बातचीत की। उन्होंने बताया कि वह गुरुवार (24 जुलाई 2025) की दोपहर करीब डेढ़ बजे मिंटो ब्रिज के पास अरविंद केजरीवाल बनकर कुछ यूट्यूबरों को इंटरव्यू दे रहे थे। इस बीच एक सफेद रंग की स्कार्पियो गाड़ी आकर कुछ दूरी पर रुकी और उसमें बैठे दो लोगों ने रेकी की। इसके कुछ देर बाद रंजन इंटरव्यू देकर आईटीओ की ओर रवाना हो जाते हैं। रंजन ने देखा कि फिर से वही गाड़ी पीछा करती है तो शक गहरा जाता है।

बीजेपी केंद्रीय कार्यालय के पास गाड़ी सवार लोगों ने खुद को रंजन का समर्थक बताते हुए पास आए। उन लोगों ने कॉलर पकड़ते हुए कहा कि हम बहुत दिनों से खोज रहे हैं तुम हमारे (कॉन्ग्रेस) खिलाफ वीडियो बनाते हो, आज तुम्हें छोड़ेंगे नहीं। इसके बाद उन लोगों ने रंजन पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की। जब इससे बचने के लिए रंजन भाजपा कार्यालय के मीडिया गेट की ओर भागे तो रंजन को पीछे से कॉलर पकड़कर गाड़ी में खींचने की कोशिश की गई। इस बीच काँग्रेस के खिलाफ वीडियो बनाने पर सबक सिखाने की बात कहते हुए हाथापाई की गई।

किसी तरह से रंजन अपना कॉलर छुड़ाकर भागे और फिर आरोपितों की भागने हुए उन्होंने वीडिया भी बनाया। रंजन के मुताबिक गाड़ी में दो लोग सवार थे, जिसमें प्रदेश अध्यक्ष (मुख्य आरोपित) गाड़ी चला रहा था। रतन रंजन द्वारा बनाया गया वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। रंजन के मुताबिक, आरोपित की पहचान गाड़ी और चेहरे से कॉन्ग्रेस यूथ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा के रूप में हुई है।

आपको बता दें कि करीब 15 दिन पहले हास्य कलाकार रतन रंजन ने बिहार राज्य में काँग्रेस द्वारा महिलाओं को सैनेटरी पैड बाँटने की घोषणा पर एक वीडियो बनाया था। इसके बाद बौखलाई काँग्रेस ने रतन रंजन के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में 6 से अधिक मुकदमे कराए थे। हालाँकि रतन रंजन लंबे समय से चुनावों के समय अलग-अलग मुद्दों पर नेताओं की मिमिक्री करते हुए राजनीतिक वीडियो बनाते रहे हैं।

रतन रंजन मूल रूप से बिहार के वैशाली जिले के रहने वाले हैं। बिहार चुनाव के समय उनके ऊपर हुआ हमला काफी चिंताजनक है। बहरहाल, अब नजरें दिल्ली पुलिस पर हैं कि वो शिकायत के आधार पर क्या कार्रवाई करती है।

जेब हुई खाली तो उतरा मुइज्जू का ‘इंडिया आउट’ का सुरूर, ‘मोदी इन’ में बदल गई नीति: जानिए कैसे 2 साल में ही भारत-मालदीव के रिश्तों में हुआ ‘पैराडाइम शिफ्ट’

पिछले दो सालों में भारत और मालदीव के रिश्तों में कई उतार चढ़ाव देखने को मिले हैं। 2 साल पहले मालदीव में ‘इंडिया आउट’ के नारे सुनाई पड़ रहे थे। भारत की मौजूदगी का विरोध मालदीव का एक तबका करता था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के चलते मालदीव का फोकस झगड़ों से हटकर सहयोग पर आ गया है।

2 साल के भीतर ही मालदीव को समझ आ गया कि उसे भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधारना होगा। मालदीव को समझ आया कि हमेशा उसके साथ भारत खड़ा रहा है, और जब ऐसा नहीं हुआ है तो वह संकट में पड़ा है।

बीते 2 सालों में रिश्तों में खटास के एक दौर के बावजूद भारत ने मालदीव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद की है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 400 मिलियन डॉलर (₹3,320 करोड़) की करेंसी स्वैप के जरिए मालदीव की मदद की। वहीं भारतीय स्टेट बैंक ने 100 मिलियन डॉलर (₹830 करोड़) के मालदीव के ट्रेजरी बॉन्ड सबस्क्राइब किए।

मालदीव को समझ आया है कि आसपास के देशों में भारत ही मालदीव का सबसे भरोसेमंद और अहम पार्टनर है।

मालदीव का ऐतिहासिक साझेदार है भारत

भारत और मालदीव के बीच लंबे समय से हिंद महासागर में व्यापार, सांस्कृतिक रिश्ते और सुरक्षा को लेकर सहयोग रहा है। मालदीव की रणनीतिक स्थिति और महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग के पास होने की वजह से यह भारत के लिए समुद्री सुरक्षा में एक अहम साथी है।

1965 में मालदीव की आजादी के बाद भारत पहला ऐसा देश था जिसने उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए जाए थे। भारत ने उसे देश के तौर पर मान्यता दी थी। 1988 में जब मालदीव में तख्तापलट का प्रयास हुआ था, तब भारत ने ऑपरेशन कैक्टस के जरिए समय पर मदद की, जिससे दोनों देशों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हो गए।

भारत ने जरूरत खत्म होने पर अपनी सेना वापस भी बुला ली, जिससे मालदीव में भारत के प्रभुत्व को लेकर चिंताएँ कम हुईं। 2004 की सुनामी और 2014 के जल संकट के वक्त भी भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आया।

ये तीनों संकट दिखाते हैं कि भारत हर मुश्किल में मालदीव और उसकी जनता के साथ खड़ा रहा है। जनवरी 2020 में भारत ने मालदीव को खसरे के टीके की 30,000 डोज भेजकर महामारी से लड़ने में मदद की।

कोविड-19 के दौरान भी भारत ने मालदीव को फौरन और पूरी तरह सहायता दी। इस महामारी में भारत मालदीव की मदद करने वाला पहला देश था। जब भी जरूरत रही भारत ने अच्छे पड़ोसी देश होने की जिम्मेदारी को निभाया और सबसे पहले मदद के लिए सामने आया है।

इसके अलावा भारत ने मालदीव में कई आवास परियोजनाएँ बनाई, इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर जोर दिया और बड़ी संख्या में छात्रों को छात्रवृत्ति दी। इससे दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत हुए। कुल मिलाकर, भारत मालदीव का सबसे भरोसेमंद और करीबी साथी बना हुआ है।

‘इंडिया आउट’ अभियान

मालदीव में विपक्षी दलों द्वारा चलाए गए ‘इंडिया आउट’ आंदोलन ने भारत को मालदीव के अंदरूनी और सुरक्षा मामलों में दखल देने वाला बताया। इंडिया आउट चलाने वालों का दावा था कि भारत की मालदीव के भीतर सैन्य मौजूदगी उसकी संप्रभुता के लिए खतरा है। सच्चाई यह थी कि भारतीय सुरक्षाबल मालदीव भीतर राहत बचाव जैसे कामों में लगे हुए थे।

फरवरी 2021 में विदेश मंत्री एस जयशंकर की यात्रा के दौरान, भारत और मालदीव ने उथुरु थिलाफल्हू (UTF) बंदरगाह के निर्माण पर सहमति जताई थी। इस परियोजना से मालदीव के तटरक्षक बल की क्षमता मजबूत होगी और दोनों देश विकास और सुरक्षा में साझेदार बनेंगे।

उसी समय भारत ने मालदीव को हथियारों की खरीद के लिए 50 मिलियन डॉलर (₹415 करोड़) का लोन भी दिया था। इस दौरान भी भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने की कोशिश भारत विरोधी कुछ समूहों ने की थी।

