Home Blog Page 5847

उसने कहा कि ‘भ्रूण हत्या ही ठीक है, ये दुनिया आप पुरुषों को मुबारक’

तीन बहनें पैदा हो चुकी थीं, पता चला चौथी भी लड़की हुई है, चाचा-ताऊ ने कहा कि वो परिवार से अलग हो रहे हैं। चेहरा तक नहीं देखा। पता चला कि सोनोग्राफी में पेट के भीतर लड़की है, डॉक्टर को पैसे देकर पेट के भीतर उस चार-पाँच इंच के शरीर को कई हिस्सों में काट कर, या तोड़ कर बाहर निकाल दिया गया। पता चला कि पहली संतान बेटी हुई है, वहीं निर्ममता से गला घोंट दिया गया। ये काम घर की औरतों ने किया है, घर के मर्दों ने किया है। ये काम माँओं ने किया है, बापों ने किया है।

वो किसी तरह बड़ी हुई तो पुरुषों ने उसके एक महीने के होने से लेकर, घुटनों पर घुड़कने तक की भी अवस्था में बलात्कार किया। घर के लोगों ने उसे यहाँ-वहाँ छुआ। बाप से लेकर भाई, मामा, चाचा, जीजा, मौसी, फूफा और शिक्षक, दोस्त आदि हर संबंध में पुरुष ने उसे उसकी मर्ज़ी के खिलाफ छेड़ा, छुआ, रेप किया, लगातार किया और इतना किया कि वो मर गई लेकिन बोल नहीं सकी किसी को कि उसके साथ क्या हुआ है, क्या हुआ था, क्या होता रहा।

प्रथम प्रेम ने उसे धोखा दिया और उसके निजी पलों को सार्वजनिक बना दिया। फिर वो सबसे डर कर रहने लगी। उसकी पढ़ाई बंद हो गई। कहीं वो किसी संबंधी के यहाँ बेहतर जगह पर पढ़ाई करने पहुँची तो पता चला कि उसका अपना जीजा, चचेरा भाई, चाचा, मौसा या कोई भी उसे इस बात पर ब्लैकमेल कर के उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती करता रहा कि उसे ज़रूरत है वहाँ रहने की, या, अगर उसने उनका साथ नहीं दिया तो उसकी बहन, बुआ, मौसी या जो भी संबंधी है, उसके साथ अच्छा नहीं होगा।

फिर वो काम करने के लिए किसी तरह ऑफिस तक पहुँची तो वहाँ बताया गया कि तुम हीन हो, और आगे बढ़ने के लिए तुम्हें ज़रूरत है तुम्हारे बॉस की। कहीं लिफ़्ट में उसके साथ जबरदस्ती हुई, कभी केबिन में बुला कर उसे बताया गया कि क्या करने पर वो आगे बढ़ सकेगी।

ये बहुत ही जेनेरिक कहानी है। इसमें आप नाम, जगह और संबंध चुन लीजिए, ये सत्यकथा हो जाएगी। यही कारण है कि यह भयावह है। यह ख़तरनाक स्थिति है। यह सर्वव्याप्त है। यह आपके घर में हो रहा है, आपकी क्लास में हो रहा है, आपके बच्चे के साथ हो रहा है, आपके पड़ोस में हो रहा है, आपके समाज में हो रहा है। आप अपने घर की लड़कियों से पूछिए, पता चल जाएगा कि क्या हो रहा है समाज में।

अलवर की घटना हुई और उस पर चुनावों के मौसम में बवाल हो रहा है। अलवर में क्या घटना हुई यह जान कर भी क्या कीजिएगा। ऐसी घटनाएँ हर मिनट हो रही हैं। ऐसी घटनाएँ बहुत ही अडवान्स इकॉनमी से लेकर पिछड़े समाज तक में होती हैं। इसलिए जगह और समाज दोनों ही ग़ैरज़रूरी हो जाते हैं।

इन घटनाओं का एक सेट पैटर्न है। घटना होगी, पुलिस केस दर्ज करने में आनाकानी करेगी, सत्ता पक्ष निंदा करेगा, विपक्ष सत्ता पक्ष को ऐसे लताड़ेगा जैसे तीन महीने पहले वहाँ सब कुछ ठीक था, फेसबुक पर लोग उस घटना का लिंक शेयर करेंगे, फिर बग़ल वाले लड़के से कहेंगे कि दूसरे केबिन की लड़की कितनी मस्त है। दोनों हँसेंगे, और माहौल चिल हो जाएगा। एक लड़की के बलात्कार की यही कहानी है। गलत है, लेकिन यही है।

हमारी समस्या यह है कि हम गलत जगह से इन मुद्दों पर बात करना शुरु करते हैं, और गलत जगह पहुँच कर खत्म कर देते हैं। मुद्दा वहीं, अपनी यथास्थिति में मौजूद रहता है जो जगह और समय बदल कर, नए रूप में फिर से आ जाता है। मोलेस्टेशन या बलात्कार राजनैतिक समस्या नहीं है, इस पर आप नेताओं को कोसने से कुछ नहीं पाएँगे। ये सामाजिक समस्या है, और समाज को इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे।

नेताओं को कोसने से कुछ भी नहीं होगा क्योंकि नेताओं को कोसने से आज तक कुछ भी नहीं हुआ। आप यह मान कर चलिए कि इन्हें सुधारने के लिए गृहयुद्ध या लार्ज स्केल पब्लिक अपरायजिंग यानी जन आंदोलन की ज़रूरत है। लेकिन उसके बाद भी इस समाज में मर्द तो रहेंगे ही, मर्द रहेंगे तो नवजात से लेकर वृद्धा तक का बलात्कार तो होता ही रहेगा। गृहयुद्ध से हासिल यही होगा कि नेताओं के मुँह से ऐसी वाहियात बातों की जगह कुछ एक्शन की बातें होंगी ताकि पुलिस यह न कह सके कि चुनाव थे इसलिए केस दर्ज नहीं किया गया।

इसलिए, बदलाव की ज़रूरत कहीं और है। मेरी मित्र ने मुझे मैसेज किया कि भ्रुण हत्या ही ठीक है, उसे भी वैसे ही मार दिया जाता तो कितना अच्छा रहता। उसने आगे लिखा कि ये दुनिया पुरुषों को मुबारक हो। मैं जवाब नहीं दे सका। जवाब देता भी तो क्या देता? मैं तब भी जवाब नहीं दे पाता हूँ जब किसी लड़की से मेरी कोहनी मेट्रो की भीड़ में टकरा जाती है और वो मुझे डाँट देती है। मैं जानता हूँ कि गलती मेरी नहीं है, पर मैं जवाब नहीं देता।

