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AMU में पढ़ाई कर रहे बांग्लादेशियों ने उगला जहर, भारत-महिलाओं को लेकर लिख रहे गालियाँ: 3 छात्रों पर कार्रवाई की माँग, जाँच जारी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के 3 बांग्लादेशी छात्रों ने सोशल मीडिया पर भारत, मंदिरों और महिलाओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियाँ की। यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों ने इसकी शिकायत AMU प्रशासन और प्रॉक्टर से की है। उन्होंने माँग की है कि इन बांग्लादेशियों की पढ़ाई बंद करके, उनका वीजा रद्द किया जाए और वापस बांग्लादेश भेजा जाए।

इन तीनों इस्लामी कट्टरपंथी छात्रों की पहचान शम्युल, रिफत रहमान और महमूद हसन अराफात के रूप में हुई है। इन छात्रों की टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट भी यूनिवर्सिटी प्रशासन को शेयर किए गए हैं। AMU ने इस मामले की जाँच शुरू कर दी है और आरोपित छात्रों को नोटिस दिया गया है।

AMU के पोस्ट ग्रेजुएशन के छात्र अखिल कौशल और कुछ अन्य छात्रों ने प्रॉक्टर को एक आधिकारिक शिकायत दी है। उन्होंने कहा कि AMU में पढ़ने वाले 3 बांग्लादेशी छात्रों ने सोशल मीडिया पर भारत विरोधी और हिंदू विरोधी पोस्ट किए जबकि दो छात्रों ने भारतीय महिलाओं पर भी अश्लील टिप्पणी की है।

इन छात्रों ने ISKCON के मंदिरों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी और इस समूह को आतंकवादी संगठन बताया था। उन्होंने खुलासा किया कि बांग्लादेशी छात्रों ने उत्तर प्रदेश में गाय का गोबर खाने को लेकर टिप्पणी की। AMU के डिप्टी प्रॉक्टर नवाज अली जैदी ने बताया कि छात्रों के खिलाफ जाँच शुरू कर दी गई है।

बताया गया है कि शमउल BA की डिग्री लेने के बाद बांग्लादेश लौट गया है। वहीं महमूद हसन अराफात को BA. LLB में दाखिला मिल गया था, लेकिन उसने एडमिशन ही नहीं लिया। मौजूदा जानकारी के मुताबिक वह बांग्लादेश में है, जबकि तीसरा छात्र रिफत रहमान इस समय AMU में बीए की पढ़ाई कर रहा है। उसे नोटिस जारी कर जवाब माँगा गया है।

डिप्टी प्रॉक्टर जैदी ने बताया कि तीनों छात्रों की जानकारी AMU के बांग्लादेश स्थित एडमिशन सेंटर को भी भेज दी गई है। वहाँ से और भी जानकारी जुटाई जा रही है। इस जाँच के पूरा होने बाद इन तीनों पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। जैदी ने ऐसे काम ना करने की छात्रों को चेतावनी दी है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया एक जिम्मेदार मँच होना चाहिए और ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बीच, प्रदर्शन करने वाले छात्रों ने कहा कि अगर इन छात्रों को दंडित नहीं किया गया तो उन्हें संस्थान में घुसने नहीं दिया जाएगा। वर्तमान में AMU में बांग्लादेश के 36 छात्र पढ़ रहे हैं।

माँ सहित दोनों बेटों ने की आत्महत्या, बहू-ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान: लिखा – ‘हमको तंग किया दिमागी रूप से… मेरी मौत की सजा इसको दिलवाना साहब’

राजस्थान के जोधपुर में एक ही परिवार के तीन लोगों ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने वालों में दो युवक और उनकी माँ शामिल हैं। तीनों ने आत्महत्या करने के पहले एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। इस नोट में उन्होंने आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप बड़े बेटे की पत्नी और उसके परिजनों पर लगाया है। उन्होंने इन सबके लिए कड़ी सजा की माँग की है।

यह घटना जोधपुर के ओसियाँ की है। ओसियाँ के बिगमी गाँव में बुधवार (11 दिसम्बर, 2024) को एक घर में एक महिला भंवरी देवी (55) और उसके दो बेटों नवरत्न सिंह (27) और प्रदीप (24) के शव मिले। इन तीनों के मुंह से झाग निकल रहा था। यह शव सबसे पहले प्रदीप की मौसी के नाबालिग बेटे ने देखे। उसने इस बात की सूचना बाकी परिजनों और गाँव वालों को दी।

इसके बाद तीनों को अस्पताल ले जाया जहाँ इन्हें मृत घोषित कर दिया गया। बताया गया कि तीनों ने जहर खाकर आत्महत्या की है। इस परिवार ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। उन्होंने एक कागज पर पीड़ा व्यक्त की और साथ ही यह सुसाइड नोट व्हाट्सएप पर पुलिस को भी भेजा है।

इस सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा, “हमको तंग किया दिमागी रूप से, झूठे इल्जाम लगाए, हमारी मौत की सजा मंडला वाले लाल सिंह, हुकम सिंह, श्रवण सिंह और इनकी बेटी नीतू कंवर इन सब ने दिमागी ढंग से टॉर्चर किया है। जूते इल्जाम लगाए गए हैं, मेरी मौत की सजा इसकी पूरी फैमिली को दिलवाना साहब प्लीज।”

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि नवरत्न की शादी कुछ माह पहले ही पास के गाँव की नीतू कँवर से हुई थी। तब से ही इस पूरे परिवार को ससुरालीजन परेशान कर रहे थे। पति-पत्नी के बीच भी झगड़ा चल रहा था। इस प्रताड़ना से ही तंग आकर तीनों ने आत्महत्या कर ली।

आत्महत्या करने वाले दोनों भाई एक फाइनेंस कंपनी में काम करते थे। पुलिस ने तीनों शवों का पोस्टमार्टम करने के लिए भेज दिया और और मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने कहा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद वह स्पष्ट तौर पर कारण बता पाएँगे।

पिता को जेल से छुड़ाना है तो दो ₹5 लाख… महाराष्ट्र के सतारा में ACB ने जज को रिश्वतखोरी में किया गिरफ्तार: 2 बिचौलिए समेत 4 हिरासत में

