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9 साल शादीशुदा मर्द से रखा अफेयर, सालों रहे शारीरिक संबंध, फिर रेप का केस कर दिया: कोर्ट ने महिला को फटकारा, 7 साल पुरानी FIR खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा है कि अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ सालों तक सहमति से संबंध बनाती है तो वो बाद में उस पर रेप का केस नहीं दर्ज कर सकती या ये नहीं कह सकती कि इतने साल तक शादी का झूठा वादा करके उसका रेप किया गया।

ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने एक ऐसे केस की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक महिला ने एक पुरुष के साथ नौ साल तक संबंध बनाए और बाद में आरोप लगा दिया कि शादी का झूठा वादा उसका रेप होता रहा।

कोर्ट ने महिला की 7 साल पुरानी एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि यह एक चिंताजनक चलन है कि लोग लंबे समय तक चले आ रहे रिश्ते में खटास आने पर उसे अपराध का रूप देने की कोशिश करते हैं। अदालत ने कहा कि झूठे वादे के आधार पर दर्ज कराई गई शिकायतों पर तत्परता होनी चाहिए न कि उन मामलों में जहाँ सालों तक शारीरिक संबंध बनाने के बाद केस दर्ज होते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक ये मामला मुंबई के शादीशुदा महेश दामू खरे और वनिता एस जाधव (जो एक विधवा हैं) से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों के बीच अफेयर साल 2008 में शुरू हुआ था। लेकिन, साल 2017 में महिला ने शिकायत देते हुए बताया कि महेश ने उनसे शादी का वादा किया था जिसके बाद दोनों में शारीरिक संबंध बने।

कोर्ट ने जब इस मामले की सुनवाई की तो लंबी सुनवाई के बाद वनिता की एफआईआर को खारिज किया गया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जहाँ एक महिला जानबूझकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखती है, तो यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह संबंध सिर्फ शादी का वादा किए जाने की वजह से था।

बता दें कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ यौन संबंध बनाए। हालाँकि, अदालत ने पाया कि दोनों के बीच लगभग नौ वर्षों तक चले रिश्ते में कोई स्पष्ट संकेत नहीं था कि आरोपित ने वास्तव में शादी करने का वादा किया था। इसके बजाय, अदालत ने देखा कि महिला द्वारा लगातार बिना किसी विरोध के संबंध बनाए रखना इस बात का प्रमाण था कि यह रिश्ता पूरी तरह से सहमति पर आधारित था।

वक्फ बोर्ड ने वाराणसी के 115 साल पुराने उदय प्रताप कॉलेज पर ठोका दावा: परिसर में बना ली अवैध मस्जिद-मजार, कॉलेज की बिजली चोरी कर जलाते हैं बल्ब-पंखा

मनमानी पर उत्तर आए वक्फ बोर्ड ने एक बार फिर चुनौती दी है। उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड ने वाराणसी में स्थित प्रसिद्ध उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) की संपत्ति पर अपना दावा ठोका है। लखनऊ स्थित यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने यूपी कालेज की जमीन को वक्फ की संपत्ति होने का दावा किया है। इसकी जानकारी सामने आने के बाद कॉलेज के शिक्षकों एवं छात्रों में आक्रोश फैल गया है।

यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के सहायक सचिव आले अतीक ने वक्फ एक्ट 1995 के तहत 2018 में कॉलेज प्रबंधक को नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया है कि वसीम अहमद निवासी भोजूबीर तहसील सदर, वाराणसी ने कहा है कि ग्राम छोटी मस्जिद नवाब टोक मजारात हुजरा उदय प्रताप कॉलेज भाेजूबीर की संपत्ति कॉलेज के नियंत्रण में है। इसे सुन्नी बोर्ड कार्यालय में पंजीकृत कराया जाए।

नोटिस में आगे कहा गया कि 15 दिनों में जवाब दें। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन की बात नहीं सुनी जाएगी। इसका जवाब देते हुए उदय प्रताप शिक्षा समिति के तत्कालीन सचिव यूएन सिन्हा ने कहा था कि यूपी कॉलेज की स्थापना 1909 में हुई है। कॉलेज की जमीन इंडाउमेंट ट्रस्ट की है और चैरिटेबल इंडाउमेंट एक्ट के तहत आधार वर्ष के बाद ट्रस्ट की जमीन पर किसी का मालिकाना हक खुद समाप्त हो जाता है।

राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने 115 साल पहले किया था स्थापित

यूपी कॉलेज करीब 500 एकड़ में फैला है। इसके द्वारा प्रदेश में डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, रानी मुरार बालिका स्कूल, राजर्षि शिशु विहार, राजर्षि पब्लिक स्कूल संचालित किया जाता है। इन सबमें करीब 20,000 विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना लगभग 115 साल पहले सन 1909 में भिनगा (बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी।

सन 1886 में संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने 25 नवम्बर 1909 को वाराणसी में ‘हेवेट क्षत्रिय हाई स्कूल’ की स्थापना की। आगे चलकर यह उदय प्रताप सिंह स्वायत्त महाविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने 1909 में ही ‘उदय प्रताप कॉलेज एंड हेवेट क्षत्रिय स्कूल इंडाउमेंट ट्रस्टट का गठन किया था, जिसके तहत यह कॉलेज संचालित है।