उन्होंने दावा किया था कि भारत ने मालदीव को जो गश्ती पोत (Patrol vessels) दी हैं, उन पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। इस दावे को पूर्व रक्षा मंत्री मारिया दीदी ने खारिज किया और बताया कि भारतीय दल केवल प्रशिक्षण के लिए वहाँ थे, अब नाव पूरी तरह मालदीव के नियंत्रण में है।

राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू के सत्ता में आने के बाद नवंबर 2023 में मालदीव ने भारत से दूरी बनाना शुरू किया और चीन के करीब आने का रुख अपनाया। मुइज़्ज़ू ने अपने चुनाव अभियान में ‘इंडिया आउट’ का नारा दिया था, ताकि देश में भारत के प्रभाव को कम किया जा सके।

प्रधानमंत्री मोदी की जनवरी 2024 में हुई लक्षद्वीप यात्रा के बाद दोनों देशों के रिश्ते और तनावपूर्ण हो गए। मुइज़्ज़ू के तीन उप-मंत्रियों द्वारा सोशल मीडिया पर मोदी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी ने स्थिति को और खराब कर दिया।

भारत ने इस पर नाराजगी जताई और मालदीव के राजदूत को तलब किया। हालांकि मालदीव सरकार ने कहा कि ये टिप्पणियाँ व्यक्तिगत हैं और संबंधित मंत्री निलंबित किए जा चुके है। इसके बाद भारत में कई लोगों और सेलिब्रिटी ने मालदीव की यात्रा का बहिष्कार करने की अपील की।

इस तरह ‘इंडिया आउट’ आंदोलन से लेकर राजनीतिक विवादों तक, भारत-मालदीव के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं।।

पहले दूर अब पास – मालदीव में मोदी का भव्य स्वागत

मालदीव की लगातार बिगड़ती आर्थिक स्थिति राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू के भारत के प्रति नरम रवैये का बड़ा कारण मानी जा रही है। अगस्त 2024 में राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू ने एक कार्यक्रम के दौरान स्वीकार किया कि भारत हमेशा मालदीव का ‘सबसे करीबी’ और ‘बहुमूल्य’ साझेदार रहा है, जिसने जब भी जरूरत पड़ी मदद की है।

यह कार्यक्रम राष्ट्रपति कार्यालय में आयोजित हुआ था, जहाँ मालदीव के 28 द्वीपों पर बनी जल आपूर्ति और सीवरेज सुविधाओं को सौंपा गया। ये सभी परियोजनाएँ भारत सरकार की ऋण सुविधा के अंतर्गत भारतीय एक्जिम बैंक द्वारा फंड की गई थीं।

मालदीव के घटते विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ते आयात खर्च को संभालने के लिए अक्टूबर 2024 में भारत और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच मुद्रा विनिमय समझौता हुआ। इसके तहत मालदीव को SAARC ढाँचे (2024–2027) के अंतर्गत 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹3,320 करोड़)और 30 बिलियन (₹3,000 करोड़) भारतीय रुपए तक की पहुँच मिली।

इसके बाद, मई 2025 में मालदीव सरकार के अनुरोध पर 50 मिलियन डॉलर (415 करोड़ रुपए) के ट्रेजरी बिल को आगे बढ़ाया गया और मार्च 2025 में भारत ने 69 मिलियन डॉलर (572.7 करोड़ रुपए)की अनुदान सहायता देने का वादा भी किया।

2025 की शुरुआत में मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला खलील और रक्षा मंत्री घस्सान मौमून की भारत यात्रा, दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की दिशा में अहम मानी गई। पिछले साल जब भारत-मालदीव संबंध सबसे निचले स्तर पर थे, ऐसे समय में इन उच्चस्तरीय यात्राओं ने एक सकारात्मक संकेत दिया।

विदेश मंत्री खलील ने एक साक्षात्कार में साफ कहा कि मौजूदा सरकार, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के ‘इंडिया आउट’ अभियान से अलग है। हालाँकि, उस समय विपक्ष के तौर पर उन्होंने इसमें भाग लिया था।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार अब किसी नेता की भारत-विरोधी टिप्पणी से खुद को पूरी तरह अलग रखेगी, चाहे वह नेता सरकार से हो या विपक्ष से। खलील के अनुसार, राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू का मकसद भारत और भारतीय जनता के साथ रिश्तों को मजबूत करना है।

रक्षा मंत्री घस्सान मौमून, जो मालदीव के सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति रहे मौमून अब्दुल गयूम के पुत्र हैं, उन्होंने भी भारत यात्रा जो 8 से 10 जनवरी तक थी उसके दौरान माना कि जब भी मालदीव को किसी संकट का सामना करना पड़ा, भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आया।

इसी तरह, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा कि भारत-मालदीव के बीच रक्षा वार्ताओं से रिश्तों में ‘नई ऊर्जा’ आई है। भारत ने मालदीव की रक्षा क्षमता बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जिसमें रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और सैनिकों को ट्रेनिंग देना शामिल है।

साथ ही, भारत ने मालदीव की राष्ट्रीय रक्षा सेना (MNDF) को कुछ जरूरी उपकरण देने के लिए 4 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹33.2 करोड़)की ग्रांट की घोषणा की। शुरुआती तनावों के बावजूद, मुइज़्ज़ू सरकार ने यह समझा कि भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना रणनीतिक और आर्थिक रूप से जरूरी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत ने रिश्तों को एक नया मोड़ दिया। जिससे व्यापार, सुरक्षा और दोनों के विकास को प्राथमिकता देने वाली इन पहलों ने दोनों देशों को और करीब लाया। माले का व्यावहारिक रवैया भारत की ‘पड़ोसी पहले’ और SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) नीति के अनुरूप है।

कौशल विकास, छात्रवृत्तियाँ, और डिजिटल पेमेंट (UPI और रूपे) जैसी साझेदारियों ने भारत की छवि को मालदीव के विकास में एक सच्चे साथी के रूप में और मजबूत किया है। ‘इंडिया आउट’ से ‘मोदी इन’ की ओर हुआ यह बदलाव दिखाता है कि भारत-मालदीव के रिश्ते कितने मजबूत और लचीले हैं।

भारत ने सांस्कृतिक जुड़ाव, रणनीतिक धैर्य और आर्थिक कूटनीति के जरिए मालदीव में अपनी भरोसेमंद साझेदारी को बनाए रखा है। हालाँकि माले की घरेलू राजनीति और चीन के प्रभाव को संतुलित करना अब भी एक चुनौती है, लेकिन यह नई साझेदारी भविष्य में साझा समृद्धि और हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम है।

यह संबंध सिर्फ रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि दोनों की तरक्की और क्षेत्रीय स्थिरता की एक मिसाल भी है। क्योंकि भारत हमेशा एक पहले मदद देने वाले और लंबे समय तक साथ निभाने वाले साझेदार की भूमिका में रहा है।

3 साल-14 राउंड बातचीत के बाद India-UK ने साइन की CETA डील, 99% भारतीय सामानों पर 0% ड्यूटी: ₹2.8 लाख करोड़ का व्यापार बढ़ेगा, जानिए दोनों देशों को समझौते से कितने फायदे

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गुरुवार (24 जुलाई 2025) का दिन बेहद खास रहा। इसी दिन भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने आखिरकार अपने बीच कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच और मजबूत नेतृत्व का नतीजा है, जो भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ जोड़ने का काम कर रहा है।

इस समझौते पर भारत की ओर से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने और यूके की ओर से बिजनेस एंड ट्रेड सेक्रेटरी जोनाथन रेनॉल्ड्स ने साइन किए। इस मौके पर खुद प्रधानमंत्री मोदी, यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, विदेश मंत्री एस जयशंकर और यूके की चांसलर रैचेल रीव्स भी मौजूद थे। यह डील मोदी जी के यूके विजिट के दौरान साइन हुई, जो दोनों देशों के बीच सालों से चल रही बातचीत का खुशखबरी भरा अंत है।

