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मंदिर चलाते हैं जो कॉलेज, वहाँ केवल हिंदुओं की होगी बहाली: मद्रास हाई कोर्ट, तमिलनाडु सरकार ने कहा- ये संस्थान धार्मिक… सुहैल ने दायर की थी याचिका

मद्रास हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम के तहत मंदिरों द्वारा स्थापित और संचालित कॉलेजों में केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को ही नियुक्त किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा करना संवैधानिक रूप से अनुचित नहीं है क्योंकि यह संस्थान मंदिरों के धन से संचालित होते हैं और यह धार्मिक संस्थानों की श्रेणी में आते हैं।

क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला चेन्नई के अरुलमिगु कपालेश्वर आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज की नियुक्तियों से जुड़ा है। 37 वर्षीय मुस्लिम व्यक्ति ए. सुहैल ने इस कॉलेज में ऑफिस असिस्टेंट पद के लिए आवेदन करने की कोशिश की, लेकिन नियुक्ति के लिए केवल हिंदू उम्मीदवारों को पात्र मानने वाले नोटिफिकेशन के कारण उन्हें इंटरव्यू में शामिल होने का मौका नहीं मिला। सुहैल ने अपनी याचिका में कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 16(1) और 16(2) का उल्लंघन है, जो धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को रोकता है। सुहैल ने यह भी तर्क दिया कि यह कॉलेज एक शैक्षणिक संस्थान है, धार्मिक नहीं, इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

हाई कोर्ट का बैड़ा फैसला

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने सुहैल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह कॉलेज पूरी तरह से मंदिर के फंड से चलाया जाता है और इसलिए इसे हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 10 के तहत धार्मिक संस्थान माना जाएगा। उन्होंने कहा, “धारा 10 के अनुसार, ऐसे संस्थानों में केवल हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोगों की नियुक्ति की जा सकती है।”

मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 16(5) के तहत आता है, जो धार्मिक संस्थानों को उनके धर्म के आधार पर नियुक्ति करने की छूट देता है। जस्टिस ने यह भी कहा कि चूँकि यह कॉलेज स्वयं वित्तपोषित है और सरकारी सहायता नहीं लेता, इसलिए इसे ‘स्टेट’ की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के बयान का रखा था तर्क

सुहैल ने अपनी याचिका में यह भी तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘हिंदू’ कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि इस आधार पर किसी को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कौन ‘हिंदू’ है और कौन नहीं। सुहैल ने यह भी दावा किया कि HR&CE अधिनियम केवल मंदिरों और मठों जैसे धार्मिक संस्थानों पर लागू होता है, न कि किसी शैक्षणिक संस्थान पर। हालाँकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया।

तमिलनाडु सरकार ने भी रखा था अपना पक्ष

इससे पहले, तमिलनाडु सरकार ने अक्टूबर 2021 में हाई कोर्ट को बताया था कि मंदिर फंड से संचालित किसी भी कॉलेज या संस्थान में केवल हिंदू कर्मचारियों की नियुक्ति की जा सकती है। राज्य के महाधिवक्ता ने कोर्ट को यह जानकारी दी थी कि HR&CE अधिनियम गैर-हिंदुओं की नियुक्ति की अनुमति नहीं देता।

इस मामले में जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि मंदिर फंड से संचालित कॉलेज को एक धार्मिक संस्थान माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(1) और 16(2) समान अवसर और गैर-भेदभाव की बात करते हैं, लेकिन अनुच्छेद 16(5) धार्मिक संस्थानों को धर्म के आधार पर नियुक्ति की छूट देता है।

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल HR&CE अधिनियम के तहत मंदिरों की स्वायत्तता को बरकरार रखता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि धार्मिक संस्थानों के संचालन में उनके धार्मिक सिद्धांतों का पालन हो। इस फैसले ने संवैधानिक प्रावधानों और धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

लड़की को डेट पर ले जाओ, पर अब्बा/अम्मी/भाई भी होंगे साथ… मजहबी जोड़े कर सकेंगे ‘हलाल मुस्लिम डेट’, मुंबई में होने वाले इस्लामी कार्निवल के बारे में जानिए सब कुछ

मुंबई में आगामी दिनों में एक ‘इस्लामी कार्निवल’ होने जा रहा है। इसमें ‘हलाल’ डेट पर जाया जा सकेगा। इस हलाल डेट में लड़की के घरवाले साथ होंगे। इसे अलावा मुस्लिम कार्निवल में इस्लामी फैशन को भी दिखाया जा सकेगा। इस कार्निवल में मुस्लिम इन्फ्लुएंसर भी आएँगे। इसका प्रचार सोशल मीडिया के माध्यम से हो रहा है। इसको लेकर सोशल मीडिया में एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में दो हिजाबी लडकियाँ इस ‘हलाल डेट’ कार्यक्रम का प्रचार कर रही है।

लडकियाँ वीडियो में बताती हैं कि अगर आप मुस्लिम हैं और आपको ये नहीं पता कि भारत का पहला ‘मॉडेस्ट’ अवार्ड शो और फैशन शो आ रहा है, तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं। इसके बाद वह बताती है कि इस कार्यक्रम का नाम ‘सलाम रमजान 3.0’ है और इसे कई संस्थान मिल कर ला रहे हैं।

दोनों लड़कियाँ बताती हैं कि यहाँ एंट्री फ्री है। इसके बाद यह हलाल डेट का जिक्र करती हैं। लडकियाँ बताती हैं कि अगर आप एक अविवाहित मुस्लिम हैं, तो आपके लिए हम ‘हलाल मुस्लिम डेट’ भी आयोजित कर रहे हैं। लडकियाँ बताती हैं कि यहाँ मुस्लिम लड़का और लड़की एक दूसरे के साथ समय बिता सकेंगे लेकिन इस दौरान लड़की के परिजन मौजूद रहेंगे।

लड़कियों ने कहा कि इस दौरान लड़कियों के ‘मेहरम’ या ‘वली’ की मौजूदगी में मुलाक़ात होगी। यानि डेट तो होगी लेकिन उसमें ‘हलाल’ या ‘हराम’ का ध्यान रखा जाएगा। हलाल उस तरीके को कहा जाता है जो इस्लाम में जायज हो जबकि हराम की अनुमति नहीं होती।

‘हलाल डेट’ का अर्थ है कि इसकी इस्लाम में अनुमति है। इस अनुमति का आधार मेहरम हो होना है। मेहरम परिवार के उस शख्स को कहते हैं, जिसके साथ कोई महिला शादी नहीं कर सकती। वहीं इसी दौरान ‘वली’ का जिक्र किया गया, इसका अर्थ किसी अभिभावक से है।

इस कार्यक्रम को 21-23 फरवरी, 2025 में मुंबई में मिल्लत ग्राउंड, अँधेरी में आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम को कई संस्थान मिलकर आयोजित कर रहे हैं। इनमें से एक संस्थान इस्लामोपिडिया है और इसके अलावा हीना दाऊद का इवेंट मैनेजिंग कम्पनी कर रही है। इसमें ‘हलाल डेट’ के अलावा और भी कई इवेंट होने हैं।

डेटिंग यानी अविवाहित लड़के-लड़कियों के मिलने या साथ समय बिताने को लेकर लगातार बहस होती आई है। कई इस्लामी विद्वान इसे गलत या हराम करार देते हैं। हालाँकि, ‘हलाल डेट’ का कांसेप्ट भी लाया गया है।

हूर ब्रांड पैकेट पर लिखा ‘भैंस का मांस’, पुलिस ने पकड़ा तो निकला 185000 किलो गोमांस: पश्चिम बंगाल में काटे 8000 गाय, नोएडा में लाकर किया स्टोर

उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 नवंबर 2024 को ग्रेटर नोएडा में गोमांस की बड़ी खेप बरामद की थी। इससे एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है जिसमें गाय पश्चिम बंगाल में काटी जाती थी। कंटेनर के जरिए नोएडा लाई जाती थी। यहाँ के एक कोल्ड स्टोरेज में इसे स्टोर किया जाता था। फिर कथित तौर पर दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखंड में इसकी सप्लाई की जाती थी।

पुलिस ने 185 टन गोमांस बरामद किए जाने की बात कही है। लेकिन गो रक्षा हिंदू दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेद नागर का दावा है कि करीब 250 टन गोमांस पकड़ी गई थी। उनका यह भी कहना है कि कंटेनर से गोमांस की सप्लाई की सूचना उन्हें ही मेवात के गोरक्षक दलों से मिली थी।

लोनी से भाजपा MLA नन्द किशोर गुर्जर का कहना है कि पकड़ी गई गोमांस की खेप से लगता है कि कम से कम 8 हजार गायों को काटा गया होगा। उन्होंने लखनऊ में बैठे 2 बड़े अधिकारियों के इसमें संलिप्त होने का भी दावा किया है। हालाँकि इनके नाम नहीं बताए हैं। इस मामले में पुलिस ने अब तक 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। कोल्ड स्टोरेज पर बुलडोजर चलाने और आरोपितों पर NSA लगाने की भी माँग हो रही है।

हरियाणा नंबर की गाड़ी से सप्लाई

घटना नोएडा के दादरी की थाना क्षेत्र है। गोरक्षा संगठन के सदस्यों को पश्चिम बंगाल से गोमांस आने की सूचना मिली थी। इस सूचना पर संगठन के सदस्य जमा हुए। एक ट्रक जिसका नंबर HR 38 AE 9185 था को रोक कर तलाशी ली गई तो उसमें मांस मिला। मामले की सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस ने घटनास्थल पर पहुँच कर माँस के सैम्पल लिए और जाँच के लिए भेजा। जाँच में यह गोमांस पाया गया।

इस ट्रक को शिव शंकर चला रहा था जो UP के एटा जिला का निवासी है। ट्रक का खलासी भी इसी जिले का सचिन था। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पूछताछ में इन्होंने बताया है कि वे मांस पश्चिम बंगाल से ला रहे थे। इसे थोक भाव में हबीबर मुल्ला से खरीदा गया था। इन्होंने बताया कि वे ट्रक SPJ कोल्ड स्टोरेज में ले जा रहे थे जो गौतम बुद्ध नगर जिले के नगला किरानी गाँव में है।

अब तक 9 गिरफ्तार, कोल्ड स्टोरेज सील

ऑपइंडिया के पास इस मामले की FIR कॉपी मौजूद है। केस भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 325 के तहत दर्ज किया गया है। कोल्ड स्टोरेज के मालिक पूरन जोशी, डायरेक्टर मोहम्मद खुर्शिदुन नबी और मैनेजर अक्षय सक्सेना को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। कोल्ड स्टोर और ट्रक सीज कर लिया गया है। 23 नवंबर को पुलिस ने इस तस्करी में शामिल दिल्ली निवासी सलीमुद्दीन अंसारी को भी दबोच लिया।

जाँच के दौरान अविनाश कुमार, राकेश सिंह और शोएब हकानी की भी मिलीभगत का पता चला। ये तीनों टोरो प्राइमरी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कम्पनी में स्टाफ हैं। इस कम्पनी पर कोल्ड स्टोरेज में रखे गए गोमांस की खरीद-फरोख्त का आरोप है। रविवार (24 नवंबर 2024) को पुलिस ने शोएब, अविनाश और राकेश को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस केस में BNS 325 के साथ 318 (4) 61 (2) और 3/8 गौवध अधिनियम की वृद्धि की गई है।

नोएडा पुलिस के अनुसार कुल 185 टन गोमांस बरामद हुआ है। इसमें से 153 टन कोल्ड स्टोरेज के चैंबर नंबर 5 में रखा गया था। शेष गोमांस पश्चिम बंगाल से आए कंटेनर से बरामद हुआ था। पुलिस ने बरामद गोमांस की कीमत लगभग 4 करोड़ रुपए बताई है। यह मांस बोनलेस था। बोनलेस मांस उस हिस्से से काट कर निकाला जाता है जिसमें हड्डी नहीं होती। इसके सैम्पल सुरक्षित रख कर बाकी मांस को नियमानुसार नष्ट कर दिया गया है।

‘हूर’ ब्रांड, पैकेट पर लिखा था भैंस का मीट

बरामद गोमांस की पैकिंग काले और पीले रंग के पैकेटों में की गई थी। पैकेटों पर ब्रांड का नाम ‘हूर’ लिखा हुआ था। साथ ही अंग्रेजी और अरबी में ‘FROZEN BONELESS BUFFALO MEAT’ लिखा हुआ था। बताया गया था कि पैकेट हलाल सर्टिफाइड हैं। मांस निकलने के लिए पशु को पूरे इस्लामिक तौर तरीकों से काटा गया है। पैकिंग करने वाले का नाम ‘मुराद कर्बला फ़ूड’ प्रिंट दर्ज था। मांस को जिस पॉलीथिन में रोल किया गया था उस पर भी अरबी भाषा में तमाम शब्द लिखे हुए थे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए गोरक्षक वेद नागर ने बताया कि उनको गोमांस आने की सूचना मेवात के गोरक्षा दलों से मिली थी। उनके अनुसार यह भारत में गोमांस की सबसे बड़ी बरामदगी है।

उन्होंने गो तस्करी में शामिल लोगों को राजनैतिक संरक्षण मिलने की भी बात कही है। आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगस्टर एक्ट के तहत एक्शन की माँग की है। प्रशासनिक कार्रवाई में ढिलाई होने पर हिन्दू महापंचायत का भी एलान किया है।

प्रशासनिक कार्रवाई में ढिलाई होने पर हिन्दू महापंचायत का भी एलान किया है। एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए नागर ने कहा कि यदि प्रशासन कोल्ड स्टोरेज पर बुलडोजर नहीं चलाएगा तो स्थानीय निवासी ही इसे ध्वस्त कर देंगे। उन्होंने आशंका जताई है कि कोल्ड स्टोरेज का मालिक पूरन जोशी धर्म परिवर्तन कर चुका है।

काटे गए 8 हजार से अधिक गोवंश: बीजेपी MLA

लोनी से भाजपा MLA नन्द किशोर गुर्जर ने दादरी को प्राचीन समय से गोरक्षकों का क्षेत्र बताते हुए इतनी बड़ी मात्रा में गोमांस की बरामदगी को सभी के लिए डूब मरने जैसी स्थिति बताया है। उन्होंने इस मामले में स्थानीय पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप लगाया है।

बीजेपी विधायक का कहना है कि कुछ अधिकारी सही मंशा से काम नहीं कर रहे। उन्होंने 8000 गायों के काटे जाने का अनुमान लगाया है। कहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी देंगे।

MLA गुर्जर का दावा है कि लखनऊ में बैठे 2 बड़े अधिकारी पूरे प्रदेश में गायों को कटवा कर उसका पैसा रख रहे हैं। उन्होंने इन दोनों अधिकरियों पर निचले स्टाफ के ऊपर दबाव डालने और सरकार की छवि बर्बाद करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इस मामले की CBI जाँच की माँग की है।