कॉलेज के प्रिंसिपल का जवाब

यूपी कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर डीके सिंह ने बुधवार (27 नवंबर) को IANS को बताया कि नोटिस 6 दिसंबर 2018 को भेजा गया था। इसका 21 दिसंबर 2018 को जवाब दिया गया था कहा गया था कि यह ट्रस्ट द्वारा संचालित है। इसलिए इस पर किसी का मालिकाना हक समाप्त हो जाता है। डीके सिंह ने कहा कि इसके बाद वक्फ बोर्ड की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

प्रिंसिपल के रूप में 1 नवंबर 2001 को कार्यभार सँभालने वाले डॉक्टर डीके सिंह ने कहा कि इस मामले का उन्होंने संज्ञान लिया था। उन्होंने कहा था, “कार्यभार सँभालने के बाद हमारे छात्रों ने बताया किया कि कुछ लोग मस्जिद में निर्माण कार्य कर रहे है। वे लोग निर्माण करने के लिए रात में बालू और सीमेंट लेकर जबरदस्ती आ रहे थे। हालाँकि, सुरक्षाकर्मियों ने इसका विरोध किया था।”

प्रिंसिपल ने आगे बताया कि उन्होंने इसकी सूचना तुरंत पुलिस-प्रशासन को दी और निर्माण सामग्री को मस्जिद से बाहर निकाला गया। उन्होंने बताया कि इसके कुछ दिनों के बाद सूचना मिली कि कॉलेज की बिजली लाइन से मस्जिद में बिजली का इस्तेमाल हो रहा है। इसका बिजली बिल कॉलेज को देना पड़ता था। प्रिंसिपल ने बताया, “लगभग एक साल पहले हमने मस्जिद का बिजली कनेक्शन कटवा दिया।”

रिपोर्ट के मुताबिक, उदय प्रताप कॉलेज परिसर में मस्जिद और मज़ार का निर्माण समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार की शह पर किया गया था। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ये निर्माण पूरी तरह अवैध है। कहा जाता है कि परिसर में स्थित मस्जिद में लोग नमाज पढ़ने के लिए भी आते हैं। वहीं, मजार के पास एक व्यक्ति हमेशा रहता है। उसका दावा है कि मस्जिद तो कॉलेज से भी पुरानी है।

‘पुलिस पर पथराव ही तो किया, जान से थोड़ी मार रहे थे… पहले से ही ईंटें जमा थीं, प्रशासन ने क्यों हटवा दिया’: संभल में बुर्का वाली खातून ने वीडियो में सब उगल डाला

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ के उपद्रव के बाद हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। पुलिस टीमें पत्थरबाजों की पहचान करके उनकी धरपकड़ में जुटी हुई हैं। इस हिंसा में मुस्लिम समुदाय के पुरुषों के अलावा महिलाएँ भी शामिल रहीं। इस घटना के बाद वायरल हो रहे वीडियो में एक मुस्लिम महिला पत्थरबाजी की घटना को बेहद मामूली बात बता रही है।

सोशल मीडिया के X प्लेटफॉर्म पर यूजर @politicscharcha ने बुधवार (27 नवंबर) को एक वीडियो शेयर किया है। 12 सेकेंड के इस वीडियो में एक पत्रकार मुस्लिम महिला से बात कर रही है। पत्रकार ने हिंसा में पुलिस वालों को लगी चोट का जिक्र किया। जवाब में मुस्लिम महिला ने इन चोटों से कोई सहानभूति नहीं दिखाई और कहा, “चोट है वो, वो सही हो जाएँगे। जिसका गया वो तो गया दुनिया से। वो तो वापस न आएगा।”

इसके बाद बुर्का वाली महिला के तेवर और सख्त हो गए। पत्रकार ने पूछा कि जो मरे हैं, वो पत्थर क्यों चला रहे थे? इस सवाल पर मुस्लिम महिला ने कहा, “पथराव ही तो कर रहे थे। कोई तुम्हें जान से थोड़ी मार रहे थे।” इतना कह कर खातून आगे बढ़ने लगी।

इस इंटरव्यू का पूरा वीडियो राजधर्म नाम के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। 10 मिनट 23 सेकेंड लम्बे इस वीडियो में महिला पत्रकार संभल के हिंसाग्रस्त इलाकों से अपनी रिपोर्टिंग की शुरुआत करती है। वीडियो में गलियों में पत्थरबाजी के निशान मौजूद दिख रहे हैं। कुछ पत्थरों को सड़क के किनारे कर दिया गया है। कई गाड़ियों को भी तोड़ डाला गया था, जो अभी वहाँ खड़ी दिख रही है। रास्ते में वारसी हाउस पड़ा। घर के आगे 2 लोग बैठे दिखे, जो मीडिया के खिलाफ बातें कर रहे थे।

वारसी हाउस पर एक युवा व दूसरा बुजुर्ग मौजूद था। इन्होंने मीडिया पर जहर उगलने का आरोप लगाया और कुर्सी उठा कर अंदर चले गए। बाद में युवा बाहर निकला। उसने जुल्म की इंतहा होने और सबको परेशानी में डालने जैसी बातें की। गलियाँ सूनी दिखीं और एक अन्य राहगीर ने भी मीडिया से बात नहीं की। कुछ ही देर बाद एक बुर्का पहने महिला जाती दिखी। उसने खुद को घटना की चश्मदीद बताया।

महिला चश्मदीद ने कहा कि पुलिस वाले कब्ज़े में नहीं आ रहे थे। पुलिस पर ही लाठीचार्ज का दोष मढ़ते हुए महिला आगे बोली, “हथियार तो पुलिस वालों के पास थे। हम तो निहत्थे थे। जब लाठीचार्ज होगा तो मजबूरन कुछ न कुछ करना पड़ेगा।” बुर्का वाली खातून ने यह भी माना कि पहले से ही चारों तरफ ईंटें रखी हुई थीं। वह इस बात से नाराज भी दिखीं कि प्रशासन ने वो ईंट-पत्थर क्यों साफ़ करवा दिए। भीड़ की तादाद 2 से ढाई हजार होने की बात को कथित चश्मदीद ने सहमति दी।

मुस्लिम महिला ने बताया कि अचानक ही लोगों को एक-दूसरे से पता चला कि मस्जिद का सर्वे हो रहा है और इसी बात पर वो लोग जमा हो गए। महिला बोली, “ऐसी बात पर एकदम से सब इकट्ठा हो जाएँ।” एक अन्य बुर्का वाली महिला ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। संभल की गलियों में बड़ी तादाद में पुलिस बल तैनात दिखा।

मोहम्मद जुबैर के खिलाफ FIR, भारत की एकता-अखंडता को खतरे में डालने का मामला: UP पुलिस ने हाई कोर्ट को बताया

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को बताया है कि उसने फर्जी खबरें फैलाने वाले तथाकथित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर पर भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए मामला दर्ज किया है। यह जानकारी जुबैर के मामले की जाँच कर रहे यूपी पुलिस के अफसर ने दी है।

यूपी पुलिस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को दिए गए एक हलफनामे में बताया है कि उसने भारतीय न्याय संहिता की अलग-अलग धाराओं में मोहम्मद जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज किया है। यह धाराएँ समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने, सबूत के साथ छेड़छाड़ और मानहानि समेत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से सम्बन्धित हैं। उस पर आईटी एक्ट की धाराएँ भी जोड़ दी गई हैं।

यह हलफनामा देने का आदेश हाई कोर्ट ने 25 नवम्बर, 2024 को हुई पिछली सुनवाई को दिया था। पुलिस ने बुधवार (27 नवम्बर, 2024) को यह हलफनामा कोर्ट को सौंपा है। मोहम्मद जुबैर इस मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा है।

मोहम्मद जुबैर के खिलाफ यह FIR उदिता त्यागी ने दर्ज करवाई है। जुबैर पेर आरोप है कि उसने डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती का एक पुराना वीडियो साझा किया और मुस्लिम भीड़ को भड़काया। इस वीडियो में कथित तौर पर यति नरसिंहानंद ने इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद का अपमान किया था।

इस वीडियो को डाले जाने के बाद मुस्लिम भीड़ डासना मंदिर के बाहर इकट्ठा हुई और बवाल काटा। देश के बाकी कई हिस्सों में भी मुस्लिमों ने खूब हंगामा किया। कई जगह पर ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए। इन हमलों में कई पुलिसवाले भी घायल हुए थे।

उदिता त्यागी ने इस मामले में मोहम्मद जुबैर पर कार्रवाई की माँग की है। उदिता त्यागी यति नरसिंहानंद सरस्वती फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। उदिता त्यागी ने इस मामले पर कहा है कि अगर उत्तर प्रदेश के सरकारी वकीलों ने सही पक्ष रखा तो मोहम्मद जुबैर को जेल जाने से कोई नहीं बचा पाएगा।

जेब में ब्रा-पैंटी, स्कूटी पर घूम-घूम महिलाओं को छेड़ता था इजहार खान, पुलिस ने किया गिरफ्तार: भोपाल का मामला

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पुलिस ने मंगलवार (26 नवंबर, 2024) को लड़कियों से छेड़खानी करने वाले इजहार खान को गिरफ्तार किया है। इजहार खान पिछले एक महीने से शहर में कई महिलाओं को छेड़ चुका था। पुलिस ने इजहार खान की स्कूटी को भी सीज कर दिया है। स्कूटी की डिग्गी और इजहार की जेब से महिलाओं के कई अंडरगारमेंट्स बरामद हुए हैं। अब पुलिस अंडरगारमेंट्स इकट्ठा करने की वजह की पड़ताल कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला भोपाल के चूनाभट्टी इलाके का है। यहाँ के यशोदा विहार में रहने वाली कई महिलाएँ एक स्कूटी वाले की छेड़खानी से काफी दिनों से परेशान थीं। सोमवार (25 नवंबर) को 2 महिलाओं ने इस संबंध पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई थीं।

इसी दिन शाम को एक और महिला ने अपने साथ हुई छेड़खानी पर शोर मचाया था। तब लोगों ने दौड़ा कर स्कूटी सवार एक व्यक्ति को पकड़ लिया था। बाद में उसको पुलिस के हवाले कर दिया गया। पूछताछ में आरोपित ने अपना नाम इजहार खान बताया