अब आप सोच रहे होंगे कि यह CETA क्या है और क्यों इतना बड़ा माना जा रहा है? सरल शब्दों में कहें तो यह एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) है, जो दोनों देशों के बीच सामान और सेवाओं के व्यापार को आसान बनाएगा। पहले जहाँ सामान भेजने पर भारी टैक्स या ड्यूटी लगती थी, अब वो कम या जीरो हो जाएगी। इससे भारत के कारोबारियों, किसानों, मजदूरों और युवाओं को नए मौके मिलेंगे।

वर्तमान में भारत-यूके का द्विपक्षीय व्यापार करीब 56 अरब डॉलर (लगभग 4.7 लाख करोड़ रुपए) का है। इस समझौते का लक्ष्य है कि 2030 तक यह दोगुना से ज्यादा हो जाए, यानी 120 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) तक पहुँच जाए। कुछ रिपोर्ट्स में यह आँकड़ा 112 अरब डॉलर बताया गया है, लेकिन ज्यादातर सोर्सेज 120 बिलियन पर सहमत हैं। यह डील 2040 तक सालाना 34 अरब डॉलर (करीब 2.8 लाख करोड़ रुपए) का अतिरिक्त ट्रेड बूस्ट देगी, जो दोनों देशों की GDP को मजबूत करेगी।

भारत-ब्रिटेन यहाँ तक कैसे पहुँचे?

यह समझौता रातोंरात नहीं हुआ। बातचीत की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब ब्रिटेन ब्रेक्जिट के बाद नए ट्रेड पार्टनर्स ढूँढ रहा था। भारत भी ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिए तैयार था। तीन साल की लंबी नेगोशिएशंस के बाद 6 मई 2025 को दोनों देशों ने एग्रीमेंट इन प्रिंसिपल पर सहमति जताई। फिर 22 जुलाई 2025 को भारत की यूनियन कैबिनेट ने इसे अप्रूव किया और अब 24 जुलाई 2025 को यह साइन हो गया।

नेगोशिएशंस में कई राउंड्स हुए – कुल 14 राउंड्स, जहाँ मुद्दे जैसे टैरिफ कट्स, वीजा रूल्स, IPR प्रोटेक्शन और संवेदनशील सेक्टरों की सुरक्षा पर बहस हुई। भारत ने अपनी तरफ से डेयरी, एग्रीकल्चर और फिशिंग जैसे क्षेत्रों को प्रोटेक्ट किया, जबकि यूके ने EVs, व्हिस्की और फाइनेंशियल सर्विसेज पर फोकस किया।

MEA (मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स) के मुताबिक, टैरिफ एक्सक्लूजन्स बहुत कम हैं, मतलब ज्यादातर ट्रेड फ्री होगा। यह डील रैटिफाई होने के बाद कुछ महीनों में लागू हो जाएगी और इसका असर तुरंत दिखना शुरू हो जाएगा।

CETA की मुख्य खासियतों को जानिए – इसमें क्या-क्या शामिल

यह समझौता सिर्फ सामान बेचने-खरीदने तक सीमित नहीं है। यह एक कॉम्प्रिहेंसिव डील है, जो गुड्स, सर्विसेज, इनवेस्टमेंट, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, जीआई टैग्स और प्रोफेशनल मोबिलिटी को कवर करता है।

सबसे बड़ी बात कि भारत के 99% निर्यातों पर यूके में जीरो ड्यूटी मिलेगी, जो लगभग 100% ट्रेड वैल्यू को कवर करती है। मतलब भारत से यूके जाने वाले सामान पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इससे भारत के एक्सपोर्ट्स में 23 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) के नए अवसर खुलेंगे। यूके की तरफ से भारत 90% ब्रिटिश प्रोडक्ट्स पर टैरिफ कट करेगा, जिससे यूके को 6 अरब पाउंड (करीब 6500 करोड़ रुपए) का इनवेस्टमेंट और एक्सपोर्ट बेनिफिट मिलेगा।

सेवाओं में यूके ने पहली बार इतनी बड़ी कमिटमेंट्स दी हैं। आईटी/आईटीईएस, फाइनेंशियल सर्विसेज, प्रोफेशनल सर्विसेज, एजुकेशन, टेलीकॉम, आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियाँ यूके के बाजार में आसानी से एंट्री कर सकेंगी।

इस डील का एक खास ब्रेकथ्रू है डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC)… जो भारतीय वर्कर्स और उनके एम्प्लॉयर्स को यूके में सोशल सिक्योरिटी पेमेंट्स से 3 साल तक छूट देगा। इससे कंपनियों की लागत 20-30% कम होगी और वर्कर्स की सैलरी बढ़ेगी। इसके अलावा ये समझौता सस्टेनेबल डेवलपमेंट, इनोवेशन और नॉन-टैरिफ बैरियर्स को कम करने पर फोकस करता है। महिलाओं, युवाओं और MSMEs को स्पेशल प्रोविजन्स हैं, जैसे ट्रेड फाइनेंस और ग्लोबल पार्टनरशिप्स।

सेक्टर-वाइज फायदे: किसको क्या मिलेगा?

चलिए अब आपको डिटेल में बताते हैं कि इस डील से अलग-अलग सेक्टरों को क्या बेनिफिट्स मिलेंगे।

मैन्युफैक्चरिंग और लेबर बेस्ड सेक्टर

टेक्सटाइल्स, लेदर, फुटवेयर, जेम्स एंड ज्वैलरी, टॉयज और मरीन प्रोडक्ट्स जैसे क्षेत्रों में बड़ा बूस्ट। इन पर 99% जीरो ड्यूटी मिलेगी।

उदाहरण: लेदर और फुटवेयर एक्सपोर्ट्स यूके में 900 मिलियन डॉलर (7500 करोड़ रुपए) को पार कर सकते हैं। तिरुपुर और कानपुर जैसे टेक्सटाइल हब्स में लाखों नौकरियाँ बढ़ेंगी।

कुल एक्सपोर्ट ग्रोथ: इन सेक्टरों से 10-15% सालाना बढ़ोतरी की उम्मीद। इससे कारीगरों, बुनकरों और महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे छोटे उद्यमों को फायदा। MSMEs को IPR और GI प्रोटेक्शन से ग्लोबल रिकग्निशन मिलेगा।

कृषि और किसान

किसान यूके के 375 अरब डॉलर के एग्री मार्केट तक पहुँच पाएँगे। 95% एग्री प्रोडक्ट्स पर ड्यूटी-फ्री एक्सेस।

नए मार्केट्स: जैकफ्रूट, मिलेट्स, ऑर्गेनिक हर्ब्स और अन्य उत्पाद। मरीन एक्सपोर्ट्स (फिशिंग) पर 99% जीरो ड्यूटी, जो मछुआरों की आय 20-30% बढ़ा सकती है।

संवेदनशील सेक्टर सुरक्षित: डेयरी, सेब, एडिबल ऑयल्स पर कोई टैरिफ कट नहीं। पारंपरिक फार्मिंग नॉलेज को पेटेंट प्रोटेक्शन।

ब्लू इकोनॉमी: मरीन सेक्टर में इंडिया की ताकत को अनलीश करेगा, जो एक्सपोर्ट को 5-10 बिलियन डॉलर बढ़ा सकता है।

सर्विसेज और युवा प्रोफेशनल्स

75,000 भारतीय वर्कर्स को 3 साल की सोशल सिक्योरिटी छूट। 36 सर्विस सेक्टरों में नो इकोनॉमिक नीड्स टेस्ट।

35 यूके सेक्टरों में 24 महीने तक काम करने का मौका, बिना लोकल ऑफिस की जरूरत। हर साल 1,800+ शेफ, योगा इंस्ट्रक्टर और म्यूजिशियंस यूके जा सकेंगे

आईटी, फाइनेंशियल, एजुकेशन में बड़ा बाजार: इंडियन टैलेंट को हाई-वैल्यू जॉब्स। DCC से लागत कम होने से कंपनियाँ ज्यादा हायर करेंगी।

