छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पिछले कुछ दशकों से धर्मांतरण के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे है। पैसे, शिक्षा और चिकित्सा जैसे लालच में पड़कर लोग मतांतरण जैसा कदम उठा रहे हैं और ईसाई मिशनरी इस हथियार का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी कर रहे हैं।
मिशनरियों के निशाने पर गरीब, कम पढ़े लिखे लोग खासकर जनजातीय लोग हैं, जिसकी वजह से इन राज्यों के जनजातीय इलाकों में ईसाई परिवारों की संख्या में काफी उछाल आया है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, इन राज्यों के धार्मिक अनुपात में काफी अंतर देखने को मिला है।
छत्तीसगढ़ के गाँवों में 75% तक ईसाई कनवर्जन
रिपोर्ट के अनुसार, जशपुर जिले के सितोंगा गाँव में पहले सिर्फ एक चर्च था, लेकिन पिछले 20 सालों में करीब 200 परिवारों ने ईसाई मजहब अपना लिया है। गाँव में कुल 400 परिवार रहते हैं, जिनमें से करीब 270 अब ईसाई बन चुके हैं। कई घरों पर ईसाई प्रतीकों वाले झंडे लहरा रहे हैं।
इसके अलावा बस्तर और नारायणपुर जिले के कई गाँवों में ईसाई परिवारों की बढ़ती संख्या की वजह से मृतकों के दफन को लेकर विवाद हो रहा है। स्थानीय हिंदू संगठन ईसाई मजहब अपनाने वालों के शवों को गाँव के श्मशान घाट में दफनाने का विरोध कर रहे हैं, इसलिए चर्च के यार्ड में दफन किया जा रहा है।
पूर्व विधायक और जनजातीय नेता राजाराम तोड़ेम ने बताया कि बस्तर की कई समुदायों में 50% से ज्यादा लोग ईसाई बन चुके हैं। अंबिकापुर के बेहरापारा में 25 घर हैं और पिछले एक दशक में 19 परिवारों ने ईसाई मजहब अपना लिया है। हालाँकि छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने स्थानीय हिंदू संगठनों के विरोध के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।
एमपी में मिशनरियों ने पैसों और स्वास्थ्य को बनाया हथियार
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर और रायपुर जिलों में धर्म परिवर्तन के आरोप में करीब 10 एफआईआर दर्ज हुए हैं। लेकिन धर्म परिवर्तन के मामले सिर्फ इन जिलों तक सीमित नहीं हैं। लोगों को पैसे और मेडिकल सुविधाएँ देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दिया जाता है।
झाबुआ जिले के डुंगरा धन्ना गाँव में कई लोगों के नाम ईसाई हैं, लेकिन उनके उपनाम और पिता के नाम हिंदू हैं। मिसाल के तौर पर डुंगरा गाँव के थॉमस पहले सनातनी थे। उनके पिता का नाम जयराम सिंगारिया है। उन्होंने बताया कि वो कुछ साल पहले बीमार पड़ गए थे। मिशनरी का काम करने वाले लोगों ने उन्हें चर्च में प्रार्थना करने की सलाह दी थी, जिसे मानकर वो चर्च जाने लगे। ऐसे में ठीक होने के बाद उन्होंने ईसाइयत को अपना लिया।
जेवियर निनामा नाम का व्यक्ति ईसाइयों के मिशनरी स्कूल में काम करता है। हालाँकि निनामा का दावा है कि वो जनजातीय है। पर लोगों का कहना है कि कमाई के चक्कर में उसने ईसाईयत को अपना लिया। मौजूदा समय में डुंगरा धन्ना गाँव की करीब 25% आबादी ईसाई मजहब को अपना चुकी है। अलीराजपुर, धार, रतलाम और छतरपुर में भी हालात कुछ ऐसे ही है।
राजस्थान में भी पैसों के दम पर मतांतरण
राजस्थान के कई भी कई जिलों धर्म परिवर्तन का ऐसा ही पैटर्न देखने को मिल रहा है। मिशनरी संगठन लोगों को पैसे दे रहे हैं और बाइबल के संदेशों के साथ हैंडपंप जैसी सुविधाएँ दे रहे हैं।
गंगानगर जिले के तीन केडी गाँव की सुमन नाम की एक महिला ने बताया कि उसे दिल्ली में बपतिस्मा के लिए ले जाया गया और कई बार 2000 से 5000 रुपये की आर्थिक मदद दी गई।
बांसवाड़ा जिले के गडोली, जंबुडी, शिवपुरा और उदयपुर जिले के जगन्नाथपुरा, मकड़ा देव और ओबरा गाँवों में भी ऐसे ही मामले देखने को मिले हैं। 8 साल पहले इन छह गाँवों में कुल 800 परिवारों में से सिर्फ 70 ईसाई थे।
अब 900 परिवारों में से करीब 450 ईसाई बन चुके हैं, यानी 41% की बढ़ोतरी। इन आँकड़ों से ये साफ है कि लोगों के धर्मांतरण 8 सालों में तेजी से हुआ है। इन गाँवों में चर्चों की संख्या भी अब चार गुना बढ़ गई है।
हालाँकि, पास्टर वेलफेयर एसोसिएशन के राज्य अध्यक्ष कुलविंदर सिंह ने धर्म परिवर्तन की बात से इनकार किया। उन्होंने कहा कि जिन्हें चर्च कहा जा रहा है, वे असल में ‘प्रेयर हॉल’ हैं।
बांसवाड़ा जिले के कई गाँवों में जीसस क्राइस्ट संगठन ने बाइबल के संदेशों के साथ हैंडपंप और पत्थर की शिलाएँ लगवाई हैं। बडी सेंड गाँव में एक शिला पर लिखा है, “जो इस पानी को पीएगा, उसे फिर प्यास लगेगी, लेकिन जो उस पानी (जीसस के कुएँ) से पीएगा, उसे हमेशा के लिए प्यास नहीं लगेगी।”
रिपोर्ट में हाई कोर्ट के वकील हिमांशु निगम के हवाले से बताया गया है कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश-1950 के अनुसार, अनुसूचित जनजाति का दर्जा सिर्फ हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के लोगों को मिलता है।
अगर कोई व्यक्ति कानूनी तौर पर या शपथ पत्र के जरिए अपना धर्म नहीं बदलता, तो उसका धार्मिक दर्जा कोर्ट तय करता है। लेकिन अगर कोई अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी जनजातीय रीति-रिवाजों का पालन करता है, तो उसका जनजातीय दर्जा बना रह सकता है।
साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज की एक छात्रा के साथ गैंगरेप के आरोप में टीएमसी की छात्र इकाई टीएमसीपी के नेता मोनोजीत मिश्रा को गुरुवार (26 जून 2025) को गिरफ्तार किया गया। मुख्य आरोपित मोनोजीत मिश्रा साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में ही पढ़ा है, जहाँ उसने छात्रा को जेनरेटर रूम में खींच लिया और उसका रेप किया। इस दौरान कॉलेज के 2 अन्य छात्र बाहर उसकी रखवाली कर रहे थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोनोजीत मिश्रा साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में TMCC का पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं (यह जानकारी उनके फेसबुक प्रोफाइल से सामने आई है)। फिलहाल वो साउथ कोलकाता जिले में टीएमसीपी के महासचिव के पद पर कार्यरत है।
गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर उनके राजनीतिक संपर्क और प्रभावशाली कनेक्शन्स को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या इतने बड़े स्तर का मामला दबाया जाएगा या पीड़िता को न्याय मिलेगा। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जाँच जारी है।
मोनोजीत मिश्रा अभिषेक बनर्जी के साथ
बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार मोनोजीत मिश्रा को कई बड़े टीएमसी नेताओं के साथ देखा गया है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में वह टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ भी नजर आ रहा हैं, जो पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे हैं।
मोनोजीत मिश्रा को टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ ही ममता बनर्जी की भाभी कजरी बनर्जी के साथ भी देखा गया है। कजरी बनर्जी कोलकाता नगर निगम के वार्ड नंबर 73 की पार्षद हैं।
कजरी बनर्जी के साथ मोनोजीत मिश्रा
एक तस्वीर में मोनोजीत मिश्रा पश्चिम बंगाल की सीएम के विश्वासपात्र फिरहाद हकीम से मिलते नजर आए।
मोनोजीत मिश्रा के साथ चंद्रिमा भट्टाचार्य को भी देखा गया है, जो पश्चिम बंगाल सरकार में शहरी विकास और नगरपालिका मामलों की राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। इसके अलावा वह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की राज्य मंत्री भी हैं।
चंद्रिमा भट्टाचार्य के साथ मोनोजीत मिश्रा
बलात्कार के आरोपित की कोलकाता दक्षिण की टीएमसी सांसद माला रॉय के भी तस्वीरे हैं।
मोनोजीत मिश्रा, माला रॉय के साथ
तृणमूल युवा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष (दक्षिण कोलकाता जिला) सार्थक बनर्जी के साथ भी देखा गया।
बलात्कार के आरोपित को तृणमूल कॉन्ग्रेस छात्र परिषद (टीएमसीपी) के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष त्रिनंकुर भट्टाचार्य के साथ भी देखा गया।
त्रिनानकुर भट्टाचार्य के साथ मोनोजीत मिश्रा
कई तस्वीरों में मोनोजीत मिश्रा टीएमसीपी कार्यालय में कार्यक्रम आयोजित करते और सत्तारूढ़ टीएमसी पार्टी के कार्यक्रमों में भाग लेते हुए भी नजर आया।
बलात्कार के आरोपित की फेसबुक प्रोफाइल के अनुसार, उसकी उम्र करीब 30 साल है और उसके 6.2K फॉलोअर्स हैं। मोनोजीत मिश्रा खुद को एक ‘क्रिमिनल लॉयर’ बताता है जो अलीपुर कोर्ट में प्रैक्टिस करता है।
क्या है पूरा मामला?
