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पहली बार हुआ सर्वे तो जामा मस्जिद में जबरन घुस भीड़ ने डराया, दूसरी बार किया दंगा: संभल में कॉल कर बुलाए गए थे उपद्रवी, 250+ पत्थरबाजों की तस्वीर जारी

संभल में विवादित जामा मस्जिद के सर्वे के पहले ही दिन मुस्लिमों ने बवाल काटा था। मुस्लिम भीड़ जबरदस्ती मस्जिद के परिसर के भीतर घुस गई थी। उसने कोर्ट के आदेश का पालन कर रही टीम को सर्वे नहीं करने दिया था। दूसरी बार जब सर्वे हुआ तो सीधा मुस्लिम दंगाई सड़कों पर उतर गए और पत्थरबाजी कर दी। इसके लिए फोन करके भीड़ इकट्ठा की गई। इसकी कॉल रिकॉर्डिंग भी सामने आई हैं। संभल पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई के सिलसिले में 250 से अधिक का पोस्टर जारी किया है।

19 नवंबर को ही काट दिया था बवाल

संभल मस्जिद में हिन्दू पक्ष के हरिहर मंदिर होने के दावे के आधार पर कोर्ट कमिश्नर के सर्वे का आदेश जिला अदालत ने 19 नवम्बर को ही दिया था। इसी दिन रात में 10 बजे के आसपास सर्वे चालू हुआ था। सर्वे से पहले मस्जिद कमिटी के सदर जफर खां और मस्जिद कमिटी के बाकी सदस्यों से सहमति ले ली गई थी।

इसके बाद ही कोर्ट कमिश्नर रमेश राघव अपनी टीम के साथ मस्जिद के भीतर दाखिल हुए थे। उनके साथ जिले डीएम-एसपी और मस्जिद कमिटी के कुछ लोग थे। बाकी किसी को भी अंदर आने की इजाजत नहीं दी गई थी। यहन तक कि डीएम और एसपी ने अपने सुरक्षाकर्मी भी बाहर छोड़ दिए थे।

टीम ने अपना सर्वे कुछ ही देर किया होगा कि 150-200 लोग मस्जिद के बाहर आकर हंगामा करने लगे। उन्होंने बाहर तैनात पुलिस से धक्कामुक्की की और मस्जिद के बंद गेट को खुलवा कर घुस गए। उन्होंने सर्वे के काम कमे खलल डालना चालू कर दिया और आपत्ति जताने लगे।

मस्जिद के अंदर आई भीड़ कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा लाई गई थी, ऐसा मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है। इस भीड़ के चक्कर में सर्वे पूरा नहीं हो सकता। इसके बाद इसे स्थगित अर्ना पड़ा और आगे किसी दिन करने की योजना बनाई गई। हालाँकि, उसी सप्ताह यूपी उपचुनाव परिणाम और जुमे की नमाज के चलते 24 तारीख चुनी गई। इस दिन दंगा ही हो गया।

दंगे में फोन कर बुलाए लोग

संभल दंगे में हो रही जाँच में और भी खुलासे हो रहे हैं। अब सामने आया है कि दंगाइयों ने मस्जिद के पास के इलाके में और लोगों को फोन करके इकट्ठा किया था और इसने ‘सामान’ लाने को कहा था। ‘सामान’ इस क्षेत्र में तमंचे या हथियार को कहा जाता है।

ऐसी ही एक कॉल रिकॉर्डिंग में एक युवक बोलता है, “सामान लेकर आ मस्जिद के पास, मेरे भाई का घर है।” इस कॉल रिकॉर्डिंग के सामने आने के बाद पुलिस ने तीन और युवकों को पकड़ा है। कॉल से पहचाने जाने वालों के नाम आमिर पठान, मोहम्मद अली और फैजान अब्बासी के तौर पर हुई है।

पुलिस अब इनसे पूछताछ कर यह जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है कि आखिर कहाँ-कहाँ से दंगाई आए और अब वह कहाँ हैं। पुलिस को इन दंगाइयों ने 49 और दंगाइयों के नाम बताए हैं। इनको पकड़ने का पुलिस प्रयास कर रही है। दंगाइयों के पास से मिले सबूतों की अभी पुलिस जाँच कर रही है।

पोस्टर भी जारी, 250 की तलाश

संभल में हुई हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गई थी। इस दौरान कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए थे। एक पुलिस अफसर के गोली लगी थी। कई पुलिसवालों के हथियार भी मुस्लिम दंगाई भीड़ ने छीन लिए थे। अब इस मामले में यूपी पुलिस कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने 7 FIR दर्ज की हैं। कुल 27 लोग भी गिरफ्तार किए गए हैं।

दंगाइयों के फोटो: साभार- जागरण

गिरफ्तार किए जाने वालों में 2 महिलाएँ भी हैं। बाकी दंगाइयों और उन्हें भड़काने वालों की गिरफ्तारी के लिए पोस्टर भी निकलवाए हैं। यूपी पुलिस ने 250 दंगाइयों के पोस्टर संभल छपवाए हैं। इन्हें संभल के प्रमुख स्थानों समेत सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जाएगा। पुलिस ने इनमें दंगाइयों की तस्वीरें CCTV के मदद से निकाली हैं। उनके नाम की भी डिटेल लिखी गई हैं।

गौरतलब है कि 24 नवम्बर, 2024 को शाही मस्जिद में वकील विष्णु शंकर जैन समेत बाकी टीम सर्वे के लिए पहुँची थी। इसी दौरान बड़ी भीड़ मस्जिद के पास इकट्ठा हो गई और उन्होंने पत्थर बरसाए। इस दंगे में 5 लोगों की मौत हो गई थी। वर्तमान में संभल में शांति है लेकिन भारी पुलिस बल तैनात है।

इस्कॉन पर बैन से ढाका हाई कोर्ट का इनकार, कट्टरपंथियों ने जबरन बंद करवाया सेंटर: बांग्लादेशी हिंदुओं पर बोलीं ममता बनर्जी- मैं मोदी सरकार के साथ

बांग्लादेश में ISKON पर बैन लगाने की माँग को ढाका हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने बांग्लादेश में चल रहे हालातों के मद्देनजर कहा कि वो फिलहाल इस्कॉन पर प्रतिबंध नहीं लगा रहे हैं और ईशनिंदा, देशद्रोह मामले में अंतरिम सरकार जो कर रही है, वो उस कार्रवाई से संतुष्ट हैं।