मैं उसे मार देना चाहती थी, लेकिन 9 साल की थी, कुछ कर नहीं सकी… जिस देविका रोतावन की गवाही से अजमल कसाब को हुई फाँसी, वह बोली- 26/11 मत भूलना देशवासियों

“मैं उसे मारना चाहती थी, लेकिन मैं सिर्फ 9 साल की थी। कोर्ट में उसे पहचानने के अलावा मैं कुछ नहीं कर सकी।” ये शब्द हैं 26/11 मुंबई हमले की पीड़िता देविका रोतावन के, जिन्होंने महज नौ साल की उम्र में आतंकी अजमल कसाब के खिलाफ गवाही देकर उसे फांसी तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। 2008 के इस खौफनाक आतंकी हमले ने न सिर्फ देश को दहला दिया, बल्कि एक बच्ची के साहस और जज्बे की ऐसी कहानी भी लिखी, जो आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई का प्रतीक बन गई।

26/11/2008 – यह तारीख भारतीय इतिहास के सबसे काले दिनों में गिनी जाती है। उस रात पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के 10 आतंकवादियों ने मुंबई में तबाही मचाई थी। चार दिनों तक चले इस आतंकवादी हमले में 166 लोग मारे गए, जिनमें 18 सुरक्षा कर्मी भी शामिल थे। 300 से अधिक लोग घायल हुए।

देविका को याद है वो खौफनाक आतंकी हमला

देविका अब 25 साल की हो चुकी हैं। हमले की 16वीं बरसी पर उन्होंने उस खौफनाक रात को याद करते हुए कहा, “16 साल हो गए, लेकिन मैं अब भी सब कुछ याद कर सकती हूँ। मैं क्या कर रही थी, कहाँ जा रही थी, और कैसे हमला हुआ।” देविका अपने पिता और भाई के साथ पुणे जाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) पहुँची थीं। उसी समय, अचानक गोलियों और धमाकों की आवाजें गूँज उठीं।

देविका ने याद करते हुए कहा, “हम बान्द्रा से CSMT पहुँचे ही थे कि एक धमाका हुआ और फिर गोलियों की बौछार शुरू हो गई। हर तरफ चीख-पुकार थी। लोग घायल हो रहे थे।” इस हमले में देविका के पैर में गोली लगी। उन्हें सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया और फिर जे.जे. अस्पताल में उनका ऑपरेशन हुआ। शारीरिक घाव तो कुछ समय में भर गए, लेकिन मानसिक घाव आज भी ताजा हैं।

आतंकवादी कसाब के खिलाफ गवाही रही बेहद अहम

घटना के बाद जब मुंबई क्राइम ब्रांच ने देविका के परिवार से संपर्क किया, तो उन्होंने अजमल कसाब के खिलाफ अदालत में गवाही देने का फैसला किया। कसाब इस हमले का इकलौता जीवित पकड़ा गया आतंकवादी था। देविका ने बताया, “मेरे पिता और मैंने आतंकवादियों को देखा था। मैं कसाब को पहचान सकती थी। मैंने अदालत में उसकी पहचान की। मैं उसे मारना चाहती थी, लेकिन नौ साल की थी, कुछ कर नहीं सकी।” देविका की गवाही ने कसाब के खिलाफ सबूतों को मजबूत किया। इसके बाद, कसाब को 2012 में फांसी दे दी गई।

26/11 मुंबई हमले से 2 साल पहले ही देविका की माँ का निधन हो चुका था। इस कठिन समय में उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाने की ठानी। देविका ने कहा, “आतंकवाद को खत्म करना जरूरी है। समाज में गलत कामों के खिलाफ बोलना चाहिए। आतंकवाद की शुरुआत पाकिस्तान से होती है, इसे रोकना चाहिए।” हालाँकि, इस संघर्ष में उनके परिवार को सामाजिक रूप से आईसोलेशन भी झेलना पड़ा। देविका ने कहा, “हमें शादी या किसी भी पारिवारिक समारोह में नहीं बुलाया जाता था। लेकिन अब लोग फिर से बुलाने लगे हैं।”

60 घंटे तक आतंकियों ने मचाई थी मुंबई में तबाही

26/11 का हमला न केवल निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने वाला था, बल्कि इसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। 60 घंटे तक चले इस हमले में आतंकवादियों ने ताजमहल पैलेस होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल और नरीमन हाउस जैसे स्थानों पर लोगों को बंधक बनाया। सुरक्षा बलों ने नौ आतंकवादियों को मार गिराया और अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा। कसाब का पकड़ा जाना और उसकी फांसी भारत के आतंकवाद विरोधी प्रयासों का महत्वपूर्ण मोड़ बना। इस हमले के बाद भारत ने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की दिशा में कदम उठाए।

देविका ने देशवासियों से अपील की है कि वे उस खौफनाक रात को न भूलें और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट रहें। देविका ने कहा, “आतंकवाद खत्म होना चाहिए। लोगों को पीड़ितों के साथ खड़ा होना चाहिए और उस रात को याद रखना चाहिए।”

देविका रोतावन आज भी आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। उनकी कहानी न केवल उनके साहस की मिसाल है, बल्कि यह आतंकवाद के खिलाफ देश की एकजुटता का प्रतीक भी है। 26/11 के हमले ने भले ही देश को गहरा जख्म दिया हो, लेकिन देविका जैसी बहादुर लड़कियों ने यह साबित कर दिया कि आतंक के खिलाफ जीत इंसानियत की होती है।

नाम के राजा, खून से राजतिलक, परंपरा निभाते-निभाते उदयपुर में हो गया बवाल: जानिए ‘राजपरिवार’ का दियादी झगड़ा कैसे पत्थरबाजी तक पहुँचा

उदयपुर के पूर्व राजघराने के लिए महाराणा प्रताप के वंशज विश्वराज सिंह मेवाड़ का सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को राजतिलक किया गया। इसे ‘दस्तूर’ कहा जाता है। इसके बाद विश्वराज सिंह ने उदयपुर के शाही महल ‘सिटी पैलेस’ में घुसने की कोशिश की। यहाँ वह एकलिंगजी मंदिर और धूणी पर जाकर दर्शन करना चाहते थे।

महल के दरवाजे उनके ही चाचा अरविन्द सिंह मेवाड़ ने बंद करवा दिए। उन्होंने अखबार में इश्तिहार देकर कहा कि यहाँ कोई नहीं घुस सकता है और इसके कानूनी कागज भी पेश कर दिए। जब विश्वराज सिंह और उनके समर्थकों ने महल में घुसने की कोशिश की तो पथराव हो गया।

पुलिस ने विश्वराज सिंह के समर्थकों को रोक दिया। इसके बाद प्रदर्शन भी हुआ। सोमवार शाम से लेकर मंगलवार रात तक स्थिति शाही झगड़े के कारण तनावपूर्ण रही। इस बीच विवादित जगहों को प्रशासन ने कानून व्यवस्था की दृष्टि से कुर्क भी कर ली है।

खून से राजतिलक, दस्तूर

सोमवार को विधायक और उदयपुर के पूर्व राजघराने के सदस्य विश्वराज सिंह मेवाड़ का राजतिलक और गद्दी पर बिठाने की परंपरा निभाई गई। यह राजतिलक उनके पिता महेंद्र सिंह मेवाड़ (10 नवम्बर, 2024) को हुई मृत्यु के बाद किया गया है।

यह परंपरा चित्तौडगढ़ किले के फतह प्रकाश महल में पूरी की गई। यहाँ विश्वराज सिंह मेवाड़ को गद्दी पर बिठाया गया। उनके आसपास राजपरिवार के लोग और सेवक मौजूद रहे। इसके साथ ही कई और राजघरानों के लोग भी इस राजतिलक में शामिल होने के लिए आए।

रक्त राजतिलक

इसके बाद सलूंबर के रावत देवव्रत ने अपने म्यान से तलवार निकाली और उस पर अंगूठा में चीरा लगाकर खून निकाला। इस खून से विश्वराज सिंह को तिलक लगाया गया। इसी के साथ उनके राजतिलक की परंपरा पूरी हुई। इसके बाद यहाँ आए लोगों ने विश्वराज सिंह मेवाड़ को नजराने पेश किए। उन्होंने गद्दी पर बैठ कर सबसे अभिवादन स्वीकार किए।

खून से तिलक करने की यह परंपरा उदयपुर राजपरिवार में महाराणा प्रताप के समय से चली आ रही है। महाराणा प्रताप का सबसे पहले तिलक खून से किया गया था। तबसे यहाँ राजतिलक ख़ून से ही होता है। यह खून का तिलक सलूंबर के ही रावत लगाते हैं।

परंपरा नहीं हुई पूरी

विश्वराज सिंह मेवाड़ राजतिलक की रस्म के बाद अपने समर्थकों के साथ उदयपुर के शाही महल ‘सिटी पैलेस’ जाने के लिए निकले। परंपरा के अनुसार, राजतिलक के बाद उन्हें यहाँ जाकर एकलिंगजी (भगवान शिव का रूप) के दर्शन करने थे और आशीर्वाद लेना था। इसके साथ ही वह धूणी माता पर भी दर्शन करते।

दरअसल, एकलिंगजी के प्रतिनिधि के रूप में ही मेवाड़ के शासक शासन करते आए हैं। इन शासकों को इसीलिए ‘एकलिंगजी का दीवान’ कहा जाता है। विश्वराज सिंह मेवाड़ और उनके समर्थकों को सिटी पैलेस के दरवाजों पर ही रोक दिया गया। यहाँ पुलिस का भारी बंदोबस्त किया गया था।

मेवाड़ राजतिलक
उदयपुर सिटी पैलेस के बाहर होता हंगामा

उन्हें सिटी पैलेस में घुसने से किसी और ने नहीं बल्कि उनके ही चाचा अरविन्द सिंह मेवाड़ के परिवार ने रोका था। अरविन्द सिंह मेवाड़ उनके पिता महेंद्र सिंह मेवाड़ के छोटे भाई हैं। उन्हें घुसने से रोका इसलिए गया क्योंकि दोनों भाइयों में सम्पत्ति को लेकर लंबा विवाद है। अरविन्द सिंह मेवाड़ ने इसको लेकर अखबार में तक इश्तिहार दिया था।

इसके बाद विवाद चालू हुआ। विवाद में पथराव भी हुआ है। कई लोग घायल हुए। पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़ दी गई। विश्वराज सिंह मेवाड़ के समर्थक यहीं बैठ गए और नारेबाजी भी करने लगे। उन्होंने प्रशासन पर भी नाराजगी जताई। हालाँकि, आखिर में रात 1:30 बजे विश्वराज सिंह मेवाड़ अपने महल लौट गए।

विवाद क्या है?

इस विवाद को जानने के लिए सबसे पहले मेवाड़ के वर्तमान शाही परिवार को समझ लेते हैं। उदयपुर राज्य का विलय भारत में आजादी के साथ ही हो गया था। लेकिन उनकी परंपरा चलती आ रही थी। उदयपुर में आजादी के समय महाराणा भूपाल सिंह का शासन था। उनके बाद 1955 में उनके बेटे महाराणा भगवत सिंह को गद्दी पर बिठाया गया।

भगवत सिंह अंतिम महाराणा थे। भगवत सिंह के बेटे महेंद्र सिंह मेवाड़ और अरविन्द सिंह मेवाड़ हैं। महेंद्र सिंह मेवाड़ बड़े बेटे थे जबकि अरविन्द सिंह मेवाड़ छोटे बेटे। भगवत सिंह मेवाड़ ने 1963 से 1983 के बीच उदयपुर राजघराने की कई संपत्तियों में हिस्सेदारी बेची। कुछ सम्पत्तियों को लीज पर भी दिया।

मेवाड़ राजतिलक
महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ (बीच में), उनके छोटे बेटे अरविन्द मेवाड़ (बाएँ) और महेंद्र सिंह मेवाड़ (दाएँ) (फोटो @SiddharthKG7/x & Eternal Mewar)

उनकी इस बात से महेंद्र सिंह मेवाड़ गुस्सा हो गए। उन्होंने अपने पिता पर ही 1983 में एक मुकदमा दायर कर दिया। महेंद्र सिंह का दावा था कि उनके पिता ने गलत किया है। उन्होंने ज्यादातर सम्पत्ति को अपने नाम किए जाने की माँग की। उनका कहना था कि नियमानुसार राजघराने के बड़े बेटे को सम्पत्ति मिलती है, इसलिए उनका हिस्सा दिया जाए।

भगवत सिंह, महेंद्र सिंह के मुकदमे वाले कदम से काफी गुस्सा हुए। महेंद्र सिंह को भगवत सिंह ने प्रॉपर्टी से बेदखल कर दिया। इसी के साथ उदयपुर राजघराने की सारी सम्पत्ति एक ट्रस्ट के पास ट्रांसफर की गई। इसका मुखिया छोटे बेटे अरविन्द सिह मेवाड़ को बना दिया गया।

जायदाद से बेदखल किए जाने के बाद महेंद्र सिंह मेवाड़ ने सिटी पैलेस छोड़ कर पास के समोर बाग़ में अपना निवास बना लिया। अरविन्द सिंह मेवाड़ और उनके बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ अब भी उदयपुर के महल यानी सिटी पैलेस में रहते हैं।

वर्तमान में विवाद तीन बड़ी संपत्तियों पर ही है। इसमें मुख्य सम्पत्ति सिटी पैलेस है, इसका मूल नाम शंभू निवास है। इसके अलावा बड़ी पाल और घास घर नाम की भी दो संपत्तियों पर लड़ाई है। यह मामला जब उदयपुर की अदालत पहुँचा तो उसने फैसला दिया कि सम्पत्तियाँ चारों में बाँटी जाएँ। इसके अलावा शंभू निवास 4-4 साल के लिए सबके कब्जे में रहे।

हाई कोर्ट ने 2022 में इस फैसले पर रोक लगा दी। इन सभी संपत्तियों के व्यावसयिक उपयोग पर भी विवाद है। अब चूंकि एकलिंगजी का मंदिर और धूणी देवी माता इसी सिटी पैलेस के अंदर हैं, इसलिए राजतिलक के बाद इस पर विवाद हो रहा है। इसी में पथराव भी हुआ।

विश्वराज सिंह मेवाड़ ने क्या कहा?