मोनोजीत मिश्रा ने अपने दो साथियों, जैब अहमद (19) और प्रमित मुखर्जी (30) के साथ मिलकर एक महिला के साथ बलात्कार किया। यह घटना बुधवार (25 जून 2025) को शाम 7:30 बजे से रात 10:50 बजे के बीच साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज के अंदर हुई। महिला की शिकायत पर पुलिस ने गुरुवार (26 जून 2025) को मोनोजीत मिश्रा और जैब अहमद को गिरफ्तार कर लिया, जबकि प्रमित मुखर्जी को शुक्रवार (27 जून 2025) को पकड़ा गया।
#WATCH | Kolkata | Police have sealed the area where three men allegedly gangraped a South Calcutta Law College student on the college premises
The three accused, Manojit Mishra, Zaib Ahmed and Pramit Mukhopadhyay, who the Police have named, have been remanded to police custody… pic.twitter.com/3g4KDti5UH
पुलिस ने आरोपितों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं। तीनों आरोपितों को शुक्रवार (27 मार्च 2025) को अलीपुर कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे 4 दिन की हिरासत में भेज दिया गया। इस बीच पीड़िता की मेडिकल जाँच कराई गई है और उसका बयान भी दर्ज किया गया है।
बहरहाल, गैंगरेप की जानकारी सामने आने के बाद जब बीजेपी ने आरोपित के टीएमसी से संबंधों के आरोप लगाए तो इन आरोपों को खारिज कर दिया गया। लेकिन जब सोशल मीडिया पर फैली आरोपित मोनोजीत मिश्रा की तस्वीरें उसी की प्रोफाइल से सामने आने लगी, तब टीएमसी के पास भी बचाव का कोई रास्ता नहीं रह गया। ऐसे में उसकी गिरफ्तारी हो गई। हालाँकि गैंगरेप के आरोपित मोनोजीत मिश्रा जैसे ‘पॉवरफुल’ स्टूडेंट लीडर, जो खुद एक ‘क्रिमिनल लॉयर’ यानी वकील है, उसके खिलाफ मामला कहाँ तक पहुँचता है, ये देखने वाली बात होगी।
नाम – प्रशांत किशोर, दावा – किसी को भी जिता सकते हैं चुनाव, काम – बिहारियों को सपने दिखाना, खुद का सपना – बिहार का मुख्यमंत्री बनना। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुँचाने का दावा, तो कभी दुनिया के सबसे बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार होने का दंभ। बीते कुछ सालों से बिहार की गलियों की खाक छान रहे हैं, जनता को बरगला रहे हैं, कभी छात्र आंदोलन में शामिल होने लगते हैं, तो कभी किसी राजनीतिक पार्टी का ठेका ले लेते हैं.. ताकि बिहार की राजनीति में खुद को चर्चा में बनाए रख सकें।
हालाँकि उनकी पार्टी उप-चुनाव में हिस्सा ले चुकी है। अब वो दावा करते हैं कि पैसा बहुत कमा लिया, अब बिहार को विकसित बनाएँगे। वैसे, इस दावे की हकीकत हर कोई जानना चाहता है। इसके लिए वो तमाम मंचों पर भी जाते हैं। कुछ नया दावा कर देते हैं और अपनी दुकानदारी बनाए रखते हैं। इस बीच, प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने ANI नाम की न्यूज एजेंसी से 1 घंटे से भी ज्यादा समय तक बातचीत की, जिसमें उन्होंने बिहार के विकास और लोगों के काम धंधों से लेकर पलायन तक पर अपने विचार रखे हैं। कई मुद्दों में से कुछ ‘अराजनीतिक मुद्दों’ पर उनकी बातों पर हम भी चर्चा करने वाले हैं।
इस इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने तमाम बातें की हैं। जिसमें ‘पलायन’, ‘बिहार का विकास’ और ‘विदेशों का विकास’ जैसी बातें आम जनता के काम की है। उन्हें जानना सबके लिए जरूरी हैं। दरअसल, प्रशांत किशोर ने कहा, “बिहार को बड़े उद्योग धंधों की जरूरत नहीं है और न ही यहाँ बड़े इंडस्ट्रियल पार्क बन सकते हैं। हम चारों ओर से जमीन से घिरे हुए हैं और हमारे यहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक है। हमें अपनी शिक्षा और सेवा क्षेत्रों को बढ़ावा देना होगा, हमें बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करनी होगी और हमें लोगों के हाथों में अधिक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि लोग अपने दम पर कुछ कर सकें। बिहार में लोग मेहनती और परिश्रमी हैं,”
उन्होंने ये भी तर्क दिया कि उद्योग केवल तटीय राज्यों में ही स्थापित किए जा सकते हैं।
अब बात ये समझ में नहीं आती कि प्रशांत किशोर को एक बड़े उद्योग के असर का अंदाज है या नहीं। एक बड़ा उद्योग लगने का असर सिर्फ वहाँ काम करने वाले लोगों के जीवन में ही बदलाव नहीं लाता, बल्कि उस पर निर्भर कई छोटे उद्योग खुद ब खुद विकसित हो जाते हैं क्योंकि ये उस उद्योग की जरूरत को पूरी करता है। इतना ही नहीं एक व्यक्ति की नौकरी पूरे परिवार का संबल होता है।
खुद बिहार में जब 1907 में जमशेदपुर में टाटा स्टील का कारखाना लगाया गया था तो वहाँ खनिज तो मौजूद था लेकिन बाकी जरूरतों को टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी ने अपने हिसाब से पैदा किया। इस पर निर्भर सैकड़ों उद्योग आज भी आदित्यपुर जैसे इलाकों में चल रहे हैं। इन उद्योगों ने हजारों लोगों को रोजगार दिया है। इतना ही नहीं इसकी वजह से बने बाजार और रिहायशी इलाके अपने आप रोजगार पैदा कर रहे हैं। तो कहने का मतलब ये है कि जब आप माहौल देंगे और नई कंपनियाँ लगेंगी तो रोजगार सृजन होगा।
कभी विकसित राज्यों में से एक था बिहार
झारखंड को छोड़ भी दें तो बिहार में भी कई कंपनियाँ थी। भागलपुर की सिल्क इंडस्ट्री, मुजफ्फरपुर, दरभंगा की चीनी मिलें, बक्सर और बिहटा की पेपर मिलें, बरौनी का ऑयल रिफाइनरी, खाद कारखाना बिहार की शान हुआ करती थी।
एक रिपोर्ट के मुताबिक 1951 में पूरे देश मे 6982 रजिस्टर्ड फैक्ट्री थी। इनमें से 455 अकेले बिहार में थी यानी कुल रजिस्टर्ड फैक्ट्री का 6.51% अकेले बिहार में थी। आजादी के बाद पूरे देश में 56 चीनी मिलें थी। इनमें से 33 बिहार में थी जो रोजगार का 29.50% उपलब्ध कराता था। चीनी मिलों में सकरी,रैयाम, लोहट काफी मशहूर थे। इसी तरह मधुबनी का मलमल, किशनगंज का कागज उद्योग, दरभंगा के हाथी दाँत के सामान प्रसिद्ध थे। खगड़िया, किशनगंज, मुंगेर, पूर्णिया भी कई कृषि आधारित उद्योगों के लिए मशहूर थे। कुछ के नाम आप भी जान लीजिए…
गया और पूर्णिया का लाख उद्योग
पटना, मुंगेर, शाहाबाद का तेल मिल
डालमिया नगर, समस्तीपुर, दरभंगा, पटना, बरौनी का कागज उद्योग
हाजीपुर का प्लाईवुड
गया, दीघा, मोकामा का चमड़ा उद्योग
डालमिया नगर, खेलारी का सीमेंट उद्योग
मुंगेर, बक्सर, गया, आरा का तंबाकू उद्योग
मुंगेर, पटना, मानपुर, पंचरूखी का शराब उद्योग
पटना का शीशा उद्योग
मुंगेर का बंदूक उद्योग मशहूर था, लेकिन अब ये पुरानी बात हो गयी है।
इनमें से अधिकतर उद्योग धंधे 1985-2005 के बीच गलत नीतियों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। यही वजह है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय प्रतिशत 2012 में वही था जो 60 साल पहले 1951 में था।
इन कंपनियों में नई जान फूँकने के लिए मोदी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। राज्य सरकार चाहे तो इनमें गति ला सकती है। अगर प्रशांत किशोर इन उद्योग धँधों के विकास के लिए कोई प्लान बताएँ, तो बिहार का भला हो सकता है।
पलायन रोकने के लिए PK के पास नहीं कोई रणनीति
इस इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार से लोग पलायन कर रहे हैं क्योंकि लोगों के पास रोजगार नहीं है। साथ ही ये भी कहते हैं कि बड़े उद्योगों से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी। उन्होंने यह नहीं बताया कि अगर उद्योगों से नहीं तो नौकरियाँ कहाँ से आएँगी?