इजहार खान के अम्मी-अब्बा टीचर है। अम्मी-अब्बा ने दावा किया है कि उन्हें अपने बेटे की करतूत के बारे में कुछ पता ही नहीं था। इजहार ने अपनी पहचान छिपाने के लिए उसने अपनी एक्टिवा स्कूटी के नंबर प्लेट पर कागज चिपका रखा था। स्कूटी की जाँच की गई तो उसकी डिग्गी के अंदर महिलाओं के कई अंडरगारमेंट्स (ब्रा-पैंटी) बरामद हुई।

इजहार खान ने पुलिस के आगे सोमवार को हुई दोनों छेड़खानी की वारदातों में अपने ही होने की बात कबूल कर ली। पुलिस उसके द्वारा की गई अन्य हरकतों की भी जाँच में जुटी है। पता चला है कि इजहार खान पीड़िताओं को धमकाता भी था। प्रथम दृष्टया पुलिस ने इजहार को साइको अपराधी माना है। वह पूछे जा रहे सवालों के भी उलटे-सीधे जवाब दे रहा है।

पत्थरबाजी, नारा-ए-तकबीर, अदालत पर अविश्वास, इबादत के नाम पर उन्माद… साल 712 की तरह दोबारा न हारे हिंदुस्तान, इसलिए समाधान जरूरी

इतिहास अलमारी में सजाने की चीज नहीं। उससे सबक़ लेकर वर्तमान में वह सब करने की सीख देने का विषय है ताकि भविष्य में अगली आने वाली पीढ़ी को निष्कंटक जीवन की परिस्थितियाँ उपलब्ध करवायी जा सकें! इतिहास सबक़ लेने का विषय है ताकि वह भूल न दोहरायी जाएँ जिनके कारण कष्ट, उत्पीड़न और हिक़ारत झेलनी पड़ी हो!

इतिहास की दो किताबें जिनका अवलोकन मैंने किया है, वह है रामधारी सिंह दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ और कन्हैया लाल मुंशी की ‘जय सोमनाथ’। वैसे सोमनाथ नामक उपन्यास विधा की किताब आचार्य चतुरसेन ने भी लिखी है, उसकी विषयवस्तु और आधार मुंशी की किताब ही है, वह भी पढ़ी है।

दिनकर जी लिखते हैं कि सिंध पर जब बिन क़ासिम ने 712 ई. में इस्लामी आक्रमण किया, तब उस समय राजा दाहिर वहाँ पर शासन कर रहा था और यह भारत पर पहला इस्लामी आक्रमण था। इस आक्रमण में राजा दाहिर मारा गया। इसके बाद क्या हुआ? क़ासिम दाहिर की बेटियों को भोगदासी बनाकर और लूटपाट कर वापस लौट गया।

बाबर मात्र 12000 घुड़सवारों के साथ आता है और जीतकर सत्ता स्थापित कर लेता है। ख़िलजी 250 आततायियों के साथ बिहार को रौंद डालता है। महमूद गजनवी हमारे मानबिंदु भगवान सोमनाथ के मंदिर को तहस-नहस कर चला जाता है और हम देखते रह गए।

इस्लामी आक्रमण और बिखरता भारत: कारण क्या था?

दिनकर लिखते हैं कि हर्षवर्धन के बाद इस देश में कोई सम्राट ऐसा नहीं हुआ, जो केन्द्रीय सत्ता को सलामत रख रखे। हमारी केन्द्रीय सत्ता टूट जाने से अनेक क्षेत्रीय छत्रपों में बिखर गया यह राष्ट्र, उसकी राजनीतिक चेतना खो गई। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि कुछ सिरफिरे आए और हमें लूटकर चले गए। मुग़ल आए और हम पर क़ाबिज़ हो गए। अंग्रेज आए और सत्ता स्थापित कर हमारा भरपूर शोषण किया। हमें हज़ार वर्ष की ग़ुलामी को झेलना पड़ा कुल मिलाकर।

कन्हैया लाल मुंशी ‘जय सोमनाथ’ में लिखते हैं कि जब गजनी का अमीर आया तो झालौर में वाक्पतिराज शासन कर रहे थे। वल्लभी के राजा भीमदेव गजनवी से लड़ने के लिए तैयारी कर रहे थे, लेकिन जब उन्होंने झालौर संदेश भेजा सहयोग के लिए तो वाक्पतिराज ने यह कह कर मना कर दिया कि यह तुम्हारा मामला है, तुम जानो। 

परिणाम यह हुआ कि गजनी का अमीर आया और सोमनाथ का विध्वंस करने में सफल हो सका। कारण हम क्षेत्रीय क्षत्रपों में बँट कर अपने-अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे थे। हम आसन्न बाहरी ख़तरे से बेख़बर अपना स्वार्थ देख रहे थे बस। जिसके दुष्परिणाम में राष्ट्र को हिक़ारत, शोषण और ध्वंस झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

वर्तमान का भारत, हिंदू और बिखराव की साजिश

चुनाव अब गुजर चुका है, इसलिए इस बात को चुनाव की दृष्टि से न देखा जाए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का वह बयान जिस पर विपक्ष ने बिना समझे बवाल किया, गौर करेंगे तो इसके आयाम बड़े हैं! यह बात इस देश के 1300 वर्ष पूर्व के इतिहास को वर्तमान से जोड़ते हुए भविष्य तक जाती है। अगर सियासत को एक कोने में रखकर कोई भी व्यक्ति विचार करे इस वाक्य पर तो कोई भी इस कटु सत्य से इनकार नहीं कर सकता।

