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थीसिस पेश करने से लेकर, डिग्री पूरी होने तक… जानें जामिया मिलिया इस्लामिया में गैर-मुस्लिमों के साथ होता है कैसा बर्ताव, सामने आई रिपोर्ट

दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में गैर-मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव और उनपर डाले जाने वाले धर्मांतरण के दबाव को लेकर एक 65 पेज की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट सामने आई है। ये रिपोर्ट ‘कॉल फॉर जस्टिस’ ट्रस्ट की छह सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा तैयार की गई है जिसमें गैर मुस्लिम फैकल्टी, छात्र, पूर्व छात्र और कर्मचारी से बात करके निष्कर्ष दिए गए हैं।

इस रिपोर्ट के अनुसार एक गैर मुस्लिम महिला सहायक प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में शुरू से ही भेदभाव महसूस किया जहाँ मुस्लिम कर्मचारी गैर मुसलमानों के साथ दु‌र्व्यवहार और भेदभाव करते थे। उन्होंने बताया कि पीएचडी थीसिस प्रस्तुत करते समय मुस्लिम क्लर्क ने उन पर अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं और कहा कि वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगी।

इसी तरह दलित समुदाय से संबंध रखने वाले फैकल्टी सदस्य ने बताया कि जब उनको कॉलेज में अपना केबिन अलॉट हुआ तो उन्हें मुस्लिम कर्मचारियों ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रशासन ने एक काफिर को केबिन दे दिया।

अगले मामले में एक अनुसूचित जनजाति के एक पूर्व छात्र ने बताया था कि कैसे Med पूरा करने के दौरान एक मुस्लिम शिक्षक ने उनसे क्लास में कहा था कि जब तक वह इस्लाम का पालन नहीं करते, उसकी MED पूरी नहीं होगी। उसके सामने ऐसे छात्रों का उदाहरण रखा गया जिनके मतांतरण करने के बाद अच्छा व्यवहार होने लगा।

बता दें कि कॉल ऑफ जस्टिस ट्रस्ट की फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट को निष्कर्ष तक पहुँचने में 3 महीने से ज्यादा का समय लगा। वहीं इसे तैयार दिल्ली हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा के नेतृत्व में किया गया। छह सदस्यीय इस फैक्ट फाइंडिंग टीम में दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त एसएन श्रीवास्तव भी शामिल थे। रिपोर्ट तैयार होने के बाद टीम सदस्यों ने इसकी सूचना गृह मंत्री (राज्य) नित्यानंद राय को दी।

बांग्लादेश में संविधान का ‘खतना’: सेक्युलर, समाजवादी जैसे शब्द हटाओ, मुजीब से राष्ट्रपिता का दर्जा भी छीनो – सबसे बड़े सरकारी वकील ने दिया सुझाव

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद देश के इस्लामीकरण की तैयारी हो रही है। बिना किसी चुनाव के सत्ता चला रही युनुस सरकार बांग्लादेश के संविधान से ‘सेक्युलर’ शब्द निकालने की तैयारी कर रही है। युनुस सरकार इसी के साथ बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाने वाले बंगबंधु मुजीबुर्रहमान का राष्ट्रपिता का दर्जा भी छीनना चाहती है। यह बात खुले तौर पर बांग्लादेश के अटॉर्नी जनरल ने देश के हाई कोर्ट में कही है।

क्या है युनुस सरकार का प्लान?

युनुस सरकार में अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्ज़माँ ने हाई कोर्ट में देश के संविधान से ‘सेक्युलर’ और ‘समाजवादी’ शब्द हटाने की वकालत की है। उन्होंने यह बात हाई कोर्ट में संविधान के 15वें संशोधन पर हो रही बहस के दौरान दिया है। युनुस सरकार बांग्लादेश के संविधान का 15वां संशोधन रद्द करना चाहती है। असदुज्ज्माँ ने कहा, “हम चाहते हैं कि संविधान से ‘सेक्युलर’ और ‘समाजवादी’ शब्द हटा दिए जाएँ… ‘समाजवाद’ नहीं, बल्कि ‘लोकतंत्र’ राज्य की नीति का मूल सिद्धांत हो सकता है।”

असदुज्जमाँ ने बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजाद करवाने की लड़ाई के हीरो, पहले राष्ट्रपति और तख्तापलट से हटाई गईं प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता मुजीबुर्रहमान को ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिए जाने का भी कोर्ट में विरोध किया है। उन्होंने कहा कि उन्हें 15वें संविधान संशोधन से यह दर्जा मिला है, जो ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि इसको लेकर गंभीर बहस चल रही है।

कैसे सेक्युलर बना था बांग्लादेश, क्या है 15वाँ संशोधन?

15वाँ संविधान संशोधन 2011 में शेख हसीना की सरकार लेकर आई थी। इस संविधान संशोधन के जरिए ही सेक्युलर और समाजवादी शब्द जोड़े गए थे। इसके साथ ही इसी संविधान संशोधन से मुजीबुर्रहमान को राष्ट्रपिता घोषित किया गया था। इस संशोधन के जरिए सत्ता पर असंवैधानिक तरीकों से कब्ज़ा किया जाना भी अवैध करार दे दिया गया था। इसके अलावा इस संशोधन के जरिए अस्थायी सरकार बनाए जाने का नियम खत्म कर दिया था।

15वाँ संविधान संशोधन उन लोगों पर भी चुनाव लड़ने की रोक लगाता है जिनको 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की मदद और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए सजा मिली हो। इस संशोधन में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर भी प्रावधान किए गए थे। देश में सत्ताधारी अपनी मनमानी ना कर पाएँ, इसके लिए आपताकाल की अधिकतम सीमा भी 120 दिनों के लिए ही कर दी गई थी। अब युनुस सरकार इसी संविधान संशोधन को खत्म करना चाहती है।

क्या इस्लामी मुल्क बनाने की तैयारी में है युनुस सरकार?

