अभिनेता विक्रांत मैसी के साथ 10 नवंबर 2024 के एक पॉडकास्ट में पत्रकार शुभंकर मिश्रा ने बताया कि कैसे मुख्यधारा का मीडिया किसी घटना के इर्द-गिर्द नैरेटिव गढ़ता है, जो घटना या इसमें शामिल लोगों के बारे में धारणा को प्रभावित करता है। मिश्रा ने खुलासा किया कि साल 2019 में जिस टेलीविजन न्यूज चैनल में वे रिपोर्टर के रूप में काम थे, उसने सूरत कोचिंग अग्निकांड को कवर करने के लिए भेजा था।
शुभंकर मिश्रा ने बताया कि न्यूज चैनल की ओर से उन्हें पीड़ितों में से एक के घर जाने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही इस घटना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराते हुए बाइट (बयान) लेने के लिए कहा गया था। बता दें कि सूरत के इस कोचिंग अग्निकांड में 22 लोगों की जान चली गई थी। इसको लेकर बड़े पैमाने पर विवाद हुआ था।
आग लगने की यह घटना 24 मई 2019 को सूरत के जगतनाका स्थित व्यवसायिक केंद्र में स्थित एक कोचिंग सेंटर में हुई थी। यह आग एयर कंडिशन (AC) में शॉर्ट सर्किट होने के कारण लगी थी। घटना में बाहर निकलने का रास्ता ब्लॉक हो गया था, जिसके कारण छात्र-छात्राएँ वहाँ फँस गए थे। उस बिल्डिंग में अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन भी नहीं किया जा रहा था और ना ही भवन के पास सर्टिफिकेट था।
मिश्रा ने कहा, “जिस समय यह घटना हुई, उस समय मैं सूरत में था। आग से बचने के लिए छात्र-छात्राएँ बिल्डिंग के कूद रहे थे। उस समय लड़कियों के इमारत से कूदने के कई परेशान करने वाले वीडियो सामने आए थे। इसकी मैंने वहाँ से दो दिनों तक रिपोर्टिंग की थी। इस घटना के बाद बिल्डिंग को सील कर दिया गया था और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद मामला खत्म हो गया था।”
उन्होंने आगे कहा, “दो दिनों के बाद अहमदाबाद में एक बड़े नेता की रैली थी। मैंने अपने एडिटर से पूछा कि क्या मैं वहाँ जाऊँ, क्योंकि यहाँ पर बिल्डिंग को सील हो गया और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है? मेरे एडिटर ने कहा कि नहीं। जब सारी दुनिया रैली की लाइव टेलिकास्ट कर रही है तो तुम हादसे के पीड़ित के घर जाओ और किसी बच्चे को पकड़कर बाइट लो कि ‘मोदी अंकल आपने ये क्या करवा दिया, मेरी बहन लौटा दो’?”
हालाँकि, शुभंकर मिश्रा ने किसी समाचार चैनल या संपादक का नाम नहीं लिया, लेकिन मिश्रा की लिंक्डइन प्रोफ़ाइल और सूरत कोचिंग आग की घटना के कवरेज के पुराने वीडियो बताते हैं कि उस समय वे टीवी9 भारतवर्ष में काम कर रहे थे। नेटिज़न्स का अनुमान है कि जिस संपादक ने पीएम मोदी के खिलाफ बाइट लेने के लिए कहा होगा वह विनोद कापड़ी या अजीत अंजुम हो सकते हैं।
अजीम अंजुम और विनोद कापड़ी ने साल 2019 में टीवी9 भारतवर्ष में काम किया था। दोनों पीएम मोदी से नफरत करने के लिए जाने जाते हैं। इस तरह का निर्देश देने वाले संपादक का नाम जानने के लिए ऑपइंडिया ने शुभंकर मिश्रा से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो पाई। उनसे बाचती होने के बाद इस खबर को अपडेट किया जाएगा।
लड़के से ट्रांसजेंडर महिला बनी संजय बांगर की बेटी अनाया बांगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना चाहती है। वह पूर्व में एक पुरुष थी और उसका नाम आर्यन बांगर था। अनाया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने ट्रांस महिला बनने की कहानी साझा की है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को लेकर अपनी खीझ को साझा किया है। अनाया 2023 में हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के जरिए ट्रांस महिला बनी है। इससे पहले वह आर्यन के रूप में क्रिकेट खेला करती थी।
अनाया के क्रिकेट खेलने के सपने पर ट्रांस महिला बनने के बाद विराम लग गया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) और इंग्लैंड & वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) के नियमों के अनुसार, कोई भी ट्रांस महिला, महिला क्रिकेट में भाग नहीं ले सकती है। अनाया ने हाल ही में एक वीडियो डाला था, जिसमें उन्होंने अपनी ट्रांस महिला बनने से पहले के फोटो डाले थे जिनमें वह कई क्रिकेटर के साथ दिखती हैं। इसमें उन्होंने क्रिकेट खेलने को लेकर बात की थी। यह वीडियो अब डिलीट हो चुका है।
Sanjay Bangar's son undergoes harmone replacement surgery.