चार उदाहरण से समझते हैं इसे:

  1. जिस तरह से तुष्टिकरण पर जरा सा सवाल खड़ा करने पर पत्थरबाज़ी होती है।
  2. नारा-ए-तकबीर के साथ जिस तरह भय फैलाने का प्रयास किया जाता है।
  3. अनुकूल निर्णय न आने पर अदालत पर अविश्वास जताया जाता है।
  4. इबादत के नाम पर जिस तरह का उन्माद फैलाने का प्रयास होता है।

ऊपर के चारों उदाहरण हर आए दिन दिख जाता है समाज में। यह वह मानसिकता है, जो बार-बार अपने इरादे उजागर करती है। इन सब बातों/घटनाओं को सामान्य नहीं कहा जा सकता है। यह वैसी ही घटनाएँ हैं, जो 1947 में घट रही थी, जिसके परिणाम बताने की आवश्यकता नहीं है।

अकेले भारत ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश इस विचारधारा से सुरक्षित नहीं है। शान्ति के पैग़ाम के नाम पर जिस तरह की अशान्ति का सुनियोजित प्रयास होता है, छिपा नहीं है किसी से।

हम उस विचारधारा से आने वाले लोग हैं जो सर्वे भवन्तु सुखिनः में विश्वास रखते हैं। लेकिन बार-बार जब हमारे अधिकारों का अतिक्रमण कर आतंक फैलाने का प्रयास किया जाए तो मामला गंभीर और विचारणीय हो जाता है।

इसलिए विचार करिए और समाधान की तरफ़ बढ़िए, यही वक्त की माँग है!

संंभल में पुलिस से लूटे 50 कारतूस, 29 टियर गैस के गोले, था पुलिसकर्मियों की हत्या का प्लान: इंस्पेक्टर की FIR से जानिए मुस्लिम दंगाइयों के इरादे

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर, 2024) को मुस्लिम भीड़ के दंगे में 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। पुलिस को किस तरह से दंगा कर रही भीड़ ने निशाना बनाया, इसका खुलासा इस घटना की FIR से हुआ है।

जहाँ एक ओर दंगाई भीड़ से जुड़े लोग विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं, वहीं FIR कुछ और कहानी बयाँ कर रही हैं। ऐसी ही एक FIR में बताया गया है कि दंगाई भीड़ ने पहले पुलिसकर्मियों को गंदी-गंदी गालियाँ दी फिर उनको घेर कर उनके हथियार छीन लिए। नुकसान से बचने के लिए पुलिस वालों को आत्मरक्षा में पीछे हटना पड़ा था।

यह FIR संभल के कोतवाली नगर में तैनात एक सब इंस्पेक्टर ने दर्ज करवाई है। FIR में सब इंस्पेक्टर ने बताया कि रविवार को वो अपने साथी सिपाहियों के साथ विवादित जामा मस्जिद के पास तैनात थे। सुबह 8:45 के आसपास मस्जिद से लगभग 100 मीटर दूरी पर 700-800 मुस्लिमों की भीड़ जमा हो गई।

इस भीड़ ने पहले नारेबाजी शुरू की फिर यह उग्र हो गए। भीड़ में शामिल मुस्लिम लड़कों ने पत्थरबाजी चालू कर दी। इसका निशाना पुलिस बनी। शिकायतकर्ता के मुताबिक दंगाई भीड़ विवादित मस्जिद का सर्वे करने आई टीम को बाहर खदेड़ने पर आमादा थी।

सब इंस्पेक्टर के अनुसार जिले में 5 से अधिक लोगों के जमा होने पर रोक लगाई गई थी। इसी के तहत पुलिस बार-बार लोगों को घर जाने की नसीहत दे रही थी। पुलिस की नसीहत का दंगाई भीड़ पर कोई असर नहीं पड़ा। वह पुलिसकर्मियों को अनुसना करते हुए धक्का देती आगे बढ़ती रही।

इस दौरान भीड़ में शामिल लोग पुलिसकर्मियों को गंदी-गंदी गालियाँ देते हुए पत्थर मारते रहे। सब इंस्पेक्टर ने शिकायत में बताया है कि इस भीड़ में शामिल लोग एक साजिश के तहत पुलिस को निशाना बना रहे थे।

पत्थरबाजी के बाद भीड़ में से 40-50 लोगों ने पुलिसकर्मियों की हत्या के लिए इन दंगाइयों को उकसाया। भीड़ में कुछ लोगों ने शिकायतकर्ता सब इंस्पेक्टर की सरकारी पिस्टल छीनने की कोशिश की। पिस्टल न छीन पाने पर हमलावरों ने सब इंस्पेक्टर से 9mm के 10 कारतूस लूट लिए।

भीड़ से से कुछ अन्य लोगों ने कॉन्स्टेबल कपिल कुमार को घेर कर कंधे पर टंगा बैग छीन लिया। इस बैग में टियर गैस के 29 गोले थे। यह उपद्रवी अपने साथ ले गए। इतने पर भी हिंसक भीड़ नहीं रुकी, उसने इसके बाद तीसरे पुलिस्कारी पुलिसकर्मी को निशाना बनाया।