अब जब युनुस सरकार 15वाँ संशोधन खत्म करने की तैयारी में है। इसको लेकर बांग्लादेश में हाई कोर्ट में याचिका लगाई गई है। युनुस सरकार सरकार याचिका लगाने वालों के पक्ष में है। उसके तरफ से वकीलों की फ़ौज खड़ी करके इस संशोधन को असंवैधानिक करार दिए जाने की कोशिश हो रही है। युनुस सरकार की कोशिशों का सीधा अर्थ यह है कि वह बांग्लादेश को इस्लामी बहुलवाद वाला एक देश बनाना चाहती है और यह भी संभव है कि वह आगे चल कर सेक्युलरिज्म हटा कर इस्लाम को देश का आधिकारिक धर्म घोषित कर दे।

यदि वह आधिकारिक तौर पर इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म नहीं भी घोषित करती तो भी सेक्युलर शब्द हटाए जाने के बाद इस्लामी उसूलों को थोपना आसान हो जाएगा। समस्या सिर्फ यहीं नहीं रुकती है। मुजीबुर्रहमान से राष्ट्रपिता का दर्जा छीनना भी इसी कड़ी का हिस्सा है। यह दिखाता है कि वह उस आदमी के योगदान को भुलाना चाहती है जिसने करोड़ों बंगालियों को पाकिस्तान के अत्याचार से बचाया। मुजीब के राष्ट्रपिता रहते हुए देश को इस्लामीकरण की तरफ ले जाना मुश्किल होगा, क्योंकि इस्लामीकरण के यह सिद्धांत, मुजीब के सिद्धांतों के एकदम उलट दिखेंगे।

इसके अलावा इस संशोधन के खत्म होने से युनुस सरकार को संवैधानिक दर्जा भी मिल सकेगा और वह कार्यवाहक के नाम पर बिना आम जनता से चुने हुए देश को नियंत्रित कर सकेंगे। यदि यह संशोधन खत्म हुआ तो देश के अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हो जाएँगे और उनको मिले विशेषाधिकार भी खत्म होंगे। बांग्लादेश के हिन्दू पहले ही इस्लामी कट्टरपंथ का सामना कर रहे हैं, 15वाँ संशोधन हटने के बाद वह अपनी आवाज भी नहीं उठा पाएँगे।

हाई कोर्ट 1- नाबालिग बीवी से सेक्स मतलब रेप, हाई कोर्ट 2- नाबालिग हिंदू लड़की के अपहरण-रेप के आरोपित जावेद को बेल: कानून में इतना कंन्फ्यूजन क्यों?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिंदू नाबालिग लड़की का अपहरण करके उसके साथ रेप करने के आरोपित जावेद आलम नामक व्यक्ति को जमानत दे दी। ये आरोप बजरंग दल के एक सदस्य ने लगाए थे और जावेद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। बजरंग दल के उस सदस्य ने आरोपित जावेद को पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। जिस समय यह हुई उस समय लड़की की उम्र करीब 17 साल थी।

न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने कहा कि CrPC की धारा 161 और 164 के बयान में पीड़ित लड़की ने कहा कि जब प्राथमिकी दर्ज की गई थी तब उसकी उम्र 17 वर्ष से अधिक थी। अपने बयान में उसने यह भी कहा कि वह आरोपित जावेद आलम के साथ विवाह किया है और अपनी इच्छा से आरोपित के साथ गई थी। पीड़िता ने अपने हलफनामा में आरोपित को अपना शौहर बताया है।

पीड़िता की उम्र अब 18 साल से अधिक है। पीड़िता के वकील ने इस दलील पर विचार किया कि अगर आवेदक को जमानत पर रिहा किया जाता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। अदालत ने आरोपित को जमानत देते हुए कहा, “…यह दर्शाता है कि पीड़िता आवेदक की कंपनी में शामिल होने और अपने वैवाहिक कर्तव्यों को निभाने के लिए इच्छुक है।” आरोपित जावेद मई 2023 से जेल में था।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू संगठन के सदस्य ने आरोपित के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366, 506, 323, 376 और POCSO अधिनियम की धारा 3/4 के साथ-साथ और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम 2021 की धारा 3/5 (1) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।।

एफआईआर में आरोप लगाया गया कि आवेदक ने 10वीं कक्षा की एक हिंदू नाबालिग लड़की का ट्रेन में अपहरण कर लिया। वहाँ वह रोती हुई पाई गई थी। प्राथमिकी में आगे कहा गया है कि लगभग आठ महीने पहले आरोपित ने लड़की को बहला-फुसला लिया, उसका धर्म बदल दिया और उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना शुरू कर दिया।

इस मामले में जमानत की माँग करते हुए आवेदक के वकील ने कहा कि आरोपित पर केवल इस कारण से झूठा मामला दर्ज किया गया क्योंकि वह मुस्लिम समुदाय से है, जबकि लड़की हिंदू समुदाय से है। वकील ने यह भी कहा कि उस समय लड़की की उम्र 18 साल से अधिक थी। वहीं, पीड़िता के वकील ने भी कहा कि आरोपित को जमानत दी जाए, ताकि वे वैवाहिक कर्तव्यों को पूरा कर सकें।

नाबालिग बीवी से सहमति से संबंध भी रेप: बॉम्बे हाई कोर्ट

बता दें कि जिस 12 नवंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट नाबालिग लड़की के अपहरण और शारीरिक संबंध बनाने के आरोपित को वैवाहिक कर्तव्य पूरा करने के लिए जमानत दे रहा था, उसी दिन बॉम्बे हाई कोर्ट एक अलग निर्णय दे रहा था। बॉ़म्बे हाई कोर्ट एक मामले के फैसले में कहा कि यदि कोई पुरुष 18 साल से कम उम्र की अपनी पत्नी के साथ सहमति से भी यौन संबंध बनाता है तो उस पर बलात्कार का मामला दर्ज किया जा सकता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के नागपुर पीठ के सिंगल बेंच जज गोविंद सनप ने 12 नवंबर को पारित आदेश में कहा, “सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून कि पत्नी होने के नाते संभोग को बलात्कार नहीं माना जाएगा, स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस मामले में यह कहने की जरूरत है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बलात्कार है, भले ही वह शादीशुदा हो या नहीं।”

कोर्ट ने कहा, “18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग बलात्कार है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर मौजूदा मामले में पत्नी के साथ सहमति से यौन संबंध बनाने के बचाव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ तक ​​कि अगर उनके बीच तथाकथित विवाह हुआ था, फिर भी पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों के मद्देनजर कि यह उसकी सहमति के खिलाफ यौन संबंध बनाया गया था, बलात्कार होगा।” 

पुलिस की वर्दी पहन असली पुलिस को ही वीडियो कॉल कर बैठा साइबर ठग: करने चला था डिजिटल अरेस्ट, घबराकर काटा फोन – देखें वायरल वीडियो

आजकल साइबर ठगी के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं, और अपराधी नित नए तरीके खोज रहे हैं लोगों को फंसाने के लिए। हाल ही में केरल के त्रिशूर शहर में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसमें एक ठग ने पुलिस की वर्दी पहनकर साइबर सेल को ही कॉल कर डाली। ठग ने पूरी तैयारी के साथ कॉल किया, मानो वह खुद पुलिस अधिकारी हो। लेकिन किसे पता था कि वह ठग इस बार असल पुलिस वालों के साथ फंसने वाला है!

