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बीजेपी को बदनाम करने के चक्कर में एक-दूसरे की पतलून उतार रहे कॉन्ग्रेस विधायक: एक ने कहा- कर्नाटक सरकार गिराने को ₹100 करोड़ का ऑफर, दूसरे ने कहा- कोई ऑफर नहीं मिला

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी बयानबाजी तेज़ हो गई है। कॉन्ग्रेस विधायक रविकुमार गनिगा ने दावा किया कि बीजेपी ने कॉन्ग्रेस विधायकों को खरीदने के लिए ₹100 करोड़ का ऑफर दिया है। वहीं, इस दावे को उनके ही पार्टी के विधायकों ने खारिज कर दिया।

कॉन्ग्रेस विधायक ने लगाए गंभीर आरोप

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मांड्या से कॉन्ग्रेस विधायक रविकुमार गनिगा ने कहा कि बीजेपी ने सरकार गिराने के लिए कॉन्ग्रेस विधायकों को ₹100 करोड़ का ऑफर दिया। उन्होंने बताया कि यह ऑफर चिक्कमगलुरु के विधायक थम्मैया और किट्टूर के विधायक बाबासाहेब पाटिल जैसे नेताओं को दिया गया। उन्होंने कहा, “होटल, गेस्ट हाउस और एयरपोर्ट पर मीटिंग्स हुई हैं। हमारे पास ऑडियो, वीडियो, सीडी, पेन ड्राइव और आईक्लाउड में सबूत हैं, जिन्हें जल्द मीडिया के सामने रखा जाएगा।”

गनिगा ने आगे कहा कि पहले ₹50 करोड़ का ऑफर दिया गया था, लेकिन कॉन्ग्रेस विधायकों ने उसे ठुकरा दिया। इसके बाद ₹100 करोड़ का ऑफर आया। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि यह पैसा पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार से जुटाया गया है।

थम्मैया ने किया दावे का खंडन

गनिगा के आरोपों पर चिक्कमगलुरु से कॉन्ग्रेस विधायक एचडी थम्मैया ने साफ कहा कि उन्हें किसी ने संपर्क नहीं किया। थम्मैया ने कहा, “मुझे बीजेपी से कोई कॉल या ऑफर नहीं आया। मुझे नहीं पता कि गनिगा ने मेरा नाम क्यों लिया। आप उनसे ही पूछें। मैं पहले बीजेपी में था, लेकिन अब कॉन्ग्रेस का वफादार विधायक हूँ।”

कडूर के विधायक केएस आनंद ने भी कहा कि बीजेपी ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया। उन्होंने कहा, “मैं कॉन्ग्रेस का वफादार नेता हूं और पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़कर राजनीति में आया हूँ। बीजेपी के नेताओं की मुझसे बात करने की हिम्मत भी नहीं हुई।”

किट्टूर के विधायक बाबासाहेब पाटिल ने यह माना कि कॉन्ग्रेस सरकार बनने के बाद बीजेपी ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन हाल-फिलहाल में ऐसा कोई ऑफर नहीं आया। उन्होंने कहा, “बीजेपी पिछले एक साल से कॉन्ग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे नाकाम रहे हैं। हमारी पार्टी एकजुट है।”

जहाँ एक तरफ गनिगा अपने आरोपों पर अडिग हैं, वहीं उनके पार्टी के ही विधायकों का कहना है कि ऐसा कोई ऑफर नहीं आया। बीजेपी पर आरोपों का जवाब फिलहाल बाकी है, लेकिन कॉन्ग्रेस के भीतर भी इन बयानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सियासी हलचल के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर क्या सबूत सामने आते हैं और कर्नाटक की राजनीति में क्या नया मोड़ आता है।

The साबरमती Report: जरूर देखने के 7 कारण, 7 कारण इग्नोर करने के… और विवाद वाले 3 सीन

28 अप्रैल 2006 की एक घटना है। एक फिल्म रिलीज होती है उस दिन। हर हफ्ते होते रहती है फिल्म रिलीज… लेकिन 28 अप्रैल 2006 का जिक्र इसलिए क्योंकि वो स्पेशल है। यूनाइटेड 93 (United 93) नाम की हॉलीवुड फिल्म आई थी उस दिन। जिस घटना पर यह फिल्म बनी थी, उसके 1721 दिन बाद। मतलब 5 साल से कम समय में घटना को सिनमाई पर्दे पर उतार दिया गया था।

United 93 के पहले भी कुछ फिल्में इस मुद्दे पर बनाई जा चुकी थीं। इस फिल्म का जिक्र इसलिए क्योंकि इसमें कहानी जो बुनी गई, वो सिनेमाई लकीर पर घटना को जोड़ती है। यही कारण है कि रॉटेन टोमैटोज, IMDb आदि पर इसकी रेटिंग शानदार है। 

घटना इतनी बड़ी थी कि हॉलीवुड तो छोड़िए, बॉलीवुड वाले भी इसको लेकर ‘सलिमा’ बनाने लगे थे। ये घटना थी 11 सितंबर 2001 की। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर इस्लामी आतंकी हमले की। घटना ऐसी कि ‘सलिमा’ बनाने वाले लोगों को इसमें भी My Name Is Khan टाइप कहानी और मसाला दिखने लगा था।

क्या अपने देश की इससे भी बड़ी घटना पर ‘सलिमा’ बनाने वालों की नींद टूटी? क्या उनके अंदर का कहानीकार उस घटना को बड़े पर्दे पर उतार कर जनता के सामने सच दिखा पाया? 9/11 से बड़ी घटना अपने देश में क्या सच में हुई है? उत्तर है – हाँ। और इस उत्तर के पीछे जो तर्क छिपा है, उसी के डर से डरता है ‘सलिमा’ बनाने वाला कौम।

27 फरवरी 2002 को 59 जिंदा इंसान आग में जला कर मार डाले गए थे। और यह घटना 9/11 से कहीं ज्यादा बड़ी और भयावह थी। मरने वालों की संख्या का तर्क इसके पीछे नहीं है। तर्क है घटना को अंजाम देने वालों की पहचान का। 9/11 को जिन लोगों ने अंजाम दिया, वो सब के सब ऐसे ही मजहबी मानसिकता और ट्रेनिंग लिए थे। लेकिन जिन लोगों ने साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाया, वो सब्जी बेचने वाले से लेकर दर्जी या पेंटर से लेकर मौलवी-मौलाना और भीड़ में चलता कोई पड़ोसी हो सकता है, ऐसे लोग जिन पर हम भरोसा करते हैं।

कोई किसी को जिंदा जला कर कैसे मार सकता है? एक साथ 59 जिंदा लोगों को कैसे जलाया जा सकता है? ऐसे सवालों का जवाब है – नफरत मन में या दिल में नहीं बल्कि रूह तक उतर आए, तभी यह करने की कोई सोच भी सकता है। ‘काफिर’ की हत्या, दोजख में जलने आदि वाली नफरत पर मुहर तो कट्टर इस्लामी सोच का हिस्सा है ही, लिखित है। लेकिन गंगा-जमुनी तहजीब ‘सलिमा’ वाली कौम इस नफरत को कैसे दिखाए, इसी का नतीजा है The साबरमती Report का 8297 दिन बाद रिलीज होना। मतलब 22 साल से ज्यादा का इंतजार।

6 पैराग्राफ और 400 से ज्यादा शब्द के बाद भी The साबरमती Report की पटकथा, संगीत, अभिनय, सिनेमैटोग्राफी आदि पर नहीं लिख पाया हूँ, इसके लिए माफ कीजिए। लेकिन मैं भटका नहीं हूँ। दरअसल मुझे इस फिल्म का रिव्यू लिखना था भी नहीं। जरूरत ही नहीं। मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। मैं समाज में इस फिल्म के होने की जरूरत पर लिख रहा हूँ। इतनी बड़ी हृदय विदारक और लोमहर्षक घटना, जिसे भारतीय इतिहास से कभी भुलाया नहीं जा सकता, उस पर 22 साल क्यों लग गए किसी को फिल्म बनाने में, मुझे इसमें दिलचस्पी है।

क्यों देखनी चाहिए The साबरमती Report

  • गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन नहीं जलाई गई थी बल्कि अयोध्या से जिस ट्रेन में कारसेवक आ रहे थे, उस साबरमती एक्सप्रेस को जलाई गई थी, इस अंतर को समझना है – तो देखिए यह फिल्म।
  • गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने के कारण मारे गए 59 लोगों में से कुछ का नाम जानना चाहते हैं – तो देखिए यह फिल्म।
  • ऐसी घटना जिसने भारतीय इतिहास को दो हिस्सों (भारत गोधरा से पहले, भारत गोधरा के बाद) में बाँट दिया, यह जानने को इच्छुक हैं – तो देखिए यह फिल्म।
  • ट्रेन में आग अपने आप नहीं लगी थी, टेक्निकल फॉल्ट के कारण नहीं लगी थी… बल्कि कट्टरपंथी मुस्लिमों ने प्लानिंग करके लगाई थी, यह सच बड़े पर्दे पर देखना है – तो देखिए यह फिल्म।
  • मीडिया हर एक सच जस का तस दिखा देता है, इस भ्रम में जीते हैं – तो देखिए यह फिल्म।
  • गंगा-जमुनी ‘सलिमा’ वाला कौम 22 साल बाद ही सही, जाग कर गोधरा के सच को लिख कर फिल्मा भी रहा, इस चेंज को देखना है – तो देखिए यह फिल्म।
  • कट्टर इस्लामी मानसिकता के कारण जिंदा जला कर मार डाले गए 59 लोगों में से 41 का नाम ही अभी तक सार्वजनिक हुआ है। बाकी 18 अज्ञात लोग कौन थे? इस पर मीडिया की खोजी पत्रकारिता और बॉलीवुड ‘सलिमा’ वाले कब रिसर्च करके लाएँगे फिल्म या डॉक्यूमेंट्री? यह सवाल सिर्फ सवाल न होकर देश का नैरेटिव बने, यह है आपकी मंशा, चाहते हैं यह कि वो 18 लोग सिर्फ अज्ञात बन कर न भूला दिए जाएँ? – तो देखिए यह फिल्म।

