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इस्लाम कबूलना तो दूर, मुस्लिमों के पाले में खड़े होने के भी पक्षधर नहीं थे अम्बेडकर: माफीनामे के बाद कॉन्ग्रेस नेता को पढ़ना चाहिए ‘मजहब’ पर बाबा साहेब के विचार

कर्नाटक में दलित और मुस्लिम वोटरों को एक साथ लुभाने के लिए एक कॉन्ग्रेस नेता सीमा लांघ गया। पूर्व MLA अजीमपीर खदरी ने एक मुस्लिम उम्मीदवार के लिए वोट माँगते हुए दावा कर दिया कि डॉ भीमराव अम्बेडकर इस्लाम कबूल करने वाले थे और इसके लिए उन्होंने तैयारी भी कर ली थी। खदरी ने कहा कि अगर डॉ अम्बेडकर इस्लाम कबूल कर लेते तो देश के सभी दलित भी मुस्लिम बन गए होते। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस सरकार के दलित मंत्रियों के मुस्लिम नाम भी दे दिए।

खदरी ने क्या कहा?

कर्नाटक के हावेरी में दलितों के आदि जाम्बव समुदाय के एक समारोह में बोलते हुए अजीमपीर खदरी ने कहा, “डॉ. बीआर अंबेडकर इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार थे। लेकिन आखिरी समय में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया… अगर अंबेडकर ने इस्लाम धर्म अपना लिया होता तो देश के सभी दलित मुसलमान बन जाते। तब मंत्री G परमेश्वर को पीर साब, आरबी तिम्मापुर को रहीम साब खान और एल हनुमंतैया को हुसैन साब कहा जाता।” खदरी के इस बयान पर विवाद हो गया। लोगों ने इस पर नाराजगी जताई तो खदरी ने माफ़ी माँग ली।

खदरी ने बाद में डैमेज कंट्रोल के लिए भले ही माफी माँग ली हो लेकिन उनका यह बयान कि डॉ अम्बेडकर इस्लाम कबूल करने वाले थे, सत्यता के पैमाने पर रंच मात्र भी सही उतरता। डॉ अम्बेडकर इस्लाम की खामियों के धुर आलोचक थे और अब्रामिक मजहबों (यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम) में इस्लाम की आलोचना सबसे अधिक करते थे।

डॉ अम्बेडकर ने क्यों नहीं अपनाया इस्लाम?

डॉ अम्बेडकर ने इस्लाम और ईसाइयत को विदेशी मजहब माना। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

इस्लाम को लेकर क्या सोचते थे अम्बेडकर?

इस्लाम को लेकर जो विचार 1940 के दशक में छपी एक किताब में डॉ अम्बेडकर ने दिए थे, इससे उन्हें आज इस्लामोफोबिक कह दिया जाता। ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ किताब में अम्बेडकर के अनुसार, “हिंदू धर्म के बारे में कहा जाता है कि यह लोगों को बाँटता है और इसके उलट इस्लाम के बारे में कहा जाता है कि यह लोगों को आपस में जोड़ता है। असल में यह केवल आधा सच है। क्योंकि इस्लाम जितनी मजबूती से जोड़ता है, उतनी ही मजबूती से बांटता भी है।”

आगे उन्होंने लिखा, “इस्लाम एक बंद कॉर्पोरेशन है और यह मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद करता है, वह असल में काफी तगड़ा अलगाववादी है। इस्लाम का भाईचारा विश्व के सभी लोगों का आपस में भाईचारा नहीं है। यह मुसलमानों का केवल मुसलमानों के लिए भाईचारा है। यह है भाईचारा, लेकिन इसका फायदा सिर्फ इसी कॉर्पोरेशन के लोगों तक ही सीमित है। जो लोग इस कॉर्पोरेशन से बाहर हैं, उनके लिए इसमें बेईज्जती और दुश्मनी के अलावा कुछ नहीं है।”

सरकार और इस्लाम साथ में संभव नहीं

डॉक्टर अम्बेडकर के अनुसार, “इस्लाम का दूसरा दोष यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की व्यवस्था है और स्थानीय सरकार की व्यवस्था से मेल नहीं खाती क्योंकि मुसलमान की निष्ठा उसके देश में नहीं बल्कि उस मजहब पर टिकी होती है जिससे वह जुड़ा हुआ है। मुसलमान के लिए इबी बेने इबी पैट्रिया [जहाँ मेरा भला हो, वहाँ मेरा देश है] अकल्पनीय है। जहाँ भी इस्लाम का शासन है, वहाँ उसका अपना देश है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम कभी भी एक सच्चे मुसलमान को भारत को अपनी मातृभूमि के रूप में अपनाने और एक हिंदू को अपना सगा-संबंधी मानने की अनुमति नहीं दे सकता”

देश के कानून से अपने कानून को ऊपर रखता है मुसलमान

डॉ अम्बेडकर ने मुस्लिमों के जहाँ वह रहते हैं, उस कानून को ना मानने और कुरान को उससे ऊपर रखने को लेकर कहा था, “एक और सिद्धांत पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है इस्लाम का सिद्धांत, जो कहता है कि किसी ऐसे देश में, जो मुस्लिम के शासन के अधीन नहीं है, जहाँ कहीं भी मुस्लिम कानून और देश के कानून के बीच संघर्ष है, तो मुस्लिम कानून देश के कानून पर हावी होना चाहिए। एक मुसलमान को मुस्लिम कानून का पालन करने और देश के कानून की अवहेलना करने पर सही माना जाएगा।”

मुसलामानों को हिन्दुओं को शासन स्वीकार नहीं

बीते कुछ समय पहले प्रतिबंधित इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI के बारे में खुलासा हुआ था कि वह भारत में 1947 तक इस्लामी राज लाना चाहता है। इसको डॉ अम्बेडकर ने काफी पहले पहचान लिया था। उन्होंने इस विषय में कहा, “इस्लाम विश्व को दो भागों में बाँटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिमों का शासन है, वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। और जिस किसी देश में जहाँ मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अनुसार उनके लिए भारत दारुल हरब है। इस तरह वे मानव मात्र में भाईचारे में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते हैं। यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”

मुसलमान के लिए हिन्दू काफिर

यह स्पष्ट है कि जो लोग मुस्लिम नहीं है, उन्हें इस्लाम काफिर मानता है। इसको लेकर डॉ अम्बेडकर ने लिखा, “मुसलमानों के लिए हिंदू काफिर है और काफिर सम्मान के लायक नहीं है। वह निम्न कुल का है और उसका कोई स्टेटस नहीं है। इसलिए काफिर द्वारा शासित देश मुसलमान के लिए दार-उल-हरब है। ऐसे में यह साबित करने के लिए कोई और सबूत ज़रूरी नहीं लगता कि मुसलमान हिंदू शासन का पालन नहीं करेंगे।”

आगे उन्होंने लिखा, “सम्मान और सहानुभूति की भावना, जो लोगों को सरकार का पालन करने के लिए प्रेरित करती हैं, यहाँ मौजूद नहीं हैं। लेकिन अगर फिर भी सबूत की ज़रूरत है, तो इसकी कोई कमी नहीं है। असल में यह इतने ज्यादा है हैं कि इनमें से क्या पेश किया जाए और क्या छोड़ा जाए, इसकी समस्या है… ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान, जब हिंदू मुसलमानों की मदद करने के लिए इतना कुछ कर रहे थे, मुसलमान यह नहीं भूले कि उनकी तुलना में हिंदू एक नीच और हीन कौम है।”

डॉक्टर अम्बेडकर के इन विचारों को पढ़ने से स्पष्ट है कि वह इस्लाम कबूल करने की तरफ कभी नहीं बढ़ सकते थे। फिर भी मात्र वोटों के लिए इतिहास को अपने हिसाब तोड़ना मरोड़ना और भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण शख्सियत के बारे में इस तरह से गलत जानकारी फैलाना कॉन्ग्रेस नेता ने सही समझा। दलितों और उनके लिए सम्माननीय लोगों के प्रति कॉन्ग्रेस और उसके नेता कितने संवेदनशील हैं, यह बयान साफ़ दिखाता है। अंत में याद रखना होगा कि इसी कॉन्ग्रेस ने डॉ अम्बेडकर ने दशकों तक वह सम्मान नहीं दिया था, जिसके वह हकदार थे।

गैर मुस्लिमों को जबरन नहीं परोसा जाएगा ‘हलाल मांस’, एअर इंडिया का बड़ा फैसला: जानें यह कैसे सही दिशा में कदम

धार्मिक विविधता का सम्मान करते हुए देश की प्रमुख एयरलाइन एअर इंडिया ने फैसला किया है कि वह अब गैर-मुस्लिम यात्रियों को हलाल माँस नहीं परोसेगी। एअर इंडिया हलाल खाना उन्हीं लोगों को खिलाएगी जिन्होंने इसे चुना होगा। एअर इंडिया ने इसको लेकर नियम जारी किए हैं।

एअर इंडिया की उड़ानों में हलाल खाने के अलावा, ग्लूटेन-फ्री भोजन, मांसाहारी भोजन, शाकाहारी भोजन, जैन भोजन, कोशर भोजन, हिंदू भोजन और बाकी विकल्प भी शामिल किए हैं। एअर इंडिया का यह कदम सभी धर्मों और उनके खाने के प्रति प्राथमिकताओं को लेकर बड़ा कदम है।

एयर इंडिया द्वारा उठाया गया कदम स्वागत योग्य है क्योंकि यह उन लोगों पर हलाल खाना नहीं थोपता जो इसे नहीं खाना चाहते। इसे पहले, एअर इंडिया की उड़ानों और असल में तो बाकी जगह हलाल मांस ही लगातार परोसा जा रहा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि हिंदू और सिख अक्सर यह नहीं पूछते थे कि यह मांस कैसे तैयार किया गया है।

इसके विपरीत, मुसलमान अपने खाने-पीने और इसके तैयार किए जाने के बारे में विशेष रूप प्रश्न करते हैं और उसी जगह खाते हैं जहाँ यह नियम पालन किए गए हों। वह उन जगहों पर नहीं खाते जहाँ हलाल मांस नहीं परोसा जाता है। इसको जबरदस्ती थोपे जाने को लेकर बीते कुछ सालों से हिन्दुओं और सिखों ने प्रश्न उठाने चालू किए हैं। अब एअर इंडिया केवल मुसलमानों बल्कि सभी समुदायों के खाने की प्राथमिकताओं का सम्मान करने वाली कुछ एयरलाइन में से एक बन गई है।

भारत विविधताओं का देश है। यह जरूरी है कि हर धर्म के लोगों को अपने हिसाब से खाने की स्वतंत्रता हो। एअर इंडिया की वेबसाइट पर अब उपलब्ध मेनू में धर्म और भोजन की प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग विकल्प हैं। इनमें जैन और हिन्दू के साथ ही शाकाहारी और फलाहारी भोजन का विकल्प भी मौजूद है।

क्या है हलाल?

हलाल और हराम दो शब्द हैं। हलाल का मतलब है जिसकी अनुमति हो और हराम का मतलब है जिसकी अनुमति ना हो। हलाल मुस्लिमों के खाने-पीने के सामान और विशेष कर मांस से सम्बन्धित है। यानी जो हलाल उत्पाद हैं, उन्हें मुस्लिम खा सकते हैं। जो उत्पाद या हराम हैं, उन्हें मुस्लिम नहीं खा सकते।

मांस का हलाल होना इस बात का प्रमाणन है कि वह उसी तरीके से काटा गया है, जैसा इस्लामी किताबों में बताया गया है। यानी मांस काटने की एक निश्चित इस्लामी विधि ही हलाल है। मांस का हलाल होना इस बात से प्रमाणित होता है कि उस पशु को किसने काटा है, कैसे काटा है, किस दिशा में काटा है और उसको काटने वाले का मजहब क्या है।

हर धार्मिक पसंद का हो सम्मान

एअर इंडिया नए नियमों के बाद अब भोजन के कई प्रकार उपलब्ध कराएगा। हालाँकि, यह ध्यान देने वाली बात है कि कोशर खाना, कोशर-प्रमाणित और हलाल खाना, हलाल-प्रमाणित किचन में बनाया जाता है। बाकी जैन या हिन्दू भोजन सामान्य किचन में बनाया जाता है, इसके लिए कोई प्रमाणन नहीं किया जाता है।

ऐसे में अगला कदम किचन काउंटरों का विभाजन किया जाए और यह बात पक्की की जाए कि शाकाहारी और मांसाहारी खाना अलग-अलग तरीके से तैयार किए जाते हैं। ऐसे में सभी के खाने की आदतों का सम्मान करना संभव होगा। एअर इंडिया का यह कदम आगे इन सब चीजों का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।

हलाल के साथ ही उसकी काफी बड़ी एक अर्थव्यवस्था भी चलती है। एअर इंडिया के अलावा बाकी एयरलाइन और बाकी जगहों पर जो लोग मुस्लिम नहीं हैं और फिर भी हलाल खाते हैं, वह जाने-अनजाने में अपने बिल का एक हिस्सा हलाल को दे रहे होते हैं। यदि एअर इंडिया के नक्शेकदम पर बाकी एयरलाइन और रेस्टोरेंट जैसी जगहें चलें तो इसमें भी कमी आएगी।

यह लेख मूल रूप से अनुराग ने अंग्रेजी में लिखा है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

बढ़कर 21% हुए मुस्लिम, 54% तक घटेंगे हिंदू: बांग्लादेशी-रोहिंग्या बदल रहे मुंबई की डेमोग्राफी, TISS की जिस रिपोर्ट से घुसपैठ पर छिड़ी बहस उसके बारे में जानिए

बांग्लादेश और म्यामांर से आने वाले अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों का घुसपैठ मुंबई में बड़े पैमाने पर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक बदलाव ला रहा है। इसके कारण साल 2051 तक इस महानगर में हिंदू आबादी घटकर 54 प्रतिशत से भी कम हो जाएगी। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने अपनी एक खोजपरक रिपोर्ट में ये भयावह बातें कही हैं।

TISS ने ‘मुंबई में अवैध आप्रवासी: सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण’ शीर्षक 118 पृष्ठों की अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ राजनीतिक संस्थाएँ अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए इन अवैध अप्रवासियों का इस्तेमाल कर रही हैं। अवैध रूप से आने वाले आप्रवासी मुंबई में आसानी से वोटर कार्ड पा जा रहे हैं और मतदान कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के दशकों में मुंबई में भारी डेमोग्राफिक बदलाव हुए हैं। साल 1961 में मुंबई की हिंदू आबादी 88 प्रतिशत थी, जो घटकर साल 2011 में 66 प्रतिशत रह गई। वहीं, इस दौरान मुस्लिम आबादी 8 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई। एक अनुमान के मुताबिक, साल 2051 तक यहाँ हिंदुओं की संख्या 54 प्रतिशत रह जाएगी, जबकि मुस्लिम 30 प्रतिशत से अधिक हो जाएँगे।

रिपोर्ट के अनुसार, एक जटिल नेटवर्क बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्याओं की घुसपैठ में मदद करता है। अवैध आप्रवासियों की आमद ‘वोट बैंक की राजनीति’ को बढ़ावा देती है। जाली दस्तावेजों के ज़रिए वोटर कार्ड बनवाकर चुनावों में घुसपैठियों की भागीदारी हो जाती है। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि मुंबई के 12 विधानसभा क्षेत्रों में आप्रवासी आबादी बहुसंख्यक है, जो मतदान पैटर्न को प्रभावित करती है।

घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के कारण देश में वोट बैंक की राजनीति और आश्रय राजनीति की शुरुआत होती है। इसके कारण देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ-साथ देश की अखंडता को भी नुकसान पहुँचता है। घुसपैठियों की संख्या ने मूल निवासियों की संस्कृति एवं उनके अस्तित्व के लिए भी खतरा उत्पन्न कर दिया है। यह सामाजिक एवं आर्थिक के साथ-साथ राजनैतिक भी है।

अध्ययन में शामिल महिलाओं में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की तस्करी की गई थी और वो देह व्यापार में लगी हुई थीं। इनमें से 40 प्रतिशत आप्रवासी महिलाएँ बांग्लादेश स्थित अपने घर पैसे भेज रही हैं। यह रकम 10,000 रुपए से लेकर 1,00,000 रुपए मासिक तक है। इतना ही नहीं, ये आप्रवासी महानगर की बुनियादी ढाँचे पर भार भी बढ़ा रहे हैं। अवैध आप्रवासियों के कारण झुग्गियों में भारी भीड़ बढ़ी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गोवंडी, कुर्ला और मानखुर्द जैसी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में घुसपैठियों की भीड़ के कारण बिजली और पानी की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया है। इससे सोशल वेलफेयर को खतरा हो रहा है। पहले से ही भारी दबाव वाले मुंबई में बुनियादी ढाँचों पर असहनीय दबाव पड़ रहा है। इसका सबसे अधिक प्रभाव स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और स्वच्छता जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, घुसपैठियों के कारण इन बुनियादी सेवाओं तक स्थानीय निवासियों की पहुँच कम हो गई है। आप्रवासियों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ा दिया है। बांग्लादेशी मुस्लिमों और रोहिंग्याओं द्वारा बेहद कम दर पर काम किया जाता है। इससे स्थानीय श्रमिकों के वेतन पर असर पड़ा है। उनमें नाराजगी बढ़ाती है। इसका फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं।

इतना ही नहीं, आप्रवासी के कारण स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर आर्थिक असमानताएँ भी बढ़ी हैं, जिसके कारण सामाजिक तनाव और हिंसक झड़पें लगातार बढ़ रही हैं। साल 1965 से मुंबई में बढ़ रही घुसपैठियों की संख्या के कारण पर मराठी पहचान पर संकट बढ़ा है। स्थानीय लोगों में अपनी संस्कृति को लेकर भी असुरक्षा बढ़ती हैं। इसके कारण समाज में तनाव और सामाजिक विभाजन बढ़ा है।

रिपोर्ट के ‘सारांश, निष्कर्ष और निहितार्थ’ शीर्षक में कहा गया है कि मुंबई में अवैध मुस्लिम घुसपैठ से जुड़ी चुनौतियों के कारण बुनियादी क्षेत्रों की स्थिति चरमरा गई है। बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्याओं की घुसपैठ को कम करने के लिए प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप लागू करने की सख्त जरूरत है। इन चुनौतियों में शहर में सुरक्षा, रोजगार, चिकित्सा और सामुदायिक स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण हैं।

TISS के असिस्टेंट प्रोफेसर सौविक मंडल का कहना है कि यह एक चिंताजनक स्टडी है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिये आप्रवासी के तौर पर मुंबई में बसे हुए हैं। ये हवाई रास्ते से नहीं, बल्कि बॉर्डर पार करके आए हैं। उन्होंने कहा, “हमने तरीका समझा तो पाया की पहले परिवार का कोई सदस्य आता है, फिर पूरा परिवार। इस तरह अवैध तरीके से गाँव बसाया जाता है। ये डार्क नेटवर्क की तरह काम करता है।”

इस मुद्दे पर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित एक सेमिनार में प्रमुख अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने कहा कि अवैध आप्रवासन एक वैश्विक मुद्दा है, जो दुनिया भर में राजनीति, सुरक्षा और जनसांख्यिकी को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि स्थिति ऐसी हो गई कि आज चुनाव अवैध आप्रवासन के विषय पर लड़े जा रहे हैं।

ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला देते हुए सान्याल ने अनियंत्रित जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणामों के बारे में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद से लाहौर और कराची जैसे शहर कैसे नाटकीय रूप से बदल गए हैं और वहाँ हिंदू एवं सिख आबादी में गिरावट आई है। उन्होंने आगे कहा, “आज बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों को दैनिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।”

सेमिनार में JNU की वीसी शांतिश्री पंडित ने अवैध आप्रवासन के जोखिमों को पहचानने का आग्रह किया। उन्होंने घुसपैठ के खतरों को लेकर कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा भारत को दिए गए संवैधानिक अधिकार और महिलाओं के अधिकार खतरे में पड़ जाएँगे, क्योंकि जो लोग आते हैं वे उस संविधान को स्वीकार नहीं करते हैं। वे भारत के संविधान से ऊपर अपना कानून चाहते हैं।”

वहीं, TISS प्रो वीसी शंकर दास ने घुसपैठ से भाषा और संस्कृति पर उत्पन्न खतरों के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अवैध आप्रवासन केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसमें कट्टरपंथ के जोखिम भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “भारत और बांग्लादेश में एजेंटों के बीच एक बड़ी साँठ-गाँठ है।” उन्होंने कहा कि कुछ एजेंट अपंजीकृत एनजीओ या मजहबी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं।

परीक्षा कैसे हो, यह परीक्षा देने वाले ही करना चाहते हैं तय… क्या प्रयागराज में ‘सिस्टम’ हैक करना चाहते हैं छात्र? समझाने की कोशिश कर रहा प्रशासन, उकसा रहे अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हजारों की संख्या में अभ्यर्थी जुटे हैं। यह सभी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) के मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। PCS और RO/ARO अभ्यर्थी यहाँ अपनी कुछ माँगे लेकर आए हैं। अभ्यर्थियों की भीड़ ने सोमवार (11 नवम्बर, 2024) को पुलिस द्वारा लगाई गई बैरीकेडिंग भी तोड़ दी। इनको समझाने के लिए पुलिस प्रशासन की टीम भी पहुँची लेकिन कोई बात नहीं बन सकी। अभ्यर्थी सरलीकरण और सिंगल डे शिफ्ट की माँग को लेकर अड़े हुए हैं और कह रहे हैं कि यह पूरी होने पर ही यहाँ से हटेंगे।

क्यों हो रहा प्रदर्शन, कब से जुटे अभ्यर्थी?

प्रयागराज के UPPSC मुख्यालय के बाहर जुटे अभ्यर्थी PCS और RO/ARO भर्ती परीक्षा को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह अभ्यर्थी सोमवार (11 नवम्बर, 2024) से जुटे हुए हैं। प्रयागराज में बड़ी संख्या में बाहर से आए अभ्यर्थी भी हैं। इनमें कुछ 500+ किलोमीटर से आए हैं। प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 10 हजार से अधिक बताई जा रही है। अभ्यर्थियों का जुटान सोशल मीडिया के माध्यम से भी हुआ है। यहाँ पुलिस-प्रशासन को नियंत्रण करने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

अभ्यर्थियों की माँग क्या है?

UPPSC ने हाल ही में RO/ARO और PCS परीक्षा के लिए तारीखें घोषित की थीं। PCS की परीक्षा का प्रीलिम्स 7-8 दिसम्बर, 2024 को करवाई जाएगी। यह परीक्षा दो पाली में होगी। इसी तरह RO/ARO परीक्षा को 22-23 दिसम्बर, 2024 को करवाया जाएगा। इसकी तीन पालियाँ होंगी। परीक्षाओं के इस कार्यक्रम को लेकर ही अभ्यर्थी विवाद कर रहे हैं। उनकी माँग है कि परीक्षा को एक दिन में एक ही पाली में करवाया जाए और इसे दो दिन ना खींचा जाए।

एक दिन में परीक्षा की माँग क्यों?

अभ्यर्थियों एक दिन में परीक्षा की माँग सरलीकरण (नॉर्मलाइजेशन) के चलते कर रहे हैं। आयोग ने इस परीक्षा में इस बार सरलीकरण का नियम लागू किया है। यह सरलीकरण का नियम इसलिए लागू किया गया है क्योंकि परीक्षा दो दिन में होनी है। अभ्यर्थियों का कहना है कि सरलीकरण में गड़बड़ी की आशंका होती है और ऐसे मामले कोर्ट में जाते हैं, इसलिए परीक्षा एक ही दिन में करवा ली जाए। अभ्यर्थियों का कहना है कि एक दिन में परीक्षा हो गई तो सरलीकरण नहीं करना पड़ेगा। वह कह रहे हैं कि बिना सरलीकरण का नोटिस लिए बिना वह प्रयागराज से नहीं हिलेंगे।

सरलीकरण से दिक्कत क्यों?

अभ्यर्थियों का कहना है कि PCS और RO/ARO में पहली बार नॉर्मलाइजेशन लागू किया है, जो कि सही नहीं है। सरलीकरण में अलग-अलग पाली होने वाली एक ही परीक्षा के कठिनाई के स्तर को देखते हुए अंक दिए जाते हैं। इसके अंतर्गत यदि किसी परीक्षा में 3 पाली हुई, जिसमें से तीसरी पाली का प्रश्नपत्र सबसे कठिन और पहली पाली का प्रश्नपत्र सरल हुआ तथा बीच की पाली का प्रश्नपत्र सामान्य रहा तो कठिन प्रश्न पत्र वाले को अंक बढ़ा कर दिए जाएँगे।

अभ्यर्थियों का तर्क है कि कुछ लोगों के लिए एक प्रश्नपत्र कठिन हो सकता जबकि दूसरे के लिए दूसरा कठिन होगा, ऐसे में सरलीकरण की प्रक्रिया सही नहीं है। उनका कहना है कि ऐसी परिस्थिति में कोर्ट में भर्ती फंस जाएगी और फिर समय बर्बाद होगा। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह भर्ती पहले ही गड़बड़ हो चुकी है। उनका कहना है कि फरवरी, 2024 में RO/ARO परीक्षा लीक हुई थी और अब कई महीने के बाद यह होने का समय आया है, यही मामला PCS के साथ है, आगे अगर गड़बड़ी हुई तो यह एक गलत परम्परा होगी।

आयोग का क्या तर्क?

UPPSC ने दो दिन में परीक्षा करवाने पर अपने तर्क रखे हैं। UPPCS का कहना है कि वह निजी संस्थानों में परीक्षा नहीं करवाना चाहती क्योंकि इससे लीक का खतरा बढ़ता है। ऐसे में सरकारी कॉलेज में ही परीक्षा करवाई जा रही है। UPPCS ने 41 जिलों में परीक्षा के लिए केंद्र बनाए हैं। उसने कहा है कि अभ्यर्थियों की संख्या भी अधिक है जिस कारण से एक दिन में इन कॉलेज में परीक्षा सम्पन्न नहीं हो सकती, तभी दो बार परीक्षा करवाई जा रही है। UPPSC ने कहा कि सरलीकरण की प्रक्रिया भी कोर्ट के आदेश के अनुसार ही करवाई जाएगी।

अब प्रशासन क्या कह रहा?

मंगलवार (12 नवम्बर, 2024) को UPPSC मुख्यालय के बाहर सोमवार से अधिक अभ्यर्थियों का जुटान है। UPPSC पदाधिकारियों ने कहा है कि वह अभ्यर्थियों से वार्ता करने को तैयार हैं और पाँच प्रतिनिधि अभ्यर्थी भेज सकते हैं। वहीं अभ्यर्थी कह रहे हैं कि अपनी माँग मनवाए बिना वह नहीं हटेंगे और कोई भी वार्ता नहीं करेंगे। उनका कहना है कि एक दिन में परीक्षा और सरलीकरण हटाने का नोटिस जारी कर दिया जाए, बस वह चले जाएँगे। इस बीच प्रशासन उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा है।

प्रशासन की तरफ से प्रयागराज के कमिश्नर और डीएम उनसे मंगलवार दोपहर को भी बात करने पहुँचे लेकिन कोई समाधान नहीं निकला है। पुलिस ने प्रदर्शन में शामिल होने आए कुछ गैर अभ्यर्थियों को हिरासत में भी लिया है। पुलिस अभी छात्रों के प्रदर्शन को हिंसक होने से रोक रही है।

मामले में राजनीति भी चालू

अभ्यर्थियों के प्रदर्शन को लेकर उत्तर प्रदेश में राजनीति ने भी जोर पकड़ लिया है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे ‘योगी बनाम प्रतियोगी’ प्रदर्शन नाम दिया है। उनका कहना है कि लोगों को अब भाजपा नहीं चाहिए, यह अभ्यर्थी समझ चुके हैं।

वह बात अलग है कि अखिलेश यादव के राज में UPPSC के चेयरमैन अनिल यादव पर गड़बड़ी के इतने आरोप लगे थे कि अभ्यर्थियों ने इसके मुख्यालय को ‘यादव सेवा आयोग’ नाम दे दिया था।

मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने कहा है कि अखिलेश यादव को इन सब मुद्दों पर नहीं बोलना चाहिए।

उन्होंने लिखा, “यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को छात्रों के मुद्दों पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्हें अपने शासनकाल में हुई भर्तियों में भ्रष्टाचार को याद रखना चाहिए। पुलिस अधिकारी संयमित व्यवहार करें और छात्रों पर बल प्रयोग न हो। प्रतियोगी छात्रों से अनुरोध है कि वे अपनी समस्याओं को शांतिपूर्ण तरीके से उठाएँ और सपा की राजनीति का शिकार न बनें। आपकी न्याय की लड़ाई में सरकार और मैं सदैव आपके साथ हूँ।”

छत्तीसगढ़ की लड़की को मुंबई ले गया फिरोज: बंधक बनाकर डेढ़ साल तक करता रहा रेप, पीड़िता बोली- हाथ-पैर बाँधकर रखता था, प्राइवेट पार्ट केमिकल से जला दिया

छत्तसीगढ़ के कोंडागाँव की रहने वाली 22 साल की एक जनजातीय युवती को फिरोज नाम के मुस्लिम युवक ने अपहरण कर लिया। इसके बाद उसे मुंबई के धारावी लेकर लगभग 1.5 साल तक रेप किया। उसे अंधेरे कमरे में हाथ-पैर बाँधकर रखता था। इतना ही नहीं, आरोपित फिरोज ने युवती के जननांग में केमिकल डालकर जला दिया। पुलिस ने आरोपित को यूपी से गिरफ्तार कर लिया है।

मामला बस्तर संभाग के कोंडागाँव जिले के माकड़ी थाना क्षेत्र के एक गाँव की है। युवती का आरोप है कि साल 2023 में उसकी तबीयत खराब हो थी तो वह दिखाने के लिए अस्पताल कोंडागाँव गई थीं। वहाँ फिरोज ने बोतल फोड़कर गर्दन पर रख दिया और उसका अपहरण कर लिया। उसने पीड़िता का मोबाइल भी छीन लिया और मुंबई के धारावी में ले जाकर बंधक बनाकर रखने लगा।

पीड़िता का कहना है कि साल 2022-23 में उसके मोबाइल पर एक अज्ञात नंबर से फोन आया था। वह अज्ञात नंबर को बार-बार काटती और ब्लॉक करती, लेकिन फिरोज पीछे पड़ा रहा। वह पीड़िता को मिलने के लिए बोलता था, लेकिन वह मना करती थी। एक दिन पीड़िता की तबीयत खराब हुई तो वह इलाज कराने कोंडागाँव गई। इसकी भनक फिरोज को लग गई और वह भी पीछा करता हुआ पहुँच गया।

सुनसान जगह देखकर उसने युवती को रोका और उसकी गर्दन पर काँच की टूटी बोतल रख दी और उसे अपहरण करके अपने साथ मुंबई लेकर चला गया। इस दौरान फिरोज ने पीड़िता से मोबाइल छीन लिया और पीड़िता के परिजनों को एक मैसेज किया। इसमें उसने लिखा, “मैं सही सलामत हूँ। मुझे एक लड़के से प्यार हो गया है और उसके साथ घर बसाने जा रही हूँ। आप लोग मेरी चिंता ना करें।”

एक अन्य रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि फिरोज़ और पीड़िता की मुलाकात साल 2023 में फेसबुक के जरिए हुई थी। उसने बातचीत के दौरान ही युवती को झाँसे में ले लिया। अपहण के सवाल पर प्रशासन का कहना है कि आरोपित फिरोज यूपी के अमेठी का रहने वाला है और वह युवती से मिलने के लिए कोंडागाँव आया था। 7 जून 2023 को दोनों भागकर मुंबई चले गए। वे वहाँ एक साल से ज़्यादा समय तक रहे, फिर नवंबर 2024 में पीड़िता वापस कोंडागाँव आई।

खैर जो भी हो, दोनों मुंबई पहुँचे। युवती ने आरोप लगाया है कि फिरोज मुंबई की एक फैक्ट्री में काम करता है। उसने धारावी की बस्ती में एक कमरे के छोटे में उसे रखा। उसमें खिड़की तक नहीं थी। वह रौशनी भी नहीं आने देता था। युवती का आरोप है कि फिरोज जब फैक्ट्री में काम के लिए सुबह जाता था तो उसका हाथ-पाँव को कपड़े से बाँधकर जाता था। उसके साथ मारपीट करता था और बाल पकड़ खींचता था।

युवती कहना है कि वह उसे खाना भी नहीं देता था। युवती वहाँ किसी को जानती नहीं थी, इसलिए चुपचाप जुल्म सहती थी। युवती का कहना है कि फिरोज पिछले 1.5 सालों से लगातार उसके साथ रेप कर रहा था। वह जब भी मना करती थी तो उसे बुरी तरह पीटता था। तीन-चार महीने पहले जब उसने फिरोज को रोका तो उसने उसने उसके प्राइवेट पार्ट में केमिकल डालकर जला दिया।

युवती ने बताया कि एक दिन फिरोज़ अपना मोबाइल घर पर ही भूल गया। इसके बाद उसने मोबाइल से एक नंबर निकाला। वह नंबर फिरोज की फैक्ट्री के मालिक का था। युवती ने फैक्ट्री मालिक को कॉल करके पूरी कहानी बताई। इसमें मालिक ने उसकी मदद की। वह रेलवे स्टेशन पहुँची और फिर वहाँ से अपने गाँव पहुँची। उसने घर पहुँचकर परिजनों को सारी बताई तो पुलिस में FIR दर्ज कराई।

पुलिस ने युवती को कोंडागाँव के जिला अस्पताल में भर्ती कराया है, जहाँ इलाज चल रहा है। कोंडागाँव जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉक्टर आरसी ठाकुर ने बताया कि 5 नवंबर को पीड़िता उल्टी, कमजोरी और पेट दर्द की शिकायत पर अस्पताल पहुँची। जाँच के दौरान स्त्री रोग परीक्षण में प्रेग्नेंसी टेस्ट नेगेटिव आया है। प्राइवेट पार्ट में लंबे समय से मौजूद इंफेक्शन जैसा पाया गया है।

सिविल सर्जन का कहना है कि युवती के शरीर के जलने या जख्म के कोई निशान नहीं थे। कोंडागाँव पुलिस ने आरोपित फिरोज को उत्तर प्रदेश के अमेठी से गिरफ्तार कर लिया है। उसे कोंडागाँव लाया गया है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कौशलेंद्र देव पटेल ने बताया है कि माकड़ी थाना क्षेत्र की पुलिस आरोपित से पूछताछ कर रही है।

रिलायंस से ₹25 करोड़ वसूल नहीं पाएगा SEBI, सुप्रीम कोर्ट ने SAT के आदेश में दखल से किया इनकार: जानिए क्या है 1994 का वह लेनदेन जिसमें मुकेश अंबानी को मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 नवंबर 2024) को भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा रिलायंस इन्वेस्टमेंट होल्डिंग्स, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और अन्य संस्थाओं के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। साल 1994 में हुए लेेद-देन में SEBI ने नियमों के उल्लंघन को लेकर यह अपील दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और न्यायाधीश आर महादेवन की पीठ ने इस मुद्दे की जाँच करने एवं निर्णय देने में देरी को लेकर SEBI की आलोचना भी की। पीठ ने SEBI से कहा, “आपने अपील 2023 में दायर की और अब नवंबर 2024 चल रहा है। यह लेन-देन भी साल 1994 का है। इसलिए इस मुद्दे को कहीं ना कहीं खत्म करने की जरूरत है।”

बता दें कि 10 दिसंबर 1992 को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के शेयरधारकों ने डटैचेबल वॉरंट के साथ गैर-परिवर्तनीय सुरक्षित प्रतिदेय डिबेंचर (NCD) जारी करने की मंजूरी दी थी। RIL ने 12 जनवरी 1994 को 3 करोड़ वॉरंट के साथ 50 रुपए मूल्य के 6 करोड़ NCD 34 संस्थाओं को आवंटित किए। प्रत्येक वॉरंट में धारकों को छह साल के भीतर 150 रुपए भुगतान करने पर RIL के दो इक्विटी शेयर हासिल करने की अनुमति दी।

ये वॉरंट ट्रेडिंग करने योग्य थे और साल 1994 में इन्हें स्टॉक एक्सचेंज में शामिल किया गया था। इसके बाद 7 जनवरी 2000 को RIL बोर्ड ने वॉरंट धारकों को 12 करोड़ इक्विटी शेयर आवंटित किए। नियमों के अनुसार, हर वॉरंट धारक को प्रत्येक 50 रुपए का भुगतान करने पर चार इक्विटी शेयर मिल सकते थे।

रिलायंस ने 28 अप्रैल 2000 को खुलासा किया कि इस आवंटन के कारण 31 मार्च 2000 तक प्रमोटरों और उनके सहयोगियों की शेयरधारिता 6.83 प्रतिशत बढ़ गई थी। SEBI ने शुरुआत में 20 अप्रैल 2000 को इस खुलासे को स्वीकार करते हुए कोई कार्रवाई नहीं की। हालाँकि, 2002 में उसे RIL के प्रमोटरों द्वारा SEBI के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए एक शिकायत मिली।

SEBI ने लेन-देन की तारीख के 17 साल बाद 2011 में कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके बाद RIL और उसके प्रमोटरों को 5 अगस्त 2011 को मामला निपटाने के लिए एक सहमति पत्र दायर किया। हालाँकि, 18 मई 2020 को इसे सेबी ने खारिज कर दिया। सेबी ने इस मामले पर दोबारा गौर किया और साल 2021 में RIL पर 25 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया।

जुलाई 2021 में प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) ने इस आदेश को रद्द कर दिया। SAT ने जुर्माना लगाने में देरी के लिए सेबी की आलोचना की। सेबी ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने SAST (शेयरों और अधिग्रहणों का पर्याप्त अधिग्रहण) नियमों का उल्लंघन नहीं किया है और सेबी के आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद सेबी को चार सप्ताह के भीतर 25 करोड़ रुपए वापस करने का आदेश दिया था ।

खालिस्तानी दे रहे हमलों की धमकी, सुरक्षा के बदले पैसा माँग रही कनाडा पुलिस: काली और त्रिवेणी मंदिर में कार्यक्रम रद्द, पुजारी बोले- श्रद्धालुओं का आने से लग रहा डर

कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों के बढ़ते हमलों के चलते दो मंदिरों को अपना कायर्क्रम रद्द करना पड़ा है। कनाडा के टोरंटो में त्रिवेणी मंदिर और काली बाड़ी मंदिर में आगामी कार्यक्रमों को रद्द किया है। इससे पहले खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक नया वीडियो जारी करके हिन्दू मंदिरों और भारतीय राजनयिकों पर हमले का ऐलान किया है।

ब्रैम्पटन के त्रिवेणी मंदिर ने सोमवार (11 नवम्बर, 2024) को एक प्रेस रिलीज जारी करके 17 नवम्बर, 2024 के कार्यक्रम को रद्द करने का ऐलान किया है। त्रिवेणी मंदिर ने लिखा, “कृपया ध्यान दें कि 17 नवंबर, 2024 को भारतीय वाणिज्य दूतावास द्वारा ब्रैम्पटन त्रिवेणी मंदिर में आयोजित जीवन प्रमाण पत्र का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है। ऐसा पील इलाके पुलिस की खुफिया जानकारी के चलते किया गया है। इस जानकारी में कहा गया था कि यहाँ हिंसा हो सकती है।”

मंदिर ने बताया कि उन्होंने श्रद्धालुओं और बाकी लोगों की सुरक्षा के चलते ऐसा किया है। मंदिर ने कहा, “हमें इस बात का गहरा दुख है कि कनाडा के लोग अब हिंदू मंदिरों में आने में असुरक्षित महसूस करते हैं। हम पील पुलिस से त्रिवेणी मंदिर के खिलाफ दी जा रही धमकियों को दूर करने और कनाडाई हिंदू समुदाय और आम जनता को सुरक्षा की गारंटी देने की माँग करते हैं।”

इस मंदिर में ओंटारियो का भारतीय वाणिज्य दूतावास जीवन प्रमाण पत्र बाँटने के लिए कार्यक्रम कर रहा था। मंदिर को पुलिस ने बताया था कि यहाँ खालिस्तानी हमला हो सकता है। कनाडा की पुलिस ने इस मंदिर को सुरक्षा देने के लिए भारी-भरकम पैसों की माँग कर दी थी। मंदिर के पंडित युधिष्ठिर ने बताया कि उनसे पुलिस ने 1 लाख कनाडाई डॉलर माँगे थे। उन्होंने कहा है कि कनाडा के राजनीतिक नेतृत्व ने उन्हें धोखा दिया है और साथ ही हिन्दुओं के खिलाफ पुलिस पक्षपाती ढंग से कार्रवाई कर रही है।

वहीं काली बाड़ी मंदिर के प्रबंधकों ने भी मंदिर में 16 नवम्बर, 2024 को होने वाले कार्यक्रम को रद्द करने की बात कही है। उन्होंने भी इसका कारण खालिस्तानियों की धमकियाँ बताया है।

कनाडा में मंदिरों और भारतीय राजनयिकों को एक और धमकी खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने दी है। पन्नू ने सोमवार (11 नवम्बर, 2024) को एक वीडियो जारी किया है। इसमें उसने 16-17 नवम्बर को मंदिरों और भारतीय राजनयिकों को निशाना बनाने की बात कही। उसने कहा कि जो भी आदमी तिरंगे के साथ दिखेगा, उसे दुश्मन समझा जाएगा। पन्नू ने कनाडा के हिन्दू सांसद चंदर आर्या को भी धमकी दी है और उन्हें कनाडा में हिंदुत्व का चेहरा बताया है।

ऐसा पहला बार नहीं हुआ है जब खालिस्तानी हमले के कारण इवेंट रद्द हुए हों। इससे पहले कनाडा में भारत के दूतावास ने बताया था कि सुरक्षा ना मिलने की वजह से वह आगामी कार्यक्रम रद्द कर रहे हैं। दूतावास के हिन्दू सभा मंदिर पर खालिस्तानियों ने हमला किया भी था।

अजीत अंजुम या विनोद कापड़ी? सूरत अग्निकांड में कौन PM को जलाना चाहता था: विक्रांत मैसी से बात करते-करते शुभंकर मिश्रा ने खोल दी मीडिया की मोदी घृणा की पोल

अभिनेता विक्रांत मैसी के साथ 10 नवंबर 2024 के एक पॉडकास्ट में पत्रकार शुभंकर मिश्रा ने बताया कि कैसे मुख्यधारा का मीडिया किसी घटना के इर्द-गिर्द नैरेटिव गढ़ता है, जो घटना या इसमें शामिल लोगों के बारे में धारणा को प्रभावित करता है। मिश्रा ने खुलासा किया कि साल 2019 में जिस टेलीविजन न्यूज चैनल में वे रिपोर्टर के रूप में काम थे, उसने सूरत कोचिंग अग्निकांड को कवर करने के लिए भेजा था।

शुभंकर मिश्रा ने बताया कि न्यूज चैनल की ओर से उन्हें पीड़ितों में से एक के घर जाने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही इस घटना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराते हुए बाइट (बयान) लेने के लिए कहा गया था। बता दें कि सूरत के इस कोचिंग अग्निकांड में 22 लोगों की जान चली गई थी। इसको लेकर बड़े पैमाने पर विवाद हुआ था।

आग लगने की यह घटना 24 मई 2019 को सूरत के जगतनाका स्थित व्यवसायिक केंद्र में स्थित एक कोचिंग सेंटर में हुई थी। यह आग एयर कंडिशन (AC) में शॉर्ट सर्किट होने के कारण लगी थी। घटना में बाहर निकलने का रास्ता ब्लॉक हो गया था, जिसके कारण छात्र-छात्राएँ वहाँ फँस गए थे। उस बिल्डिंग में अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन भी नहीं किया जा रहा था और ना ही भवन के पास सर्टिफिकेट था।

मिश्रा ने कहा, “जिस समय यह घटना हुई, उस समय मैं सूरत में था। आग से बचने के लिए छात्र-छात्राएँ बिल्डिंग के कूद रहे थे। उस समय लड़कियों के इमारत से कूदने के कई परेशान करने वाले वीडियो सामने आए थे। इसकी मैंने वहाँ से दो दिनों तक रिपोर्टिंग की थी। इस घटना के बाद बिल्डिंग को सील कर दिया गया था और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद मामला खत्म हो गया था।”

उन्होंने आगे कहा, “दो दिनों के बाद अहमदाबाद में एक बड़े नेता की रैली थी। मैंने अपने एडिटर से पूछा कि क्या मैं वहाँ जाऊँ, क्योंकि यहाँ पर बिल्डिंग को सील हो गया और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है? मेरे एडिटर ने कहा कि नहीं। जब सारी दुनिया रैली की लाइव टेलिकास्ट कर रही है तो तुम हादसे के पीड़ित के घर जाओ और किसी बच्चे को पकड़कर बाइट लो कि ‘मोदी अंकल आपने ये क्या करवा दिया, मेरी बहन लौटा दो’?”

हालाँकि, शुभंकर मिश्रा ने किसी समाचार चैनल या संपादक का नाम नहीं लिया, लेकिन मिश्रा की लिंक्डइन प्रोफ़ाइल और सूरत कोचिंग आग की घटना के कवरेज के पुराने वीडियो बताते हैं कि उस समय वे टीवी9 भारतवर्ष में काम कर रहे थे। नेटिज़न्स का अनुमान है कि जिस संपादक ने पीएम मोदी के खिलाफ बाइट लेने के लिए कहा होगा वह विनोद कापड़ी या अजीत अंजुम हो सकते हैं।

अजीम अंजुम और विनोद कापड़ी ने साल 2019 में टीवी9 भारतवर्ष में काम किया था। दोनों पीएम मोदी से नफरत करने के लिए जाने जाते हैं। इस तरह का निर्देश देने वाले संपादक का नाम जानने के लिए ऑपइंडिया ने शुभंकर मिश्रा से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो पाई। उनसे बाचती होने के बाद इस खबर को अपडेट किया जाएगा।

ICC ने तोड़ा संजय बांगर के बेटे का इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने का सपना, आर्यन से बना है ‘अनाया’: जानिए ट्रांस वुमन को लेकर क्या हैं नियम

लड़के से ट्रांसजेंडर महिला बनी संजय बांगर की बेटी अनाया बांगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना चाहती है। वह पूर्व में एक पुरुष थी और उसका नाम आर्यन बांगर था। अनाया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने ट्रांस महिला बनने की कहानी साझा की है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को लेकर अपनी खीझ को साझा किया है। अनाया 2023 में हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के जरिए ट्रांस महिला बनी है। इससे पहले वह आर्यन के रूप में क्रिकेट खेला करती थी।

अनाया के क्रिकेट खेलने के सपने पर ट्रांस महिला बनने के बाद विराम लग गया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) और इंग्लैंड & वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) के नियमों के अनुसार, कोई भी ट्रांस महिला, महिला क्रिकेट में भाग नहीं ले सकती है। अनाया ने हाल ही में एक वीडियो डाला था, जिसमें उन्होंने अपनी ट्रांस महिला बनने से पहले के फोटो डाले थे जिनमें वह कई क्रिकेटर के साथ दिखती हैं। इसमें उन्होंने क्रिकेट खेलने को लेकर बात की थी। यह वीडियो अब डिलीट हो चुका है।

हाल ही में इंस्टाग्राम पर अनाया द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में, उन्होंने बताया कि HRT के 11 महीनों के दौरान उनके शरीर में कई बदलाव आए हैं। अनाया का दावा है कि इससे उन्हें काफी ख़ुशी मिली है और उनका डिस्फोरिया भी खत्म हो गया है। डिस्फोरिया एक ऐसी अवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति महसूस करता है कि वह गलत शरीर में है और उसे अपना लिंग बदलने की जरूरत है। अनाया ने कहा है कि उन्हें अब इससे छुटकारा मिल रहा है।

उन्होंने एक और रिपोर्ट साझा की, जिसमें ECB द्वारा ट्रांस महिलाओं को क्रिकेट से रोका गया है। अनाया ने इस पोस्ट में लिखा, “ट्रांस-एथलीट होना काफी कठिन है।”

कैसे क्रिकेट से अलग हुईं अनाया?

अगस्त 2024 में एक पोस्ट में अनाया ने बताया था कि वह कैसे क्रिकेट से अलग हो गई हैं। इस पोस्ट में लिखा था, “छोटी उम्र से ही क्रिकेट हमेशा मेरी जिन्दगी का हिस्सा रहा है। बड़े होते हुए, मैंने अपने पिता को देश के लिए खेलते देखा और साथ ही उनकी कोचिंग भी देखी। मैंने उनके नक्शेकदम पर चलने की ठानी थी। खेल के प्रति उनका जुनून, अनुशासन और समर्पण मेरे लिए बहुत प्रेरणादायक था। क्रिकेट ही मेरा प्यार, मेरी महत्वाकांक्षा और मेरा भविष्य बन गया था।”

अनाया ने आगे लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन मुझे भी उनके जैसे अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलेगा। उन्होंने लिखा था कि उन्हें क्रिकेट छोड़ना पड़ेगा और अब वह एक अलग सच्चाई का सामना कर रही हैं। अनाया ने कहा था कि उनका प्यारा खेल अब उनसे दूर हो रहा है। अनाया ने क्रिकेट नियमों को लेकर लिखा, “ऐसा लगता है कि सिस्टम मुझे बाहर कर रहा है, इसलिए नहीं कि मुझमें प्रेरणा या प्रतिभा की कमी है, बल्कि इसलिए कि नियम मेरी वास्तविकता को नहीं समझ पाए हैं।”

क्या हैं ट्रांस लोगों को लेकर ICC के नियम?

ICC ने पहले ट्रांस महिलाओं को महिला क्रिकेट में भाग लेने की अनुमति दी थी। 29 वर्षीय डेनियल मैकगेही 2023 की शुरुआत में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में खेलने वाली पहली ट्रांसजेंडर खिलाड़ी थीं। हालाँकि, उनकी भागीदारी पर काफी विवाद हुआ और इसके बाद ICC ने नवम्बर 2023 में नए नियम लागू कर दिए। इनके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो कि पुरुष के तौर पर युवा हुआ है और बाद में महिला बना है, महिलाओं के क्रिकेट में भाग नहीं ले सकता। ऐसे ही नियम ECB ने लागू किए थे। अनाया इंग्लैंड में ही खेलती थीं।

आदिवासी लड़कियों से निकाह करके जमीन नहीं हथिया पाएँगे ‘घुसपैठिए’, अमित शाह ने झारखंड में किया वादा: सरकार आने पर बनेगा कानून

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि झारखंड में जनजातीय लड़कियों को फंसा कर निकाह करने वाले घुसपैठियों को जमीन नहीं लेने दी जाएगी। गृह मंत्री शाह ने राज्य में भाजपा सरकार आने पर इसको लेकर कानून बनाने का वादा किया है। गृह मंत्री ने इसी के साथ घुसपैठियों को राज्य से भगाने का भी वादा किया है।

झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार करते हुए सरायकेला में अमित शाह ने यह वादा किया है। अमित शाह ने कहा कि राज्य में जनजातीय बच्चियों से शादी करके जमीनें हड़पने का षड्यंत्र चल रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में भाजपा सरकार बनने पर कानून लाया जाएगा कि शादी के बाद भी महिला की जमीन घुसपैठिए के नाम ट्रांसफर नहीं होगी।

अमित शाह ने यहाँ यह भी वादा किया कि जो जमीन पहले घुसपैठिए कब्जा चुके हैं, उसे भी कमिटी बनाकर खाली करवाया जाएगा और इन घुसपैठियों को बाहर भगाया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन की कुर्सी घुसपैठ के खिलाफ काम करने के चलते गई।

सरायकेला में अमित शाह ने यह भी आरोप लगाया कि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार घुसपैठियों को बढ़ावा देने में मदद कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार घुसपैठियों को संरक्षण दे रही है। गृह मंत्री अमित झारखंड के लोगों से वादा किया कि वह सभी घुसपैठियों को सरहद के उस पर डालने का काम भाजपा करेगी।

अमित शाह ने यहाँ जनजातियों के आरक्षण का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस मुस्लिमों को आरक्षण देने का विचार बना रही है जो ओबीसी, जनजाति और SC का आरक्षण काट कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह किसी का आरक्षण कम नहीं होने देंगे।

चम्पई सोरेन के इस्तीफे को अमित शाह ने पूरे जनजातीय समुदाय का अपमान करार दिया है। अमित शाह ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य की हेमंत सोरेन सरकार घोटालों में लिप्त है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राज्य सरकार पर घुसपैठियों को शह देने का आरोप लगाया था।

गौरतलब है कि आजतक ने भी मार्च, 2024 में एक रिपोर्ट में बताया था कि बांग्लादेशियों को झारखंड में गरीब जनजातीय लड़कियों को फँसाने का टार्गेट मिला हुआ है। इसके बाद उनसे निकाह करवाया जाता है और फिर जमीन हड़प ली जाती है। आजतक की रिपोर्ट में बताया गया था कि कहीं-कहीं निकाह करके मुखिया पद पर तक कब्जा जमाया गया है।