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मुरादाबाद से दिल्ली पल्लेदारी करने आया था तौफीक, खाना-पानी माँग नेहा को बनाया बहन… 3 साल में निकाह का डालने लगा प्रेशर: नहीं मानी तो छत से फेंका, OPindia से बोले परिजन- नहीं मालूम था कसाई निकलेगा

“उसके बहुत ऊँचे-ऊँचे सपने थे। वो बस यही कहती रहती थी कि अच्छी जगह नौकरी करूँगी, घर को सपोर्ट करूँगी। तौफीक ईद पर सेवइयाँ लेकर आता था…” आँसुओं में डूबी नेहा की बड़ी बहन बार-बार यही दोहरा रही है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अशोक नगर में सोमवार (23 जून 2025) को सुबह साढ़े सात बजे 19 साल की नेहा का कत्ल हो गया। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले तौफीक ने उसे घर की पाँचवीं मंजिल से नीचे फेंक दिया।

इस हत्याकांड की तह तक पहुँचने के लिए ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम नेहा के घर पर पहुँची और घरवालों से हर मुद्दे पर बातचीत की। घरवारों ने तौफीक और उसके इरादों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

राखी बँधवाई, सेवइयाँ खिलाई और ले ली जान

तौफीक ने कहा कि मेरी कोई बहन नहीं है। कथित तौर पर उसने नेहा को बहन बना लिया। बड़ी बहन कहती है कि वो रक्षाबंधन पर राखी भी बँधवाता था। ईद पर सेवइयाँ खिलाता था। तीन साल बाद उसने शादी का प्रस्ताव दे दिया।

इसके बाद नेहा की माँ ने तौफीक को घर पर आने से मना कर दिया। नेहा की माँ के मुताबिक, तौफीक इस बात से बहुत नाराज हो गया था। 23 जून को सुबह साढ़े सात बजे वो बुरखा पहनकर नेहा की बिल्डिंग में आता है।

उसे पता था कि इस समय नेहा छत पर कपड़े धो रही होगी। पाँचवीं मंजिल की छत पर वो सीधे जाता है। इतने में नेहा के पिता भी छत पर आते हैं। कुछ कहा-सुनी होती है। इसके बाद वो नेहा को छत से नीचे खाली पड़े प्लॉट में फेंक देता है और भाग जाता है।

नेहा की ये कहानी सिर्फ रिश्तों में बात बिगड़ जाने के बाद हुई हत्या की नहीं है। ये उससे कहीं अधिक है।

मुरादाबाद से दिल्ली आकर करता था पल्लेदारी

आसपास के लोग बताते हैं कि तौफीक तीन-चार साल पहले मुरादाबाद से दिल्ली के इस इलाके में आया था। उसके साथ मुरादाबाद के करीब पंद्रह मुस्लिम लड़के बगल की होलसेल मार्केट में पल्लेदारी का काम करते थे। एक मजदूर की दिन की कमाई करीब एक हजार रुपये थी। दुकानदार बताते हैं कि मजदूरों को रहने-खाने की व्यवस्था हम ही देते थे।

नेहा के पड़ोसी OpIndia से बात करते हुए बताते हैं कि करीब तीन साल पहले तौफीक इस मोहल्ले में पहली बार आया था। वो लोगों से कहता था कि अकेला रहता हूँ, तो खाने-पीने की सही से व्यवस्था नहीं है।

परिवार ने की मदद, नेहा ने बाँधी राखी, लेकिन तौफीक के इरादे कुछ और

मोहल्ले के कुछ लोगों ने शुरुआत में एक-दो बार खाना-पीना दिया भी। लेकिन रोज-रोज यूँ किसी अजनबी को खाना खिलाना सही नहीं लगा। मोहल्ले में अधिकतर लोगों ने खाना देना बंद कर दिया था।

फिर तौफीक की नजर मोहल्ले के तिराहे पर बने पाँच मंजिला मकान पर पड़ी। इस मकान के पहले फ्लोर पर राकेश (बदला हुआ नाम) का परिवार दिखा। परिवार में तीन बड़ी बेटियाँ और दो छोटे बेटे थे।

उसने उस परिवार से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू की। परिवार धार्मिक था, लेकिन उन्हें तौफीक में सिर्फ एक घर से दूर रहने वाला लाचार मजदूर दिखा। शुरुआत में कभी-कभी वो खाना खाने आता। फिर लगातार दिन में ठंडा पानी माँगने के लिए आने लगा।

उसने घर में जगह बनाई। फिर रक्षाबंधन आया। तौफीक को नेहा ने राखी बाँधी। अगले तीन वर्षों तक ये संबंध बरकरार रहा। लेकिन इसी दौरान तौफीक की नजरें बदल गईं। वो अब नेहा को अपनी बीवी बनाना चाहता था।

भइया से सैंया बनने की चाह में बना हत्यारा

नेहा तौफीक को भइया बुलाती थी। लेकिन हत्या के कुछ महीने पहले ही तौफीक ने शादी का प्रस्ताव रख दिया। परिवार और नेहा के लिए ये प्रस्ताव चौंकाने वाला था। लेकिन तौफीक ने मन बना लिया था।

वो किसी भी कीमत पर नेहा से शादी करना चाहता था। नेहा की माँ ने तौफीक के घर में आने पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन वो छुप-छुपकर नेहा से मिलता रहा। शायद नेहा को उम्मीद नहीं थी कि इस छुपने-छुपाने के खेल का अंजाम उसकी मौत होगा। तौफीक लगातार मिल रहे इनकार से आग-बबूला हो चुका था।

नेहा भाई-बहनों में दूसरे नंबर की लड़की थी। तौफीक को पता था कि सुबह सात बजे वो कपड़े धुलने घर की छत पर जाती है। 23 जून को भी वो कपड़े धुलने जाती है। तौफीक ने जुर्म कबूल करते हुए बताया, “उस दिन मैं पहले से छत पर मौजूद था। नेहा के आने का इंतजार कर रहा था। साढ़े सात बजे नेहा छत पर आती है।”

पिता के सामने नेहा को पाँचवीं मंजिल से फेंका नीचे

नेहा के पिता कहते हैं, “वो नेहा पर चिल्ला रहा था। सामने से नेहा भी चिल्लाती है। आवाज सुनकर मैं छत पर जाता हूँ। मेरी आँखें फटी रह जाती हैं। वो दुपट्टे से नेहा का गला दबा रहा था। मैं अपनी बेटी को बचाने के लिए झपट पड़ता हूँ। तौफीक मुझे भी धक्का दे देता है। मैं जब तक उठ पाता, उतनी देर में उसने नेहा को छत से नीचे फेंक दिया। मैं कुछ समझ पाता, इतनी देर में वो सीढ़ियों से नीचे भागने लगा। नेहा ईंट के ढेर पर जा गिरी थी। वो चीख रही थी, मैं भी मदद के लिए चिल्लाता हूँ।”

शोर सुनकर आसपास के लोग इकट्ठा हो जाते हैं। जिस प्लॉट में नेहा गिरी थी, उसका दरवाजा बंद था। बड़ी मशक्कत के बाद उसका ताला तोड़ा जाता है। नेहा की बड़ी बहन बताती है – “वो तड़प रही थी, उसका शरीर तीन हिस्सों में टूट चुका था, वो बस पानी माँग रही थी।”

आसपास के लोग उसे ऑटो में रखते हैं। बुरी तरह घायल नेहा को GTB अस्पताल ले जाया जाता है। करीब पाँच घंटे के इलाज के बाद नेहा की मौत हो जाती है।

पानी पिलाने की इतनी बड़ी सजा मिली

OpIndia की टीम नेहा के घर पहुँचती है। बाहर पुलिसवालों का जमावड़ा है। ग्राउंड फ्लोर पर बड़ी बहन आँसुओं में डूबी बैठी है। कुछ रिश्तेदार और मीडिया के लोगों ने उसे घेर रखा है। पहली मंजिल पर नेहा के पिता मौजूद हैं। दरवाजे पर राम और गणेश सहित कई हिंदू देवी-देवताओं के चित्र लगे हैं। अंदर पिता बिस्तर पर बेसुध लेटे हैं। नेहा का छोटा भाई टीवी पर अपनी बहन की हत्या की खबर देख रहा है।

माइक लगाने पर वो बोलने की कोशिश करते हैं। गला भर आता है। आँखों से आँसू टपकने लगते हैं। उठने की कोशिश करते हैं, लेकिन उठ नहीं पाते। रोते हुए कहते हैं कि पता नहीं था तौफीक इतना बड़ा कसाई निकलेगा।

मैं उनकी आँखों से निकलते आँसुओं में उस अफसोस को पढ़ पा रहा था। अफसोस इस बात का कि क्यों नहीं वक्त रहते मैं तौफीक को पहचान पाया? इतिहास तो साँपों को दूध पिलाने की सजा के उदाहरण देता है, लेकिन पानी पिलाने की सजा इतनी बड़ी कैसे हो गई?

बांग्लादेश में यूनुस सरकार ने गिराया हिन्दू मंदिर, इस्लामी भीड़ पहले से दे रही थी तोड़ने की धमकी: भारत ने लताड़ा, कहा- मूर्तियाँ तो दूसरी जगह रख देते

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की सरकार ने एक हिन्दू मंदिर को जमींदोज कर दिया है। राजधानी ढाका में इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश इस्लामी कट्टरपंथी पहले से कर रहे थे। हिन्दू इस तोड़फोड़ का विरोध ना कर पाएँ, इसके लिए बांग्लादेश की फ़ौज भी लगा दी गई थी। भारत ने बांग्लादेश की इस मामले में आलोचना की है।

राजधानी ढाका में गिराया गया यह मंदिर माँ दुर्गा को समर्पित था। इसे बांग्लादेश रेलवे के ढाका डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर और डिविजनल एस्टेट ऑफिसर मोहम्मद नासिर उद्दीन महमूद के आदेश पर गिराया गया है। मंदिर गिराने की यह कार्रवाई गुरुवार (26 जून, 2025) को की गई।

मंदिर गिराए जाने के समय बड़ी संख्या में हिंदू पुरुष और महिलाएँ वहाँ मौजूद थे, जो रोते हुए मंदिर को गिरते देख रहे थे। मंदिर को गिराने के लिए ढाका के पूर्वाचल आर्मी कैंप से फ़ौज और पुलिसबल भी बुलाया गया था। यहाँ बुलडोजर भी साथ लाया गया था। विरोध करने वाले हिन्दुओं को फ़ौज ने हटा दिया और मंदिर को तोड़ दिया।

ढाका के खिलखेत सर्वजनीन दुर्गा मंदिर को गिराए जाने से पहले हिंदू समुदाय ने प्रशासन से रथ यात्रा निकालने की अनुमति देने और उसके बाद तोड़फोड़ को कुछ समय के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया था। हालाँकि, प्रशासन ने इस अपील को अस्वीकार कर दिया।

गुरुवार को मंदिर गिराए जाने की कार्रवाई में मंदिर की मूर्तियाँ, पूजा सामग्री और अन्य धार्मिक वस्तुएँ भी नष्ट हो गई। देवी काली और भगवान शिव की मूर्तियाँ बुलडोजर के नीचे आकर टुकड़े-टुकड़े हो गई। यह मंदिर करीब 50 साल से अधिक समय से दुर्गा पूजा का केंद्र रहा है। मंदिर में देवी काली की मूर्ति भी थी, जिसकी नियमित पूजा की जाती थी।

यह मंदिर लोहे की नालीदार चादरों से बना एक अस्थायी ढाँचा था और रेलवे की जमीन पर स्थित था, लेकिन बांग्लादेश जैसे इस्लामी देश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल था। इस घटना से पहले, 24 जून, 2025 की रात को एक मुस्लिम भीड़ ने मंदिर पर हमला किया था।