साइबर सेल के अधिकारियों ने ठग की इस गलती का फायदा उठाया। शुरुआत में साइबर सेल के पुलिस अधिकारी ने वीडियो कॉल पर कैमरा खराब होने का बहाना बनाते हुए पुलिस अधिकारियों ने ठग से उसकी सारी जानकारी ले ली। ठग की सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद पुलिस अधिकारी ने कैमरा ऑन किया। जालसाज तब हैरान रह गया जब उसे एहसास हुआ कि वह असली पुलिस अधिकारियों से बात कर रहा है।

पुलिस अधिकारी ने उसे बताया कि उसकी लोकेशन और व अन्य सारी जानकारी उनके पास है। इसके बाद जैसे ही ठग को एहसास हुआ कि वह असली पुलिस से बात कर रहा है, वह बुरी तरह घबराया और कॉल काट दी।

यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि ठग चाहे जितना भी चालाक हो, पुलिस अब पूरी तरह से सतर्क है। ठगों को अपनी काबिलियत पर इतना घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अब साइबर ठगी से बचने के लिए पुलिस भी पूरी तरह से तैयार है। इस घटना ने यह भी साबित किया कि अगर आप साइबर ठगी करने का सोच रहे हैं, तो बेहतर है कि आप अपनी मंशा बदल लें, क्योंकि पुलिस आपकी हर हरकत पर नज़र रख रही है। आखिरकार, ये ठग भी समझ गए होंगे कि उनके ‘अच्छे दिन’ अब खत्म हो चुके हैं।

बता दें कि पीएम मोदी ने भी साइबर ठगी पर अपनी बात रखी थी। उन्होंने डिजिटल अरेस्टिंग जैसे मुद्दे पर बात करके लोगों को जागरुक भी किया था।

दारू, ड्रग और हिंसा वाले गाने ना गाएँ दिलजीत दोसांझ, तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार ने थमाया नोटिस: हैदराबाद में हो रहा है कॉन्सर्ट

पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसांझ का 15 नवंबर यानी आज हैदराबाद में ‘दिल-लुमिनाटी’ कॉन्सर्ट होना है लेकिन उससे पहले सिंगर को राज्य सरकार ने कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में शर्त रखी गई है कि दिलजीत इस कॉन्सर्ट में शराब, ड्रग्स और हिंसा से जुड़े कोई गाने न गाएँ।

पंजाबी सिंगर को यह नोटिस चंडीगढ़ के प्रोफेसर पंडितराव धरनेवर की शिकायत के बाद जारी किया गया है। उन्होंने शिकायत में बताया था कि दोसांझ ने लाइव शो में दारू आदि से जुड़े गाने गाए। इसके साथ उन्होंने वीडियो एविडेंस भी दिए थे।

इसी शिकायत के बाद रंगारेड्डी जिले के महिला एवं बाल, विकलांग और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण विभाग के जिला कल्याण अधिकारी द्वारा 7 नवंबर को जारी नोटिस जारी किया गया। नोटिस में कहा गया है,”हम आपके लाइव शो में दारू, ड्रग्स और हिंसा को बढ़ावा देने से रोकने के लिए एडवांस में यह नोटिस जारी कर रहे हैं।”

नोटिस में यह भी कहा गया, “विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, व्यस्कों को 140 डेसिबल से ज्यादा साउंड प्रेशर के कॉन्टैक्ट में नहीं आना चाहिए और बच्चों को 120 डेसिबल से ज्यादा… इसलिए, बच्चे लाइव शो के दौरान मंच पर नहीं आने चाहिए क्योंकि स्टेज पर साउंड प्रेशर 120 डेसिबल से ऊपर हो जाता है।”

उल्लेखनीय है कि आज शाम 7 बजे हैदराबाद के एयरपोर्ट एप्रोच रोड स्थित जीएमआर एरिना में ‘दिल-ल्यूमिनाटी’ कॉन्सर्ट आयोजित होगा। इस शो का प्रचार राज्य में जोरो-शोरों से हुआ है। इससे पहले दिलजीत का प्रोग्राम दिल्ली के जेएलएन स्टेडियम में हुआ था जहाँ अगले दिन हर जगह दारू की बोतल पड़ी मिली थी।

‘भंगी’, ‘नीच’, ‘भिखारी’ जातिसूचक नहीं, राजस्थान हाई कोर्ट ने SC/ST ऐक्ट हटाया: कहा- लोक सेवकों की जाति के बारे में अनजान थे आरोपित, कोई गवाह भी मौजूद नहीं

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि ‘भंगी’, ‘नीच’, ‘भिखारी’, ‘मंगनी’ आदि किसी जाति के नाम नहीं है। इसलिए इनके इस्तेमाल पर किसी के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (SC/ST ऐक्ट) के तहत आरोप नहीं लगाए जा सकते। इसके बाद कोर्ट ने चार लोगों के खिलाफ लगे इस ऐक्ट को हटा दिया।

इन चारों लोगों पर कुछ लोक सेवकों के खिलाफ इन कथित जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर मामला दर्ज किया गया था। ये लोक सेवक एक मामले में अतिक्रमण का निरीक्षण करने और उसे हटाने के लिए आए थे। जज बीरेंद्र कुमार ने कहा कि इन शब्दों में जाति संदर्भ नहीं था और न ही ऐसा कुछ था जो बताता हो कि किसी लोक सेवक को उनकी जाति के आधार पर अपमानित करना था।