बांग्लादेश में चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी

बता दें कि इस्कॉन, बांग्लादेश में पहले से ही इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर था। कई संगठन इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की माँगे करते थे। लेकिन, इन कट्टरपंथी ताकतों को बल तब मिला, जब 25 नवंबर को हिंदुओं की रैली के दौरान हिंदू नेता चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी पर राष्ट्रीय ध्वज का अपमान लगाकर उन्हें देशद्रोह के मुकदमे में गिरफ्तार किया गया।

इस गिरफ्तारी के बाद ही उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किए, जो हिंसा में बदल गए। इन प्रदर्शनों के दौरान चटगांव में एक वकील, सैफुल इस्लाम की हत्या हो गई और कट्टरपंथियों को हिंदुओं को दोबारा से निशाना बनाने का मौका मिल गया।

कोर्ट में दाखिल हुई याचिका

27 नवंबर को इन्हीं घटनाओं को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील मोनिरुज्जमां ने जस्टिस फराह महबूब और जस्टिस देबाशीष रॉय चौधरी की पीठ के सामने इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की माँग वाली अर्जी दाखिल की। साथ ही चटगांव और रंगपुर में आपातकाल घोषित करने की भी अपील की थी।

इसी याचिका पर सुनवाई करते कोर्ट ने सरकार द्वारा की गई कार्रवाई की सारी जानकारी माँगी और पाया कि इस मामले पर युनूस सरकार सख्त हैं। तीन केस दर्ज हो चुके हैं। एक 13 लोग, एक में 14 लोग और एक में 49 लोगों को आरोपित बनाया गया है जबकि गिरफ्तारी 33 लोगों की हुई है। पुलिस सीसीटी के जरिए भी लोगों की पहचान कर रही है।

इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर इस्कॉन

गौरतलब है कि कोर्ट ने भले ही इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी लगातार इसे अपने निशाने पर लिए हुए हैं। बुधवार को खबर आई कि शिबचर बांग्लादेश में इस्कॉन नमहट्टा केंद्र को मुसलमानों ने जबरन बंद कर दिया। वहीं बांग्लादेशी सेना इस्कॉन भक्तों को अपने साथ गाड़ी में ले गई। एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें कट्टरपंथियों को इस्कॉन मंदिर का बोर्ड हटाते भी देखा गया। इस वीडियो को इस्कॉन के राधारमण दास ने साझा कर दिखाया है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के क्या हालात हो रखे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा- बांग्लादेश मुद्दे पर मोदी सरकार के साथ हूँ

मालूम हो कि पड़ोसी मुल्क में अल्पसंख्यकों पर होते अत्याचार और चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी के मुद्दे पर भारत भी गंभीर है। इस बीच बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान सामने आया है। उन्होंने साफ कहा है कि जब दूसरे देशों की बात आएगी तो हम केंद्र सरकार के साथ खड़े रहेंगे। अगर किसी भी धर्म के लोगों पर अत्याचार होता है तो हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं। अगर बांग्लादेश में किसी भी धर्म के लोगों पर अत्याचार होता है तो हम इसका समर्थन नहीं करते हैं।

पत्थरबाजी-आगजनी करने वाले मुस्लिम, लेकिन संभल हिंसा के ‘दोषी’ वकील विष्णु शंकर जैन और जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम: ‘जय श्रीराम’ पर चल रहे प्रोपेगेंडा का जानिए सच

उत्तर प्रदेश के संभल स्थित जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा की जिम्मेदारी इस्लामी-वामपंथी तंत्र वकील विष्णु शंकर जैन पर डालने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस्लामी-वामपंथी तंत्र और समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा एक वीडियो वायरल किया जा रहा है। इसमें जैन और सर्वे दल पर विवादित मस्जिद में सर्वेक्षण के लिए जाने के दौरान ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाकर दंगे भड़काने का आरोप लगाया गया है।

कुख्यात इस्लामवादी समीउल्लाह खान ने भी ऐसा ही एक वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस के साथ एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और सर्वे टीम के लोग चल रहे हैं। इस दौरान कुछ लोग ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे हैं। वीडियो शेयर करते हुए समीउल्लाह खान ने दावा किया है कि संभल में हिंसा की शुरुआत यहीं से हुई थी।

24 नवंबर सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर वीडियो के साथ किए गए पोस्ट में समीउल्लाह ने दावा किया है, “संभल में हिंसा की शुरुआत… हिंदुत्व के वकील विष्णु शंकर जैन ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने वाली टीम के साथ मस्जिद का सर्वे करने पहुँचे। क्या न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने का यही तरीका है?”

समीउल्लाह खान ने अपने पोस्ट में आगे लिखा, “वकील विष्णु शंकर जैन हमेशा मस्जिदों में मंदिर क्यों खोजते हैं, जिससे अशांति, अराजकता और तनाव पैदा होता है? उन्हें मस्जिदों के खिलाफ इतनी आसानी से आदेश कैसे मिल रहे हैं? वे मथुरा मस्जिद के खिलाफ भी सक्रिय थे? यह सब करने के लिए इस हिंदुत्ववादी वकील की गुप्त रूप से समर्थन कौन कर रहा है?”

इसी तरह ‘द मुस्लिम’ नाम के एक अन्य इस्लामवादी एक्स हैंडल ने उस वीडियो को शेयर किया। इसके साथ ही इस X हैंडल ने लिखा, “सर्वेक्षण दल ने धार्मिक नारे लगाते हुए मस्जिद में प्रवेश किया। कोर्ट द्वारा नियुक्त सर्वेक्षण दल ने पथराव और झड़पों के बीच मस्जिद में प्रवेश किया।”

सदफ आफरीन नामक एक अन्य मुस्लिम शख्स ने इस वीडियो को सोशल मीडिया साइट एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, “सर्वे टीम है ये, मस्जिद का सर्वेक्षण करने आए हैं दोबारा! ‘JSR’ (जय श्रीराम) के नारे लगाते हुए पहुँचे हैं ये काली कोट वाले सर्वे टीम! आजकल हर एक संस्था में धर्म घुस चुका है! और ये देश के लिए घातक है!”