उन्होंने मंदिर को खाली करने के लिए 12 घंटे की धमकी दी थी। इस्लामी भीड़ ने मंदिर को तोड़ने की कोशिश की थी और भक्तों को गालियाँ और जान से मारने की धमकियाँ भी दीं। इसके बाद प्रशासन ने भारी सुरक्षा के बीच मंदिर को गिरा दिया जिससे हिंदू समुदाय में गहरा आक्रोश और दुख है।

मुस्लिम भीड़ ने मंगलवार (24 जून 2025) को हिंदू श्रद्धालुओं को दोपहर 12 बजे तक का अल्टीमेटम दिया और कहा कि अगर उस समय तक मंदिर नहीं हटाया गया, तो वे खुद ही मंदिर को तोड़ देंगे। इस धमकी के बाद, स्थानीय हिंदू नेताओं ने खिलखेत पुलिस से सुरक्षा की माँग की लेकिन प्रशासन ने उनकी कोई मदद नहीं की।

इसके दो दिन बाद, मंदिर को बेदखली के नाम पर अचानक गिरा दिया गया। मोहम्मद यूनुस के मातहत बांग्लादेश रेलवे विभाग ने कहा कि यह कार्रवाई अध्यादेश संख्या 24, 1970 की धारा 5(1) और 5(2) के तहत की गई। उनके अनुसार, यह अभियान कुरील बिश्वा रोड चौराहे से खिलखेत बाजार तक रेलवे की जमीन से ‘अवैध कब्जे हटाने’ के लिए चलाया गया था।

हालांकि, हिंदू समुदाय का कहना है कि यह मंदिर लंबे समय से पूजा स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था और इसे अचानक गिराना  भीड़ के दबाव में लिया गया एक अन्यायपूर्ण फैसला था।

प्रशासन का कहना है कि खिलखेत दुर्गा मंदिर रेलवे की सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना हुआ था, इसलिए उसे हटाया गया। लेकिन हिंदू समुदाय का कहना है कि यह मंदिर लंबे समय से प्रशासन की जानकारी में वहाँ मौजूद था और इसे कभी भी अवैध नहीं माना गया।

मंदिर को जगन्नाथ यात्रा से ठीक पहले गिराया जाना हिंदू समुदाय के लिए और भी दर्दनाक रहा। इस घटना ने पूरे बांग्लादेश में हिंदुओं में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। जहाँ सरकार इसे अतिक्रमण हटाने की सामान्य कार्रवाई बता रही है, वहीं हिंदू समुदाय का मानना है कि यह कदम अल्पसंख्यकों पर हो रहे लगातार अत्याचारों का हिस्सा है।

लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि मूर्तियों को नष्ट करने के बजाय उन्हें सम्मानपूर्वक दूसरी जगह क्यों नहीं स्थानांतरित किया गया। कुछ स्थानीय निवासियों का दावा है कि यह जमीन वास्तव में रेलवे द्वारा मंदिर के लिए दान की गई थी, जिससे यह पूरी कार्रवाई और भी विवादास्पद बन गई है।

भारत ने बांग्लादेश को लताड़ा

ढाका में मंदिर गिराने पर भारत ने बांग्लादेश को लताड़ लगाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार (26 जून, 2025) को इस मामले में टिप्पणी की है। उन्होंने कहा, “हम समझते हैं कि कट्टरपंथी खिलखेत, ढाका में दुर्गा मंदिर को ध्वस्त करने के लिए चिल्ला रहे थे। अंतरिम सरकार ने मंदिर को सुरक्षा प्रदान करने के बजाय, इस घटना को अवैध भूमि उपयोग के मामले के रूप में पेश किया और आज मंदिर को ध्वस्त करने की अनुमति दी।”

उन्होंने आगे कहा, “इससे देवता की मूर्ति को नुकसान पहुँचा है, इससे पहले कि उसे स्थानांतरित किया जाता। हम इस बात से दुखी हैं कि बांग्लादेश में ऐसी घटनाएँ बार-बार हो रही हैं। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि हिंदुओं, उनकी संपत्तियों और उनके धार्मिक संस्थानों की रक्षा करना बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी है।”

सोनिया गाँधी पर दर्ज होगा चोरी का मुकदमा? नेहरू के एडविना-अरुणा अली वाले पत्रों पर एक्शन लेगा PMML: प्रधानमंत्री मोदी वाली बैठक में उठा मुद्दा, UPA काल में हुए इधर-उधर हुए थे 51 बक्से

कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी पर जल्द ही चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ निजी दस्तावेजों को वापस पाने के लिए इस एक्शन पर विचार कर रही है। ये दस्तावेज वर्ष 2008 में UPA सरकार के दौरान हटाए गए थे।

इस मामले में 23 जून, 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी। यह बैठक PMML सोसाइटी की थी। PMML की यह वार्षिक बैठक थी। इस बैठक में इस मुद्दे पर भी गंभीर चर्चा की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैठक में शामिल सदस्यों के बीच सहमति बनी कि अब इस मामले को कानूनी रास्ते से सुलझाया जाना चाहिए।

PMML ट्रस्ट के सूत्रों ने बताया कि वे इन दस्तावेजों की कथित ‘चोरी’ को लेकर कानूनी जाँच पर विचार कर रहे हैं। PMML के लोगों का कहना है कि ये दस्तावेज पहले दान किए गए थे और इसलिए ये अब कानूनी रूप से संस्थान की संपत्ति हैं।

अगर यह साबित होता है कि इन दस्तावेजों को गैरकानूनी तरीके से संस्थान के कब्जे से हटाया गया था, तो सोनिया गाँधी को इस मामले में कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। मामले में गंभीर जाँच होने की संभावना है, जो सोनिया गाँधी पर शिकंजा बढ़ाएगी।

UPA काल में 51 डिब्बों में भर ले गए थे दस्तावेज

इस पूरे विवाद की जड़ पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी संग्रह से जुड़े उन ऐतिहासिक दस्तावेजों में है, जिनमें कई मशहूर हस्तियों के साथ उनकी पत्रों से बातचीत शामिल है। इनमें एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन, जयप्रकाश नारायण, विजया लक्ष्मी पंडित, बाबू जगजीवन राम और अरुणा आसफ अली जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

ये दस्तावेज 1971 से लेकर 2008 तक नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (NMML) में रखे गए थे। NMML का नाम बदल कर अब प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) हो गया है। यह पूरा विवाद वर्ष 2008 में चालू हुआ था। तब यह कागज कथित तौर प 51 बक्सों में पैक कर सोनिया गाँधी द्वारा संग्रहालय से निकाल लिए गए।

बताया गया है कि इनमें वे दस्तावेज भी शामिल थे जिन्हें पहले इंदिरा गाँधी और बाद में सोनिया गाँधी ने NMML को दान किया था, क्योंकि गाँधी परिवार उत्तराधिकारी के रूप में काम कर रहा था। PMML इससे पहले कई बार सोनिया गाँधी के कार्यालय को कई बार पत्र भेजकर उन दस्तावेजों को लौटाने की अपील कर चुका है।

गुजरात के इतिहासकार और PMML सोसाइटी के सदस्य प्रोफेसर रिजवान कादरी ने भी सितंबर 2024 में सोनिया गाँधी और फिर दिसंबर, 2024 में राहुल गाँधी को पत्र लिखे। उन्होंने निवेदन किया कि अगर दस्तावेज वापस नहीं दिए जा सकते, तो कम से कम उनकी फोटोकॉपी या डिजिटल स्कैन ही भेज दिए जाएँ।

लगातार कहने के बावजूद सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने कोई जवाब नहीं दिया है। इसके चलते यह मामला काफी गंभीर हो गया है। अब PMML इस मामले में कानूनी रास्ते तलाश रहा है और जल्द एक्शन ले सकता है।

पीएम मोदी वाली बैठक में भी हुई वापसी की माँग

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी की 47वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) हाल ही में तीन मूर्ति भवन में आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की। इसमें सोसाइटी के उपाध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण, धर्मेंद्र प्रधान और अश्विनी वैष्णव सहित कई प्रमुख नेता शामिल हुए।

अन्य प्रमुख सदस्यों में भाजपा नेता स्मृति ईरानी, गीतकार प्रसून जोशी और रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी लोहानी भी मौजूद थे। लोहानी अब PMML के निदेशक के रूप में कार्य कर रहे हैं। बैठक में इस मुद्दे पर दोबारा चर्चा की गई। यह इससे पहल फरवरी 2024 की AGM में उठाया गया था।

PMML के सदस्यों का मानना है कि ये दस्तावेज सिर्फ परिवार की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर हैं और इन्हें संस्थान के पास सुरक्षित रहना चाहिए। इस पर सभी सदस्यों की आम सहमति बनी।

फरवरी की बैठक के बाद इस मामले में कानूनी सलाह ली गई और इसी के आधार पर सोनिया गाँधी के कार्यालय को एक औपचारिक पत्र भेजा गया। इसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर यह रिकॉर्ड में रखा गया कि दस्तावेज वापस ले लिए गए हैं और उन्हें लौटाने का अनुरोध किया गया है। हालाँकि, गाँधी परिवार की ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं आया।

अब PMML सोसाइटी के सदस्य 2014 से पहले की प्रशासनिक चूक को सुधारने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, ताकि नेहरू से जुड़े ये ऐतिहासिक दस्तावेज दोबारा सार्वजनिक संग्रह में आ सकें।

ट्रस्ट ने बताया- दान किए कागज नहीं हो सकते वापस

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) ट्रस्ट अब कानूनी सलाह पर विचार कर रहा है। इसके अनुसार, एक बार जो दस्तावेज दान कर दिए जाते हैं, उनको वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए ट्रस्ट का मानना है कि नेहरू गाँधी परिवार द्वारा दान किए गए दस्तावेज अब भी संग्रहालय की वैध संपत्ति हैं।

बैठक में इन कागजों के मालिकाना हक़, इनके संरक्षण, कॉपीराइट और इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को शोधकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने से जुड़ी चिंताओं पर भी चर्चा हुई। खासतौर पर नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच हुए पत्राचार की पूरी जानकारी रखने पर जोर दिया गया।

सदस्यों ने यह भी माँग की कि जो दस्तावेज संग्रहालय से लिए गए थे, उनका फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए ताकि यह साफ हो सके कि कहीं कोई अहम कागज गुम तो नहीं हो गया।

जनवरी 2025 में PMML की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन हुआ था। इसमें कई नए और प्रमुख लोगों को शामिल किया गया था। स्मृति ईरानी, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, फिल्म निर्देशक शेखर कपूर और कलाकार वासुदेव कामथ को इसमें सदस्य बनाया गया था।

नृपेंद्र मिश्रा को परिषद का अध्यक्ष बनाए रखा गया और उन्हें 5 साल का नया कार्यकाल दिया गया। इस बैठक में सिर्फ नेहरू पेपर्स का मामला ही नहीं उठा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशभर के संग्रहालयों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए दो नए सुझाव भी दिए।

उन्होंने पूरे देश में ‘म्यूजियम मैप’ बनाने और सभी संग्रहालयों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उन्होंने आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ के मौके पर उससे जुड़े सभी कानूनी दस्तावेजों और घटनाओं को इकट्ठा करने की योजना भी पेश की।

भाजपा ने दस्तावेजों को बताया ऐतिहासिक

दिसंबर 2024 में भाजपा सांसद संबित पात्रा ने नेहरू से जुड़े दस्तावेजों के मामले पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने साफ कहा कि ये सिर्फ पारिवारिक पत्र नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेज हैं। पात्रा ने यह भी कहा कि जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उन कागजों में क्या लिखा है।

यह मुद्दा पहले भी संसद में उठ चुका है, जिससे साफ होता है कि अगर सोनिया गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू होती है, तो मामला और तूल पकड़ सकता है।

राजस्थान में मिला सरस्वती नदी का ‘पेलियोचैनल’, ‘मिथक’ बताने वाले वामपंथियों के सिले होठ: सदानीरा नदी के किनारे बसती थी प्राचीन वैदिक सभ्यता, रिसर्च से आया सामने