कोर्ट ने कहा, “इस्तेमाल किए गए शब्द जातिसूचक नहीं थे और न ही ऐसा आरोप है कि याचिकाकर्ता उन लोक सेवकों की जाति को जानते थे, जो अतिक्रमण हटाने गए थे। आरोप को पढ़ने से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता लोक सेवकों को इस कारण से अपमानित नहीं करना चाहते थे कि वे SC/ST समाज से थे, बल्कि उनका बयान उनके द्वारा गलत तरीके से की जा रही माप की कार्रवाई के विरोध में था।”

यह मामला जनवरी 2011 की है। कुछ अधिकारियों ने सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण का निरीक्षण करने के लिए जैसलमेर के एक क्षेत्र का दौरा किया था। निरीक्षण के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों को रोका और उनके साथ अपमानजनक शब्दों में दुर्व्यवहार किया था। इसके बाद उन लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 353 (लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल), 332 (लोक सेवक को चोट पहुँचाने के लिए चोट पहुँचाना), 34 (सामान्य इरादा) के तहत एक आपराधिक मामला के साथ-साथ और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(X) में भी केस दर्ज किया गया था।

हालाँकि, शुरुआती जाँच में पुलिस ने आरोपों को निराधार पाया और एक नकारात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके विरोध में लोक सेवकों ने ट्रायल कोर्ट का रुख किया और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक आरोप तय करने का आग्रह किया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपने खिलाफ मामले को रद्द करने की माँग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे लोक सेवकों की जाति से अनभिज्ञ थे और यह पुष्टि करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था कि यह घटना सार्वजनिक दृश्य में हुई थी। कोर्ट ने उनकी इस तर्क को सही पाया। 12 नवंबर के आदेश में कहा गया, “मामले में केवल मुखबिर और उसके अधिकारी ही घटना के गवाह हैं। कोई भी स्वतंत्र गवाह यह समर्थन करने के लिए नहीं आया है कि वह घटना का गवाह था।”

इसके बाद कोर्ट ने आंशिक रूप से याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्ताओं को एससी/एसटी अधिनियम मामले से बरी कर दिया। हालाँकि, न्यायालय ने पाया कि आईपीसी की धारा 353 और 332 के तहत शेष आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार हैं। इसके बाद उसने इन आरोपों को बरकरार रखा।

UPPSC अब कैसे लेगा RO-ARO और PCS की परीक्षा, पुराने पैटर्न को मंजूरी देने के बाद कैसे होगा एग्जाम, क्या होगी नई तारीख: जानें सभी सवालों के जवाब

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) ने प्रयागराज में छात्रों के प्रदर्शन के बाद PCS परीक्षा में ‘वन डे वन शिफ्ट’ बात मान ली है। आयोग ने RO/ARO परीक्षा को लेकर भी कमिटी बना दी। दोनों परीक्षाएँ अब फिलहाल के लिए टल गई हैं। यह दोनों परीक्षाएँ दिसम्बर, 2024 में होनी थी। PCS परीक्षा को पुराने पैटर्न पर करवाने को लेकर आयोग ने सहमति दे दी है। दोनों परीक्षाओं की नई तारीखें अभी सामने नहीं आई हैं। कमिटी की रिपोर्ट के बाद ही अब कुछ स्पष्ट हो सकेगा। अभ्यर्थी इसके बाद भी प्रयागराज में डटे हुए हैं।

क्यों आयोग ने बदला फैसला?

UPPSC ने इससे पहले PCS की प्री परीक्षा और RO/ARO को दो दिनों में आयोजित करने का कार्यक्रम तय किया था। इनमें से PCS परीक्षा 7-8 दिसम्बर को होती जबकि RO/ARO 22-23 दिसम्बर को आयोजित करवाई जाती। आयोग ने परीक्षा को दो दिनों में करवाने के पीछे सेंटर कम मिलने का हवाला दिया था।

आयोग ने यह परीक्षाएँ 41 जिलों में करवाने का फैसला लिया था। उसने कहा था कि अभ्यर्थियों की संख्या भी अधिक है जिस कारण से एक दिन में इन कॉलेज में परीक्षा सम्पन्न नहीं हो सकती, तभी दो बार परीक्षा करवाई जा रही है और जब दो दिन में परीक्षा होगी तो यह नियम लागू ही करना पड़ेगा। ऐसे में अभ्यर्थी इसके विरोध में आ गए।

प्रयागराज में UPPSC के मुख्यालय के बाहर सोमवार (11 नवम्बर, 2024) से हजारों अभ्यर्थियों ने डेरा डाल दिया। उन्होंने माँग की कि यह दोनों ही परीक्षाएँ एक ही दिन में करवाई जाए। अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन करते रहे कि उनकी माँग जब तक नहीं मानी जाएगी तब वह नहीं हटेंगे।

आयोग ने अभ्यर्थियों को वार्ता के लिए भी बुलाया लेकिन वह इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। आखिर में आयोग ने PCS की प्री परीक्षा को लेकर एक नोटिफिकेशन जारी दी। उसने एक दिन में परीक्षा की बात कही और RO/ARO पर कमेटी बनाने को कहा।

अब परीक्षा कैसे होगी?

आयोग के UPPCS की प्री परीक्षा एक दिन में कराने के निर्णय से अंक दिए जाने में बदलाव होगा। दरअसल, जब आयोग ने दो दिन में परीक्षा करवाने का निर्णय लिया था तो इसी के साथ इसमें नॉर्मलाइजेशन भी लागू कर दिया था। अब जब परीक्षा एक दिन में होगी तो नॉर्मलाइजेशन नहीं लागू होगा। नॉर्मलाइजेशन की जरूरत तभी होती है जब कोई परीक्षा एक से अधिक पाली या दिनों में हो और उसके अलग-अलग प्रश्न पत्र आए हों।

आयोग के निर्णय के बाद यह स्थिति बदल गई है, ऐसे में अब पुराना ही पैटर्न चलेगा। RO-ARO परीक्षा के मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं है। दोनों परीक्षाओं की नई तारीखें सभी सामने नहीं आई हैं। माना जा रहा है कि RO-ARO परीक्षा पर रिपोर्ट के बाद ही तारीखों को लेकर कोई बात साफ होगी।

नॉर्मलाइजेशन से दिक्कत क्यों?