विश्वराज सिंह मेवाड़ ने इस पूरे विवाद के बाद कहा कि वह एकलिंग जी और धूणी माता के दर्शन करना चाहते हैं। उन्होंने रोके जाने को गलत बताया। विश्वराज सिंह मेवाड़ ने कहा कि दर्शन करना परंपरा है, इसलिए वह जाना चाहते हैं। उन्होंने यहाँ दोबारा जाने की बात कही है। इस बीच प्रशासन ने उन संपत्तियों को कुर्क कर लिया है, जिन पर विवाद है।

अपनी ही लगाई आग में जल रहा बांग्लादेश, अजान की आ रही थी आवाज और एक-दूसरे को कूट रहे थे छात्र: कॉलेजों में तबाही, 8000 पर FIR

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में डॉ. महबूबुर रहमान मोल्ला कॉलेज (DRMC) में छात्रों के दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प ने पूरे इलाके को दहला दिया। इस हिंसा में कॉलेज को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा, 100 से अधिक छात्र घायल हुए, और स्थानीय निवासियों के बीच भय का माहौल पैदा हो गया। इस मामले में 7 हजार से 8000 छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (25 नवंबर 2024) सुबह करीब 10 बजे सुहरावर्दी कॉलेज के छात्रों ने डंडों के साथ प्रदर्शन शुरू किया और कवि नजरुल कॉलेज के सामने जुट गए। यहाँ छात्रों ने जोरदार नारेबाजी की और कॉलेज प्रशासन के शांति की अपील करने पर उन्हें ‘फेक, फेक’ के नारों से जवाब दिया। इसके बाद ये छात्र डॉ. महबूबुर रहमान मोल्ला कॉलेज पहुँचे और वहाँ बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ शुरू कर दी। ये बवाल ढाका के पॉलिटेक्निक कॉलेज तक पहुँच गया।

कॉलेज प्रशासन के मुताबिक, छात्रों के इस हिंसक प्रदर्शन में कॉलेज को लगभग 70 करोड़ टका का नुकसान हुआ। 12 मंजिला कॉलेज बिल्डिंग की लगभग सभी खिड़कियाँ और दरवाजे टूट गए। लाइब्रेरी, कैश काउंटर, प्रिंसिपल का ऑफिस, विज्ञान प्रयोगशाला और शौचालय तक तोड़ दिए गए। आठवीं और नौवीं मंजिल पर स्थित दो विज्ञान प्रयोगशालाओं में छात्रों ने केमिकल फैला दिए, जिससे जहरीली गैस पूरे कॉलेज में फैल गई।

कॉलेज के प्रधानाचार्य ओबैदुल्लाह नय्योन ने बताया कि 300 से अधिक पंखे, 30 लैपटॉप, पाँच लिफ्ट और कई अन्य महत्वपूर्ण उपकरण नष्ट कर दिए गए। इसके अलावा, छात्रों ने कॉलेज से महत्वपूर्ण दस्तावेज और प्रमाणपत्र भी बर्बाद कर दिए। प्रधानाचार्य ने पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी और अन्य सुरक्षाबल सुबह से मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने छात्रों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। कॉलेज प्रशासन ने एक फेसबुक ग्रुप “UCB” पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि इस ग्रुप के माध्यम से छात्रों को उकसाया गया और साजिश रची गई

8000 छात्रों के खिलाफ एफआईआर

वहीं, ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस के वारी डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद सालेह उद्दीन ने कहा कि यह हमला अचानक नहीं, बल्कि योजना बनाकर रची गई साजिश थी। उनका दावा है कि कुछ बाहरी तत्व, जो खुद को छात्र बताकर कॉलेज में दाखिल हुए, इस हमले के पीछे थे। पुलिस ने आरोपियों को 24 घंटे के भीतर पकड़ने का वादा किया है। सोमवार (25 नवंबर 2024) को पुलिस ने घटना को लेकर एफआईआर दर्ज की, जिसमें 7,000-8,000 छात्रों के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। एफआईआर में सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने, पुलिस पर हमला करने और सरकारी हथियारों की लूटपाट का जिक्र है।

इस बवाल की वजह से सुहरावर्दी कॉलेज की ऑनर्स प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ स्थगित कर दी गई हैं। साथ ही, कॉलेज के छात्रों और कर्मचारियों के बीच असुरक्षा की भावना व्याप्त है। पुलिस और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) ने इलाके में भारी सुरक्षा व्यवस्था की है।

कौन हैं संत चिन्मय कृष्ण दास प्रभु जिन्हें बांग्लादेश ने ‘देशद्रोह’ में किया गिरफ्तार, रिहाई की माँग कर रहे हिंदुओं पर भी हमला: इस्कॉन ने कहा- दखल दे भारत

बांग्लादेश में हिंदू धार्मिक संगठन इस्कॉन (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस) के प्रमुख नेताओं में से एक चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच गहरा आक्रोश और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। चिन्मय कृष्ण दास प्रभु को सोमवार (25 नवंबर 2024) को ढाका के हजरत शाह जलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया। उन पर देशद्रोह और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया गया है। उनकी गिरफ्तारी के बाद से कई जिलों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चिन्मय कृष्ण दास प्रभु को ढाका से चटगांव जाने के दौरान डिटेक्टिव ब्रांच (डीबी) ने हिरासत में लिया। इस गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस के जासूसी शाखा के अतिरिक्त आयुक्त रेजाउल करीम मल्लिक ने बताया कि उन्हें पुलिस के अनुरोध पर गिरफ्तार किया गया है।

गिरफ्तारी का मुख्य आधार 25 अक्टूबर को चटगांव के लालदीघी मैदान में आयोजित एक रैली है, जिसमें उन्होंने भाषण दिया था। इस रैली में कुछ प्रदर्शनकारियों ने ‘आमी सनातनी’ लिखे भगवा ध्वज को चटगाँव के न्यू मार्केट चौक स्थित ‘आजादी स्तंभ’ पर फहराया। इसे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान मानते हुए बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) नेता फिरोज खान ने उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज कराया।

प्रदर्शन कर रहे हिंदुओं पर ढाका में हमला

चिन्मय प्रभु की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ढाका के सहबाग में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने मुख्य सड़कों को जाम कर दिया और ‘हम न्याय के लिए मरेंगे, हम इसके लिए लड़ेंगे’ जैसे नारे लगाए। इस दौरान ढाका यूनिवर्सिटी के जगन्नाथ हॉल में प्रदर्शन कर रहे हिंदुओं पर कुछ अज्ञात लोगों ने लाठी-डंडों से हमला किया। यह हमला शाहबाग पुलिस स्टेशन से मात्र 30 मीटर की दूरी पर हुआ। इस घटना में 20 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हुए। वहीं, दिनाजपुर और चटगाँव में भी सड़कों पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। प्रदर्शनकारियों का मुख्य उद्देश्य चिन्मय कृष्ण दास की तुरंत रिहाई की माँग करना था।

इस्कॉन का बयान और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

इस्कॉन बांग्लादेश ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को ‘अत्याचार’ बताते हुए उनकी रिहाई की माँग की है। इस्कॉन, इंक. ने अपने बयान में कहा, “हम एक शांतिप्रिय भक्ति आंदोलन हैं। किसी भी प्रकार के आतंकवाद से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। बांग्लादेश सरकार से हम अपील करते हैं कि चिन्मय प्रभु को तुरंत रिहा किया जाए।”

इस्कॉन के प्रवक्ता राधारमण दास ने सोशल मीडिया पर लिखा, “चिन्मय कृष्ण दास, जो बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, को ढाका पुलिस ने गिरफ्तार कर अज्ञात स्थान पर भेज दिया है। हम भारत सरकार और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से आग्रह करते हैं कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें।”

भारत में भी इस गिरफ्तारी पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है। बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने इसे ‘बांग्लादेशी हिंदुओं के खिलाफ दमन की कार्रवाई’ बताते हुए भारत सरकार से हस्तक्षेप की माँग की।

हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों के बीच गिरफ्तारी

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। अगस्त में सत्ता परिवर्तन के बाद से हिंदू समुदाय के 205 से अधिक हमले दर्ज किए गए हैं। इनमें मंदिरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और निजी संपत्तियों को निशाना बनाया गया। खुलना जिले में इस्कॉन मंदिर पर हमला कर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति जला दी गई थी। इसके अलावा, 52 जिलों में हिंदुओं पर अत्याचार की खबरें आईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई सरकार बनने के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के 49 शिक्षकों से जबरन इस्तीफा ले लिया गया।

कौन हैं चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी?

चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी उर्फ चिन्मय प्रभु बांग्लादेश के प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक नेता और इस्कॉन के प्रवक्ता हैं। वे लंबे समय से हिंदू समुदाय के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों के खिलाफ कई विरोध रैलियों का नेतृत्व किया। सनातन जागरण मंच द्वारा आयोजित चटगांव की रैली में उन्होंने 8 सूत्रीय माँगें रखी थीं, जिनमें हिंदू मंदिरों की सुरक्षा और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए एक विशेष मंत्रालय की स्थापना की माँग प्रमुख थी।

बता दें कि बांग्लादेश में इस्कॉन के 77 से अधिक मंदिर हैं, जो देश के लगभग हर जिले में स्थित हैं। लगभग 50,000 लोग इस्कॉन से जुड़े हुए हैं। बांग्लादेश के हिंदू समुदाय के लिए इस्कॉन धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनकी रिहाई के लिए उठ रही आवाजें न केवल बांग्लादेश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूँज रही हैं। यह घटना उस देश की राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता को भी उजागर करती है, जो अल्पसंख्यक समुदायों के लिए चिंता का विषय है।

जब 3 दिनों तक पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई को बनाया बंधक, 26/11 के बलिदानियों को बरसी पर राष्ट्र का नमन

साल 2008, तारीख 26 नवंबर, आज से ठीक 14 साल पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने एक ऐसा हमला किया था, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। बम धमाकों और गोलीबारी के बीच एक तरह से करीब 60 घंटे तक मुंबई बंधक बनी रही।

आज भी यह आतंकी हमला भारत के इतिहास का वो काला दिन है जिसे शायद ही कोई भूला सकता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हमले में 160 से ज्यादा लोग मारे गए, 300 से ज्यादा घायल हुए थे। और इन आतंकियों का सामना करते हुए मुंबई पुलिस, होमगॉर्ड, ATS, NSG कमांडों सहित कुल 22 सुरक्षाबलों ने अपना बलिदान दिया था।

पाकिस्तानी आतंकी हमले को नाकाम करने में वीरगति को प्राप्त हुए सुरक्षाबलों की बात करें तो मुंबई पुलिस, एटीएस, NSG कमाण्डों में प्रमुख नाम ATS प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे, एसीपी सदानंद दाते, एनएसजी के कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एसआई विजय सालस्कर, इंस्पेक्टर सुशांत शिंदे, एसआई प्रकाश मोरे, एसआई दुरूगड़े, एएसआई नाना साहब भोंसले, एएसआई तुकाराम ओंबले, कॉन्सटेबल विजय खांडेकर, जयवंत पाटिल, योगेश पाटिल, अंबादास पवार और एम.सी. चौधरी जैसे प्रमुख नाम हैं।

इनके अलावा होमगॉर्ड मुकेश बी जाधव, अरुण चिट्टे, हवलदार गजेंद्र सिंह, नागप्पा आर महाले, किशोर के.शिंदे, संजय गोविलकर और सुनील कुमार यादव ने भी आतंकियों का सामना करते हुए अपना बलिदान दिया था।

देश के इन वीर-बलिदानियों पर आगे बात करने से पहले उस दिन क्या हुआ था यदि उस पर संक्षेप में एक नजर डालें तो 26/11 मुंबई हमलों की छानबीन से जो कुछ सामने आया है, वह बताता है कि 10 हमलावर कराची से नाव के रास्ते मुंबई में घुसे थे।

इस नाव पर चार भारतीय भी सवार थे, जिन्हें किनारे तक पहुँचते-पहुँचते आतंकियों ने मार डाला था। रात के तकरीबन आठ बजे थे, जब ये हमलावर कोलाबा के पास कफ़ परेड के मछली बाजार पर उतरे। वहाँ से वे चार ग्रुपों में अलग-अलग बँट गए और टैक्सी लेकर आतंकी मंसूबों को अंजाम देने मुंबई में अपने टारगेट की तरफ निकल गए।

कहा तो यह भी जाता है कि इन लोगों की आपाधापी और हड़बड़ाहट देखकर कुछ मछुआरों को शक भी हुआ और उन्होंने पुलिस को जानकारी भी दी। लेकिन शुरू में मुंबई पुलिस ने इसे कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी और न ही आगे बड़े अधिकारियों या खुफिया एजेंसियों को जानकारी दी।

मीडिया रिपोर्टों के हवाले से बात करें तो रात करीब साढ़े 9 बजे के आसपास छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलीबारी की पहली खबर मिली। यहाँ दो आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर 52 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। 100 से ज्यादा लोग हमले में घायल भी हुए।

आतंकियों के पास एके-47 राइफलें थीं। यहीं पर हमला करने वालों में एक आतंकी अजमल आमिर कसाब भी था, जिसे बाद में मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले ने जकड़ लिया और 10 में से जीवित पकड़ा जाने वाला यही एकमात्र आतंकी था।

आगे अपने विदेशी ग्राहकों के लिए मशहूर लियोपोल्ड कैफे में दो आतंकियों ने जमकर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में भी 10 लोग मारे गए थे। हालाँकि, जल्द ही यहाँ दोनों आतंकियों को भी सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया। इसके बाद हमला नरीमन हाउस बिजनेस एंड रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स पर हुआ।

हमले से कुछ देर पहले ही पास के गैस स्टेशन में बड़ा धमाका भी हुआ। जिसके बाद नरीमन हाउस में मौजूद लोग बाहर की तरफ आए और इसी दौरान आतंकियों ने उन पर फायरिंग झोंक दी। सबसे बड़ा हमला होटल ताज पर था यदि आतंकी यहाँ अपने मंसूबों में पूरी तरह कामयाब होते तो आतंकी इतिहास में इस दिन की चोट और भी गहरी होती।

इन पाकिस्तानी आंतकियों से लड़ते-लड़ते देश के वीर जाँबाजों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।  मुंबई पुलिस के बहादुर पुलिसकर्मियों, ATS के जवानों और एनएसजी कमांडो सहित तमाम सुरक्षाबलों ने इन आतंकियों का डटकर सामना किया और 10 में से 9 आतंकियों को मारकर अनगिनत लोगों की जान बचाई।

उनमें से आइए जानतें हैं कुछ बहादुर योद्धाओं के बारें में जिन्होंने अपनी जान की परवाह न कर उस दिन लोगों की सुरक्षा करते हुए खुद बलिदान हो गए थे।

मुंबई एटीएस चीफ हेमंत करकरे

मुंबई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे जब यह आतंकी हमला हुआ उस समय अपने घर में खाना खा रहे थे, जब उनके पास आतंकी हमले को लेकर क्राइम ब्रांच ऑफिस से फोन आया। करकरे तुरंत घर से निकले और एसीपी अशोक काम्टे, इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के साथ मोर्चा सँभाला।

हालाँकि, कामा हॉस्पिटल के बाहर चली मुठभेड़ में आतंकी अजमल कसाब और इस्माइल खान की अंधाधुंध गोलियाँ लगने से वह बलिदान हो गए। बाद में मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। हेमंत करकरे ने मुंबई सीरियल ब्लास्ट और मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच में भी अहम भूमिका निभाई थी। हालाँकि इनके ऊपर कई कई दूसरे आरोप भी थे जो बाद में इनके बदनामी का कारण भी बनें।

एसीपी अशोक काम्टे

अशोक काम्टे मुंबई पुलिस में बतौर एसीपी तैनात थे। जिस वक्त मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, वह एटीएस चीफ हेमंत करकरे के साथ थे। कामा हॉस्पिटल के बाहर पाकिस्तानी आतंकी इस्माइल खान ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। तभी एक गोली उनके सिर में जा लगी। घायल होने के बावजूद उन्होंने लश्कर आतंकी इस्माइल खान को मार गिराया।

सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर

कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड के लिए खौफ का दूसरा नाम रहे सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर भी कामा हॉस्पिटल के बाहर हुई फायरिंग में हेमंत करकरे और अशोक काम्टे के साथ आतंकियों की गोली लगने से बलिदान हो गए थे। विजय सालस्कर को भी मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।

एएसआई तुकाराम ओंबले

मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले का जब गिरगाँव चौपाटी पर अजमल कसाब से सामना हुआ, तब वह पूरी तरह निहत्थे थे। यह जानने के बावजूद कि सामने वाले के हाथों में एके-47 है, वह अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकी कसाब पर टूट पड़े। इस दौरान उन्हें कसाब की बंदूक से कई गोलियाँ लगीं और वह बलिदान हो गए लेकिन कसाब से अपनी पकड़ ढीली नहीं की। बलिदानी तुकाराम ओंबले को उनकी इस जाँबाजी के लिए शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन नेशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडो थे। वह 26/11 एनकाउंटर के दौरान मिशन ऑपरेशन ब्लैक टारनेडो का नेतृत्व कर रहे थे और 51 एसएजी के कमांडर थे। जब ताज महल पैलेस और टावर्स होटल पर कब्जा जमाए बैठे आतंकियों से लड़ रहे थे तो एक आतंकी ने पीछे से उन पर हमला किया जिससे घटनास्थल पर ही वह बलिदान हो गए। मरणोपरांत 2009 में उनको अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह

एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह, 51 एसएजी (स्पेशल एक्शन ग्रुप) का हिस्सा थे, उन्होंने नरीमन हाउस को खाली कराते समय वीरगति को प्राप्त की, आतंकियों द्वारा फेंका गया एक ग्रेनेड उनके पास ही फट गया, जिससे गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्होंने अपना बलिदान दे दिया।

शशांक शिंदे

वे छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पुलिस स्टेशन  मुंबई के प्रभारी थे। सीएसटी में आतंकी हमला हुआ तो आतंकवादियों को उलझा कर रखा। पीछे से एक आतंकी ने उन पर हमला किया। उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था।

प्रकाश पी मोरे

प्रकाश पी मोरे, एल.टी. मार्ग थाने में तैनात पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे। जिन्होंने अपनी अंतिम साँस तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

बापूसाहेब दुरूगड़े

बापूसाहेब दुरूगड़े, एल.ए.1 थाने के पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे जो 26/11 के हमलों के दौरान बलिदान हो गए थे।

विशेष रूप से उल्लेखित इन कुछ नामों के अलावा कुल करीब 22 नाम हैं जिन्होंने मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने और उन्हें मौत के घाट उतारने में अपना बलिदान देकर बहादुरी की मिसाल पेश की थी। इसके अलावा भी विभिन्न विभागों से जुड़ें ऐसे हजारों दूसरे सुरक्षा बलों के जवान हैं जिन्होंने अनगिनत लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई। बता दें कि आतंकियों के खिलाफ मुंबई में 11 जगहों पर पुलिस और सुरक्षा बलों ने कार्रवाई की थी।

सपा MLA के बेटे ने कहा- सांसद जियाउर्रहमान बर्क हमारे साथ, सुनते ही भीड़ ने शुरू कर दी पत्थरबाजी… तमंचे की गोलियाँ, अजीब हथियार खोल रहे संभल साजिश के तार

संभल में 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम पर इस्लामी भीड़ के हमले के बाद ऑपइंडिया ने गहरी साजिश की आशंका जताते हुए रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जैसे-जैसे पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ रही है इस साजिश के तार खुलने लगे हैं।

हिंसा के दौरान 5 लोगों की मौत हुई। इनकी पहचान कैफ, अयान, नईम अहमद, बिलाल और नोमान के तौर पर हुई है। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि पुलिस फायरिंग में इनकी मौत हुई। लेकिन पुलिस ने स्पष्ट किया है कि उसने उपद्रव रोकने के लिए फायरिंग नहीं की थी। केवल लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागे गए थे।

इतना ही नहीं खबरों में बताया गया है कि पोस्टमार्टम के दौरान 2 शवों से 315 बोर की गोली निकली है। इस बोर की गोलियाँ पुलिस इस्तेमाल नहीं करती है। यह अमूमन उन तमंचों में प्रयोग किया जाता है, जिसके लाइसेंस पब्लिक को दिए जाते हैं। पुलिस ने कुछ घरों से धारदार हथियार भी बरामद किए हैं। इनमें से एक अजीब तरह का हथियार जिसके दोनों तरफ से वार किया जा सकता है।

इस हिंसा में 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिसमें से 1 की हालात गंभीर है। जामा मस्जिद के सदर जफर अली को पुलिस ने हिरासत में लिया है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और इसी पार्टी के विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल के खिलाफ भी FIR दर्ज की गई है।

सपा सांसद, विधायक के बेटे पर FIR

दैनिक भास्कर ने जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल के खिलाफ कोतवाली नगर थाने में दर्ज FIR के अंश प्रकाशित किए हैं। मौके पर तैनात एक सब इंस्पेक्टर द्वारा दर्ज कराई गई FIR में कहा गया है, सुबह करीब 9 बजे अचानक से 700-800 लोगों की भीड़ सर्वे रुकवाने की नीयत से आई। भीड़ में सुहैल इकबाल भी शामिल थे। सुहैल इकबाल ने भीड़ से कहा कि सांसद जियाउर्रहमान बर्क हमारे साथ हैं। हम भी आपके साथ हैं। अपने मंसूबों को पूरा कर लो। सुहैल के इतना कहते ही भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और गोली चलाना शुरू कर दी। इसी बीच एक उपद्रवी ने सीओ संभल काे गोली मार दी, जो उनके पैर में लगी।”

सब इंस्पेक्टर दीपक राठी की ओर से संभल कोतवाली में दर्ज कराई गई FIR में सांसद जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल को नामजद करते हुए 700-800 अज्ञात भीड़ को शामिल किया गया है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 191(2), 191(3), 190. 221, 132, 125, 324(5), 196 और 323(b) के साथ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाली धारा 3/5 के तहत दर्ज की गई है।

लोकसभा स्पीकर से मिला सपा प्रतिनिधिमंडल

समाजवादी पार्टी ने पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए इसे मुस्लिमों के साथ अत्याचार बताने की कोशिश की है। अखिलेश यादव, अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद, मामले में आरोपित जियाउर्रहमान बर्क और डिम्पल यादव ने कई समाजवादियों सहित लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की है।

मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश

इस घटना पर मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय सिंह का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि घटना की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश दिए गए हैं। आंजनेय सिंह ने कहा कि किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा। पुलिस पर सवाल खड़े कर रहे लोगों से उलटे उन्होंने ही पूछ लिया, “वहाँ लोग करने क्या गए थे? न तो वो नमाज़ का समय था। न तो वहाँ को स्कूल या ऑफिस था। वहाँ कोई बाजार भी नहीं था जो लोग सामान खरीदने गए थे।”

आईएएस आंजनेय सिंह के मुताबिक कुछ लोगों ने पूरे शहर को आग में झोंकने की साजिश रची है। कुछ लोगों के घरों में तोड़फोड़ के सवाल पर उन्होंने कहा, “जिस घर से लगातार पत्थर चल रहे थे उनसे कई बार दरवाजा खोलने की विनती की गई थी। क्या आप ये उम्मीद करते हैं कि कोई पुलिस को लगातार पत्थर मारे और वो हाथ जोड़े खड़े रहे?”

कमिश्नर आंजनेय सिंह ने बताया है कि संभल में अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुँह पर रुमाल बाँध कर हिंसा करने वालों को भी चिन्हित किया जा रहा है। उनके अनुसार 4 शवों के पोस्टमार्टम से मौत की वजह देसी बंदूकों से गोली लगना सामने आया है।

विकसित देशों ने की पर्यावरण की ऐसी-तैसी, पर क्लाइमेट चेंज से लड़ना गरीब देशों की जिम्मेदारी: दोगलई पर पश्चिम को भारत ने रगड़ा, 300 अरब डॉलर वाले COP-29 डील बताया अनुचित

अजरबैजान की राजधानी बाकू में हाल ही में एक समझौता हुआ है। यह समझौता संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वाली शाखा ने COP-29 बैठक में करवाया है। इसके तहत विश्व के विकसित और अमीर देश राजी हुए हैं कि वह 300 बिलियन डॉलर 2035 से विकासशील या गरीब देशों को देना चालू करेंगे। यह पैसा जलवायु परिवर्तन से रोकने के लिए निर्धारित किए गए लक्ष्य प्राप्त करने को दिया जाएगा। भारत ने इस समझौते पर नाराजगी जताई है। उसने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

क्या है समझौता?

अज़रबैजान की राजधानी बाकू में COP 29 की एक बैठक हुई है। COP 29 की इस बैठक में समझौता हुआ है कि विकसित और अमीर देश मिल कर हर साल 300 बिलियन डॉलर (लगभग ₹25.29 लाख करोड़) देंगे। 300 बिलियन डॉलर का यह लक्ष्य 2035 तक प्राप्त किया जाएगा। अभी यह नहीं साफ़ है कि यह पैसा किस साल से देना चालू किया जाएगा।

पहले यह अमीर और विकसित देश मात्र 100 बिलियन डॉलर देने पर ही राजी थे। हालाँकि, लम्बी बातचीत और बैठकों के बाद यह देश 300 बिलियन के आँकड़े तक पहुँचे। इस फैसले को यूरोपियन देशों ने क्रांतिकारी बताया है। उन्होंने कहा है कि इससे दुनिया में जलवायु परिवर्तन को रोकने में मदद मिलेगी और गरीब देशों की सहायता भी होगी।

वहीं दक्षिणी ध्रुव में स्थित देशों (अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका) ने इस समझौते को आधा-अधूरा बताया है। यह देश माँग कर रहे थे कि उन्हें 1.3 ट्रिलियन डॉलर (100 लाख करोड़ से अधिक) दिए जाएँ। हालाँकि, यह देश इस पर राजी नहीं हुए।

यह पैसा इन देशों को या तो कर्ज या फिर किसी प्रोजेक्ट में लगाने के लिए सहायता के तौर पर दिया जाएगा। यह पैसा वह सभी विकसित देश दे रहे हैं जिनके 19वीं, 20वीं और 21वीं शताब्दी में जरूरत से कहीं ज्यादा कोयला, तेल और बाकी ईंधन उपयोग करने समेत पेड़ काटने के कारण आज विश्व इस जलवायु की समस्या में फंसा हुआ है।

पैसा देने को राजी हुए अधिकांश देश यूरोप से ताल्लुक रखते हैं। हालाँकि, यह पैसा तब ही दिया जाएगा जब विकासशील या गरीब देश अपना कार्बन उत्सर्जन घटाएंगे और लक्ष्य प्राप्त करेंगे। विकसित देशों द्वारा दिए गए इन पैसों का इस्तेमाल अक्षय या स्वच्छ ऊर्जा के प्रोजेक्ट लगाने में किया जाएगा।

विकसित देशों का कहना है कि उन्होंने पहले 100 बिलियन डॉलर का वादा किया था जो कि 2022 में पूरा कर लिया गया था। भारत समेत बाकी विकासशील देश इस दावे को नहीं मानते हैं। उनकी नए समझौते पर भी सहमति नहीं है।

भारत क्यों हुआ नाराज?

इस समझौते के दौरान बाकू में मौजूद भारतीय प्रतिनधि चाँदनी रैना ने इसका जम कर विरोध किया। चाँदनी रैना ने इस समझौते को लेकर कहा, “भारत इस समझौते को वर्तमान स्वरूप को स्वीकार नहीं करता है। जितना पैसा जुटाने की बात की गई है, वह काफी कम है और एक मामूली धनराशि है। यह ऐसा समझौता नहीं है जिससे हमारा देश अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक जलवायु एक्शन लिया जा सके।”

भारत ने यह समझौता करने के तरीके पर भी सवाल खड़े किए। भारत ने कहा कि सब कुछ पहले ही मैनेज किया जा चुका था और बाकू में ना किसी की सहमति ली गई और ना ही उनकी समस्याएँ सुनी गईं। इसे बजाय जल्दबाजी में समझौता कर दिया गया। भारत को समझौता होने से पहले बयान की अनुमति ना मिलने पर भी रोष जताया। भारत ने कहा कि हमने सभी जिम्मेदार संस्थाओं को इस मामले में सूचित कर दिया था लेकिन हमारी बात नहीं मानी गई।

भारत का समर्थन नाइजीरिया समेत बाकी देशों ने भी किया। नाइजीरिया ने इस समझौते में स्वीकार की गई 300 बिलियन डॉलर की धनराशि को एक मजाक करार दिया है। कई छोटे देशों ने भी भारत का समर्थन किया है। कई छोटे द्वीपीय देशों ने भी इस पूरे समझौते पर प्रश्न खड़े किए हैं।

क्यों बेईमानी जैसे हैं ये समझौते?

जलवायु परिवर्तन को लेकर मचे हो-हल्ले के बीच यह बात ध्यान देना जरूरी है कि इनमें सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों का ही है। विकासशील देशों ने ही इस समस्या को जन्म दिया है। अपने देशों को औद्योगिक ताकत बनान के लिए अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी समेत तमाम देशों ने दुनिया भर में जंगल काटे, खूब तेल और गैस जलाई।

उन्होंने कोयले का भी भरपूर तरीके से इस्तेमाल किया। इसके जरिए उन्होंने अपने नागरिकों का जीवन स्तर बढ़ाया और अब जब उनकी समस्याएँ हल हो चुकी हैं, तब वह दूसरे देशों को ऐसा नहीं करने देना चाहते हैं। उनको भारत एवं उसके जैसे बाकी विकासशील देशों के कोयले अथवा जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने पर समस्या है।

पश्चिमी देश भारत, चीन, नाइजीरिया और ब्राजील जैसे देशों पर दबाव बना रहे हैं कि वह अब कोयला और ऐसे ही बाकी ईंधनों का इस्तेमाल ना करें। उनका भारत पर दबाव है कि वह अभी से ही महँगी ऊर्जा की तरफ जाएँ। भारत की अर्थव्यवस्था अभी ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह पूरी तरह हरित ऊर्जा में बदल सके।

भारत तेजी से हरित ऊर्जा की तरफ बढ़ रहा है लेकिन इसमें समय लगने वाला है। पश्चिमी देश यह पैसा देकर विकासशील देशों से उनका ऊर्जा का अधिकार तो छीन ही रहे हैं, वह अपनी जिम्मेदारी से भी भाग रहे हैं।