जब भी लोग ऋग्वेद में वर्णित पवित्र सरस्वती नदी की बात करते हैं, तो वामपंथी अक्सर इसे इतिहास नहीं, बल्कि एक मिथक (कहानी) कहते हैं। लेकिन अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक अहम खोज की है। राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन के 23 मीटर नीचे एक प्राचीन सूखी नदी का रास्ता मिला है। यह खोज यह साबित करने में मदद कर सकती है कि सरस्वती नदी वास्तव में अस्तित्व में थी।

पेलियोचैनल एक सूखी और बंद हो चुकी पुरानी नदी का रास्ता होता है। अप्रैल 2024 से मई 2025 के बीच खुदाई में कुछ अहम चीजें मिलीं। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का मानना है कि यह सूखा हुआ नदी मार्ग प्राचीन सरस्वती नदी का हिस्सा हो सकता है, जिसका जिक्र ऋग्वेद में है। खुदाई में यह भी पता चला कि यहाँ लगभग 3500 से 1000 ईसा पूर्व के बीच लोग रहते थे। ये सब निशान कुषाण, मगध और शुंग (या शुंगा) राजवंश के समय के हैं। भारत के पुरातात्विक इतिहास में यह पहली बार है जब किसी पेलियोचैनल की खोज हुई है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान एएसआई जयपुर के वरिष्ठ पुरातत्वविद विनय गुप्ता ने कहा कि यह प्राचीन नदी प्रणाली शुरुआती मानव बस्तियों के विकास में मददगार थी और बहज क्षेत्र को बड़ी सरस्वती नदी सभ्यता से जोड़ती है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह पेलियोचैनल (सूखी नदी का मार्ग) एक अनोखी खोज है, जो यह साबित करती है कि प्राचीन जल स्रोतों ने यहाँ सभ्यता को पनपने में मदद की थी। ASI ने अपनी रिपोर्ट संस्कृति मंत्रालय को सौंप दी है, जो अब यह तय करेगा कि इस जगह को कैसे संरक्षित किया जाए। इस सूखी नदी के अलावा, ASI की टीम को मिट्टी के खंभों वाले मकानों के अवशेष, परतों वाली दीवारें, भट्ठियाँ और लोहे व ताँबे की चीजें भी मिली हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की रिपोर्ट के अनुसार, खुदाई में मिले छोटे-छोटे पत्थर के औजार (जिन्हें माइक्रोलिथिक टूल्स कहते हैं) यह बताते हैं कि इस जगह पर इंसानों की बस्ती अत्यंत प्राचीन समय यानी होलोसीन काल से भी पहले की हो सकती है।

टीम को कई हिंदू धार्मिक वस्तुएँ भी मिलीं। इनमें 15 यज्ञ कुंड, शक्ति पूजा के लिए बनाए गए छोटे जल कुंड, और शिव व पार्वती की मिट्टी की मूर्तियाँ शामिल हैं, जो लगभग 1000 ईसा पूर्व की हैं। इसके अलावा, महाजनपद काल के भी यज्ञ कुंड मिले हैं। इनमें से ज्यादातर कुंडों में रेत भरी हुई थी और उनमें छोटे मटके थे, जिनमें बिना लिखावट वाले तांबे के सिक्के रखे गए थे।

सबूतों के बावजूद सरस्वती नदी के अस्तित्व को नकारते रहे वामपंथी

ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘अम्बितमे, नदितमे, देवितमे’ कहा गया है, जिसका अर्थ है: ‘सबसे उत्तम माँ, सबसे उत्तम नदी और सबसे उत्तम देवी।’ ऋग्वेद के मंत्रों में लगभग 50 बार सरस्वती नदी का उल्लेख मिलता है, जो यह दिखाता है कि यह नदी ऋग्वैदिक समाज और हिंदू धर्म के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी।

सरस्वती को ‘गुप्तगामिनी’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब है, ‘वह नदी जिसका प्रवाह छिपा हुआ है।’ प्राचीन काल में यह एक विशाल और पवित्र नदी मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ इसकी वास्तविकता पर विवाद शुरू हो गया।

हालाँकि अब वैज्ञानिक और पुरातात्विक खोजें यह संकेत दे रही हैं कि एक विशाल प्राचीन नदी प्रणाली वास्तव में मौजूद थी, जो ऋग्वेद के वर्णनों से मेल खाती है, फिर भी कुछ वामपंथी इतिहासकार और प्रोपेगंडा फैलाने वाले मीडिया समूह लगातार इस विषय पर सच्चे शोध को भी खारिज करते रहे हैं। वे सरस्वती को केवल एक मिथक या प्रतीकात्मक कल्पना बताने की कोशिश करते हैं, न कि एक वास्तविक भौगोलिक नदी।

सरस्वती नदी के अस्तित्व या संभावित अस्तित्व को लेकर वामपंथी ‘विद्वानों’ और ‘मीडिया’ का जो रवैया दिखता है, वह ऊपर से देखने पर केवल एक शैक्षणिक असहमति लगता है। लेकिन असल में यह केवल शैक्षणिक नहीं है। हिंदू विरोधी वामपंथी समूह लंबे समय से उन शोधों और खोजों को नजरअंदाज या खारिज करते आ रहे हैं जो वैदिक परंपराओं की प्राचीनता और निरंतरता को साबित करते हैं। ये लोग ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को कमजोर करने की कोशिश करते हैं, जबकि ये ग्रंथ हिंदू सभ्यता की नींव माने जाते हैं।

असल में वामपंथी मीडिया में बार-बार सरस्वती नदी को ‘मिथक’ (काल्पनिक) कहकर बुलाना एक सुनियोजित प्रयास है, जिससे आम लोगों खासकर हिंदुओं के मन में यह बैठाया जा सके कि सरस्वती नदी सिर्फ एक कहानी है, न कि हकीकत। यह एक तरह की ब्रेनवॉशिंग है, जबकि पुरातात्विक साक्ष्य और वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि यह नदी वास्तव में अस्तित्व में थी।

वामपंथी प्रोपगैंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने भी लगातार सरस्वती नदी के अस्तित्व से इनकार किया है। यह पोर्टल न केवल इस विषय पर हो रहे शोध को नकारात्मक रूप से पेश करता है, बल्कि भारत की प्राचीन नदी प्रणालियों पर हो रही वैज्ञानिक खोजों का भी बिना सोचे-समझे मजाक उड़ाता है।

फरवरी 2019 में द वायर ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था ‘सरस्वती: वह नदी जो कभी थी ही नहीं, लेकिन हमेशा लोगों के दिलों में बहती रही।’ इस लेख में लेखक ने रोमिला थापर, इरफान हबीब और कुछ अन्य वामपंथी इतिहासकारों का जिक्र किया, जो पहले भी इस्लामी आक्रमणकारियों और अत्याचारियों का महिमामंडन और साथ ही साथ हिंदू इतिहास को कमजोर या छोटा करके दिखाने की कोशिश करते रहे हैं।

द वायर ने अपने एक लेख में दावा किया कि सरस्वती नदी शायद वैदिक आर्यों की एक मानसिक कल्पना मात्र थी, जो उन्होंने तब गढ़ी जब वे सिंधु और यमुना के बीच के शुष्क इलाके में पहुँचे, जहाँ पानी की बहुत कमी थी। लेख में कहा गया कि हाल की खोजों से यह साबित नहीं होता कि हड़प्पा काल में इस क्षेत्र में कोई ‘बारह-मासी नदी’ थी। लेख में इस बात पर भी नाराजगी जताई गई कि सरकार ने एक ‘अस्तित्वहीन’ नदी की खोज पर 50 करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया।

2021 में द वायर ने फिर सरकार की आलोचना की जब हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी पर शोध के लिए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रिसर्च ऑन द सरस्वती रीवर’ (CERSR) की स्थापना की गई। द वायर ने अपने लेख का शीर्षक रखा ‘हाउ द इंडियन गवरमेंट इज पुशिंग मनी डाउन अ माइथोलॉजिकल रीवर’। इसमें मोदी सरकार के सरस्वती नदी का पता लगाने के प्रयासों को एक ‘हिंदू परियोजना’ कहा गया।

एक वास्तुकार और मूर्तिकार द्वारा लिखे गए लेख में इस बात पर भी अफसोस जताया गया था कि केंद्र सरकार चार धाम को जोड़ने और काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर पर पैसा खर्च कर रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार हिंदू ‘पौराणिक कथाओं’ को बढ़ावा दे रही है। 

इसमें यह भी कहा गया कि सरस्वती एक पौराणिक नदी है और पौराणिक कथाएँ तत्काल परिणाम देती हैं जबकि विज्ञान धीमा और साक्ष्य-आधारित है, इसलिए मोदी सरकार को इससे तुरंत लाभ नहीं मिल सकता है।

अगस्त 2018 में द वायर ने पत्रकार से यूट्यूबर बने रविश कुमार को भी मंच दिया, जहाँ उन्होंने सरस्वती नदी पर हो रहे शोध और सरकार के प्रयासों का मजाक उड़ाया। उन्होंने इस पूरे प्रयास को एक तरह के राजनीतिक और धार्मिक एजेंडे के तौर पर पेश किया।

जनवरी 2018 में ‘स्क्रॉल’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें सरस्वती नदी के अध्ययन के लिए एक स्थाई समिति के गठन की बात की गई थी। लेख के आखिरी पैराग्राफ में हमेशा की तरह सरस्वती नदी के अस्तित्व पर संदेह जताया गया।

ऐसे कई लेख हैं जो सरस्वती नदी को ‘मिथक’ (पौराणिक) नदी कहते हैं। जहाँ इस नदी की खोज को एक ‘हिंदू प्रोजेक्ट’ बताया जाता है, और जो भी विद्वान, इतिहासकार या पुरातत्वविद वेदों में वर्णित विवरणों के आधार पर इतिहास और अवशेषों की खोज करते हैं, उन्हें ‘हिंदुत्व से प्रभावित’ कहा जाता है।

वाममपंथी विचारधारा वाले ‘बुद्धिजीवियों’ द्वारा लिखे जाने वाले इन लेखों में अक्सर यह संकेत दिया जाता है कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों में दिए गए वर्णनों से मेल खाने वाली जगहों की खुदाई का चलन अब आम हो गया है और इसे हिंदू राष्ट्रवादियों के ‘पुनर्जागरणवादी एजेंडे’ का हिस्सा बताया जाता है।

2001 में आयोजित इंडियन हिस्ट्री कॉन्ग्रेस में मुगल शासन की तारीफ करने और हिंदुओं को नकारात्मक रूप में दिखाने वाले वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब ने एक शोध पत्र प्रस्तुत किया था। इस लेख का शीर्षक था – ‘इमौजिन रीवर सरस्वती : अ डिफेंस ऑफ कॉमन सेंस।’

इसमें इरफान हबीब ने न सिर्फ कभी समृद्ध रही सरस्वती नदी की भव्यता को खारिज किया, बल्कि यह भी दावा किया कि सरस्वती के अस्तित्व से जुड़ी बातें बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई हैं, ताकि हिंदू केंद्रित इतिहास को बढ़ावा दिया जा सके। रोमिला थापर भी उन वामपंथी-मार्क्सवादी इतिहासकारों में शामिल रही हैं, जिन्होंने घग्गर-हकरा नदी तंत्र को प्राचीन सरस्वती नदी से जोड़ने वाले शोध और निष्कर्षों को नकारा है।

वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग वैदिक ग्रंथों और हिंदू शास्त्रों को अविश्वसनीय मानते हैं। उनके लिए इन ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा है, वह ‘मिथक’ यानी काल्पनिक होता है। लेकिन अब वैज्ञानिक शोध की बढ़ती संख्या यह संकेत दे रही है कि उत्तर-पश्चिम भारत में ऐसे पेलियोचैनल (प्राचीन नदी मार्ग) पाए गए हैं, जो वेदों में वर्णित सरस्वती नदी के विवरणों से मेल खाते हैं।