महाराष्ट्र के सतारा में रिश्वत लेने के आरोप में न्यायाधीश धनंजय निकम की गिरफ्तारी हुई है। खबर के अनुसार, सतारा भ्रष्टाचार निरोधक विभाग ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश धनंजय निकम समेत 4 लोगों को 5 लाख रुपए की रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार किया है।

न्यायाधीश को लेकर शिकायत दी गई थी कि उन्होंने शिकायतकर्ता के पिता को जमानत देने के लिए रिश्वत माँगी थी। बाद में पुलिस ने उन्हें होटल में जाल बिछाकर रंगे हाथ पकड़ा। अब मामले को दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने इस मामले में 11 दिसंबर 2024 को एफआईआर दर्ज की। आरोप के अनुसार, धनंजय निकम ने दो बिचौलियों, किशोर खरात और आनंद खरात, के माध्यम से शिकायतकर्ता से पैसे की माँग की थी।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने एसीबी से संपर्क किया और बताया कि उसके पिता को जमानत देने के लिए रिश्वत माँगी गई। एसीबी ने अपनी जाँच शुरू की और आरोप को सच पाया। इसके बाद उन्होंने न्यायाधीस समेत 4 को गिरफ्तार किया।

गौरतलब है कि इससे पहले महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एक ठेकेदार से तीन लाख रुपए की रिश्वत माँगने और स्वीकार करने के आरोप में बीएमसी के एक सहायक अभियंता को गिरफ्तार किया था। एक अधिकारी ने इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए बताया, “ठेकेदार ने बाबासाहेब अंबेडकर रोड और रेय रोड रेलवे स्टेशन के पास शौचालय निर्माण के लिए मंजूरी के लिए आवेदन किया था। एसीबी के जाल में उसे ठेकेदार से तीन लाख रुपए लेते हुए पकड़ा गया।”

इसके अलावा राजस्थान में भी सतारा जैसी घटना सामने आई थी। वहाँ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मंगलवार को झुंझुनू में एक मजिस्ट्रेट को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह कथित तौर पर 2 लाख रुपए की रिश्वत और एक महंगा डिनर सेट ले रहा था

दूसरे के साथ फरार हुई बीवी, निचले कोर्ट ने पति को दिया मुआवजा, केरल हाई कोर्ट ने पलटा फैसला: कहा- पत्नी की ‘एडल्ट्री’ मुआवजे का आधार नहीं

केरल में हाल में एक मामला सामने आया जहाँ एक पीड़ित पति ने फैमिली कोर्ट से ये कहकर मुआवजा माँगा था कि उसकी बीवी भाग गई है। फैमिली कोर्ट ने उसकी माँग को मान भी लिया। हालाँकि जब ये केस केरल हाई कोर्ट में पुनर्विचार के लिए पहुँचा तो न्यायधीशों द्वारा फैसला पलट दिया गया। उच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी के व्यभिचार को मुआवजे का आधार नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, केरल हाईकोर्ट के जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एमबी स्नेहलता ने इस केस की सुनवाई की और कहा कि पत्नी के पति को छोड़कर भागने पर मुआवजा नहीं दिया जा सकता है।अदालत ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संबंधों में होने वाले विवादों को कानूनी रूप से मुआवजे के रूप में नहीं देखा जा सकता है।

केरल उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि शादी एक संवैधानिक अधिकार है। इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपने साथी के साथ संबंध समाप्त करता है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ भाग जाता है, तो इसे कानूनी रूप से दंडनीय नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विवाह और व्यक्तिगत संबंधों में कई जटिलताएँ होती हैं और इनका समाधान कानूनी प्रक्रिया द्वारा नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों को सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर सुलझाने की आवश्यकता होती है।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि तलाक (संशोधन) एक्ट,2001 के बाद सेक्शन 34 को भारतीय तलाक अधिनियम से हटा दिया गया जो व्यभिचार पर हर्जाने की देने की अनमुति देता था। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि इस बात के भी कोई साक्ष्य नहीं हैं जिससे कि ये पता चल सके कि पत्नी की हरकत से पूर्व पति को कोई मानसिक पीड़ा हुई है इसलिए न्यायलय मुआवजा देने वाले फैसले को खारिज करता है।

क्या था मामला

गौरतलब है कि इस मामले में पीड़ित पुरुष ने कोर्ट में कहा था उसकी पत्नी ने उसके साथ धोखा किया और दूसरे व्यक्ति के साथ भाग गई। पति के अनुसार, उसकी पूर्व पत्नी अपने साथ सोना और पैसा भी लेकर गई थी। ऐसे में उसने याचिका में 20 लाख रुपए के मुआवजे का दावा किया और सोना व नकदी वापस माँगा था। फैमिली कोर्ट ने तब सुनवाई करते हुए सोना और नकदी वाली माँग को खारिज कर दिया था और 4 लाख मुआवजा देने के लिए आदेश पारित किया था। फैमिली कोर्ट ने माना था कि घटना से पति को मानसिक और भावनात्मक नुकसान हुआ है इसलिए मुआवजा मिलना चाहिए।

पत्थर वाले संविधान पर बवाल, इंसान को तालिबानी आतंकियों की तरह मारा: महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर-आगजनी, कलेक्टर ऑफिस में भी तोड़फोड़

महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर से बनाई गई संविधान की किताब को एक शख्स ने क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद उस शख्स को भीड़ ने बुरी तरीके से पीटा। दावा किया गया कि उसके चेहरे पर पैर रखा गया और उसकी लाठियों से सैकड़ों लोगों के सामने पिटाई हुई। मामला यहीं नहीं रुका बल्कि भीड़ ने परभणी के बाजार में दुकानों और गाड़ियों पर हमला किया और पत्थर बरसाए। महिलाओं की एक भीड़ कलेक्टर ऑफिस में घुसी और यहाँ भी पत्थर चलाए। कुछ महिलाओं ने कलेक्टर के सामने ही हंगामा काट दिया। हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई की है।