इंटरव्यू के दौरान अजीब तर्क देते हुए उन्होंने कहा, “दिल्ली में निर्माण कार्य करने वाले अधिकांश श्रमिक बिहार से हैं। जब बिहार के पास पैसा होगा, तो इन लोगों को दिल्ली आने की जरूरत नहीं होगी, वे बिहार में ही बिल्डिंग फिटिंग, प्लास्टरिंग और अन्य काम कर लेंगे।” बिहार की दुर्गति की शायद यही वजह है कि नेता उद्योग धंधों की महत्ता को कमतर आँकते रहे हैं।
दरअसल बिहार में कॉन्ग्रेस और आरजेडी के जमाने में उद्योग धंधों की उपेक्षा की गई। ऐसे कानून बनाए गए जिससे बिहार के खनिज संसाधन राज्य के बाहर इस्तेमाल होने लगे। रेल भाड़ा सामान्यीकरण कानून ऐसा ही कानून था। स्वतंत्रता के बाद केंद्र सरकार का बनाया यह कानून 90 के दशक में खत्म हुआ था।
इस कानून के तहत धनबाद से राँची कोयला की ढुलाई में जितना रेल किराया लगता था, उतने ही भाड़े में यह धनबाद से मद्रास (अब चेन्नई) भी पहुँच जाता था। इसने उद्योगपतियों को समुद्र किनारे कोयला आधारित उद्योग लगाने को प्रोत्साहित किया। इसका असर बिहार पर अर्थव्यवस्था पर दिखा।
कॉन्ग्रेस के बाद 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव का राज रहा. इस वक्त उद्योगों के बजाए सोशल जस्टिस पर जोर रहा। जातीय हिंसा का लोग शिकार हुए। उद्योग धंधे एक के बाद एक ढहते चले गए। जातिवादी राजनीति, गुंडागर्दी ने बिहार से लोगों को पलायन करने के लिए मजबूर किया। किसानी से घर चलाना मुश्किल हुआ तो लोग दूसरे राज्यों की ओर चल पड़े और अब ये हाल है कि छोटे-छोटे किसान अब दूसरे राज्यों में मजदूर बन गए हैं।
बिहार में रोजगार सृजन के लिए औद्योगीकरण की आवश्यकता नहीं है, इस तर्क के समर्थन में उन्होने छोटे-छोटे विकसित देशों न्यूजीलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और अन्य देशों का उदाहरण दिया। उन्होंने दावा किया, “इन देशों से किसी भी देश में कोई बड़ा उद्योग धंधा नहीं है और फिर भी ये देश अत्यधिक विकसित हैं।”
वैसे प्रशांत किशोर दुनिया के कई देशों में घूमने का दावा करते हैं। वो कहते हैं कि भारत में सोशल मीडिया क्रांति ही वो लेकर आए। खुद को पॉलिटिकल ‘ठेकेदारी’ का भी अगुवा बताते हैं। लेकिन इस इंटरव्यू में वो इतना बढ़-चढ़कर बोलने लग जाते हैं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि रुकना कहाँ है। दरअसल, जिन देशों का नाम प्रशांत किशोर ने लिया, सिर्फ माहौल बनाने के लिए, उन देशों के बारे में सही जानकारी इन्हें है ही नहीं।
ऐसा इसलिए, क्योंकि बाल्टिक देशों (नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड) और न्यूजीलैंड जैसे जिन देशों का नाम वो ले रहे हैं, पहली बात वो बेहद विकसित देश हैं। विकास एक दिन की प्रक्रिया नहीं होती। हालाँकि ये सभी देश महज 200-300 सालों में आगे बढ़े हैं। अब अगर इन देशों की अर्थव्यवस्था, उद्योग धंधों की बात करें तो प्रशांत किशोर का दावा है कि इन देशों के पास कोई इंडस्ट्री नहीं है। जबकि उनका दावा बिल्कुल बकवास है।
दरअसल, इन देशों में ऐसे उद्योग हैं जो उनके सकल घरेलू उत्पाद में काफी योगदान देते हैं। फिनलैंड की बात करें तो यहाँ उद्योग दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है। सर्विस सेक्टर के बाद इसका नंबर आता है। यहाँ मेटल इंडस्ट्री, कैमिकल इंडस्ट्री, फॉरेस्ट इंडस्ट्री, फूड अल्कोहल और तंबाकू इंडस्ट्री के अलावा टैक्सटाइल और लेदर इंडस्ट्री भी है।
प्रशांत किशोर ने दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय वाले देश नॉर्वे का भी नाम लिया। नॉर्वे में तेल और गैस पर आधारित पेट्रोलियम उद्योग अर्थव्यवस्था में काफी अहम योगदान देते हैं। इस देश में विनिर्माण उद्योग भी काफी आगे है। सर्विस सेक्टर यहाँ तीसरे स्थान पर है। मछली पकड़ना, खेती-बाड़ी और हाइड्रो पावर सेक्टर भी यहाँ काफी विकसित है।
न्यूजीलैंड में कृषि, डेयरी, माँस और ऊन उद्योग काफी विकसित हैं। इसके अलावा एल्यूमिनियम जैसे धातु आधारित उद्योग, लकड़ी और पेपर आधारित उद्योग, कैमिकल आधारित उद्योग भी काफी हैं। इसके अलावा खनन और सेवा उद्योग जैसे स्वास्थ्य सेवा, वित्त और आईटी शामिल हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर का सिर्फ उद्योग धंधों के बिना इन देशों के विकसित होने का दावा करना महज फिजूल की बात है, क्योंकि वो ये नहीं बताते कि इन देशों का विकास कैसे हुआ। सबसे अहम बात, ये देश उपनिवेशीकरण के दौर में आगे बढ़े-जिसकी चर्चा फिर कभी।
प्रशांत किशोर के पास बिहार को आगे ले जाने का कोई रोडमैप नहीं
वैसे, प्रशांत किशोर ने बिहार में जॉब यानी नौकरी पैदा करने की जरूरत पर भी बात की। उन्होंने कहा, “जब लोगों को शिक्षा के साथ-साथ संसाधन और काम करने के लिए अनुकूल माहौल मिलेगा, तो बिहार से पलायन रुक जाएगा। इंडस्ट्री से पलायन नहीं रुकता है। पलायन रोकना है तो लोगों के लिए जॉब जेनरेट करनी होगी। “
चलिए, ये बात तो है कि प्रशांत किशोर बिहार में नौकरी पैदा करने की जरूरत को मानते हैं, लेकिन ये होगा कैसे? बस, इसी सवाल का जवाब उनके पास नहीं मिलता। प्रशांत किशोर आरजेडी, कॉन्ग्रेस, जेडीयू और बीजेपी को भला- बुरा कह रहे हैं। पीएम मोदी से लेकर लालू यादव, तेजस्वी यादव, राहुल गाँधी सबका नाम ले रहे हैं और उनकी कमियाँ गिना रहे। राज्य में क्या है, क्या नहीं? सबकी बात करते हैं लेकिन विकास का विजन गायब है। दूसरे नेताओं की तरह शब्दों को चासनी में डाल कर बस जनता को बरगलाते नजर आ रहे हैं। ऐसे में जनता प्रशांत किशोर की बात से कितना ‘कन्विंस’ हो पाएगी, ये तो समय ही बताएगा।
‘आप किसी सोते हुए व्यक्ति को जगा सकते हैं, लेकिन जो जागते हुए सोने का नाटक कर रहा हो, उसे नहीं जगा सकते’ यह कहावत मौजूदा भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर बिल्कुल सटीक बैठती है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पिछली हार के बाद से कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार ईवीएम और वीवीपैट में गड़बड़ी के आरोप लगा रही है। विशेष रूप से राहुल गाँधी चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठा रहे हैं।
कॉन्ग्रेस का आरोप है कि शाम 6 बजे के बाद डाले गए लगभग 76 लाख वोटों की वैधता संदिग्ध है और उनका इशारा साफ है कि चुनाव आयोग ने बीजेपी गठबंधन को अनुचित लाभ पहुँचाया।
चुनाव आयोग ने 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अनियमितताओं के आरोपों को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गाँधी को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। इसके जवाब में कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुरुवार (26 जून 2025) को एक आधिकारिक पत्र भेजा।
पत्र में कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग के सामने दो प्रमुख माँग रखी। इसमें महाराष्ट्र की मतदाता सूची की मशीन से पढ़े जाने वाली डिजिटल कॉपी और महाराष्ट्र और हरियाणा में मतदान दिवस के वीडियो फुटेज शामिल था। कॉन्ग्रेस ने अनुरोध किया कि यह डेटा उन्हें पत्र की तारीख से एक सप्ताह के भीतर ही उपलब्ध कराया जाए।
पार्टी ने कहा कि यह कोई नया अनुरोध नहीं है, बल्कि लंबे समय से किया जा रहा है, जिसे चुनाव आयोग के लिए पूरा करना कठिन नहीं होना चाहिए। कॉन्ग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें जैसे ही ये जानकारियाँ प्राप्त होगी, वे चुनाव आयोग से मिलने को तैयार हैं और उस बैठक में अपने डेटा विश्लेषण के निष्कर्ष भी पेश करेंगे।
Congress writes to the Election Commission in response to ECI's letter to LoP Lok Sabha Rahul Gandhi, offering to meet and discuss the issues about the Maharashtra 2024 Vidhan Sabha election that he and the Congress party raised.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने 288 में से 235 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की थी। इससे कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना (यूबीटी) के गठबंधन- महाविकास अघाड़ी (एमवीए) को बड़ा झटका लगा।
चुनाव के नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस लगातार चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग से महाराष्ट्र समेत सभी राज्यों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए एक साथ डिजिटल और मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूची प्रकाशित करने की माँग की। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को ‘सच बोलकर’ अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखना चाहिए।
राहुल गाँधी ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्वाचन क्षेत्र में सिर्फ पाँच महीनों में मतदाता सूची में 8 प्रतिशत की अचानक बढ़ोतरी हुई, जिसे उन्होंने ‘वोट चोरी’ करार दिया।
उन्होंने एक्स पर लिखा कि कुछ मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की संख्या में 20 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) ने अज्ञात लोगों द्वारा वोट डालने की शिकायत की है और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हजारों वोटर्स ऐसे पाए गए जिनके पते ही सत्यापित नहीं थे।
In Maharashtra CM’s own constituency, the voter list grew by 8% in just 5 months.
Some booths saw a 20-50% surge.
BLOs reported unknown individuals casting votes.
Media uncovered thousands of voters with no verified address.
राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “और चुनाव आयोग? चुप्पी या फिर मिलीभगत। ये गड़बड़ियाँ अलग-थलग नहीं हैं, यह साफ तौर पर वोट चोरी है और जब गड़बड़ियों को छिपाया जाता है तो वह खुद एक कबूलनामा बन जाता है।” उन्होंने चुनाव आयोग से मशीन से तत्काल पढ़ी जा सकने वाली डिजिटल मतदाता सूची और सीसीटीवी फुटेज जारी करने की माँग की है।
कॉन्ग्रेस पार्टी न्यूजलॉन्ड्री की हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर चुनाव में बड़े स्तर पर धांधली के आरोप लगा रही है। राहुल गाँधी ने इस रिपोर्ट का हवाला देकर दावा किया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्वाचन क्षेत्र नागपुर पश्चिम में महज पाँच महीनों में 29,219 नए मतदाता जोड़े गए। रिपोर्ट के अनुसार, यह आँकड़ा प्रतिदिन औसतन 162 नए मतदाताओं का है, जो कुल मिलाकर 8.25 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि नागपुर पश्चिम के 378 बूथों में से 263 बूथों पर मतदाताओं की संख्या में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई। इनमें से 26 बूथों पर 20 प्रतिशत से ज्यादा और 4 बूथों पर 40 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई।
इन दावों के आधार पर कॉन्ग्रेस चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रही है और इसे ‘वोट चोरी’ और ‘साजिश’ का हिस्सा बता रही है, जबकि अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग इन गड़बड़ियों पर चुप्पी साधे हुए है। दूसरी ओर आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भरोसा जताया है।
राहुल गाँधी ने हाल ही में चुनाव आयोग पर हमला करते हुए जो एक्स पोस्ट लिखा था, उसमें न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट का हवाला दिया गया था
न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के आधार पर राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए आरोपों का मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट रूप से खंडन किया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में सिर्फ नागपुर पश्चिम ही नहीं, बल्कि 25 से ज्यादा ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जहाँ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में 8% से ज्यादा की वृद्धि हुई है और इनमें से कई सीटों पर कॉन्ग्रेस ने जीत हासिल की है।
फडणवीस ने राहुल गाँधी को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “राहुल गाँधी जी, मैं समझता हूँ कि महाराष्ट्र में मिली करारी हार का दर्द दिन-ब-दिन बढ़ रहा है, लेकिन आप कब तक बिना तथ्यों के हवा में तीर चलाते रहेंगे?” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नागपुर पश्चिम से सटे दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में 7% यानी 27,065 मतदाता बढ़े, और वहाँ से कॉन्ग्रेस के विकास ठाकरे जीते।
इसी तरह, उत्तर नागपुर में 7% (29,348) मतदाता बढ़े और वहाँ भी कॉन्ग्रेस के नितिन राउत विजयी रहे। पुणे जिले के वडगाँव शेरी में 10% (50,911) मतदाता बढ़े और वहाँ शरद पवार गुट के बापूसाहेब पठारे ने जीत दर्ज की। मालाड पश्चिम में 11% (38,625) और मुंब्रा में 9% (46,041) मतदाता बढ़े, जहाँ कॉन्ग्रेस के असलम शेख और शरद पवार गुट के जितेंद्र आव्हाड ने जीत हासिल की।
फडणवीस ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गाँधी को कम से कम ट्वीट करने से पहले अपनी ही पार्टी के नेताओं से बात कर लेनी चाहिए थी। इससे कॉन्ग्रेस के अंदर की संवादहीनता इतनी साफ तौर पर उजागर न होती।
झूठ बोले कौवा काटे काले कौवे से डरियो…
राहुल गांधी, माना की महाराष्ट्र की करारी हार की आपकी पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. लेकिन कब तक हवा में तीर चलाते रहोगे? वैसे आप की जानकारी के लिए, महाराष्ट्र में ऐसे 25 से अधिक चुनाव क्षेत्र है जहाँ 8% से अधिक मतदाता लोकसभा और… https://t.co/YtpuKNeUNE
झूठ, चिल्लाहट, माँगें: कॉन्ग्रेस का तरीका या लोकतंत्र खतरे में?
राहुल गाँधी ने पहले भी चुनाव आयोग की पारदर्शिता और ईमानदारी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह आरोप लगाया कि आयोग सबूत नष्ट कर रहा है, जिसमें 45 दिनों की सीसीटीवी फुटेज भी शामिल है।
राहुल गाँधी ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, “वोटर लिस्ट? मशीन-पठनीय प्रारूप नहीं मिलेगा। सीसीटीवी फुटेज? कानून बदलकर उसे छिपा दिया गया। चुनाव की फोटो और वीडियो? अब 1 साल नहीं, सिर्फ 45 दिनों में नष्ट कर दी जाएँगी। जिससे जवाब चाहिए था, वही सबूत नष्ट कर रहा है। यह साफ है, मैच फिक्स है। और फिक्स चुनाव लोकतंत्र के लिए जहर है।”
राहुल गाँधी ने माँग की कि मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक की जाए। हालाँकि चुनाव आयोग ने इस माँग को खारिज करते हुए कहा कि मतदान केंद्रों की वेबकास्टिंग फुटेज सार्वजनिक करना मतदाताओं की गोपनीयता और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की माँगें दिखने में तो लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद उल्टा है। आयोग के अनुसार, राहुल गाँधी जैसे नेता चुनाव आयोग पर दबाव बनाकर फुटेज जारी करवाना चाहते हैं ताकि मतदाताओं और गैर-मतदाताओं की पहचान की जा सके।
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा कि अगर किसी पार्टी को किसी बूथ पर कम वोट मिले हों, तो वो सीसीटीवी फुटेज से यह पता लगा सकती है कि किसने वोट डाला और किसने नहीं। इससे मतदाताओं की पहचान उजागर हो सकती है और उन्हें डराया-धमकाया जा सकता है।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सीसीटीवी फुटेज को सिर्फ 45 दिनों तक इसलिए रखा जाता है क्योंकि यही चुनाव याचिका दाखिल करने की कानूनी अवधि होती है। यह फुटेज सिर्फ आंतरिक प्रशासनिक जरूरतों के लिए होती है। यदि किसी ने 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दाखिल की हो, तो फुटेज सहेजा जाता है और कोर्ट के आदेश पर उपलब्ध कराया जा सकता है।
चुनाव आयोग ने कहा कि 45 दिनों से अधिक समय तक यह फुटेज रखने से इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है, जैसे झूठी सूचनाएँ फैलाना या राजनीतिक साजिश रचना। इसलिए सुरक्षा, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अखंडता बनाए रखने के लिए यह नीति अपनाई गई है।
कॉन्ग्रेस नेता ने शिरडी में 7,000 फर्जी वोटर का दावा किया, झूठ पकड़ा गया
इस साल फरवरी में संसद में बोलते हुए राहुल गाँधी ने एक और गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ पाँच महीनों में महाराष्ट्र के शिरडी निर्वाचन क्षेत्र की एक ही इमारत से 7,000 फर्जी मतदाता पंजीकृत किए गए थे। उनका कहना था कि एक सामान्य पते का उपयोग कर वोटर लिस्ट में गलत तरीके से नाम जोड़े गए।
हालाँकि बाद में जाँच से पता चला कि राहुल गाँधी का यह दावा काफी हद तक भ्रामक था। असल में यह संख्या 7,000 नहीं, करीब 3,000 थी और वह भी किसी एक इमारत से नहीं। ये मतदाता शिरडी सीट के तहत आने वाले लोनी शहर के छात्रावासों में रहने वाले छात्र थे। इन छात्रों ने अपने कॉलेज या छात्रावास का पता मतदाता पंजीकरण फॉर्म में दिया था, जो पूरी तरह से वैध है।
इस मामले में और जानकारी देते हुए अहमदनगर के जिला कलेक्टर सिद्धराम सलीमथ ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब किसी राजनीतिक दल ने शिकायत की, तो उन्होंने चुनाव आयोग को स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि लोनी क्षेत्र में कई शैक्षणिक संस्थान हैं और नए मतदाता उन्हीं संस्थानों के छात्र हैं, जो छात्रावासों में रहते हैं।
कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति 18 वर्ष से अधिक आयु का है और उसके पास वैध दस्तावेज हैं, तो वह यह चुन सकता है कि उसे कहाँ से वोट डालना है। छात्र चूंकि छात्रावास में रह रहे थे, इसलिए उनके कॉलेज के प्रवेश पत्रों को निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि यह सुनिश्चित करने के लिए गहराई से जाँच की गई कि कोई भी मतदाता दो बार पंजीकृत न हो, लेकिन ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं मिली। इस तरह राहुल गाँधी का यह दावा भी तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और भ्रामक साबित हुआ।
राहुल गाँधी ने अमेरिका यात्रा में महाराष्ट्र चुनाव के 65 लाख फर्जी वोटों पर झूठ बोला
अप्रैल 2025 में अमेरिका की दो दिवसीय यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को जीत दिलाने के लिए चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई। उन्होंने दावा किया, ‘सिस्टम में कुछ बहुत गड़बड़ है।’
राहुल गाँधी ने उदाहरण देते हुए कहा कि शाम 5:30 बजे तक चुनाव आयोग ने जो वोटिंग डेटा दिया, उसके बाद सिर्फ दो घंटों यानी 5:30 से 7:30 बजे के बीच में अचानक 65 लाख नए वोट जुड़ गए। उन्होंने इस आँकड़े को असंभव बताया और कहा, “हमारे लिए यह बिल्कुल साफ है कि चुनाव आयोग ने समझौता किया है। महाराष्ट्र में जितने वयस्क हैं, उससे ज्यादा लोगों ने मतदान किया।”
उन्होंने आगे कहा कि एक व्यक्ति को वोट डालने में औसतन 3 मिनट लगते हैं और अगर इतने कम समय में इतने सारे वोट पड़े होते, तो दोपहर 2 बजे तक भी मतदान केंद्रों पर लंबी लाइनें होनी चाहिए थीं लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
राहुल गाँधी ने यह भी आरोप लगाया कि जब उनकी पार्टी ने चुनाव की वीडियोग्राफी की माँग की, तो न केवल चुनाव आयोग ने इस माँग को खारिज कर दिया, बल्कि बाद में कानून भी ऐसा बना दिया गया जिससे अब पार्टियाँ वीडियोग्राफी की माँग भी नहीं कर सकती।
इंडियन एक्सप्रेस ने राहुल गाँधी को महाराष्ट्र और लोकसभा चुनावों पर झूठ फैलाने का मंच दिया
राहुल गाँधी ने जून 2025 में द इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार को ‘औद्योगिक पैमाने’ पर धांधली का नतीजा बताने की कोशिश की। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया, चुनाव आयोग और मतदाता पंजीकरण से लेकर मतदान प्रतिशत तक लगभग हर पहलू पर सवाल उठाए।
गाँधी ने न सिर्फ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर शक जताया, बल्कि मतदाता पंजीकरण में हुए इजाफे को भी संदिग्ध बताया। उन्होंने दावा किया कि मतदान में अचानक हुई बढ़ोतरी असामान्य थी और बिना किसी ठोस आधार के लोकसभा और विधानसभा चुनाव नतीजों को एक साथ जोड़कर दोनों में कॉन्ग्रेस के खराब प्रदर्शन को धांधली से जोड़ा।
उनकी पूरी कोशिश यही दिखी कि वे हार की जिम्मेदारी ‘सिस्टम’ पर डालें। या तो ये एक रणनीतिक राजनीति का हिस्सा हो सकता है या पिर अपनी पार्टी की विफलताओं से ध्यान भटकाने का बेहतर तरीका भी कहा जा सकता है।
हालाँकि, ऑपइंडिया ने राहुल गाँधी के इस लेख और उनके दावों का तथ्यों के जरिए खंडन किया। रिपोर्ट में बताया गया कि उन्होंने कई भ्रामक और गलत आँकड़े पेश किए और चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो सवाल उठाए। असल में वे वास्तविकता से मेल नहीं खाते।
चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र चुनाव में मतदान प्रतिशत के कॉन्ग्रेस के झूठ दावों को किया खारिज
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों 2024 के बाद, भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने कॉन्ग्रेस पार्टी को एक विस्तृत पत्र भेजकर उनके लगाए गए आरोपों को बिंदुवार तरीके से खारिज किया और तथ्यों के साथ उनकी गलतियों को उजागर किया।
कॉन्ग्रेस का दावा था कि मतदान के आखिरी घंटों में अचानक वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, जिसे उन्होंने गड़बड़ी बताया। इस पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदान के आखिरी घंटों में वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी होना एक सामान्य प्रक्रिया है।
आयोग ने यह भी बताया कि वोटिंग खत्म होने के समय फॉर्म 17C वहीं मौजूद उम्मीदवारों के अधिकृत एजेंटों को दे दिया जाता है। इसमें हर मतदान केंद्र का सटीक वोटिंग आँकड़ा होता है। ऐसे में मतदान प्रतिशत में हेरफेर करना संभव ही नहीं है।
चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस के इस आरोप को भी खारिज कर दिया कि मतदाताओं की संख्या को मतदाता सूची में मनमाने तरीके से जोड़ा या हटाया गया।
इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस ने नवंबर 2024 में भी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की एक संदिग्ध रिपोर्ट के आधार पर भी चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव के दौरान 5,04,313 अतिरिक्त वोट डाले गए। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) ने इस रिपोर्ट को झूठा बताया। उन्होंने बताया कि यह संख्या दरअसल 5,38,225 डाक मतपत्रों की थी, जो चुनाव आयोग की ओर से पहले से जारी आँकड़ों का हिस्सा थे। रिपोर्ट में इन्हें गलत तरीके से ‘अतिरिक्त वोट’ के रूप में दिखाया गया था।