2019 में IIT बॉम्बे और फिजिकल रिसर्च लैब, अहमदाबाद के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक रिपोर्ट में कहा कि उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानों में एक सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदी के प्रमाण पाए हैं। इसी नदी के किनारे प्रारंभिक हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ था।

इससे पहले यह माना जाता था कि हड़प्पा सभ्यता पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी, लेकिन अब शोध से यह पता चला है कि इस क्षेत्र में मौजूद घग्गर नदी के पुराने रास्ते के साथ-साथ कई हड़प्पा बस्तियाँ बसी हुई थीं। यह नदी अब मौसमी (सीजनल) बहाव वाली है, लेकिन इसके प्राचीन मार्ग सरस्वती नदी से जुड़े माने जा रहे हैं।

फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी-अहमदाबाद और IIT बॉम्बे के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए संयुक्त शोध में यह बताया गया है कि उत्तर-पश्चिम भारत में, आज की घग्गर नदी के मार्ग के साथ-साथ एक समय में सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदी बहती थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही नदी प्राचीन सरस्वती नदी थी, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।

शोध के अनुसार, यह सरस्वती नदी हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों से 7000 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक बहती रही। इसी नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता की सबसे पहली बस्तियाँ 3000 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच बसी थीं। शोध में यह भी कहा गया है कि जब सरस्वती नदी का प्रवाह कम हुआ और अंत में समाप्त हो गया, तो इसका सीधा असर हड़प्पा सभ्यता के पतन पर पड़ा।

इसके अलावा नदी और सभ्यता दोनों का पतन लगभग उसी समय हुआ जब करीब 4200 साल पहले ‘मेघालय चरण’ की शुरुआत हुई। यह एक ऐसा समय था जब दुनियाभर में जलवायु शुष्क होने लगी। अध्ययन में शामिल वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि जहाँ सरस्वती का उद्गम गंगा, यमुना और सतलज के समान हिमालय के हिमनद क्षेत्रों में था, वहीं वर्तमान घग्गर का उच्च हिमालय से कोई सीधा संबंध नहीं है तथा इसका उद्गम हिमालय की तराई शिवालिक से होता है।

शोध के दौरान फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) में रेडियोकार्बन और ऑप्टिकल स्टिमुलेटेड ल्यूमिनेसेंस (OSL) तरीकों से सतह की उम्र का निर्धारण किया गया। वैज्ञानिक जे.एस. रे बताते हैं कि उन्होंने पाया कि सरस्वती नदी का प्रवाह लगभग 80,000 साल पहले से निरंतर बहता था और यह 20,000 साल पहले तक चलता रहा। इसके बाद नदी का प्रवाह बर्फीले युग (ग्लेशियल पीरियड) के अत्यधिक शुष्क होने के कारण घटने लगा। हालाँकि लगभग 9000 साल पहले नदी का प्रवाह फिर से मजबूत हुआ और 4500 साल पहले तक यह लगातार बहती रही।

शोध में यह भी कहा गया कि सरस्वती नदी के प्रवाह के घटने की मुख्य वजह सतलज से जुड़े जल मार्गों का सूखना था। बाद के हिंदू ग्रंथों जैसे महाभारत में भी सरस्वती नदी के घटते प्रवाह से गायब होने तक का वर्णन मिलता है।

शोध रिपोर्ट में कहा गया है, “घग्गर नदी का यह पुनर्जीवित सदानीरा (हमेशा बहने वाली) रूप, जिसे सरस्वती से जोड़ा जा सकता है, संभवतः हड़प्पा सभ्यता के शुरुआती बस्तियों के विकास में मददगार था। नदी का यह अंततः घटता हुआ प्रवाह, जो सभ्यता के पतन का कारण बना, लगभग उसी समय हुआ जब मेघालय चरण की शुरुआत हुई।”

शोध में यह भी बताया गया, “हमारा अध्ययन यह सामने लाता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग अपनी शुरुआती बस्तियाँ घग्गर नदी के उस मजबूत चरण के किनारे बसा रहे थे, जो लगभग 9000 से 4500 साल पहले था, और जिसे बाद में सरस्वती नदी कहा गया। हालाँकि जब यह सभ्यता परिपक्व हुई, तब तक नदी ने अपनी ग्लेशियल (बर्फीली) कनेक्टिविटी खो दी थी।”

अपनी किताब ‘द लैंड ऑफ सेवेन रीवर्स’ में प्रसिद्ध इतिहासकार और अर्थशास्त्री संजीद सान्याल ने टिप्पणी की है कि सरस्वती नदी के मार्ग के बदलने में भूवैज्ञानिक बदलाव (टेक्टोनिक शिफ्ट) की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। गुजरात का धोलावीरा जो कच्छ के रण में स्थित है, भी इसका एक उदाहरण है। वह कहते हैं, ‘यदि वहाँ पानी का कोई स्रोत नहीं होता, तो कोई भी सभ्यता उस जगह पर शहर नहीं बसा सकती थी।’

सान्याल ने यह भी माना है कि हड़प्पा सभ्यता का अंत सरस्वती नदी के समाप्त होने के कारण हो सकता है। उन्होंने यह सुझाव दिया कि इन शहरों में रहने वाले लोग नदी के खत्म होने के बाद गंगा के मैदानी इलाकों की ओर चले गए होंगे।

दिलचस्प बात यह है कि 2013 में लोकसभा में हरीश चौधरी द्वारा सरस्वती नदी के बारे में एक सवाल पूछा गया था। चूँकि ISRO प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के तहत कार्य करता है, इसलिए इस सवाल का जवाब सीधे प्रधानमंत्री को दिया गया। इस सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने उत्तर-पश्चिम भारत में पेलियोचैनल्स का अध्ययन किया और उन्हें सरस्वती नदी के चैनलों से जोड़ा है।

सरकार ने कहा, “सरस्वती नदी के एकीकृत पेलियोचैनल मानचित्र को हिमालय से लेकर कच्छ के रण तक तैयार किया गया है। उत्तर-पश्चिम भारत में सरस्वती नदी के पेलियोचैनल के मानचित्र वाले मार्ग का संबंध हिमालय की सदानीरा (हमेशा बहने वाली) स्रोत से किया गया है, जो सतलज और यमुना नदियों के माध्यम से जुड़ा हुआ था।”

सरकार ने यह भी बताया कि उत्तर-पश्चिम भारत में सरस्वती नदी के पूरे मार्ग का निर्धारण भारतीय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट डेटा और डिजिटल ऊँचाई मॉडल (DEM) का उपयोग करके किया गया। सैटेलाइट इमेजेज मल्टीस्पेक्ट्रल और मल्टीटेम्पोरल होती हैं, जिनमें एक सिनॉप्टिक (समग्र) दृश्य मिलता है, जो पेलियोचैनल्स का पता लगाने में मदद करता है।

पेलियोचैनल्स को ऐतिहासिक मानचित्रों, पुरातात्त्विक स्थलों, जलविज्ञान और ड्रिलिंग डेटा का उपयोग करके प्रमाणित किया गया। यह भी देखा गया कि प्रमुख हड़प्पा स्थल जैसे कालिबंगन (राजस्थान), बनावली और रेखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) सरस्वती नदी के किनारे स्थित हैं।

घग्गर-हकरा नदी प्रणाली के आसपास कई प्रमुख हड़प्पा स्थलों की खोज हुई है, जैसे कालिबंगन, रेखीगढ़ी और धोलावीरा। इससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में कभी एक बड़ी नदी बहती थी, जिसने सिंधु घाटी सभ्यता (जिसे कई बार सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है) के विकास में अहम भूमिका निभाई।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक पुरातत्वविद ब्रज बासी लाल (बी.बी. लाल)इस मत के मजबूत पक्षधर रहे हैं कि इन हड़प्पा स्थलों का जो भौगोलिक वितरण है, वह सरस्वती नदी के मार्ग से मेल खाता है, न कि केवल सिंधु (इंडस) नदी से। इसका मतलब यह है कि सरस्वती नदी भी हड़प्पा सभ्यता का एक केंद्रीय हिस्सा रही होगी।

यह भी दिलचस्प है कि कालिबंगन में हुई खुदाई में वैदिक यज्ञ वेदियाँ और यूप स्तंभ मिले हैं, जो वैदिक और हड़प्पा सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक निरंतरता का संकेत देते हैं। हालाँकि, बी.बी. लाल जैसे विद्वानों को कई बार वामपंथी-लिबरल समूह द्वारा ‘हिंदुत्व-प्रभावित’ कहकर बदनाम किया गया है, जबकि उनका काम ठोस शोध पर आधारित रहा है।

सरस्वती नदी को जानबूझकर ‘मिथक’ (काल्पनिक) कहकर खारिज करना, एक सोची-समझी कोशिश है ताकि हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता को कमजोर किया जा सके। यह बात तो समझी जा सकती है कि केवल धार्मिक ग्रंथों पर ही इतिहास लिखना उचित नहीं है, भले ही वे ग्रंथ हिंदू संस्कृति की नींव हों और वैदिक युग के जीवन व समाज की विस्तृत जानकारी देते हों, लेकिन समस्या तब होती है जब वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग वैध शोध पत्रों, पुरातात्त्विक खोजों और अन्य प्रमाणों को खारिज कर देते हैं, वो भी सिर्फ इसलिए कि कोई बात उनके एजेंडे से मेल नहीं खाती। वे न सिर्फ इन तथ्यों को नकारते हैं, बल्कि इस दिशा में आगे और शोध या खोज को रोकने की कोशिश भी करते हैं।

वामपंथी और अन्य हिंदू-विरोधी तत्व, जो लंबे समय से आर्य आक्रमण सिद्धांत (Aryan Invasion Theory – AIT) के समर्थक रहे हैं, केवल हिंदू ग्रंथों की ऐतिहासिकता को कमजोर करने के उद्देश्य से ही नहीं, बल्कि सरस्वती नदी को ‘मृत नदी’ कहकर उसकी खोज और अध्ययन का भी विरोध करते हैं। जबकि शोध यह दिखाते हैं कि सरस्वती नदी का सदानीरा रूप लगभग 9,000 से 4,500 साल पहले तक रहा और ऋग्वेद में इसका उल्लेख एक विशाल और बहती हुई नदी के रूप में है, जो 1900 ईसा पूर्व से पहले का समय हो सकता है।

कई विद्वानों का मानना है कि यह समय-सीमा वैदिक युग को परिपक्व हड़प्पा काल (2600-1900 ईसा पूर्व) के साथ जोड़ती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि वैदिक और हड़प्पा सभ्यताएँ समकालीन (एक ही समय में मौजूद) थीं या शायद एक ही संस्कृति का हिस्सा थीं। यह खास बात है कि हड़प्पा स्थलों पर वैदिक धार्मिक तत्वों की खोज, किसी भी तरह के हिंसक आक्रमण के पुरातात्त्विक प्रमाणों की कमी और आनुवांशिक अध्ययनों में भारतीयों में बहुत कम स्टेपी (Steppe) वंश का पाया जाना, इन सभी ने आर्य आक्रमण सिद्धांत (Aryan Invasion Theory) के समर्थकों को बड़ा झटका दिया है।

अब तक के अध्ययनों ने विघटनकारी और हिंसक विदेशी आक्रमण के बजाय सांस्कृतिक निरंतरता का संकेत दिया है। यहाँ तक कि जब वामपंथी इतिहासकारों और विद्वानों ने ‘आक्रमण’ शब्द की जगह ‘प्रवासन’ (immigration) का इस्तेमाल कर नैरेटिव को बदलने की कोशिश की, तब भी उन्हें खास सफलता नहीं मिली।