उपभोक्ताओं और अन्य सेक्टरों को लाभ

भारतीयों को यूके के प्रोडक्ट्स सस्ते में मिलेंगे: व्हिस्की, EVs, चॉकलेट्स, कॉस्मेटिक्स, कार्स, सैल्मन फिश आदि पर टैरिफ कट।

मैन्युफैक्चरिंग: इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, केमिकल्स में ट्रांसफॉर्मेशन। फूड प्रोसेसिंग और प्लास्टिक्स में 15-20% ग्रोथ।

स्टार्टअप्स: यूके इनवेस्टर्स और इनोवेशन हब्स तक एक्सेस, जो ग्लोबल एक्सपैंशन में मदद करेगा।

अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक असर

यह डील हजारों जॉब्स क्रिएट करेगी। यूके में हजारों ब्रिटिश जॉब्स सिक्योर होंगी, जबकि भारत में MSMEs और लेबर-इंटेंसिव सेक्टरों से लाखों नई नौकरियाँ आएँगी। ट्रेड बूस्ट से GDP ग्रोथ 0.5-1% बढ़ सकती है। इनवेस्टमेंट: यूके से 6 बिलियन पाउंड का फ्लो, जो इंडियन इंडस्ट्रीज में लगेगा। जेंडर-इक्विटेबल ग्रोथ: महिलाओं को फाइनेंस और ग्लोबल चेन में शामिल होने से एम्पावरमेंट। कुल मिलाकर यह ‘मेक इन इंडिया’ को फास्ट ट्रैक देगा और भारत को ग्लोबल ट्रेड लीडर बनाएगा।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए पीएम मोदी और यूके के पीएम कीर स्टारमर को बधाई दी। उन्होंने कहा कि 99% भारतीय निर्यात पर शून्य ड्यूटी से करीब 23 अरब डॉलर के नए अवसर खुलेंगे, खासकर मेहनत पर आधारित सेक्टरों के लिए। इससे कारीगर, बुनकर और MSMEs को समृद्धि मिलेगी। उन्होंने बताया कि कपड़ा, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण, खिलौने और मछली उत्पादों में रोजगार बढ़ेगा। महिलाओं को फाइनेंस और वैश्विक वैल्यू चेन में गहराई से शामिल होने का मौका मिलेगा।

किसानों के लिए 95% कृषि उत्पादों पर ड्यूटी फ्री निर्यात और मछुआरों के लिए 99% मछली उत्पादों पर शून्य ड्यूटी से उनकी आय बढ़ेगी। इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, केमिकल्स, फूड प्रोसेसिंग और प्लास्टिक जैसे विनिर्माण सेक्टरों में भी बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता नौकरी सृजन, समुदायों को सशक्त करने और भारत की रणनीतिक व्यापार नेतृत्व को मजबूत करने में मदद करेगा।

CETA भारत और यूके के बीच एक नया युग शुरू करेगा। यह समझौता भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में ले जाएगा। इससे नौकरियाँ बढ़ेंगी, निर्यात में उछाल आएगा और दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते मजबूत होंगे। महिलाओं, युवाओं, किसानों और MSMEs को नई संभावनाएँ मिलेंगी। उदाहरण के लिए तिरुपुर और कानपुर जैसे शहरों में जूते और कपड़े के उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, जिससे लाखों लोगों को काम मिलेगा। इसी तरह किसानों को अपने जैविक उत्पादों को यूके में बेचने का मौका मिलेगा, जो उनकी जिंदगी बदल सकता है।

इस समझौते से समाज के हर वर्ग को फायदा पहुँचेगा। पीएम मोदी के विजन और पीयूष गोयल की मेहनत से यह संभव हुआ है। आने वाले सालों में यह समझौता भारत को आर्थिक रूप से और मजबूत करेगा और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य हकीकत में बदल सकता है। यह सिर्फ एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि भारत की तरक्की की एक नई कहानी है।

महाराष्ट्र के ठाणे में जमीन कब्जा 17000 स्क्वायर फीट में फ़ैल गई दरगाह, बॉम्बे HC ने गिराने से रोक पर किया इनकार: कहा- यहाँ ज्यादा लोग आते हैं, इससे ये वैध नहीं हो जाती

बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के ठाणे में एक दरगाह गिराने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह दरगाह पहले 160 स्क्वायर फीट में थी और बाद में धीमे-धीमे इसने 17 हजार स्क्वायर फीट जमीन पर कब्जा कर लिया था। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यहाँ आने वालों की संख्या के नाम पर कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा, “हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि किसी भीड़ के आने और कहीं बड़ी संख्या में ज्यादा लोगों के आने के आधार पर यह दरगाह कानूनी सरंचना साबित हो जाती है। यह जमीन हड़पने और उसके तरीके का एक क्लासिक मामला है इस तरह से जमीन हड़पने को कोर्ट अपनी मंजूरी नहीं दे सकती।”

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में दरगाह ट्रस्ट की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा ट्रस्ट ने उस जमीन को कभी खरीदा ही नहीं और ना ही किसी तरह की निर्माण अनुमति ली। कोर्ट ने कहा कि केवल चैरिटी कमिश्नर द्वारा सार्वजनिक नोटिस जारी करना भूमि पर स्वामित्व या कब्जे का प्रमाण नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ने यह जमीन एक निजी व्यक्ति की है, जिसने सिविल कोर्ट में अतिक्रमण का मुकदमा जीत लिया है। 5 अप्रैल 2025 को ठाणे के सिविल न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि ट्रस्ट ने उस जमीन पर अवैध अतिक्रमण किया है और न तो वों मालिक है और न ही कब्जेदार।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके संज्ञान में आने वाले पक्ष को दावे पर सही होना चाहिए और अपने अधिकारों को साबित करने के लिए पुख्ता दस्तावेज पेश करने चाहिए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्ट ने दरगाह को मिले नोटिस के जवाब में कोई ठोस तर्क नहीं दिया और सुनवाई तक में हिस्सा नहीं लिया।

आखिरकार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्ट की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ट्रस्ट न तो जमीन का मालिक है, न ही उसने किसी भी तरह की अनुमति ली है। दरगाह की संरचना पूरी तरह अवैध है और इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।

कोर्ट ने ठाणे नगर निगम को तोड़ने की कार्रवाई को जारी रखने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी संस्था इस तरह से सार्वजनिक या निजी भूमि पर कब्जा कर निर्माण नहीं कर सकती और फिर उसे मजहबी स्थल का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिश नहीं कर सकती।

वहीं हाई कोर्ट के सामने दरगाह ट्रस्ट का तर्क था कि यह दरगाह 1982 के पहले से ही उस स्थान पर मौजूद है और वह ‘मजहबी केंद्र’ है। हालाँकि, उनकी कोई दलील काम नहीं आई।

मामला क्या है?