अभ्यर्थियों का कहना है कि PCS और RO/ARO में पहली बार नॉर्मलाइजेशन लागू किया है, जो कि सही नहीं है। सरलीकरण में अलग-अलग पाली होने वाली एक ही परीक्षा के कठिनाई के स्तर को देखते हुए अंक दिए जाते हैं। इसके अंतर्गत यदि किसी परीक्षा में 3 पाली हुई, जिसमें से तीसरी पाली का प्रश्नपत्र सबसे कठिन और पहली पाली का प्रश्नपत्र सरल हुआ तथा बीच की पाली का प्रश्नपत्र सामान्य रहा तो कठिन प्रश्न पत्र वाले को अंक बढ़ा कर दिए जाएँगे।

अभ्यर्थियों का तर्क है कि कुछ लोगों के लिए एक प्रश्नपत्र कठिन हो सकता जबकि दूसरे के लिए दूसरा कठिन होगा, ऐसे में सरलीकरण की प्रक्रिया सही नहीं है। उनका कहना है कि ऐसी परिस्थिति में कोर्ट में भर्ती फंस जाएगी और फिर समय बर्बाद होगा। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह भर्ती पहले ही गड़बड़ हो चुकी है।

अब भी प्रदर्शन क्यों कर रहे अभ्यर्थी?

आयोग के प्री परीक्षा को एक दिन में करवाने पर सहमत होने और RO/ARO को लेकर विचार करने के बाद भी अभ्यर्थी प्रयागराज से नहीं हिल रहे हैं। उनका कहना है कि प्री परीक्षा की तरह ही उन्हें RO/ARO को एक दिन में करवाने पर आयोग का नोटिफिकेशन चाहिए।

उन्होंने कहा है कि RO/ARO को लेकर कमिटी बनाने की बात कही गई है, इस कमिटी में सिवाय सरकारी अफसरों के कोई नहीं होगा और ऐसे में उनकी आवाज दब जाएगी और आंदोलन भी खत्म हो जाएगा। वह कह रहे हैं कि इस संबंध में भी जब स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, तब आन्दोलन खत्म हो जाएगा।

5000 भील योद्धा, गुरिल्ला युद्ध… और 80000 मुगल सैनिकों का सफाया: महाराणा प्रताप ने पूंजा भील को ऐसे ही नहीं दी थी राणा की उपाधि

16वीं शताब्दी के एक अद्वितीय योद्धा राणा पूंजा भील को हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के समर्थन के लिए याद किया जाता है। उनकी वीरता और रणनीति ने न केवल मुगल सेना को झकझोरा, बल्कि उन्हें भारतीय इतिहास में एक अद्वितीय स्थान दिलाया। जनजातीय वीरता और संघर्ष की इस कहानी में राणा पूंजा भील का योगदान अनमोल है। ये अलग बात है कि उनके बलिदान की चर्चा अधिकतर पाठ्यक्रमों से गायब हो चुकी है और राजस्थान के बाहर बहुत कम ही लोगों को उनके बारे में पता है, लेकिन इतिहास की जड़ों में जाकर देखेंगे, तो राणा पूंजा नाम के योद्धा की धमक चहुँओर सुनाई देगी, विशेषकर मुगलों के खिलाफ संघर्ष में। आज हल्दीघाटी के युद्ध के नतीजे महाराणा प्रताप की तरफ झुकते दिखे हैं, तो उसके पीछे राणा पूंजा जैसे वीरों का अतुलनीय योगदान है।

राणा पूंजा का जन्म 1540 में वर्तमान राजस्थान के कुंभलगढ़ क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम दूदा सोलंकी और माता का नाम केरी बाई था। भील जनजाति की बहुलता वाले इस क्षेत्र पर पहले यदुवंशी राजाओं का अधिकार था, लेकिन गुजरात से आए चालुक्य वंश से संबंधित सोलंकियों ने पानरवा को अपनी कर्मभूमि बनाया। राणा पूंजा का जीवन बचपन से ही साहस और संकल्प का प्रतीक रहा। 15 वर्ष की आयु में ही पिता के निधन के बाद उन्हें पानरवा का मुखिया बना दिया गया। बचपन से ही वे धनुर्विद्या और गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे, जिसके कारण उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई।

हल्दीघाटी युद्ध में योगदान

1576 ईस्वी का हल्दीघाटी युद्ध, महाराणा प्रताप और मुगल आक्रमणकारी अकबर के बीच लड़ा गया एक ऐतिहासिक युद्ध था। इस युद्ध में राणा पूंजा भील ने 5000 भील योद्धाओं के साथ महाराणा प्रताप का समर्थन किया। गुरिल्ला युद्ध की अपनी अद्वितीय रणनीति के कारण उन्होंने मुगल सेना को भारी क्षति पहुँचाई। पूंजा की सेना ने पहाड़ी मार्गों और घने जंगलों में छापामार रणनीति का प्रयोग कर मुगलों की आपूर्ति और सैन्य संचार को बाधित किया।

राणा पूंजा की रणनीति ने मुगलों को घेरने में मदद की, जिससे महाराणा प्रताप की सेना को नई ऊर्जा और संबल मिला। पूंजा की वीरता और सैन्य कौशल ने युद्ध के अनिर्णय में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी राणा पूंजा ने मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। मुगलों को कभी इस इलाके में स्थाई तौर पर पैर जमाने का मौका नहीं मिला। ये वो समय था, जब मुट्ठी भर योद्धा हजारों मुगल सैनिकों को सालों-साल तक छकाते रहे और जहाँ-तहाँ हुई मुठभेड़ों में मार गिराते रहे। महाराणा प्रताप और राणा पूंजा की जुगलबंदी ने मुगलों को लगातार चोट देने का काम किया।

महाराणा प्रताप और राणा पूंजा के पास करीब 9000 सैनिक थे, जिसमें से 5000 से कुछ अधिक सैनिक सिर्फ भील थे। उनके पास पारंपरिक तीर-कमान ही हथियार थे, जबकि करीब 90 हजार सैनिकों की मुगल फौज के पास गोला-बारूद जैसे विध्वंसक हथियार थे, लेकिन तीर-कमान, तलवार और भालों के वार से मुगलों की सेना पर ऐसा वार हुआ कि महज 10-12 हजार सैनिक ही बचे, वो भी सिर्फ इसलिए बच पाए, क्योंकि उन्होंने घुटने टेक दिए थे। खास बात ये है कि जब महाराणा प्रताप घायल हो गए थे, तब राणा पूंजा महाराणा प्रताप की वेशभूषा में मुगलों का सामना किया और अपनी युद्धकला से उन्हें पीछे लौटने को विवश कर दिया।