सरस्वती नदी के अस्तित्व से इनकार करना, वामपंथियों को आर्य आक्रमण सिद्धांत (AIT) को किसी तरह जिंदा रखने में मदद करता है। अगर सरस्वती नदी को वास्तविक माना जाए, तो उन्हें ऋग्वेद की समय-सीमा को सिंधु घाटी सभ्यता के साथ मिलाने की जरूरत पड़ेगी, जो उनके नैरेटिव को पूरी तरह उल्टा कर देता है।

इसी वजह से जब NCERT ने अपने पाठ्यक्रम में हड़प्पा सभ्यता का नाम बदलकर ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ किया, तो वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में बड़ी नाराजगी देखी गई। असल में सरस्वती नदी के अस्तित्व को स्वीकार करना न केवल वैदिक संस्कृति की प्राचीनता को प्रमाणित करता है, बल्कि मैक्समूलर जैसे विदेशी विद्वानों द्वारा फैलाए गए उस पुराने और विभाजनकारी दावे को भी झूठा साबित करता है जिसमें कहा गया है कि विदेशी आर्यों ने भारत आकर मूल द्रविड़ों को हराया और सिंधु घाटी सभ्यता को नष्ट कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि नवबौद्ध विचारधारा से जुड़े कुछ लोग आज भी आर्य-आक्रमण सिद्धांत को ही सच मानते हैं, जबकि ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उनके सबसे बड़े प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी अपने तर्कों और तथ्यों के आधार पर आर्य आक्रमण सिद्धांत को खारिज कर दिया था।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भले ही वामपंथी-लिबरल समूह ने हिंदू इतिहास को बदनाम करने और सरस्वती नदी को केवल एक ‘मिथक’ साबित करने के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन लगातार मिल रहे पुरातात्विक प्रमाण इस ओर इशारा करते हैं कि जिसे वे ‘मिथक’ कहते हैं, वह वास्तव में एक ऐतिहासिक सच हो सकता है, जिसे अब तक पूरी तरह खोजा नहीं गया है।

इसलिए जरूरत है कि सरस्वती नदी पर और अधिक गहराई से शोध किया जाए, ताकि उसके हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों से संबंध को बेहतर तरीके से समझा जा सके। वहीं सरस्वती नदी और हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों से इसके संबंध पर भी और अधिक शोध किया जाना चाहिए ताकि प्राचीन नदी और स्वदेशी वैदिक-हड़प्पा सातत्य में इसकी भूमिका का पता लगाया जा सके।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जिसने माँ-बच्चे और पत्नी के सामने की शख्स की हत्या, उसे केरल के हाई कोर्ट ने दी माँ की सेवा करने को पैरोल: जेल के नियमों में नहीं था ऐसा कोई प्रावधान, कहा- हमारे यहाँ आँख के बदले आँख वाली सजा नहीं दी जाती

केरल हाईकोर्ट ने 93 साल की एक वृद्ध महिला की सेवा के लिए उसके बेटे को एस्कॉर्ट परोल दे दी। दरअसल हत्या का दोषी पाए जाने पर बेटा को कोर्ट ने मौत की सजा दी थी। अब मानवीय पहलू के आधार पर न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हिकृष्णन ने पैरोल देने का आदेश दिया।

हालाँकि केरल कारागार एवं सुधार सेवाएँ (प्रबंधन) अधिनियम और केरल कारागार एवं सुधार सेवाएँ (प्रबंधन) अधिनियम के मुताबिक मौत की सजा पाए कैदियों को पैरोल नहीं दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा, “हालाँकि यह सच है कि दोषी किसी भी ‘मानवीयता’ का हकदार नहीं है, क्योंकि उसने एक व्यक्ति की उसकी माँ, पत्नी और बच्चे के सामने बेरहमी से हत्या की है। लेकिन कोर्ट कैदी की तरह बर्ताव नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने कहा,

“अगर कोई कहता है कि कैदी की माँग गलत है तो उन्हें पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन कोर्ट कैदी की तरह अमानवीय रुख नहीं अपना सकता। कैदी ने एक परिवार को अनाथ कर दिया। भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ ‘आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत’ जैसी सजा दी जाती हो। हमारा देश न्याय करते समय अपनी मानवता, करुणा और सहानुभूति के लिए जाना जाता है। यह देखना संवैधानिक न्यायालय का कर्तव्य है कि सजा पूरी होने तक कैदी की बुनियादी जरूरतों और बुनियादी अधिकारों की रक्षा की जाए।”

कैदी ने सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। कैदी की पत्नी ने जेल अधिकारियों से भी अनुरोध किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उसने एस्कॉर्ट पैरोल के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट को उसने बताया कि 93 साल की माँ बिस्तर पर पड़ी हैं और बुरी तरह बीमार हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहा एक कैदी कोर्ट से गुहार लगाता है कि वह अपनी बीमार माँ को देखना चाहता है, तो न्यायालय अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता, भले ही उसने हत्या करते समय मृतक और उसके रिश्तेदारों के साथ अमानवीय व्यवहार किया हो, जिसे ट्रायल कोर्ट ने सही पाया है।

कोर्ट ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे दोषी को उसकी माँ से मिलने के लिए एस्कॉर्ट पैरोल पर ले जाएँ और उसकी माँ के साथ कम से कम 6 घंटे बिताने दें। इस दौरान एस्कॉर्टिंग पुलिस निगरानी करती रहे।

न्यूजीलैंड में हिंदुओं-सिखों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, ॐ लिखा झंडा जलाया तो खिल गईं इस्लामी कट्टरपंथियों की बाँछे, सेकुलरों को भी मिला असीम सुख: जानें – ‘अंब्रेला कंट्री’ में इस नई आफत के पीछे कौन

शांति और खूबसूरती के लिए दुनिया भर में पहचाना जाने वाला न्यूजीलैंड इन दिनों अशांति की खबरों से चर्चा में है। यहाँ सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें गैर-ईसाई धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, सिख), प्रवासियों, फिलिस्तीनी समुदायों और यहाँ तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को निशाना बनाया जा रहा है। इन प्रदर्शनों की अगुवाई एक माओरी मूल का धार्मिक नेता ब्रायन तमाकी कर रहा है, जो डेस्टिनी चर्च नामक संगठन चलाता है।

प्रदर्शनों में माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ और हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, फिलिस्तीनी झंडों को जलाने जैसे भड़काऊ कदम उठाए गए हैं। ये सब न्यूजीलैंड की उस छवि को नुकसान पहुँचा रहे हैं, जो इसे सभी धर्मों और संस्कृतियों को अपनाने वाला ‘अंब्रेला कंट्री’ बनाती है।

इस प्रदर्शन के दौरान माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ और धार्मिक झंडों को जलाने जैसे भड़काऊ कदम उठाए गए हैं, जिससे न्यूजीलैंड की बहुसांस्कृतिक छवि को ठेस पहुँची है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें हिंदुओं और खालिस्तानियों के खिलाफ प्रदर्शन के दावे किए जा रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें लोग अपने ‘हिसाब’ से पोस्ट कर रहे हैं। इस्लामी हैंडल और कथित सेकुलर लोग ये कहकर इस प्रदर्शन का वीडियो शेयर कर रहे हैं कि न्यूजीलैंड में हिंदुओं का विरोध हो रहा है।

फातिमा जैसे हैंडल्स को इसी बात की खुशी हो रही है कि हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है।

वहीं श्रवण पासवान नाम के ट्विटर हैंडल ने वीडियो शेयर करते हुए इस बात पर खुशी जताई कि न्यूजीलैंड में हिंदू (ब्राह्मणों) के खिलाफ जनता सड़कों पर उतरी है।

हालाँकि इन प्रदर्शनों का विरोध भी हो रहा है। आखिर इस अशांति की जड़ क्या है? ‘अंब्रेला कंट्री’ यानी सभी को समेटने वाले देश न्यूजीलैंड में ऐसा क्यों हो रहा है? इस पूरे मामले को विस्तार से समझाते हैं

न्यूजीलैंड में विरोध प्रदर्शन का मामला क्या है?

न्यूजीलैंड की आबादी करीब 53 लाख है और यह देश हमेशा से प्रवासियों के लिए खुला रहा है। लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद, यानी 2022 से, यहाँ प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इससे कई समस्याएँ सामने आई हैं, जैसे मकानों की कमी और किराए में भारी बढ़ोतरी। लोग परेशान हैं कि उनके लिए घर और नौकरियाँ कम पड़ रही हैं। सरकार ने कोशिश की है कि कुशल प्रवासियों जैसे शिक्षकों या डॉक्टरों को प्राथमिकता दी जाए, लेकिन स्थानीय लोगों को लगता है कि प्रवासी उनके संसाधन छीन रहे हैं।

इन प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाले ब्रायन तमाकी के एक्स हैंडल पर एक 40 मिनट से भी ज्यादा का वीडियो मिला, जिसमें वो और उनके ‘प्रदर्शनकारी’ अनुयाई सभी गैर-ईसाइयों के खिलाफ आग उगल रहे हैं।

हालाँकि इस मामले पर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भी बयान दिया था कि इतना ज्यादा प्रवास ‘लंबे समय तक चल नहीं सकता।’ इसके साथ ही कई न्यूजीलैंडवासी बेहतर नौकरियों और जिंदगी की तलाश में ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं। 2023 में 47,000 लोग देश छोड़कर चले गए, जो एक रिकॉर्ड है। इस स्थिति ने कुछ लोगों में गुस्सा और असुरक्षा की भावना पैदा की है।

धार्मिक और सांस्कृतिक टकराव एक जगह लाए ब्रायन तमाकी

इसी माहौल में ब्रायन तमाकी और उनके डेस्टिनी चर्च ने गैर-ईसाई धर्मों और प्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए। 21 जून 2025 को ऑकलैंड में हुए एक प्रदर्शन में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और फिलिस्तीनी झंडों को जलाया गया। प्रदर्शनकारी माओरी युद्ध नृत्य ‘हाका’ कर रहे थे, जो माओरी संस्कृति का एक पवित्र हिस्सा है। तमाकी का कहना है कि गैर-ईसाई धर्मों का प्रसार ‘नियंत्रण से बाहर’ हो गया है और प्रवासियों का बिना न्यूजीलैंड की संस्कृति को आत्मसात हुए आना ‘अतिक्रमण‘ है।

न्यूजीलैंड की ‘अंब्रेला कंट्री’ छवि पर खतरा

न्यूजीलैंड को ‘अंब्रेला कंट्री’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ हर धर्म और संस्कृति के लोग शांति से रहते हैं। लेकिन तमाकी के प्रदर्शन ने इस एकता को चुनौती दी है। हालाँकि न्यूजीलैंड के नेताओं ने इसे सख्ती से नकारा है। कार्यवाहक प्रधानमंत्री डेविड सेमुर ने इसे ‘गैर-न्यूजीलैंड जैसा’ बताया और कहा कि यहाँ सभी धर्मों और संस्कृतियों का स्वागत है, बशर्ते वे शांति से रहें।

पुलिस मंत्री मार्क मिशेल ने भी प्रदर्शन को ‘घृणास्पद’ करार दिया, खासकर माओरी युद्ध हथियार ‘ताइहा’ का इस्तेमाल धार्मिक झंडों को नष्ट करने के लिए करना गलत बताया। विभिन्न धार्मिक संगठनों ने एकजुट होकर तमाकी की निंदा की और कहा कि न्यूजीलैंड की ताकत उसकी विविधता में है।

हालाँकि न्यूजीलैंड में अभी हालात इतने खराब नहीं हैं, लेकिन तमाकी जैसे नेताओं के उत्तेजक बयान और प्रदर्शन अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर इसे रोका नहीं गया, तो न्यूजीलैंड की शांति और एकता को नुकसान पहुँच सकता है।

क्यों पड़ेगा फर्क?