मैं जवाब इसलिए नहीं दे पाता क्योंकि वो डाँट मुझे नहीं, मेरे मर्द होने को पड़ी है जो उसी मेट्रो की भीड़ में हस्तमैथुन भी करता है, उसी मेट्रो की भीड़ में लड़कियों के कंधे पर हाथ रखता है, उसी मेट्रो की भीड़ में उनकी कमर छूता है, उसी मेट्रो की भीड़ में वो उसकी पीठ सहलाता है। ये हर जगह मैं ही तो हूँ। ये मेरा ही तो रूप है जो बसों में उस पर गिर जाता है, जो गर्ल्स हॉस्टल की खिड़कियों की सीध में अपने लिंग पर हाथ फेरता है। वो मैं ही तो होता हूँ जो अपनी किसी जान-पहचान की बच्ची को चॉकलेट देकर कहीं ले जाता हूँ, और उसके साथ हैवानियत दिखाने के बाद उसकी हत्या भी कर देता है।

ये सारे रूप मेरे हैं, इसलिए जब मेरी गलती नहीं होती, फिर भी मैं उसकी डाँट को सुन कर शर्म से सिर झुका लेता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसी लड़की को आधे घंटे पहले किसी ने इसी कोहनी से जानबूझकर छुआ होगा। ये हरकतें इतनी आम हैं कि एक लड़की दिन में औसतन दस बार ऐसी गंदी स्थिति का शिकार बनती होगी।

मर्दानगी और पावर

मर्दानगी के साथ पावर की जो अनुभूति होती है, वो एक कंकाल-सदृश मर्द के भीतर भी होती है। वो सेक्स भी करता है तो वो सामने वाले के ऊपर आनंद से ज़्यादा अपने पावर का इस्तेमाल करता दिखता है। वो उन क्षणों की निर्मलता को ग्रहण करने की जगह इस फ़िराक़ में होता है कि उसके भीतर का जानवर उस लड़की या स्त्री पर कैसे अपना प्रभाव छोड़े।

हम सेक्स नहीं करते, हम बता रहे होते हैं कि हम कितनी शक्ति समेटे हुए हैं, और हमारी सारी शक्ति की पूर्णता एक स्त्री की योनि पर प्रहार करने से प्रदर्शित होती है। बिस्तर पर हम कितने वहशी है, वो हमारी प्रेमिकाएँ जानती हैं।

यही पावर, इसी शक्ति का स्थानांतरण एक वैसे तरीके से होता है जो अपनी पूर्णता में जब बाहर न आ सके, तो किसी भीड़ में किसी की बाँह को मसल देने में बाहर आता है। यही पावर आपको किसी के कूल्हों पर थपकियाँ मारने की हिम्मत दे देता है। यही पावर आपको किसी स्त्री के वक्ष पर अपना हाथ टिका देने की ताक़त देता है। ये उसी वहशीपने का सूक्ष्म रूप है। ये दरिंदगी मर्दों में सामान्यतः पाई जाती है, फ़र्क़ बस इतना है कि कुछ इस पर नियंत्रण रखते हैं, पर अधिकतर इस समाज में घुटती लड़कियों के अस्तित्व को ही ख़ारिज मानते हुए हर अवस्था में, हर जगह पर, हर समय, हावी होना चाहते हैं।

बलात्कार का सामान्यीकरण

इसी का कुत्सित रूप है रेप, या बलात्कार। यह शब्द सुन कर हमें चौक जाना चाहिए, लेकिन हम नहीं चौंकते। यह शब्द हमें चौंकाता क्यों नहीं? क्योंकि इसे हम मर्दों ने इतना आम कर दिया है कि अब ऐसी खबरें हमें आश्चर्यचकित नहीं करतीं। इसे हमने एक बच्ची के जन्म से लेकर, उसकी लाश पर भी अपने निशान छोड़ने तक सामान्य बना दिया है। हमें क्षणिक दुःख होता है, लेकिन हम भूल जाते हैं। लेकिन रेप भूलने वाली घटना नहीं है।

अगर हम भूल जाते हैं तो हमारे सिस्टम में समस्या है। हमारे समाज में समस्या है। अलवर, ग़ाज़ियाबाद, मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, तिरुवनंतपुरम, बंग्लोर, गोवा, पार्क स्ट्रीट से मतलब नहीं है, मतलब इससे है कि हर समाज में यह कोढ़ है, जिसका इलाज करने की जगह हमने इसे टाला है। हमने कभी बहुत ज़्यादा सोचा भी नहीं। हमने खुद के भीतर कभी झाँका ही नहीं। हमने अपने ऊपर नियंत्रण करने की कोशिश ही नहीं की।

हमारे भीतर का दरिंदा अपनी प्रेमिका पर ही सही, अपनी पत्नी पर ही सही, हावी तो होता है। हमने क्या उन क्षणों में प्रेम किया है, या वो करवाया है जो हमारे मन में पलता रहता है। कहीं हमसे जुड़ने वाली लड़की को यह तो नहीं लगा कि प्रेम यही है जबकि आपने सहमति लेकर उसका बलात्कार ही किया हो? क्या आपने कोशिश की जानने की कि उसने जो सर्वस्व सौंपा है, उसे आपने भी अपना सर्वस्व दिया है?

यहीं से हमारी मानसिकता पर सवाल उठते हैं। यहीं हमारी पहली गलती होती है। जब हम उस स्थिति को भी नहीं समझ सके, जो हमारे पास है, पूर्ण सहमति से है, तो हम बाहर क्यों किसी को देखकर उन्मादित नहीं होंगे? या, हमें क्यों फ़र्क़ पड़ेगा ऐसी खबरों से कि नोएडा में एक सोलह साल की बच्ची को 51 दिनों तक तीन लड़कों ने लगातार क़ैद में रखा और बलात्कार किया?

मर्दों की मानसिकता में सुधार नहीं आया तो भले ही हमारे समय में नहीं, पर आने वाले समय में हम अपने ही घरों में बलात्कार करते पाए जाएँगे। हमारा डर खत्म हो चुका होगा, पुलिस घरों में मौजूद नहीं होगी, और हमारे भीतर की कुंठा हमें अपनी माँ, बहन या बेटी के ऊपर कूदने का ज़रिया बना देगी।

हम क्या कर सकते हैं?

हम क्या करें फिर? सबसे पहले तो यही करें कि स्वीकारें कि हर ऐसी घटना के भागीदार हम सारे मर्द हैं। किसी मर्द को ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के पीछे की हिम्मत हम ही तो देते हैं। ये सामूहिक वारदात है, जिसका अपराध हर मर्द के सर पर है। हम अपने भीतर की कुंठा से निजात तभी पा सकते हैं जब हम अपनी गलती, अपने समाज की गलती को स्वीकारने की स्थिति में आएँ। अपनी पत्नी और प्रेमिका पर हमले करने वाले, ऐसी बातों पर क्या संवेदना दिखा पाएँगे!