यह मामला ठाणे जिले की गज़ी सलाउद्दीन रेहमतुल्ला होल दरगाह से संबंधित है। इसे ठाणे नगर निगम (TMC) ने अवैध करार देते हुए गिराने का आदेश दिया था। TMC के अनुसार, यह दरगाह पहले 160 वर्ग फुट में बनी थी, लेकिन धीमे-धीमे इसे बिना किसी वैध अनुमति के बढ़ाकर 17,610 वर्ग फुट कर दिया गया।

ट्रस्ट ने इस विध्वंस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने मई 2024 में ट्रस्ट की दलीलों को खारिज करते हुए नगर निगम के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहाँ कोर्ट ने ट्रस्ट को यह छूट दी कि वह हाईकोर्ट में दोबारा आवेदन दाखिल कर सके और राहत माँगे। हालाँकि, इस बार भी दरगाह वैध नहीं सिद्ध हुई।

कोलकाता में 5 बार नमाज पढ़ती थीं आगरा की 2 हिन्दू बहनें, इस्लाम से जन्नत नसीब होने की करती थीं बात: पिता ने बताया- रेस्क्यू ना होता तो निकाह करवा देता धर्मांतरण गैंग

कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से बचाई गई आगरा की दो सगी हिंदू बहनों के माता-पिता परेशान हैं। उन्हें बेटियों के भागने से पहले ही उनके ब्रेनवॉश होने का पता लग गया था। बेटियाँ इस्लामी धर्मांतरण गैंग के इस कदर प्रभाव में थीं कि वह उन्हें ही पूजा से रोकती थीं। यहाँ तक कि वह बचाए जाने के बाद भी घर लौटना नहीं चाहती थीं।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेटियों की माँ बताती हैं धर्मांतरण गैंग के प्रभाव में आने के बाद दोनों बहनें एक ही कमरें में पूरा दिन बिताने लगीं थी। उनके अनुसार, पहले बड़ी बेटी ब्रेनवॉश हुई, उसके बाद छोटी बेटी को भी उसने धर्मांतरण के लिए भड़काया था। फिर दोनों बहनों ने घर से भागने का प्लान बनाया और मार्च में अचानक गायब हो गईं।

पीड़िता के पिता ने बताया है कि उनकी शिकायत पर 4 मई 2025 को पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की। जाँच के बाद बच्चियों को कोलकाता से बचाकर ले आई। पिता ने दैनिक भास्कर को बताया, “पुलिस को सही वक्त पर बच्चियों को पता लग गया, ऐसा न होता तो मेरी कुँवारी बेटियों का अब तक निकाह करवा चुके होते।”

मदरसे वालों ने भेजा कोलकाता

आगरा की दोनों बहनें घर से भागने का प्लान पहले ही बना चुकी थी। इसके बाद 24 मार्च 2025 को जब परिजन घर से बाहर गए हुए थे, तभी दोनों बहने घर से ₹25 हजार रुपए और गहने लेकर भाग गईं और दिल्ली पहुँची। यहाँ एक कार्यालय में धर्म परवर्तन करवाने पहुँची, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। फिर एक मस्जिद गईं, यहाँ से उन्हें मदरसा भेज दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मदरसे में उनकी मुलाकात जोया नाम की मुस्लिम युवती से हुई। जोया ने बहनों को ₹10 हजार रुपए दिए। तीन दिन यहाँ रहने के बाद बहनें बिहार होते हुए कोलकाता चली गईं। यहाँ उन्हें मोहम्मद इब्राहिम उर्फ रीत बनिक से मिलवाया गया।

इब्राहिम ने ही कोलकाता की मुस्लिम बस्ती में दोनों बहनों को कमरा दिलवाया। घर से साथ लाईं नगदी और गहनों से रोजाना का खर्चा निकालने लगीं।

कोलकाता के कमरे में इस्लाम रटती थीं दोनों लड़कियाँ

पुलिस पूछताछ में सामने आया कि दोनों बहनें पूरे दिन में 5 बार नमाज भी पढ़ती थीं। कमरे में रहकर इस्लाम की किताबें रट रहीं थी। पुलिस ने उनके पास से ‘आतंकवाद और इस्लाम’, ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’, ‘धर्म परिवर्तन’ जैसी कई किताबें भी बरामद की हैं। पुलिस को शक है कि दोनों बहनें भी गैंग की सदस्य आयशा जैसा बनना चाहती थीं।

दोनों बहनें विदेश में मुस्लिम युवतियों के मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ने तक की बातें भी करती थीं। पुलिस ने यह भी बताया था कि जब कोलकाता की मुस्लिम बस्ती में बहनों को लेने पहुँची थी, जब उन्होंने वापस आने से इनकार कर दिया था। बहनें इस्लाम से जन्नत नसीब होने की बातें करती थीं। तब बहनों की काउंसलिंग कर उन्हें सुरक्षित आगरा वापस लाया गया था।

आगरा आकर भी जब घर जाने की बात कही, तो बड़ी बहन ने शर्त रख दी। लड़की का कहना था कि सभी पकड़े गए 10 आरोपितों को छोड़े जाने के बाद ही वह घर लौटेंगी। उसका कहना था कि ये लोग अच्छा काम करते हैं और अगर ये सभी जेल चले गए तो इन्हें जन्नत भी नसीब नहीं होगी।

क्या था मामला?

हाल ही में आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया, जिन्हें कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेसक्यु किया गया।

मामले में पुलिस ने 10 आरोपितों को अलग-अलग राज्य से गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ के बाद गिरोह के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद से ही धर्मांतरण गैंग से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। म बस्ती से बहनों को रेस्क्यू किया गया। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया। कई ऐसी

मुर्दा, घुसपैठिए, फ्रॉड… क्या इनसे ही टिमटिमा रहा लालू का लालटेन? चुनाव आयोग के ‘स्वच्छता अभियान’ से घबराए तेजस्वी यादव, बिहार में दे रहे ‘बांग्लादेश मॉडल’ की धमकी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी माहौल गरम है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि अगर मतदाता सूची में कथित हेरफेर और धांधली की स्थिति बरकरार रही, तो विपक्ष विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने पर विचार कर सकता है।

इससे पहले, ठीक यही बात पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और पत्रकार रवीश कुमार जैसे लोग भी कर रहे थे, जिन्हें ‘बांग्लादेशी टूलकिट’ का हिस्सा माना जा रहा है। ये लोग ठीक वही करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी बदौलत आज बांग्लादेश में कोहराम मचा हुआ है।

तेजस्वी यादव का बयान: कितना गंभीर, कितना रणनीतिक?

तेजस्वी यादव ने पटना में एक न्यूज एजेंसी से कहा, “अगर चुनाव में धांधली हो रही है, तो लोग वोट क्यों देंगे? ऐसे में सरकार को एक्सटेंशन दे देना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर महागठबंधन और जनता इस दिशा में सहमत होती है, तो वे चुनाव बहिष्कार पर विचार करेंगे।

तेजस्वी का यह बयान सतही तौर पर एक रणनीतिक कदम लगता है, जिसका मकसद एनडीए सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाना है। लेकिन उनके इस बयान में गंभीरता की कमी साफ झलकती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भारत में किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने पूरे चुनाव का बहिष्कार नहीं किया, भले ही EVM या मतदाता सूची जैसे मुद्दों पर सवाल उठे हों।

तेजस्वी के इस बयान को गंभीरता से लिया जाना स्वाभाविक है, क्योंकि बिहार की सियासत में उनका कद बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बयान केवल जनता को लामबंद करने की कोशिश है, या वास्तव में उनकी हार की आशंका को दर्शाता है?

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनावों में महागठबंधन को केवल 9 सीटें मिलीं, जबकि एनडीए ने 31 सीटें जीतीं। सी-वोटर सर्वे के अनुसार, तेजस्वी की लोकप्रियता 41% से घटकर 35% हो गई है, जबकि नीतीश कुमार की स्वीकार्यता 58% है। नीतीश की विकास-केंद्रित छवि और 35% महिला आरक्षण जैसे कदमों ने उनकी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके उलट मतदाता सूची से 53 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में 90% वोटरों को महागठबंधन का समर्थक माना जा रहा है। तेजस्वी का यह बयान उनकी जमीन खिसकने की आशंका को उजागर करता है।

SIR से जुड़े महत्वपूर्ण आँकड़े

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी घमासान चरम पर है। चुनाव आयोग के अनुसार, SIR का मकसद मतदाता सूची को अपडेट करना और फर्जी या गैर-नागरिक वोटरों को हटाना है। चुनाव आयोग के अनुसार, बिहार में 7.89 करोड़ वोटरों में से 97.30% ने फॉर्म भरे। लेकिन 52.3 लाख वोटर अपने पते पर नहीं मिले (कुल का 6.62%)। इनमें 18.66 लाख मृत हैं, 26.01 लाख शिफ्ट हो चुके हैं, 7.09 लाख डुप्लिकेट हैं, और 1 लाख अनट्रेसेबल हैं।

यह प्रक्रिया 1 लाख बीएलओ और 1.5 लाख राजनीतिक एजेंट्स (विपक्षी सहित) द्वारा की जा रही है। विपक्ष का दावा है कि 53 लाख वोट कैंसल हो रहे हैं, जिनमें 90% उनके समर्थक हैं। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि मृत, डुप्लिकेट और शिफ्टेड वोटरों को हटाना जरूरी है, ताकि फर्जी वोटिंग रोकी जाए।

उदाहरण के लिए, 20 लाख मृत वोटरों को सूची में रखना क्या लोकतंत्र है? 7 लाख डुप्लिकेट से दो जगह वोटिंग हो सकती है। 1 लाख के अते-पते नहीं मिल रहे, जो विदेशी या फर्जी हो सकते हैं। एसआईआर नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार से आए वोटरों को भी फिल्टर कर रहा है।

चुनाव आयोग ने दावा किया है कि 96-98% संशोधन कार्य पूरा हो चुका है। यही नहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से कटे हैं, या जुड़ने बाकी रह गए हैं, उनके लिए 1 अगस्त 2025 से 1 सितंबर 2025 तक इसे सही कराने का समय होगा।

बिहार चुनाव आयोग द्वारा दी गई जानकारी का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: CEOBihar)

हालाँकि लेकिन तेजस्वी ने इसे ‘फर्जी’ करार दिया। उन्होंने कहा, “पहले मतदाता सरकार चुनते थे, अब सरकार मतदाताओं को चुन रही है।” एसआईआर से फर्जी वोटर हटने से उनके कोर वोट बैंक पर असर पड़ेगा। इसलिए बहिष्कार की धमकी देकर जनता को मोबलाइज करने की कोशिश है। लेकिन अगर जीत दिखती, तो मैदान क्यों छोड़ते? यह हार की आशंका है।

बांग्लादेशी टूलकिट और अराजकता का इतिहास

ये सब जो हो रहा है, वह महज संयोग नहीं लगता। विपक्ष की भाषा और रणनीति बांग्लादेश से प्रेरित लगती है, जहां विपक्षी पार्टी बीएनपी ने 2023-24 के चुनावों का बहिष्कार किया था। वहाँ खालिदा जिया की पार्टी ने चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर हिंसा और अराजकता फैलाई, जिससे शेख हसीना की सरकार को चुनौती मिली। भारत में भी यही ‘टूलकिट’ चल रहा है।

किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अब एसआईआर विवाद में अंतरराष्ट्रीय तत्वों की भूमिका देखी गई है। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में यूरोपीय यूनियन के राजदूत ने चुनाव पर सवाल उठाए, ठीक वैसे ही भारत में विदेशी मीडिया और एनजीओ ईवीएम हैकिंग जैसे मुद्दों को हवा देते हैं।

बिहार में यह टूलकिट स्पष्ट दिखता है। साल 2024 में कॉन्ग्रेस से टिकट न मिलने पर निर्दलीय सांसद बने पप्पू यादव भी चुनाव बहिष्कार की वकालत कर रहे है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि बहिष्कार से बेहतर है कि विपक्ष विधानसभा और लोकसभा से इस्तीफा दे दे। दूसरी ओर रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, “चुनाव क्यों करा रहे हैं, प्रिंट कमांड दीजिए और रिजल्ट छाप दीजिए।”

पप्पू यादव और रवीश की भाषा अराजकता को जन्म देने वाली है। जब लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता नहीं मिलती, तो बहिष्कार और हिंसा का सहारा लिया जाता है। महाराष्ट्र चुनावों में भी यही कोशिश हुई, जहाँ राहुल गाँधी ने मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया, लेकिन सफल नहीं हुई।

अब बिहार में एसआईआर को बहाना बनाकर एजेंडा चलाया जा रहा है। यह टूलकिट विदेशी ताकतों से प्रेरित है, जो भारत में अस्थिरता चाहते हैं। शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा, तो यहाँ पीएम मोदी को निशाना बनाने की साजिश है। लेकिन बिहार में यह ध्वस्त हो रहा है, क्योंकि नीतीश कुमार की छवि मजबूत है और एनडीए एकजुट। विपक्ष का एजेंडा ध्वस्त होने की कगार पर है, क्योंकि जनता अब ऐसे हथकंडों को समझ चुकी है।

पप्पू यादव और रवीश कुमार महज टूलकिट के प्यादे?

पप्पू यादव का बयान तेजस्वी के बयान से मेल खाता है, लेकिन उनकी स्थिति कमजोर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया और महागठबंधन के विरोध प्रदर्शन में उन्हें मंच पर जगह नहीं मिली। फिर भी वे SIR और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।

दूसरी ओर रवीश कुमार का बयान और उनकी पत्रकारिता शैली विपक्ष के नैरेटिव को बढ़ावा देती दिखती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह एक सुनियोजित रणनीति है, जिसमें विपक्षी नेता और कुछ पत्रकार मिलकर जनता में असंतोष पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं, तेजस्वी की रणनीति एनडीए और चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की है, लेकिन सफलता संदिग्ध है। अगर महागठबंधन एकजुट होता है, तो एनडीए असहज हो सकता है, क्योंकि ग्रामीण गरीब मतदान को अधिकार मानते हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस की चुप्पी दर्शाती है कि एकजुटता नहीं है। बहिष्कार से विपक्ष प्रतीकात्मक विरोध करेगा, लेकिन जनता एनडीए को मजबूत करेगी।

लोकतंत्र पर हमला या रणनीतिक दाँव?

तेजस्वी का चुनाव बहिष्कार का बयान लोकतंत्र पर हमले के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि यह मतदान जैसे मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार को कमजोर करता है। बिहार में ग्रामीण और गरीब वर्ग मतदान को अपने अधिकार के रूप में देखता है। अगर विपक्ष बहिष्कार करता है, तो यह जनता में असंतोष तो पैदा कर सकता है, लेकिन यह महागठबंधन की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाएगा। कॉन्ग्रेस और अन्य सहयोगी दलों ने अभी तक इस बयान पर स्पष्ट समर्थन नहीं दिखाया है, जिससे तेजस्वी की रणनीति कमजोर पड़ सकती है।

राहुल गाँधी ने भी कर्नाटक में चुनावी धांधली के ‘100% सबूत’ होने का दावा किया है, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक नहीं किया। यह दावा तेजस्वी के बयान को बल देता है, लेकिन अगर विपक्ष एकजुट नहीं हो पाता, तो यह केवल प्रतीकात्मक रह जाएगा। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने तेजस्वी पर तंज कसते हुए कहा, “उन्हें लग रहा है कि बिना नकली वोटरों के वे चुनाव नहीं जीत सकते।”

बिहार में सियासी समीकरण और भविष्य

बिहार में एनडीए की स्थिति मजबूत है। नीतीश कुमार की स्वच्छ छवि, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान जैसे नेताओं का समर्थन और बीजेपी की रणनीति ने महागठबंधन को बैकफुट पर ला दिया है। तेजस्वी का वोटर बेस – यादव, मुस्लिम और ओबीसी अभी भी उनके साथ दिखते है, लेकिन SIR के बाद उनके वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका है। अगर तेजस्वी और विपक्ष बहिष्कार की राह चुनते हैं, तो यह उनकी हार को और पक्का कर सकता है।

तेजस्वी की धमकी गंभीर कम, रणनीतिक ज्यादा है। यह बांग्लादेशी टूलकिट का हिस्सा है, जहाँ बहिष्कार से अराजकता फैलाई जाती है। लेकिन बिहार में नीतीश की छवि और एसआईआर की पारदर्शिता से विपक्ष का एजेंडा ध्वस्त हो रहा है।