ये प्रदर्शन न्यूजीलैंड की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा हैं। अगर धार्मिक और प्रवासी समुदायों के खिलाफ नफरत बढ़ती है, तो देश की बहुसांस्कृतिक छवि को नुकसान होगा। इससे पर्यटन, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है। साथ ही सामाजिक तनाव बढ़ने से अपराध और हिंसा की घटनाएँ बढ़ सकती हैं, जैसा कि 2019 के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमले जैसे मामलों में देखा गया। धार्मिक संगठनों ने सरकार से नफरत भरे भाषणों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की माँग की है, ताकि ऐसी घटनाएँ रोकी जा सकें।

कौन है प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाला ब्रायन तमाकी

ब्रायन रेमंड तमाकी का जन्म 2 फरवरी, 1958 को न्यूजीलैंड के वाइकाटो क्षेत्र में हुआ। वे माओरी मूल के हैं और ताइनुई जनजाति से ताल्लुक रखते हैं। 15 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और जंगल में मजदूरी शुरू की। किशोरावस्था में तमाकी की मुलाकात हन्नाह ली से हुई। उनका रिश्ता तूफानी था। एक बार हन्नाह ने तमाकी पर चाकू से हमला किया, और वे बाथरूम में बंद होकर बमुश्किल बचे। 1978 में उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ, जो शादी से पहले था। 1980 में तमाकी और हन्नाह ने तोकोरोआ के एक चर्च में शादी की। इसके बाद उनके दो और बच्चे हुए।

डेस्टिनी चर्च की स्थापना

1982 में तमाकी और हन्नाह ने बाइबल कॉलेज में पढ़ाई की और फिर तोकोरोआ में पादरी बने। 1980 के दशक में उन्होंने कई चर्च शुरू किए और 1998 में डेस्टिनी चर्च की नींव रखी। यह चर्च अपनी कट्टरपंथी विचारधारा के लिए जाना जाता है, जो समलैंगिकता, गैर-परंपरागत परिवार मूल्यों और आधुनिक सामाजिक बदलावों का विरोध करता है। तमाकी खुद को ‘बिशप’ कहते हैं और समृद्धि धर्मशास्त्र को बढ़ावा देते हैं, जिसमें धन और सफलता को ईश्वर की देन माना जाता है। यह विचारधारा कई बार विवादास्पद रही, क्योंकि इसे अनैतिक और खतरनाक माना गया।

राजनीतिक में कई बार मिली करारी शिकस्त

तमाकी ने कई बार राजनीति में कदम रखने की कोशिश की, लेकिन हर बार असफल रहे। 2003 में उनके समर्थकों ने डेस्टिनी न्यूजीलैंड पार्टी बनाई, जो 2005 के चुनाव में केवल 0.6% वोट पा सकी। 2019 में उनकी पत्नी हन्नाह ने विजन न्यूजीलैंड पार्टी शुरू की, जो गर्भपात और समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर केंद्रित थी। 2022 में तमाकी ने फ्रीडम्स न्यूजीलैंड पार्टी बनाई, जो 2023 के चुनाव में 0.33% वोट के साथ नाकाम रही।

तमाकी का प्रभाव सीमित है, लेकिन उनके उत्तेजक बयान और प्रदर्शन सोशल मीडिया के जरिए वायरल होते हैं, जिससे वे चर्चा में रहते हैं। कुल मिलाकर तमाकी का जीवन बेहद उठापटक भरा रहा है और इन प्रदर्शनों के जरिए वो न्यूजीलैंड की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ब्रायन तमाकी के नेतृत्व में न्यूजीलैंड में हो रहे प्रदर्शन देश की शांति और बहुसांस्कृतिक छवि के लिए चुनौती हैं। प्रवास, आवास संकट और सांस्कृतिक तनाव जैसे मुद्दों ने न्यूजीलैंड की सामाजिक एकता को खतरा पैदा किया है। ऐसे में अब न्यूजीलैंड के सामने अब अपनी ‘अंब्रेला कंट्री’ की पहचान को बचाने की भी चुनौती है और यह तभी संभव होगा जब एकता और सम्मान के मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए।

नशा देकर रेप, ब्लैकमेलिंग, परिवारों पर झूठे मुकदमे… पादरी बजिंदर सिंह की काली करतूतों के कई पीड़ित:’पापा जी’ की कहानी बताते हुए सिहरती जाती हैं महिलाएँ

पंजाब का यीशू-यीशू वाला पादरी बजिंदर सिंह के अत्याचार से पीड़ित महिलाएँ अब खुल कर सामने आ रही हैं। बजिंदर फिलहाल मनसा जेल में बंद है। उसे एक मामले में 1 अप्रैल 2025 को उम्रकैद की सजा मिली है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक महिला ने बताया कि बजिंदर सिंह ने उसे नशा देकर रेप किया और उसका वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने लगा। बजिंदर ने कहा कि अगर वह उसके पास नहीं गई तो वीडियो वायरल कर देगा। इतना ही नहीं उसे श्मशान भेजा और तंत्र-मंत्र के लिए जलती चिता की राख और खोपड़ी लाने का आदेश दिया। वह 4 बार श्मशान गई और जलती हुई राख और खोपड़ियाँ लेकर आई। पूरी रात वह मंत्र पढ़ता था और तांत्रिक पूजा करता था। इस दौरान महिला को उसके साथ बैठना पड़ता था।

महिला ने तंग आकर उसके खिलाफ पुलिस कंप्लेन करने की धमकी दी। इसके बाद महिला पर चोरी का इल्जाम लगाया गया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। हालाँकि पुलिस को उसके पास से कुछ नहीं मिला और उसे छोड़ दिया गया। महिला के मुताबिक उसने 2018 में सबसे पहले पादरी बजिंदर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, वो गिरफ्तार भी हुआ लेकिन 3 महीने में ही जेल से बाहर आ गया।

केस खत्म करने के लिए उसने महिला को 10 लाख रुपए ऑफर किए थे, लेकिन महिला नहीं मानी। इसके बाद उसके पति को झूठे रेप केस में फँसाया। यहाँ तक कि महिला पर रेप में मदद करने का आरोप भी लगाया। इस मामले में दोनों पति-पत्नी अभी बेल पर हैं। महिला और उसके पति को परेशान करने का सिलसिला थमा नहीं है।

महिला के मुताबिक बजिंदर को रेपिस्ट करने पर जालंधर में उनदोनों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। ये केस चर्च के प्रधान ने कराया। इसमें दोनों बरी हो गये। एक और केस चंडीगढ़ में किया गया। इसमें महिला के पति पर नशा देकर रेप करने का आरोप है।
एक और मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी में दर्ज किया गया है। इसमें आरोप लगाया गया कि महिला ने लड़की का किडनैप किया। महिला के पति और ड्राइवर ने मिलकर रेप किया। इस केस में महिला के तरफ से फर्जी वकील भी कोर्ट में खड़ा था। उसके बेल की अर्जी रिजेक्ट भी हो गयी।

एक दूसरी महिला अनीशा (बदला हुआ नाम) ने फरवरी 2025 में बजिंदर सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। महिला के मुताबिक बजिंदर सिंह प्रोफेट या पादरी नहीं है बल्कि शैतान है जो फर्जी चमत्कार की बात करके लोगों को बरगलाता है। अनीशा के मुताबिक, ” 2017 में बजिंदर ने उसे गंदे तरीके से छुआ। उस वक्त वह मात्र 13 साल की थी। मुझे लगा कि शायद ये गलती से हुआ है। 2020 से वह बहाने बनाकर अकेले अपने ऑफिस बुलाने लगा। मेरे साथ सब कुछ हुआ,
बस रेप नहीं हुआ”

दरअसल 2017 में अनीशा अपने माँ के साथ चर्च जाने लगी थी। एक साल बजिंदर ने उसकी माँ को अपनी टीम में शामिल कर लिया। वह हमेशा अनीशा को सेवा के लिए बुलाने का दबाव डालता। अनीशा के मुताबिक उसकी माँ ने 2020 में उसे सेवा के लिए पहली बार भेजा। उसे फिर अकेले बजिंदर बुलाने लगा। उसे बैड टच के बाद गंदे मैसेज भी करने लगा। बात बैड टच से आगे बढ़ गई और अनीशा को डिप्रेशन होने लगा। अनीशा कहती है कि जब भी उसे बुलावा आता, वह पैनिक हो जाती, लेकिन मजबूरन जाना पड़ता था।

अनीशा की माँ बजिंदर के बुलावे को यीशू का संदेश समझती और उसे भेज देती। अनीशा को बजिंदर ने धमकी दी कि अगर उसने मुँह खोला तो उसके पूरे परिवार को मार देगा।
अनिशा के मुताबिक बजिंदर कहता,” मैंने बहुत लोगों को मारा है, तुम्हें भी मार दूँगा और कोई मेरा कुछ नहीं कर पाएगा।”

बजिंदर ने अनीशा की माँ को धमकी दी कि अगर किसी से कुछ कहा तो परिवार की बेइज्जती करेंगे। अनीशा के पिता को लड़की की छेड़छाड़ के आरोप में फँसाया।

अनीशा कहती है कि चर्च में कई लड़कियों के साथ बजिंदर ने जोर जबरदस्ती की। एक लड़की के माता-पिता अभी भी चर्च में काम करते हैं। उन्हें बजिंदर के करतूतों के बारे में सब पता है लेकिन वे डरते हैं।

अनिशा के मुताबिक चर्च से कई लड़के-लड़कियाँ गायब भी हुए। अनीशा ने 7 साल तक बजिंदर के साथ काम किया है। वह कहती हैं कि ” वह कोई चमत्कार नहीं करता, सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है। उसकी टीम आगे की लाइन में बैठती है। जो भी मंच तक पहुँचते हैं सब पहले से तय होता है। मेरी तो आँखों के सामने ये सब होता था।”

कौन है पादरी बजिंदर सिंह?

पादरी बजिंदर सिंह हरियाणा के करनाल का रहने वाला है। उसका जन्म यमुनानगर में हुआ था। उसके चर्च की देशभर में करीब 260 शाखाएँ हैं। मोहाली के न्यू चंडीगढ़ में सबसे बड़ा चर्च है। जालंधर के ताजपुर में पादरी बजिंदर सिंह एक चर्च चलाता है, जिसे ग्लोरी ऑफ विजडम चर्च कहा जाता है।

करीब 15 साल पहले एक हत्या के मामले में उसे सजा मिली। वह जेल से निकला और ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। वह बीमारियों का इलाज करने का दावा करता है। उसकी सभाओं में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। उसके यूट्यूब चैनल पर करीब 37 लाख सब्सक्राइबर हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, मॉरिशस, मलयेशिया तक में शाखाएँ हैं और उसके अनुयायी उसे ‘पापा जी’ कहते हैं।

रेयर अर्थ मिनरल, TBM, स्मार्टफोन पार्ट… भारत की विकास यात्रा में अड़ंगा लगा रहा चीन: अब स्पेशल खाद की भी सप्लाई रोकी, ‘हाथी’ की आर्थिक तरक्की ‘ड्रैगन’ को नहीं हो रही बर्दाश्त

बीते 20-30 वर्षों में चीन ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास हासिल किया है। चीन ‘दुनिया की फैक्ट्री’ के रूप में उभरा है। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही और उसकी विस्तारवादी नीतियों के चलते विश्व का उस पर विश्वास नहीं है। उसका विकल्प इस दुनिया में मात्र एक ही देश है, और वह है भारत। भारत ने कई मामलों में चीन को कड़ी टक्कर देना चालू कर दिया है। चीन, भारत की तरक्की में अब रोड़े अटका रहा है। उसने बीते कुछ वर्षों में कई बार ऐसी हरकतें की हैं, जिससे भारत की विकास यात्रा को धक्का लगे।

अब चीन ने उर्वरक पर लगाया बैरियर

इस कड़ी में सबसे ताजा मामला चीन से भारत आने वाले कृषि उत्पादों से जुड़ा हुआ है। इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने बिना कोई आधिकारिक प्रतिबन्ध लगाए ही विशेष काम में उपयोग होने वाले उर्वरकों की आपूर्ति रोक दी है। चीन के पोर्ट पर भारत जाने के लिए कंटेनर तैयार रखे हैं, लेकिन चीनी अधिकारी उनकी जाँच कर हरी झंडी नहीं दे रहे, जिससे यह अधर में लटके हैं। फसल को बढ़ाने, कीट भगाने और उसकी विशेष जरूरतों को पूरा करने वाले यह उर्वरक भारत आना बंद हो चुके हैं।