अपने बच्चों को शुरु से बताइए कि लैंगिक समानता क्या है। उसे बताइए कि उसमें और उसकी बहन, दोस्त में जो अंतर है, वो बस ऐसा ही है कि पौधे में गुलाब का फूल भी होता है, गेंदा का भी। लड़कियों की सुंदरता को प्राप्य या अप्राप्य की श्रेणी में मत डालिए। उसे रेस की ट्रॉफ़ी मत बनाइए। दोनों ही बच्चों को, एक समान ट्रीटमेंट दीजिए।

घर के भीतर, स्कूल में आपके बच्चे के साथ क्या हो रहा है, बार-बार पूछिए। लड़का हो या लड़की, उनसे पूछिए कि कहीं स्कूल में, ट्यूशन पर कोई उसे गलत तरीके से छूता तो नहीं। पढ़ाई के अलावा और क्या है जो किसी ने उसे बताने से मना किया हो। बच्चों को इग्नोर मत कीजिए, किसी भी हालत में। कोई बच्चा अचानक से बदल रहा हो तो उसे अपनी व्यस्तता के कारण मत भूलिए। आपको हमेशा याद रहना चाहिए कि वो बच्चा अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं हुआ, बल्कि आपने उसे पैदा किया है, और आपकी ज़िम्मेदारी है उसे बेहतर भविष्य देना। इसलिए, उसकी उपेक्षा भूल कर भी मत कीजिए।

आप जहाँ काम करते हों, वहाँ अपने दोस्तों को चिरकुटों वाले काम करने से रोकिए। उसे बताइए कि यही स्थिति उसे एक बलात्कारी बना सकती है, या कोई उसी से सीख कर कुछ ऐसा कर जाएगा जो उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल होगी। लड़कियों को देखने, घूरने और एक्स-रे करने में अंतर है। इस बात का ध्यान रखिए।

हमारा समाज तो बर्बाद हो चुका है, हम इसमें बहुत कुछ नहीं बदल सकते। लेकिन, हमारे बच्चों को हम थोड़ा बेहतर समाज देकर, उन्हें भी यही बात सिखा कर, आने वाले बच्चों के लिए और भी बेहतर समाज बना सकते हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है। आप इसे चाहें तो इग्नोर कर सकते हैं कि आपका घर तो सुरक्षित है, लेकिन व्यक्ति कभी भी अकेलेपन में नहीं होता, उसके साथ होने वाली घटनाओं पर उसके अकेले होने का ज़ोर नहीं होता, वो बाहरी शक्तियों से भी प्रभावित होती हैं।

बेहतर शिक्षा और सतत प्रयास ही इस समाज को साफ करने में सहायक होगा। अपने स्तर पर अपनी प्रेमिका और पत्नी पर ज़ोर आज़माने से बेहतर, प्रेम करना शुरु कीजिए। इन क्षणों की अपनी अहमियत है, इन्हें इनकी पूर्णता में समझिए। क्षणिक आनंद और शक्ति प्रदर्शन कई स्तर पर आपकी मानसिक स्थिति पर आघात पहुँचाता है। इसकी परिणति बहुत भयावह होती है।

अलवर हर मिनट घटित होता है। नेता लोग हर दिन बयान देते हैं। हम हर दिन कहीं न कहीं फेसबुक पर इस पर चर्चा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं में कमी नहीं आती। कमी इसलिए नहीं आती क्योंकि हमने महसूस करना छोड़ दिया है। हमने इसकी भयावहता को नॉर्मलाइज कर दिया है। हम इसे सामान्य बात मान कर आगे बढ़ जाते हैं।

जबकि हमें यह समझना होगा कि अपने भीतर थोड़े बदलाव लाकर, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण लाकर, दमन की जगह प्रेम ला कर, हम समाज तक एक बेहतर ऊर्जा भेज सकते हैं। मैं जानता हूँ कि शायद यह लेख भी मेरे उन सवा लाख शब्दों की तरह डिजिटल दुनिया में तैरता रहेगा, किसी के काम न आएगा, जो मैंने अभी तक सिर्फ बलात्कार पर लिखे हैं। लेकिन मैं लिखता रहूँगा क्योंकि इससे अगर एक व्यक्ति भी थोड़ा बदल पाता है, अपने भीतर की नकारात्मकता को स्वीकार पाता है, तो मेरा लिखना सफल होगा।

जय श्री राम, हुह… जिस पत्रकार ने ऐसा कहा, वो एक नंबर का धूर्त है, बंगालियों के नाम पर कलंक है

प्रीतिश नंदी ने ‘जय श्री राम’ से आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ये ‘जय श्री राम वाले’ माँ सरस्वती से अनजान हैं। उन्होंने दावा किया कि वे और अन्य बंगाली नागरिक माँ सरस्वती की पूजा करते हैं। उन्होंने कहा कि सरसवती विद्या, ज्ञान और बुद्धि की देवी है। उन्होंने कहा कि ‘वे लोग’ महिलाओं की इज़्ज़त करते हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण बंगाली लोग दुर्गा और काली, दोनों की ही पूजा करते हैं। इसके बाद उन्होंने ‘जय श्री राम’ पर तंज कसते हुए लिखा, “जय श्री राम, हुह“। प्रीतिश नंदी के दावे सही हैं, सरस्वती की पूजा बंगाल में होती है, माँ काली एवं दुर्गा की पूजा बंगाल में होती है, बंगाली महिलाओं की इज़्ज़त करते हैं, लेकिन पेंच कहाँ है, ये हम आपको बताते हैं। दरअसल, उन्होंने जिन देवी-देवताओं का नाम लिया, उनकी पूजा किसी न किसी रूप में हर उस जगह होती है, जहाँ हिन्दू समाज रहता है।

दुर्गा पूजा के दौरान आप बिहार की किसी भी गली में चले जाइए, लोगों में जोश और उत्साव वहाँ किसी बंगाली की तरह ही रहता है। ठीक ऐसे ही, माँ सरस्वती की पूजा केरल एवं तमिलनाडु में भी होती है, जो पश्चिम बंगाल से काफ़ी दूर है। वहाँ नवरात्रि के अंतिम तीन दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। माँ कालरात्रि की पूजा नवरात्र के दौरान पूरे भारत में की जाती है। क्या केरल, तमिलनाडु और बिहार के लोग महिलाओं की इज़्ज़त नहीं करते हैं? दरअसल, भारत में कन्या पूजन और देवियों की पूजा लम्बे समय से होती आ रही है। हाँ, बंगाल के दुर्गा पूजा में भव्यता, उत्साह और जोश सबसे ज्यादा होता है, लेकिन यही तो भारत की विशालता की ख़ासियत है। बिहार में छठ के दौरान कुछ ऐसा ही उत्साह होता है, केरल में ओणम के दौरान, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी के दौरान और तमिलनाडु में पोंगल के दौरान कुछ ऐसी ही भव्यता होती है।