इसके बाद दंगाइयों का निशाना कॉन्स्टेबल पंकज कुमार बने। उनके कंधे पर टंगा बैग लूट लिया गया। इस बैग में 25 ब्लैंक कारतूस और इतने ही रबर बुलेट थे जो भीड़ अपने साथ ले गई। भीड़ ने यहीं तैनात कॉन्स्टेबल राजपाल को निशाना बनाया। उनसे भी 15 कारतूस छीने गए।

इसके बाद दंगाई भीड़ ने उनकी हत्या करने की कोशिश की। पुलिसकर्मियों को अपनी जान बचाने के लिए थाने की तरफ भागना पड़ा। भीड़ एलान कर रही थी कि वो किसी भी हाल में जामा मस्जिद का सर्वे नहीं होने देगी। अतिरिक्त फ़ोर्स आने के बाद ही यहाँ तैनात पुलिसकर्मियों की जान बच पाई। हिंसा में कई पुलिसकर्मियों को चोटें आईं हैं जिनका इलाज अस्पताल में जारी है।

पुलिस को गोली मार के लूँगा बदला

इस बीच संभल में मरे एक उपद्रवी के अब्बा का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में वो अपने बेटे की मौत का बदला पुलिस से लेने की चुनौती देता दिख रहा है। उसने मीडिया के आगे खुलेआम कहा, “माँग कुछ नहीं है मेरी। बदला ये है कि जिसने मारा है उसको गोली मारूँगा।” जब पत्रकार ने पूछा कि किसने मारा है तब सामने से जवाब आया, “पुलिस ने तो मारी है गोली।”

यूनुस सरकार के वकील ने ISKCON को बताया ‘कट्टरपंथी संगठन’, बैन करने की बनाई है योजना: संत को किया है गिरफ्तार

बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने हाई कोर्ट में हिन्दुओं के संगठन ISKCON को ‘कट्टरपंथी’ बताया है। उन्होंने कोर्ट में बताया है कि ISKCON को बैन करने की कार्रवाई पहले से चल रही है। यूनुस सरकार ने यह बातें ISKCON के एक संत की गिरफ्तारी के बाद कही हैं। हाई कोर्ट में एक मुस्लिम वकील ने ISKCON को बैन करने की माँग को लेकर याचिका लगाई है।

बांग्लादेश हाई कोर्ट में वकील ने याचिका दायर करके कहा है कि ISKCON को बैन कर दिया जाए क्योंकि यह देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त है। वकील ने इस मामले में हाई कोर्ट में ISKCON को लेकर कथित मीडिया रिपोर्ट्स दी हैं।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए बांग्लादेश के हाई कोर्ट ने देश के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्ज्माँ से जवाब माँगा। असदुज्ज्माँ ने कोर्ट को बताया कि सरकार इस ‘कट्टरपंथी’ संगठन पर कार्रवाई को लेकर पहले ही विचार कर रही है। असदुज्ज्माँ ने बताया कि इसको बैन करने को लेकर काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि ISKCON की जाँच की जा रही है।

गौरतलब है कि ISKCON के संत चिन्मय कृष्ण दास को बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों ने सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद मंगलवार को उन्हें जमानत भी देने से इनकार कर दिया गया। जज काजी नजरुल इस्लाम ने इस दौरान उन्हें देशद्रोह का प्रथम दृष्टया दोषी पाया।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद चटगाँव कोर्ट परिसर में हंगामा हुआ। हिन्दुओं ने यहाँ प्रदर्शन किया और चिन्मय कृष्ण दास को छोड़ने की माँग की। इन हिन्दुओं पर बांग्लादेश की पुलिस और इस्लामी कट्टरपंथियों ने ईंट और पत्थर बरसाए और लाठियाँ चलाई। इस दौरान गोली चलाने की बात भी सामने आई।

प्रदर्शन के दौरान हुए हमले में एक सरकारी वकील की मौत हो गई। बांग्लादेश की पुलिस ने इस हत्या का दोष पीड़ित हिन्दुओं पर ही मढ़ दिया है। हालाँकि, बांग्लादेश की सम्मिलित हिन्दू जागरण जोत समिति ने स्पष्ट किया है कि हिन्दू इस घटना में शामिल नहीं थे बल्कि दूसरी तरफ मस्जिद से हमला हुआ था।

वकील की हत्या के मामले में पुलिस ने बुधवार (27 नवम्बर, 2024) को 33 लोगों को हिरासत में लिया है। इनमें से 6 को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। इनकी पहचान घटनास्थल के CCTV कैमरे से की गई है। यह नहीं स्पष्ट है कि यह लोग कौन है।

संभल हिंसा में मुस्लिम महिलाओं के 3 प्लान: (i) दंगाइयों की रक्षा (ii) पुलिस को निष्क्रिय करना (iii) पत्थर-बोतलें फेंकना – रुकैया, फरमाना, नजराना ने खोले राज

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (23 नवंबर) को भड़की हिंसा के बाद इसकी साजिश की परतें धीरे-धीरे उधड़ रहीं हैं। पकड़े गए पत्थरबाजों ने पूछताछ में खुलासा किया है कि दंगाइयों को बैकअप देने के लिए कई मुस्लिम महिलाओं को भी तैयार रखा गया था। इस बीच प्रदेश सरकार ने हिंसा में हुए नुकसान की वसूली उपद्रवियों से करने का एलान किया है। उधर जमीयत उलेमा ए हिन्द ने भविष्य में किसी भी मस्जिद का सर्वे रोकने की माँग की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पकड़े गए पत्थरबाजों और गिरफ्तार हुई खातूनों से पूछताछ में सामने आया है कि संभल हिंसा के दौरान बैकअप के लिए मुस्लिम महिलाओं को तैयार रखा गया था। पहले से ही साजिश के तहत काँच की बोतलें और पत्थर जमा कर लिए गए थे। इसके बाद उपद्रवियों ने पुलिस पर हमला किया। अंत में औरतों को इस बात के लिए रेडी रखा गया था कि अगर पुलिस दंगाइयों का पीछा करे तो वो सामने आकर खड़ी हो जाएँ।

बताया ये भी गया है कि मुस्लिम महिलाओं पर कई जिम्मेदारी डाली गई थी। पहली जिम्मेदारी में पुलिस के आगे खड़े होकर दंगाइयों को कवर देना था। वहीं दूसरे काम में उनको खुद भी पत्थरबाजी और सुरक्षा बलों पर बोतलें आदि फेंकने का जिम्मा मिला था। हिंसा में शामिल रुकैया, फरमाना और नजराना ने भी इसी तरह की साजिश रचे जाने की पुष्टि की है। इन महिला अरोपितों को आमने-सामने बिठा कर भी पूछताछ की गई है।

जो किया, वही भरेगा

इस बीच उत्तर प्रदेश शासन ने दंगाइयों से ही हिंसा में हुए नुकसान की भरपाई की वसूली की तैयारी कर ली है। पुलिस विभाग सहित अन्य डिपार्टमेंट नुकसान का आंकलन करने में जुटा हुआ है। दंगाइयों की सम्पत्तियों की भी खोजबीन शुरू कर दी गई है। बताते चलें कि हिंसा के बाद अब तक कुल 27 दंगाई गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इसमें 3 महिलाओं के साथ इतने ही नाबालिग भी शामिल हैं। 74 पत्थरबाजों को चिन्हित किया जा चुका है। बाकी की पड़ताल की जा रही है। जिले में कहीं भी खुले में पेट्रोल बेचने पर पाबन्दी लगा दी गई है।

दंगाइयों के साथ खड़ी जमीयत बंद करवाना चाहती है सर्वे

इस पूरे मामले में अब जमीयत उलेमा ए हिन्द की एंट्री हुई है। जमीयत ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र जारी करते हुए माँग की है कि आगे से किसी भी मस्जिद का सर्वे न करवाया जाए। सर्वे से सामाजिक एकता को खतरा बताते हुए जमीयत ने यह भी आवाज उठाई है कि हिन्दू पक्षकार ‘द ‘प्लेसेज ऑफ़ वर्शिप एक्ट’ का पालन करें। मौलाना महमूद मदनी ने मंगलवार (26 नवंबर) को यह पत्र जमीयत के सचिव नूर अहमद फारुकी के जरिए से जारी किया है।

इसी के साथ जमीयत उलेमा ए हिन्द संभल हिंसा में खुल कर दंगे के आरोपितों के पक्ष में खड़ी हो गई है। जमीयत की तरफ से शासन से SDM और डिप्टी एसपी को सस्पेंड करने की भी माँग उठाई गई है। जमीयत उलेमा ने संभल हिंसा में हुई मौतों का जिम्मेदार भी प्रशासन को ठहरा दिया है।

पैदा हुई ईसाई, रिजर्वेशन वाली नौकरी के लिए बन गई दलित: सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा- सिर्फ ‘आरक्षण’ के लिए खुद को हिन्दू बताना संविधान के साथ धोखा

पुद्दुचेरी की एक ईसाई महिला ने दलित होने का दावा करते हुए आरक्षण की माँग कर दी। महिला ने दावा किया कि वह पैदा जरूर ईसाई हुई थी लेकिन हिन्दू धर्म में विश्वास रखती अहि और दलित है, इसलिए आरक्षण दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उसके दावे को नकार दिया।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि महिला केवल नौकरी लेने को ही दलित हिन्दू होने की बात कह रही है जबकि सबूत दिखाते हैं कि वह ईसाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ लेने के लिए ही खुद को दलित हिदू बताना और इसमें विश्वास ना करना संविधान के साथ विश्वासघात है। सुप्रीम कोर्ट ने उसे दलित होने का जाति प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया है।

क्या है मामला?

यह मामला पुद्दुचेरी की एक ईसाई महिला से जुड़ा हुआ है। सी सेल्वारानी नाम की एक महिला ने कोर्ट में दावा किया कि वह हिन्दू पैदा हुई थी और उसके माँ और बाप वल्लुवन जाति के हैं। ऐसे में वह भी इसी जाति की है और अपने जीवन भर हिन्दू धर्म में विश्वास रखते आई है। उसने यह भी बताया कि उसने अपनी पूरी शिक्षा भी दलित होने के फायदे लेते हुए की है।

महिला सेल्वारानी ने कहा कि उसने 2015 में एक नौकरी के लिए आवेदन किया था। इसमें वह पास भी हो गई थी। इसके नौकरी के लिए दस्तावेज के सत्यापन के दौरान उससे जाति प्रमाण पत्र माँगा गया था। उसने इसके लिए आवेदन दिया था लेकिन इसे रद्द कर दिया गया क्योंकि प्रारम्भिक जाँच में सामने आया कि वह ईसाई है और उसका बाप्तिसमा भी हुआ है।

दलित ना होने का जाति प्रमाण पत्र आवेदन रद्द किए जाने के बाद सेल्वारानी मद्रास हाई कोर्ट पहुँच गई। इसके बाद हाई कोर्ट ने मामले में जाँच करके फैसला लेने को जिला प्रशासन से कहा। जिला प्रशासन ने इसके बाद जाँच की और फिर से उसके दलित होने के दावे को खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि ना ही वह हिन्दू है और ना ही बौद्ध या सिख।

इसके बाद सेल्वारानी केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) पहुँच गई। यहाँ से उसने एक जिस नौकरी में आवेदन किया था, उसके लिए एक पद खाली रखवा लिया। वह हाई कोर्ट दोबारा पहुँची लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद दलित होने का प्रमाण पत्र लेने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट आ गई।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में सेल्वारानी ने दावा किया कि वह हिन्दू पैदा हुई थी और तब से हिन्दू धर्म में विश्वास रखती है। उसने दावा किया कि वह मंदिरों में भी जाती है और हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करती है। उसने यह दावा किया कि उसकी माँ एक ईसाई थी और पिता हिन्दू थे। उसने दावा किया उसकी माँ शादी के बाद हिन्दू बन गई थी।

इसके अलावा उसने अपने परिजनों के जाति प्रमाण पत्र भी दिखा दिए। उसने यह भी दावा किया कि उसका बाप्तिसमा तब हुआ था जब वह 3 महीने की थी इसलिए वह ईसाई नहीं बन जाती। उसने साथ ही में यह भी बताया गया कि अपनी पूरी शिक्षा भी उसने दलित होने के आरक्षण का लाभ लेते हुए पूरी की है, इसलिए अब नौकरी में भी उसे आरक्षण मिलना चाहिए।

वहीं इस मामले में जाति प्रमाण पत्र देने का विरोध कर रहे जिला प्रशासन ने बताया कि सेल्वारानी के आवेदन के बाद की गई जाँच में सामने आया था कि उसका पिटा एक धर्मांतरित ईसाई है। इसके अलावा जन्म के तीन महीने बाद ही सेल्वारानी का भी ईसाइयत में बाप्तिसमा करवा दिया गया था। इसका रिकॉर्ड भी है।

इस मामले में गाँव वालों से भी जानकारी माँगी गई। सेल्वारानी के ही गाँव के एक व्यक्ति ने अबूत के साथ बताया कि सेल्वारानी ईसाई है और उसके माता-पिता की शादी भी चर्च में हुई थी। इस बात की तस्दीक सेल्वारानी के गाँव के और भी चार लोगों ने की। जिला प्रशासन ने कहा कि ऐसे में सेल्वारानी को जाति प्रमाण पत्र ना दिया जाना ठीक था।

फैसले में कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि रिकॉर्ड दिखाते हैं कि भले ही सेल्वारानी ने खुद के ईसाई ना होने और हिन्दू धर्म मानने का दावा किया हो लेकिन अगर ऐसा होता तो वह मात्र बयान नहीं देती बल्कि कुछ सही में करती।

कोर्ट ने कहा, ” वह सिर्फ यह दावा नहीं कर सकती कि उसके पिता ने पुनः धर्म परिवर्तन कर लिया है और उसने और उसकी माँ ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया है। सेल्वारानी और उसके परिवार ने यदि सही में धर्म परिवर्तन करने का इरादा किया था, तो उन्हें हिंदू धर्म में मानने के लिए दिखावा करने के बजाय इसे सही दर्शाने के लिए कुछ पक्का काम करना चाहिए था।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मान लिया जाए कि सेल्वारानी की माँ हिन्दू बन गई थी तो फिर उसने अपने बच्चों का बाप्तिसमा क्यों करवाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस मामले में, सेल्वारानी जन्म से ईसाई थी और उसे किसी भी जाति से नहीं जोड़ा जा सकता। किसी भी मामले में, ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने पर, व्यक्ति अपनी जाति खो देता है।”

कोर्ट ने धर्मांतरण को लेकर कहा, “कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म में तभी धर्मांतरित होता है, जब वह वास्तव में उसके सिद्धांतों और आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित होता है। हालाँकि, यदि धर्मांतरण का उद्देश्य केवल आरक्षण का फायदा लेना है। लेकिन अगर दूसरे धर्म में कोई विश्वास सही में नहीं है, तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा फायदा दिया गया तो आरक्षण के पूरे उद्देश्य को ही खत्म कर देगा। कोर्ट ने कहा कि सबूत साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि सेल्वारानी ईसाई धर्म को मानती है और नियमित रूप से चर्च में जाकर इस धर्म का सक्रिय रूप से पालन करती है। कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद वह हिंदू होने का दावा करती है और रोजगार के उद्देश्य से अनुसूचित जाति समुदाय का प्रमाण पत्र चाहती है। कोर्ट ने कहा कि यदि उसे आरक्षण का फायदा दिया गया तो यह संविधान के साथ धोखाधड़ी होगी।