चाँदनी नाम वाली एक अन्य इस्लामवादी X हैंडल ने लिखा, “UP के संभल जामा मस्जिद के सर्वे टीम धार्मिक नारा लगाते हुए मस्जिद में दाखिल हुई… जय श्री राम का नारा इसलिए लगा रहे हैं कि स्थानीय मुसलमानों को भड़काया जाए।”

इसी तरह, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी के नेता सलमान निज़ामी ने भी संभल में हुई इस्लामी हिंसा के लिए विष्णु शंकर जैन और यहाँ तक कि अदालत को भी दोषी ठहराया। निजामी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “संभल हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 5 हो गई है। इस खून-खराबे के लिए जज और याचिकाकर्ता ज़िम्मेदार हैं।”

निजामी ने आगे कहा, “दूसरे पक्ष को सुने बिना सर्वे का आदेश देना और सर्वे दल का मस्जिद में ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते हुए घुसना जानबूझकर उकसाने जैसा था। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछार या आँसू गैस का इस्तेमाल करने के बजाय फायरिंग करना अल्पसंख्यकों में डर फैलाने और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने की मंशा को दर्शाता है। ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा मिलनी चाहिए!”

राजनीतिक लाभ के लिए दंगाई भीड़ को उचित ठहराने का प्रयास

इस्लामवादी सोशल मीडिया हैंडलों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने भी मुस्लिम भीड़ के हमले एवं हिंसा के लिए ‘जय श्रीराम’ के नारे को जिम्मेदार ठहराया। बता दें कि पुलिस ने संभल से सांसद जियाउर रहमान बर्क पर भी हिंसा के लिए मुस्लिमों को उकसाने का मामला दर्ज किया है।

जियाउर रहमान बर्क की तरह ही समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के चाचा एवं सपा सांसद राम गोपाल यादव ने भी मस्जिद के बाहर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने को दंगे भड़काने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। हालाँकि, जिस वीडियो को शेयर करके ये सभी नारे एवं एडवोकेट जैन पर आरोप लगा रहे हैं, वह मस्जिद में सर्वे के लिए जाने के दौरान का है ही नहीं। इससे उनके झूठ का पता चल जाता है।

दरअसल, रविवार को न्यायालय के निर्देशों के बाद अधिवक्ता कमिश्नर और अधिवक्ता जैन की एक टीम सुबह 7:30 बजे सर्वे के लिए मस्जिद गई। जब टीम ने विवादित मस्जिद में प्रवेश किया, तब शूट किए गए वीडियो में स्थिति बिल्कुल शांतिपूर्ण थी और इस दौरान किसी भी समय ‘जय श्रीराम’ के नारे नहीं लगे और ना ही किसी अन्य समुदाय के लोगों का मजाक उड़ाया गया।

उस समय तक कोई भी विजयोन्माद नहीं था और ना ही हिंदू पक्ष एवं सर्वे टीम ने मुस्लिमों को भड़काने का कोई प्रयास नहीं किया। हालाँकि, इस्लामी-वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र लगातार अधिवक्ता जैन पर निशाना साधकर उनकी जान को खतरे में डाल रहा है। बता दें कि जैन काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी विवाद में भी हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें कट्टरपंथियों से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं।

इन तमाम विवादों को लेकर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने एक्स लिखा कि जब वे सर्वे टीम के साथ रविवार को विवादित मस्जिद में दाखिल हुए तो प्रशासन ने इलाके की घेराबंदी कर दी थी। उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए सही तथ्यों की जाँच किए बिना ‘गैर-जिम्मेदाराना’ बयान देने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की है।

इससे पहले जैन ने भ्रामक दावों का खंडन किया था। जैन ने कहा, “सोशल मीडिया पर जो वीडियो प्रसारित हो रहा है, वह रात 11 बजे सर्वेक्षण पूरा होने के बाद विवादित क्षेत्र से मेरे जाने के दौरान का है। यह मेरे सर्वे स्थल पर जाने का वीडियो नहीं है। मैं मस्जिद कमेटी, सीजी और एसजी के वकीलों के साथ जिला प्रशासन के साथ सर्वेक्षण स्थल पर गया था। झूठी जानकारी फैलाई जा रही है।”

इससे साफ हो जाता है कि इस्लामवादी और उनके समर्थक विष्णु शंकर जैन की जान को खतरे में डालने के लिए झूठ फैला रहे हैं और उन्हें तथा पवित्र ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष को दोषी ठहरा रहे हैं। यदि इस तर्क को मान भी लिया जाए कि ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए गए थे तो इससे इस्लामी भीड़ की हिंसा सही कैसे साबित हो जाती है? ‘ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू मेरी कुरान’ का क्या हुआ?

मंदिरों के अंदर नमाज पढ़ने को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘भाईचारे’ का प्रतीक मानने वाला ये इस्लामी-वामपंथी मस्जिद में हिंदुओं द्वारा कथित तौर पर ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने पर नाराज क्यों हो जाते हैं? यह पवित्र हिंदू नारा हिंसा का आधार कैसे हो सकता है? ये वही लोग हैं, जब जिहादी ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाकर बम विस्फोट और सिर कलम करते हैं, तब भी कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।

हालाँकि, यही लोग इस्लामवादी भीड़ की हिंसा को उचित ठहराने के लिए ‘जय श्रीराम’ के नारे को सुविधाजनक रूप से दोषी ठहराते हैं। जब इस्लामवादी किसी मंदिर के बाहर ईद या मुहर्रम का जुलूस निकालते हैं और ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हैं तो क्या हिंदुओं को इस्लामवादियों पर हमला करना चाहिए?