प्रीतिश नंदी अंग्रेजों की उसी ‘फूट डालो’ नीति को आगे बढ़ा रहे हैं, जिस पर चलते हुए कॉन्ग्रेस ने लिंगायत समुदाय को हिन्दू धर्म से अलग देखते हुए उसे एक अलग धर्म बनाने की कोशिश की थी। धर्मों में लड़ाने, जातियों में लड़ाने और सम्प्रदायों में लड़ाने के बाद अब ये गिरोह विशेष अलग-अलग देवी-देवताओं के भक्तों और क्षेत्रीय परम्पराओं के आधार पर लड़ाने पर उतारू है। अगर बंगाल में श्रीराम की पूजा नहीं होती, लोग उन्हें नहीं मानते, तो प्रीतिश नंदी क्या बता सकते हैं कि वहाँ ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने वाले क्या अयोध्या से आ रहे हैं? अगर इन छद्म बुद्धिजीवियों ने जरा भी भारत का इतिहास पढ़ा होता, तो शायद ये ऐसा नहीं कहते। नंदी ने ऐसी ही ग़लती की है, जैसी जावेद अख़्तर ने घूँघट और बुर्क़े की तुलना कर के की थी। इन्हें ऐतिहासिक तथ्यों से जवाब देना आवश्यक है।

पश्चिम बंगाल में श्रीराम के प्रभाव को नकारने वाले और ‘जैस श्री राम’ के नारे से चिढ़ने वाले प्रीतिश नंदी से बस एक सवाल पूछा जाना चाहिए और वह ये है कि कृत्तिवासी रामायण क्या है? प्रीतिश को या तो नहीं पता या वो सब जानते हुए भी लोगों को बेवकूफ बनाना चाहते हैं। हमारा कार्य है उन चीजों को सामने लाना, जो ये छद्म बुद्धिजीवी नहीं चाहते कि आप जान पाएँ। हमारा कार्य है उस तथ्य को सामने रखना, जिसे ये वामपंथी छिपा लिया करते हैं, दबा दिया करते हैं और इसके उलट एक अलग नैरेटिव बनाते हैं। दरअसल, कृत्तिवासी रामायण भगवान श्रीराम की गाथा है, बंगाली भाषा में, और वाल्मीकि रामायण का बंगाली रूपांतरण है। कृत्तिवासी रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध से पहले दुर्गा पूजा करने की कहानी भी है और बंगाल में दुर्गा पूजा की लोकप्रियता बढ़ने में इसका भी योगदान है।

आज जो रामचरितमानस हिंदी बेल्ट में लोकप्रिय है, जिस पुस्तक ने रामायण को उत्तर भारत के घर-घर तक पहुँचाया, उस रामचरितमानस के लेखक भी उसी धरा से प्रभावित थे, जो कृत्तिवासी रामायण के लेखक कृत्तिवासी ओझा ने शुरू की थी। तुलसीदास का रामचरितमानस कृत्तिवासी रामायण के बाद लिखा गया और तुलसीदास उससे प्रभावित भी थे। न सिर्फ़ तुलसीदास, बल्कि रविंद्रनाथ टैगोर जैसे महान लेखक भी कृत्तिवासी रामायण में भगवान श्रीराम के चित्रण से प्रभावित थे। बंगाल में दुर्गा पूजा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय अगर जिसको जाता है, तो वह हैं- कृत्तिवासी ओझा। वही कृत्तिवासी ओझा, जिन्होंने रामायण का बंगाली रूपांतरण लिखा। प्रीतिश नंदी किसे ठगने की कोशिश कर रहे हैं? किसे बेवकूफ बना रहे हैं वह? जब एक बंगाली रामायण लिख सकता है, रामायण में ‘दुर्गा पूजा’ की चर्चा कर इसे घर-घर में लोकप्रिय बना सकता है, तो बंगाल में ‘जै श्री राम’ के नारे से किसी को भी आपत्ति क्यों?

माँ दुर्गा और भगवान श्रीराम के भक्तों को अलग-अलग देखते हुए क्षेत्र और श्रद्धा के नाम पर उन्हें लड़ने की कोशिश में लगे नंदी क्या यह नहीं जानते कि बंगाली रामायण के लेखक ने दुर्गा पूजा को बंगाल के घर-घर तक पहुँचाया। जब ख़ुद भगवान श्रीराम माँ दुर्गा के उपासक हैं, उन्होंने दुर्गा पूजा की थी, तो क्या रामभक्त देवी दुर्गा की पूजा नहीं कर सकते? या फिर माँ दुर्गा को मानने वाले भगवान श्रीराम के भक्त नहीं हो सकते? मिथिलांचल में दुर्गा पूजा के दौरान रामायण और दुर्गा सप्तशती साथ-साथ पढ़ी जाती है। रामनवमी के दौरान माँ सीता को जगतजननी दुर्गा का अवतार मानकर पूजा की जाती है। ख़ुद तुलसीदास ने रामचरितमानस में माँ पार्वती के जन्म की कहानी कहते हुए उन्हें जगदम्बा कहा है।

हिन्दू धर्म को तोड़ने-मरोड़ने के प्रयास में लगे प्रीतिश नंदी को जानना चाहिए कि कृत्तिबास ओझा के ‘श्री राम पंचाली’ ने बंगाल में दुर्गा पूजा को मशहूर कर जन-जन तक पहुँचा दिया। इसमें पहली बार शक्तिपूजा के बारे में लिखा था। ‘श्री राम पंचाली’ में राम द्वारा रावण को हराने के लिए शक्ति पूजा करने का जिक्र है। इसमें इस बात का जिक्र है कि जब राम को लगा कि रावण से युद्ध करना कठिन है तो जामवंत ने उनकी चिंता को देखकर उन्हें शक्ति की पूजा करने को कहा। इसके बाद भगवान श्रीराम ने दुर्गा पूजा किया। प्रीतिश नंदी को शायद यह पता ही नहीं। आख़िर हो भी कैसे, इन्हें माँ दुर्गा तभी याद आती है जब भगवान श्रीराम का अपमान करना होता है। इन्हें रामायण और महाभारत तभी यात आता है जब इन्हें हिन्दुओं को हिंसक साबित करना होता है। वामपंथियों ने नया कुटिल तरीका आज़माने की असफल कोशिश की है।

प्रीतिश नंदी, सीताराम येचुरी और जावेद अख़्तर जैसे लोग अगर रामायण-महाभारत, माँ दुर्गा और घूँघट की बात कर रहे हैं तो इन्हें शक की नज़रों से देखा जाना चाहिए। क्योंकि, ये लोग कभी भी इन चीजों में विश्वास नहीं रखते। ये इन चीजों के गुण तभी गाते हैं, जब हिन्दुओं को भड़काना हो, अलग-अलग करना हो और नीचा दिखाना हो। प्रीतिश नंदी से निवेदन है कि कृत्तिवास ओझा को पढ़ें, ‘श्रीराम पांचाली’ को पढ़ें, टैगोर को पढ़ें। तब उन्हें पता चलेगा कि बंगाल और रामायण का वही कनेक्शन है, जो उस क्षेत्र का माँ दुर्गा से है। यहाँ बात क्षेत्रीयता की नहीं है, बात पूरे हिन्दू समाज की है, भारतीय इतिहास की है, श्रीराम और माँ दुर्गा के भक्तों को अलग-अलग कर के देखने वालों की साज़िश के पर्दाफाश करने की है।