रिपोर्ट बताती है कि चीन भारत छोड़ कर बाकी देशों को ख़ुशी-ख़ुशी यह उर्वरक भेज रहा है। यहाँ ना कोई जाँच में दिक्कत है और ना ही पोर्ट पर इससे सम्बन्धित कंटनेर रोके जा रहे हैं। भारत इस उत्पाद का हर साल जून-दिसम्बर के बीच लगभग 1.5 लाख टन आयात चीन से करता है। चीन बीते कुछ वर्षों से यह आयात भारत को करने में आनाकानी कर रहा था लेकिन इस बार उसने पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है।

भारत इन विशेष तरह के उर्वरकों के लिए 80% चीन पर ही निर्भर है। इकॉनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि जिन उर्वरकों के निर्यात पर चीन ने कैंची चलाई है, वह सामान्यतः नैनो तरह के हैं और पानी में घोले जाते हैं। भारत जहाँ यूरिया, DAP और फॉस्फेट जैसे उत्पादों में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, वहीं ऐसे विशेष तरह के उर्वरकों के लिए वह चीन समेत कई अन्य देशों पर निर्भर है। भारत को प्रति वर्ष लगभग 3.5

यदि चीन इन उर्वरकों की सही समय पर आपूर्ति नहीं करता, तो भारत में कई फसलें प्रभवित हो सकती हैं। रिपोर्ट बताती है कि चीन का विकल्प बाजार में मौजूद है। भारत जॉर्डन या किसी अन्य यूरोपियन देश से यह उर्वरक खरीद सकता है। लेकिन समस्या यह है कि ये देश इतनी बड़ी मात्रा, इतने कम समय में आपूर्ति कर नहीं पाएँगे। भारत को आने वाले सामानों पर चीन कोई पहली बार ऐसी बदमाशी नहीं कर रहा। इससे पहले भारत की आर्थिक तरक्की को ब्रेक लगाने के लिए कई बार ऐसे ही प्रयास कर चुका है।

TBM भी रोकीं

भारत में लगातार बन रहा इन्फ्रा भी चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। वह इसके निर्माण में जिस तरह से अड़ंगा लगा सकता है, लगा रहा है। चीन ने अहमदाबाद-मुम्बई बुलेट रेल प्रोजेक्ट में उपयोग होने वाली 3 टनल बोरिंग मशीन (TBM) का भारत को आयात रोक दिया है। टनल बोरिंग मशीन, जमीन के नीचे सुरंग बनाने के लिए काम में लाई जाती हैं। यह जमीन के नीचे एक दिशा में गड्ढा खोदती जाती हैं, यह वर्तमान में जमीन के नीचे सुरंग बनाने के लिए सबसे तेज तरीका है।

TBM मशीन (प्रतीकात्मक चित्र, साभार: Terratec)

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन ने वर्तमान में भारत को आने वाली 3 ऐसी TBM रोक रखी हैं। यह तीनों मशीनें जर्मनी की एक कम्पनी ने बनाई हैं। यह कम्पनी इन्हें चीन के गुआंगझाऊ में बनाती है। इनकी आवश्यकता मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स बनाने में है। यह कॉरिडोर 21 किलोमीटर लम्बा है। इनके चक्कर में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। तीन में से 2 TBM भारत अक्टूबर, 2024 में ही आ जानी थीं। लेकिन अभी तक यह चीन के पोर्ट पर फंसी हैं।

इस मामले को वाणिज्य मंत्रालय के साथ ही विदेश मंत्रालय के पास पहुँचाया गया है। वह इस पर काम कर रहे हैं। TBM का मुद्दा कोई नया नहीं है। इसको लेकर केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल जर्मनी के मंत्री को सावर्जनिक तौर पर लताड़ चुके हैं। इसमें उन्होंने जर्मन कम्पनी की बनाई TBM के चीन के पोर्ट पर रोके जाने की बात दोहराई थी इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। इन TBM के आने के बाद ही भारत में काम तेजी पकड़ पाएगा। भारत में इन्फ्रा निर्माण में अड़ंगा लगाने का यह दांव चीन अब जानबूझ कर खेल रहा है।

रेयर अर्थ मिनरल पर भी ताला

चीन के पास पृथ्वी के दुर्लभ चुंबकीय तत्वों (रेयर अर्थ मैग्नेट्स) का भंडार है। अमेरिका के साथ टैरिफ वार के बाद चीन ने इन दुर्लभ तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसका बड़ा नुकसान भारत को हुआ। भारत में स्थापित ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर और अन्य उपकरण निर्माण से जुड़े उद्योगों को इस प्रतिबंध के चलते आपूर्ति बाधित हो गई थी। अप्रैल 2025 में चीन ने 7 मध्यम से भारी दुर्लभ तत्वों पर सुरक्षा और प्रसार संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इसके बाद चीन ने निर्यातकों को लाइसेंस लेने की जरूरत बता दी। दुर्लभ मैग्नेट इलेक्ट्रिक और पेट्रोल गाड़ियों, रक्षा उपकरणों और में एक अहम भूमिका निभाते हैं। इनका उपयोग मोटर और स्टीयरिंग सिस्टम, ब्रेक, वाइपर और ऑडियो डिवाइसेज के निर्माण में किया जाता है। कई भारतीय कम्पनियों को निर्माण पर ब्रेक के बारे में भी चीन के इस कदम के चलते सोचना पड़ा था। मारुति सुजुकी की आने वाली गाड़ी E-विटारा का उत्पादन तक इसके चलते प्रभावित हो गया।

भारत की अर्थव्यवस्था में 7.1% हिस्सा ऑटोमोबाइल सेक्टर का है। यह देश में रोजगार का एक बड़ा स्रोत है। ऐसे में चीन यह सप्लाई बाधित कर भारत की जीडीपी वृद्धि दर को भी प्रभावित कर रहा है। हालाँकि, उसकी यह हरकतें ज्यादा दिन नहीं चलती। लेकिन हर बार बार वह किसी ना किसी तरीके से यह प्रयास करता है कि भारत के आर्थिक इंजन पर ब्रेक लगा दे। यह भी उसी कड़ी में उठाया एक कदम है।

स्मार्टफोन निर्माण में भी लगा रहा ब्रेक

भारत बीते कुछ वर्षों में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन निर्माता बन कर उभरा है। इस मामले में उसने सीधे चीन को चुनौती दी है। एप्पल के लिए फोन बनाने वाली फॉक्सकॉन समेत तमाम कम्पनियाँ लगातार भारत में निवेश कर रही हैं। भारत स्मार्टफोन निर्माण के मामले में चीन के विकल्प के तौर पर उभरा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2025 खत्म होते-होते भारत विश्व के 20% फोन बना रहा होगा। इस मेक इन इंडिया से चीन को करारा झटका लगा है।

अपने हाथ से बिजनेस छिनता देख चीन ने भारत के मेक इन इंडिया में टाँग अड़ाने का प्रयास किया है। जनवरी में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन ने उन विशेषज्ञ इंजीनियरों के भारत आने पर रोक लगाई है, जो यहाँ स्मार्टफोन निर्माण को लेकर काम करने वाले थे। वह फॉक्सकॉन के चीनी स्टाफ को भारत आने देने में कई बैरियर लगा रही हैं। यहाँ तक कि इन स्टाफ को टिकट करवा लेने के बाद भी अपनी यात्रा रद्द करने को कहा गया।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि चीन स्मार्टफोन बनाने के लिए आवश्यक कई पार्ट्स की सप्लाई भी रोक रहा है। वह इससे भारत की मेक इन इंडिया की यात्रा को प्रभावित करना चाहता है। चीन की यह हरकतें इस बात का प्रमाण हैं कि वह भारत के लिए वर्तमान में कितनी भी मीठी बातें बोल रहा हो, वह असल में हमारी आर्थिक वृद्धि नहीं देख पा रहा। वह जानता है कि भारत ही उसके जितनी निर्माण क्षमता बना सकता है। इसलिए चाहे TBM हों या स्मार्टफोन के पुर्जे, वह सबकी सप्लाई में पेंच फँसाता है।

खुद को ड्रैगन और भारत को हाथी बताने वाला चीन वैसे तो दोनों के साथ ‘डांस’ यानी दोनों देशों के सहयोग की बात करता है, लेकिन जब असल सहयोग की बात आती है तो उसे समस्या हो जाती है और वह चतुराई से हाथी को धोखा देने लगता है।

‘कोई अनपढ़ होगा जो मैन्युफैक्चरिंग में जाति की बात करेगा’: राहुल गाँधी के प्रोपेगेंडा को नेहरू प्लेस के दुकानदार ने किया तार-तार, Opindia से बताया- कॉन्ग्रेस के राज में तो असेम्बलिंग तक नहीं होती थी

राहुल गाँधी वर्तमान में एक मिशन पर हैं। यह मिशन है हर उस चीज में कमी निकालना, जो भारत की उपलब्धियाँ हैं। इसी कड़ी में 21 जून, 2025 को राहुल गाँधी ने ट्विटर पर एक वीडियो जारी किया। लगभग 8 मिनट के इस वीडियो का शीर्षक रखा गया, ‘सब माल चाइनीज है।’

राहुल गाँधी ने यह वीडियो देश के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक मार्केट ‘नेहरू प्लेस’ में बनाई। राहुल गाँधी नीली टीशर्ट में यहाँ पहुँचते हैं, एक लैपटॉप-मोबाइल की रिपेयरिंग की दुकान को चुनते हैं। यहीं से यह वीडियो बनाई गई है। वीडियो में वह एक मुस्लिम और एक हिन्दू कारीगर को अपने दाएँ-बाएँ बैठाते हैं।

राहुल गाँधी इसके बाद पूछते हैं कि उनके यहाँ उपयोग होने वाला माल कहाँ बना होता है। इसके बाद वह अपना पहले से निर्धारित प्रोपेगेंडा चालू करते हैं। राहुल गाँधी दावा करते हैं कि भारत में वर्तमान में कोई मैन्युफैक्चरिंग नहीं होती और सब कुछ चीन से आता है। भारत में होने वाली मैन्यूफैक्चरिंग को वह ‘असेम्बली’ बताते हैं।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इसके बाद राहुल ‘मेड इन इंडिया’ और ‘असेम्बलड इन इंडिया’ में फर्क समझाने का प्रयास करते हैं। राहुल गाँधी अपने प्रोपेगेंडा के तहत बताते हैं कि भारत अगर मैन्युफैक्चरिंग में पिछड़ा है तो इसकी जड़ में जाति है। वह इसी से अपने वीडियो का अंत करते हैं।

राहुल गाँधी की पूरे वीडियो के दौरान कोशिश होती है कि केंद्र की मोदी सरकार की ‘मेड इन इंडिया स्कीम’ की साख पर बट्टा लगाएँ। राहुल गाँधी पूरे विडियो के दौरान यह बताने की कोशिश करते हैं कि कैसे चीन ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट पर कब्जा कर लिया है।

यह बात जगजाहिर है कि भारत में वर्तमान में तेजी से स्मार्टफोन और बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण बढ़ रहा है। यह यहाँ तक बढ़ा है कि भारत वर्तमान में दूसरे नम्बर का स्मार्टफोन निर्माता है। 2024-25 में भारत का सबसे बड़ा निर्यात स्मार्टफोन ही थे। हालाँकि, यह सब जानने के बावजूद हमारे मन में कुछ प्रश्न उठे।

इन प्रश्नों का जवाब लेने के लिए हम नेहरू प्लेस पहुँचे। नेहरू प्लेस पहुँच कर सबसे पहले हमने बात की रेहड़ी-पटरी पर इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वालों से। हमारा उनसे प्रश्न था कि क्या नेहरू प्लेस या भारतीय बाजार में केवल चीनी इलेक्ट्रॉनिक सामान ही मिलता है।