दरअसल, हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भीलों ने राजपूतों के साथ मिलकर गोगुंडा की घेराबंदी करके वहाँ तैनात मुगल सेना को घेरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरफ राजपूतों और भीलों की टुकड़ी गुरिल्ला नीति से हमले करती और मुगलों को चोट पहुँचाती, तो दूसरी तरफ गोगुंडा की घेराबंदी मुगलों तक कोई सहायता भी नहीं पहुँचने देती। ऐसे में मुगलों की सेना पूरी तरह से बेबस होती चली गई।

किवदंतियों में कहा जाता है कि मुगल सैनिक जब अकबर से मिले, उन्होंने कहा – “बादशाह, वहाँ तो बरसात हो रही थी।” प्रचंड गर्मी में बरसात की बात सुनकर अकबर हैरत में पड़ गया, लेकिन उसे समझ आ गया कि सैनिक जिस बरसात की बात कर रहे हैं, वो महाराणा प्रताप और राणा पूंजा के वीरों की कमानों से निकले तीर थे।

उनका संघर्ष एक जनजातीय नेता के रूप में भीलों की स्वायत्तता और सम्मान के लिए था। भील योद्धाओं ने कई बार मुगल काफिलों पर हमले किए और उन्हें सफलतापूर्वक पराजित किया। राणा पूंजा की इस जुझारूपन ने मेवाड़ की सीमाओं की रक्षा सुनिश्चित की और उनकी निडरता का प्रतीक बन गया।

इतिहासकारों का मानना है कि राणा पूंजा को ‘राणा’ की उपाधि महाराणा प्रताप ने दी थी, क्योंकि उन्होंने उन्हें अपना भाई मानते हुए मेवाड़ की रक्षा में अद्वितीय योगदान दिया। मेवाड़ के राज्य प्रतीक में भी राणा पूंजा का उल्लेख है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी भूमिका को अत्यधिक सम्मानित किया गया था।

खास बात ये है कि राणा पूंजा के बाद उनके वंशजों ने भी मुगलों को पीढ़ियों तक चोट देने का काम किया। राणा पुंजा के बेटे राणा राम ने महाराणा अमर सिंह के शासनकाल के दौरान मुगल सेना पर हमले में भाग लिया, जहाँ उन्होंने मुगल सेना को लूट लिया। (श्यामलादास-भाग 2, 1987, पृष्ठ 223)। राणा राम के वंशज राणा चंद्रभान ने औरंगजेब के मेवाड़ पर आक्रमण के दौरान महाराणा राज सिंह को अपनी सेवा प्रदान की।

राणा पूंजा की वीरता को आज भी राजस्थान और भील समुदाय में गर्व के साथ याद किया जाता है। 1986 में, राजस्थान सरकार ने उनके सम्मान में ‘राणा पूंजा पुरस्कार’ की स्थापना की, जो राज्य के विशिष्ट योगदानकर्ताओं को दिया जाता है।

राणा पूँजा की पहचान को लेकर विवाद

राणा पूंजा की पहचान पर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं। कुछ इतिहासकार उन्हें राजपूत मानते हैं, जबकि अधिकांश उन्हें भील समुदाय का हिस्सा बताते हैं। उनके वंशजों का यह दावा है कि वे भील नहीं थे, बल्कि वो राजपूत थे, जिन्हें भीलों का साथ प्राप्त था। उन्होंने भीलों की सैन्य टुकड़ी तैयार कर महाराणा प्रताप की सेनाओं का नेतृत्व किया। उनके भील होने के प्रमाण के रूप में उनके परिवार का जुड़ाव भील जनजाति से बताया जाता है।

महाराणा प्रताप के साथ हल्दीघाटी युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले राणा पूंजा को भील संबोधित करने पर आपत्ति जताते हुए मनोहर सिंह सोलंकी ने संभागीय आयुक्त राजेंद्र भट्ट और डूंगरपुर कलेक्टर को लिखित में शिकायत दर्ज करवाई थी। उन्होंने बताया था कि वे खुद राणा पूंजा की सोलहवीं पीढ़ी के वंशज हैं। उनका दावा है कि सोलंकी राजवंश के राणा पूंजा भीलों के सरदार थे, लेकिन इतिहास के तथ्य से परे उन्हें बार बार भील जाति से जोड़ा जाता है। लिखित आपत्ति में सोलंकी ने यह कहा सोलंकी ने दी लिखित आपत्ति में बताया कि ऐसी घटनाएं दो जातियों के बीच परस्पर सामाजिक सौहार्द्र को बिगाड़ने की कोशिश है।

उन्होंने दस्तावेजों के साथ दावा किया कि महाराणा उदय सिंह का विवाह सम्बंध पानरवा के राणा हरपाल की बहन रतनबाई सोलंकिणी से रहा। महाराणा भूपाल सिंह के समय सर सुखदेप ने उल्लेखित मेवाड़ के गजट 1935 में भी पानरवा के शासकों को सोलंकी राजपूत व पदवी राणा बताया है।

1989 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा उनकी मूर्ति का अनावरण करने पर भी विवाद उत्पन्न हुआ। मेवाड़ के महाराणा महेंद्र सिंह सहित कई राजपूत वंशजों ने इसका विरोध किया और राणा पूंजा की भील पहचान को चुनौती दी।

राणा पूंजा का योगदान: एक आदर्श

राणा पूंजा का जीवन आज के समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका संघर्ष यह बताता है कि सच्ची वीरता और देशभक्ति जाति या पृष्ठभूमि से नहीं मापी जा सकती। उन्होंने साबित किया कि चाहे कोई भी परिस्थिति हो, देश और समाज के प्रति निष्ठा सर्वोपरि होती है। उनकी कहानी न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय है। चाहे हल्दीघाटी का युद्ध हो या उसके बाद का संघर्ष, राणा पूंजा का समर्पण और साहस अद्वितीय था।

राणा पूंजा भील का जीवन बलिदान, निष्ठा और देशभक्ति का प्रतीक है। उनकी वीरता ने उन्हें न केवल मेवाड़ बल्कि पूरे भारत का महानायक बना दिया। उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा और आने वाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा लेती रहेंगी।

कभी म्यांमार में मजदूरी करने वाला सैंटियागो मार्टिन कैसे बना लॉटरी किंग: ED ने तमिलनाडु और कोलकत्ता सहित 20 से अधिक ठिकानों पर मारे छापे

