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फाँसी लगाकर अपने ही घर में झूल गया लीनेश साहू, लिखा- ईसा मसीह ईसा मसीह कर रात भर परेशान करती है पत्नी: सास-साली ईसाई बनने का डाल रहे थे दबाव

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में ईसाई मत अपनाने के दबाव की वजह से एक युवक ने अपनी जान दे दी है। मृतक का नाम लीनेश साहू है। लीनेश को यह दबाव उसकी बीवी व कुछ अन्य ससुराली जनों की तरफ से दिया जा रहा था। आत्महत्या से पहले शनिवार (7 दिसंबर 2024) को लीनेश ने अपनी पीड़ा को व्हाट्सएप स्टेट्स में लिख कर शेयर भी किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला धमतरी जिले के थानाक्षेत्र अर्जुनी में पड़ने वाले गाँव पटियाडीह का है। यहाँ रहने वाले 30 वर्षीय लीनेश साहू टेलरिंग (दर्जी) का काम कर के अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। रविवार की सुबह उनका शव अपने घर के अंदर फाँसी के फंदे पर लटका मिला। परिजनों की सूचना पर पहुँची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी।

प्रथम दृष्टया पुलिस ने इस घटना को आत्महत्या माना है। जाँच के दौरान पुलिस को लीनेश साहू का मोबाइल मिला। फाँसी लगाने से पहले लीनेश ने व्हाट्सएप स्टेटस लगाया था। इस स्टेटस में मृतक ने खुद को अपनी बीवी से परेशान बताया और लिखा, “मेरे को धर्म परिवर्तन करने के लिए बहुत ज्यादा परेशान करती है। ईसा मसीह ईसा मसीह करके मेरे को रात भर परेशान करती है।” लीनेश ने इसी स्टेटस में आगे बताया था कि वो अपने पूरे हफ्ते की कमाई अपनी बीवी को दे देते थे। हालाँकि इसके बावजूद उनकी पत्नी से उनसे कभी प्यार से बात नहीं की।

लीनेश साहू ने धर्मान्तरण के लिए होने वाली प्रताड़ना में अपनी सास के साथ पत्नी की छोटी व बड़ी बहन को भी शामिल बताया है। इन सभी ने लीनेश से कहा, “तू आ जा। फिर तेरे पापा को भी मना लेंगे।” लीनेश के अनुसार उन्होंने अपनी ससुराल में कभी खाना तक नहीं खाया। मृतक ने अपनी पत्नी पर न सिर्फ धर्मान्तरण के दबाव बल्कि झूठ बोलने का भी आरोप लगाया है। 8वीं पास लीनेश की पत्नी ने शादी से पहले खुद को कक्षा 12 पास बताया था।

फ़िलहाल पुलिस ने इस पूरे मामले का संज्ञान ले कर जाँच शुरू कर दी है। मोबाइल स्टेटस में जिनका जिक्र किया गया था उनसे पूछताछ की जा रही है। डिप्टी एसपी नेहा पवार ने मीडिया को बताया कि जाँच में सामने आए तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

‘भारत की जेल में मर जाएँगे, लेकिन बांग्लादेश लौटकर नहीं जाएँगे’: जंगल-नदी पार कर छिपते-छिपाते त्रिपुरा पहुँचा हिंदू परिवार, कहा- वहाँ हालत बदतर, सब कुछ बेच कर यहाँ आए

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचार के कारण एक हिन्दू परिवार भाग कर भारत आ गया। उसे त्रिपुरा में गिरफ्तार किया गया है। हिन्दू परिवार ने कहा है कि भले ही उन्हें भारत के भीतर जेल में डाल दिया जाए लेकिन वह वापस बांग्लादेश वापस नहीं जाएँगे।

हिन्दू परिवार में बूढ़े-बच्चे सभी शामिल हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति बदतर हो गई है। यह परिवार जंगल-नदी किसी तरह पार करके भारत पहुँचा है।

इस परिवार के मुखिया शंकर चंद सरकार हैं। वह बांग्लादेश के किशोरगंज जिले से अपने परिवार के 9 सदस्यों को लेकर भारत आए हैं। उनके परिवार में उनके बूढ़े पिता, पत्नी, छोटा भाई और बच्चे शामिल हैं। शंकर चंद सरकार अपने परिवार को लेकर बांग्लादेश से किसी तरह छुपते-छुपाते भारत आए हैं।

उन्होंने त्रिपुरा के रास्ते अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की है। हालाँकि, उन्हें उनके परिवार समेत त्रिपुरा के ही धलाई जिले में एक रेलवे स्टेशन के बाहर से रेलवे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। शंकर चंद सरकार बांग्लादेश में ड्राइवर के तौर पर काम करते थे।

उन्होंने बताया है कि जब से बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार का पतन हुआ तब से वहाँ हिन्दुओं के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों से भी बदतर व्यवहार हो रहा है। उन्होंने बताया कि कोई भी सवारी उनकी गाड़ियों में नहीं बैठती थी और जो बैठती भी थी वह पैसा नहीं देती थी।

पैसा माँगने पर मारपीट की जाती थी। पुलिस भी उनकी नहीं सुनती थी। उनके ऊपर गलत काम करने के आरोप लगाए जाते थे। शंकर चंद सरकार ने बताया है कि उन्होंने अपनी अधिकांश सम्पत्ति नुकसान झेल कर बेच दी। बांग्लादेश में हिन्दुओं से सम्पत्ति खरीदने को भी लोग राजी नहीं हो रहे।

उन्होंने बताया कि बांग्लादेश छोड़ना उनके लिए मजबूरी बन गया था। शंकर चंद सरकार ने बताया कि उनके बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा मसला बनती जा रही थी। उन्होंने बताया है कि इलाके में बाक़ी हिन्दू परिवार भी भाग कर भारत आना चाहते हैं लेकिन नौकरी-धंधे के चक्कर में ऐसा नहीं कर पा रहे।

पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद शंकर सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश वापस नहीं जाएँगे। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हमने शांति पाने के लिए सीमा पार की, और भले ही हमें जेल हो जाए, हम वापस जाने के बजाय जेल में मरना पसंद करेंगे।”

पुलिस ने बताया है कि उसने मुखबिर की सूचना के आधार पर यह कार्रवाई की है और आगे उन्हें कोर्ट में पेश करेगी। गौरतलब है कि बांग्लादेश में यूनुस सरकार आने के बाद से हिन्दुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। कहीं मंदिर तोड़े जा रहे तो कहीं हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं।

सीरिया में अफगानिस्तान जैसा कब्जा, राष्ट्रपति असद की 24 साल की सत्ता छिनी-देश छोड़ भागे: जानिए जिन्हें सब बता रहे विद्रोही कौन हैं वे, अल कायदा और ISIS से रहे हैं HTS के लिंक

पश्चिम एशियाई देश सीरिया में असद सरकार का पतन हो गया है। रविवार (8 दिसम्बर, 2024) की सुबह विद्रोही गुटों के लड़ाके राजधानी दमिश्क में घुस गए हैं। सीरियाई सेना से उन्हें कोई ख़ास चुनौती नहीं मिल रही है। राष्ट्रपति बशर अल असद के देश छोड़ने की आशंका जताई गई है। बीते लगभग 5 दशक से चल रहे सीरिया में असद परिवार के शासन का अंत लगभग तय हो गया है। इस बीच सीरिया में जिन विद्रोहियों ने कब्जा किया है, उनके आतंकी लिंक को लेकर चिंताएँ जताई गईं हैं।

अभी सीरिया में क्या हो रहा?

सीरिया में बीते लगभग 15 दिनों में हालात तेजी से बदले हैं। सीरिया के विद्रोही गुटों हयात उल शम्स अल तहरीर (HTS) और फ्री सीरियन आर्मी अथवा सीरियन नेशनल आर्मी (SNA) ने बीते लगभग एक सप्ताह में तेजी से देश के बड़े-बड़े शहरों पर कब्जा किया है। इसमें सबसे प्रमुख अलेप्पो शहर रहा है। यह सीरिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इसके बाद यह तेजी से दमिश्क की तरफ बढ़े हैं। यदि उनकी यही रफ़्तार रही तो वह अगले कुछ दिनों में दमिश्क पर पूरी तरह कब्जा जमा सकते हैं।

सीरियाई सेना इन विद्रोहियों के सामने लड़ने से कहीं-कहीं पीछे हट चुकी है। कई जगह पर उनकी लड़ाई इन गुटों के खिलाफ काफी कमजोर है। सीरिया में कुछ उसी तरह से परिस्थितियाँ बन रही हैं, जिस तरह से अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान में बनी थीं। तब भी तालिबान के लड़ाके एक के बाद एक शहर पर कब्जा जमाते चले गए थे। सीरियाई राष्ट्रपति बसर अल असद के देश छोड़ने की भी इस बीच आशंका जताई गई है। विद्रोही गुटों ने ऐलान किया है कि बशर अल असद इस बीच अपने परिवार के साथ सीरिया छोड़ चुके हैं।

राष्ट्रपति असद के सीरिया छोड़ने सम्बन्धी पुष्टि अभी सरकार की तरफ से नहीं हुई है। बशर अल असद सीरिया छोड़ कर कहाँ गए हैं, अभी इसकी जानकारी नहीं है। सीरिया में असद सरकार का विरोध करने वाले गुट सड़कों पर आकर जश्न मना रहे हैं। वहीं दमिश्क पर लगभग कब्जा कर चुके गुट HTS ने कहा है कि वह ‘सामाजिक एकता’ बनाए रखेंगे। HTS ने जश्न में फायरिंग करने और सरकारी संस्थानों पर बलपूर्वक कब्जा करने से भी लड़ाकों को रोक दिया है। इस लड़ाई में शुरू में शामिल रहे ईरान और रूस की तरफ से अभी प्रतिक्रिया आना बाकी है।

कौन हैं सीरिया पर कब्जा जमाने वाले नए लड़ाके?

सीरिया में असद सरकार का तख्तापलट करने वाले प्रमुख विद्रोही समूह HTS और SNA ही हैं। यह दोनों विद्रोही गुट 2011 में अरब स्प्रिंग के बाद सामने आए थे। इनमें से HTS का नाम अल नुसरा फ्रंट था। इसने 2011 में असद सरकार के खिलाफ चालू हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बाद जंग छेड़ दी थी। 2012 में HTS ने खुद को अल कायदा से जुड़ा हुआ बताया था। इसके ISIS से भी लिंक रहे हैं। 2016 तक इसने असद सरकार के खिलाफ भीषण लड़ाई लड़ी थी।

2016 में HTS के मुखिया अबू मोहम्मद अल जवालानी ने खुद को अल कायदा और ISIS से अलग बताया। उसने अल नुसरा को भंग कर दिया और इसे HTS नाम दिया। हालाँकि, इसके अधिकांश लड़ाके वही हैं जो पहले आतंकी थे। इस संगठन को वर्तमान में तुर्की का पूरा समर्थन हासिल है। वर्तमान में इसी के लड़ाके दमिश्क में घुस रहे हैं। यह संगठन 2016 के बाद से ही सीरिया का इदलिब प्रांत नियंत्रित कर रहा है। इस बार भी इसने लड़ाई यहीं से चालू की थी।

HTS पर मानवाधिकार उल्लंघन और बेगुनाहों के मारने के सैकड़ों आरोप हैं। भले ही इसने अपना नाम बदल लिया हो, इस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबन्ध अब भी लगे हुए हैं। यह कुर्दों के खिलाफ अब भी लड़ रहे हैं और उन पर अत्याचार कर रहे हैं। इस बीच HTS के मुखिया जुलानी ने अपने आतंकी संगठन की छवि बदलने और अपने आप को एक विद्रोही नेता दिखाने के पूरे प्रयास किए हैं। इस प्रयास में उसे पश्चिमी देशों की मीडिया का भी साथ मिल रहा है। जुलानी को 2013 में वैश्विक आतंकी घोषित किया गया था। उस पर करोड़ों का इनाम भी रखा गया था।