लोकतंत्र पर हमला बंद हो, विपक्ष सबूतों से लड़ाई लड़े। एसआईआर से साफ-सुथरी चुनाव प्रक्रिया बनेगी, जो असली लोकतंत्र है। अगर बहिष्कार होता है, तो विपक्ष खुद को अलग-थलग कर लेगा। बिहार की जनता समझदार है, वह ऐसे हथकंडों से नहीं बहकेगी। बिहार की जनता जो मतदान को अपने अधिकार के रूप में देखती है, शायद इस रणनीति को स्वीकार न करे। तेजस्वी और विपक्ष को अगर अपनी जमीन बचानी है, तो उन्हें बहिष्कार की बजाय जनता के बीच जाकर अपनी बात रखनी होगी।

53 साल के बलात्कारी को सुप्रीम कोर्ट ने दी ‘बच्चों वाली सजा’, कहा- अपराध के समय वह 16 साल का था, अधिकतम 3 साल सुधार गृह में रह सकता है: सजा खत्म कर मामला किशोर बोर्ड को भेजा

सुप्रीम कोर्ट से रेप एक एक दोषी को 37 वर्षों के बाद राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने जहाँ उसको रेप के मामले में दोषी ठहराया जाना सही माना है तो वहीं उसकी सजा खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि उसने 1988 में जब यह अपराध किया था, तब वह नाबालिग था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस BR गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 53 साल के इस आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर होने के बाद उसकी उम्र को लेकर जिला जज से एक रिपोर्ट माँगी थी।

जिला जज से रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि आरोपित उस समय 16 वर्ष का था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालत और राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा इस व्यक्ति को सुनाई गई सजा और उनके मामले को रद्द कर दिया। राजस्थान हाई कोर्ट ने उस व्यक्ति को 5 वर्ष की सजा सुनाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आगे किशोर न्याय बोर्ड के पास भेज दिया है, ताकि सजा पर फैसला लें। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 53 वर्षीय शख्स को किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश होने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति अपराध के समय नाबालिग होने का दावा कभी भी उठा सकता है।

क्या था मामला?

दरअसल आरोपित ने 17 नवंबर 1988 को राजस्थान के अजमेर जिले में 11 साल की बच्ची के साथ रेप किया था। उस समय निचली अदालत ने उसे धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और धारा 376 (बलात्कार) के तहत दोषी ठहराया था और तीन साल की जेल की सजा सुनाई थी।

राजस्थान हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा और उसे सजा सुना दी। हालाँकि, वह सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और फिर उसकी उम्र 7 नवंबर, 1988 को 16 वर्ष, 2 महीने और 3 दिन थी, यानी उस दौरान वह नाबालिग था। हालाँकि, कोर्ट ने उसे दोषी नहीं मानने की दलील नहीं मानी।

मंदिर बचाने के लिए मुस्लिमों ने बनाई ह्यूमन चेन- लिबरलों ने खूब गढ़ा नैरेटिव, पर बच नहीं पाए बेंगलुरु के इस्लामी दंगाई: इकरामुद्दीन, आतिफ और सैयद को 7 साल की सजा

बेंगलुरु की एक विशेष NIA अदालत ने अगस्त, 2020 में इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ के दंगे पर सजा सुनाई है। बेंगलुरु की अदालत ने इस्लामी भीड़ के पुलिस थाने पर हमले के मामले में यह सजा सुनाई है। इस दंगे में इस्लामी भीड़ ने कॉन्ग्रेस विधायक के घर पर हमला बोला था और पुलिस थानों को भी जला दिया था। इस हमले में प्रतिबंधित संगठन PFI और उसकी राजनीतिक विंग SDPI के लोगों के शामिल होने के सबूत NIA को मिले थे। दंगे के बाद लिबरल-वामपंथी गैंग मुस्लिमों की ‘ह्यूमन चेन’ वाला नैरेटिव चलाया था।

NIA कोर्ट ने क्या सुनाया फैसला?

बेंगलुरु की एक विशेष NIA अदालत ने सैयद इकरामुद्दीन उर्फ सैयद नवीद, सैयद आतिफ और मोहम्मद आतिफ को सजा सुनाई है। उन्हें 7 वर्ष जेल की सजा सुनाई गई है। उन्होंने इस मामले में आरोप तय किए जाने के दौरान ही इस्लामी भीड़ वाले दंगे में शामिल होना कबूल कर लिया था।

इन तीनों को NIA कोर्ट ने UAPA, कर्नाटक सम्पत्ति एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (IPC) की अलग-अलग धाराओं के तहत सजा सुनाई है। NIA कोर्ट को सरकारी वकील प्रसन्ना ने जनता में विश्वास वापस पैदा करने वाला बताया है।

उन्होंने कहा, “यह फैसला पुलिस बलों में जनता का विश्वास बहाल करता है और साथ ही PFI को गैरकानूनी घोषित करने के केंद्र के फैसले को वैध ठहराता है।” उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस पर हमले जनता का विश्वास डिगाते हैं।

उन्हें जहाँ इस मामले में सजा सुना दी गई है, बाकी आरोपितों के खिलाफ अभी मुकदमा चालू होना है। इस मामले में 199 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था जबकि 180 से अधिक लोग गिरफ्तार हुए थे। इनके खिलाफ अभी आरोप तय करके मुकदमा चालू किया जाना है और बहस होनी है।

इस्लामी भीड़ ने थाने-कॉन्ग्रेस MLA के घर पर किया था हमला

11 अगस्त 2020 की रात पूर्वी बेंगलुरु में दंगे और आगजनी का भीषण नज़ारा देखने को मिला था। केजी हल्ली, डीजे हल्ली और पुल्केशी नगर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। 1000 से भी अधिक की इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ ने स्थानीय विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर को घेर लिया था और तोड़फोड़ शुरू कर दी थी।

इस्लामी भीड़ का कहना था कि विधायक के रिश्तेदार ने पैगम्बर मुहम्मद को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट किया है। उन्होंने आसपास कड़ी हिन्दुओं की कई गाड़ियाँ जला दी थीं। घटों तक यह दंगा फसाद चलता रहा था। उन्होंने विधायक की बहन के घर भी हमला किया था। इसके अलावा DJ हल्ली और HJ हल्ली पुलिस थानों को भी आग लगा दी थी।

इस मामले में बाद में हुई जाँच में सामने आया था कि इस्लामी भीड़ का यह दंगा पूर्व प्रायोजित था। पता चला था कि PFI से जुड़े मुजम्मिल पाशा और SDPI के लोगों को गिरफ्तार किया गया था। मामले की जाँच NIA को सौंपी गई थी, इसमें सामने आया था कि दंगा करने को पैसा भी बांटा गया था। तीन दंगाई मारे भी गए थे।

लिबरल-वामपंथी गैंग चला रहा था ‘ह्यूमन चेन’ वाली थ्योरी

जहाँ एक ओर इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ आधे बेंगलुरु को जलाने पर तुली हुई थी तो वहीं लिबरल-वामपंथी गैंग इस दौरान उसे बचाने को अलग ही थ्योरी गढ़ रहा था। इस दौरान उन्होंने एक वीडियो वायरल किया था जिसमें एक मुस्लिम भीड़ एक मंदिर के बाहर खड़ी थी।

लिबरलों का दावा था कि यह मुस्लिम इस मंदिर को मानव शृंखला बना कर दंगाइयों से बचा रहे थे। इस वीडियो को राजदीप सरदेसाई जैसे लिबरल पत्रकारों से लेकर कॉन्ग्रेस नेताओं तक ने खूब प्रसारित किया था। हालाँकि, बाद में यह भी सामने आया था कि इस वीडियो को संभवतः स्क्रिप्ट करके बनाया गया था क्योंकि इसे जल्दी अपलोड किया जाना था।

42 साल बाद एक साथ खुले मंदिर-गुरुद्वारा के द्वार, एकसाथ गूँजेगी ‘गुरुवाणी’ और ‘जय श्रीराम’: 1984 के दंगों में जड़ा गया था ताला, CM योगी और दोनो पक्षों की सुलह लाई रंग