यह पूरा बवाल मंगलवार (10 दिसम्बर, 2024) को चालू हुआ। यहाँ परभणी रेलवे स्टेशन के बाहर लगाई गई डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की एक प्रतिमा के पास ही पत्थर की ही संविधान की एक किताब लगाई गई थी। इसे सोपन पवार नाम के एक शख्स ने कथित तौर पर क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद इसे भीड़ ने पकड़ लिया और बुरी तरीके से पीटा। इसी घटना का कथित वीडियो वायरल है। इसमें दिखता है कि एक शख्स जमीन पर पडा है और उसके चेहरे पर एक शख्स ने पैर रखा हुआ है। इसके बाद एक और शख्स उसे लाठियों से पीटता है।

संविधान की प्रतिकृति पर हमला के आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हालाँकि, उसकी गिरफ्तारी के बाद भी परभणी में हिंसा हुई। मंगलवार और बुधवार दोनों दिन अम्बेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने रैलियाँ निकाली। बुधवार (11 दिसम्बर, 2012) को परभणी में सड़क पर आई भीड़ ने आगजनी की। उन्होंने सड़क पर टायर जलाए। कुछ दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। यहाँ कड़ी गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया है। कुछ लोग नीले झंडे और लाठी-डंडे हाथ में लिए नजर आए। इस प्रदर्शन में कुछ हरे झंडे और टोपी वाले लोग भी दिखे।

विरोध प्रदर्शन करने वाली कुछ महिलाएँ इस दौरान परभणी के कलेक्टर ऑफिस में घुस गईं। कलेक्टर के ऑफिस में तोड़फोड़ की गई और उनके सामने भी हंगामा किया गया। कुछ महिलाएँ यहाँ कार्रवाई की माँग को लेकर काफी उत्तेजित हो गईं। इसके बाद उन्हें बाहर ले जाया गया।

इसका एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। मामले में पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाने के लिए निषेधाज्ञा लागू कर दी है। कहीं-कहीं पुलिस को एक्शन भी लेना पड़ा है। मामले में दलित नेताओं ने कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने अभी तक 40 लोगों को इस हिंसा के संबंध में गिरफ्तार किया है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मामले में बयान दिया है। मायावती ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “महाराष्ट्र राज्य के परभणी में स्थित भारतरत्न बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा एवं संविधान का किया गया अपमान अति-निन्दनीय व शर्मनाक। इस घटना से पार्टी काफी दुःखी व चिन्तित भी है। वहाँ की राज्य सरकार, ऐसे जातिवादी व असामाजिक तत्वों के विरुद्ध तुरन्त सख़्त क़ानूनी कार्रवाई करे, वरना वहाँ हालात् काफी बिगड़ सकते हैं। सभी से शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने की अपील।”

रमजान (‘शांति’ का महीना) में नमाज कर निकली भीड़ ने बुद्ध-महावीर की तोड़ी थी मूर्तियाँ, अखिलेश सरकार ने कोर्ट को बताया था ‘मनोरंजन’ के लिए थीं प्रतिमाएँ

मुस्लिमों का एक कॉन्सेप्ट है। इसका नाम है ‘उम्माह’, वैसे तो इसका अर्थ होता है राष्ट्र, लेकिन इसका प्रैक्टिकल मतलब होता है कि पूरी दुनिया के मुस्लिम एक हैं। यानि सूडान का मुस्लिम बांग्लादेश के मुस्लिम का साथ देगा, क्योंकि वह उसका इस्लामी भाई है। इसी के चलते 1920 के दशक में जब तुर्की में खलीफा को हटाया गया, तो भारत में मुस्लिमों ने विद्रोह कर दिया। यह कोई अकेली ऐसी घटना नहीं है। भारत लगातार ऐसी घटनाएँ देखता आया है। ऑपइंडिया आपके लिए 2012 की ही एक ऐसी घटना की कहानी लाया है।

यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ा हुआ है लेकिन इसके तार असम-म्यांमार तक जुड़े हुए हैं। घटना 2012 की है। इसकी शुरुआत होती है लखनऊ से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर असम और म्यांमार से। म्यांमार में रोहिंग्या और बौद्धों के बीच लड़ाई होती है। म्यांमार की फ़ौज रोहिंग्याओं को भागने पर मजबूर कर देती है। रोहिंग्याओं के गाँव जलाए जाते हैं। दूसरी तरफ असम में मुस्लिम 4 बोडो लड़कों को मार देते हैं। इससे दोनों समुदाय में दंगा भड़कता है। असम जल उठता है। कुछ मुस्लिम भी मारे जाते हैं।

इससे पूरे देश में रहने वाला मुस्लिम गुस्सा हो जाता है। रमजान के ‘पवित्र’ महीने के अंतिम जुमे की नमाज, यानि अलविदा की नमाज के बाद एक विरोध प्रदर्शन का ऐलान होता है। मुस्लिमों के जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठन कहते हैं कि असम और म्यांमार में मुलिमों पर जुल्म हो रहा है जिसके खिलाफ हर एक मुस्लिम सड़क पर उतरेगा। यहाँ भी उम्मा का कॉन्सेप्ट लगाया जाता है। ये तारीख थी 17 अगस्त, 2024। दिन तो पहले ही बता दिया गया है कि शुक्रवार।

फोटो साभार: The Hindu

नमाज के बाद हजारों मुस्लिमों की भीड़ सड़कों पर उतरती है। यह पूरी कार्रवाई लखनऊ की टीले वाली मस्जिद से चालू हुई। मुस्लिम भीड़ ने इस मस्जिद से निकलने के बाद तोड़फोड़ चालू की। रोड पर जो दिखा, उसके साथ बदतमीजी की। इसके बाद ये भीड़ इसी इलाके में बने महावीर पार्क (जिसे हाथी पार्क के तौर पर जाना जाता है) में घुसी। यहाँ इसने महावीर स्वामी की मूर्ति क्षतिग्रस्त की। उनकी मूर्ति के साथ बर्बरता की गई।

भगवान महावीर की यह 9 फीट ऊँची पद्मासन प्रतिमा 25 अप्रैल, 2002 को स्थापित की गई थी। तब उत्तर प्रदेश सरकार ने भगवान महावीर की 2600वीं जयंती के अवसर पर यह प्रतिमा स्थापित की थी। पहले हाथी पार्क के नाम से मशहूर इस पार्क का नाम बदलकर भगवान महावीर पार्क कर दिया गया था। भगवान महावीर की प्रतिमा को आचार्य 108 श्री विवेकसागरजी महाराज और अन्य जैन साधुओं के नेतृत्व में जैन समुदाय के सदस्यों द्वारा जुलूस के रूप में लाया गया था। लेकिन जिन जैनों का इस हिंसा से कोई लेना-देना तक नहीं था उनको भी निशाना बनाया गया।