इससे पहले वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी ने इस्लामी हिंसा को सही ठहराने के लिए विवादित जामा मस्जिद में सर्वे का आदेश देने के लिए अदालत को ‘संघी’ बताते हुए उसे दोषी ठहराया था। अब इस्लामी तंत्र दंगाई भीड़ की हिंसा को सही ठहराने के लिए विष्णु शंकर जैन और ‘जय श्रीराम’ को दोषी ठहरा रहा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

पीरियड आते ही ‘शेख चच्चा’ ने बना लिया बेगम, 15 दिन भोगा, प्रेग्नेंट कर चला गया अपने मुलुक… हैदराबाद में एक नहीं कई शबाना, ‘मुताह निकाह’ के नाम पर अरब के बुड्ढे करते हैं बच्चियों का शोषण

पीरियड आते ही निकाह होना इस्लाम में नया नहीं है, लेकिन हैदराबाद में इस रिवायत के चलते एक अलग दुनिया चल रही है जहाँ अरब मुल्क के अमीर शेख आते हैं, रकम देकर छोटी लड़कियों (वर्जिन) से कुछ समय के लिए निकाह करते हैं और फिर उनके साथ कुछ दिन गुजारकर चले जाते हैं।

हाल में आजतक की मृदुलिका झा ने इस पर ग्राउंड रिपोर्ट की है। रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि कैसे ‘मुताह निकाह, शेख मैरिज’ के चलन ने लड़कियों की जिंदगियाँ बर्बाद की हुई है और परिवार वालों को इन सबसे कोई आपत्ति भी नहीं है। इस निकाह को हैदराबाद में एक बिजनेस की तरह आगे बढ़ाया जा रहा है और इसे कराने के लिए बकायदा ब्रोकर और एजेंट हैं।

रिपोर्ट में एक शबाना (बदला नाम) नाम की लड़की का जिक्र पढ़ने को मिलता है। शबाना की आपबीती किसी आम लड़की के लिए रूह कंपाने वाली है। जिस समय शबाना को पीरियड हुए ही थे तभी उसका निकाह एक शेख से हो गया था। शबाना के लिए तो वो ‘शेख अंकल’ थे, लेकिन अंकल की नजर उसपर कैसी थी ये उसे नहीं पता था।

शेख अंकल उसके घर आते, उसे गोद में बिठाते, उसके गुदगुदी करते और फिर उसे घूर-घूरकर चले जाते… ये सिलसिला कई दिन चला और फिर एक दिन दोनों का निकाह हो गया। शबाना की बिदाई लंबी गाड़ी में हुई और उसे होटल लेकर जाया गया। यहाँ वही शेख अंकल उसके साथ 15 दिन रहे।

शुरू में शबाना ने रो-रोकर अपना विरोध जताया, मगर फिर जब अम्मी-अब्बू-फुफ्फू किसी ने उसकी नहीं सुनी तो वो भी शेख के साथ 15 दिन कमरे में रही। जब लौटी तो हालत खराब थी। पेट में दर्द और उल्टियाँ रुकती नहीं थीं। शुरू में लगा पेट गड़बड़ है मगर फिर अम्मी-खाला को ज्यादा समय नहीं लगा समझने में कि शबाना पेट से हो है।

खबर लगते ही गर्भ गिराने की कोशिशें हुईं लेकिन स्थिति तब तक हाथ से निकल गई थीं। गर्भपात करवाने पर शबाना की जान को भी खतरा था इसलिए घरवाले उसे लेकर लौटे और एक कमरे में बंद कर दिया। उसे धमकी दी गई कि अबसे वो न स्कूल जाएगी-न बाहर।

शबाना ने इसके बाद एक बच्ची को जन्म दिया। घरवालों ने सोचा कि वो इस बच्ची को यतीमखाने भेजें। हालाँकि शबाना के भाई-भाभी ने इससे मना कर दिया और वो बच्ची गोद लेली। अब वो बच्ची शबाना को ‘बाजी’ कहती है। शबाना चाहकर भी उसे अपनी बेटी नहीं कह पाती क्योंकि अब्बू मजहबी किस्म के हैं और वो नहीं चाहते कि किसी को इस बारे में पता हो।

इसी प्रकार खबर में एक ऐसी महिला का भी जिक्र है जिसने अपनी बड़ी बेटी को शेख के हाथ बेचा और बाद में खुद पाँच मंजिला घर में आराम से रहती मिली। उनका मकसद अब आगे छोटी बेटी का निकाह भी इसी तरह से करवाने का है।

वहीं एक ऐसी लड़की का भी जिक्र खबर में मिलता है जिसे एक शेख से निकाह करने के नाम पर ठगा गया और केवल उसका शारीरिक शोषण नहीं हुआ, उसे नौकरानी बनाकर रखा गया। बाद में जब शेख अमेरिका गया तो शेख के बेटे उसका शोषण करने लगे। लड़की जान बचाने के चक्कर में तीसरी मंजिल से जमीन पर गिरी और अब उसके पाँव में रॉड डली हुई है, शरीर में बड़ा गड्ढा है।

हैदराबाद में मुताह निकाह आम

अजीब बात ये है कि ‘मुताह निकाह’ हैदराबाद के कई इलाकों (शाहीन नगर, हसन नगर, याकूब पुरी, बारकास, चारमीनार और वट्टापल्ली) में अब आम हो चुका है, लेकिन लोगों को ये गुनाह नहीं लगता। स्थानीय महिलाएँ, होटल के लोग, ब्रोकर-एजेंट सब मिलकर बड़े ही शातिर ढंग से इस कारोबार को संचालित कर रहे हैं। ब्रोकर 20-25-50 हजार रुपए में लड़कियों का सौदा करते हैं और शेखों को बेचते हैं। ये एजेंट पहले से ही जानते हैं कि कौन से परिवार की लड़कियाँ इस प्रकार के निकाह के लिए उपलब्ध हैं और किसे अधिक पैसे की आवश्यकता है।

इसके बाद ये गल्फ मुल्कों के शेखों से संपर्क में आते हैं, उन्हें मेडिकल वीजा पर भारत बुलाया जाता है, लड़कियों की ब्यूटी पार्लर या घर में परेड होती है और फिर शेख अपने लिए लड़की चुनता है और बाद में निकाह कराया जाता है। बताया जाता है कि इस तरह के निकाह करने पहले केवल अरब के अमीर शेखों के आने का चलन था, मगर अब सूडान और सोमालिया से भी मुस्लिम नागरिक आते हैं जो कम पैसों में ही इस तरह कॉन्ट्रैक्ट निकाह करते हैं।

मृदुलिका झा की रिपोर्ट पढ़कर भी समझ सकते हैं कि कैसे एजेंट खुलकर बताते हैं कि वो कितनी लड़कियों के निकाह कराते हैं। कैसे उनका वर्जिनिटी सर्टिफिकेट शेखों को उपलब्ध कराते हैं। कैसे एक लड़की को बार-बार वर्जिन बताकर कई बार शेखों को दिया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि एक शेख के आगे खुद को परोसने के लिए लड़कियाँ भीतर फिटकरी रखती हैं और कई बार डॉक्टर के पास जाकर बार-बार सर्जरी भी करवाती हैं।

मुताह निकाह की शर्तें

मौजूदा जानकारी के अनुसार, मुताह निकाह इस्लाम में अस्थायी संबंध को कहते हैं जो कुछ समय के लिए बनाया जाता है। इस निकाह की कुछ अनिवार्य शर्तें और नियम हैं। जैसे,

  • दोनों पक्षों की आयु 15 वर्ष से अधिक होनी चाहिए।
  • बीवियों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • निकाहनामा में रॉयल्टी और दहेज की अवधि का उल्लेख किया जाना चाहिए।
  • दोनों पक्षों के बीच शारीरिक संबंध बन सकता है।
    मुताह निकाह में बीवी व्यक्तिगत कानून के तहत रखरखाव का दावा नहीं कर सकती है।
    • इसी तरह मुताह निकाह में तलाक मान्यता प्राप्त नहीं होता।

ऑनलाइन होता है निकाह

इस मुताह निकाह का चलन हैदराबाद में इतना हो चला है कि अब इन्हें करने के लिए किसी स्थान की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि इसे व्हॉट्सएप पर ही करवा दिया जाता है। टाइम्स की एक रिपोर्ट में ब्रोकर ने तो ये भी बताया कि ऐसे 20-30 निकाह हर महीने होते हैं। इसके बाद दुल्हनों को टूरिस्ट वीजा पर उनके शौहरों के पास भेज दिया जाता है। फिर वहाँ न केवल लड़कियों का शोषण होता है, बल्कि उन्हें मारा पीटा जाता है, उन्हें नौकर बनाकर भी रखा जाता है।

सालों से हो रही लड़कियाँ मुताह निकाह की शिकार

बता दें कि हैदराबाद में मुताह निकाह की रिवायत आज से नहीं है। तमामों लड़कियाँ इसकी शिकार हो चुकी हैं। कुछ को इस्तेमाल करके छोड़ दिया गया तो कुछ को गल्फ मुल्कों में ले जाकर जिंदगी बर्बाद कर दी गई। कभी वो सेक्स स्लेव बनकर जीवन गुजारती हैं तो कभी खदीमा के तौर पर काम करती हैं। लड़कियों का कोई निश्चित ठिकाना नहीं रह जाता। उनका केवल गुलामों की तरह इस्तेमाल होता है और साथ में ध्यान रखा जाता है कि शेखों के साथ हुए निकाह से बच्चे न हों क्योंकि ऐसा होने पर खर्चा ज्यादा होता है।

अजमेर में जहाँ आज दरगाह, वहाँ कभी शिव मंदिर में हर सुबह महादेव का अभिषेक करते थे ब्राह्मण दंपती… किताब में लिखकर गए हैं जस्टिस शारदा, जानिए क्या हैं हिंदू पक्ष के दावे के 3 आधार

राजस्थान के अजमेर सिविल कोर्ट ने मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में संकटमोचन महादेव मंदिर होने का दावा करने वाली याचिका स्वीकार कर ली है। अब इस पर अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी। कोर्ट ने अल्पसंख्यक मंत्रालय, दरगाह कमेटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को नोटिस जारी करके उससे पहले जवाब माँगा है। याचिका में दरगाह की जगह हिंदू मंदिर होने के तीन आधार बताए गए हैं।

इस याचिका को हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्ता ने दायर किया है। गुप्ता का दावा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में लगे दरवाजों की बनवाट और नक्काशी इसके हिंदू मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। दरगाह में मौजूद बुलंद दरवाजे की बनावट हिन्दू मंदिरों के दरवाजे की तरह है। इन नक्काशी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ हिन्दू मंदिर रहा होगा।

हरबिलास की किताब, जिसे आधार बनाया गया (साभार: भास्कर)

गुप्ता ने जो दूसरा आधार दिया है, वह दरगाह की ऊपरी संरचना। दरगाह के ऊपरी संरचना में भी हिन्दू मंदिरों के अवशेष जैसी चीजें दिखाई देती हैं। गुप्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि इसके गुंबदों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पूर्व में कोई मंदिर रहा होगा और उसे तोड़कर ही उसके अवशेष पर दरगाह का निर्माण करवाया गया है।

अपने दावे का तीसरा आधार उन्होंने पानी और झरने को दिया है। गुप्ता का कहना है कि जहाँ शिव मंदिर होता है, वहाँ पानी और झरने जरूर होते हैं। इस दरगाह में भी ऐसा ही है। इसलिए यहाँ हिंदू मंदिर होने के दावे को नकारा नहीं जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने अपनी याचिका में हरबिलास शारदा की किताब ‘अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव’ का भी संदर्भ दिया है।

किताब में दावा (साभार: भास्कर)

गुप्ता का दावा है कि इस किताब में कहा गया है कि जिस जगह पर मोइनुद्दीन की दरगाह है, वहाँ कभी हिंदू मंदिर हुआ करता था। किताब में यह भी दावा किया गया है कि यहाँ एक हिंदू दंपति रहते थे और दरगाह स्थल पर बने महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। वे सुबह चंदन से महादेव का तिलक और जलाभिषेक करते थे। शारदा ने यह किताब 1911 में लिखी थी।

हरबिलास शारदा ब्रिटिश भारत में जज थे। सन 1892 में उन्होंने अजमेर के न्यायिक विभाग में सब जज के रूप में काम करना शुरू किया था। सन 1894 में वे अजमेर नगरपालिका के नगर आयुक्त बनाए गए। इसके बाद 1902 में उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ा में उन्होंने सत्र न्यायाधीश के रूप में काम किया। सन 1925 में शारदा जोधपुर हाई कोर्ट के सीनियर जज बने थे।

विष्णु गुप्ता के वकील रामस्वरूप बिश्नोई ने बताया कि सिविल जज मनमोहन चंदेल की बेंच ने मामले की सुनवाई की स्वीकृति दी है। यह मामला भगवान श्री संकटमोचन महादेव विराजमान बनाम दरगाह कमिटी के बीच है। बिश्नोई ने कहा कि इसमें पहले 750 पेजों का वाद पेश किया गया था। इसे संशोधित करके 38 पेजों का किया गया है।

जिस मस्जिद को मुगल आक्रांता औरंगजेब ने केशवदेव मंदिर को तोड़कर बनवाया, वह मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े एक और मामले में बना पक्षकार: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी अनुमति

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह मस्जिद मुकदमा संख्या-3 में पक्षकार बनने की मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद के आवेदन को स्वीकार कर लिया है। इस मामले में एक पक्षकार ठाकुर केशव देवजी महाराज विराजमान और केशवदेव मंदिर कटरा केशवदेव हैं। इस मुकदमे में केशवदेव मंदिर परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की भी माँग की गई है।

वाद दायर करने वाले हिंदू पक्ष का कहना है कि मुगल आक्रांता औरंगजेब ने सन 1670 में कटरा केशदेव मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। मस्जिद में स्थित बहुमूल्य सोने एवं हीरे के आभूषण लूट लिए थे। इसके साथ ही भगवान केशवदेव के विग्रह को मुगल साम्राज्य की तत्कालीन राजधानी आगरा में स्थित जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर दबा दिया गया था।

शाही ईदगाह मस्जिद के सचिव तनवीर अहमद ने आवेदन में तर्क दिया कि वह इस मुकदमे में एक आवश्यक पक्ष हैं, क्योंकि वादी (हिंदू पक्ष) के दावों का कोई आधार नहीं है। मस्जिद पक्ष ने दावा किया कि मस्जिद के नीचे या उसके मंच या सीढ़ियों पर इस प्रकार की कोई मूल्यवान मूर्ति या प्रतिमा नहीं दबाई गई है। मस्जिद पक्ष ने तर्क दिया कि अगर उसे पक्षकार नहीं बनाया जाता है तो उसके हित प्रभावित होंगे।

ईदगाह मस्जिद के आवेदन का विरोध करते हुए हिंदू पक्ष ने कहा कि मुगल आक्रांता औरंगजेब हिंदू विरोधी था। उसने मूल्यवान आभूषण आदि लूटकर केशवदेव जी के विग्रह को आगरा की बेगम साहिबा मस्जिद की सीढ़ियों में दफनाए थे। इसलिए मथुरा के शाही मस्जिद ईदगाह को इस मुकदमे में पक्षकार बनने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

दोनों पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद जज राममनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने कहा कि आवेदक ईदगाह मस्जिद अधिकांश मुकदमों में प्रतिवादी है और वह अधिकांश मुकदमों में प्रभावी ढंग से मुकदमा लड़ रहा है। इसलिए ईदगाह मस्जिद को वाद संख्या 3 में भी प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही जज मिश्रा ने मस्जिद के आवेदन को स्वीकार कर लिया।

बता दें कि मथुरा के एक आरटीआई के जवाब में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कहा था कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि को तोड़कर औरंगजेब ने शाही ईदगाह ढाँचा खड़ा करवाया था। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के रहने वाले अजय प्रताप सिंह ने देश भर के मंदिरों के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से आरटीआई के तहत जानकारी माँगी थी।

आरटीआई में दिए गए जवाब में कहा गया है कि अंग्रेजों के शासन के दौरान सन 1920 में इलाहाबाद से प्रकाशित गजट में यूपी के विभिन्न जिलों के 39 स्मारकों की सूची दी गई है। इसमें 37 नंबर पर कटरा केशवदेव भूमि पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि का उल्लेख है। उसमें कहा गया है कि मस्जिद के स्थान पर पहले कटरा टीले पर केशवदेव मंदिर था, जिसे ध्वस्त करके मस्जिद बनाया गया है।

दरअसल, मथुरा का केशवदेव मंदिर अति प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि जिस जगह पर कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान विष्णु के परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, कालांतर में वहीं पर केशवदेव मंदिर का निर्माण हुआ था। श्रीकृष्ण के प्रपौत्र व्रज और व्रजनाभ ने राजा परीक्षित के सहयोग से इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिसे समय-समय पर अन्य राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल आक्रांता औरंगजेब ने 1670 में फरमान जारी करके मथुरा में भगवा केशवदेव के मंदिर को तोड़ने के लिए फरमान जारी किया था। इसके बाद वहाँ शाही ईदगाह मस्जिद बना दी गई। इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए औरंगजेब खुद भी आया था। इसका जिक्र कई अंग्रेज इतिहासकारों ने भी किया है।

मथुरा का यह विवाद 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा है। श्रीकृष्ण जन्मस्थानभूमि के पास 10.9 एकड़ जमीन का मालिकाना हक है, जबकि ढाई एकड़ जमीन शाही ईदगाह मस्जिद के पास है। हिंदू पक्ष इस पूरी जमीन पर अपना दावा करता है। हिंदू पक्ष ईदगाह ढाँचे को हटाकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर बनाने की भी माँग करता है।

9 साल शादीशुदा मर्द से रखा अफेयर, सालों रहे शारीरिक संबंध, फिर रेप का केस कर दिया: कोर्ट ने महिला को फटकारा, 7 साल पुरानी FIR खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा है कि अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ सालों तक सहमति से संबंध बनाती है तो वो बाद में उस पर रेप का केस नहीं दर्ज कर सकती या ये नहीं कह सकती कि इतने साल तक शादी का झूठा वादा करके उसका रेप किया गया।

ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने एक ऐसे केस की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक महिला ने एक पुरुष के साथ नौ साल तक संबंध बनाए और बाद में आरोप लगा दिया कि शादी का झूठा वादा उसका रेप होता रहा।

कोर्ट ने महिला की 7 साल पुरानी एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि यह एक चिंताजनक चलन है कि लोग लंबे समय तक चले आ रहे रिश्ते में खटास आने पर उसे अपराध का रूप देने की कोशिश करते हैं। अदालत ने कहा कि झूठे वादे के आधार पर दर्ज कराई गई शिकायतों पर तत्परता होनी चाहिए न कि उन मामलों में जहाँ सालों तक शारीरिक संबंध बनाने के बाद केस दर्ज होते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक ये मामला मुंबई के शादीशुदा महेश दामू खरे और वनिता एस जाधव (जो एक विधवा हैं) से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों के बीच अफेयर साल 2008 में शुरू हुआ था। लेकिन, साल 2017 में महिला ने शिकायत देते हुए बताया कि महेश ने उनसे शादी का वादा किया था जिसके बाद दोनों में शारीरिक संबंध बने।

कोर्ट ने जब इस मामले की सुनवाई की तो लंबी सुनवाई के बाद वनिता की एफआईआर को खारिज किया गया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जहाँ एक महिला जानबूझकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखती है, तो यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह संबंध सिर्फ शादी का वादा किए जाने की वजह से था।

बता दें कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ यौन संबंध बनाए। हालाँकि, अदालत ने पाया कि दोनों के बीच लगभग नौ वर्षों तक चले रिश्ते में कोई स्पष्ट संकेत नहीं था कि आरोपित ने वास्तव में शादी करने का वादा किया था। इसके बजाय, अदालत ने देखा कि महिला द्वारा लगातार बिना किसी विरोध के संबंध बनाए रखना इस बात का प्रमाण था कि यह रिश्ता पूरी तरह से सहमति पर आधारित था।

वक्फ बोर्ड ने वाराणसी के 115 साल पुराने उदय प्रताप कॉलेज पर ठोका दावा: परिसर में बना ली अवैध मस्जिद-मजार, कॉलेज की बिजली चोरी कर जलाते हैं बल्ब-पंखा

मनमानी पर उत्तर आए वक्फ बोर्ड ने एक बार फिर चुनौती दी है। उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड ने वाराणसी में स्थित प्रसिद्ध उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) की संपत्ति पर अपना दावा ठोका है। लखनऊ स्थित यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने यूपी कालेज की जमीन को वक्फ की संपत्ति होने का दावा किया है। इसकी जानकारी सामने आने के बाद कॉलेज के शिक्षकों एवं छात्रों में आक्रोश फैल गया है।

यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के सहायक सचिव आले अतीक ने वक्फ एक्ट 1995 के तहत 2018 में कॉलेज प्रबंधक को नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया है कि वसीम अहमद निवासी भोजूबीर तहसील सदर, वाराणसी ने कहा है कि ग्राम छोटी मस्जिद नवाब टोक मजारात हुजरा उदय प्रताप कॉलेज भाेजूबीर की संपत्ति कॉलेज के नियंत्रण में है। इसे सुन्नी बोर्ड कार्यालय में पंजीकृत कराया जाए।

नोटिस में आगे कहा गया कि 15 दिनों में जवाब दें। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन की बात नहीं सुनी जाएगी। इसका जवाब देते हुए उदय प्रताप शिक्षा समिति के तत्कालीन सचिव यूएन सिन्हा ने कहा था कि यूपी कॉलेज की स्थापना 1909 में हुई है। कॉलेज की जमीन इंडाउमेंट ट्रस्ट की है और चैरिटेबल इंडाउमेंट एक्ट के तहत आधार वर्ष के बाद ट्रस्ट की जमीन पर किसी का मालिकाना हक खुद समाप्त हो जाता है।

राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने 115 साल पहले किया था स्थापित

यूपी कॉलेज करीब 500 एकड़ में फैला है। इसके द्वारा प्रदेश में डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, रानी मुरार बालिका स्कूल, राजर्षि शिशु विहार, राजर्षि पब्लिक स्कूल संचालित किया जाता है। इन सबमें करीब 20,000 विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना लगभग 115 साल पहले सन 1909 में भिनगा (बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी।

सन 1886 में संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने 25 नवम्बर 1909 को वाराणसी में ‘हेवेट क्षत्रिय हाई स्कूल’ की स्थापना की। आगे चलकर यह उदय प्रताप सिंह स्वायत्त महाविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने 1909 में ही ‘उदय प्रताप कॉलेज एंड हेवेट क्षत्रिय स्कूल इंडाउमेंट ट्रस्टट का गठन किया था, जिसके तहत यह कॉलेज संचालित है।

कॉलेज के प्रिंसिपल का जवाब

यूपी कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर डीके सिंह ने बुधवार (27 नवंबर) को IANS को बताया कि नोटिस 6 दिसंबर 2018 को भेजा गया था। इसका 21 दिसंबर 2018 को जवाब दिया गया था कहा गया था कि यह ट्रस्ट द्वारा संचालित है। इसलिए इस पर किसी का मालिकाना हक समाप्त हो जाता है। डीके सिंह ने कहा कि इसके बाद वक्फ बोर्ड की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

प्रिंसिपल के रूप में 1 नवंबर 2001 को कार्यभार सँभालने वाले डॉक्टर डीके सिंह ने कहा कि इस मामले का उन्होंने संज्ञान लिया था। उन्होंने कहा था, “कार्यभार सँभालने के बाद हमारे छात्रों ने बताया किया कि कुछ लोग मस्जिद में निर्माण कार्य कर रहे है। वे लोग निर्माण करने के लिए रात में बालू और सीमेंट लेकर जबरदस्ती आ रहे थे। हालाँकि, सुरक्षाकर्मियों ने इसका विरोध किया था।”

प्रिंसिपल ने आगे बताया कि उन्होंने इसकी सूचना तुरंत पुलिस-प्रशासन को दी और निर्माण सामग्री को मस्जिद से बाहर निकाला गया। उन्होंने बताया कि इसके कुछ दिनों के बाद सूचना मिली कि कॉलेज की बिजली लाइन से मस्जिद में बिजली का इस्तेमाल हो रहा है। इसका बिजली बिल कॉलेज को देना पड़ता था। प्रिंसिपल ने बताया, “लगभग एक साल पहले हमने मस्जिद का बिजली कनेक्शन कटवा दिया।”

रिपोर्ट के मुताबिक, उदय प्रताप कॉलेज परिसर में मस्जिद और मज़ार का निर्माण समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार की शह पर किया गया था। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ये निर्माण पूरी तरह अवैध है। कहा जाता है कि परिसर में स्थित मस्जिद में लोग नमाज पढ़ने के लिए भी आते हैं। वहीं, मजार के पास एक व्यक्ति हमेशा रहता है। उसका दावा है कि मस्जिद तो कॉलेज से भी पुरानी है।

‘पुलिस पर पथराव ही तो किया, जान से थोड़ी मार रहे थे… पहले से ही ईंटें जमा थीं, प्रशासन ने क्यों हटवा दिया’: संभल में बुर्का वाली खातून ने वीडियो में सब उगल डाला