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (14 नवंबर 2024) को तमिलनाडु के लॉटरी व्यवसायी सैंटियागो मार्टिन के चेन्नई और कोयंबटूर स्थित कई ठिकनों पर छापेमारी की। इतना ही नहीं, मार्टिन और उनके दामाद आधव अर्जुन एवं अन्य सहयोगियों से जुड़े चेन्नई और कोयंबटूर, हरियाणा में फरीदाबाद, पंजाब में लुधियाना और पश्चिम बंगाल में कोलकाता के कम-से-कम 20 स्थानों की तलाशी ली गई।

चेन्नई में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की सुरक्षा कवर में ट्रिप्लिकेन, टेनाम्पेट और पोएस गार्डन में स्थित कार्यालयों की तलाशी ली गई। वहीं, कोयंबटूर में तीन स्थानों पर सुबह से शाम तक तलाशी ली गई। मार्टिन के कार्यालय, थुदियालुर के पास वेल्लाकिनार स्थित उनके आवास और कोयंबटूर में मेट्टुपालयम रोड पर मार्टिन होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज में भी तलाशी ली गई।

बता दें कि हाल ही में निचली अदालत ने मार्टिन के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश दिया। इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट ने इस आदेश को पलट दिया और ईडी को मार्टिन के खिलाफ अपनी जाँच आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। मद्रास हाई कोर्ट के इस निर्णय के दो सप्ताह बाद ही प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने मार्टिन के खिलाफ देश भर में 20 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की।

दरअसल, मार्च में चुनाव आयोग ने उन कंपनियों के नामों का ऐलान किया था, जिन्होंने राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए चुनावी बॉन्ड खरीदा था। इनमें सबसे अधिक बॉन्ड फ्यूचर गेमिंग और होटल सर्विसेज कम्पनी ने खरीदा था। इसका मालिक घोटाले का आरोपित सैंटियागो मार्टिन है। सैंटियागो मार्टिन की कम्पनी ने 12 अप्रैल 2019 से 24 जनवरी 2024 के बीच ₹1,368 करोड़ का राजनीतिक चंदा दिया था।

‘लॉटरी किंग’ के रूप में भी जाने जाना वाला, सैंटियागो मार्टिन का केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPIM), तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुन्नेत्र कजघम (DMK), पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ काफी करीबी रिश्ता है।

CPI(M) से सैंटियागो मार्टिन का गठजोड़

सैंटियागो मार्टिन ने वर्ष 2007 में कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र देशाभिमानी को ₹50 लाख के चार चुनावी बॉन्ड के माध्यम से ₹2 करोड़ का चंदा दिया था। जब यह मामला खुला तो पार्टी लोगों के निशाने पर आ गई। पार्टी की छवि बचाने के लिए महासचिव प्रकाश करात ने पैसा स्वीकार करने के बाद उसे लौटाने का निर्णय लिया था।

वर्ष 2016 में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के करीबी माने जाने वाले एक वरिष्ठ वकील एमके दामोदरन ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दायर एक मामले में सैंटियागो मार्टिन की तरफ से केस लड़ा था। मुख्यमंत्री विजयन के कानूनी सलाहकार एमके दामोदरन लॉटरी घोटाले के सिलसिले में मार्च 2018 में सैंटियागो मार्टिन के लिए कोर्ट गए थे।

DMK से भी संबंध

अक्टूबर 2010 में तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल पीएस रमन ने केरल हाई कोर्ट में सैंटियागो मार्टिन का केस लड़ा था। जब इस पर केरल सरकार ने ऐतराज किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री करूणानिधि ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और रमन को इस मामले की पैरवी छोड़नी पड़ी थी। मालिक सैंटियागो मार्टिन ने ₹50 करोड़ रुपये खर्च करके करुणानिधि की 75वीं फिल्म के निर्माण में मदद की।

उसने इसमें स्क्रिप्ट भी लिखी थी। यह भी कहा जाता है कि ‘इलैगनन‘ नाम की एक फिल्म 3 साल तक अधर में लटकी रही, इसके बाद मार्टिन ने इसे पुनः चालू किया। इस फिल्म की कहानी लिखने के लिए करूणानिधि को ₹45 लाख का भुगतान किया गया था। सिनेमा के बड़े नामों का कहना था कि इसके बदले में सेंटिआगो को बिना किसी समस्या के लॉटरी का धंधा चलाने दिया जाता था।

जनवरी 2023 में इंडिया टुडे में छपी इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सैंटियागो मार्टिन के दामाद आधव अर्जुन को DMK ने साल 2024 लोकसभा चुनावों के लिए चुनावी रणनीतिकार की भूमिका में नियुक्त किया था। यह भी बताया जाता है कि अर्जुन के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री दामाद सबरीसन के साथ भी बहुत अच्छे संबंध हैं।

कॉन्ग्रेस और TMC से भी जुड़े हैं तार

वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी सितंबर 2010 में केरल हाई कोर्ट में घोटाले के दागी सैंटियागो मार्टिन का केस लड़ा था। हालाँकि, उन्हें कम्युनिस्टों के विरोध के चलते मामले से नाम वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। तक कॉन्ग्रेस के मीडिया प्रमुख जनार्दन द्विवेदी ने कहा था, “पार्टी ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है, भले ही सिंघवी इस मामले से हटने की घोषणा की है।”

‘पत्रकार’ रोहिणी सिंह ने सितम्बर 2021 में एक ‘क्षेत्रीय दल’ और एक लॉटरी माफिया के बीच एक गठजोड़ की तरफ इशारा किया था। इसके बाद दिसंबर 2021 में रोहिणी सिंह ने ट्वीट किया, “अडानी और अम्बानी को भूल जाओ। लॉटरी किंग सैंटियागो मार्टिन पर नजर रखो और उस पार्टी पर नजर रखो, जिसे वह फंड करता है। देश की राजनीति में आगे का समय बड़ा दिलचस्प है।”

G2G न्यूज की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सैंटियागो की कम्पनी फ्यूचर गेमिंग और होटल सर्विसेज ने वर्ष 2017 और 2021 के बीच पश्चिम बंगाल में ₹12000 करोड़ GST दिया था। रिपोर्ट में आगे लिखा गया था, “फ्यूचर गेमिंग देश के बड़े करदाताओं में से एक है। हर बार समय पर बड़ी मात्रा में करों का भुगतान करके, एक मजबूत देश के निर्माण में इसका योगदान प्रशंसनीय है।”

सैंटियागो मार्टिन की कंपनी कंपनी लम्बे समय से पश्चिम बंगाल में ‘डियर लॉटरी’ चला रही है। नवंबर 2022 में सीबीआई ने बताया था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के मंत्री अनुब्रत मंडल और उनकी बेटी ने तीन साल में 5 बार यह लॉटरी जीती है।

क्या करती है फ्यूचर गेमिंग एंड होटल्स?