वाराणसी के जगतगंज इलाके में एक धार्मिक स्थल पिछले 42 वर्सों से विवाद के चलते बंद पड़ा था। इसे अब दोबारा श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया है। यह स्थल जहाँ एक ओर से सिखों के पवित्र गुरुद्वारे के रूप में जाना जाता है और दूसरी ओर से हिंदू समुदाय के लिए बड़े हनुमान मंदिर के रूप में श्रद्धा का केंद्र रहा है।

1984 के दंगों के दौरान इस जगह को प्रशासन द्वारा सील कर दिया गया था। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल, सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप नारायण सिंह की मध्यस्थता और दोनों पक्षों की सहमति के बाद अब इसे फिर से खोल दिया गया है। सोमवार (21 जुलाई 2025) को परिसर के दरवाजे पर लगे जंग लगे ताले हटने के बाद सिख और हिंदू समुदाय के लोगों में खुशी की लहर है।

फोटो साभार – हिंदुस्तान

मंदिर और गुरुद्वारे का इतिहास

रिपोर्ट के अनुसार, इस जगह का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व दोनों समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अनुसार, सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर करीब दो सौ साल पहले जब काशी आए थे, तब वे नीचीबाग क्षेत्र (जहाँ वर्तमान में गुरुद्वारा है) में रुके थे।

वे अपने अनुयायियों से मिलने के लिए कई बार जगतगंज भी आए थे। इसलिए यह भूमि सिख समुदाय के लिए पूजनीय मानी जाती है। समय के साथ यहाँ एक गुरुद्वारा भी स्थापित हुआ। वहीं हिंदू समुदाय द्वारा यहाँ श्री बड़े हनुमान मंदिर की स्थापना की गई थी। दोनों धार्मिक स्थल कई सालों से अस्तित्व में रहे और लोगों की आस्था का केंद्र बने रहे।

क्यों बंद किया गया था धार्मिक स्थल?

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की 31 अक्टूबर 1984 को उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। जगतगंज में स्थित यह स्थल गुरुद्वारा और मंदिर दोनों के लिए एक स्थान था।

इसलिए प्रशासन ने किसी भी सांप्रदायिक तनाव या टकराव को रोकने के उद्देश्य से इस स्थल को सील कर दिया। उस समय मंदिर और गुरुद्वारा दोनों का पूरा तरह से निर्माण नहीं हुआ था। जिले में बढ़ते तनाव को देखते हुए, प्रशासन ने इस जगह को पूरी तरह बंद कर दिया ताकि कोई हादसा न हो।

विवाद कैसे बढ़ा और क्या-क्या हुआ?

समय बीतने के साथ, इस जमीन के मालिक हक और कब्जे को लेकर दोनों समुदायों के बीच विवाद गहराता चला गया। जिसके बाद मंदिर प्रबंध समिति और गुरुद्वारा प्रबंध समिति, दोनों ने ही उस जगह को लेकर अपना-अपना दावा किया।

यह विवाद लोकल कोर्ट में पहुँच गया, जहाँ यह मामला कई दशकों तक लंबित रहा। तीन हजार से साढ़े तीन हजार वर्गफीट भूमि को लेकर चल रहे इस विवाद में समय-समय पर अस्थायी निर्माण होते रहे, जिससे विवाद बढ़ता गया। दोनों पक्षों के बीच बातचीत की कई कोशिशें हुईं, लेकिन सफल नहीं हो पाईं। इस दौरान धार्मिक भावनाएँ भी गहराती रहीं, जिससे विवाद बढ़ता  गया।

लगभग दो महीने पहले स्वतंत्रता सेनानी बाबू जगत सिंह के वंशज और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप नारायण सिंह ने एक बार फिर दोनों पक्षों को सुलह के लिए तैयार किया। इसके बाद दोनो पक्षों में कई बार बातचीत भी हुई।

इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर यह प्रक्रिया और तेज हुई। आखिरकार श्री बड़े हनुमान मंदिर समिति के व्यवस्थापक श्याम नारायण पांडे और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार करन सिंह सभरवाल के बीच सहमति बनी। दोनों ने यह तय किया कि भूमि को बराबर-बराबर बाँट दिया जाएगा और दोनों समुदाय अपनी-अपनी आस्था के अनुसार गुरुद्वारा और मंदिर का निर्माण करेंगे।

वाराणसी की गंगा-जमुनी तहजीब एक बार फिर दुनिया के सामने एक आदर्श बनकर उभरी है, जहाँ इस ऐतिहासिक समझौते के बाद दोनों पक्षों ने अदालत में सुलहनामा दाखिल किया और जिला प्रशासन से जगह को फिर से खोलने की अनुमति माँगी।

जिसके बाद वाराणसी के अतिरिक्त नगर मजिस्ट्रेट देवेंद्र कुमार की निगरानी में आवश्यक जाँच-पड़ताल पूरी हुई। सोमवार (21 जुलाई 2025) को ताले तोड़े गए और जगह को दोनों समुदायों के लिए खोल दिया गया।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के उपाध्यक्ष परमजीत सिंह अहलूवालिया ने इसे सिख समुदाय के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया और कहा कि जल्द ही यहाँ भव्य गुरुद्वारा बनेगा, जहाँ दुनिया भर से सिख श्रद्धालु दर्शन के लिए आएँगे। वहीं मंदिर समिति भी इस जगह पर बड़े हनुमान जी के भव्य मंदिर के निर्माण की तैयारी में है।

₹3000 करोड़ का लेन-देन, 35 जगहों पर तलाशी, 25 लोगों से पूछताछ…अनिल अंबानी से जुड़ी 50 कंपनियों पर ED ने मारा छापा, सीबीआई की शिकायत पर एक्शन

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गुरुवार (23 जुलाई 2025) को अनिल अंबानी से जुड़ी कई कंपनियों पर छापेमारी की है। ईडी ने अनिल अंबानी की कंपनियों और यस बैंक के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में ये एक्शन लिया है।

जानकारी के अनुसार, धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मुंबई और दिल्ली में ईडी अधिकारियों ने कथित तौर पर मामले से जुड़ी 50 से ज्यादा कंपनियों पर छापे मारे और उनके रिकॉर्ड की भी जाँच की। यह छापेमारी केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज की गई FIR के बाद की गई है।

दरअसल, मनी लॉन्ड्रिंग का यह मामला CBI की FIR, राष्ट्रीय आवास बैंक, सेबी, राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) और बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा साझा की गई रिपोर्टों से सामने आया है।

इस दौरान 25 से ज्यादा लोगों से पूछताछ भी की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी की ओर से लगभग 35 जगहों पर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। एजेंसी की शुरुआती जाँच में बैंकों, शेयरधारकों, निवेशकों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों को धोखा देकर पैसो की हेराफेरी करने का खुलासा हुआ है।

जाँच में पता चला है कि 2017 से 2019 के बीच यस बैंक से लगभग 3000 करोड़ रुपये के लोन का अवैध रूप से गलत इस्तेमाल किया गया था। वहीं लोन मंजूरी से पहले यस बैंक के प्रमोटरों की कंपनियों को धनराशि मिली थी। यस बैंक के प्रमोटर समेत बैंक अधिकारियों को रिश्वत देने के मामले की भी आशंका जताई गई है।

ईडी द्वारा की जा रही इस कार्रवाई के बाद अनिंल अंबानी की कंपनी रिलायंस पावर और रिलायंस इन्फ्रा के शेयर पर भी काफी प्रभाव पड़ा है। दोनों कंपनियों के शेयरों में 5-5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

जानकारी के अनुसार, रिलायंस पावर के शेयर 5 फीसदी की गिरावट के साथ 59.77 रुपये के स्तर पर और रिलायंस इन्फ्रा के शेयर लगभग 5 फीसदी की गिरावट के साथ 360 रुपये के स्तर पर ट्रेड कर रहे हैं।