वहीं दूसरा गुट सीरियन नेशनल आर्मी है। जहाँ HTS एक संगठन की तरह है, SNA में कई सारे अलग-अलग विद्रोही गुट शामिल हैं। इसका गठन 2017 में हुआ था। इसका काम असद सरकार के खिलाफ लड़ने वालों को एक साथ लाना था। इसे भी तुर्की का पूरा समर्थन हासिल है। पहले इसका नाम फ्री सीरियन आर्मी हुआ करता था। इसमें भी अलग-अलग गुट शामिल थे। वर्तमान में इसमें लगभग 50,000 से अधिक लड़ाके शामिल बताए जाते हैं। SNA की HTS के साथ भी लड़ाई बताई जाती है।

क्यों गिर गई असद सरकार?

राष्ट्रपति बशर अल असद का परिवार बीते 5 दशकों से अधिक समय से सीरिया की सत्ता में रहा है। बशर अल असद के पिता हाफिज अल असद ने यहाँ सत्ता पर कब्जा जमाया था। वह 1971 में सीरिया के राष्ट्रपति बन गए थे। इसके बाद 2000 में बशर अल असद ने सत्ता संभाली। बशर अल असद को सबसे बड़ी चुनौती का सामना 2011 में करना पड़ा जब ट्यूनीशिया से सरकार विरोधी आंदोलन चालू हो गए। इसके बाद एक-एक करके अरब और अफ़्रीकी देशों में सरकारें गिरने लगीं।

बशर अल असद की सरकार इ खिलाफ भी हथियारबंद विद्रोह चालू हो गया। 2015 तक आते-आते उनकी स्थिति काफी कमजोर हो गई थी लेकिन रूस और ईरान के समर्थन से उनकी सरकार बच पाई। ईरान ने जहाँ सीरिया के भीतर हिजबुल्लाह के लड़ाके भेजे तो वहीं रूस ने भाड़े के लड़ाके भेजे। रूस ने विद्रोहियों, ISIS और बाकी लड़ाका समूहों के खिलाफ हवाई हमले किए। 2020 आते-आते असद ने सीरिया के अधिकांश हिस्सों पर अपना कब्जा जमा लिया था। हालाँकि, इदलिब जैसे कुछ प्रांत तब भी उनके शासन से बाहर रहे थे।

2024 में यह लड़ाई अक्टूबर माह में दोबारा छिड़ गई। हालाँकि, इस बार ईरान और रूस असद की सहायता नहीं कर पाए। जहाँ ईरान, इजरायल के साथ अपने संघर्ष को लेकर फंसा हुआ है, वहीं रूस यूक्रेन में उलझा हुआ है। ऐसे में बिना लड़ाकों और हवाई हमलों के HTS और SNA जैसे विद्रोही गुट बिना किसी प्रतिरोध के आगे बढ़ते गए।

भारत और अमेरिका समेत बाकी ने क्या कहा?

भारत हमेशा से ही सीरिया में चल रहे विवाद को लेकर बातचीत के समर्थन में रहा है। हाल ही में भारत ने अपने नागरिकों से कहा था कि वह जल्द से जल्द से सीरिया छोड़ दें। वहीं अमेरिका ने कहा है कि इस पूरे विवाद से उसका कोई लेना-देना नहीं है। हालाँकि, अमेरिका असद सरकार का विरोध ही करते आया है। फ्रांस और अमेरिका जैसे देश परोक्ष रूप से HTS और SNA के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। वहीं तुर्की खुले तौर पर विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है।

खुद को ‘पत्रकार’ बताने वाला नसीम रजा जैदी निकला ‘मीडिया जेहादी’, संभल के दंगाइयों को ‘शहीद’ बता इकट्ठा कर रहा था पैसा: पुलिस ने पकड़ा, पहचान पत्र निकले फर्जी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 23 नवंबर 2024 को हुई हिंसा के बाद अब हालात सामान्य हो रहे हैं। लेकिन इस बीच कुछ असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन्हीं में से एक नाम नसीम रजा जैदी का है, जो खुद को पत्रकार बताता है। पुलिस ने नसीम को शनिवार (7 दिसंबर 2024) को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू की है। नसीम न सिर्फ दंगाइयों का महिमामंडन में जुटा बल्कि मारे गए उपद्रवियों के नाम पर पैसों की उगाही भी कर रहा था।

पुलिस को सूचना मिली थी कि नसीम सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश फैलाकर लोगों को पुलिस के खिलाफ उकसा रहा है। वह दंगाइयों को ‘शहीद’ बताकर उनकी महिमामंडन कर रहा था और पुलिस को हिंसक और हमलावर साबित करने की कोशिश कर रहा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नसीम ने QR कोड जारी कर पैसे जुटाने की भी शुरुआत की थी। वह दावा कर रहा था कि ये पैसे हिंसा में शामिल लोगों की मदद के लिए इस्तेमाल किए जाएँगे।

पुलिस ने नसीम को पकड़कर पूछताछ की तो उसने खुद को एक न्यूज संस्थान का पत्रकार बताया। लेकिन जब पुलिस ने संस्थान से जानकारी ली, तो पता चला कि नसीम का दावा झूठा है। उसके पहचान पत्र भी फर्जी निकले। नसीम के इस फर्जीवाड़े के खिलाफ पुलिस ने कोतवाली में FIR दर्ज कर के कार्रवाई शुरू कर दी।

पुलिस अधीक्षक संभल के मुताबिक नसीम के खिलाफ भारतीय नयाय संहिता (BNS) की धारा 318, 338, 336 और 340 के तहत केस दर्ज किया गया है। नसीम रजा जैदी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है।

अब यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि उसने कितने पैसे कहाँ से जुटाए और उनका इस्तेमाल कहाँ किया। भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने नसीम की करतूत को ‘मीडिया जिहाद’ बताया है। पुलिस मामले की आगे जाँच कर रही है।

अब महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड ने 103 किसानों की जमीनों पर ठोका दावा, खाली करने का दिया नोटिस: जानिए वक्फ संपत्ति के नाम पर कहाँ-कहाँ की गई ऐसी दुस्साहस

विभिन्न राज्यों के वक्फ बोर्डों द्वारा गाँव-के-गाँव और बड़े-बड़े होटलों-कॉलेजों को अपनी संपत्ति बताने के बाद वक्फ बोर्ड के इरादे खुलकर सामने आ गए हैं। इसके बावजूद वह रूकने का नाम नहीं ले रहा है। अब महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड ने लातूर के 103 किसानों की जमीनों पर अपना दावा ठोका है। उसने इन जमीन के मालिक किसानों को नोटिस भी जारी किया है।

पीड़ित किसानों का कहना है कि जिन जमीनों पर वे पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं, उसे अब वक्फ हड़पना चाह रहा है। किसानों का आरोप है कि उनकी लगभग 300 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड की नजर पड़ गई और उसे हड़प लिया। इसे खाली करने के लिए 103 किसानों को नोटिस दी गई है। इस मामले में दावा छत्रपति संभाजीनगर के महाराष्ट्र राज्य वक्फ न्यायाधिकरण में वाद दायर किया गया है।

वक्फ बोर्ड की ओर से भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि लातूर के तालेगाँव के किसान इन जमीनों को तुरंत खाली कर दें। नोटिस मिलने से घबराए किसानों ने सरकार और प्रशासन से उनकी जमीनों को बचाने के लिए मदद की गुहार लगाई है। किसानों का कहना है कि ये उनकी अपनी जमीन है, वक्फ बोर्ड का इसमें कोई हिस्सा नहीं है। नोटिस भेजे हुए लगभग दो महीने हो चुके हैं।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि ये जमीनें गाँव वालों को उसकी ओर से दी गई हैं और अब ये जमीनें उसे वापस चाहिए। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास इन जमीनों के निजामकालीन दस्तावेज मौजूद हैं। वहीं, एक किसान ने हैदराबाद गजट दिखाया और यह जमीन का दस्तावेज है। उसने बताया कि यह दस्तावेज उसके पास तब से है, जब बीदर एक जिला था। उसी दौरान उसके पूर्वजों ने जमीन खरीदी थी। 

वक्फ बोर्ड की दुस्साहस की कई कहानियाँ

बता दें कि यह अकेला मामला नहीं है वक्फ बोर्ड की मनमानी का। उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड ने वाराणसी में स्थित प्रसिद्ध उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) पर भी अपना दावा ठोका है। बोर्ड का का कहना है कि यह संपत्ति उसकी है। उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना लगभग 115 साल पहले सन 1909 में भिनगा (बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी। 

साल 2022 में तमिलनाडु के वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं के पूरे थिरुचेंदुरई गाँव को वक्फ संपत्ति बताते हुए उस पर अपना दावा ठोक दिया। यहाँ 1500 साल पुराना एक मंदिर है। उसे भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति घोषित कर दी। इस तरह वक्फ बोर्ड ने 369 एकड़ भूमि पर अपना दावा ठोका है। हालाँकि, ग्रामीणों का कहना है कि ये जमीनें उनकी पुश्तैनी हैं। उन्होंने बोर्ड के दावे को फर्जी बताया।

कर्नाटक में भी वक्फ बोर्ड ने वहाँ की 1200 एकड़ (लगभग 2000 बीघा) जमीन को शाह अमीनुद्दीन दरगाह का बताकर अपनी संपत्ति बताई है। इसके बाद राज्य के कॉन्ग्रेस सरकार ने किसानों को नोटिस भेजकर उन जमीनों को खाली करने के लिए कहा था। बाद में विजयपुरा जिले के टिकोटा तालुक स्थित होनवाड़ा गाँव के किसानों ने इसकी शिकायत मंत्री एमबी पाटिल से की।

वहीं, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान भी एक बड़ा विवाद है। सन 1950 में वक्फ बोर्ड ने इसे वक्फ संपत्ति बताते हुए अपना दावा ठोक दिया था। वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसलिए यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है। हालाँकि, यह विवाद अदालत में है और इस पर अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसी तरह बेंगलुरु में आईटीसी विंडसर होटल पर भी वक्फ ने दावा ठोका है।

इसी तरह का मामला अप्रैल 2024 में हैदराबाद से आया था। तेलंगाना वक्फ बोर्ड ने राजधानी के एक नामी 5 स्टार होटल मैरियट को ही अपनी जागीर घोषित कर दिया था। हालाँकि, हाई कोर्ट ने उसके इस मंसूबे को धाराशायी कर दिया था। दरअसल, साल 1964 में अब्दुल गफूर नाम के एक व्यक्ति ने तब वायसराय नाम से चर्चित इस होटल पर अपना हक जताते हुए मुकदमा कर दिया था।

इसी तरह गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर ही दावा ठोक दिया। अब यह वक्फ की संपत्ति है, क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी। 

इसी तरह कोलकाता के टॉलीगंज क्लब और रॉयल कलकत्ता गोल्फ क्लब को भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताई है। इसके अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सों में कई ऐसी संपत्तियाँ हैं, जिन पर वक्फ बोर्ड अपना दावा ठोकता है और उन्हें वक्फ संपत्ति बताता है। ये सारे मामले विवाद के घेरे में हैं। अब इन संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण की माँग होने लगी है।

करीब पाँच साल पहले साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि केरल में मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके की संपत्ति उसकी है। यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनके पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। 

इसी तरह, केरल के वायनाड जिले के तलापुझा गाँव में 28 अक्टूबर 2024 को कुछ परिवारों को अचानक एक गंभीर और चौंकाने वाला नोटिस मिला। इस नोटिस में केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि वे ज़मीनें जो इन परिवारों की मानी जा रही थीं, असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति हैं। वक्फ बोर्ड ने इन जमीनों को तुरंत खाली करने के लिए कहा है।

वक्फ बोर्ड भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले स्मारकों पर भी दावा करता है। कई स्मारक तो उसके कब्जे में भी हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वक्फ संशोधन बिल को लेकर गठित JPC को ऐसे 120 स्मारकों की सूची दी, जो उसके अधीन है लेकिन वक्फ बोर्ड उन पर दावा करता है। कई संपत्तियाँ तो वक्फ के कब्जे में है। इसका उदाहरण यूपी के संभल का विवादित जामा मस्जिद है, जिसे हिंदू हरिहर मंदिर बताते हैं।

यह संपत्ति ASI के अधीन है, लेकिन उन्हें परिसर में घुसने तक नहीं दिया जाता है। इसका निरीक्षण करने के लिए ASI की टीम को पुलिस-प्रशासन से मदद लेनी पड़ती है। इतना ही नहीं, ASI की जानकारी के बिना ही, इस संरक्षित स्मारक में कई तोड़फोड़ पर निर्माण भी किए गए हैं। यह सारी जानकारी खुद ASI ने संभल मामले में हलफनामा दायर कर कोर्ट को दी है।

35 साल पहले मिट्टी का था एक टीला, पहले बनाई मजार, फिर दे दिया मस्जिद का रूप: वाराणसी के कॉलेज में जिस ‘ढाँचे’ पर विवाद, उसे प्रशासन भी बता चुका है ‘अवैध’

वाराणसी के प्रतिष्ठित उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) में मस्जिद को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। छात्रों के प्रदर्शन, वक्फ बोर्ड की दावेदारी और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच यह मुद्दा अब राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस विवाद की शुरुआत कॉलेज के 115वें स्थापना दिवस पर एक नोटिस के वायरल होने से हुई और अब ये मुद्दा काफी बढ़ चुका है।

एक नोटिस से जुड़ा है सारा विवाद

इस विवाद की जड़ें 2018 से जुड़ी हैं, जब उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कॉलेज प्रबंधन को एक नोटिस भेजकर मस्जिद को वक्फ संपत्ति में पंजीकृत करने की माँग की थी। कॉलेज प्रबंधन ने इस माँग को खारिज करते हुए कहा कि मस्जिद कॉलेज की 8200 स्क्वायर फीट जमीन पर बनी है, जो ट्रस्ट की संपत्ति है। 2021 में वक्फ बोर्ड ने इस दावे को औपचारिक रूप से छोड़ दिया था। हाल ही में, 25 नवंबर 2024 को कॉलेज के 115वें स्थापना दिवस पर 2018 का पुराना पत्र वायरल हुआ। इसके बाद कॉलेज परिसर में छात्रों ने मस्जिद में नमाज के दौरान हनुमान चालीसा पढ़ा, जिससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।

6 दिसंबर 2024 को करीब 300 छात्रों ने कॉलेज गेट के बाहर भगवा झंडे लेकर प्रदर्शन किया और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था कि मस्जिद अवैध है और इसे हटाया जाना चाहिए। प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया, और बाहरी छात्रों की एंट्री पर रोक लगा दी गई। कॉलेज प्रशासन ने भी छात्रों की माँग का समर्थन करते हुए कहा कि मस्जिद का निर्माण अवैध है। उन्होंने आरोप लगाया कि मस्जिद में बाहरी लोग आकर नमाज पढ़ते हैं, जिससे परिसर की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं।

कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर डी.के. सिंह ने बताया, “यह मस्जिद नहीं, यहाँ 35 साल पहले सिर्फ एक टीला था, बाद में यहाँ मजार बनी थी, और धीरे-धीरे इसे मस्जिद का रूप दे दिया गया। रातों-रात निर्माण सामग्री लाकर अवैध निर्माण किया गया। जब हमने इस पर कार्रवाई की, तो इसे वक्फ संपत्ति घोषित करने की कोशिशें शुरू हुईं।” उन्होंने आगे बताया कि कॉलेज की बिजली लाइन का भी उपयोग मस्जिद के लिए किया जा रहा था, जिसे बाद में कटवा दिया गया।

छात्रों का कहना है कि अगर मस्जिद में नमाज पढ़ी जा सकती है, तो उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ करने की अनुमति होनी चाहिए। छात्र नेता विवेकानंद सिंह ने कहा, “यह मस्जिद वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं है। इसे हटाया जाना चाहिए। अगर नमाज जारी रही, तो हम भी हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।”

कैसे हुई थी उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना?

वाराणसी का उदय प्रताप कॉलेज, जिसे आमतौर पर यूपी कॉलेज के नाम से जाना जाता है, भारत के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक है। इस कॉलेज की स्थापना 1909 में भिनगा (जिला बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी। उदय प्रताप सिंह एक महान समाज सुधारक और दूरदर्शी शासक थे। वे न केवल अपने राज्य की भलाई के लिए समर्पित थे, बल्कि शिक्षा के प्रसार में भी उनकी गहरी रुचि थी।

राजा उदय प्रताप सिंह का मानना था कि समाज को उन्नति के पथ पर ले जाने के लिए शिक्षा एक प्रभावी साधन हो सकती है। उनकी दृष्टि केवल अकादमिक विकास तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज को नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध करना था। उनके इसी उद्देश्य ने उन्हें वाराणसी में एक ऐसा शिक्षण संस्थान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया, जो ग्रामीण और शहरी युवाओं को उच्च शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्रदान कर सके।

राजा उदय प्रताप सिंह न केवल एक शासक थे, बल्कि उन्होंने समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी जीवनशैली में सन्यास की झलक मिलती थी। वे एक साधारण और सादगीपूर्ण जीवन जीने में विश्वास रखते थे। शिक्षा को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि आज यूपी कॉलेज हजारों विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का एक उत्कृष्ट केंद्र बन गया है।

उदय प्रताप कॉलेज की शुरुआत एक हाई स्कूल के रूप में हुई थी। यह संस्थान वाराणसी के भदऊँ गाँव में स्थापित किया गया था। 500 एकड़ में फैले इस परिसर में समय के साथ शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए कई संस्थान स्थापित किए गए। इनमें डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, रानी मुरार बालिका विद्यालय, राजर्षि शिशु विहार और राजर्षि पब्लिक स्कूल शामिल हैं।

आज उदय प्रताप कॉलेज में लगभग 20,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। यह संस्थान केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। इसका विशाल परिसर, शैक्षणिक माहौल और गौरवशाली इतिहास इसे अन्य संस्थानों से अलग पहचान दिलाता है। कॉलेज प्रबंधन का दावा है कि 35 साल पहले यहाँ केवल मिट्टी का टीला था, जहाँ बाद में मजार बनी और फिर मस्जिद का निर्माण हुआ।

स्थानीय प्रशासन ने विवाद को शांत करने के लिए कॉलेज के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी है। पुलिस ने बाहरी छात्रों और असामाजिक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। एसीपी एस. चन्नप्पा ने कहा, “हालात तनावपूर्ण थे, लेकिन पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया। मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने वाले सात छात्रों को हिरासत में लिया गया है।”

क्या कहता है कानून?

उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जफर फारूकी ने कहा कि 2018 में जो नोटिस दिया गया था, उसे 2021 में रद्द कर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मस्जिद पर वक्फ बोर्ड का कोई दावा नहीं है। फारूकी ने यह भी आरोप लगाया कि 2018 का पुराना नोटिस अब वायरल करके विवाद खड़ा किया जा रहा है।

बता दें कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत, किसी संपत्ति को वक्फ में पंजीकृत करने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि मस्जिद का कोई रिकॉर्ड खसरा-खतौनी में नहीं है और यह ट्रस्ट की संपत्ति है। फिलहाल, विवाद सुलझने के बजाय गहराता दिख रहा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। पुलिस और प्रशासन ने परिसर में शांति बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। यह मामला न केवल कानूनी पहलुओं को उजागर करता है, बल्कि धार्मिक और सामाजिक तनावों को भी सामने लाता है।

राहुल गाँधी को ढोने के लिए साथी नहीं तैयार, ममता बनर्जी बनना चाहती हैं ‘लीडर’: अखिलेश और उद्धव ठाकरे की पार्टी ने किया समर्थन, RJD बोली- लालू ने बनाया INDI गठबंधन

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में INDI गठबंधन की करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस गठबंधन को संभालने की अपनी पुरानी इच्छा फिर से दोहराई है। उन्होंने कहा कि वह INDI गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, ममता बनर्जी के बयान का कॉन्ग्रेस ने विरोध किया है, जबकि समाजवादी पार्टी और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने इसका समर्थन किया है।

एक इंटरव्यू में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने ने ही INDI गठबंधन को बनाया है। ममता बनर्जी ने कहा कि अगर इस गठबंधन का इसका नेतृत्व करने वाले इसे ठीक से नहीं चला सकते तो उन्हें (ममता को) मौका दें। ममता ने कहा कि वह बंगाल से इस गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। बता दें कि गठबंधन का नेतृत्व फिलहाल कॉन्ग्रेस कर रही है।

ममता बनर्जी के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन में एक फिर से विवाद खड़ा हो गया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा फिर से जाहिर हो गई है। ममता बनर्जी के बयान का समर्थन करते हुए शिवसेना (UBT) के संजय राउत ने कहा, “हम भी चाहते हैं कि वे विपक्षी INDIA गठबंधन की प्रमुख भागीदार बनें। चाहे वह ममता बनर्जी हों, अरविंद केजरीवाल हों या शिवसेना, हम सभी एक साथ हैं। हम जल्द ही कोलकाता में ममता बनर्जी से बात करने जाएँगे।”

वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह ने भी ममता बनर्जी के बयान का समर्थन किया। उन्होंने शनिवार (7 दिसंबर 2024) को को कहा, “इस बार के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों में से सपा ने 37 सीटें जीतीं। पश्चिम बंगाल में TMC ने 42 सीटों में से 29 सीटें जीतीं। भाजपा को इन दोनों राज्यों में 35 सीटों का नुकसान हुआ। सभी दल सहमत हों तो सपा ममता बनर्जी का समर्थन करेगी।”

उधर, लेफ्ट ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। वामपंथी नेता डी राजा ने कहा, “कॉन्ग्रेस को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। हालात INDIA ब्लॉक की मीटिंग की माँग करते हैं। कॉन्ग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में गठबंधन के सहयोगियों को समायोजित नहीं किया। अगर कॉन्ग्रेस ने INIDA ब्लॉक के सहयोगियों की बात सुनी होती तो लोकसभा और हरियाणा-महाराष्ट्र चुनाव नतीजे अलग होते।”

ममता बनर्जी के बयान पर यूपी के सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “ममता जी बड़ी नेता हैं, लेकिन राहुल गाँधी के अलावा देश में कोई भी INDIA गठबंधन का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है।” वहीं, कॉन्ग्रेस की सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि ममता बनर्जी को ऐसा लगता होगा, लेकिन कॉन्ग्रेस को ऐसा नहीं लगता है। कॉन्ग्रेस के लोग अपनी पार्टी के हिसाब से चलते हैं।

उधर, लालू यादव की पार्टी RJD ने INDI गठबंधन को ममता बनर्जी द्वारा बनाए जाने को खारिज कर दिया। RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “बीजेपी के खिलाफ विपक्षी गठबंधन के असली आर्किटेक्ट लालू प्रसाद यादव हैं। उनकी पहल पर पटना में गठबंधन की पहली बैठक हुई थी। इसमें ममता बनर्जी भी शामिल हुई थीं। सभी अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।”

INDIA गठबंधन में उठ रहे विरोध के स्वर पर भाजपा ने हमला बोला है। भाजपा ने कहा कि विपक्ष के नेताओं को राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। वे अब भी राहुल गाँधी को राजनीति का कच्चा खिलाड़ी समझते हैं। भाजपा ने कहा कि विपक्ष में कई लोग ऐसे हैं, जो राहुल गाँधी को राजनीतिक तौर पर विफल मानते हैं।

भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, “इंडी एलायंस में खानदान अनेक औऱ ख्वाहिश एक है। हर इंसान की अपनी ख्वाहिश है। वे गठबंधन के ही मुखिय़ा बनना चाहते है, क्योंकि उनको पता है कि सरकार में तो कभी आने वाले है नहीं हैं।” जदयू नेता नीरज कुमार ने कहा कि भ्रष्टाचार की बुनियाद पर जेल से रहकर सरकार चलाने वाले घटक दलों के बीच असहमति है।

‘तू मुसलमान नहीं, काफिर है’: संभल में पत्थरबाजी का बीवी ने किया विरोध तो शौहर ने मारपीट कर दिया तीन तलाक, पुलिस की तारीफ पर भड़का

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। महिला निदा जावेद को उसके शौहर एजाजुल आबेदीन ने तीन तलाक इसलिए दे दिया क्योंकि उसने संभल में हुई हिंसा को लेकर पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया। शौहर ने महिला को ‘काफिर’, ‘मुसलमानों की दुश्मन’ कहते हुए घर से निकाल दिया।

निकाह के बाद से ही खफा रहता था आरोपित

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता निदा जावेद ने बताया कि 2012 में उसका पहला निकाह हुआ था, जिससे तीन बच्चे हैं। 2021 में तलाक होने के बाद पड़ोस में रहने वाले एजाजुल आबेदीन से उसका रिश्ता जुड़ा। एजाजुल ने शादी का झांसा देकर गुरुग्राम बुलाया और उसके साथ रहना शुरू कर दिया। दबाव बढ़ने पर और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उसने निकाह किया। निकाह के बाद से ही एजाजुल उसे दहेज के लिए परेशान करने लगा। निदा ने बताया कि उसका शौहर अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ता था, लेकिन जब उसने संभल हिंसा में पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया तो मामला बिगड़ गया।

पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया, तो दिया तीन तलाक

महिला ने बताया कि एक दिन घर में संभल हिंसा को लेकर बात हो रही थी। निदा ने कहा कि पुलिस ने पत्थरबाजों पर लाठी चलाकर सही किया। यह सुनते ही एजाजुल आग-बबूला हो गया और उसे मुसलमानों की दुश्मन कहते हुए तीन तलाक दे दिया। निदा ने आरोप लगाया कि एजाजुल ने उसे काफिर भी कहा और वीडियो देखने पर आपत्ति जताई। निदा के अनुसार, उसके जेठ ने भी उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश की थी, जिसे लेकर वह पहले ही शिकायत दर्ज करा चुकी है।

पीड़िता ने एसएसपी कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज कराई है। एसएसपी सतपाल अंतिल ने कहा कि महिला की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं और मामले की जाँच जारी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पीड़ित महिला के अधिवक्ता अभिषेक शर्मा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है। चाहे वह किसी की आलोचना हो या समर्थन। अगर इस आधार पर किसी महिला को प्रताड़ित किया जाता है, तो यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

गायों की तस्करी से आहत होती है धार्मिक भावनाएँ, कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा: जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट, शकील मोहम्मद पर PSA कार्रवाई को अम्मी ने दी थी चुनौती

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए बेहद अहमद टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि गोवंश की तस्करी से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है। इसलिए यह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा है। यह मामला गो-तस्करी से जुड़े एक व्यक्ति शकील मोहम्मद का है। कोर्ट ने उसे उसकी हिरासत को बरकरार रखा है और चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काज़मी ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति शकील मोहम्मद की गतिविधियाँ (पशु तस्करी) न केवल कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करती हैं, बल्कि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी खतरा पैदा करेंगी। कोर्ट ने हिरासत में लिए गए शकील मोहम्मद की हिरासत को न्यायसंगत बताया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया, “गोजातीय पशुओं में गाय और बछड़े शामिल हैं और उनकी अवैध तस्करी को हमेशा एक समुदाय द्वारा वध के उद्देश्य से ही देखा जाता है। इसलिए ऐसे समुदाय के लोगों में यह भावना है कि यह गतिविधि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है।” अदालत ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ गोवंशीय पशुओं की अवैध तस्करी के कई एफआईआर दर्ज हैं।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से समुदाय के वर्तमान जीवन की गति भी बाधित होने की संभावना है। इससे न केवल कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होगी, बल्कि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी खतरा पैदा होगा। बता दें कि शकील को मार्च 2024 में जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया था।

शकील मोहम्मद की अम्मी ने विभिन्न आधारों पर उसकी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी। शकील की अम्मी ने याचिका में दावा किया है कि शकील को बिना सोचे-समझे हिरासत में लिया गया और प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया गया। इसमें उसे हिरासत में लिए जाने के खिलाफ अपना पक्ष रखने के उसके अधिकार के बारे में सूचित करना और उसकी अपनी भाषा में पढ़ना शामिल है।

इस मामले में सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि शकील मोहम्मद एक कट्टर और आदतन अपराधी है। वह चाकू घोंपने, दंगा करने और गोवंश की तस्करी समेत कई आपराधिक वारदातों में शामिल रहा है। वकील ने दलील दी कि शकील मोहम्मद शांतिप्रिय लोगों के बीच आतंक फैलाया है और उसकी असामाजिक गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हैं।

उसकी प्रिवेटिव डिटेंशन को लेकर न्यायालय ने आर कलावती बनाम तमिलनाडु राज्य (2006) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा किया। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना गया था कि प्रासंगिक कारक हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कार्यों की प्रकृति नहीं है, बल्कि सामुदायिक जीवन या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने की उसकी क्षमता प्रासंगिक है।

न्यायालय ने पाया कि शकील की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने की संभावना थी। इसलिए उसकी निवारक हिरासत को बरकरार रखा। न्यायालय ने याचिका में लगाए गए इस आरोप में भी कोई दम नहीं पाया कि उसे हिरासत में रखने में प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया गया। कोर्ट ने पाया कि हिरासत आदेश शकील को हिंदी/डोगरी में पढ़कर सुनाया गया था, जिसे वह समझ गया।

पैंटी, पायजामा, चप्पल, अंडरवियर… सब पर छाप दी भगवान गणेश की फोटो, वॉलमार्ट ने ऑनलाइन बिक्री के लिए डाले: हिंदुओं के विरोध के बाद हटाए प्रोडक्ट

अमेरिकी रिटेल कारोबारी कंपनी वॉलमार्ट शुक्रवार (6 दिसंबर 2024) को उस समय विवादों में घिर गई, जब यह पता चला कि वॉलमार्ट ने भगवान गणेश की छवि वाले अंडरवियर और चप्पल जैसे उत्पाद बेचने शुरू किए।

यह मामला तब उजागर हुआ जब ‘तत्वम-असि’ नाम के एक लोकप्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने इस पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने लिखा, “यह अस्वीकार्य है। आप हमारे हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं कर सकते।”

‘गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ के नाम पर अपमान

तस्वीरों में दिख रहा है कि वॉलमार्ट ने ‘सेलेस्शियल गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ के तहत टॉप्स, पैंट्स, शॉर्ट्स, बिकिनी, चप्पल, मोज़े और अन्य कपड़ों पर भगवान गणेश की छवि का उपयोग किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वॉलमार्ट कम से कम 70 प्रकार के अंडरवियर, बॉक्सर, थोंग और ब्रा पर भगवान गणेश का चित्र छापकर बेच रहा था।

भगवान गणेश की छवि का अंडरवियर और चप्पल जैसे उत्पादों पर उपयोग हिंदू समुदाय के लिए अत्यधिक आक्रोश का कारण बना। सोशल मीडिया पर कई उपयोगकर्ताओं ने इसे हिंदू भावनाओं का मजाक उड़ाने वाला कदम बताया।

हिंदू कार्यकर्ता राजन ज़ेड ने वॉलमार्ट से अपील करते हुए कहा, “किसी भी धर्म के प्रतीकों का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह संवेदनशीलता और सम्मान का मामला है।”

ब्रिटेन स्थित हिंदू संगठन ‘इनसाइट यूके’ ने ट्वीट किया, “हिंदू समुदाय इस कृत्य से चिंतित है। यह हिंदू देवी-देवताओं, हमारी भावनाओं और हमारी परंपराओं के प्रति सम्मान की पूर्ण कमी को दर्शाता है।”

हिंदू संगठनों ने वॉलमार्ट के इस कदम की कड़ी आलोचना की। हिंदू जागृति संगठन ने बयान जारी किया, “श्री गणेश, जो हिंदू धर्म में अत्यधिक पूजनीय हैं, उनकी छवि को अंडरवियर, बॉक्सर, मोजे और चप्पल पर दिखाना न केवल अपमानजनक है बल्कि पूरे विश्व के हिंदुओं के लिए अस्वीकार्य है।”

अमेरिका स्थित हिंदू एडवोकेसी फ़ोरम (HAF) ने सीधे वॉलमार्ट प्रबंधन से संपर्क किया और हिंदू छवियों के अनुचित उपयोग को रोकने की माँग की। उन्होंने इसे एक गंभीर मुद्दा बताते हुए वॉलमार्ट से माफ़ी माँगने की भी माँग की।

हिंदू समुदाय और संगठनों के विरोध के बाद, वॉलमार्ट ने अपने ‘सेलेस्शियल गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ को हटा दिया। हालाँकि, स्विमसूट्स जैसे कुछ उत्पाद अब भी उपलब्ध बताए जा रहे हैं।

पहले भी कई कंपनियाँ कर चुकी हैं बदमाशी

यह पहली बार नहीं है जब किसी कंपनी ने हिंदू देवी-देवताओं का इस प्रकार दुरुपयोग किया हो। अप्रैल 2022 में, ‘सहारा रे स्विम’ नामक कपड़ों के ब्रांड ने अपने स्विमवियर कलेक्शन में हिंदू देवी-देवताओं की छवियों का उपयोग कर विवाद खड़ा कर दिया था। यह ब्रांड सहारा रे नामक एक युवा सर्फर और ‘ओनली फैंस’ मॉडल का है।

मई 2019 में, अमेज़न पर हिंदू देवी-देवताओं की छवि वाले फर्श की चटाई और टॉयलेट कवर बेचे जाने की खबर आई थी। इसे लेकर भी हिंदू समुदाय ने कड़ी नाराजगी जताई थी।

अक्टूबर 2018 में, न्यूयॉर्क के ‘हाउस ऑफ यस’ नामक नाइटक्लब में दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों को चिपकाने का मामला सामने आया। भारतवंशी अंकिता मिश्रा ने इस पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था, “दीवारों पर भगवान गणेश, सरस्वती, काली और शिव जैसे हिंदू देवी-देवताओं की छवियाँ लगी हुई थीं। यह चुप्पी की कीमत है। जब तक आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, इस प्रकार का कृत्य बार-बार होगा।”

व्यावसायिक लाभ के लिए हिंदुओं की भावनाओं को पहुँचाई जा रही ठेस

वॉलमार्ट द्वारा भगवान गणेश की छवि वाले उत्पाद बेचने की घटना हिंदू समुदाय के लिए गहरी संवेदनाओं को आहत करने वाली है। यह मामला न केवल धार्मिक असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि यह दिखाता है कि किस तरह से व्यावसायिक लाभ के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया जाता है। हिंदू संगठनों के विरोध और वॉलमार्ट द्वारा इन उत्पादों को हटाने के बाद भी, यह घटना धार्मिक भावनाओं के प्रति वैश्विक जागरूकता की कमी को उजागर करती है।