इसी के साथ भीड़ बुद्धा पार्क में भी घुसी। यहाँ इस भीड़ ने बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। टोपी लगे हुए युवाओं ने ध्यान की मुद्रा में बैठे बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। लोहे के डंडे और साइन बोर्ड से उनकी मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की गई। इस पूरे वाकये की तस्वीरें आज भी जब तब सामने आती हैं। बुद्ध पर होते इस हमले को देखकर आपको अफगानिस्तान के बामियान की याद आ जाएगी। वहाँ भी तालिबान (वैसे तो तालिब का मतलब छात्र होता है, लेकिन यहाँ आतंकी से है) वालों ने बुद्ध की मूर्तियों को विस्फोटक लगा कर उड़ा दिया था।

ये सब काम वहाँ हो रहा था जहाँ पर इस देश के सबसे बड़े सूबे की सरकार बैठती है। लेकिन सरकार भला उन पर क्यों कर एक्शन लेने लगती। क्योंकि सरकार थी समाजवादी पार्टी की। उसके मुखिया थे अखिलेश यादव। ये वही अखिलेश यादव थे, जिनके राज में बरेली में कांवड़ यात्रा के डीजे बंद हो जाते थे। जब पूरे दिन मुस्लिम भी ने खूब तबाही मचा ली, तब जाकर कहीं पुलिस ने उनको तितर बितर किया। इस हिंसा के बाद जैन और बुद्ध समाज ने प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि आखिर उनके आराध्य का इसमें क्या दोष था।

लेकिन जैन समाज के साथ मजाक यहीं तक नहीं सीमित था। जब हाई कोर्ट में इस बात के लिए याचिका डाली गई कि सरकार उन लोगों पर कार्रवाई करे जिन्होंने महावीर स्वामी की मूर्ति तोड़ी और नई मूर्ति भी लगवाए तो अखिलेश सरकार ने चौंकाने वाला जवाब दिया। अखिलेश सरकार के नौकरशाह ने हाई कोर्ट को कहा कि साहब वो उन मूर्तियों का कोई ख़ास धार्मिक महत्त्व थोड़े था, वो तो हमें सैर-सपाटे के लिए आने वालों की मौज के लिए लगाई गईं थी। अखिलेश सरकार के दूसरे नौकर शाह ने यह तक कह दिया कि साहब मूर्ति टूटी ही नहीं।

इस पर कोई ने फटकार लगाई। इसके बाद कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मूर्तियाँ या तो रिपेयर करवाओ या फिर नई लगवाओ। सरकार ने भरोसा दिया कि लगवाएँगे लेकिन जब कई दिनों तक कार्रवाई नहीं हुई, तब फिर कोर्ट ने फटकारा। कोर्ट ने 2017 में सरकार को इस बात पर भी फटकार लगाई कि आखिर उन लोगों पर क्या कार्रवाई हुई है जिहोने यह मूर्तियाँ तोड़ी थी। इस पर भी तब की सरकार ने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया।

लेकिन ये सब कहानी अब क्यों बताई जा रही है? दरअसल, इस मामले में जिन लोगों ने जनहित याचिका लगाई थी उनके वकील थे हरि शंकर जैन। हरि शंकर जैन के ही बेटे विष्णु शंकर जैन अब संभल में लड़ाई लड़ रहे हैं। उनको धमकियाँ दी जा रही हैं, मुस्लिमों से कहा जा रहा है कि उनका चेहरा पहचान लें। उन्होंने इस मामले में शिकायत भी दर्ज करवाई है। उन्होंने इस लखनऊ वाले मामले की याद भी लोगों को दिलाई है। उन्होंने कोर्ट का वह आदेश साझा किया है।

जिस हिंदू बच्ची का पाकिस्तान में हुआ जन्म, वो भारत आकर बनी डॉक्टर, CAA के कारण बदली किस्मत: अब तक 1222 लोग बने हिंदुस्तानी

गुजरात के अहमदाबाद में पिछले 20 साल से रह रहे 56 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के चलते भारत की नागरिकता मिली। खुद गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने 11 दिसंबर को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें नागरिकता के प्रमाण प्रत्र सौपें। इस अवसर पर, गृह राज्य मंत्री ने सभी नए नागरिकों को बधाई दी और कहा, “मुस्कुराइए, अब आप इस महान देश भारत के नागरिक हैं।”

बता दें कि इन 56 पाकिस्तानी नागरिकों में से एक प्रमुख नाम हिशा कुमारी का है। हिशा का जन्म साल 1998 में पाकिस्तान में हुआ था। वह 2013 में अपने परिवार के साथ भारत आईं और यहाँ आकर 8वीं से आगे की पढ़ाई की। 2017 में उनका एडमिशन अजमेर के मेडिकल कॉलेज में हुआ और अब वह पढ़ाई पूरी करके निकल चुकी हैं।

हिशा भारत की नागरिकता मिलने पर कहती हैं- “मुझे मेरी पहचान लौटाने के लिए देश के पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह का आभार। ये नागरिकता मिलने के बाद मैं कहीं भी अप्लाई कर सकती हूँ।” उन्होंने नागरिकता मिलने पर अपने प्रमाण पत्र के साथ अपनी तस्वीर भी दिखाई और बोलीं कि भारत का नागरिक होने पर गर्व महसूस हो रहा है।

गौरतलब है कि साल 2017 से मार्च 2024 तक के बीच में मोदी सरकार 1167 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता का प्रमाण पत्र दे चुकी है और इन 55 लोगों को मिलाकर ये संख्या 1222 पहुँच गई है। राज्य गृहमंत्री हर्ष संघवी ने भी इस बाबत जानकारी दी कि पिछले छह महीनों में अकेले गुजरात में 50 से अधिक पाकिस्तानी हिंदुओं को यह प्रमाणपत्र मिला है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले इन लोगों को दिल्ली जाकर लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही उनकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है।

ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित मासूम बच्ची को ठीक करने का झाँसा, चर्च में रखा 40 दिन: अंधविश्वास के चक्कर में 8 साल की दलित लड़़की की मौत

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में अंधविश्वास के चक्कर में 8 साल की एक दलित बच्ची की जान चली गई। पीड़िता का नाम भव्यश्री है, जिसे ब्रेन ट्यूमर था। उसके ब्रेन ट्यूमर का इलाज करने का दावा कर उसे 40 दिनों तक चर्च में रखा गया था। इस दौरान इलाज के बजाय पीड़िता से मज़हबी क्रिया-कलाप करवाए गए। पादरी ने पीड़ित परिवार को ‘सब सही हो जाएगा’ जैसे झाँसे दिए। आखिरकार भव्यश्री ने सोमवार (9 दिसंबर 2024) को दम तोड़ दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना नेल्लोर के कालुवई की है। यहाँ की दलित बस्ती के एक गरीब परिवार में 8 वर्षीया भव्यश्री एक बहन और एक भाई के साथ रहती थी। पिछले कुछ दिनों से भव्यश्री की तबीयत खराब चल रही थी। भव्यश्री को अक्सर उल्टियाँ होती थीं और सिर में दर्द रहता था। परिजनों ने जाँच करवाई तो बच्ची को ब्रेन ट्यूमर निकला। डॉक्टरों ने सर्जरी कराने के लिए कहा, जिसका इलाज काफी ज्यादा था।

भव्यश्री के पिता लक्ष्मैया और माँ लक्ष्मी को कुछ रिश्तेदारों ने इलाज कराने के बजाय चर्च में झाड़-फूँक कराने की सलाह दी। इस सलाह पर यकीन करके लक्ष्मैया और लक्ष्मी अपनी बेटी को लेकर अडुरपल्ली के एक चर्च में गए। यहाँ चर्च के स्टाफ और पादरी ने झाँसा दिया कि प्रार्थना करने से बीमारी ठीक हो जाएँगी। पीड़ित परिवार ने उनकी बातों पर यकीन कर लिया।

पीड़िता को चर्च में ही रोककर उससे तमाम ईसाई क्रिया-कलाप शुरू कराए जाने लगे। हालाँकि, इससे भव्यश्री की तबीयत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई। लगभग 40 दिनों तक भव्यश्री के माता-पिता अपनी बेटी को लेकर चर्च में पादरी द्वारा बताए गए तामझाम करते रहे। तबीयत बिगड़ने के बजाय वहाँ सब ठीक हो जाने का झाँसा दिया जाता रहा। आखिरकार सोमवार (9 दिसंबर) को भव्यश्री ने दम तोड़ दिया।

आत्महत्या किए अतुल सुभाष के साले और सास का वायरल वीडियो, मीडिया को दे रहे केस की धमकी: निकिता का वकील बोला- कोर्ट इज़ राइट

बेंगलुरु में बीवी और ससुराल वालों की प्रताड़ना से मजबूर होकर एक MNC कम्पनी में काम करने वाले अतुल सुभाष ने आत्महत्या कर ली थी। इस मामले में उनकी पत्नी निकिता सिंहानिया के परिजनों ने अब मीडिया को भी धमकाया है। मीडिया अतुल के ससुराल वालों से उनका पक्ष जानने पहुँची थी। उन्होंने इस बीच मीडिया को कैमरा बंद करने और उन पर भी मुकदमा ठोंकने की धमकी दे दी। निकिता सिंहानिया के वकील ने इस बीच कोर्ट और घूस माँगने की आरोपित महिला जज का बचाव किया है।

अतुल सुभाष की आत्महत्या का मामला सोशल मीडिया और मीडिया पर छाने के बाद कुछ पत्रकार जौनपुर स्थित निकिता सिंहानिया के घर पर पहुँचे थे। यहाँ पर मौजूद निकिता की माँ और उसके भाई ने पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। उन्होंने अतुल की आत्महत्या के संबंध में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। उन्होंने कैमरे पर पत्रकारों से बात भी नहीं की। जब पत्रकारों ने उनसे कैमरे पर बोलने को कहा तो वह इस मामले में भी मुकदमा करने की धमकी देने लगे। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।

वहीं इस मामले में निकिता सिंहानिया के वकील दिनेश कुमार मिश्रा ने मीडिया से कहा है कि अतुल सुभाष ने इस मामले में जज रीता कौशिक को दोषी बताया है जो सही नहीं है। वकील दिनेश कुमार मिश्रा ने बताया कि अतुल सुभाष की सैलरी लगभग ₹84000 थी, इसमें से ₹40000 उन्हें भरण पोषण देने का आदेश दिया गया था। दिनेश मिश्रा ने कहा कि अगर अतुल को यह सही नहीं लगा तो वह ऊँची अदालत में जा सकते थे। उन्होंने कहा कि कोर्ट इस मामले में सही है।

वकील दिनेश मिश्रा ने अतुल सुभाष द्वारा जज रीता कौशिक पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा कि जज एकदम सही हैं और हम उनके साथ काम करते हैं। वकील दिनेश मिश्रा ने बताया है कि ऐसे मामले में जो साधारण प्रक्रिया होती है, वही अपनाई गई थी। उन्होंने इस बात पर इनकार किया कि कोर्ट की प्रक्रिया और प्रताड़ना के कारण आत्महत्या करना सही था। उन्होंने कहा कि बाकी अगर कोई मामला हुआ होगा तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।

गौरतलब है कि हाल ही में अतुल सुभाष ने सोमवार (10 दिसम्बर, 2024) को आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने इससे पहले 24 पन्नों का एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था। इसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह उनकी पत्नी और उसके परिजनों ने उनको परेशान किया और उनके बेटे से भी नहीं मिलने दिया। उनकी पत्नी इस तरह प्रताड़ित करती थी कि 4 साल के अपने बेटे को बाप से बात भी नहीं करने देती थी। उन्होंने बताया था कि वह 2 वर्ष में 120 बार केस के लिए जौनपुर जा चुके थे और वित्तीय के साथ ही मानसिक रूप से परेशान थे।

इस मामले में निकिता सिंहानिया और उनके परिजनों के खिलाफ एक केस दर्ज किया गया है। मामले में बेंगलुरु पुलिस भी उत्तर प्रदेश पूछताछ करने के लिए जा रही है।

गोतस्करी में अचानक क्यों आने लगे हिंदुओं के भी नाम?: षड्यंत्र के पीछे कई सरगना, कहीं डिफेंस लाइन के तौर पर इस्तेमाल, कोई ₹200 देकर नाबालिग हिंदुओं का कर रहा ब्रेनवॉश

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में पुलिस ने 8 दिसंबर 2024 को गोतस्करों के एक गिरोह को पकड़ा। इसका सरगना उमर था, जो हिन्दू के वेश में गोहत्या का रैकेट को चला रहा था। वह गले में भगवा गमछा रखता, माथे पर तिलक लगाता और हाथ में त्रिशूल रखता था। उसे देखकर लोग उसे हिन्दू संत समझते थे। इस दौरान गोतस्करी के कई ऐसे रैकेट का खुलासा हुआ, जिसमें आरोपित हिन्दू समुदाय के हैं।

गाय को माँ मानने वाले हिन्दुओं की गोकशी में गिरफ्तारी आम लोगों के लिए बेहद नया और चौंकाने वाली घटना है। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं की बारीकी से पड़ताल की और इन घटनाओं के तमाम पहलुओं को खंगाला गया। इस पड़ताल में तमाम ऐसे कारणों का खुलासा हुआ, जो कई अनसुलझे सवालों का जवाब देते हैं।

क्या कहते हैं सरकारी आँकड़े

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले को लिया जाए तो गौवध अधिनियम में दर्ज केसों में हिन्दुओं की संलिप्तता का प्रतिशत लगभग 15 है। साल 2024 में जनवरी से नवंबर तक पूरे जिले के विभिन्न थानों में गौवध अधिनियम के कुल 27 केस दर्ज हुए हैं। इसमें 4 मुकदमों में हिन्दू समुदाय के आरोपित नामजद किए गए हैं।

ये मुकदमे बुढ़ाना, नई मंडी और चरथावल पुलिस स्टेशनों में दर्ज हुए हैं। ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी में यह भी निकल कर आया कि इन मुकदमों में हिन्दू आरोपितों की संलिप्तता कटे मांस के ट्रांसपोर्ट करने, जीवित गायों को वाहनों में एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने तथा गायों की खरीद-बिक्री करने जैसे कामों में पाई गई है।

एक संदिग्ध की गलती से कई हिन्दू फँसे

गोतस्करी में हिन्दुओं की संलिप्तता का सबसे चर्चित मामला हाल ही में नोएडा से सामने आया था। 9 नवंबर 2024 को ग्रेटर नोएडा में गोरक्षकों के सहयोग से नोएडा पुलिस ने गोमांस की एक बड़ी खेप बरामद की थी। इससे एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसमें गाय पश्चिम बंगाल में काटी जाती थी और उसका मांस कंटेनर में भरकर नोएडा लाई जाती थी। यहाँ इसे एक कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता था।

फिर इस मांस को दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखंड सहित कई जगहों पर सप्लाई की जाती थी। पुलिस ने 185 टन गोमांस बरामद किए जाने की बात कही है। एक अनुमान के मुताबिक, इतना मांस कम-से-कम 8-10 हजार गायों को काटकर जमा किया गया होगा। जिस ट्रक में ये मांस नोएडा लाया गया था, उसे शिव शंकर चला रहा था, जबकि ट्रक में खलासी सचिन था। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

जिस जगह यह गोमांस रखा गया था, उस कोल्ड स्टोरेज का मालिक पूरन जोशी और मैनेजर अक्षय सक्सेना है। जिस कंपनी के जरिए ये गोमांस सप्लाई होती थी, उसके डायरेक्टर मोहम्मद खुर्शिदुन नबी को इन दोनों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। जाँच के दौरान पुलिस को इस केस में शोएब हक्कानी के साथ अविनाश कुमार और राकेश सिंह की मिलीभगत की जानकारी हुई थी।

ये तीनों टोरो प्राइमरी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कम्पनी में स्टाफ हैं। इस कम्पनी पर कोल्ड स्टोरेज में रखे गए गोमांस की खरीद-फरोख्त का आरोप है। इस घटना का खुलासा करने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले गौरक्षक वेद नागर ने ऑपइंडिया से बात की। वेद ने हमें बताया कि पैसों के लालच में पूरन जोशी नामक प्रमुख आरोपित ने बाकी सभी हिन्दुओं को अपने अपराध में बलि का बकरा बना डाला है।

उन्होंने बताया कि ट्रक ड्राइवर शिव शंकर और खलासी सचिन को पता ही नहीं था कि जिस ट्रक को वो ला रहे हैं उसमें क्या लोड किया गया है। पश्चिम बंगाल में गोमांस की लोडिंग के समय भी इन दोनों को कहीं बहाने से भेज दिया जाता था और लोड हो जाने के बाद उन्हें बुला लिया जाता था। इसके बाद उन्हें एक मैप देकर उसके अनुसार चलने के लिए कह दिया जाता था।

वेद नागर का दावा है कि कोल्ड स्टोरेज के मालिक पूरन जोशी के इंटरनेशनल गोतस्करों से रिश्ते हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि पूरन जोशी ने इस्लाम कबूल कर लिया है। नागर का कहना है कि खुद को हिन्दू कहने वाला व्यक्ति गोमांस की तस्करी नहीं कर सकता है। इस मामले में गिरफ्तार अन्य हिन्दुओं को नागर ने पूरन जोशी का सहयोगी भर बताया हैं, जिन्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था।

नैतिकता और संस्कारों में कमी बन रही वजह

UP के बाराबंकी जिले में पड़ने वाले सतरिख थानाक्षेत्र में पुलिस ने सोमवार (9 नवंबर 2024) को मुठभेड़ के बाद 7 गोतस्करों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपितों के पास से चाकू, तमंचे, वाहन आदि बरामद हुए थे। इन 7 गोतस्करों में सरवर, गुफरान, मोहम्मद उमर, नबीजान और मोहम्मद अजीज के अलावा अंकुल गुप्ता नाम का एक युवक भी था। इन आरोपितों ने पुलिस पर गोली भी चलाई थी।

ऑपइंडिया ने इस मामले में निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी वेदमूर्तिनंद सरस्वती से बात की। स्वामी वेदमूर्तिनंद ने बताया कि वर्तमान समय में हिन्दुओं के घरों में अभिभावक अपने बच्चों को मॉर्डन बनाने के चक्कर में संस्कारों से दूर करते जा रहे हैं। कालांतर में वही संतानें गोहत्या जैसे पापों में शामिल हो रही हैं जिनके माता-पिता ने उनको कभी धर्म, गाय, गंगा और गीता आदि की शिक्षा नहीं दी।

स्वामी वेदमूर्तिनंद ने हमें आगे बताया कि वो गोहत्या और गोवंश की तस्करी में बढ़ रही हिन्दुओं की संख्या से चिंतित हैं और आगामी महाकुंभ में तमाम साधु संतों के साथ वे इस मुद्दे पर गहन मंथन करेंगे। उन्होंने कहा कि इस मंथन के बाद साधु-संत इस मामले में किसी समाधान की तरफ बढ़ेंगे।

लग्जरी जीवन की चाह में पाप

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में अक्टूबर 2024 में पुलिस ने गोतस्करी के एक रैकेट का खुलासा किया था। इस रैकेट में प्रताप मौर्य व उसका भाई बबलू शामिल पाए गए थे। ये दोनों देवरनियाँ थाना क्षेत्र के शरीफनगर गाँव के एक गोशाला के केयरटेकर थे। आरोप है कि इस गोशाला से गोहत्या के लिए गायें भेजी जाती थीं। इनके खरीदारों में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोग थे।

पुलिस ने इन दोनों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। आरोपितों में कुछ मुस्लिम भी थे, जो गायों को काटने का काम करते थे। इनकी गिरफ्तारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बरेली के विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी हिमांशु पटेल से ऑपइंडिया ने बात की। हिमांशु ने बताया कि लम्बे समय से इस नेटवर्क पर उनकी नजर थी। प्रताप और बबलू गोशाला से 2-3 हजार रुपया प्रति गाय बेच देते थे।

इन गायों में अधिकतर बीमार और बूढ़े गोवंश होते थे, जिन्हें मुस्लिम समुदाय के कसाई जंगलों में ले जाकर उन्हें काट देते थे। जब हमने हिमांशु पटेल से प्रताप मौर्य और उसके भाई बबलू की गोतस्करी में मिलीभगत की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि प्रताप और बबलू लग्जरी लाइफ के शौकीन थे। कुछ पैसों के लालच में वे गोहत्या जैसे अपराध में शामिल हो गए।

हिमांशु ने आगे बताया कि दोनों आरोपित भाई आर्थिक रूप से कमजोर थे। वे गौशाला में काम करते थे और इन दोनों को 6 से 7 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था। हालाँकि, महंगे शौक ने इन्हें हिन्दू विरोधी अपराध की तरफ धकेल दिया। बकौल हिमांशु पटेल, वो और उनका संगठन गोतस्करी में शामिल हर वर्ग, मत और मज़हब के व्यक्ति को एक ही जैसी सजा की माँग करता है।

गोतस्करी में डिफेंस लाइन के तौर पर हिन्दुओं का इस्तेमाल

ऑपइंडिया ने हैदराबाद से भाजपा विधायक टी राजा सिंह से बात की। टी राजा सिंह ने हमें बताया कि गोहत्या की जड़ में चरमपंथी मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं, लेकिन वो बेहद गरीब हिन्दुओं को लालच देकर उन्हें अपनी डिफेन्स लाइन के तौर पर प्रयोग में लाते हैं। राजा सिंह का कहना है कि गोतस्करी में उन्हीं हिन्दुओं को लगाया जा रहा है, जो गाय के महत्व को नहीं जानते और बेहद गरीब होते हैं।

राजा सिंह ने बताया कि तस्करी में इस्तेमाल ट्रक ड्राइवर और क्लीनर के साथ-साथ लेबर भी हिन्दू होते हैं। उन्होंने इसे पकड़े जाने पर मारपीट आदि से बचने के लिए मुस्लिम तस्करों द्वारा अपनाई जा रही डिफेंस लाइन बताया। तेलंगाना का जिक्र करते हुए राजा सिंह ने कहा कि हिन्दुओं को गलत साबित करने की सोच में कई बार मुस्लिम लोग बकरीद में गरीब हिंदू से ही गाय की कुर्बानी तक करवा देते थे।

गोवंश के खिलाफ राजनैतिक बयानबाजी फैला रही नफरत

भाजपा विधायक राजा सिंह ने गोतस्करी में कुछ हिन्दुओं के शामिल होने की वजह विपक्षी दलों के नेताओं की बयानबाजी बताया है। अखिलेश यादव का उदहारण देते हुए राजा सिंह ने कहा कि वो आए दिन सड़क से लेकर संसद तक बेसहारा गायों को ही देश की सबसे बड़ी समस्या बता रहे हैं। इससे उनकी बातों पर जरा-सा भी विश्वास करने वाले हिन्दुओं में गोमाता के प्रति नफरत का भाव जगता है।

राजा सिंह ने अखिलेश यादव को डिब्बे का दूध पीने वाला बताते हुए लोगों से उनकी बातों पर ध्यान नहीं देने की भी अपील की है। उन्होंने हमें बताया कि कोई भी हिन्दू गोहत्या को जायज नहीं बताता है। वह गाय को माँ मानता है और उसे काटने वाले को अपने धर्म का शत्रु मानता है। बकौल राजा सिंह, कुछ हिन्दुओं को मोहरा बनाकर पूरे समुदाय पर अंगुली उठाने की साजिश रचने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होंगे।

गोतस्करी में शामिल हिन्दुओं पर पुलिसकर्मियों के मत

ऑपइंडिया ने गोतस्करी हिन्दुओं के शामिल होने की वजह की पड़ताल में कुछ रिटायर्ड और वर्तमान पुलिसकर्मियों से बात की। नाम नहीं छापने की शर्त पर पुलिसकर्मियों ने साफ तौर पर कहा कि गोतस्करी में हिन्दुओं के शामिल होने की मूल वजह उनका लालच है। हालाँकि, उन सभी ने यह भी कहा कि हिन्दुओं की अधिकतम मिलीभगत गायों को यहाँ से वहाँ ले जाना तक ही सीमित है।

इसी वजह से अधिकतर ड्राइवर, खलासी व उनके कुछ अन्य सहयोगी पुलिस द्वारा साजिश में शामिल मानकर पकड़े जाते हैं। एक पुलिस इंस्पेक्टर ने ऑपइंडिया को यह भी बताया कि हिंदुओं के सामाजिक ताने-बाने में गोहत्यारा को कभी स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में लिस्टेड गोतस्कर एक साजिश के तहत अपने साथ में हिन्दू समाज के किसी व्यक्ति को शामिल करने की पूरी कोशिश करते हैं।

पुलिस ने इंस्पेक्टर ने आगे बताया कि गोस्तकरों के साथ अगर कोई हिंदू रहेगा तो लोग उस पर शंका नहीं करेंगे। अगर शंका करके पकड़ भी लिए तो केस दर्ज होने में मुश्किल आएगी। एक पुलिसकर्मी का यह भी कहना है कि कई बार गोतस्कर ही अपने क्षेत्र में सक्रिय गोरक्षकों को कानूनी जाल में फँसाने के लिए उनका नाम ले लेते हैं। इस तरह के आरोप जाँच के बाद झूठे भी पाए जाते हैं।

गोतस्करी के लिए नाबालिग हिन्दुओं का ब्रेनवॉश

एक अन्य पुलिस अधिकारी ने बताया कि गोहत्यारों द्वारा नाबालिग हिन्दू बच्चों का ब्रेनवॉश करके महज 200 से 500 रुपए में गोतस्करी जैसे अपराध करवाए जा रहे हैं। रायबरेली के थाना जगतपुर में साल 2022 के एक केस में गिरफ्तारी के बाद यह भेद खुला। हमें बताया गया कि 13-14 साल के नाबालिगों के माता-पिता को भी नहीं पता था कि उनका बेटा गोतस्करी में शामिल है।

लगभग आधे दर्जन नाबालिगों को दिन भर अलग-अलग इलाकों में घूमने के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 200 से 300 रुपए मिलते थे। उनको कहा जाता था कि कहीं भी बेसहारा गोवंश दिखे तो फ़ौरन उसे किसी पेड़ से बाँध कर फोन पर सूचना दो। जब गोवंश बाँध दिए जाते थे तो गोतस्कर अपने वाहन से उन्हें लाद कर काटने के लिए कहीं दूर लेकर चले जाते थे।

ऐसे चलता है गोहत्यारों का अर्थतंत्र

एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को बताया कि एक स्वस्थ्य सांड (नर गोवंश) को काट कर गोतस्कर लगभग 10 से 15 हजार रुपए कमाते हैं। इनके मांस, हड्डी और खालों को अलग-अलग ठिकानों पर बेचा जाता है। मांस खाने, जबकि खाल जूते-जैकेट आदि बनाने के काम में आती हैं। पूर्व अधिकारी का दावा है कि एक गोतस्कर का तंत्र मांस से लेकर खाल तक के वैध-अवैध कारोबार से जुड़ा होता है।

नाम न छापने की शर्त पर उस पूर्व अधिकारी ने बताया कि यही वजह है कि जो गोतस्करों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के बावजूद वो जल्द ही जेलों से छूट जाते हैं, क्योंकि उनकी पैरवी उच्चस्तर पर होती है। हमें यह भी बताया गया कि बदलते समय और सरकार में जैसे सख्ती बढ़ती जा रही है उसी का परिणाम है कि अब गोतस्कर अपने डिफेन्स में कुछ हिन्दुओं को लालच देकर अपने साथ रखना शुरू कर चुके हैं।

पुलिस में भी हैं दोनों मानसिकता के अधिकारी/कर्मचारी

हिन्दू और गोरक्षा संगठनों से हुई बातचीत के दौरान हमें बताया गया कि पुलिस विभाग में भी दोनों मानसिकता के अधिकारी और कर्मचारी होते हैं। कुछ पुलिसकर्मी अपने क्षेत्र में लालच के चक्कर में गोतस्करों से मिलकर उनको बढ़ावा देते हैं। हालाँकि, प्रशासन में कई स्टाफ ऐसे भी हैं, जो गोहत्या जैसे मामले में हर प्रकार के दबाव और लालच को दूर रखकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हैं।

बरेली के विहिप नेता हिमांशु पटेल ने कहा कि कुछ पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं, जो अपनी गलतियों को दबाने के लिए उन हिन्दुओं पर केस दर्ज करने की फिराक में लगे रहते हैं जो अपने इलाके में होने वाली गोतस्करी को मुद्दा बनाकर उठाना शुरू कर देते हैं। हिमांशु पटेल ने उम्मीद जताई है कि उत्तर प्रदेश शासन ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों को जल्द चिन्हित करके उनको दंडित करेगा।

हर केस होगा दर्ज, तभी काबू में आएँगे गोतस्कर

ऑपइंडिया की जमीनी पड़ताल में पता चला कि जिस भी थानाक्षेत्र में गोकशी होती है, वहाँ के संबंधित प्रभारी मामले को दबाने की भरसक कोशिश में जुट जाते हैं। ऐसा करने के पीछे की मुख्य वजह अपने ऊपर होने वाली विभागीय कार्रवाई से बचना होता है। गोहत्या साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील मुद्दा माना जाता है। साथ ही विशेषकर उत्तर प्रदेश के वर्तमान शासन में ऐसा नहीं होने देने के सख्त निर्देश हैं।

उत्तर प्रदेश के जिस क्षेत्र में गोकशी की घटनाएँ होती हैं, वहाँ के पुलिस अधिकारी को अपनी कुर्सी खतरे में दिखने लगती है। कुछ पुलिसकर्मियों के साथ हिन्दू संगठन से जुड़े सदस्यों ने नाम नहीं बताने और कैमरे पर नहीं आने की शर्त पर हमें बताया कि अक्सर गोकशी की घटना को प्रशासन द्वारा इन्हीं कारणों से दबाने की कोशिश की जाती है।

उनका कहना है कि अगर उन्हें हर केस दर्ज करके गोतस्करों को चिन्हित करके उन पर कड़ी कार्रवाई के लिए फ्री-हैंड दे दिया जाए तो कुछ एक मामलों में ही तमाम गोतस्कर व गोहत्यारे जेल की सलाखों के पीछे होंगे। उन्होंने इसे दीर्घकालिक समय में सकारात्मक बदलाव लाने वाला संभावित कदम बताया है।