एक रिपोर्ट बताती है कि फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज की स्थापना वर्ष 1991 में सैंटियागो मार्टिन ने की थी। यह कम्पनी तमिलनाडु में शुरू हुई थी, लेकिन जब यहाँ लॉटरी बंद हो गई तो मार्टिन ने अपना अधिकांश धंधा केरल और कर्नाटक में शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण के केंद्र में रहने वाला सैंटियागो मार्टिन ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ लॉटरी ट्रेड एंड अलाइड इंडस्ट्रीज का अध्यक्ष हैं।

मार्टिन की इस कम्पनी में 1000 से अधिक लोग काम करते हैं। फ्यूचर गेमिंग वर्तमान में 13 राज्यों में लॉटरी चलाती है। इन राज्यों में अभी भी लॉटरी को कानूनी मान्यता है। यह राज्य अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, पंजाब, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, नागालैंड और सिक्किम हैं।

सैंटियागो मार्टिन की यह कम्पनी ‘डियर लॉटरी’ नाम से लॉटरी चलाती है। उसकी कम्पनी फ्यूचर गेमिंग दक्षिण भारत में अपनी एक अन्य कम्पनी मार्टिन कर्नाटक और पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी एक अन्य कम्पनी सिक्किम लॉटरी के माध्यम से धंधा करती है।

सैंटियागो मार्टिन का ‘लॉटरी घोटाला’

सैंटियागो मार्टिन पर 1 अप्रैल 2009 से 31 अगस्त 2010 के बीच में केरल में लॉटरी टिकटों की फर्जी बिक्री के माध्यम से सिक्किम सरकार को (₹910.29 करोड़) का नुकसान पहुँचाने का आरोप है। ED ने इस विषय में बताया था, “मार्टिन और उसकी सहयोगी कंपनियों और संस्थाओं ने अप्रैल 2009 से अगस्त 2010 के बीच जीतने वाले लॉटरी टिकटों के पैसों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया था।”

तब इस मामले में एजेंसी ने उनकी ₹157.7 करोड़ की चल संपत्ति (म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट) और ₹299.16 करोड़ की अचल सम्पत्ति जब्त कर ली थी। दिसंबर 2021 में ED ने मनी लॉन्ड्रिंग के चलते उसकी ₹19.59 करोड़ की संपत्ति कुर्क की थी। वर्ष 2019 में आयकर विभाग ने देश भर में ‘लॉटरी मार्टिन’ के 70 ठिकानों पर छापेमारी की थी।

म्यांमार के शहर यंगून में कभी मजदूरी करने वाला सैंटियागो मार्टिन ₹7000 करोड़ का ‘लॉटरी’ का धंधा खड़ा कर चुका है। वह लगातार पैसों की गड़बड़ी और धोखाधड़ी समेत मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में साल 2011 से जाँच एजेंसियों के राडार पर हैं।


हफ्ते में 70 घंटे काम, 1 दिन की छुट्टी भी कैंसल: Infosys के नारायणमूर्ति ने दोहराई अपनी बात, बोले- मुझे मेरे हार्ड वर्क करने पर गर्व

देश की बड़ी आईटी कंपनियों में से एक इंफोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति ने पिछले साल एक पॉडकॉस्ट में देश के युवाओं को 70 घंटे काम करने की सलाह दी थी। उनके पॉडकॉस्ट के बाद देश में वर्किंग कल्चर पर बहुत बहसें हुईं, लेकिन नारायण मूर्ति ने इस मुद्दे पर अपनी राय नहीं बदली। उन्होंने हाल में एक मंच से 70 घंटे काम करने की बात को दोहराया और कहा कि उन्हें अपने कहे पर कोई पछतावा नहीं है।

उन्होंने सीएनएबीसी टीवी 18 के ग्लोबल लीडरशिप समिट के मंच से बात करते हुए कहा, “मुझे लगता है कि इस देश में लोगों को कठिन परिश्रम करना बहुत जरूरी है क्योंकि कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। मैं माफी चाहता हूँ। मैंने अपना ओपिनियन नहीं बदला है। मैं इस विचार को अपनी कब्र तक लेकर जाऊँगा। मुझे इतना कठिन परिश्रम करने पर बहुत ज्यादा गर्व है।”

गौरतलब है कि नारायण मूर्ति ने अक्तूबर 2023 में एक पॉडकास्ट पर कहा था कि भारत की कार्य उत्पादकता दुनिया में सबसे कम है। उन्होंने भारतीय युवाओं को सलाह दी कि उन्हें हर हफ्ते 70 घंटे काम करना चाहिए, ताकि वे चीन जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

मूर्ति के इस बयान पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ आईं। कुछ उद्योगपतियों, जैसे JSW ग्रुप के चेयरमैन सज्जन जिंदल और ओला कैब्स के CEO भाविश अग्रवाल ने उनके विचारों का समर्थन किया। जिंदल ने कहा कि भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए अधिक मेहनत की आवश्यकता है, जबकि अग्रवाल ने कहा कि यह समय आराम करने का नहीं है। दूसरी ओर, लेखक चेतन भगत और व्यवसायी अशनीर ग्रोवर ने इस विचार का विरोध किया। उनका कहना था कि काम की मात्रा से ज्यादा उसकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।

बता दें कि नारायण मूर्ति ने अपने शुरुआती करियर के दौरान 70 से 90 घंटे प्रति सप्ताह काम करने का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता ने उन्हें सिखाया था कि गरीबी से बचने का एकमात्र तरीका कड़ी मेहनत करना है। मूर्ति ने कहा कि जब तक युवा अधिक मेहनत नहीं करेंगे, तब तक भारत अन्य विकसित देशों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकेगा।