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कनाडा की सड़कों पर सनातनियों का सैलाब, लगे ‘जय श्रीराम’ के नारे: हिंदू मंदिर पर हमले को लेकर PM मोदी ने दिया सख्त संदेश, हिंसा में अब तक 3 गिरफ्तारी

कनाडा के ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर पर हमले के बाद जगह-जगह इस घटना के खिलाफ रोष जाहिर किया जा रहा है। पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है मगर इससे हिंदुओं की नाराजगी शांत नहीं है। उन्होंने कनाडा में मार्च निकाल अपनी सुरक्षा के लिए चिंता जाहिर की। इस दौरान जोर-जोर से नारेबाजी हुई। वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “मैं कनाडा में हिंदू मंदिर पर हुए जानबूझकर किए गए हमले की कड़ी निंदा करता हूँ। हमारे राजनयिकों को डराने की कायराना कोशिशें भी उतनी ही भयावह हैं। हिंसा के ऐसे कृत्य भारत के संकल्प को कभी कमजोर नहीं कर पाएँगे। हम उम्मीद करते हैं कि कनाडा सरकार न्याय सुनिश्चित करेगी और कानून के शासन को कायम रखेगी।”

मालूम हो कि हिंदू मंदिर में श्रद्धालुओं पर खालिस्तानी हमले के बाद कनाडा में हिंदू समुदाय के हजारों लोग भी सड़कों पर उतरे दिखे। इस दौरान उन्होंने मार्च निकालते हुए खुलेआम खालिस्तान मुर्दाबाद और जय श्रीराम के नारे लगाए। मार्च की वीडियो सोशल मीडिया पर हर जगह मौजूद है।

कनाडाई हिंदू संगठन ‘कोएलिशन ऑफ हिंदू ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, “हिंदू मंदिरों पर लगातार हो रहे हमलों के खिलाफ हजार से ज्यादा कनाडाई हिंदू ब्रैम्पटन में इकठ्ठा हुए हैं। कल (रविवार) को पवित्र दिवाली वीकेंड के दौरान इस तट से दूसरे तट तक कनाडा के हिंदू मंदिरों पर हमला किया गया। हम कनाडा से इस हिंदू फोबिया को तुरंत रोकने के लिए कहते हैं।”

हिंदू मंदिर पर हमला

बता दें कि 3 नवंबर को हिंदू सभा मंदिर में भारतीय कांसुलर कैंप चल रहा था। इस बीच खालिस्तानियों की भीड़ आई और उनपर हमला बोल दिया। इस दौरान बच्चे और महिलाएँ भी निशाना बनाई गईं। घटना के बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक तीन गिरफ्तारियाँ की है। वहीं एक पुलिसकर्मी को सस्पेंड किया गया है। हिंसा मामले में गिरफ़्तार किए गए लोगों की पहचान मिसिसॉगा के 43 वर्षीय दिलप्रीत सिंह बौंस, ब्रैम्पटन के 23 वर्षीय विकास और मिसिसॉगा के 31 वर्षीय अमृतपाल सिंह के तौर पर हुई है।

लक्ष्मी-गणेश विसर्जन जुलूस पर पथराव, मीडिया की रिपोर्टों में प्रतिमा क्षतिग्रस्त होने का भी दावा… लेकिन ‘अफवाह’ बता रही है सिद्धार्थनगर पुलिस

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में सोमवार (4 नवंबर 2024) को लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर पत्थरबाजी से नाराज श्रद्धालुओं ने प्रदर्शन की है। पथराव में प्रतिमा क्षतिग्रस्त होने की बात कही जा रही है। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर हालत को काबू किया। हालाँकि, जिले के एडिशनल एसपी ने पत्थरबाजी होने से साफ इनकार किया है और किसी के भी घायल होने की खबरों को अफवाह बताया है।

हिंदुस्तान और न्यूज़ 18 के मुताबिक, घटना सिद्धार्थनगर जिले के डुमरियागंज थाना क्षेत्र की है। यहाँ श्रद्धालुओं ने सोमवार को भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन जुलूस निकाला था। जुलूस में DJ पर धार्मिक भजन बज रहा था। थोड़ी देर में यह जुलूस मुस्लिम बहुल गाँव माली मैनहा के आगे से गुजरा। इस दौरान जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने पथराव का आरोप लगाया।

कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि जुलूस में शामिल 2 महिला श्रद्धालुओं को चोटें आई हैं। इससे लोगों का गुस्सा और भड़क गया। जैसे ही यह बात जिले के सीनियर अधिकारियों को पता चली वो फ़ौरन ही भारी फ़ोर्स के साथ मौके पर पहुँचे। श्रद्धालुओं को समझा-बुझाकर शांत कराया और विरोध में लगाए गए जाम को हटवाया गया। इसके बाद यह जुलूस अपने तय मार्ग से विसर्जन के लिए आगे बढ़ गया।

हालाँकि, श्रद्धालु पत्थरबाजी करने वाले आरोपितों को चिन्हित करके उन पर कार्रवाई की माँग पर अड़े हैं। इसमें एक व्यक्ति को हिरासत में लेने की बात कही जा रही है। वहीं, मीडिया के दावों के एकदम विपरीत सिद्धार्थनगर पुलिस ने पत्थरबाजी और किसी के घायल होने की खबरों को कोरी अफवाह बताया है। पुलिस का कहना है कि अफवाह उड़ाने वाले लोगों की तलाश की जा रही है।

जिले एक एडिशनल एसपी ने अपने आधिकारिक बयान में बताया कि ऊहापोह की स्थिति जुलूस में शामिल किसी व्यक्ति के द्वारा अफवाह उड़ाने से हुई थी, जिसे सँभाल लिया गया है। वहीं, भाजपा नेता एवं डुमरियागंज से पूर्व विधायक राघवेंद्र सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि वो हंगामे के असली कारणों की अपने स्तर से पड़ताल करवा रहे हैं। जो भी बात सामने आएगी, उसके अनुसार कार्रवाई होगी।

करेंट से श्रद्धालुओं की मौत पर 7 पुलिसकर्मी सस्पेंड

वहीं, सिद्धार्थनगर के ही एक अन्य थाना क्षेत्र शोहरतगढ़ में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा को विसर्जित करने जा रहे श्रद्धालुओं का वाहन बिजली के तार की चपेट में आ गया। धनगढ़िया गाँव की इस घटना में एक बच्चे की मौत हो गई है, जबकि 13 अन्य लोग घायल हो गए हैं।

जिले की पुलिस अधीक्षक प्राची सिंह ने इस घटना के बाद 2 सब इंस्पेक्टर सहित कुल 7 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया है। पुलिस द्वारा विद्युत विभाग के कर्मचारियों पर भी कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया है। यह घटना शनिवार (2 नवंबर 2024) की है।

नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ सूर्य उपासना का 4 दिन का अनुष्ठान: विस्तार से जानिए क्यों होता है छठ, क्या हैं इसके तात्पर्य

लोक आस्था का महापर्व छठ भगवान सूर्य और उनकी दो पत्नियों ऊषा और प्रत्यूषा को समर्पित है। ‘छठ’ नामकरण के पीछे इसका अमावस्या के छठे दिन या षष्ठी को होना है। इस बार आज मंगलवार (5 नवंबर, 2024) से नहाय-खाय के साथ सूर्योपासना के महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान की शुरुआत हो चुकी है। 7 नवंबर तारीख को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 8 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही 4 दिन के महापर्व का समापन हो जाएगा।

पहले दिन छठ व्रतियों ने सुबह-सुबह नदियों में स्नान किया। शनिवार को खरना पर पूरे दिन उपवास कर शाम में सूर्य देव की पूजा कर प्रसाद ग्रहण किया जाएगा। वहीं 7 नवंबर रविवार की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद सोमवार 8 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर आयु-आरोग्यता, यश, संपदा का आशीष लेते हुए पर्व संपन्न होगा।

सूर्य देव और छठी मईया (ऊषा देवी के लिए प्रयुक्त नाम) इस पर्व के आराध्य हैं। इसकी तैयारी अत्यंत श्रमसाध्य और सघन होती है। ऊषा और प्रत्यूषा सूर्य देव की दो शक्ति मानी जाती हैं और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। संध्या काल में दिया जाने वाला पर्व का प्रथम अर्घ्य उनकी अंतिम किरण प्रत्यूषा को दिया जाता है और प्रातः काल का अर्घ्य सूर्य की प्रथम किरण ऊषा को।

छठ पर्व और सूर्य देव की पूजा का उल्लेख भारत के दोनों महाकाव्यों महाभारत और रामायण में है। श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद देवी सीता के अयोध्या के राजपरिवार के कुल देवता के रूप में सूर्योपासना और महाभारत में इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपदी के इस पर्व को मनाने के बारे में लिखित प्रमाण हैं। सूर्य पुत्र कर्ण महाभारत के प्रमुखतम किरदारों में एक है। यही नहीं, देवी ऊषा स्वयं वैदिक काल की देवी मानी गईं हैं, जिनकी उपासना में कई वेद मन्त्र और ऋचाएँ हैं।

समकालीन परम्परा की बात करें तो दीवाली खत्म होते ही विभिन्न राज्यों में बसे आस्थावानों के साथ ही खास तौर से बिहार के लोग 6 दिन बाद होने वाले छठ की तैयारियों में लग जाते हैं। राज्य के हर कोने में छठी मईया के गीत गाए जाते हैं। सबसे प्रचलित गीत बिहार की अपनी बेटी और पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा के होते हैं। “उग हो सुरुज देव” से लेकर “मारबो रे सुगवा धनुष से” तक इन गीतों का जुड़ाव हर बिहारी से होता है।

गाँव-कस्बों में साफ़-सफाई चालू हो जाती है, जो एक सामुदायिक प्रक्रिया होती है। केवल पगार पाने वाले सफाई कर्मचारी ही नहीं, छठ के दौरान साफ़-सफाई पूरे बिहार का जिम्मा होता है। घर से लेकर घाट तक, जहाँ पानी के किनारे अर्घ्य देना होता है, कंकड़-पत्थर, गंदगी, घास-फूस का नामोनिशान मिटा दिया जाता है।

पहला दिन: नहाय-खाय

इस दिन व्रतिन (व्रती महिलाएँ) सुबह-सवेरे नहा कर मौसमी सब्ज़ियों, चावल और दाल का भोजन करती हैं। दाल में अमूमन चना सबसे अधिक प्रचलित है, जबकि सब्ज़ियों में लौकी (जिसे ‘कद्दू’ के नाम से जाना जाता है); साथ में चने का साग भी होता है। व्रतिन का बिना नमक का भोजन प्रसाद होता है, जिसे बाद में पूरा परिवार ग्रहण करता है।फ़ैमिली वेकेशन पैकेज

इसी दिन (या अगले दिन, सुविधानुसार) व्रतिन अपने घर के अन्य लोगों की मदद से सूर्य देवता को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को बनाने में प्रयुक्त होने वाले गेहूँ को धोकर सूखने के लिए फैला देती हैं। घर के बच्चों की ज़िम्मेदारी होती है ध्यान रखना कि गेहूँ में कोई गंदगी न गिर जाए या चिड़िया जूठा न कर दे या बीट न कर दे।

इस दिन सबसे चर्चित मिठाई ठेकुआ की भी तैयारी जम कर होती है। गेहूँ को या तो घर ही में जाँते में पिसा जाता है या पास की चक्की से पिसवाया जाता है। इसी आटे से मिठाइयाँ, रोटी, पूड़ी आदि बनती हैं।

दूसरा दिन: खरना

व्रतिन का पूरे दिन उपवास होता है- वह भी निर्जला। इसके अलावा उन्हें स्वच्छता, शौच-अशौच के भी कठोर नियमों का पालन करना होता है। शाम को वही घर वालों के लिए भोजन भी बनाती हैं, जिसमें पूड़ी और तस्मई (गुड़ या शक़्कर की खीर) प्रमुख होते हैं। तस्मई में एक बूँद पानी का प्रयोग नहीं होता है और दूध उसी गाय का इस्तेमाल किया जाता है जिसका बछड़ा जीवित रहता है।

शाम को भोजन बनाने से खाली होकर व्रतिन पूजा पर बंद कमरे में बैठती हैं। विभिन्न देवताओं, जिनमें ग्राम और कुल के भी देवी-देवता शामिल होते हैं, को नैवेद्य का भोग लगता है। इस नैवेद्य में रोटी, तस्मई और केला होता है, और यह भोग केले के पत्ते पर ही लगता है।

व्रतिन जब पूजा करतीं हैं तो पूरा घर दम साधे बैठे रहता है ताकि उनका ध्यान भंग न हो जाए। उसके बाद वे प्रसाद ग्रहण कर अपने उपवास का पारण करती हैं। वे अपने थाल में कुछ खाना छोड़ कर उठतीं हैं, जिसे घर के बाकी सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कई बार तो घरों में इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए आपस में होड़ लग जाती है, क्योंकि यह माँ के प्रसादों में सबसे अनुपम माना जाता है। इस नैवेद्य के प्रसाद के बाद पूरा घर तस्मई और पूड़ी ग्रहण करता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन व्रतिन का उपवास फिर शुरू हो जाता है जो लगभग 36 घंटे चलता है। यह भी निर्जला ही होता है। इस दिन परिवार के बच्चे या युवा डलिया और सूप तैयार करते हैं जिनमें ठेकुआ, लडुआ, साँच और घर के पास उगने वाली कोई भी फसल (गन्ना, संतरा, सेब से लेकर मूली, केला, मूँगफली, मकई तक) हो सकते हैं। घर के पुरुष इन डलियों को सिर पर लेकर घर से घाट तक जाते हैं। रास्ते भर में सफाई, पानी के छिड़काव आदि से स्वच्छता और शुचिता बरकरार रखे जाते हैं।

डलिया को घाट पर खोल कर रख दिया जाता है। व्रतिन जल में स्नान कर ढलते सूर्य और प्रत्यूषा की वंदना करती हैं। इसके बाद वे हर डलिया को एक दिए के साथ हाथ में लेतीं हैं और वे और परिवार के अन्य सदस्य डलिया में जल और दूध द्वारा अर्घ्य देते हैं।

इसके बाद व्रतिन फिर एक बार स्नान करतीं हैं और उसके बाद घाट पर पूजा होती है। इसमें आराधना, पुष्पांजलि, धूप चढ़ाना और अगरबत्ती जलाना शामिल होते हैं। डलिया को पुरुष सदस्य वापिस घर ले आते हैं और इसे सहेज कर रात भर के लिए ऐसी जगह स्थापित किया जाता है जहाँ गलती से स्पर्श, पैरों का लगना आदि न हो।

चौथा दिन: ऊषा अर्घ्य

शाम के अर्घ्य की ही प्रक्रिया इसमें दोहराई जाती है। डलिया लेकर घाट पर पहुँचा जाता है, जहाँ व्रतिन पानी में उतर कर सूर्योदय का इंतज़ार करतीं हैं। जैसे सूर्य देव देवी ऊषा के साथ प्रकट होते हैं, युगल को जल और दूध का अर्घ्य शाम की ही भाँति पहली किरण के साथ दिया जाता है।

इसके बाद डलिया को वापिस घर ले जा कर परिवार के लोगों और पड़ोसियों में प्रसाद वितरित होता है। व्रतिन के जलाशय से बाहर आने तक पूरा परिवार भी उनके साथ खाली पेट प्रतीक्षा करता है।

व्रतिन जलाशय से बाहर आकर नए वस्त्र धारण करतीं हैं और घर की अन्य महिलाओं के साथ वापिस घर जातीं हैं। रास्ते में खेतों में वे मृदा (मिट्टी) की भी पूजा करतीं हैं। इसे भूमि की उर्वरा शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन माना जाता है।

जब व्रतिन घर पहुँचती हैं तो घर के सभी सदस्य उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उन क्षणों में जब वे अपनी सभी इन्द्रियों और अंगों के आवेश को स्थिर किए हुए होतीं हैं, तो उनकी वाणी में माता उषा या छठी मईया का निवास माना जाता है।

डलिया के प्रसाद के अलावा इस वक्त का मुख्य भोजन कद्दू (लौकी)-भात होता है।

डलिया की सामग्री की महत्ता

हर परिवार में अलग-अलग संख्या में डलिया होती हैं। एक, दो, तीन से लेकर किसी-किसी परिवार में संख्या दस के परे भी जा सकती है। यह संख्या इस पर निर्भर करती है कि घर के लोगों ने छठी मईया से कितनी डलिया की मनौती मानी थी।

कई बार मान लीजिए कि कोई अगर गंभीर रूप से बीमार है तो घर की वयोवृद्ध दादी-नानी कुछ वर्षों (या हो सकता है हमेशा के लिए भी) एक निश्चित बड़ी संख्या की मनौती मान लें। इसमें कई बार तो ऐसा भी होता है कि लोग अपने ही नहीं, आस-पड़ोस के लोगों के लिए मनौती मान लेते हैं, जैसे, “हे छठी मईया, मेरा ये बेटा (गाँव का मुखिया, जिसका मान लीजिए एक्सीडेंट हो गया था) बिस्तर से उठ खड़ा हो, तो मैं जब तक ये जिएगा, एक डलिया फल हर साल चढ़ाऊँगी।”

‘कष्ट लेना’

यह अर्घ्य के दो दिनों की शाम और सुबह में काफी आम है। कई लोग, अमूमन पुरुष, छोटी चाकू या ऐसी ही किसी धातु वाली वस्तु के साथ सूर्य की ओर चेहरा कर दंड प्रणाम करते हुए घाट तक जाते हैं।

असल में वे क्या कर रहे होते हैं:

वे अपने घर से निकल कर सूर्य को प्रणाम करते हैं, और ज़मीन पर लेट कर अपने शरीर की लम्बाई जितनी दूरी नापते हैं। इस दूरी का वे ज़मीन पर कील या चाकू आदि से निशान लगा देते हैं। उसके बाद वे उठ कर फिर से सूर्य को प्रणाम करते हैं, निशान वाली जगह पैर जमा कर फिर ज़मीन पर लेट जाते हैं, सिर की जगह पर निशान लगाते हैं… यह प्रक्रिया घाट पहुँचने तक जारी रहती है।

यह केवल सुनने में ही नहीं, करने में भी बहुत ही कठिन प्रक्रिया है। इसे करने वाला या तो खुद इसकी मन्नत माना होता है, या उसके लिए उसकी माँ, दादी-नानी ने उसके कल्याण के लिए यह मन्नत मानी होती है। इस आराधना विधि को ‘कष्ट लेना’ कहा जाता है।

यह इतना दुष्कर और जटिल है कि इस मन्नत का उपयोग केवल बहुत ही बड़ी विपत्ति के उपाय में किया जाता है- जैसे अगर किसी का एक्सीडेंट हो गया है, या किसी अन्य कारण से प्राण संकट में पड़ गए हों। तभी इस कष्ट के अर्पण के बदले देवताओं से सहायता माँगी जाती है।

हालाँकि यह ‘कष्ट लेना’ क्रिया अमूमन केवल पुरुष ही करते हैं, लेकिन इससे मिलता-जुलता एक संस्करण स्त्रियों के लिए भी होता है। उन्हें उसके लिए जलाशय में सबसे पहले पहुँच जाना होता है, उन महिलाओं के पहले जो ‘कष्ट’ वाली मनौती नहीं किए होतीं हैं और अर्घ्य की प्रक्रिया समाप्त होने पर उनसे बाद में निकलना होता है। अक्टूबर अंत-नवंबर के कड़ाके की ठंड में सूर्योदय के पहले से ऐसा करना बेहद मुश्किल होता है।

बिहार में सबसे प्रचलित छठी मईया से मॉं, दादी, नानी हमेशा ही प्रार्थना करती रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि माँ उषा अपने बच्चों का सदैव ध्यान रखतीं हैं। यह ‘कष्ट’ माँ उषा की संतान होने के प्रति आभार प्रकट करने का एक ज़रिया है।