इसके बाद अब कॉन्ग्रेस न्यूजलॉन्ड्री की एक और इसी तरह की रिपोर्ट का सहारा ले रही है, जिसमें तथ्य न के बराबर और प्रचार 100 प्रतिशत तक शामिल है। इन सभी मामलों में देखा गया है कि राहुल गाँधी बार-बार चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, लेकिन वे कभी अपने आरोपों को ठोस तथ्यों से साबित नहीं कर पाते। चुनाव आयोग ने हर बार उनके दावों को तथ्यों के आधार पर खारिज किया है। इसके बावजूद राहुल गाँधी इन आरोपों को दोहराते रहते हैं।
दरअसल, ऐसा लगता है कि राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का उद्देश्य पारदर्शिता या जवाबदेही लाना नहीं है, बल्कि बार-बार मिल रही चुनावी हार का दोष किसी और पर डालकर खुद को बचाना है। यही वजह है कि उनके ये आरोप अब एक पुराने, घिसे-पिटे बहाने बन चुके हैं, जो अब भारत में चुनाव हारने वाली हर पार्टी के लिए एक ‘स्टैंडर्ड स्क्रिप्ट’ की तरह इस्तेमाल होने लगे हैं।
कॉन्ग्रेस ने महाराष्ट्र मतदाता सूची में अनियमितताओं का दावा किया, चुनाव आयोग ने बेनकाब किया झूठ
इस साल अप्रैल में चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र की मतदाता सूची में लगे अनियमितताओं के आरोपों को साफ तौर पर खारिज किया। आयोग ने बताया कि जनवरी 2025 में प्रकाशित मतदाता सूची के विशेष सारांश संशोधन (6-7 जनवरी को) के दौरान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22, 23 और 24 के तहत बहुत ही कम आपत्तियाँ या सुधार के अनुरोध मिले।
चुनाव आयोग के अनुसार, 9.7 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से केवल 89 अपील जिला चुनाव कार्यालयो में और सिर्फ 1 अपील मुख्य निर्वाचन कार्यालय में दर्ज की गई।
आयोग ने इस बेहद कम संख्या को आधार बनाकर कहा कि यह आँकड़ा संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए बड़े-बड़े दावों को गलत साबित करता है। यानी, जो अनियमितता और धांधली के आरोप लगाए जा रहे थे, उनकी कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई। आयोग ने जोर देकर कहा कि यह संख्या दर्शाती है कि मतदाता सूची में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2024 महाराष्ट्र चुनाव की याचिका खारिज कर कॉन्ग्रेस को दिया झटका
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (25 जून 2025) को नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में कथित मतदान अनियमितताओं के आधार पर चुनाव के नतीजे रद्द करने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया।
यह याचिका मुंबई निवासी चेतन चंद्रकांत अहिरे ने दायर की थी। इसकी पैरवी वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता प्रकाश अंबेडकर ने की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शाम 6 बजे की समय सीमा के बाद लगभग 76 लाख वोट डाले गए। इनकी वैधता पर सवाल थे। याचिका में चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और देर से मतदान में असामान्य वृद्धि का दावा किया गया था।
हालाँकि, जस्टिस जीएस कुलकर्णी और आरिफ डॉक्टर की पीठ ने इस दावे में कोई ठोस आधार नहीं पाया। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों समेत पिछले सभी चुनावोंमें भी शाम 6 बजे के बाद वोटिंग के इसी तरह के रुझान देखे गए थे और उन्हें कभी चुनौती नहीं दी गई। अदालत ने साफ कहा कि जब तक शाम 6 बजे के बाद डाले गए वोटों को किसी उम्मीदवार की जीत से जोड़ने वाले स्पष्ट सबूत नहीं मिलते, तब तक ये आरोप निराधार हैं।
याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने सुनवाई में काफी सममय लगने के बाद भी जुर्माना नहीं लगाया। चुनाव आयोग के वकील ने याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र और विजयी उम्मीदवारों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए, जिनसे कोर्ट ने सहमति जताई।
कोर्ट ने कहा, “यह याचिका पूरी तरह से आधारहीन है। इसे खारिज न करने का कोई आधार नहीं मिल रहा। हमने याचिका की सुनवाई में पूरा दिन लगा दिया, इसलिए यह निश्चित रूप से जुर्माने के साथ खारिज करने योग्य है, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे।”
दरअसल, यह पूरा मामला न्यायिक समय की बर्बादी साबित हुआ, क्योंकि चुनाव आयोग ने कई बार इन आरोपों को खारिज किया था और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भरोसा जताया था। 1 लाख से ज्यादा बूथ अधिकारियों, 288 रिटर्निंग अधिकारियों और कॉन्ग्रेस के 28,421 एजेंटों समेत 1 लाख से अधिक बूथ एजेंटों ने चुनावों की निगरानी की।
फिर भी कॉन्ग्रेस और उसके प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गाँधी डिजिटल मतदाता सूची, सीसीटीवी फुटेज जैसी माँगे कर रहे हैं और नियमित चुनावी प्रक्रियाओं को भ्रामक तरीके से अनियमितताओं के रूप में पेश कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनकी पार्टी चुनाव जीतने में असफल रही।
कॉन्ग्रेस क्यों चुप है? क्या वह बिना तथ्य और षड्यंत्र की कहानियों पर भरोसा कर रही है?
ईवीएम हैकिंग और वीवीपैट छेड़छाड़ के कॉन्ग्रेस के आरोपों ने पार्टी को केवल आलोचना और शर्मिंदगी ही दी हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस, महायुति गठबंधन के हाथों करारी हार के बाद, अपने कमजोर नेतृत्व और चुनावी रणनीति की असफलताओं को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग और मतदाता संख्या पर गंभीर सवाल उठाकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।
कोर्ट और मतदाताओं ने कॉन्ग्रेस के ईवीएम और वीवीपैट दावों को निराधार ठहराया है तो पार्टी अब ‘अतिरिक्त मतदाताओं’ की साजिश वाली थ्योरी पर जोर दे रही है। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी और ठीक थी।
मतदाता यह देख रहे हैं कि कॉन्ग्रेस जीतने पर चुनाव आयोग के परिणाम स्वीकार करती है, लेकिन हारने पर लगातार षड्यंत्र के सिद्धांत गढ़ती है। अपनी थोड़ी-बहुत जीत को ‘व्यवस्था से लड़ाई’ बताती है और हार को ‘मजबूरी’ बताकर बचाव करती है।
अपने झूठे दावों को बार बार दोहरा कर कॉन्ग्रेस असल में अपने वोटर्स से ही दूर हो रही है। मतदाता पार्टी की ओर से ह रही इस बयानबाजी को ‘खट्टे अंगूर’ के तौर पर देखते हैं। वोटर लिस्ट और सीसीटीवी फुटेज की माँग पर जोर देकर कॉन्ग्रेस गॉबेल्सियन रणनीति अपनाती है, झूठ को बार-बार दोहराना ताकि वह सच लगने लगे।
अगर कॉन्ग्रेस का उद्देश्य सचमुच जवाब पाना होता, तो वह चुनाव आयोग से संवाद करती और अपने चुनावी असफलताओं पर आत्मनिरीक्षण करती। लेकिन इसके बजाय, वह चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाकर अपनी विफलताओं से किनारा करती नजर आती है। इससे पार्टी को नुकसान होता है, क्योंकि अंततः उसके समर्थक उसके आरोपों पर विश्वास करते हैं।
यह रिपोर्ट मूलतः अंग्रेजी की श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करे।
शिवसेना नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत एक नया विवाद खड़ा करने की कोशिश में हैं। तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी जब शिवसेना (यूबीटी) को सफलता नहीं मिली, तो अब मामले को मराठी वर्सेज हिंदी की तरफ मोड़ने की कोशिश हो रही है। इसी कड़ी में शुक्रवार (27 जून 2025) को संजय राउत ने एक ट्वीट किया जिसमें उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की तस्वीर है।
संजय की पोस्ट में लिखा है, “जय महाराष्ट्र! ‘There will be a single and united march against compulsory Hindi in Maharashtra schools. Thackeray is the brand!'”
इस पोस्ट को देखकर लगता है कि यह सिर्फ भाषा के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए उठाया गया कदम है।
राज और उद्धव का मिलन: बहाना या सचमुच का मराठी अस्मिता का सवाल?
संजय राउत का यह ट्वीट दिखाता है कि उद्धव ठाकरे (शिवसेना-UBT) और राज ठाकरे (एमएनएस) एक साथ आ रहे हैं। दोनों ठाकरे भाई, जो पहले एक-दूसरे से दूर थे, अब मराठी अस्मिता और हिंदी के खिलाफ एक मोर्चे पर खड़े हैं। राउत का कहना है कि 5 जुलाई 2025 को महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने के खिलाफ एक संयुक्त मार्च निकाला जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सचमुच मराठी भाषा की रक्षा के लिए है या फिर अपनी सियासी जमीन बचाने की कोशिश?
पिछले कुछ सालों में एमएनएस और शिवसेना दोनों की लोकप्रियता में कमी आई है, खासकर 2024 के विधानसभा चुनाव में एमएनएस का सूपड़ा साफ हो गया था। ऐसे में यह मिलन राजनीतिक फायदा उठाने का एक तरीका लगता है।
संजय राउत और उद्धव सेना झूठे दावों के साथ फिर से भाषा का झगड़ा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें वे कह रहे हैं कि ‘हिंदी को अनिवार्य किया जा रहा है’। आइए जानें कि ऐसा क्यों नहीं है और नई शिक्षा नीति (NEP) क्या कहती है।
सच यह है कि हिंदी को कहीं भी जबरदस्ती लागू नहीं किया जा रहा। नई शिक्षा नीति 2020 में तीन भाषाओं का फॉर्मूला है, जिसमें मराठी, अंग्रेजी और एक तीसरी भाषा शामिल है। यह तीसरी भाषा छात्र अपनी मर्जी से चुन सकते हैं – हिंदी, संस्कृत, उर्दू या कोई और। स्कूलों में हिंदी इसलिए पढ़ाई जाती है क्योंकि यह पसंद की जाती है, शिक्षक आसानी से मिल जाते हैं, और बच्चों को यह भाषा पहले से थोड़ी-बहुत आती है। लेकिन अगर कोई स्कूल या माँ-बाप चाहें, तो दूसरी भाषा भी चुन सकते हैं।
नई शिक्षा नीति (NEP) कहती है कि शुरुआती कक्षा (कम से कम 5वीं तक और अगर हो सके तो 8वीं तक) में पढ़ाई मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होनी चाहिए। इसका मतलब साफ है – कोई भी भाषा थोपी नहीं जा रही।
महाराष्ट्र सरकार ने 2025 तक 80% शिक्षकों को नई शिक्षा पद्धति के लिए प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया कि हिंदी पढ़ना जरूरी है। अगर कोई स्कूल हिंदी नहीं पढ़ाना चाहता, तो वह दूसरी भाषा चुन सकता है। फिर भी संजय राउत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना-UBT इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है, ताकि लोगों की भावनाएँ भड़कें और उन्हें सियासी फायदा मिले।
राजनीतिक फायदा और भावनाओं का खेल
संजय राउत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना-UBT इस मुद्दे को बढ़ाकर मराठी लोगों की भावनाओं को भड़का रही है। पिछले कुछ सालों में मुंबई में मराठी वोट बैंक कमजोर हुआ है और बीएमसी जैसे अहम पदों से शिवसेना का कब्जा छूट गया है। ऐसे में हिंदी विरोध का नारा फिर से उनकी सियासी जमीन तैयार कर सकता है। वहीं राज ठाकरे, जिनकी पार्टी चुनावों में पिछड़ गई, वो भी इस मौके को भुनाना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि मराठी अस्मिता का मुद्दा उठाकर वे फिर से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाएँ। लेकिन सच यह है कि यह सब राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है, न कि मराठी भाषा की चिंता से।
राज ठाकरे और हिंदी-उत्तर भारतीय विरोध का इतिहास
राज ठाकरे की राजनीति का इतिहास हिंदी और उत्तर भारतीयों के खिलाफ रुख से भरा पड़ा है। 2006 में जब उन्होंने शिवसेना से अलग होकर एमएनएस बनाई, तो उनका नारा था ‘मराठी मानुस’। उन्होंने मुंबई में उत्तर भारतीयों और बिहारियों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन भी कराए, जिसकी वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 2008 में एक ट्रेन हादसे के बाद हिंदी मीडिया की कवरेज को लेकर हिंसा भड़की थी।
राज का कहना था कि बाहरी लोग महाराष्ट्र की नौकरियाँ छीन रहे हैं। बाद में 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी का झंडा भगवा कर हिंदुत्व की ओर रुख किया, लेकिन मराठी अस्मिता का मुद्दा हमेशा उनके एजेंडे में रहा। अब हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य करने का विरोध करके वे फिर से पुरानी रणनीति पर लौट रहे हैं।
बता दें कि पिछले दशकों में ठाकरे परिवार ने कई बार भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर सियासत की है। उदाहरण के लिए, मुंबई में 30 साल तक सत्ता में रहते हुए शिवसेना ने मराठी माणस के लिए कुछ खास नहीं किया। चॉल में रहने वाले मराठी लोगों को 2 घंटे पानी मिलता था, जबकि बाहरी लोगों के टावरों में 24 घंटे सुविधा थी। अब जब सत्ता हाथ से निकल रही है, तो उन्हें मराठी याद आ रही है। यह दोहरा चेहरा साफ दिखता है।
हिंदी को अनिवार्य करने का दावा गलत है। NEP 2020 में छात्रों और अभिभावकों को भाषा चुनने की आजादी है। संजय राउत का यह पोस्ट और ठाकरे भाइयों का मिलन महज एक राजनीतिक स्टंट है, जो मराठी अस्मिता के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश है। हमें इस खेल को समझना होगा और भावनाओं में बहकर फैसले लेने से बचना होगा। महाराष्ट्र की तरक्की तभी होगी जब हम एकता और शिक्षा पर ध्यान दें, न कि भाषा के नाम पर लड़ाई लड़ें।
असम के सिराजुली में डॉन बॉस्को स्कूल में एक हिंदू बच्ची को परेशान करने के बाद अब बच्ची के परिवार को केस वापस लेने के लिए डराया-धमकाया जा रहा है। दरअसल स्कूल में केजी में पढ़ने वाले छात्र के माथे पर लगा तिलक जबरन हटा दिया था और क्लास टीचर ने उसे पिटाई करने की धमकी दी थी।
ऑपइंडिया ने 6 वर्षीय बच्ची के चाचा अवध किशोर वर्मा से बात की। उन्होंने बताया कि स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता मिल्खास टोपो ने फोन पर परिवार को धमकी दी है। फोन कॉल की एक ऑडियो क्लिप भी उन्होंने साझा की। मिल्खास टोपो खुद को स्कूल की प्रबंधन समिति का सदस्य होने का दावा करता है।
अवध ने बताया कि यह फोन कॉल उनके भाई विनय कुमार वर्मा को बुधवार (25 जून) को आया था। गौरतलब है कि 24 जून को परिवार ने आरोपित शिक्षिका रिनी रोज और स्कूल प्रशासन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
आरोपित कॉन्ग्रेस नेता ने माना है कि उसे स्कूल प्रबंधन ने परिवार से बात करने को कहा था। विनय ने बच्ची के साथ हुए वारदात की जानकारी दी। मिल्खास टोपो ने शिक्षिका और स्कूल प्रशासन के इस कुकृत्य को ‘छोटी घटना’ बताने की कोशिश की।
ऑडियो क्लिप में उसे यह कहते हुए सुना गया, “यह एक बड़ा स्कूल है। प्रिंसिपल वहाँ होने वाली हर बात पर नजर नहीं रख सकता। क्या वह व्यक्तिगत रूप से हर किसी की जानकारी रख सकता है?”
मिल्खास ने पूरी घटना को ‘महत्वहीन’ बताते हुए कहा, “यह एक ईसाई स्कूल है। आपको एडमिशन के समय एक डायरी दी गई थी। उसमें लिखे दिशा-निर्देशों को पढ़ें।” कॉन्ग्रेस नेता ने विनय के ऑफिस का पता भी लिया और कहा कि AASU (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) के कार्यकर्ता वहाँ आकर बात करेंगे।
मिल्खास ने पीड़ित परिवार को निर्देश दिया कि वे अपनी जरूरी धार्मिक मान्यताओं को अपने घर तक ही रखें और उन्हें स्कूल में न लाएँ। बातचीत के दौरान मिल्खास ने विनय को अपशब्द भी कहे।
इसके बाद स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता ने पीड़ित के दादा बलराम वर्मा से बात की और स्कूल का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “अगर बच्ची का तिलक मिटा भी दिया गया तो इसमें बड़ी बात क्या है?”
मिल्खास टोपो ने बलराम वर्मा से स्कूल की ‘डायरी गाइडलाइन पढ़ने’ की सलाह दी और अपनी बात कहते हुए पीड़ित के दादा के साथ दुर्व्यवहार किया। अवध किशोर वर्मा के अनुसार, मिल्खास ढेकियाजुलु में कॉन्ग्रेस पार्टी का उपाध्यक्ष है।
पुलिस में शिकायत के बारे में पूछे जाने पर पीड़ित के चाचा ने बताया कि स्कूल प्रशासन मंगलवार (24 जून) को थाने गया और लिखित में वादा किया है कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।
अवध किशोर वर्मा द्वारा दर्ज कराई गई पुलिस शिकायत का स्क्रीनशॉट
हालाँकि मिल्खास टोपो के धमकाने का सिलसिला 24 जून को भी जारी रहा। बुधवार (25 जून) को डॉन बॉस्को स्कूल के प्रिंसिपल पीड़ित के घर आए और आश्वासन दिया कि ऐसा अब नहीं होगा। उन्होंने पीड़ित के परिजनों से पुलिस में दर्ज शिकायत वापस लेने का भी अनुरोध किया।
अवध कुमार वर्मा ने ऑपइंडिया को बताया कि परिजनों ने बच्ची को स्कूल से निकालने का मन बना लिया है।
क्या था मामला?
सोमवार (23 जून) को डॉन बॉस्को स्कूल की शिक्षिका रिनी रोज ने KG में पढ़ने वाली छात्रा के माथे पर लगा तिलक जबरन मिटा दिया था।
इस घटना से बच्ची सदमे में है। जब पीड़िता ने अपने माता-पिता को इस बारे में बताया तो वे स्कूल पहुँचे और प्रिंसिपल (पिता) से शिकायत की। उन्हें आश्वासन दिया गया कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।
बच्ची के साथ अगले दिन यानी मंगलवार (24 जून) को भी ऐसा ही व्यवहार किया गया। हिंदू संस्कृति और धर्म दोनों के लिए पवित्र तिलक को जबरन उसके माथे से हटा दिया गया।
इसके अलावा, किंडरगार्टन की छात्रा को धमकी दी गई कि अगर वह फिर से माथे पर तिलक लगाकर स्कूल आई तो उसकी पिटाई होगी। क्लास टीचर रिनी रोज की धमकी से बच्ची काफी परेशान हो गई। बच्ची के चाचा अवध किशोर वर्मा ने ढेकियाजुलु पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई। ऑपइंडिया के पास शिकायत की एक प्रति एक्सक्लूसिव तौर पर मौजूद है।
वर्मा ने अपनी शिकायत में कहा, “इस कृत्य ने न केवल हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, बल्कि यह हमारे संविधान द्वारा दिए गए धर्म का पालन करने के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। यह धार्मिक भेदभाव का मामला है और हिंदू धर्म का जानबूझकर अपमान किया गया है।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं जाँच में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हूँ और कोई भी अतिरिक्त जानकारी या सबूत देने के लिए तैयार हूँ। इस गंभीर मामले पर ध्यान देने के लिए आपका धन्यवाद।”
अवध किशोर वर्मा ने ऑपइंडिया को खास बातचीत में बताया कि कुछ दिन पहले ही कैथोलिक स्कूल के अधिकारियों ने एक हिंदू बंगाली छात्र की तुलसी माला जबरन उतार दी थी।
ओडिसा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुक्रवार (27 जून 2025) को शुरू हो चुकी है। इसे लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई आयोजन किए जाते हैं। इस वर्ष रथयात्रा के 148वें वर्ष पर गुजरात के अहमदाबाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्री जगन्नाथ मंदिर पहुँचकर मंगला आरती की।
गृह मंत्री के साथ इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल भी साथ दिखे। उन्होंने पूजा- अर्चना करे बाद रथ खींचने की रस्म निभाई। इसे लेकर अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की।
उन्होंने लिखा कि जगन्नाथ रथ यात्रा के पावन अवसर पर अहमदाबाद में मंगला आरती में शामिल होना अपने आप में एक दिव्य और अलौकिक अनुभव है।