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ के उपद्रव के बाद हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। पुलिस टीमें पत्थरबाजों की पहचान करके उनकी धरपकड़ में जुटी हुई हैं। इस हिंसा में मुस्लिम समुदाय के पुरुषों के अलावा महिलाएँ भी शामिल रहीं। इस घटना के बाद वायरल हो रहे वीडियो में एक मुस्लिम महिला पत्थरबाजी की घटना को बेहद मामूली बात बता रही है।

सोशल मीडिया के X प्लेटफॉर्म पर यूजर @politicscharcha ने बुधवार (27 नवंबर) को एक वीडियो शेयर किया है। 12 सेकेंड के इस वीडियो में एक पत्रकार मुस्लिम महिला से बात कर रही है। पत्रकार ने हिंसा में पुलिस वालों को लगी चोट का जिक्र किया। जवाब में मुस्लिम महिला ने इन चोटों से कोई सहानभूति नहीं दिखाई और कहा, “चोट है वो, वो सही हो जाएँगे। जिसका गया वो तो गया दुनिया से। वो तो वापस न आएगा।”

इसके बाद बुर्का वाली महिला के तेवर और सख्त हो गए। पत्रकार ने पूछा कि जो मरे हैं, वो पत्थर क्यों चला रहे थे? इस सवाल पर मुस्लिम महिला ने कहा, “पथराव ही तो कर रहे थे। कोई तुम्हें जान से थोड़ी मार रहे थे।” इतना कह कर खातून आगे बढ़ने लगी।

इस इंटरव्यू का पूरा वीडियो राजधर्म नाम के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। 10 मिनट 23 सेकेंड लम्बे इस वीडियो में महिला पत्रकार संभल के हिंसाग्रस्त इलाकों से अपनी रिपोर्टिंग की शुरुआत करती है। वीडियो में गलियों में पत्थरबाजी के निशान मौजूद दिख रहे हैं। कुछ पत्थरों को सड़क के किनारे कर दिया गया है। कई गाड़ियों को भी तोड़ डाला गया था, जो अभी वहाँ खड़ी दिख रही है। रास्ते में वारसी हाउस पड़ा। घर के आगे 2 लोग बैठे दिखे, जो मीडिया के खिलाफ बातें कर रहे थे।

वारसी हाउस पर एक युवा व दूसरा बुजुर्ग मौजूद था। इन्होंने मीडिया पर जहर उगलने का आरोप लगाया और कुर्सी उठा कर अंदर चले गए। बाद में युवा बाहर निकला। उसने जुल्म की इंतहा होने और सबको परेशानी में डालने जैसी बातें की। गलियाँ सूनी दिखीं और एक अन्य राहगीर ने भी मीडिया से बात नहीं की। कुछ ही देर बाद एक बुर्का पहने महिला जाती दिखी। उसने खुद को घटना की चश्मदीद बताया।

महिला चश्मदीद ने कहा कि पुलिस वाले कब्ज़े में नहीं आ रहे थे। पुलिस पर ही लाठीचार्ज का दोष मढ़ते हुए महिला आगे बोली, “हथियार तो पुलिस वालों के पास थे। हम तो निहत्थे थे। जब लाठीचार्ज होगा तो मजबूरन कुछ न कुछ करना पड़ेगा।” बुर्का वाली खातून ने यह भी माना कि पहले से ही चारों तरफ ईंटें रखी हुई थीं। वह इस बात से नाराज भी दिखीं कि प्रशासन ने वो ईंट-पत्थर क्यों साफ़ करवा दिए। भीड़ की तादाद 2 से ढाई हजार होने की बात को कथित चश्मदीद ने सहमति दी।

मुस्लिम महिला ने बताया कि अचानक ही लोगों को एक-दूसरे से पता चला कि मस्जिद का सर्वे हो रहा है और इसी बात पर वो लोग जमा हो गए। महिला बोली, “ऐसी बात पर एकदम से सब इकट्ठा हो जाएँ।” एक अन्य बुर्का वाली महिला ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। संभल की गलियों में बड़ी तादाद में पुलिस बल तैनात दिखा।

मोहम्मद जुबैर के खिलाफ FIR, भारत की एकता-अखंडता को खतरे में डालने का मामला: UP पुलिस ने हाई कोर्ट को बताया

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को बताया है कि उसने फर्जी खबरें फैलाने वाले तथाकथित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर पर भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए मामला दर्ज किया है। यह जानकारी जुबैर के मामले की जाँच कर रहे यूपी पुलिस के अफसर ने दी है।

यूपी पुलिस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को दिए गए एक हलफनामे में बताया है कि उसने भारतीय न्याय संहिता की अलग-अलग धाराओं में मोहम्मद जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज किया है। यह धाराएँ समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने, सबूत के साथ छेड़छाड़ और मानहानि समेत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से सम्बन्धित हैं। उस पर आईटी एक्ट की धाराएँ भी जोड़ दी गई हैं।

यह हलफनामा देने का आदेश हाई कोर्ट ने 25 नवम्बर, 2024 को हुई पिछली सुनवाई को दिया था। पुलिस ने बुधवार (27 नवम्बर, 2024) को यह हलफनामा कोर्ट को सौंपा है। मोहम्मद जुबैर इस मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा है।

मोहम्मद जुबैर के खिलाफ यह FIR उदिता त्यागी ने दर्ज करवाई है। जुबैर पेर आरोप है कि उसने डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती का एक पुराना वीडियो साझा किया और मुस्लिम भीड़ को भड़काया। इस वीडियो में कथित तौर पर यति नरसिंहानंद ने इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद का अपमान किया था।

इस वीडियो को डाले जाने के बाद मुस्लिम भीड़ डासना मंदिर के बाहर इकट्ठा हुई और बवाल काटा। देश के बाकी कई हिस्सों में भी मुस्लिमों ने खूब हंगामा किया। कई जगह पर ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए। इन हमलों में कई पुलिसवाले भी घायल हुए थे।

उदिता त्यागी ने इस मामले में मोहम्मद जुबैर पर कार्रवाई की माँग की है। उदिता त्यागी यति नरसिंहानंद सरस्वती फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। उदिता त्यागी ने इस मामले पर कहा है कि अगर उत्तर प्रदेश के सरकारी वकीलों ने सही पक्ष रखा तो मोहम्मद जुबैर को जेल जाने से कोई नहीं बचा पाएगा।