‘लतखोर’ और अजूबा हो गए हैं ‘धरनामंत्री’ केजरीवाल, योगी आदित्यनाथ की निंदनीय टिप्पणी

“सबसे बड़ा अजूबा दिल्ली के मुख्यमंत्री स्वयं हो गए हैं, पता ही नहीं लगता कि वे मुख्यमंत्री हैं या धरना मंत्री। क्या मुख्यमंत्री को धरने पर बैठना चाहिए? जब कोई कोई सुधरता नहीं तो इसलिए ही उसे कहते हैं ‘लतखोर’। व्यक्ति फिर उसी तरीके से उसे जवाब देता है। वही यहाँ हो रहा है।” उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार (मई 07, 2019) को दिल्ली में एक चुनावी सभा में यह विवादित बयान दिया है जिससे अरविन्द केजरीवाल समर्थकों में खासा नाराजगी देखने को मिल रही है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विवादित बयान देते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ‘लतखोर’ और ‘धरनामंत्री’ कह डाला। उन्होंने केजरीवाल से सवाल करते हुए कहा कि AAP प्रमुख शहर की सरकार के मुखिया हैं अथवा धरना और प्रदर्शन के नेता हैं? पूर्वी दिल्ली से भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर के समर्थन में मंगलवार को दिल्ली में रैली को संबोधित करते हुए आदित्यनाथ ने कहा, ‘‘हमें विश्वास है कि वह दिल्ली में हमारी जीत का खाता खोलेंगे, जैसे वह क्रिकेट में भारतीय टीम के लिए खाता खोलते थे।’’

यूपी सीएम ने कहा, “आज उत्तर प्रदेश में सभी जनपदों में बिजली है। पूरी सुरक्षा की व्यवस्था है। लेकिन पहले जो बीमारी उत्तर प्रदेश में थी, अब वह बीमारी आम आदमी पार्टी दिल्ली में लेकर आ गई है। जो आम आदमी पार्टी पानी पी-पीकर भ्रष्टाचार के लिए कॉन्ग्रेस को गाली देती थी, आज उस भ्रष्टाचार में स्वंय डूब गई है। बहन-बेटियों की सुरक्षा का खतरा AAP की गलत नीतियों की वजह से बढ़ा है। आप देख सकते हैं कि इनके मंत्री, विधायक रोज किसी न किसी घटना में शामिल होते हुए दिखाई देते हैं। सबसे बड़ा अजूबा तो दिल्ली के मंत्री ही हो गए हैं। पता ही नहीं चलता कि वे मुख्यमंत्री हैं या धरना मंत्री। विकास की कोई योजना आती है, तो वे धरने पर बैठ जाते हैं। जब कोई कोई सुधरता नहीं तो इसलिए ही उसे कहते हैं ‘लतखोर’। व्यक्ति फिर उसी तरीके से उसे जवाब देता है। वही यहाँ हो रहा है।”

योगी आदित्यनाथ ने कहा, “अजहर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया। उसकी उल्टी गिनती शुरू हो गई है, कुत्ते की मौत मरेगा जैसे ओसामा मरा था। यह मोदी जी की वजह से है, जब पाकिस्तान की बॉर्डर के अंदर आतंकियों के खिलाफ आपरेशन हुए तो कॉन्ग्रेस ने पूछा सबूत कहाँ है? आतंकवाद पर भी कॉन्ग्रेस पाकिस्तान की बोली बोलती नज़र आई।”

जब राजीव गाँधी ने निजी मनोरंजन के लिए युद्धपोत ‘विराट’ का किया इस्तेमाल, साथ में थे ससुराल के लोग

प्रधानमंत्री मोदी ने जब आज रामलीला मैदान की रैली में यह जानकारी दी कि भारत के मुख्य युद्धपोत आईएनएस विराट का इस्तेमाल राजीव गाँधी ने अपने निजी मनोरंजन और छुट्टियों के लिए किया तो बहुत लोगों को लगा कि यह एक जुमला है। लेकिन भाषण के थोड़ी ही देर में इंटरनेट पर इंडिया टुडे की एक स्टोरी शेयर की गई जिसमें राजीव गाँधी के कथित मनोरंजक छुट्टियों की पूरी जानकारी विस्तृत रूप से दी गई है।

इंडिया टुडे मैगजीन की जनवरी 31, 1988 की एक रिर्पोट के अनुसार, अनिता प्रताप ने इस पूरे ‘हॉलीडे’ का ब्यौरा दिया है। उन्होंने लिखा है कि राजीव गाँधी की पूरी कोशिश थी कि प्रेस उनसे दूर रहे लेकिन इंडियन एक्सप्रेस एवं बाकी मीडिया के फ़ोटोग्राफ़र ने कई तस्वीरें निकाल लीं। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय नौसेना के युद्धपोत का इस्तेमाल हुआ, जो कि आश्चर्यजनक बात है।

द्वीप के उस हिस्से को बहुत ही सावधानी से चुना गया था जहाँ मीडिया की पहुँच आसान नहीं थी। मीडिया को दूर रखने का भरपूर प्रयास किया गया था। लेकिन द्वीप का वह छोटा हिस्सा 26 दिसंबर 1987 को तब सुर्खियों में आया, जब राजीव के बेटे राहुल गाँधी ने चार दोस्तों के साथ नारंगी और सफेद रंग की लक्षद्वीप प्रशासन के हेलीकॉप्टर से उड़ान भरी। मीडिया को दूर रखने के लाख प्रयासों के बावजूद भी आमंत्रितों की सूची ने खुद ही खबर बना दी।

मेहमानों की सूची में राहुल और प्रियंका के चार दोस्त, सोनिया गाँधी की बहन, बहनोई और उनकी बेटी, उनकी विधवा माँ आर. मैनो, उनके भाई और एक मामा शामिल थे। साथ ही पूर्व सांसद अमिताभ बच्चन, उनकी पत्नी जया और उनके बच्चे अभिषेक और श्वेता भी मौजूद थे। अमिताभ के भाई अजिताभ की बेटी, जिनकी विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम के संदिग्ध उल्लंघन के लिए जाँच की जा रही थी, वह भी साथ में गई थी। इसके आलावा अन्य भारतीय मेहमानों में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण सिंह के भाई बिजेंद्र सिंह की पत्नी और बेटी थीं। दो अन्य विदेशियों ने भी इस पार्टी की शान बढ़ाई।