रथयात्रा के पावन अवसर पर श्री जगन्नाथ मंदिर, अहमदाबाद की मंगला आरती में शामिल होना अपने आप में दिव्य और अलौकिक अनुभव होता है। आज महाप्रभु की मंगला आरती में शामिल होकर दर्शन-पूजन किया। महाप्रभु सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें। pic.twitter.com/T3XDWbjQt1
गृहमंत्री ने आगे लिखा, “महाप्रभु जगन्नाथ जी मंगला आरती में शामिल होकर दर्शन-पूजन किया। महाप्रभु सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।”
12 दिन तक चलेगी रथयात्रा
27 जून 2025 से शुरू होकर ये रथयात्रा 8 जुलाई 2025 तक चलेगी। भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों को खींच कर गुंडिचा मंदिर तक लेकर आया जाता है। यहाँ वे एक सप्ताह तक निवास करते हैं। उसके बाद उन्हें वापस जगन्नाथ मंदिर ले जाया जाता है।
रथयात्रा के अवसर पर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिलता है। दुनियाभर से लोग इस रथयात्रा को देखने पुरी आते हैं। सभी भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए लालायित दिखते हैं। इस बार की जगन्नाथ यात्रा को लेकर सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पुरी हो या अहमदाबाद, तक हर जगह पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
पुरी में रथयात्रा को मद्देनजर रखकर लगभग 10,000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। इनमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की आठ कंपनियाँ भी शामिल हैं। इसके अलावा ट्रैफिक व्यवस्था भी दुरुस्त रखी गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो।
ओडिशा के पूरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर से हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि के दिन यह भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा में तीन रथ होते हैं। भगवान जगन्नाथ यानी श्रीकृष्ण के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।
इसके अलावा इस यात्रा में बलराम का भी रथ होता है। यह हरे और लाल रंग का होता है। इस रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, वहीं सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है। यह काले या नीले और लाल रंग का होता है। रथयात्रा में सबसे आगे बलराम का रथ होता है, वहीं बीच में सुभद्रा और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है।
जगन्नाथ यात्रा: एक प्राचीन परम्परा
पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की परंपरा बहुत पुरानी है। पुरी के पंडित और स्थानीय लोगों का मानना है कि सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण और भगवान बलराम ने रथ में बैठकर पूरे नगर की यात्रा की थी। तब से हर साल पुरी में रथयात्रा को आयोजन किया जाता है।
यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मंदिर से चलकर करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित सालबेग की मजार पर आने के बाद रुक जाता है और कुछ देर यहाँ रुकने के बाद रथ फिर से आगे बढ़ता है। दरअसल सालबेग को भगवान जगन्नाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है।
सालबेग मुस्लिम परिवार से थे। एक बार वह पुरी आए जहाँ उन्होंने भगवान जगन्नाथ के भक्तों से उनकी महिमा सुनी तो उनके मन में भी भगवान के दर्शन की इच्छा हुई। लेकिन गैर-हिंदू होने के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से उन्हें रोक दिया गया।
इस घटना के बाद से सालबेग के मन में भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति और बढ़ गई। वो उसी क्षेत्र में रहकर दिन रात उनकी भक्ति करने लगे। कहा जाता है कि एक रात सालबेग ने सपने में भगवान जगन्नाथ के दर्शन पाए। भगवान ने उनसे कहा “मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिए मैं खुद तुम तक आऊँगा और तुम्हें दर्शन दूँगा।
इसके बाद आयोजित हुई रथयात्रा के दौरान जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ उस जगह पहुँचा जहाँ सालबेग ठहरे थे, वहीं अटक गया। हजारों लोगों की मशक्कत के बाद भी रथ आगे नहीं बढ़ा। अंत में भक्तों ने भगवान जगन्नाथ की फूलों की माला सालबेग तक पहुँचाई, जिसके बाद रथ निकल गया। तब से हर साल जगन्नाथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ को सालबेग की मजार पर रोका जाता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वे भारत के साथ एक ‘बहुत बड़ी ट्रेड डील’ करने जा रहे हैं। गुरुवार (26 जून 2025- स्थानीय समय के अनुसार) को ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ कार्यक्रम में भारत के लिए दरवाजे खोलने की बात कही है। ट्रंप का यह बयान चीन के साथ एक नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद सामने आया है।
व्हाइट हाउस में कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हर कोई चाहता है कि वे ट्रेड डील करे और इसका हिस्सा बने। हम हर देश के साथ डील नहीं करने जा रहे। ट्रंप ने कहा, “आपको याद है कुछ महीने पहले प्रेस ने कहा था कि क्या आपको सचमुच लगता है कि इसमें किसी को रुचि होगी? खैर, हमने कल चीन के साथ एक डील साइन की है।”
#WATCH | "…We just signed (trade deal) with China. We're not going to make deals with everybody… But we're having some great deals. We have one coming up, maybe with India, a very big one. We're going to open up India. In the China deal, we're starting to open up China.… pic.twitter.com/fJwmz1wK44
ट्रंप ने आगे कहा, “हम हमारे पास कुछ बेहतरीन डील्स हैं और हम उसे लेकर आ रहे हैं- शायद भारत के साथ। हम इंडिया के साथ एक बहुत बड़ी डील की शुरुआत करने जा रहे हैं। चीन के साथ ट्रेड डील करके हम चीन के लिए भी नए रास्ते खोलने जा रहे हैं।”
अमेरिका पहुँची भारतीय टीम
भारत से वाणिज्य मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में ट्रेड डील पर बातचीत के लिए एक टीम अमेरिका पहुँची है। अमेरिकी टीम से भारतीय समूह दो दिन से बातचीत कर रहा है। भारत और अमेरिका वर्तमान में एक अंतरिम व्यापार समझौते पर काम कर रहे हैं।
अमेरिका ने 2 अप्रैल 2025 को भारत से निर्यात होने वाले सामानों पर 26% अतिरिक्त टैक्स लगाने का ऐलान किया था, लेकिन इसे 90 दिनों के लिए टाल दिया गया। यह 90 दिन 9 जुलाई 2025 को समाप्त हो रहे हैं।
भारतीय समूह अमेरिकी टीम के साथ बातचीत कर 9 जुलाई से पहले इस समझौते पर अपनी डील सुनिश्चित करना चाहता है। अगर यह ट्रेड डील नहीं होती है तो भारत से निर्यात होने वाले सामानों पर अतिरिक्त टैक्स लागू हो जाएगा।
भारत-अमेरिका को होगा फायदा
भारतीय समूह के साथ अगर अमेरिका की यह ट्रेड दिल सकारात्मक रूप लेती है तो भारत और अमेरिका के बीच 2030 तक व्यापार 500 अरब डॉलर यानी लगभग 41 लाख 75,000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाएगा। इस समय यह 191 अरब डॉलर (15 लाख 94 हजार 961 करोड़ रुपए) है। इसकी वजह से भारत के लिए अमेरिकी कंपनियों में भी कई अवसर खुल सकते हैं।
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के मदुरै में थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर मौजूद सिकंदर बदहुशा अवुलिया दरगाह में पशु बलि की प्रथा और पहाड़ी का नाम बदलने की माँग वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले को सुनने वाली मद्रास हाई कोर्ट में जस्टिस जे. निशा बानु और जस्टिस एस. श्रीमती की बेंच ने पहाड़ी का नाम बदलने की माँग को एकमत से खारिज कर दिया।
हालाँकि पशु बलि के मुद्दे पर दोनों जजों की राय अलग-अलग रही, यानी उन्होंने इस पर एकराय नहीं दिखाई। इस थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर एक दरगाह, दो हिंदू मंदिर (अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर) और प्राचीन जैन गुफाएँ हैं, जिसके चलते यह मामला काफी चर्चा में रहा है।
पहाड़ी का नाम नहीं बदलेगा
जज जे. निशा बानु और जज एस. श्रीमती ने साफ-साफ कहा कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी का नाम बदलकर ‘सिकंदर हिल्स‘ करने की कोई जरूरत नहीं है। दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि पहाड़ी का मौजूदा नाम ही रहेगा।
पशु बलि पर दोनों जजों की राय अलग
मद्रास हाई कोर्ट में बुधवार (25 जून 2025) को आए फैसले में पशु बलि के मुद्दे पर दोनों जजों ने अलग-अलग तर्क दिए। जस्टिस जे. निशा बानु ने पशु बलि की प्रथा को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि दरगाह और मंदिर पहाड़ी पर अलग-अलग जगहों पर हैं, इसलिए एक समुदाय की धार्मिक प्रथाएँ दूसरे समुदाय के पवित्र स्थानों पर असर नहीं डालतीं।
जस्टिस बानु ने अपने फैसले में कहा कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी का मालिकाना हक अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर के पास है और इस बारे में कोई विवाद नहीं है। सिविल कोर्ट पहले ही मंदिर के हक को मान्यता दे चुके हैं।
जस्टिस बानु ने यह भी कहा कि पशु बलि की प्रथा न सिर्फ मुस्लिम समुदाय बल्कि हिंदू समुदाय में भी पुराने समय से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में 1950 का एक कानून था, जो पशु और पक्षी बलि पर रोक लगाता था, लेकिन इसे 2004 में तमिलनाडु एक्ट 20 के तहत हटा लिया गया। यानी अब तमिलनाडु में धार्मिक स्थानों पर पशु बलि की प्रथा पर कोई कानूनी रोक नहीं है। इसलिए जस्टिस बानु ने कहा कि दरगाह में पशु बलि की प्रथा को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह एक पुरानी धार्मिक परंपरा है।
दूसरी तरफ जस्टिस एस. श्रीमती ने पशु बलि के खिलाफ फैसला दिया। उनका कहना था कि सिकंदर दरगाह में कँधूरी पशु बलि की प्रथा पुराने समय से चली आ रही है, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि रीजनल डेवलपमेंट ऑफिसर (RDO) ने सही निष्कर्ष निकाला था कि इस प्रथा को साबित करने के लिए दोनों पक्षों को सिविल कोर्ट जाना चाहिए। जज श्रीमती ने अपने फैसले में कहा कि सिकंदर दरगाह में कँधूरी पशु बलि की प्रथा होने का कोई पक्का सबूत नहीं है। अगर दरगाह वाले इस प्रथा को सही साबित करना चाहते हैं, तो उन्हें सिविल कोर्ट में जाना होगा।
जस्टिस एस श्रीमती ने यह भी निर्देश दिया कि दरगाह को यह साबित करना होगा कि रमजान, बकरीद और अन्य इस्लामी त्योहारों के दौरान पशु बलि और प्रार्थना की प्रथा 1920 में दायर एक मुकदमे (O.S.No.4 of 1920) से पहले से चली आ रही थी। इसके लिए उन्हें सिविल कोर्ट का रास्ता अपनाना होगा।
कब से चल रहा ये विवाद?