क्यों नहीं देखें The साबरमती Report

  • ट्रेन कैसे जल रहा, यह विजुअल देखना चाहते हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। क्योंकि फिल्म की मूल कहानी साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने की घटना को लेकर नहीं है। फिल्म गढ़ी गई है गोधरा में ट्रेन को जलाने के बाद कैसे इस अमानवीय घटना को इतिहास से मिटाने की कोशिश की गई, इस पर। पूरी फिल्म मीडिया के इसी झूठ परोसने वाले बिजनेस पर केंद्रित है।
  • अगर देखना चाहते हैं कि जिंदा जलने वाले लोग कैसे चिल्ला रहे हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। वो इसलिए क्योंकि पीड़ित परिवारों को और ज्यादा प्रताड़ित करने की मंशा नहीं रही होगी कहानीकार और निर्देशक की। इसलिए आग या आग में जलते लोग इस फिल्म का हिस्सा भर हैं। हाँ यह जरूर दिखाया गया है कि ट्रेन की दो बोगियों को प्लानिंग करके जला दिया कट्टर मुस्लिम भीड़ ने। इसके बाद कैसे मीडिया ने इस खबर को लगभग मार दिया, पूरी कहानी ही इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
  • सिनेमा में दिखाई गई ‘2 कहानी’ और कहानी के पीछे का झूठ और उसके बाद निकल कर आई हकीकत के अंतर को समझ नहीं पाते हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। यह बहुत जरूरी हिस्सा है, जिसे सिनेमा हॉल में बैठे कई दर्शक समझने में गलती करते दिखे, टिका-टिप्पणी भी की। निर्देशक ने इसी कारण से कहानी-1 और कहानी-2 लिख करके फिल्म में स्पष्ट दिखाया है और उसके बाद क्लियर भी किया है कि इन दोनों कहानियों को जानबूझ कर प्लांट किया गया था ताकि गोधरा का सच कभी सामने आ ही न पाए। कहानी-1 में मुस्लिम लड़की का कारसेवकों द्वारा अपहरण और कहानी-2 में हिंदू लड़के द्वारा कारसेवकों के ही खिलाफ गवाही देने का प्लॉट इतना मजबूत पक्ष है कि इन्हीं दो कहानियों के दम पर ‘ट्रेन में अपने आप लग गई थी आग’ वाला नैरेटिव तब का न सिर्फ मीडिया गढ़ा, बल्कि शुरुआती जाँच रिपोर्टों में भी इसे ही सच मान लिया गया था। फिल्म में इन दोनों कहानियों के झूठ का पर्दाफाश करके निर्देशक ने यह साबित कर दिया कि कहानी ही सच हो, यह जरूरी नहीं।
  • मीडिया रिपोर्ट में क्या कहा गया और फिल्म के अंत में सच कैसे बाहर आया, इसे नहीं समझ पा रहे हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। कहानीकार और निर्देशक ने देश के चौथे स्तंभ मतलब मीडिया पर आँख मूँद कर भरोसा करने के मिथक को तोड़ा है। यही कारण है कि शुरुआती फिल्म में जहाँ-जहाँ ‘एक्सीडेंट के कारण ट्रेन में आग लग गई’ जैसा सीन है, उसकी स्क्रिप्ट में ध्यान से सुनेंगे तो पाएँगे कि यह मीडिया रिपोर्ट है। ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि यही सच है। मीडिया = सच, इस भ्रम को तोड़ने में निर्देशक के साथ-साथ कहानीकार को 10 में से 10 अंक मिलने चाहिए।
  • पाकिस्तानी टीम के छक्का मारने पर मुस्लिम कॉलनी में बजती तालियाँ और फूटते पटाखों के बीच मुसलमानी टोपी पहने छोटे-छोटे बच्चों का इंडिया की जीत पर जश्न मनाते सीन के बीच का अंतर नहीं समझ पाते – तो मत देखिए यह फिल्म। दृश्य माध्यम में कुछ चीजें प्रत्यक्ष कही जाती हैं, कुछ अप्रत्यक्ष। दर्शक होने के नाते इस अंतर को समझना होगा। कहानीकार प्रत्यक्ष तौर पर हीरो से बुलवा रहा है कि मुस्लिम कॉलनियों में पाकिस्तान क्रिकेट टीम के अच्छे खेलने पर पटाखे फुटना आम बात है। जबकि निर्देशक वहीं एक समानांतर दुनिया दिखा रहा है कि इसी कॉलनी के अबोध बच्चे जिन्हें पाकिस्तान या कट्टर मजहबी घुट्टी नहीं पिलाई गई है, वो इंडिया की जीत को अपनी जीत समझ कर एंजॉय कर रहा है। कट्टर मुस्लिम व्यस्क या किशोर का रवैया बनाम मुस्लिम बच्चे के रवैये को पर्दे पर कैसे दिखाया जाए, इस अंतर को समझना होगा।
  • ईमानदार लोग दोनों तरफ होते हैं, इस लाइन के तर्क को नहीं समझ पाते – तो मत देखिए यह फिल्म। इस सीन में कोई समस्या नहीं है फिर भी कई दर्शकों का यह कहना कि फिल्म बनाने वालों ने बैलेंस के लिए ऐसा किया, यह सच नहीं है। इसको ऐसे समझ सकते हैं – अगर दूसरी तरफ के कुछ लोग ईमानदार नहीं होते तो घरवापसी कौन कर रहा है? दूसरी तरफ के ईमानदार लोगों के लिए रास्ते बंद कर देंगे तो उनके हिस्से का भोगा हुआ सच कैसे बाहर आएगा?
  • हिंदी पत्रकार के इर्द-गिर्द बुनी गई है यह फिल्म लेकिन लिखी गई शुद्ध हिंदी से प्यार है – तो मत देखिए यह फिल्म। जी हाँ, हिंदी फिल्म है तो बोली गई हिंदी तो सही ही है लेकिन जहाँ हिंदी में लिखा गया है, वो हिस्सा सच में निराश करने लायक है।

जिन-जिन सीन पर विवाद, वहाँ क्या कहना चाहता है निर्देशक

‘ईमानदार लोग दोनों तरफ होते हैं’ – इस सीन पर आहत हैं तो एपीजे अब्दुल कलाम को लेकर आपके क्या विचार हैं? क्या उनको भी खारिज कर देंगे। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान अभी तो खैर बीजेपी में हैं लेकिन उन्होंने तो शाह बानो मामले पर अपनी ही कॉन्ग्रेस पार्टी के राजीव गाँधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, तो क्या उनको भी खारिज कर देंगे? कहानीकार और निर्देशक बस यह कहना चाह रहे कि समाज के किसी भी तबके में अगर कोई अच्छा है तो उसे उसी नजरिए से देखा जाए। क्या इतना कहने-दिखाने की भी आजादी नहीं हो उसे?

‘मुसलमानी टोपी पहने छोटे-छोटे बच्चों का इंडिया की जीत पर जश्न’ – ध्यान रखिए कि इस सीन में जो बच्चे दिखाए गए हैं, वो किशोरावस्था में नहीं पहुँचे हैं। निर्देशक यह दिखाना चाहता है कि मजहबी कट्टरपन का जहर अभी उनके दिमाग में नहीं भरा है, अबोध हैं, भारत की जीत पर खुशियाँ मना रहे हैं। क्योंकि इसी निर्देशक ने उसी मुस्लिम कॉलनी के उन्हीं बच्चों के व्यस्क परिवार वालों को पाकिस्तानी छक्के पर तालियाँ बजाते और पटाखे छोड़ते भी दिखाया है। दृश्य माध्यम में एकदम विपरीत संदर्भों को समानांतर प्रस्तुत करके दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने की विधा खत्म कर देना चाहते हैं क्या?

‘मीडिया रिपोर्ट और 2 झूठी कहानियाँ’ – मीडिया ने साबरमती एक्सप्रेस के जलाए जाने के बाद झूठ ही गढ़ा है, यही तो कहना चाह रहा है निर्देशक। जिस मीडिया पर आप भरोसा करते हैं, उसके दिखाए विजुअल को ही सच मान लेते हैं, उसी का तो पर्दाफाश किया गया है। साबरमती एक्सप्रेस को किसने जलाया से ज्यादा इस फिल्म का फोकस है – किसने छिपाया, किसने षड्यंत्र रचा। मीडिया इसमें विलेन है – कहानी के इस लाइन से भला क्या और कैसी दिक्कत?

कहाँ किया जा सकता था सुधार

शुरुआती डिस्क्लेमर से लेकर अंतिम के साभार वाले सीन में उल्टी-पुल्टी-टूटी-फूटी लिखी हिंदी पर ध्यान नहीं दिया गया। यह अक्षम्य तब है, जबकि पूरी फिल्म में हीरो बार-बार अपने आप को हिंदी मीडियम वाला कह रहा होता है, उसे हिंदी पत्रकार होने पर गर्व भी होता है। निर्माता-निर्देशक को बिना पैसे खर्च किए उसी से प्रूफरीड भी करवा लेना चाहिए था, अगर सच में उसे रील वाली हिंदी रियल लाइफ में भी आती है तो!