इसका जवाब था, नहीं! अधिकतर दुकानदारों ने बताया कि अब ग्राहक चीन का नाम सुनकर प्रॉडक्ट को रिजेक्ट कर देते हैं। उन्होंने बताया, “हमारी दुकानों पर अब 80% माल मेड इन इंडिया ही है।” कैमरा बंद होते ही दुकानदारों ने यह भी कहा कि देश के इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में पीछे रहने की वजह कॉन्ग्रेस के नेताओं का भ्रष्टाचार ही है।

नेहरू प्लेस के अधिकतर दुकानदार राहुल गाँधी के सब माल चाइनीज है वाले दावे को खोखला बताते हैं। उनका कहना था कि मनमोहन सिंह के समय में अधिकतर प्रोडक्ट मेड इन चाइना होते थे लेकिन 2014-15 के बाद मार्केट बदला है। उन्होंने बताया कि अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक सामान अब भारत में ही बने हुए हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि ग्राहक भी भारत में ही बना हुआ सामान पसंद करते हैं। उनका कहना था कि चीनी सामान पर कोई गारंटी नहीं होती, इसलिए भी भारतीय ग्राहक उससे बचते हैं। दुकानदारों का कहना था कि भारतीय सामानों पर एक साल तक की गारंटी मिल रही है।

दुकानदारों के मेड इन इंडिया वाले दावों का समर्थन आँकड़े भी करते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2014 में देश में 2 मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट थीं जबकि आज 300 से अधिक यूनिट काम कर रही हैं। मोबाइल फोन एक्सपोर्ट में भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्लेयर बन चुका है।

भारत ने 2024-25 में ₹2 लाख करोड़ से अधिक स्मार्टफोन निर्यात किए हैं। इस निर्माण गतिविधि को असेम्बलिंग बताने वाले राहुल गाँधी को यह भी जानना चाहिए कि भारत में बनने वाले स्मार्टफोन में अब 25% तक पार्ट भारतीय ही उपयोग हो रहे हैं।

राहुल गाँधी को यह पता होना चाहिए कि दशकों से इस काम जुटा हुआ चीन भी अभी तक 35%-40% के स्तर पर पहुँच पाया है। भारत ने 20% की उपलब्धि 5 ही वर्षों में हासिल कर ली है। सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं, सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी 1.52 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट के साथ 5 नए प्रोजेक्ट लॉन्च हुए हैं।

2026 तक भारत का इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्शन 300 बिलियन डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। बाजार पर भी इसका सीधा असर नजर आता है। दुकानदार कहते हैं कि अब भारत में किसी भी कंपनी को व्यापार करना है तो अपनी फैक्ट्री यहाँ लगानी ही होगी, सैमसंग जैसी कम्पनियाँ भारत में अपनी बड़ी यूनिट्स लगा रही हैं।

राहुल गाँधी के चीन वाले प्रोपेगेंडा का सच जानने के बाद हम उस दुकान पर गए, जहाँ से राहुल गाँधी ने यह वीडियो शूट किया था। हमने उसी मैकेनिक शिवम से बात की, जिससे राहुल गाँधी ने बात की थी। हमने पूछा कि क्या वो राहुल गाँधी की काम में जाति देखने के तर्क से सहमत है? शिवम का जवाब चौंकाने वाला था।

शिवम ने कहा, “जाति की बात करने वाला व्यक्ति कोई अनपढ़ ही होगा। काम में जाति देखने के बजाए योग्यता देखना चाहिए। उसने कहा कि मेरा पूरा नाम शिवम माहेश्वरी है और मैं बनिया जाति से आता हूँ। हमारी दुकान वाल्मीकि समाज से लेकर तमाम जातीय और सामाजिक वर्गों से आने वाले लोग काम करते हैं।”

शिवम ने आगे बताया, “हम हमेशा योग्यता को ही प्राथमिकता देते हैं। साथ ही असेम्बलड इन इंडिया वाली बात को काटते हुए कहा कि 2014-15 से पहले तो हम असेम्बल भी नहीं करते थे, अब असेम्बल तो कर रहे हैं कम से कम।”

उस दुकान में शिवम के सहयोगी ने बताया कि जब कोई जाति नहीं होगी तभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाएगा। अन्य दुकानदार भी बताते हैं कि 2014 के बाद चीनी प्रोडक्टस मार्केट में कम हुए हैं। लोगों का विश्वास भी मेड इन इंडिया पर ज्यादा है।

शिवम और अन्य दुकानदारों की बातें सीधे तौर पर यह साबित करती हैं कि राहुल गाँधी ने अपने राजनैतिक लाभ के लिए उनका इस्तेमाल किया था। संभव है कि, राहुल गाँधी की सोशल मीडिया टीम ने अपने नैरेटिव के हिसाब से क्लिप्स को काटकर प्रचारित किया हो। लेकिन Opindia की ग्राउंड रिपोर्ट में सारा सच निकलकर सामने आ गया।

हिंदू राजाओं ने जिस ‘सत्र भूमि’ को धार्मिक प्रचार के लिए दिया दान… वहाँ कभी मिलता है गोमांस, कभी सुनाई पड़ती है अजान: अब असम में इन जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराएगी हिमंता सरकार, जानें पूरा मामला

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने असम में सत्र भूमि को अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने की बड़ी पहल की है। पूर्वोत्तर राज्य असम में कई वैष्णव मठ हैं जिन्हें सत्र कहा जाता है। इनकी स्थापना असमिया संत श्रीमंत शंकरदेव और उनके शिष्यों माधवदेव, हरिदेव और दामोदरदेव ने 15वीं और 16वीं शताब्दी में की थी।

सत्र एक आध्यात्मिक संस्था है और राज्य में पारंपरिक साहित्य, संगीत और अन्य सांस्कृतिक का केंद्र रहा है। आम तौर पर सत्र भूमि में एक बड़ा प्रार्थना कक्ष, स्नान कक्ष, शयनगृह और अतिथि गृह होते हैं।

असम के सत्र ( फाइल फोटो, साभार- पर्यटन विभाग, असम सरकार )

राज्यभर में करीब 900 सुत्रा है जो चारों ओर फैले हुए हैं। ये लोग सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। इनमें औनियाती, कमलाबारी, दखिनपत, गरमुर, बेंगनाती, समागुरी और नतुन कमलाबारी शामिल हैं।

सैकड़ों वर्षों से राजाओं और स्थानीय हिंदुओं ने सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रचार के लिए सत्रों को भूमि दान में देते आ रहे हैं। इन जमीनों को ‘सत्र भूमि’ के रूप में जाना जाता है। इसका उल्लेख आधिकारिक भूमि अभिलेखों में भी है।

इस सत्र भूमि का इस्तेमाल भिक्षुओं की मदद और धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में होता था। असमिया पहचान को बनाए रखने में सत्र आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सत्र भूमि पर कब्जा

पूरे असम में सत्र भूमि के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए बने आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि असम के 11 जिलों में 303 सत्रों की 15,288.52 बीघा (1,898 हेक्टेयर से अधिक) भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है।

सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि बोंगाईगांव, माजुली, डिब्रूगढ़, नागांव, बाजाली, कामरूप, लखीमपुर और धुबरी जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है। राजधानी दिसपुर के आकार से दोगुने क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया गया है।

सरमा ने ट्वीट किया, “हमारी राजधानी दिसपुर से दोगुना बड़ा क्षेत्र! हां, असम में सत्र भूमि पर अतिक्रमण का यह परिणाम है। सत्रों पर अतिक्रमण का विशाल पैमाना असम की संस्कृति और पहचान पर सीधा हमला है।”

जनसांख्यिकीय परिवर्तन, भू-माफिया की संलिप्तता और राजनीतिक संरक्षण जैसे कारकों ने इस खतरे को बढ़ाने में योगदान दिया है। उन्होंने अवैध अतिक्रमण से सख्ती से निपटने का प्रण लिया है।

असम सरकार ले रही है भूमि वापस

हाल के वर्षों में, असम में हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने सत्र भूमि को अवैध कब्जे से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
नवंबर 2021 में इसको लेकर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इसे ‘असम में सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और आकलन के लिए आयोग (CRAPSLA) कहा जाता है। आयोग में असम के तीन विधायक प्रदीप हजारिका, रूपक सरमा और मृणाल सैकिया शामिल थे।

एक साल बाद दिसंबर 2022 में, CRAPSLA ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने असम के 62 सत्रों का दौरा किया और अवैध अतिक्रमणों की जाँच की। आयोग का कार्यकाल आगे बढ़ाया गया ताकि अधिक प्रभावित सत्रों का दौरा किया जा सके।

9 जून 2023 को CRAPSLA ने अपनी अंतिम रिपोर्ट हेमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। आयोग ने 126 सत्रों का दौरा किया, अपना विस्तृत मूल्यांकन दिया और नीतिगत कार्रवाई के लिए सिफारिशें की।

असम के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह रिपोर्ट सत्र भूमि पर कब्जे की पूरी जानकारी देती है। सरकार निष्कर्षों की गहन जाँच करेगी और सिफारिशों पर कार्रवाई करेगी।” उन्होंने एक वर्ष के भीतर एक स्थायी सत्र आयोग के गठन की भी घोषणा की। आयोग के पास प्रशासनिक स्वायत्तता, न्यायिक अधिकार और राज्य में सत्रों की आर्थिक मदद के लिए वित्तीय अनुदान होगा।


सीएम सरमा ने कहा, “आयोग को संस्थागत बनाने के लिए सितंबर या फरवरी के विधान सत्र में एक कानून पेश किया जाएगा। यह सत्र संस्थानों की सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिए 25 साल का विजन तैयार करेगा।”

अतिक्रमण करने वालों पर होगा एक्शन

दिसंबर 2022 में CRAPSLA की अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद असम सरकार एक्शन में दिखी। सरकार ने नागाँव जिले में श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान के पास 1000 बीघा भूमि को अतिक्रमण से मुक्त करवाया।

असम सरकार ने फरवरी 2023 में गोपाल अता सत्र के पास 55 बीघा कब्जे वाली जमीन वापस ली। जुलाई 2024 में इसी तरह के अतिक्रमण हटाओ अभियान से सत्र को 34 बीघा भूमि वापस मिली।

अगस्त 2024 में हिमंता सरकार ने 250 साल से ज्यादा पुराने हेरिटेज संस्थानों के 5 किलोमीटर के दायरे में बाहरी लोगों को जमीन खरीदने पर रोक लगा दिया। इसके लिए ‘असम भूमि और राजस्व विनियमन (दूसरा संशोधन) विधेयक’ पारित किया। इसके अलावा सत्र को आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की।

असम सरकार ने अक्टूबर 2024 में सत्रों को भूमि दिए जाने और कानूनी रूप से कोई दिक्कत न हो, इसके लिए ‘मिशन बसुंधरा 3.0’ के तहत कई उपाय किए।

हेमंता विस्वा सरमा ने इस ओर इशारा किया कि मस्जिदों का निर्माण सत्र की जमीन पर हो रहा है साथ ही सत्र संस्कृति को नुकसान पहुँचाने के लिए बीफ खाया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “जब सत्र के पास गाय का मांस खाया जाता है और मस्जिद से अज़ान की आवाज सत्र के कार्यक्रमों को बाधित करती है।” उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियाँ सत्रों से 10 किलोमीटर दूर की जा सकती हैं।

भाजपा 2016 की शुरुआत में ही सत्र की भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाती रही है, जबकि कॉन्ग्रेस शासन ने इसे ‘सरकार की साजिश’ करार दिया है।

पिछले 9 वर्षों में, भाजपा सरकार (अब एक मिशन मोड में) सत्रों को उसकी भूमि वापस दिलाने के काम में लगी हुई है।