यह विवाद पिछले साल 27 दिसंबर को शुरू हुआ, जब मलैयादीपट्टी के 53 साल के सैयद अबू दाहिर और उनके परिवार ने पशु बलि के लिए थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर जानवर ले जाने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें रोक लिया, जिसके बाद 20 मुस्लिमों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद जनवरी में मुस्लिम समुदाय ने पहाड़ी पर खुली पहुँच और पशु बलि को पुरानी परंपरा बताते हुए इसकी अनुमति माँगी। उन्होंने पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल्स’ नाम देना शुरू कर दिया।
इसी दौरान पुलिस ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) जैसे इस्लामी संगठनों को पहाड़ी पर पशु बलि (कुर्बानी) करने से रोक दिया। SDPI प्रतिबंधित आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) का राजनीतिक संगठन है। पुलिस ने मुस्लिम समुदाय को पका हुआ मांस दरगाह में ले जाकर खाने की इजाजत दी, लेकिन पशु बलि पर रोक लगा दी। ऐसा इसलिए क्योंकि इस पहाड़ी पर प्राचीन जैन गुफाएँ और भगवान मुरुगन का मंदिर भी है।
विवाद तब और बढ़ गया, जब कुछ अज्ञात लोगों ने पहाड़ी पर मौजूद प्राचीन जैन गुफाओं को हरे रंग से रंग दिया। इससे हिंदू समुदाय में भारी गुस्सा फैल गया। फरवरी में भारत हिंदू मुन्नानी जैसे कई हिंदू संगठनों ने थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर पशु बलि के खिलाफ प्रदर्शन किए। मुस्लिम समुदाय का दावा है कि पूरी पहाड़ी वक्फ बोर्ड की संपत्ति है और पशु बलि उनकी पुरानी परंपरा है। वे पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल्स’ कहकर बुला रहे हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है।
गौरतलब है कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी हिन्दुओं के लिए काफ़ी पवित्र है और भगवान मुरुगन के 6 निवास स्थलों में से एक है। हिन्दुओं का कहना है कि पहाड़ी पर कुर्बानी करना मतलब भगवन मुरुगन के शीर्ष पर कुर्बानी करना होगा क्योंकि उनका मंदिर पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। हिन्दुओं ने आरोप लगाया कि नाम बदलना और क़ुरबानी को लेकर झगड़े करना उन्हें मंदिर जाने से रोकने का प्रयास है। यहाँ पर सिर्फ प्राचीन मुरुगन मंदिर मंदिर ही नहीं, बल्कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की जैन गुफाएँ भी हैं। इस पर ब्राह्मी लिपी में अभिलेख भी हैं।
हालाँकि अब हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो पहाड़ी का नाम बदलेगा और न ही पशुओं की बलि दी जा सकेगी, क्योंकि ऐसा करने से पहले मुस्लिमों को O.S.No.4 of 1920 मामले को लेकर सिविल कोर्ट में जाना होगा।
“उसके बहुत ऊँचे-ऊँचे सपने थे। वो बस यही कहती रहती थी कि अच्छी जगह नौकरी करूँगी, घर को सपोर्ट करूँगी। तौफीक ईद पर सेवइयाँ लेकर आता था…” आँसुओं में डूबी नेहा की बड़ी बहन बार-बार यही दोहरा रही है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अशोक नगर में सोमवार (23 जून 2025) को सुबह साढ़े सात बजे 19 साल की नेहा का कत्ल हो गया। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले तौफीक ने उसे घर की पाँचवीं मंजिल से नीचे फेंक दिया।
इस हत्याकांड की तह तक पहुँचने के लिए ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम नेहा के घर पर पहुँची और घरवालों से हर मुद्दे पर बातचीत की। घरवारों ने तौफीक और उसके इरादों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
राखी बँधवाई, सेवइयाँ खिलाई और ले ली जान
तौफीक ने कहा कि मेरी कोई बहन नहीं है। कथित तौर पर उसने नेहा को बहन बना लिया। बड़ी बहन कहती है कि वो रक्षाबंधन पर राखी भी बँधवाता था। ईद पर सेवइयाँ खिलाता था। तीन साल बाद उसने शादी का प्रस्ताव दे दिया।
इसके बाद नेहा की माँ ने तौफीक को घर पर आने से मना कर दिया। नेहा की माँ के मुताबिक, तौफीक इस बात से बहुत नाराज हो गया था। 23 जून को सुबह साढ़े सात बजे वो बुरखा पहनकर नेहा की बिल्डिंग में आता है।
उसे पता था कि इस समय नेहा छत पर कपड़े धो रही होगी। पाँचवीं मंजिल की छत पर वो सीधे जाता है। इतने में नेहा के पिता भी छत पर आते हैं। कुछ कहा-सुनी होती है। इसके बाद वो नेहा को छत से नीचे खाली पड़े प्लॉट में फेंक देता है और भाग जाता है।
नेहा की ये कहानी सिर्फ रिश्तों में बात बिगड़ जाने के बाद हुई हत्या की नहीं है। ये उससे कहीं अधिक है।
मुरादाबाद से दिल्ली आकर करता था पल्लेदारी
आसपास के लोग बताते हैं कि तौफीक तीन-चार साल पहले मुरादाबाद से दिल्ली के इस इलाके में आया था। उसके साथ मुरादाबाद के करीब पंद्रह मुस्लिम लड़के बगल की होलसेल मार्केट में पल्लेदारी का काम करते थे। एक मजदूर की दिन की कमाई करीब एक हजार रुपये थी। दुकानदार बताते हैं कि मजदूरों को रहने-खाने की व्यवस्था हम ही देते थे।
नेहा के पड़ोसी OpIndia से बात करते हुए बताते हैं कि करीब तीन साल पहले तौफीक इस मोहल्ले में पहली बार आया था। वो लोगों से कहता था कि अकेला रहता हूँ, तो खाने-पीने की सही से व्यवस्था नहीं है।
परिवार ने की मदद, नेहा ने बाँधी राखी, लेकिन तौफीक के इरादे कुछ और
मोहल्ले के कुछ लोगों ने शुरुआत में एक-दो बार खाना-पीना दिया भी। लेकिन रोज-रोज यूँ किसी अजनबी को खाना खिलाना सही नहीं लगा। मोहल्ले में अधिकतर लोगों ने खाना देना बंद कर दिया था।
फिर तौफीक की नजर मोहल्ले के तिराहे पर बने पाँच मंजिला मकान पर पड़ी। इस मकान के पहले फ्लोर पर राकेश (बदला हुआ नाम) का परिवार दिखा। परिवार में तीन बड़ी बेटियाँ और दो छोटे बेटे थे।
उसने उस परिवार से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू की। परिवार धार्मिक था, लेकिन उन्हें तौफीक में सिर्फ एक घर से दूर रहने वाला लाचार मजदूर दिखा। शुरुआत में कभी-कभी वो खाना खाने आता। फिर लगातार दिन में ठंडा पानी माँगने के लिए आने लगा।
उसने घर में जगह बनाई। फिर रक्षाबंधन आया। तौफीक को नेहा ने राखी बाँधी। अगले तीन वर्षों तक ये संबंध बरकरार रहा। लेकिन इसी दौरान तौफीक की नजरें बदल गईं। वो अब नेहा को अपनी बीवी बनाना चाहता था।
भइया से सैंया बनने की चाह में बना हत्यारा
नेहा तौफीक को भइया बुलाती थी। लेकिन हत्या के कुछ महीने पहले ही तौफीक ने शादी का प्रस्ताव रख दिया। परिवार और नेहा के लिए ये प्रस्ताव चौंकाने वाला था। लेकिन तौफीक ने मन बना लिया था।
वो किसी भी कीमत पर नेहा से शादी करना चाहता था। नेहा की माँ ने तौफीक के घर में आने पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन वो छुप-छुपकर नेहा से मिलता रहा। शायद नेहा को उम्मीद नहीं थी कि इस छुपने-छुपाने के खेल का अंजाम उसकी मौत होगा। तौफीक लगातार मिल रहे इनकार से आग-बबूला हो चुका था।
नेहा भाई-बहनों में दूसरे नंबर की लड़की थी। तौफीक को पता था कि सुबह सात बजे वो कपड़े धुलने घर की छत पर जाती है। 23 जून को भी वो कपड़े धुलने जाती है। तौफीक ने जुर्म कबूल करते हुए बताया, “उस दिन मैं पहले से छत पर मौजूद था। नेहा के आने का इंतजार कर रहा था। साढ़े सात बजे नेहा छत पर आती है।”
पिता के सामने नेहा को पाँचवीं मंजिल से फेंका नीचे
नेहा के पिता कहते हैं, “वो नेहा पर चिल्ला रहा था। सामने से नेहा भी चिल्लाती है। आवाज सुनकर मैं छत पर जाता हूँ। मेरी आँखें फटी रह जाती हैं। वो दुपट्टे से नेहा का गला दबा रहा था। मैं अपनी बेटी को बचाने के लिए झपट पड़ता हूँ। तौफीक मुझे भी धक्का दे देता है। मैं जब तक उठ पाता, उतनी देर में उसने नेहा को छत से नीचे फेंक दिया। मैं कुछ समझ पाता, इतनी देर में वो सीढ़ियों से नीचे भागने लगा। नेहा ईंट के ढेर पर जा गिरी थी। वो चीख रही थी, मैं भी मदद के लिए चिल्लाता हूँ।”
शोर सुनकर आसपास के लोग इकट्ठा हो जाते हैं। जिस प्लॉट में नेहा गिरी थी, उसका दरवाजा बंद था। बड़ी मशक्कत के बाद उसका ताला तोड़ा जाता है। नेहा की बड़ी बहन बताती है – “वो तड़प रही थी, उसका शरीर तीन हिस्सों में टूट चुका था, वो बस पानी माँग रही थी।”
आसपास के लोग उसे ऑटो में रखते हैं। बुरी तरह घायल नेहा को GTB अस्पताल ले जाया जाता है। करीब पाँच घंटे के इलाज के बाद नेहा की मौत हो जाती है।
पानी पिलाने की इतनी बड़ी सजा मिली
OpIndia की टीम नेहा के घर पहुँचती है। बाहर पुलिसवालों का जमावड़ा है। ग्राउंड फ्लोर पर बड़ी बहन आँसुओं में डूबी बैठी है। कुछ रिश्तेदार और मीडिया के लोगों ने उसे घेर रखा है। पहली मंजिल पर नेहा के पिता मौजूद हैं। दरवाजे पर राम और गणेश सहित कई हिंदू देवी-देवताओं के चित्र लगे हैं। अंदर पिता बिस्तर पर बेसुध लेटे हैं। नेहा का छोटा भाई टीवी पर अपनी बहन की हत्या की खबर देख रहा है।
माइक लगाने पर वो बोलने की कोशिश करते हैं। गला भर आता है। आँखों से आँसू टपकने लगते हैं। उठने की कोशिश करते हैं, लेकिन उठ नहीं पाते। रोते हुए कहते हैं कि पता नहीं था तौफीक इतना बड़ा कसाई निकलेगा।
मैं उनकी आँखों से निकलते आँसुओं में उस अफसोस को पढ़ पा रहा था। अफसोस इस बात का कि क्यों नहीं वक्त रहते मैं तौफीक को पहचान पाया? इतिहास तो साँपों को दूध पिलाने की सजा के उदाहरण देता है, लेकिन पानी पिलाने की सजा इतनी बड़ी कैसे हो गई?