विश्वास ही हम सब को एक सूत्र में पिरोता है। छठ पूजा पूरे परिवार को साथ ले आती है। व्रतिन को घर में सबसे अधिक सम्मान दिया जाता है और बच्चों में उनके थके हाथ-पैर दबाकर, सिर पर मालिश कर उनका आशीर्वाद लेने की होड़ लगी रहती है।

यह पर्व पृथ्वी पर साक्षात् दिखने वाले एकमात्र देवता को धन्यवाद करने का एक तरीका है, जिनके अनुग्रह से पृथ्वी पर जीवन और प्राण का संचार होता है। यह उन सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का तरीका है, जिनकी किरणों के बिना पूरा ब्रह्माण्ड मृत हो जाएगा। वे केवल जीवन ही नहीं देते। अपनी किरणों से व्याधियों का नाश कर पालन भी करते हैं। छठ पर हम उन्हें और उनकी शक्तियों ऊषा और प्रत्यूषा को अपना आभार ज्ञापित करते हैं।

(पहली बार मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित पूर्व संपादक अजीत भारती के इस लेख में जरुरी एडिटोरियल बदलाव किए गए हैं।)

15 साल की दलित नौकरानी की हत्या में गिरफ्तार हुआ मोहम्मद निशाद और उसकी बीवी, लेकिन मीडिया ने ‘दीवाली’ को घसीटा: हिंदुओं से ये कैसी नफरत TOI-HT

चेन्नई पुलिस ने 3 नवंबर 2024 को मोहम्मद निशाद और उसकी पत्नी नासिया को उनकी 15 साल की दलित नौकरानी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया। कथित तौर पर मियाँ-बीवी नाबालिग नौकरानी को प्रताड़ित करते थे। गर्म तवा और सिगरेट से दाग देते थे। बुरी तरह पिटाई करते थे।

प्रताड़ना से जब नाबालिग दलित की मौत हो गई तो मुस्लिम दंपती घर छोड़कर भाग गया। पुलिस ने नाबालिग की लाश उनके घर के बाथरूम से बरामद की। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) और हिंदुस्तान टाइम्स (HT) जैसे मीडिया संस्थान इस घटना में भी ‘दीपावली’ को घसीटकर लाने में पीछे नहीं रहे। नाबालिग की लाश 31 अक्टूबर को बरामद की गई थी और इसी दिन दीपावली भी थी।

मीडिया ने हत्या को दीपावली से जोड़ा

TOI ने इस घटना के बारे में अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ‘दीवाली’ शब्द को प्रमुखता से छापा है। इस पोस्ट में कहीं भी आरोपितों का नाम नहीं लिखा गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा, “दीवाली के दिन 15 वर्षीया घरेलू सहायिका की उसके मालिकों द्वारा बेरहमी से पिटाई किए जाने के बाद मौत हो गई है। दंपती ने उसे सिगरेट से दागने सहित कई गंभीर चोटें पहुँचाई और मरने के लिए शौचालय में बंद कर दिया।”

साभार- X/TOI

इसी रिपोर्ट में TOI ने आरोपितों के नाम दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में बताए हैं। (न्यूज़ का आर्काइव लिंक)

साभार- TOI

कमोबेश ऐसी ही हरकत हिंदुस्तान टाइम्स ने भी की है। HT मीडिया ने अपनी रिपोर्ट के शुरुआती पैराग्राफ में आरोपितों के नाम का कहीं भी जिक्र नहीं किया है। लेकिन इसी रिपोर्ट की शुरुआत में ही जोर-शोर से दीपावली का जिक्र किया गया है। बाद में इस रिपोर्ट में एक अलग सेक्शन बना कर आरोपितों के नाम खोले गए हैं। (खबर का आर्काइव लिंक)

साभार- Hindustan Times

क्या है घटनाक्रम

यह घटना तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के अमिनजीकराई थानाक्षेत्र की है। यहाँ मेहता नगर में 35 वर्षीय मोहम्मद निशाद और उनकी 30 साल की पत्नी नासिया ने 15 साल की नाबालिग लड़की को नौकरानी बना कर रखा था। निशाद और नासिया आए दिन लड़की को मारते-पीटते थे। कई बार उसे ये दोनों सिगरेट और गर्म तवे से जला चुके थे। मृतका के गले पर एक निशान भी मिला है, जिससे लगता है कि उसका गला घोंटा गया था।

नाबालिग लड़की मूलतः तंजावुर की रहने वाली है। उसके पिता की मौत हो चुकी है। वह अपनी विधवा माँ की मदद घरों में काम कर के कर रही थी। 31 अक्टूबर को भी नसिया और मोहम्मद निशाद ने नाबालिग को पीटा था। पिटाई से लड़की की मौत हो गई। दोनों ने लड़की के शव को बाथरूम में बंद कर दिया और फिर एक दोस्त के घर भाग गए।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका को प्रताड़ित किए जाने का खुलासा हुआ है। नासिया और मोहम्मद निशाद की गिरफ्तारी के साथ पुलिस ने 4 अन्य लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की है। इन चारों में एक भाई-बहन हैं, जिन्होंने पीड़िता को मोहम्मद निशाद के घर पर काम करने के लिए रखवाया था। इसके अलावा 2 अन्य वो पति-पत्नी हैं जिनके घर मोहम्मद निशाद और नासिया भागकर गए थे। आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के साथ पॉक्सो एक्ट में कार्रवाई की गई है।

माँ-बेटी को मुस्लिम बनाने की कोशिश में लगा था हसन, हिंदुओं को दिखाता था नीचा: तमिलनाडु पुलिस ने किया गिरफ्तार, SDPI का रह चुका है सदस्य

तमिलनाडु पुलिस ने शनिवार (2 नवंबर 2024) को 45 साल के हसन बधुशा को गिरफ्तार किया। उस पर एक हिंदू माँ-बेटी पर इस्लाम कबूलने के लिए दबाव डालने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप है। हसन प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) का सदस्य रह चुका है। उसकी साजिशों के कारण पीड़ित महिला का अपने पति के साथ भी मतभेद हो गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना कोयंबटूर के थुडियालुर पुलिस स्टेशन क्षेत्र की है। इरोड जिले के कोल्लमपलायम निवासी 42 साल के डी सत्यमूर्ति ने 1 नवंबर को शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में उन्होंने बताया था कि उनकी पत्नी एम आरती एक आईटी कम्पनी में जॉब करती है। हसन उनकी पत्नी का बचपन से ही दोस्त है। दोस्ती के बहाने वह अक्सर आरती से मिलने आया करता था। हसन थुडियालुर में एक स्टोर का मालिक है। उसने अपना स्टोर चलाने के लिए आरती से 2 लाख रुपए कर्ज लिया था।

इस कर्ज को चुकाने के बदले हसन ने आरती से निकाह करने का वादा किया। सत्यमूर्ति का आरोप है कि हसन ने उनके दाम्पत्य जीवन के बीच दरार डालने की काफी कोशिश की। उसने आरती से हिन्दू धर्म के खिलाफ कई आपत्तिजनक बातें की। इस दौरान उसने हिन्दू धर्म को नीचा दिखा कर आरती के मन में उसकी आस्था के प्रति नफरत पैदा करने का प्रयास किया।

कुछ दिनों बाद हसन ने आरती और उसकी 14 वर्षीय बेटी को पढ़ने के लिए कुरान दिया। सत्यमूर्ति ने इसे उनकी बेटी और पत्नी को इस्लाम कबूल करवाने की हसन द्वारा रची गई साजिश करार दिया है। थोड़े समय बाद सत्यमूर्ति और आरती के रिश्तों में खटास पड़नी शुरू हो गई। 1 जून 2024 को सत्यमूर्ति अपने परिवार के साथ इरोड के कोल्लमपलायम में रहने लगे। इससे नाराज हो कर 8 जून को हसन बधुशा ने सत्यमूर्ति पर हमला भी किया।

आरोप है कि हसन ने आरती को अपने पति से तलाक लेने के लिए उकसाया। उसने खुद को आरती से निकाह करने को तैयार बताते हुए हिन्दू धर्म के बारे में कई गलत बातें की। पुलिस ने इस शिकायत का संज्ञान ले कर हसन बधुशा के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। FIR धारा 294, 323, 153, 298, और 506 (2) के तहत दर्ज हुई है। आरोपित को हिरासत में ले कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।

इस मामले के सामने आते ही SDPI ने हसन बधुशा से अपना पल्ला झाड़ लिया है। एक बयान में SDPI ने कहा है कि हसन अब उनसे जुड़ा नहीं है। बकौल SDPI हसन को लगभग 6 माह पहले ही SDPI के सभी पदों से मुक्त कर दिया गया था।

भारत-बांग्लादेश-म्यांमार को काटकर ईसाई मुल्क बनाने की रची जा रही साजिश? जिस अमेरिकी खतरे से शेख हसीना ने किया था आगाह, वह मिजोरम CM के बयान से फिर खड़ा हुआ

मिजोरम के मुख्यमंत्री पू लालदुहोमा के एक हालिया बयान पर विवाद हो गया है। यह बयान लालदुहोमा ने अमेरिका में दिया था। लालदुहोमा ने इस बयान में उत्तरपूर्व क्षेत्र में एकीकृत जो लोगों का देश बनाने की बात की तरफ इशारा किया। लालदुहोमा ने कहा था कि हमें (जो ईसाइयों) तीन अलग-अलग सरकारों के अंतर्गत रहना पड़ रहा है, जो स्वीकार्य नहीं है। लालदुहोमा के बयान में साफ़ में था कि वह भारत, म्यांमार और बांग्लादेश रहने वाले जो लोगों को एक निजाम के अंतर्गत चाहते हैं।

लालदुहोमा ने यह बयान अमेरिका में 4 सितम्बर, 2024 को दिया था। यह बयान जो समुदाय की एक बैठक में दिया गया जहाँ पर उन्होंने उत्तरपूर्व में एक संगठित चर्च बनाने की चर्चा भी छेड़ी थी। उन्होंने यहीं तीनों देशों में बिखरे ईसाइयों के एक साथ एक देश में होने की बात भी कही।

लालदुहोमा ने क्या कहा?

लालदुहोमा ने कहा, “अमेरिका की यात्रा पर आने का मुख्य कारण हम हमारी एकता का एक रास्ता तलाशना है। हम लोग एक ही हैं और एक दूसरे से अलग रहने का जोखिम नहीं उठा सकते… हमें गलत तरीके से बाँटा गया है और तीन अलग-अलग देशों में तीन अलग-अलग सरकारों के अधीन रहने के लिए मजबूर किया गया है, यह ऐसी बात है जिसे हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे।”

लालदुहोमा का तीन अलग-अलग सरकारों से तात्पर्य भारत, बांग्लादेश और म्यांमार से था। लालदुहोमा के बयान से साफ़ है कि उन्हें ईसाई समुदाय का तीन अलग-अलग देशों में अलग-अलग देशों में रहना पसंद नहीं है और वह इन तीनों क्षेत्रों को एक करने के लिए एक रास्ता तलाशना चाहते हैं।

इसी बयान में लालदुहोमा ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि हम यह दृढ़ विश्वास और इच्छाशक्ति रखें कि एक दिन, ईश्वर की कृपा से, जिसने हमें एक देश बनाया है, उसी के नेतृत्व में हम एक देश बन कर उठेंगे और अपना लक्ष्य हासिल कर लेंगे।” उन्होंने बाद में यह भी कहा कि कोई एक देश सीमाओं के तौर पर बंटा भी हुआ हो सकता है।

लालदुहोमा की इस बात से साफ़ है कि वह एक ऐसे देश की बात कर रहे हैं जिसमें यह तीनों जगह के लोग शामिल हों लेकिन एकदम अलग होगा और यह ईश्वर की कृपा से बनेगा। लालदुहोमा यह बयान तब दे रहे हैं जब वह स्वयं भारतीय गणराज्य के अंतर्गत एक संवैधानिक पद पर हैं और उन्होंने देश की एकता और अखंडता को लेकर शपथ ली है।

शेख हसीना ने जताई थी इसी की आशंका

जिस तरह की बात लालदुहोमा कर रहे हैं, इसी से सम्बन्धित बात बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना कह चुकी हैं। शेख हसीना ने बांग्लादेश में तख्तापलट से पहले मई 2024 में शेख हसीना ने कहा था कि गोरी चमड़ी वाले देश बांग्लादेश और म्यांमार के एक हिस्से को तोड़ कर ईसाई देश बनाना चाहते हैं।

उन्होंने तब भारत का नाम नहीं लिया था लेकिन साफ़ था कि यह देश भी उसी तर्ज पर बनता, जिसकी दुहाई लालदुहोमा ने दी है। लालदुहोमा का भी कहना है कि ईसाइयों को उत्तर पूर्व में एक होना होगा और ईश्वर ने चाहा तो उनका एक देश का सपना जरूर पूरा होगा।

शेख हसीना ने यह भी कहा था कि अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देश उनके चुनाव और सरकार में इसलिए अड़ंगा लगा रहे हैं क्योंकि वह बंगाल की खाड़ी में एक बेस चाहते हैं। हसीना ने कहा था कि इस ईसाई मुल्क में चट्टोगाम भी शामिल होगा, जो खाड़ी का एक प्रमुख बंदरगाह है। उन्होंने कहा था कि एक गोरी चमड़ी वाले आदमी ने उनको यह सारे ऑफर दिए थे।

इसी के कुछ दिनों के बाद शेख हसीना की सत्ता चली गई थी। उन्हें आनन फानन में अपना देश छोड़ कर निकलना पड़ा था। वर्तमान में वह भारत में शरण लेकर रह रही हैं। लेकिन उनके द्वारा जताई गई चिंता एक बार फिर मिजोरम CM के बयान के रूप सामने आई है।

नई नहीं है ईसाई देश की बातें

भारत के उत्तर पूर्व में एक ईसाई देश बनाने की यह बात कोई नई नहीं है। शेख हसीना ने मई में इसको लेकर अपने नेताओं से भी चिंता जताई थी। स्वराज्य की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शेख हसीना ने आवामी लीग के नेताओं से बताया था कि जोगम नाम का एक देश बनाने की साजिश चल रही है। शेख हसीना ने बताया था कि इस देश में म्यांमार के सागाइंग डिवीजन और चिन राज्य का बड़ा हिस्सा, भारत का मिजोरम और मणिपुर के कुकी बहुल इलाके और बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबन जिले और आसपास के क्षेत्र शामिल होंगे।

भारत के भीतर भी मिजोरम में सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM), विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) और साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी की राज्य इकाई मिजोरम स्थित ZRO द्वारा की गई एकीकरण की माँग का समर्थन करती है, इसका मुख्य उद्देश्य तीनों देशों में सभी ज़ो-आबादी वाले क्षेत्रों का एकीकरण करना है। बताया गया है कि चर्च और विशेष रूप से अमेरिका स्थित बैपटिस्ट चर्च इस “ज़ो-एकीकरण” की माँग को बढ़ावा दे रहा है। इन चर्च के अमेरिका की CIA से घनिष्ठ संबंध होने की सूचना है।

मणिपुर में हिंसा में बड़ा रोल निभाने वाले कुकी लड़ाके भी धार्मिक आधार जो लोगों के साथ जुड़े हैं। कुकी वर्तमान में म्यांमार के भीतर बड़ा इलाका नियंत्रित करते हैं। मणिपुर में हिंसा फ़ैलाने में म्यांमार से आने वाले घुसपैठियों का बड़ा हाथ रहा है। यह कुकी भी उस कुकी-चिन-जो समुदाय का हिस्सा हैं, जिसका एक वर्ग अलग ईसाई देश चाहता है।

मिजोरम में ईसाइयत का प्रभाव

मिजोरम की लगभग 90% जनसंख्या ईसाई है। मिजोरम में ईसाइयत का प्रभाव 20वीं शताब्दी की शुरुआत से ही चालू हुआ है। इससे पहले यहाँ की अधिकांश जनता जनजातीय परम्पराओं को मानती थी। हालाँकि, मिशनरियों ने यहाँ लम्बे समय तक ईसाइयत का प्रचार किया जिससे राज्य की अधिकांश जनता ईसाई हो गई।

मिजोरम के अलावा नागालैंड और मेघालय भी ईसाइयत की बहुलता वाले राज्य हैं। हालाँकि, मिजो लोगों का फैलाव सीमाओं के पार भी है, ऐसे में इनके एकीकरण के साथ ही एक देश बनाने की बातें भी उठती रही हैं। CM लालदुहोमा का बयान यही कहानी बताता है।

अयोध्या में दीपोत्सव पर बजा रहे थे- राम आएँगे तो अँगना… रईस खान के खानदान ने कर दिया हमला: कहा- मादर$द तुम बड़े रामभक्त हो गए हो

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक रामभक्त मुस्लिम परिवार पर दूसरे मुस्लिम परिवार ने हमला कर दिया। घटना शुक्रवार (1 नवंबर 2024) की है। पीड़ित का नाम अनीस खान उर्फ बबलू है।

आरोपों के अनुसार अनीस खान अपने कार्यालय में दीपोत्सव मनाते हुए भगवान राम का भजन सुन रहे थे। इसी दौरान रईस खान के खानदान के लोगों ने हमला कर दिया। हमले में कुल्हाड़ी और लाठी-डंडों के अलावा बंदूक का भी प्रयोग किया गया। आरोपितों को गिरफ्तार कर पुलिस ने जेल भेज दिया है।

यह घटना अयोध्या कोतवाली थाना क्षेत्र की है। शुक्रवार को अनीस खान ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत में उन्होंने खुद को रामभक्त बताया है। कहा है कि भगवान राम के मंदिर का समर्थक होने की वजह से उनको कई बार विदेशों से भी मौत की धमकियाँ मिल चुकी है। घटना का जिक्र करते हुए अनीस खान ने बताया है कि शुक्रवार को उनके कार्यालय में दीपोत्सव का कार्यक्रम था। रात 8:30 से 8:45 के बीच उनके कार्यालय में ‘राम आएँगे तो अँगना…’ वाला भजन बज रहा था।

अनीस खान के मुताबिक इस दौरान रिश्ते में उसका भाई रईस अपने 2 बच्चों जावेद और कैफ के साथ वहाँ आ धमका। इन सभी के हाथों में बंदूक, कुल्हाड़ी और लाठी-डंडे थे। इन तीनों ने अनीश से कहा, “मादर$द, तुम बड़े रामभक्त हो गए हो।” इतना कह कर तीनों ने अनीस के घर वालों पर हथियार तान दिए।

हमले से बचने के लिए अनीस ने खुद को परिवार सहित घर में बंद कर लिया। इसके बाद हमलावरों ने घर का दरवाजा तोड़ डाला और अनीस के साथ उनके बेटे अदनान, अयान और आसिफ को बेरहमी से पीटा। पीड़ित मोहम्मद अनीस ने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने अनीस की शिकायत पर रईस, जावेद और कैफ के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115 (2), 352, 109 (2), 333 और 324 (4) के तहत कार्रवाई की गई है।

ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। वहीं एक वीडियो बयान में अनीस खान उर्फ बबलू ने बताया है कि दीपोत्सव के समय वे अपने कुछ मित्रों के साथ ‘राम आएँगे तो अँगना…’ वाला सुन रहे थे। इसी ख़ुशी में अनीस का एक साथी नाचने लगा। ये रईस और उसके परिवार को नागवार गुजरा। उन्होंने पहले सबको गालियाँ दीं और बाद में अनीस के परिजनों को पीटा। DSP अयोध्या आशुतोष तिवारी ने बताया कि मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

खालिस्तानियों ने किया हमला, पर कनाडा की पुलिस ने हिंदुओं को ही पीटा: छड़ी-मुक्का मारते वीडियो वायरल, बच्चों का भी गला दबोचा

कनाडा में हिंदू मंदिर पर खालिस्तानी हमला किए जाने के बाद कनाडाई पुलिस का चेहरा उजागर हुआ है। कुछ वीडियोज सामने आई हैं जिसमें घटनास्थल पर खड़े हिंदू आरोप लगा रहे हैं कि पुलिस ने उन खालिस्तानियों के साथ कुछ नहीं किया जिन्होंने हमला किया उलटा हिंदुओं पर ही छड़ी मारनी शुरू कर दी।

इस वीडियो को कनाडाई पत्रकार डेनियर बोर्डमैन ने साझा किया है। ट्वीट के मुताबिक, ये वीडियो 3 नवंबर वाली घटना का है जब सरे में हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया। डेनियर वीडियो शेयर करते हुए बताते हैं कि कनाडाई पुलिस भीड़ में जाकर हिंदुओं को धक्का दे रही है और उन खालिस्तानियों को बचा रही है जो दीवाली पर हिंदू श्रद्धालुओं को निशाना बनाने आए थे।

वीडियो में देख सकते हैं कि हिंदुओं के सिर पर मुक्के मारे जा रहे हैं और उन्हें लाठी से पीटा जा रहा है। कुछ पुलिस अधिकारी हिंदुओं को बचाने की बजाय उन्हीं पर आगे बढ़कर हमले कर रहे हैं वहीं कुछ पुलिस अधिकारी शांत खड़े हैं और विरोध करने वाले हिंदुओं को पीछे ढकेल रहे हैं।

इस पूरे वाकये को एक हिंदू महिला ने रिकॉर्ड किया है। वीडियो में वह उस पुलिस अधिकारी की ओर इशारा भी कर रही है और दिखा रही है कि इसी अधिकारी ने हिंदू को मारा है। महिला कहती है कि छड़ी से उन लोगों पर हमले किए गए और खालिस्तानियों को कुछ भी नहीं कहा गया।

वीडियो में लोगों के चिल्लाने और रोने की आवाजे भी आ रही है मगर फिर भी कना़डाई पुलिस को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। एक वीडियो में तो तीन पुलिसकर्मी बच्चे का गला दबोचकर उसे जमीन पर लिटाए हुए हैं और फिर उसका हाथ मोड़ रहे हैं। पीछे से आवाज सुनाई पड़ रही है- उसे कुछ मत करो वो एक बच्चा है।

एक अन्य वीडियो में दावा है कि सरे में कनाडाई पुलिस हिंदुओं का रास्ता रोककर खड़ी हो गई थी। ऐसे में पूछा जा रहा है कि क्या खालिस्तानी और कनाडाई पुलिस मिलकर हिंदुओं पर अत्याचार कर रहे हैं।

कुछ वीडियो में मंदिर में आए लोगों को ही कनाडाई पुलिस उठाकर कार में डालती दिख रही है जिसे देख लोगों ने पूछा कि जब हमला हिंदू मंदिर पर हुआ तो ये खालिस्तानियों की जगह हिंदुओं को क्यों पकड़ा जा रहा है। ये भेदभाव नहीं तो क्या है। लोगों ने पूछा ‘क्या- ये खालिस्तानी पुलिस है?’ पीछे से आवाज सुनाई पड़ी है कि एक व्यक्ति पंजाबी में कनाडाई पुलिस की कार्रवाई के लिए उ्हें धन्यवाद दे रहा है।

इन सारी घटनाओं को रिपोर्ट करते हुए कहा, कनाडाई पत्रकार डैनियल बोर्डमैन कहते हैं, “हाल ही में हुआ हमला भयानक है…इसने नई सीमाएँ लांघ दी हैं…यह इस देश में हिंदू भक्तों पर पहला दिनदहाड़े हमला है। पुलिस की प्रतिक्रिया घृणित थी…इसे पूरी तरह से रोका जा सकता था…हम कनाडा में इसे हर समय देखते हैं, जहाँ पुलिस अपने मन से कार्रवाई करती है। कनाडाई सरकार बिलकुल नहीं सुनती।”

बता दें कि कनाडा में खालिस्तानी हमले लगातार बढ़ रहे हैं। कल पहले खबर आई कि सरे में हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया, फिर पता चला कि ब्रैम्पटन में भी अटैक हुआ है। दोनों घटनाओं की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है।

ट्रक में भरकर गोवंश मेवात ले जा रहे थे तस्कर, राजस्थान पुलिस ने रोका तो बरसाई गोलियाँ: जवाबी कार्रवाई के बाद भागे, सर्च ऑपरेशन में मिले 100+ गोवंश

राजस्थान के भरतपुर जिले में गोतस्करों और पुलिस के बीच रविवार (3 नवंबर 2024) की रात मुठभेड़ हो गई। इसके बाद तस्कर ट्रक छोड़ भाग गए। इस दौरान मौके पर गोरक्षा दल के सदस्य भी मौजूद थे। इन सभी ने मिलकर 25 से 30 गोवंश बचाए। इन्हें काटने के लिए मेवात ले जाया जा रहा था।

फरार तस्करों की तलाशी के दौरान पुलिस ने रात भर सर्च ऑपरेशन चलाया। तस्कर पकड़ में नहीं आए। लेकिन 100 से अधिक गोवंश बरामद किए हैं। इन सभी को गोशाला में भिजवा दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना भरतपुर के चौकी झील इलाके की है। रविवार रात लगभग 12:30 पर गोरक्षा दल से जुड़े लोगों ने QRT (क्विक रेस्पॉन्स टीम) को गोतस्करी की सूचना दी। इस सूचना पर पुलिस की अलग-अलग टीमों का गठन हुआ। पुलिस को बताया गया कि गोतस्कर खोहरा बछेना गाँव के जंगलों से ट्रक ले कर गुजरेंगे। पुलिस टीम ने घेराबंदी की तो सूचना सही पाई गई।

गोरक्षा दल के सदस्यों द्वारा बताई गई ट्रक आई तो पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की। इस पर ट्रक चालक ने पुलिस पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की। रात में अँधेरे में दोनों तरफ से लगभग 7 राउंड फायरिंग हुई। इसके बाद गोतस्कर ट्रक छोड़ भाग निकले। ट्रक में लगभग 20 से 25 गोवंश मिले। माना जा रहा है कि इन्हें मेवात ले जाया जा रहा था।

पुलिस टीम ने फरार गोतस्करों की तलाश में रात भर सघन अभियान चलाया। कई घंटों की तलाशी के बाद एक भी गोतस्कर हाथ नहीं लगा। हालाँकि इसी तलाशी में लगभग 100 जीवित गोवंश मिले। सभी गोवंशों को बरामद कर बयाना की रुदावल श्रीकृष्ण गोशाला और भरतपुर की इकरन गोशाला भेज दिया गया है। पुलिस के अनुसार गोवंश अधिनियम, पुलिस टीम पर फायरिंग करने और राजकार्य में बाधा डालने का केस दर्ज किया जाएगा।

12 हजार मौतों से वे 72 साल पहले सीख गए, हम कितनी पीढ़ियों की साँसों में धुआँ भरकर सीखेंगे? पटाखे-पराली से अधिक दिल्ली के बकैत सत्ताधीश घोंट रहे दम

दिल्ली की स्थिति बढ़ते प्रदूषण के कारण बदहाल हैं। ठंड से पहले आसमान में कोहरे की परत है जिसके संपर्क में आते ही आँखों में जलन और साँस लेने की तकलीफ होने लगती है।

हर रोज राजधानी का बढ़ता AQI नए रिकॉर्ड बना रहा है। आनंद विहार में तो आज AQI ने 600 का आँकड़ा पार कर लिया था। वहीं बवाना में ये आज सुबह 406 के आसपास था।

दिल्ली सरकार और उसके मंत्री हर साल कहते हैं कि वो प्रदूषण कंट्रोल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और जल्द स्थिति बेहतर होगी… लेकिन हकीकत यह है कि अगर प्रयास वाकई हो रहे होते तो पिछले 10 वर्षों में AQI का ग्राफ लगातार बढ़ नहीं रहा होता और न दिल्ली के हालात इतने गंभीर होते।

AQI.IN साइट के अनुसार दिल्ली में 4 नवंबर की सुबह दिल्ली का AQI 400 पार था और खबर लिखने तक प्रदूषण मामले में सबसे खराब स्थिति वाले शहरों में दिल्ली नंबर 1 पर आ गया है।

ऐसे गंभीर हालातों में दिल्ली सरकार एक्शन लेने के नाम पर दीवाली में पटाखों पर बैन लगाने जैसी कार्रवाई कर रही है या फिर दूसरे राज्य की सरकारों पर सारे प्रदूषण का ठीकरा फोड़ रही है। मगर इसका स्थायी निवारण क्या है इस पर कोई बात नहीं हो रही। अगर दीवाली पर फूटे पटाखों को दिल्ली के बढ़े प्रूषण का कारण मानते हैं तो फिर आपको 28 अक्तूबर (जब देश में दीवाली नहीं मनाई गई थी) का रिकॉर्ड देखना चाहिए। 28 अक्तूबर 2024 को दिल्ली का औसत एक्यूआई 356 रिकॉर्ड किया गया था जबकि दीवाली के अगले दिन औसत AQI 351 था।

इन दो आँकड़ों से ये बात तो स्पष्ट है कि पटाखे फोड़ने से वायु प्रदूषण होता जरूर है मगर इसका सीधा असर दिल्ली में बढ़ते AQI से बिलकुल नहीं है। क्योंकि अगर ऐसा होता तो दिल्ली में सामान्य दिन की आबो हवा से दीवाली की अगली सुबह में फर्क होता।

2018 से 2023 का हर महीने का AQI

खैर! हर वर्ष दीवाली से पहले शायद पटाखे बैन करके आम आदमी पार्टी को ऐसा लगता हो कि वो युद्ध स्तर पर AQI कंट्रोल करने में लगे हुए हैं। जबकि रिजल्ट देख लगता है कि सरकार दिल्ली की हालत को सुधारने की जगह उसमें ढिलाई दिखाने में लगी हैं।

कभी इसी सरकार ने स्वच्छता के मायनों में दिल्ली को लंदन जैसा बनाने की बात कही थी, मगर लापरवाही देख यह लगता है कि दिल्ली को लंदन-पेरिस बनाने के सपने देखने वाली सरकार ने लंदन को देख कुछ नहीं सीखा। अगर सीखा होता तो आज दिल्ली में दमघोंटू हवा नहीं चल रही होती।

1952 में लंदन में ऐसे ही प्रदूषण से इकट्ठा हुआ स्मॉग दिखाई दिया था। 4 दिन में इस कोहरे ने 2 लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित किया था और 12000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। उस घटना ने लंदन को उनके पर्यावरण को लेकर सतर्क कर दिया और उसके बाद कभी वैसा धुआँ या कोहरा लंदन पर नहीं देखा गया। वहाँ ‘राइट टू क्लीन एयर’ कानून बना और लंदन समेत सभी यूरोपीय देशों ने वाकये से सीख ली।

वहीं दिल्ली में हालात साल दर साल बदतर हो रहे हैं। शोध के नजरिए से देखें तो इसके कई कारण हैं जैसे जनसंख्या वृद्धि के कारण दिल्ली में बढ़ते वाहन और उनसे निकलने वाला धुआँ, औद्योगिक गतिविधियाँ, निर्माण कार्य, जलवायु परिवर्तन, पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की संख्या आदि। अब दिल्ली सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए क्या कर रही है? इस पर कहीं कुछ स्पष्टता से नहीं बताया जा रहा है। लेकिन राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप लगातार जारी हैं। एक तरफ खबरों में आता है कि पराली जलाने का 93% प्रदूषण पंजाब से आता है तो सीएम आतिशी प्रेस के सामने दावा करती हैं कि उनकी सरकार आने के बाद पंजाब में पराली जलाने की संख्या कम हुई है।

ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली की आबो-हवा सुधारने से ज्यादा बड़ा मुद्दा अपनी पार्टी की छवि सुधारने का है। हर बार एक्शन पर बात करने की जगह किसी अन्य राज्य पर सारा ठीकरा फोड़ना AAP की आदत हो गई है।

ये बात सभी जानते हैं कि अगर प्रदूषण इतना बढ़ा है और हवा इतनी खराब हुई है तो प्रशासन शांति से नहीं बैठेगा। मगर सवाल यहाँ ये है कि जो कार्य दिल्ली सरकार प्रदूषण रोकने के लिए कर रही है… क्या वे काफी हैं या इसमें सख्ती की जरूरत और है। अगर जवाब ‘हाँ’ है तो सवाल उठता है कि अगर अभी तक उठाए कदम पर्याप्त हैं तो फिर बीते सालों में ठंड आते ही बढ़ने वाले प्रदूषण में फर्क क्यों नहीं दिखा और अगर जवाब ‘नहीं’ है तो फिर सवाल ये है कि बावजूद ये जानने के कि इनसे दिल्ली की हवाल नहीं सुधर रही या आगे कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। क्या सिर्फ दूसरे राज्यों पर प्रदूषण का ठीकरा फोड़ने से दिल्ली की हालत सुधर जाएगी।

गौरतलब है कि मीडिया में अलग-अलग जगह से जानकारियाँ इकट्ठा करने पर पता चलता है प्रदूषण रोकने के लिए दिल्ली में GRAP-1 को लागू किया गया है। इसके अलावा प्रदूषण करने वाले वाहनों पर कार्रवाई हो रही है और साथ ही धूल को नियंत्रित करने के लिए मैकेनिकल रोड स्विपिंग मशीनें, पानी छिड़कने वाली मशीनें और एंटी स्मॉग गन का उपयोग किया जा रहा है।