इधर आपके बच्चे फेफड़े में भर रहे जहरीली हवा, उधर गुमराह करने वाले ‘रिसर्च’ शेयर कर प्रदूषण फैला रहा रवीश कुमार: पावर प्लांट की आड़ में असल कारणों पर डाला जा रहा पर्दा

हर साल अक्टूबर से जनवरी के बीच, दिल्ली और उत्तर भारत के कई राज्यों में वायु प्रदूषण की समस्या चरम पर होती है। गिरते तापमान, धुआं, धूल, धीमी हवाएं, वाहनों से निकलने वाला धुआं और पराली जलाने जैसी वजहें मिलकर इस संकट को बढ़ाती हैं।

धुंध के चलते दिल्ली आने-जाने वाली कई फ्लाइट्स रद्द होती हैं। स्कूल बंद करने पड़ते हैं, यातायात में भारी परेशानी होती है, और आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। लोगों को जहरीली हवा में सांस लेना पड़ता है, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है। ये धुंध इतनी घनी होती है कि इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

17 नवंबर को दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 441 पर पहुँच गया, जो “गंभीर” श्रेणी में आता है। इस दिन दिल्ली देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर रहा। पिछले दिन का AQI 417 था। इस खराब हालात में लोग सांस लेने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं, जबकि राजनीतिक गलियारे में हमेशा की तरह दोषारोपण का खेल शुरू हो गया है। समाधान देने के बजाय, हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचने और सियासी फायदा उठाने में लगा है।

इस दौरान तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अधूरी सच्चाई बताने वाले कई शोध रिपोर्ट्स सामने आती हैं। ये रिपोर्ट्स दिखने में गंभीर प्रयास लग सकती हैं, लेकिन इनमें समग्र दृष्टिकोण और पूरी सच्चाई का अभाव होता है। ये अक्सर किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती हैं।

15 नवंबर को सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट इसका ताजा उदाहरण है। इस रिपोर्ट का शीर्षक था, “थर्मल पावर प्लांट्स से बढ़ता SO₂ उत्सर्जन: FGD स्थापना में देरी नहीं होनी चाहिए,” जिसे मनोजकुमार एन ने लिखा है।

इस रिपोर्ट के आधार पर कई मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे मनीकंट्रोल, बिजनेस टुडे और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने खबर चलाई कि दिल्ली-एनसीआर में थर्मल पावर प्लांट्स से प्रदूषण पराली जलाने से 16 गुना ज्यादा है।

फोटो: मनीकंट्रोल
फोटो साभार: बिजनेस टुडे
फोटो साभार: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

दिल्ली प्रदूषण: पराली से ध्यान हटाने का खेल और थर्मल पावर प्लांट्स पर नए आरोप

जैसे ही CREA की रिपोर्ट आई, कई लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया और सोशल मीडिया पर साझा किया। रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लेखक और स्तंभकार देविंदर शर्मा ने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “दिल्ली के थर्मल पावर प्लांट्स पराली जलाने से 16 गुना अधिक प्रदूषण करते हैं।” इस पर ‘पत्रकार’ रवीश कुमार ने टिप्पणी की, “किसी को इन तथ्यों में दिलचस्पी नहीं है। हर किसी को बस वक्त गुजारना है और हर मुद्दे में दूसरों पर दोष डालना है। सबसे अच्छा है कि सब थाली बजाएं, सब खुश रहेंगे।”

अपनी आदत के अनुसार, रवीश ने एक बार फिर केंद्र सरकार को दोषी ठहराया और 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति आभार व्यक्त करने की अपील का मजाक उड़ाया। मोदी सरकार और उसे चुनने वाले लोगों के प्रति उनकी नाराजगी, समाधान की कमी के साथ, उनके ‘कैंप’ के बाकी लोगों की तरह, बस एक तयशुदा ढर्रे पर चलती है।

ट्वीट का स्क्रीनशॉट

इस बीच, डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) ने वायु प्रदूषण प्रबंधन पर रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि रविवार को दिल्ली में वाहनों से होने वाला प्रदूषण कुल प्रदूषण का लगभग 15.8% था। DSS ने यह भी कहा कि शनिवार (16 नवंबर 2024) को दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान पराली जलाने का था, जो कुल प्रदूषण का 25% था।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, इस दौरान PM2.5 मुख्य प्रदूषक था। PM2.5 ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में गहराई तक पहुँचकर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य खतरे उत्पन्न होते हैं।

CREA रिपोर्ट: थर्मल पावर प्लांट्स और पराली जलाने की तुलना

अब देखते हैं CREA की रिपोर्ट के मुख्य दावों को। रिपोर्ट के मुताबिक, “एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स पराली जलाने से 16 गुना अधिक प्रदूषण करते हैं।”

CREA का अनुमान है कि जून 2022 से मई 2023 के बीच एनसीआर के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स ने 281 किलोटन सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उत्सर्जन किया। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कोयला-निर्भर ऊर्जा क्षेत्र से SO₂ उत्सर्जन वैश्विक मानवजनित उत्सर्जन का लगभग 20% है। 2023 में भारत से बिजली उत्पादन के जरिए 6,807 किलोटन SO₂ का उत्सर्जन हुआ, जो तुर्की (2,206 किलोटन) और इंडोनेशिया (2,017 किलोटन) जैसे अन्य बड़े उत्सर्जकों से कहीं अधिक है।

रिपोर्ट ने दावा किया कि एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स सालाना 281 किलोटन SO₂ उत्सर्जित करते हैं, जबकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से 8.9 मिलियन टन चावल के भूसे को जलाकर 17.8 किलोटन SO₂ उत्सर्जित होता है। हालाँकि, पराली जलाना सिर्फ एक मौसमी समस्या है, जबकि थर्मल पावर प्लांट्स सालभर प्रदूषण फैलाते हैं।

इसके बावजूद थर्मल पावर प्लांट्स को अक्सर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों में ढील दी जाती है और फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक लगाने में बार-बार मोहलत मिलती है। दूसरी ओर, पराली जलाने पर किसानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है।

दिल्ली के बदरपुर का थर्मल पॉवर प्लांट अब बंद हो चुका है, चिमनियाँ गिराई जा चुकी हैं। (फोटो साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)

दिल्ली प्रदूषण: थर्मल पावर प्लांट्स और पराली जलाने की तुलना पर अधूरी सच्चाई

आंकड़ों के अनुसार, पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में मौसमी प्रदूषण बढ़ता है, जबकि थर्मल पावर प्लांट्स सालभर चलते हैं। दिल्ली से 300 किलोमीटर के भीतर 11 कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स हैं। इसके अलावा, पंजाब का गोइंदवाल साहिब पावर प्लांट भी इस सूची में शामिल है।

FGD तकनीक से प्रदूषण घटाने की संभावना

CREA की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि थर्मल पावर प्लांट्स में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक को तेजी से लागू किया जाए, तो एनसीआर में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उत्सर्जन 93 किलोटन तक घट सकता है, यानी 67% की कमी। CREA के विश्लेषक मनोजकुमार ने कहा, “एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स से 96% प्रदूषण सेकेंडरी पार्टिकुलेट के रूप में होता है, जो मुख्य रूप से SO₂ से उत्पन्न होता है। SO₂ उत्सर्जन में कमी से पार्टिकुलेट मैटर और स्वास्थ्य जोखिम दोनों को कम किया जा सकता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि, “SO₂ का स्तर अक्सर राष्ट्रीय मानक (NAAQS) के भीतर होता है क्योंकि यह वायुमंडल में जल्दी ही सल्फेट्स में बदल जाता है। ये सल्फेट्स PM2.5 के मुख्य घटक होते हैं, जिनका लंबा जीवनकाल होता है और वे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।”

तथ्यों की गलत तुलना और समस्याओं को बढ़ा चढ़ाकर बताना

थर्मल पावर प्लांट्स वायु प्रदूषण में योगदान करते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इस विश्लेषण में तुलना का आधार उचित नहीं है। पराली जलाने का समय सितंबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर तक सीमित है, जब दिल्ली में प्रदूषण अपने चरम पर होता है। इसके विपरीत, थर्मल पावर प्लांट्स पूरे साल चलते हैं।

दो अलग-अलग समय-सीमाओं के स्रोतों की तुलना करना उचित नहीं है। सालभर चलने वाले स्रोत के आंकड़ों को पूरे साल के औसत पर फैला दिया जाता है, जिससे इसका असर कम दिखता है। उदाहरण के लिए, यदि एक रिपोर्ट कहती है कि पराली जलाना सालाना आधार पर केवल 5% प्रदूषण का कारण बनता है, तो यह भले ही छोटा आँकड़ा लगे, लेकिन इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उस अवधि में यह 60% प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो, जब यह होता है।

इसे बेहतर समझने के लिए सोचें कि वार्षिक परीक्षा के स्कोर की तुलना किसी छात्र के एकल टेस्ट स्कोर से करना अकादमिक प्रदर्शन का सही आकलन नहीं होगा। निष्पक्ष तुलना तभी हो सकती है जब दोनों को समान मापदंडों पर आंका जाए।

इसी तरह, दिल्ली और उत्तर भारत में वायु की खराब गुणवत्ता पराली जलाने के समय से मेल खाती है, जो इसके पर्यावरणीय प्रभाव को स्पष्ट रूप से दिखाती है। दूसरी ओर, अब यह भी पाया गया है कि किसान उपग्रह निगरानी से बचने के लिए पराली जलाने का समय बदल रहे हैं।

दिल्ली प्रदूषण: पराली जलाने और थर्मल पावर प्लांट्स के प्रदूषण में नई सच्चाई

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट देखी गई है। 2021 में 79,000 से अधिक घटनाओं की तुलना में 2023 में यह संख्या घटकर लगभग 32,000 रह गई। ये आंकड़े सैटेलाइट इमेज विश्लेषण पर आधारित थे। लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आई कि किसान सैटेलाइट निगरानी को चकमा देने के लिए नई रणनीतियाँ अपना रहे हैं।

सैटेलाइट की निगरानी से बचने की रणनीति

NASA वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने बताया कि पंजाब में इस सप्ताह पराली जलाने की घटनाएँ 7,000 से अधिक हो गईं, जिसमें 400 नए मामले दर्ज हुए। उन्होंने कहा, “हम NASA के Suomi NPP और Aqua जैसे सैटेलाइट्स के दोपहर के समय के डेटा का उपयोग करते हैं, जो 1:30-2:00 बजे क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। लेकिन किसानों ने समझ लिया है कि वे इस समय के बाद पराली जलाकर निगरानी से बच सकते हैं।”

खेत में जलती पराली (फोटो साभार: न्यूज बाइट्स)

जेठवा ने बताया कि दक्षिण कोरिया के जियोस्टेशनरी सैटेलाइट से यह पुष्टि हुई है कि ज्यादातर पराली जलाने की घटनाएँ 2 बजे के बाद होती हैं, जब NASA सैटेलाइट्स क्षेत्र से गुजर चुके होते हैं। हालाँकि, जियोस्टेशनरी सैटेलाइट, जो हर पाँच मिनट में क्षेत्र की तस्वीर लेता है, इन आग की घटनाओं को रिकॉर्ड करता है।

वायु प्रदूषण में कई कारक जिम्मेदार

वायु प्रदूषण कई प्रकार के प्रदूषकों से मिलकर बनता है, जिनमें SO₂ और CO₂ जैसी गैसें, धूल, और धुआं शामिल हैं। इस समय दिल्ली और अन्य जगहों पर PM2.5 और PM10 जैसे कणों का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।

PM2.5: ये बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्त प्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

PM10: ये अपेक्षाकृत मोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 10 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकते हैं और सांस की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं, लेकिन PM2.5 जितने खतरनाक नहीं होते।

थर्मल पावर प्लांट्स इन कणों के स्रोतों में से एक हैं, लेकिन पराली जलाने, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल और अन्य गतिविधियां भी इन कणों के प्रमुख योगदानकर्ता हैं।

सैटेलाइट डेटा और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि पराली जलाने और थर्मल पावर प्लांट्स दोनों ही दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। लेकिन किसानों द्वारा सैटेलाइट की निगरानी से बचने के प्रयास और मौसमी एवं वार्षिक प्रदूषण के बीच गलत तुलना से प्रदूषण का सही आकलन करना मुश्किल हो जाता है। असली चुनौती यह है कि सभी स्रोतों के प्रति एक समान और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए ताकि वायु गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।

गैर-बराबरी की तुलना

रिपोर्ट में बताया गया, “हालाँकि कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स (CFPP) के उत्सर्जन से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, लेकिन इन प्लांट्स पर नियमों का पालन कराने में सख्ती पराली जलाने के मुकाबले बहुत कम है। पराली जलाने के दौरान किसानों को भारी जुर्माने और कड़ी निगरानी का सामना करना पड़ता है, वहीं CFPPs को तकनीकों जैसे FGD (Flue Gas Desulfurization) लागू करने में देरी और नियमों का बार-बार उल्लंघन करने के लिए छूट दी जाती है।”

कृषि क्षेत्र में नियमों की कमी

जबकि उद्योगों, निर्माण कार्य, और ऑटोमोबाइल्स के लिए एंटी-पाल्यूशन नियम स्थापित हैं, किसानों के लिए ऐसे नियम या तो हैं ही नहीं या उनका पालन नहीं किया जाता। एक हालिया उदाहरण कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट्स का है, जिसे पराली जलाने की समस्या का दीर्घकालिक समाधान माना गया था। लेकिन 38 में से केवल 5 प्लांट्स ही चालू हैं, और वे भी पूरी क्षमता पर नहीं चल रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स को किसानों के विरोध के कारण रोक दिया गया। ये प्लांट्स फसल के अवशेष, गोबर, और अन्य कृषि कचरे से बायोगैस बनाने के लिए तैयार किए गए थे। किसानों से उम्मीद की गई थी कि वे पराली जलाने की बजाय इसे इन प्लांट्स में भेजेंगे।

CBG प्लांट्स के संचालन में बाधाएँ

लुधियाना के गुंघराली गाँव में CBG प्लांट के संचालन प्रमुख पंकज सिंह ने बताया, “प्लांट को पराली की समस्या हल करने और पर्यावरण की मदद के लिए बनाया गया था। लेकिन किसान विरोध के कारण यह बंद है। 70 करोड़ रुपये खर्च कर प्लांट बनाया गया और अब भारी EMI और कर्मचारियों की सैलरी का भुगतान करना पड़ रहा है। क्षेत्र के अन्य तीन प्लांट्स भी बंद पड़े हैं, और राज्य सरकार से मदद के लिए हमने कई बार गुहार लगाई है।”

AAP का थर्मल पावर प्लांट्स पर रुख और U-Turn

थर्मल पावर प्लांट्स को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) का रुख समय-समय पर बदलता रहा है। 2021 में जब कोयले की कमी के कारण दिल्ली में बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ, तब AAP ने केंद्र सरकार पर गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाने का आरोप लगाया।

तत्कालीन डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा था, “देशभर के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर आगाह कर रहे हैं, लेकिन केंद्रीय ऊर्जा मंत्री कह रहे हैं कि कोई संकट नहीं है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।” उस वक्त बिजली मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि कोयले की सप्लाई न मिलने पर दिल्ली में “कंप्लीट ब्लैकआउट” हो सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि 2019 में AAP ने दिल्ली में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स को बंद करने की घोषणा की थी। इसके बाद 2020 में AAP ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स पर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इन्हें तुरंत बंद करने की माँग की थी।

AAP का सुप्रीम कोर्ट में रुख

2021 में AAP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के 11 कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स को बंद करने का आदेश देने की अपील की थी।

AAP प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा था, “जब दिल्ली सरकार थर्मल पावर प्लांट्स को बंद कर सकती है, तो अन्य राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते?”

हालाँकि, थर्मल पावर प्लांट्स बंद करने का दावा करने के बाद, बिजली संकट के समय AAP ने केंद्र सरकार पर दोष मढ़ना शुरू कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक राजनीतिक चाल है, जहां पर्यावरण को बचाने के नाम पर विकास परियोजनाओं में रुकावट डालने की प्रवृत्ति देखी गई है।

AAP का पटाखों पर बैन भी दिल्ली में वायु गुणवत्ता सुधारने में विफल

आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार ने दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सितंबर में पटाखों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यह कदम उद्योग को बड़ा झटका देने वाला था और लाखों लोगों की आजीविका पर असर डाल रहा था। पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने सितंबर में कहा, “सर्दी के मौसम में दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने का खतरा है। इस समय पटाखे जलाने से प्रदूषण और बढ़ जाता है।”

उन्होंने आगे कहा, “इस स्थिति को देखते हुए, जैसा कि पिछले साल हुआ था, हम सभी प्रकार के पटाखों के उत्पादन, भंडारण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रहे हैं, ताकि लोगों को प्रदूषण से बचाया जा सके। ऑनलाइन पटाखों की बिक्री और डिलीवरी पर भी पूरी तरह से बैन रहेगा। यह प्रतिबंध दिल्ली में 1 जनवरी 2025 तक लागू रहेगा, ताकि दिल्लीवासियों को पटाखों से होने वाले प्रदूषण से राहत मिल सके।”

हालाँकि, यह बात ध्यान देने योग्य है कि पटाखे जलाने की अनुमति केवल अरविंद केजरीवाल के तिहाड़ जेल से लौटने पर दी गई। फिर भी, इस बैन से कोई खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वायु गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि स्थिति और भी खराब हो सकती थी। दिल्ली सरकार ने यमुनाजी की सफाई में भी काफी काम किया, लेकिन यमुनाजी अभी भी गंदी है और वहां लोग जहरीले झाग के बीच छठ पूजा मनाने को मजबूर हुए, यह स्पष्ट रूप से पार्टी के पर्यावरण के प्रति समर्पण का संकेत है।

दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ी आलोचना की कि उसने दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सालभर पटाखों पर प्रतिबंध नहीं लगाया और पटाखों पर बैन को सही तरीके से लागू नहीं किया। कोर्ट ने यह भी देखा कि सरकार ने शादियों और चुनावों के लिए इस प्रतिबंध में छूट दी थी। AAP अधिकतर हिन्दू त्योहारों पर पटाखों के जलने को लेकर चिंतित दिखती है, बजाय इसके कि वह असली समस्या का समाधान निकालने के लिए सक्रिय कदम उठाए।

सवाल: क्यों बचाव किया जा रहा है?

विपक्ष, मीडिया और उनका पूरा तंत्र राजनीति करने के लिए तैयार है और असली समस्या की पहचान करने की बजाय जिम्मेदारी किसी और पर डालने में जुटा है। वे खुशी-खुशी दीवाली (एक हिन्दू त्योहार) को निशाना बनाएँगे, उद्योगों, पावर प्लांट्स और शायद एक दिन एलियंस को भी दोषी ठहराएँगे। यह नकारा नहीं जा सकता कि उद्योग प्रदूषण में योगदान करते हैं, लेकिन कम से कम वे देश की आर्थिक वृद्धि में योगदान देते हैं, तो फिर जलने वाले पराली से क्या हासिल होता है सिवाय प्रदूषण बढ़ाने के? इसे इस तरह से क्यों बचाया जा रहा है?

अगर थर्मल पावर प्लांट्स बंद कर दिए जाते हैं तो ये लोग क्या विकल्प देंगे? दिल्ली NCR के 3.3 करोड़ से ज्यादा निवासियों की बिजली की माँग कैसे पूरी करेंगे? अगर गाड़ियाँ भी प्रदूषण का कारण हैं, तो क्या उन्हें भी प्रतिबंधित कर दिया जाए? क्या रविश कुमार और जो लोग ऐसी कहानियां बढ़ावा दे रहे हैं, उनके पास खुद गाड़ी या एयर कंडीशनर नहीं हैं?

हम जो ऊर्जा उपयोग करते हैं, वह अभी भी मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न होती है। अरविंद केजरीवाल के भव्य सरकारी आवास में 50 एयर कंडीशनर, 250 टन का एयर कंडीशनिंग प्लांट, 12 बड़े झूमर और 57 सीलिंग फैन हैं। पर्यावरण के प्रति उनके इस कथित चिंतन और पावर प्लांट्स के खिलाफ विरोध को देखकर लगता है कि उन्होंने कुछ और तरीका खोज लिया है, जो बिजली देने के लिए इन एयर कंडीशनर्स के अलावा काम करता है।

औद्योगिक विस्तार देश की आर्थिक विकास के लिए जरूरी है, और उनकी पहली रणनीति ऐसी है जो भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले साधनों पर निशाना साधती है या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन पर हमला करती है, बजाय इसके कि वे इस मुद्दे का व्यावहारिक समाधान खोजें। यह सिर्फ यह दर्शाता है कि वे इस समस्या से ज्यादा अपनी राजनीतिक विपक्षी पार्टियों पर हमला करने में रुचि रखते हैं। साथ ही, वे ‘रिसर्च’ जो सभी कारकों को ध्यान में नहीं रखते और समान आधार पर नहीं किए जाते, केवल उनके अपने बयान को बढ़ावा देने के लिए होते हैं, चाहे उनके असली उद्देश्य कुछ भी हों।

उनका थर्मल पावर प्लांट्स के खिलाफ अनर्गल प्रचार पश्चिमी देशों की याद दिलाता है, जिन्होंने अब जलवायु परिवर्तन के खतरों को पहचाना है और चाहते हैं कि भारत और अन्य विकासशील देश अपने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करें, जबकि उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को न केवल उपनिवेशीकरण बल्कि कोयले का उपयोग करके बढ़ाया था।

सीधे शब्दों में कहें तो इस मामले का चाहिए व्यावहारिक समाधान। जो देश के आर्थिक विकास को बाधित न करें, जो तुच्छ राजनीतिक चालों और दोषारोपण के खेलों पर आधारित न हो, जो शायद राजनीतिक पक्ष को लाभ पहुंचाते हैं लेकिन निश्चित रूप से देश और उसके लोगों के लिए नहीं, उसे प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। थर्मल पावर प्लांट्स और अन्य प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और उनकी योगदान को कम करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।

हालाँकि इस मुद्दे के समाधान के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण और प्रभावी उपायों की आवश्यकता है। केवल वे लोग जो व्यक्तिगत या राजनीतिक एजेंडे रखते हैं, यह कहकर आधे कारणों को दोषी ठहराते हैं और बाकी को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें इसका लाभ मिलता है।

भानु बनकर अमेरिका में छिपा था लॉरेंस बिश्नोई का भाई अनमोल, भारत लाने की कोशिशों में जुटी CBI: बाबा सिद्दीकी के मर्डर में तलाश, NIA ने रखा है ₹10 लाख का इनाम

अनमोल बिश्नोई अमेरिका में पकड़ा गया है। वह गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का छोटा भाई है। बाबा सिद्दीकी की हत्या में उसकी तलाश थी। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उस पर 10 लाख का इनाम घोषित कर रखा है।

अनमोल को FBI (फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन) ने गुरुवार (14 नवंबर 2024) को कैलिफोर्निया से हिरासत में लिया। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस मामले में टिप्पणी से इनकार किया है। उसे प्रत्यर्पित कर भारत लाने की कोशिशों में सीबीआई जुट गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अनमोल बिश्नोई 15 मई 2022 को फर्जी कागजातों के सहारे अमेरिका चला गया था। उसने भानू नाम से पासपोर्ट बनवा रखा है। अमेरिकी एजेंसियों को उसके दस्तावेजों में एक कागज फर्जी मिला था और आखिर में उसका भांडा फूट गया। अनमोल बिश्नोई को भारत लाने के लिए CBI (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) ने शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को FBI के आधिकारियों से मीटिंग की है।

बताया जा रहा है कि लगभग 45 मिनट चली मीटिंग में CBI ने FBI को अनमोल बिश्नोई के खिलाफ भारत में दर्ज तमाम आपराधिक केसों के सबूत दिए गए। इन केसों में बाबा सिद्दीकी की हत्या और मुंबई में ही बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग भी शामिल है।

हालाँकि अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी अनमोल बिश्नोई के मुद्दे पर कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर से इस बावत सवाल हुआ तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार दिया दिया।

बताते चलें कि अनमोल बिश्नोई पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 10 लाख रुपए का इनाम भी घोषित कर रखा है। यह इनाम अक्टूबर 2024 में घोषित किया गया था। अनमोल साल 2022 में NIA द्वारा दर्ज 2 अलग-अलग केसों में वांटेड है। इन मुकदमों में उसके खिलाफ चार्जशीट भी लग चुकी है। इसी साल सितंबर महीने में राजस्थान पुलिस ने अनमोल बिश्नोई के खिलाफ कुल 31 केस दर्ज होने की जानकारी दी थी। इसमें से 22 मुकदमे राजस्थान में दर्ज हैं।

अनमोल के खिलाफ 6 दिसंबर 2022 को उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी हुआ था। साल 2023 में अनमोल को अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक शादी समारोह में देखा गया था। दिल्ली पुलिस के भी मुताबिक जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह की कमान अनमोल बिश्नोई ही सँभालता है। यह एक संगठित अपराध वाला गिरोह है जो न सिर्फ हत्याएँ करवाता है, बल्कि दहशत बना कर उगाही भी करता है।

दावा- पंजाब में कम हुई पराली जलाने की घटना, हकीकत- नासा के भी उपग्रहों को चकमा दे रहे हैं किसान: यूँ ही नहीं घुट रहा दिल्ली का दम, जहरीली हवा के पीछे की सच्चाई जानिए

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या हर साल सर्दियों में गंभीर रूप ले लेती है, जिसमें पराली जलाने की घटनाओं को प्रमुख कारण बताया जाता है। हालाँकि, इस साल सैटेलाइट डेटा से संकेत मिले हैं कि पराली जलाने के मामलों में भारी गिरावट आई है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में 2023 के मुकाबले 2024 में पराली जलाने की घटनाओं में 71% तक की कमी बताई गई। लेकिन विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि किसान सैटेलाइट निगरानी से बचने के लिए समय बदलकर पराली जला रहे हैं।

सैटेलाइट से बचने की रणनीति?

विशेषज्ञों ने पाया है कि किसान अब दिन के ऐसे समय में पराली जला रहे हैं जब निगरानी करने वाले सैटेलाइट उस क्षेत्र के ऊपर नहीं होते। नासा की फायर इनफॉर्मेशन फॉर रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (FIRMS) और अन्य सैटेलाइट्स का उपयोग आग की घटनाओं की निगरानी के लिए किया जाता है। ये सैटेलाइट्स दिन में केवल कुछ घंटों के लिए क्षेत्र की तस्वीर लेते हैं।

नासा के वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने हाल ही में खुलासा किया कि किसान पराली जलाने के समय को इस तरह से बदल रहे हैं कि सैटेलाइट उनका पता नहीं लगा पाते। हिरण जेठवा ने बताया कि किसान अब दोपहर बाद और शाम को पराली जला रहे हैं, जब सैटेलाइट्स का निगरानी समय समाप्त हो चुका होता है।

यह निष्कर्ष दक्षिण कोरिया के जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट GEO-KOMSAT 2A से मिले डेटा से पुष्टि हुआ, जिसने 2 बजे के बाद पंजाब में पराली जलने की घटनाओं में बढ़ोतरी दिखाई। कोरियाई जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स की मदद से पता चला कि किसान ज्यादातर पराली दोपहर बाद और शाम को जलाते हैं, जब नासा के सैटेलाइट वहां से गुजर चुके होते हैं।

जमीनी हालात और सरकारी आँकड़ों में अंतर

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में 2021 में लगभग 79,000 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गई थीं, जबकि 2023 में यह घटकर 32,000 रह गई। इस साल 10 नवंबर तक यह संख्या केवल 6,611 बताई गई। हरियाणा में भी मामलों में कमी आई है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल घटनाओं की संख्या कम होने से समस्या खत्म नहीं होती।

नासा और दक्षिण कोरिया के सैटेलाइट्स से मिले डेटा में अंतर ने इन आँकड़ों को लेकर सवाल उठाए हैं। जहाँ नासा का डेटा दोपहर 1:30 से 2 बजे तक सीमित है, वहीं दक्षिण कोरियाई सैटेलाइट ने दिखाया कि पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएँ दोपहर बाद और शाम को हुईं।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आँकड़ों की गिरावट पराली जलाने के असली मामलों को नहीं दिखाती। नासा के वैज्ञानिक हिरण जेठवा के मुताबिक, “अगर पराली जलाने की घटनाओं में इतनी कमी आई है, तो एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) यानी वायु में कणीय प्रदूषण के स्तर में गिरावट क्यों नहीं आई?” AOD के आँकड़े बताते हैं कि प्रदूषण का स्तर पिछले छह-सात सालों में स्थिर बना हुआ है।

दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है। शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को दिल्ली का AQI 428 रिकॉर्ड किया गया, जो इस सीजन का सबसे खराब स्तर है।

सरकारी प्रयासों पर फिरता दिख रहा है पानी

पंजाब सरकार ने पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। इसमें कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट स्थापित करना भी शामिल है, जो पराली को ऊर्जा के रूप में उपयोग करने का स्थायी समाधान माना जाता है। लेकिन किसानों के विरोध के चलते केवल पाँच प्लांट ही काम कर रहे हैं, और वे भी पूरी क्षमता पर नहीं हैं। इसके अलावा, कृषि उपकरणों पर सब्सिडी देने और किसानों को जागरूक करने जैसे प्रयास भी किए गए। हरियाणा में इस दिशा में कुछ सफलता मिली है, लेकिन पंजाब में स्थिति में सुधार सीमित है।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी सुधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को निर्देश दिया कि वे स्थाई सैटेलाइट्स जैसे जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट्स से डेटा प्राप्त करें, ताकि दिनभर के दौरान पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी रखी जा सके। कोर्ट ने कहा कि इस डेटा का उपयोग तुरंत कार्रवाई के लिए किया जाना चाहिए।

भले ही आँकड़ों में पराली जलाने के मामलों में कमी दिखाई गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत और प्रदूषण के स्तर में सुधार नहीं हो सका है। किसानों द्वारा सैटेलाइट से बचने की रणनीति ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। दीर्घकालिक समाधान के बिना, वायु प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएँ हर साल की तरह बढ़ती रहेंगी। पराली जलाना किसानों के लिए एक सस्ता और तेज तरीका है, जिससे वे अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार कर सकते हैं। हालाँकि, पराली जलाने के लिए वैकल्पिक समाधान जैसे कि बायोडिग्रेडेबल एजेंट्स, मशीनरी, और कृषि प्रबंधन कार्यक्रम मौजूद हैं, लेकिन इनका उपयोग सीमित है।

आतंकी नजीर अहमद वानी को UP ATS ने कश्मीर से पकड़ा, 30 साल से थी तलाश: देवबंद में पुलिस पर फेंका था ग्रेनेड, जमानत मिलते ही हो गया था फरार

उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने सहारनपुर पुलिस के साथ मिलकर 30 साल से फरार चल रहे हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया। नजीर, जो जम्मू कश्मीर के बड़गाम जिले का रहने वाला है, पर 1993 में उत्तर प्रदेश के देवबंद में पुलिसकर्मियों पर हमले का मामला दर्ज था। इस हमले का मकसद पुलिसकर्मियों की हत्या करना था और उस पर 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित था।

सहारनपुर पुलिस के मुताबिक, 26 अगस्त 1993 को देवबंद के यूनियन तिराहे पर कुछ पुलिसकर्मी सुरक्षा के लिए तैनात थे। तभी एक ग्रेनेड फेंका गया, जिससे दो पुलिसकर्मी और जय प्रकाश सैनी व सुखबीर नाम के दो नागरिक घायल हो गए थे। इस हमले के बाद पुलिस ने IPC की धारा 307 (हत्या के प्रयास) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत केस दर्ज किया था। जाँच में पता चला कि इस हमले का आरोपित नजीर अहमद वानी था, जो फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर लंबे समय से देवबंद में रह रहा था।

नजीर अहमद कश्मीर के बड़गाम जिले में थानाक्षेत्र पारिमपुरा के गाँव इन्जक शरीफाबाद का रहने वाला था। वह हिजबुल मुजाहिदीन का सक्रिय आतंकी था जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे लम्बे समय से UP के देवबंद में रह रहा था। आखिरकार 26 मई 1994 को पुलिस ने नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया।

तब फर्जी कागजातों के इस्तेमाल की वजह से उस पर पुलिस ने एक अन्य केस दर्ज करवाया था। यह नई देवबंद थाने में ही FIR IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 467, 468 और 471 के तहत दर्ज हुई थी। साल 1994 में ही नजीर अहमद की जमानत हो गई। तब से नजीर अहमद अदालत में कभी पेश नहीं हुआ। पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय से वह लगातार अपना नाम और पता बदल रहा था।

सहारनपुर पुलिस प्रेसनोट

लम्बे समय से फरार वारंटी नजीर अहमद वानी के खिलाफ 20 मई 2024 को सहारनपुर की एक अदालत ने स्थाई वारंट जारी किया। इस वारंट का सहारनपुर पुलिस ने संज्ञान लिया और नजीर अहमद की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपयों का इनाम घोषित किया। आरोपित की गिरफ्तारी के लिए सहारनपुर पुलिस के साथ ATS को भी लगाया गया।

आखिरकार रविवार (17 नवंबर 2024) को पुलिस ने उसे बड़गाम जिले के हाकर मुल्ला गाँव से गिरफ्तार कर लिया, जहाँ वह रह रहा था। हाकर मुल्ला गाँव सोईबुद्ध कस्बे के पास मौजूद है। जरूरी कानूनी कार्रवाई के बाद नजीर अहमद वानी को कश्मीर से सहारनपुर लाया गया और कोर्ट के सामने पेश किया गया। अदालत ने आरोपित को जेल भेज दिया है।

मणिपुर में बिहार के लोगों से हफ्ता वसूली, हिंसा के लिए महिला ब्रिगेड: रिपोर्ट से कुकी संगठनों की साजिश उजागर, दंगाइयों को छुड़ाकर भी ले जा चुकी हैं औरतें

मणिपुर में हिंसा फैलाने के लम्बी चौड़ी साजिश रची गई थी। इसके लिए कुकी आतंकी संगठनों ने महिला ब्रिगेड तैयार की। उनको हथियार की ट्रेनिंग दी। उन्होंने मणिपुर में काम के लिए बाहर से आने वालों से वसूली का भी प्लान बनाया था। यहाँ तक कि कुकी संगठनों ने खुद का ड्रोन सिस्टम तक तैयार किया।

न्यूज18 को मिली एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर में कांग्लीपाक नेशनल पार्टी (KNP), कुकी नेशनल फ्रंट (KNF) और यूनाइटेड पीपल पार्टी ऑफ़ कांग्लीपाक (UPPK) ने मणिपुर के कई इलाकों में हिंसा के लिए साजिश रची है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह अपनी आतंकी गतिविधियाँ फंड करने के लिए बाहर से आने वाले कामगारों से वसूली करना चाहते हैं।

यह संगठन नेपाल और बिहार से मणिपुर पहुँचने वाले व्यापारियों से ₹1-1.5 लाख/महीने का वसूलने की साजिश रच चुके हैं। इसके अलावा यह सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर की जासूसी भी कर रहे हैं। इन संगठनों ने KCP और KNF ने कादतन और चिखांग में सुरक्षाबलों की जासूसी के लिए एक ड्रोन सिस्टम लगाया है।

सुरक्षाबलों की जासूसी और लोगों से पैसा वसूलने के अलावा इन संगठनों ने हमला करने कि भी नई तकनीक निकाली थी। कुकी संगठनों ने अपना नुकसान कम करने और सुरक्षाबलों के हाथ बाँधने के लिए महिलाओं की ब्रिगेड तैयार की थी। इन संगठनों ने महिलाओं को हथियार चलाने कीई ट्रेनिंग दी है।

इन महिलाओं को 45 दिन की विशेष ट्रेनिंग इसी काम के लिए दी गई। कुकी संगठनों ने यह सोच कर यह ट्रेनिंग दी थी कि यदि महिलाएँ सुरक्षाबलों पर हमला करेंगी तो वह वापस जवाब भी देने में हिचकिचाएँगे और बाद में विक्टिम कार्ड भी खेला जा सकेगा।

यह बात बीते दिनों में देखी भी गई है। कई बार महिलाओं ने सुरक्षाबलों का रास्ता रोका है। 30 अप्रैल 2024 को भारतीय सेना अपने साथ वो हथियार और गोला बारूद लेकर जा रहे थे, जो उन्होंने बिष्णुपुर में कुछ वाहनों से जब्त किए थे। लेकिन, इस बीच रास्ते में महिलाओं का एक ग्रुप आया और काफिला रोककर 11 उपद्रवियों को रिहा कराया।

मणिपुर में बीते कुछ दिनों में हालात फिर बिगड़ गए हैं। यह हिंसा 6 लाशें मिलने के बाद चालू हुई है। लाशें मिलने के बाद रविवार को मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में भारी हिंसा हुई। लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। कई जगह तोड़फोड़ भी हुई। कई भाजपा विधायकों के घरों को भी निशाने पर लिया गया है।

NDTV की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यह मणिपुर सरकार में काम करने वाले हीरोजीत का परिवार था। उनके बेटे और सास के अलावा उनकी पत्नी, एक और बच्चा, पत्नी की बहन, बहन के बच्चे की भी कुकी लड़ाकों ने हत्या कर दी है।

कुकी लड़ाकों ने यह कार्रवाई CRPF से हुई एक मुठभेड़ के दौरान की थी। उन्होंने वापस लौटते समय इन 6 लोगों को अगवा कर लिया था और बाद में मार दिया। इससे पहले CRPF के साथ हुई मुठभेड़ में 11 कुकी लड़ाके मारे गए थे।

404 एकड़ जमीन, बसे हैं 600 हिंदू-ईसाई परिवार: उजाड़ना चाहता है वक्फ बोर्ड, जानिए क्या है केरल का मुनम्बम भूमि विवाद जिसे केंद्रीय मंत्री ने बताया ‘बर्बरता’

केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम उपनगर में 404 एकड़ जमीन के वक्फ विवाद की काफी चर्चा हो रही है। इस जमीन विवाद की वजह से राजनीतिक दलों में भी सरगर्मी है। मुनम्बम में करीब 600 हिंदू और ईसाई परिवार इस जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि यहाँ रहने वाले लोगों का दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कानूनी रूप से दशकों पहले खरीदा था। इस विवाद ने राज्य के उपचुनावों के चलते राजनीतिक पार्टियों के बीच एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है।

विवाद की ऐतिहासिक जड़

एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम के तटीय क्षेत्र में वक्फ भूमि विवाद करीब 404 एकड़ जमीन का है। इस जमीन पर मुख्य रूप से लैटिन कैथोलिक समुदाय के ईसाई और पिछड़े वर्गों के हिंदू परिवार बसे हुए हैं। ये परिवार यहाँ दशकों से रह रहे हैं। केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने 1950 के एक वक्फ डीड का हवाला देते हुए इस भूमि पर अपना स्वामित्व जताया है। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन कानूनी रूप से फारूक कॉलेज से खरीदी थी, जिसे एक समय में इस संपत्ति का प्रबंधन सौंपा गया था।

यह विवाद 1902 से जुड़ा हुआ है, जब त्रावणकोर के शाही परिवार ने इस जमीन को एक प्रमुख व्यापारी अब्दुल सत्तार मूसा सैट को लीज पर दिया था। 1950 में, मूसा सैट के दामाद, मोहम्मद सिद्दीक सैट ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया और इसका प्रबंधन कोझिकोड के फारूक कॉलेज की प्रबंध समिति के अध्यक्ष को सौंपा। डीड में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि इस जमीन का उपयोग इस्लामी कानून के तहत परोपकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

फारूक कॉलेज ने 1960 के दशक में जमीन पर बसे लोगों को हटाने की कोशिशें शुरू की, जिससे कानूनी लड़ाई छिड़ गई। इन निवासियों के पास अपने स्वामित्व के पुख्ता दस्तावेज़ नहीं थे, क्योंकि वे कई पीढ़ियों से इस जमीन पर बसे हुए थे। अंततः, कॉलेज प्रबंधन ने लोगों के साथ कोर्ट से बाहर समझौता करने का फैसला किया और बाजार मूल्य पर उन्हें जमीन के टुकड़े बेच दिए।

केंद्रीय मंत्री ने वक्फ पर लगाए ज्यादा हस्तक्षेप के आरोप

यह मामला अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। भाजपा नेताओं खासकर केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने वक्फ बोर्ड पर ज़्यादा हस्तक्षेप का आरोप लगाया। एक चुनावी रैली में गोपी ने वक्फ के दावों को “बर्बरता” करार दिया और इसे कानूनी उपायों से रोकने का वादा किया। उन्होंने कहा, “इस बर्बरता को भारत में रोका जाएगा… सच्चे संविधान को बनाए रखने के लिए यह विधेयक संसद में पारित होगा।”

भाजपा नेता बी गोपालकृष्णन ने इसे और आगे बढ़ाते हुए कहा कि सबरीमाला और वेलंकन्नी जैसे धार्मिक स्थलों को भविष्य में इसी तरह के दावों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने मतदाताओं से भाजपा का समर्थन करने का आग्रह किया ताकि ऐसे परिणामों को रोका जा सके।

मुख्यमंत्री का रुख और मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि वे मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ खड़े हैं। उन्होंने भाजपा के अभियान को लोगों को गुमराह करने का प्रयास बताया।

वहीं, मुस्लिम नेताओं जैसे समसथा समूह के सदस्यों ने वक्फ बोर्ड की तरफदारी की। ओ एम थरुवाना ने सिराज डेली में लेख लिखते हुए निवासियों के लिए न्याय और वक्फ भूमि की बिक्री में शामिल लोगों की जवाबदेही की माँग की।

‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’

वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।

वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’

गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला

कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”

एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है। वहीं, केरल में एक गाँव के कई घरों पर भी वक्फ बोर्ड ने दावा ठोक दिया है।

आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद

वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।

36 साल की कौशल्या, 17 की मुस्कान, 6 साल का मिंटू… मोख्तार अंसारी ने कुल्हाड़ी से काटकर उजाड़ दिया छत्तीसगढ़ का एक हिंदू परिवार, डेढ़ महीने बाद मिले कंकाल

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में एक महिला के साथ उसके बेटी और बेटे की निर्मम हत्या कर दी गई। हत्या के पीछे की वजह प्रेम प्रसंग को माना जा रहा है। आरोपित का नाम मोख्तार अंसारी है। मोख्तार के भाई आरिफ का एक नाबालिग लड़की से अफेयर था। इसी वजह से वो अपने घर पर पैसे नहीं भेजता था। मोख्तार ने इसी गुस्से में लड़की के साथ उसकी माँ और भाई को भी मार डाला। इन तीनों के कंकाल शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को बरामद हुए थे। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बलरामपुर के थानाक्षेत्र दहेज़वार का है। यहाँ शुक्रवार (15 नवंबर) को एक बंद पड़े ईंटों के प्लांट से पुलिस को 3 मानव कंकाल मिले थे। कंकाल में इनकी खोपड़ी और शरीर के कुछ अन्य हिस्से थे। कंकाल के पास साड़ी, सलवार और पैंट भी बरामद हुआ। पुलिस ने इन कंकालों की जाँच करवाई तो ये 36 वर्षीया कौशल्या, 17 साल की मुस्कान और 6 वर्षीय मिंटू के निकले। कौशल्या मुस्कान और मिंटू की माँ थी। ये तीनों 27 सितंबर से लापता चल रहे थे।

पुलिस ने केस दर्ज करके जाँच शुरू की तो पता चला कि मुस्कान का झारखंड के बरगढ़ निवासी आरिफ से अफेयर था। आरिफ कुसमी इलाके में रह कर ठेकेदारी करता था। वह कौशल्या के घर आता-जाता था। पुलिस को मृतका और आरिफ के बीच चैट व लम्बी कॉल डिटेल भी मिली। इसी आधार पर पुलिस की पड़ताल आगे बढ़ी तो हत्या का राज खुल गया। तीनों की हत्या आरिफ के 38 वर्षीय भाई मोख्तार अंसारी ने उनके गाँव से 80 किलोमीटर दूर ले जाकर की थी।

पुलिस ने मोख्तार को गिरफ्तार करके पूछताछ की तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। मोख्तार ने बताया कि उसके अब्बा को कुछ दिनों पहले साँप ने काट लिया था। इस वजह से उनकी तबियत काफी खराब रहने लगी थी। मोख्तार का भाई आरिफ इलाज के लिए पैसे नहीं भेज रहा था, जिसका कारण आरोपित मुस्कान और उसके परिवार को मानता था। इसी गुस्से में उसने मुस्कान के पूरे परिवार को खत्म करने की ठान ली।

अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए 27 सितंबर को मोख्तार कुसमी गया। यहाँ से उसने कौशल्या, मुस्कान और मिंटू को झाँसे में लिया और अपने साथ लेकर बलरामपुर पहुँच गया। उसने पहले से तय प्लान के मुताबिक तीनों को दहेज़वार के सुनसान स्थान पर मौजूद एक झोपड़ी में रखा। जब रात में माँ के साथ उनकी बेटी और बेटा सो गए तब मोख्तार ने तीनों के सिर पर इतनी तेज कुल्हाड़ी मारी कि सिर की हड्डियाँ तक टूट गईं। इसके बाद उसने सबकी लाश पानी से भरे खेत में फेंक दी और भाग निकला।

कौशल्या, मुस्कान और मिंटू की लाश खेतों में कई दिनों तक पड़ी रही। सुनसान इलाके में तीनों की लाश के अंग पानी के साथ बहते रहे। इसी वजह से ज्यादा दुर्गंध भी नहीं आई। शुक्रवार (15 नवंबर) को खेत का मालिक फसल काटने आया, तब उसे कंगाल पड़े मिले। मामले की सूचना पुलिस को दी गई। जाँच में यह भी पता चला कि कौशल्या के पति सूरजदेव ठाकुर ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी थाने में दर्ज करवाई थी। इस केस में सूरजदेव ने आरिफ को नामजद किया था।

पुलिस पर इस शिकायत पर कार्रवाई न करने का आरोप है। तब इस मामले में मोख्तार से भी पूछताछ हुई थी लेकिन उसने सच नहीं उगला था। कुसमी थाना प्रभारी जितेंद्र जयसवाल को कार्रवाई में लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया है। शवों के पहचान की पुष्टि के लिए उनके सैम्पल को लैब भेजा जा रहा है जिसकी रिपोर्ट 10-15 दिनों में आ सकती है। मोख्तार को 5 दिनों के रिमांड पर लिया गया है। पुलिस यह भी जानने का प्रयास कर रही है कि हत्या में कहीं मोख्तार के अलावा कोई और तो नहीं था।

जिस जमीन पर दशकों से रह रहे, पास में है दस्तावेज भी… उन जमीनों पर भी वक्फ बोर्ड ने ठोका दावा: केरल के वायनाड में नोटिस मिलने के बाद टेंशन में ग्रामीण

केरल के वायनाड जिले के तलापुझा गाँव में 28 अक्टूबर 2024 को कुछ परिवारों को अचानक एक गंभीर और चौंकाने वाला नोटिस मिला। इस नोटिस में केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि वे ज़मीनें जो इन परिवारों की मानी जा रही थीं, असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति हैं।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, तलापुझा गाँव के लोगों भेजे गए नोटिस में वक्फ संपत्ति के अतिक्रमण का आरोप लगाया गया है। जैसे ही यह खबर फैली, पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। अब तक पाँच परिवारों को यह नोटिस मिला है, लेकिन वहाँ के निवासी चिंतित हैं कि जल्द ही पूरे गाँव के बाकी परिवारों को भी इसी तरह के नोटिस मिल सकते हैं।

इस नोटिस में क्या है?

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 52 के तहत जारी इस नोटिस में कहा गया कि 4.7 एकड़ जमीन, जो सर्वे नंबर 47/1 और 45/1 में पंजीकृत है, को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया है। नोटिस में यह बताया गया कि इस ज़मीन पर वक्फ संपत्ति का दावा है और इसके अतिक्रमण की शिकायत की गई थी। वक्फ बोर्ड ने जमीन मालिकों से कहा कि वे 16 नवंबर 2024 तक अपने लिखित जवाब पेश करें और सभी दस्तावेज़ जमा करें।

इसके अलावा, 19 नवंबर 2024 को इस मामले की ऑनलाइन सुनवाई निर्धारित की गई। नोटिस में चेतावनी दी गई कि अगर मालिकों ने जवाब नहीं दिया या सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए, तो मामला उनकी अनुपस्थिति में ही निपटाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह था कि वक्फ बोर्ड अपने स्तर पर निर्णय ले लेगा और उस पर अमल कराएगा।

नोटिस साभार: द हिंदू

जमीन मालिकों ने नोटिस का किया विरोध

इस नोटिस से जमीन मालिकों में गहरी नाराज़गी है और उनमें असमंजस की स्थिति भी है। इन लोगों ने अपना वैध स्वामित्व प्रमाणित करने के लिए दशकों पुरानी कानूनी दस्तावेज़ों और निर्बाध कब्जे का हवाला दिया। इस मामले में हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवारों ने अपनी परेशानी जाहिर की। उनका मानना है कि यह उनके भूमि अधिकारों पर अवैध दखल का प्रयास है।

नोटिस पाने वालों में तुषारा अजीत कुमार नाम की महिला भी हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार ने 1949 से यह ज़मीन संभाली हुई है। उनके ससुर, हवलदार कुंजरमन, ने 1940 के दशक में एक ईसाई परिवार से यह ज़मीन खरीदी थी और उन्होंने इस ज़मीन के लिए सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए थे। कुंजरमन ने पूरी प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों को अच्छी तरह से संभाला, जिसमें 1949 से लेकर 1960 के दशक के अंत तक के रिकॉर्ड शामिल हैं।

इस ज़मीन को बाद में उनके छह बच्चों में बाँटा गया, जिसमें तुषारा के पति, अजीत कुमार भी शामिल हैं। तुषारा ने हाल ही में इस ज़मीन का एक हिस्सा बेचने की कोशिश की थी, और उन्हें लगता है कि इसी वजह से यह विवाद खड़ा हुआ। तीन सदस्यों वाली थलापुझा हयातुल इस्लाम जमात मस्जिद समिति ने इस बिक्री पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह ज़मीन वक्फ बोर्ड की है। तुषारा का मानना है कि मस्जिद समिति के इन सदस्यों ने ही मामले को वक्फ बोर्ड तक पहुँचाया।

गृहिणी के तौर पर घर संभालने वाली तुषारा ने कहा कि वो इस दावे के खिलाफ मजबूती से खड़ी रहेंगी। उनका कहना था कि यह ज़मीन तभी ली जा सकती है जब वह जीवित न रहें। उनके बेटे जितुल ने वक्फ अधिनियम और उसके संशोधनों का अध्ययन करना शुरू कर दिया है और परिवार एक वकील के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।

हिंदुओं ही नहीं, मुस्लिम परिवारों को भी मिला नोटिस

इस नोटिस ने केवल गैर-मुस्लिम परिवारों को ही नहीं, बल्कि मुस्लिम परिवारों को भी हैरान कर दिया। 70 वर्षीय हम्सा फैज़ी भी उन्हीं में से एक हैं, जिन्हें नोटिस मिला। हम्सा फैज़ी ने बताया कि उन्होंने 1998 में यह ज़मीन 50,000 रुपये प्रति सेंट की दर से खरीदी थी और तब से सभी आवश्यक दस्तावेज़ और टैक्स रिकॉर्ड संभालते आ रहे हैं। यह ज़मीन पहले सुकीमारन और कृष्णनकुट्टी से खरीदी गई थी, जो कुनहुट्टी अलक्कंडी के बच्चे थे।

नोटिस पाने वालों में 70 साल के हमजा फैज़ी कई सालों तक जमात समिति का पद संभाल चुके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे पास ज़मीन के सभी वैध दस्तावेज़ हैं, फिर भी मुझे नोटिस भेजा गया।” फैज़ी का घर साल 1987 में किसी अन्य व्यक्ति ने बनवाया था, जिसे उन्होंने खरीद लिया था। वो दशकों से उसी घर में रह रहे हैं। हालाँकि, स्थानीय नेताओं से उन्हें समर्थन की उम्मीद है, लेकिन उन्हें अपनी ज़मीन के भविष्य को लेकर चिंता है।

जमाल का हैरानी भरा अनुभव

जमाल के पास 15 सेंट की ज़मीन है, ने इसे एक “चौंकाने वाला अनुभव” बताया। वे पिछले 14 साल से इस संपत्ति पर रह रहे हैं और उसी जगह पर अपनी दुकान चला रहे हैं। उनके पास भी ज़मीन के सभी वैध रिकॉर्ड और टैक्स रसीदें हैं। उन्होंने बताया कि कुछ परिवारों के पास केवल 9 सेंट की ज़मीन है, जो यह दर्शाता है कि यह संपत्ति छोटे-छोटे हिस्सों में अलग-अलग मालिकों के पास बंटी हुई है।

इस विवादित ज़मीन पर सात घर और दस दुकानें हैं, जो थलापुझा पुलिस स्टेशन के पास सड़क किनारे स्थित हैं। निवासियों को चिंता है कि वक्फ बोर्ड के दावे उनके जीवन और रोज़गार को बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं।

जमीनों और घरों के दस्तावेज मौजूद

तलापुझा के जमीन मालिक अपने स्वामित्व की वैधता पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि उनके पास अपने दावे को साबित करने के लिए दशकों पुरानी दस्तावेज़ी प्रमाण हैं। थविनहाल पंचायत के रिकॉर्ड बताते हैं कि विवादित ज़मीन पर कम से कम एक इमारत का दस्तावेज़ 1948 तक का है। अधिकांश निवासियों के पास 1963 में मस्जिद समिति द्वारा उद्धृत किए गए दस्तावेज़ से पहले के टाइटल डीड हैं। इनमें से कई लोग दूसरे या तीसरे पीढ़ी के मालिक हैं, जिन्होंने नियमित रूप से ज़मीन का टैक्स चुकाया है और संपत्ति रिकॉर्ड में किसी भी वक्फ के दावे का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

जमीन पर रहने वाले अन्य लोगों में भी फैला डर

हालाँकि अब तक केवल पाँच परिवारों को नोटिस मिला है, लेकिन लगभग 50 अन्य परिवार जिनके पास इस 4.7 एकड़ विवादित क्षेत्र में छोटे-छोटे ज़मीन के टुकड़े हैं, वो भी आशंकित हैं कि उन्हें भी जल्द ही ऐसे नोटिस मिल सकते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर वक्फ बोर्ड का यह दावा मान्य हो जाता है, तो इसका असर पूरे गाँव पर पड़ेगा और लोग अपने घरों और रोज़गार को खो सकते हैं।

एनडीए उम्मीदवार ने स्थानीय लोगों का किया समर्थन

इस विवाद ने स्थानीय नेताओं का भी ध्यान खींचा है। एनडीए उम्मीदवार नव्या हरिदास ने तलापुझा का दौरा कर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उन्हें समर्थन देने का आश्वासन दिया। उन्होंने वक्फ बोर्ड को चेतावनी दी कि वह निजी संपत्ति को हड़पने नहीं देंगे। भाजपा के सूत्रों ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड, वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों से पहले जल्दबाजी में जमीन पर दावे कर रहा है।

इस बीच, स्थानीय समुदाय ने एक एक्शन काउंसिल बनाई और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन तथा मंत्री ओआर केलू को ज्ञापन सौंपा। निवासियों ने सरकार से अपने भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की माँग की है।

‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’

वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।

वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’

गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला

कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”

एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है।

आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद

वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।