आज कल राजीव गाँधी गलत कारणों से इस लोकसभा चुनाव का हिस्सा बन गए हैं। राहुल गाँधी के ‘चौकीदार चोर है’ नारे के जवाब में जब से मोदी ने राजीव गाँधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ कहा है, तब से मधुमक्खियों के छाते में ढेला मारने जैसी स्थिति हो गई है। लगातार बयानबाज़ी चल रही है जिसमें कॉन्ग्रेस और उसके समर्थक राजीव गाँधी को महान बताने में लगे हुए हैं, वहीं भाजपा वाले हर रोज राजीव गाँधी के कोई कारनामे को बाहर ले आते हैं।

51 दिनों तक 16 साल की नाबालिग लड़की को बंधक बनाकर करते रहे बलात्कार

नोएडा में तीन युवकों ने 16 साल की एक लड़की को बंधक बना लिया और 51 दिनों तक उसके साथ गैंगरेप करते रहे। नोएडा के मामूरा इलाके में रहने वाली एक किशोरी को उसके पड़ोस में रहने वाले दो युवकों ने किसी अनजान जगह ले जाकर उसे बंदी बना लिया। 51 दिन बाद किसी तरह लड़की वहाँ से भागने में कामयाब रही।

नोएडा पुलिस के अनुसार पीड़िता पढ़ी-लिखी नहीं है और वह बता नहीं पा रही है कि युवकों ने उसे कहाँ बंधक बनाकर रखा था। हालाँकि, वह उन दो लड़कों को पहचान सकती है। किशोरी के परिजनों ने बताया कि बार-बार कोशिश करने के बावजूद पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कर रही थी, एसपी (क्राइम) के पास जाने के बाद FIR दर्ज की गई।

किशोरी के पिता द्वारा दी गई शिकायत के मुताबिक, छोटू और सूरज दोनों उनके घर गए और बेटी का विश्वास जीतकर उसे अगवा कर ले गए। यह घटना मार्च के पहले सप्ताह में हुई थी। लड़की के पिता एक फैक्ट्री में काम करते हैं और आरोपी लड़कों में छोटू मध्य प्रदेश के छतरपुर, और सूरज, महोबा का रहने वाला है।

भागने की कोशिश करने पर जान से मारने की धमकी देते थे

शिकायत के अनुसार, “अगवा की गई किशोरी को एक कमरे में बंधक बनाकर रखा गया था, जहाँ उसके साथ 2 मार्च से लेकर 22 अप्रैल तक कई बार रेप किया गया। पीड़िता ने भागने की कोशिश करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी थी। उनकी गैरमौजूदगी में आदित्य किशोरी के साथ मारपीट करता था, वह नोएडा सेक्टर 135 में रहता है।” शिकायतकर्ता पिता ने बताया है कि तीसरा आरोपित आदित्य, बाँदा जिले का रहने वाला है।

22 अप्रैल को पीड़िता किसी तरह वहाँ से भाग निकलने में कामयाब हुई और अपने माता-पिता के पास पहुँची। इस मामले में पुलिस अधिकारी का कहना है कि शुरुआत में किशोरी के पिता ने आरोपित के साथ कथित तौर पर समझौता कर लिया था, लेकिन बाद में पिता ने कहा कि समझौता दबाव में किया गया था। पड़ोसियों ने कहा कि पुलिस शिकायत से उनकी बदनामी होगी और बहकावे में आकर उन्होंने लिखित समझौते पर दस्तखत कर दिए थे। फेज-3 एसएचओ अखिलेश त्रिपाठी ने कहा कि पुलिस के सामने किसी कागजात पर दस्तखत नहीं किए गए थे, पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और जल्द ही किशोरी का बयान लिया जाएगा। 

अलवर गैंगरेप मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार को जारी किया नोटिस

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अलवर, राजस्थान दुष्कर्म प्रकरण का संज्ञान लेते हुए राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने मामले में पुलिस की निष्क्रियता पर मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट माँगी है। वहीं, आयोग ने प्रदेश सरकार को आदेश देते हुए कहा है कि पूरे प्रकरण की 6 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करें।

बता दें कि राजस्थान के अलवर में एक बेहद ही शर्मनाक घटना में 5 युवकों ने पति के सामने ही पत्नी के साथ कथित तौर पर गैंगरेप को अंजाम दिया। आरोपित युवकों ने गैंगरेप के बाद दलित जाति की पीड़ित युवती का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। यह घटना राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी इलाके की है।

विगत 26 अप्रैल को पीड़िता अपने पति के साथ बाइक पर सवार होकर दोपहर 3 बजे तालवृक्ष जा रही थी, तभी थानागाजी-अलवर बाइपास रोड पर उनकी बाइक के सामने 5 युवकों ने अपनी मोटरसाइकिलें लगा दीं। इसके बाद वे महिला एवं उसके पति को रेत के टीलों की तरफ ले गए। वहाँ उन्होंने पति के साथ मारपीट की और दंपति को बंधक बना लिया।

पाँचों युवकों ने इसके बाद दोनों पति-पत्नी के कपड़े उतरवाए। पति के साथ मारपीट की। पीड़िता के साथ भी मारपीट की और रेप की कोशिश की। शुरुआत में जब पीड़िता ने रेप की कोशिश का विरोध किया तो उसके पति को और मारा गया। अंततः पीड़िता ने अपने पति की रक्षा के लिए हार मान ली। इसके बाद उन दरिंदों ने 3 घंटे तक बारी-बारी से पीड़िता के साथ रेप किया। 11 वीडियो क्लिप भी बनाए। 

इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में प्रशासन के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। पुलिस ने छोटेलाल, जीतू और अशोक सहित 5-6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। 26 अप्रैल की घटना को चार दिनों बाद 30 अप्रैल को पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। पुलिस ने IPC और SC/ST ऐक्ट की धाराओं 147, 149, 323, 341, 354B, 376(D) & 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

मोदी का मुखौटा पहने लड़के को थानेदार ने बुरी तरह से मारा थप्पड़

धनबाद से एक वीडियो सामने आया है। इसमें सड़क किनारे खड़े एक लड़के को बैंक मोड़, धनबाद के थानेदार सुरेंद्र सिंह थप्पड़ मारते दिख रहे हैं। थानेदार के थप्पड़ से लड़के का मोबाइल और मुखौटा नीचे गिर गया। बाद में दूसरे पुलिसकर्मी ने उसे उसका मोबाइल उठा कर दिया। जब थानेदार ने लड़के को झापड़ मारा, उस समय आसपास खड़े लोग उस लड़के का मज़ाक उड़ाते देखे जा सकते हैं। वीडियो में लोग उस लड़के को ‘चौकीदार चोर है’ बोलने को कह रहे हैं। वीडियो में एक व्यक्ति की आवाज़ आती है- “करिए, करिए। जो करना है करिए।” नीचे ट्विटर पर शेयर की गई वीडियो में आप इस घटना को देख सकते हैं।

बता दें कि वो लड़का सड़क किनारे खड़ा था, वहाँ से राहुल गाँधी का काफ़िला गुजरने वाला था। पुलिस बार-बार उस लड़के को वहाँ से हटने को कह रही थी। थानेदार ने कहा कि विधि-व्यवस्था के लिहाज से उस लड़के पर ‘हल्का बल प्रयोग’ किया गया।

हिंदुस्तान अख़बार के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

सोशल मीडिया पर वीडियो को देखने के बाद धनबाद पुलिस के उस थानेदार के प्रति गुस्सा ज़ाहिर करते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास से उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की माँग की। लोगों ने कहा कि किसी बच्चे पर इस तरह से बल प्रयोग करना सरासर ग़लत है। वीडियो पोस्ट करने वाले ट्विटर यूजर ने दावा किया कि पुलिस ने महिला भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ भी गाली-गलौज किया।

बता दें कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी कल मंगलवार (मई 7, 2019) को झारखण्ड के दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने चाईबासा में भी जनसभा को सम्बोधित किया। चाईबासा में राहुल गाँधी की सभा में कम भीड़ को देखते हुए नाराज कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसका आरोप मुख्यमंत्री रघुवर दास पर मढ़ा। राहुल गाँधी ने धनबाद में 35 मिनट का रोड शो कर कीर्ति झा आज़ाद के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। राहुल गाँधी को उस समय असहज स्थिति झेलनी पड़ी, जब उनके रोड शो के दौरान भाजपा समर्थक मोदी का मुखौटा पहनकर खड़े हो गए। हालाँकि, विरोध के बावजूद उनकी रैली और रोड शो को पूरा कराया गया।

मुखबिरी के शक में नक्सली आतंकियों ने की ग्रामीण की गोली मारकर हत्या

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर बौखलाए नक्सलियों ने एक ग्रामीण को निशाना बनाया है। बीती रात नक्सलियों ने मुखबिरी के शक में कांकेर जिले में ग्रामीण की गोली मारकर की हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, पखाँजूर के समीप छोटे बेठिया थाना क्षेत्र रेंगावाही गाँव के निवासी संतु गोटा को नक्सलियों ने मुखबिरी करने के सन्देह में गोली मार दी। 

स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 से 20 हथियारबंद नक्सलियों ने ग्रामीण संतु गोटा को घर से जबरन निकालकर अगवा कर लिया और जंगल में ले गए। जब परिजनों ने इसका विरोध किया तो नक्सलियों ने कहा कि वह बातचीत करके छोड़ देंगे। लेकिन तभी से वह गायब हो गए। बुधवार (मई 08, 2019) को तीन दिन बाद ग्रामीण का शव रेंगावाही गाँव के सड़क के किनारे मिला। मृतक के शव पर डंडे के निशान भी पाए गए हैं।

उसके सीने के बीचो-बीच में नक्सलियों ने गोली मारी है। मृतक के बारे में जानकारी मिलते ही घर में मातम छा गया। जिसके बाद परिजनों ने इसकी जानकारी नजदीकी पुलिस थाने में दी। मृतक के शव को पखांजुर हॉस्पिटल में पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है। इस घटना के बाद इलाके में सुरक्षाबलों ने सर्चिंग बढ़ा दी है। गौरतलब है कि इलाके में लगातार नक्सलियों का आतंक जारी है।

वाजपेयी की आलोचना, राजीव गाँधी को दण्डवत प्रणाम: यौन शोषण आरोपित ‘बड़े’ पत्रकार का दोमुँहापन

विनोद दुआ पत्रकारिता के क्षेत्र में एक बड़ा नाम है, पुराना नाम है। विनोद दुआ का नाम है या फिर वो बदनाम हैं, इसका निर्णय तो जनता कर ही रही है, लेकिन इस बीच हम उनके ऐसे दोहरे रवैये को जनता के समक्ष रखना चाहते हैं, जिसे आपको देखना, सुनना व जानना चाहिए। यौन शोषण के आरोपित विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ भी तब तक पीड़ित महिलाओं के लिए ख़ूब आवाज़ उठा रही थीं, जब तक ख़ुद उनके पिता ही उसमें न फँस गए। लेकिन, उसके बाद उन्होंने अपने पिता का बचाव किया और उनके ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा। इससे पता चलता है कि विनोद दुआ की लेगेसी सही हाथों में है। ताज़ा विवाद 2 दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर उनके द्वारा कही गई बातों से उपजा है।

दरअसल, जब अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ था, तब उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर वामपंथी कविता कृष्णन समेत कई लोगों ने भद्दी टिप्पणियाँ की थीं। विनोद दुआ ने अटल बिहार वाजपेयी के निधन के बाद कहा था कि हमारे देश में मृत व्यक्ति को अचानक से महान बना देने का एक चलन है, जो कि एक प्रकार का पाखंड है। इन्होंने वाजपेयी को दी जा रही श्रद्धांजलि की चर्चा करते हुए कहा था कि उन्हें ‘जिस तरह की’ श्रद्धांजलियाँ दी जा रही हैं, उसे पॉलिटिकली करेक्ट समझा जाता है। इसके आगे विनोद दुआ ने सच्ची श्रद्धांजलि की परिभाषा बताते हुए कहा था कि असली श्रद्धांजलि तभी हो सकती है जब निधन के बाद किसी की अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयों की भी चर्चा की जाए।

अभी कुछ दिनों पहले पीएम मोदी ने पूर्व पीएम राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी नंबर 1 कहा था। इसके बाद सियासी तूफ़ान खड़ा हो गया और कॉन्ग्रेस ने मोदी पर व्यक्तिगत व भद्दी टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दी। तरह-तरह के विपक्षी नेताओं व कथित बुद्धिजीवियों ने कहा कि राजीव गाँधी के बारे में ऐसा कोई भी बयान देना ग़लत है क्योंकि वो मर चुके हैं। इनमें विनोद दुआ भी शामिल हो गए हैं। तमाम तरह के लोग जो वाजपेयी के निधन के बाद उनकी बुराइयाँ गिनने के इच्छुक थे, उन्होंने राजीव गाँधी, उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और सिख दंगों में उनकी भूमिका के आरोपों पर कुछ भी बोलने से नाराज़ हैं। विनोद दुआ के लिए, राजीव गाँधी के बारे में कुछ बोलने का अर्थ हुआ- ‘कुर्सी के लिए नीचे गिरना’।

विनोद दुआ ने ताज़ा वीडियो में कहा कि हमारे ‘प्रधानसेवक’ ने कुर्सी पाने की लालसा में गिरते हुए दिवंगत पीएम राजीव गाँधी के बारे में ऐसी टिप्पणी की, जो ग़लत है। विनोद दुआ ने अपने वाजपेयी के समय के स्टैंड को बदलते हुए आगे कहा कि हमारे यहाँ एक नियम है कि जो दिवंगत हो चुके हैं, जिनका निधन हो चुका है, उनके बारे में ऐसा न बोला जाए। यौन शोषण के आरोपित पत्रकार दुआ के लिए जो उस समय ‘पाखंड’ था, वो अब ‘नियम’ बन चुका है। वाजपेयी के निधन के तुरंत बाद उनकी बुराइयाँ गिना कर उन्हें ‘सच्ची श्रद्धांजलि’ देने वाले दुआ राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार से लेकर सिख दंगों में उनकी भूमिका को लेकर लगे आरोपों की चर्चा से खिन्न हैं। दुआ जैसे लोगों के लिए ही शायद दोमुँहे साँप वाली कहावत बड़े-बुजुर्ग लिख गए हैं।

अगर कॉन्ग्रेस मौजूदा PM को गाली देगी तो पूर्व PM के कार्यों को मैं भी गिनाऊँगा: मोदी

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए ताबड़तोड़ चुनाव-प्रचार जारी है। ऐसे में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (मई 8, 2019) को विपक्ष की ‘गाली पॉलिटिक्स’ से लेकर ममता बनर्जी के कई आरोपों का अपने ही स्टाइल में जवाब दिया। कुरुक्षेत्र में चुनावी रैली के बाद टाइम्स नाउ से खास बातचीत में PM ने कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री के लिए यदि अपशब्द कहे जाएँगे, गालियाँ दी जाएँगी, झूठे आरोप लगाए जाएँगे तो पूर्व प्रधानमंत्रियों के भ्रष्टाचार का भी लेखा-जोखा लिया जाएगा। झूठ का जवाब सच से दिया जाएगा।

टाइम्स नाउ की पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया कि विपक्ष के हमलों पर आप क्या कहेंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए मोदी ने कहा, “जब मैं 2014 का चुनाव लड़ रहा था तो मुझे कम गालियाँ सुनने को मिलती थीं। अब विपक्ष का हमला बढ़ गया है। गालियों को पचाने का मेरी पाचन शक्ति (डाइजेशन पावर) बढ़ गई है। 2019 में गालियों को पचाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है।”

अगला सवाल ममता के मोदी को अपना प्रधानमंत्री न मानने को लेकर था। यहाँ तक कि फानी चक्रवात के बाद ममता बनर्जी ने मोदी का फोन तक उठाने से इनकार कर दिया था। पत्रकार ने सवाल किया कि ‘ममता बनर्जी ने आपको प्रधानमंत्री मानने से इंकार कर दिया है’, इस पर मोदी ने तंज किया, “उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री पीएम लगता है लेकिन भारत का पीएम उन्हें प्रधानमंत्री नहीं लगता। इसका जवाब देश की जनता देगी।”

हाल ही में कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका ने मोदी की तुलना महाभारत के दुर्योधन से कर दी थी तो इस पर उनका जवाब था, “मैं इसका जवाब मौन रहके दूँगा।”

लगभग पाँच चरण के मतदान सम्पन्न हो चुके हैं, अभी तक के रुझानों के अनुसार बीजेपी बढ़त बनाए हुए है। इसी को मद्देनज़र रखते हुए जब पूछा गया कि उन्हें क्यों लगता है उनकी सरकार 2019 में दोबारा आएगी? इस पर मोदी ने भरोसा जताया कि “मैंने पाँच सालों तक देश का भ्रमण किया है। मैं देश की जनता से जुड़ा हुआ हूँ। हमारा काम बोलता है। 2019 में चुनाव प्रचार के दौरान पहली बार देश में सरकार के पक्ष में (प्रो इन्कम्बैंसी) लहर है। भाजपा इस बार 282 से ज्यादा सीट जीतेगी। हमारे सहयोगियों की सीटें भी बढ़ेंगी। हमारा वोट शेयर भी बढ़ेगा। यह चुनाव सफलताओं से भरा होगा।”

चुनाव प्रचार में अब जब मुद्दे गायब होने लगे हैं और विपक्ष ने पुराने राग फिर से छेड़ना शुरू कर दिया है। फिर से मोदी को गाली देने का चलन बढ़ गया है। विपक्ष विकास के मुद्दे से कतराने लगा है। तब पत्रकार ने मोदी से पूछा कि इस चुनाव में मुद्दे क्या हैं? इस पर प्रधानमंत्री ने कहा, “चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास है लेकिन विपक्ष इससे कन्नी काट रहा है। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विकास के मुद्दे पर आए लेकिन वह इससे भाग रहा है। हम चुनावों में आतंकवाद की चर्चा करते हैं। आतंकवाद जब पड़ोस से आएगा तो क्या इस पर चुप रहना चाहिए?”

राहुल के ‘चौकीदार चोर है’ के जवाब में हाल ही में मोदी ने राजीव गाँधी पर वॉर करते हुए उन्हें उनके पूर्व के कामों के आधार पर ललकारा, उसी बयान को आधार बना जब उनसे पूछा गया कि आपके ‘भ्रष्टाचारी नंबर-1’ बयान पर कॉन्ग्रेस हमलावर है। आप क्या कहेंगे? इस सवाल के जवाब में मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी के ‘नामदार’ ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि हम किसी भी प्रकार से मोदी की छवि ध्वस्त करना चाहते हैं। मैंने चुनौती दी है कि अगर कॉन्ग्रेस मौजूदा प्रधानमंत्री को गाली देगी तो पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यों का भी लेखा-जोखा लिया जाएगा। 1984 में सिखों के कत्लेआम, भोपाल गैस कांड, बोफोर्स में भ्रष्टाचार पर कॉन्ग्रेस को जवाब देना ही होगा।”

पत्रकार ने आगे पूछा हमेशा मसूद अजहर का बचाव करने वाला चीन अपना रुख बदलने को कैसे तैयार हुआ? इस पर मोदी ने कहा, “आतंकवाद के संबंध में भारत की बात अब दुनिया मानने लगी है। दुनिया आज कश्मीर के पुराने गाने सुनने को तैयार नहीं है। हमने भारत की सच्चाई से लोगों को अवगत कराया है। एक समय ऐसा था जब रूस भारत के साथ होता था और दुनिया कमोबेश पाकिस्तान के साथ हुआ करती थी लेकिन आज आतंकवाद सहित वैश्विक मुद्दों पर दुनिया हमारे साथ है। हम अपनी बात दुनिया को समझाने में सफल हुए हैं।”

भोपाल में दिग्विजय हिन्दू वोटरों को लुभाने के लिए कम्प्यूटर बाबा के नेतृत्व में हठयोग का अनुष्ठान करवा रहे हैं। हालाँकि, कभी हिंदुत्व को भगवा आतंक से जोड़ने का षड़यंत्र रचने वाले दिग्विजय का यह रूप उनकी बेबसी को दर्शाता है। जब टाइम्स नाउ की पत्रकार ने पूछा कि भोपाल में दिग्विजय सिंह ने हजारों साधु-संतों को उतार दिया, इस बारे में आप क्या कहेंगे? इस पर प्रधानमंत्री ने कहा, “दिग्विजिय सिंह ने भारत की पाँच हजार साल पुरानी परंपरा को आतंकवादी करार दिया। वह जाकिर नाइक को भी ला सकते हैं।”