हाल ही में इंस्टाग्राम पर अनाया द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में, उन्होंने बताया कि HRT के 11 महीनों के दौरान उनके शरीर में कई बदलाव आए हैं। अनाया का दावा है कि इससे उन्हें काफी ख़ुशी मिली है और उनका डिस्फोरिया भी खत्म हो गया है। डिस्फोरिया एक ऐसी अवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति महसूस करता है कि वह गलत शरीर में है और उसे अपना लिंग बदलने की जरूरत है। अनाया ने कहा है कि उन्हें अब इससे छुटकारा मिल रहा है।
उन्होंने एक और रिपोर्ट साझा की, जिसमें ECB द्वारा ट्रांस महिलाओं को क्रिकेट से रोका गया है। अनाया ने इस पोस्ट में लिखा, “ट्रांस-एथलीट होना काफी कठिन है।”
अगस्त 2024 में एक पोस्ट में अनाया ने बताया था कि वह कैसे क्रिकेट से अलग हो गई हैं। इस पोस्ट में लिखा था, “छोटी उम्र से ही क्रिकेट हमेशा मेरी जिन्दगी का हिस्सा रहा है। बड़े होते हुए, मैंने अपने पिता को देश के लिए खेलते देखा और साथ ही उनकी कोचिंग भी देखी। मैंने उनके नक्शेकदम पर चलने की ठानी थी। खेल के प्रति उनका जुनून, अनुशासन और समर्पण मेरे लिए बहुत प्रेरणादायक था। क्रिकेट ही मेरा प्यार, मेरी महत्वाकांक्षा और मेरा भविष्य बन गया था।”
Sanjay Bangar's son undergoes harmone replacement surgery.
अनाया ने आगे लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन मुझे भी उनके जैसे अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलेगा। उन्होंने लिखा था कि उन्हें क्रिकेट छोड़ना पड़ेगा और अब वह एक अलग सच्चाई का सामना कर रही हैं। अनाया ने कहा था कि उनका प्यारा खेल अब उनसे दूर हो रहा है। अनाया ने क्रिकेट नियमों को लेकर लिखा, “ऐसा लगता है कि सिस्टम मुझे बाहर कर रहा है, इसलिए नहीं कि मुझमें प्रेरणा या प्रतिभा की कमी है, बल्कि इसलिए कि नियम मेरी वास्तविकता को नहीं समझ पाए हैं।”
क्या हैं ट्रांस लोगों को लेकर ICC के नियम?
ICC ने पहले ट्रांस महिलाओं को महिला क्रिकेट में भाग लेने की अनुमति दी थी। 29 वर्षीय डेनियल मैकगेही 2023 की शुरुआत में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में खेलने वाली पहली ट्रांसजेंडर खिलाड़ी थीं। हालाँकि, उनकी भागीदारी पर काफी विवाद हुआ और इसके बाद ICC ने नवम्बर 2023 में नए नियम लागू कर दिए। इनके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो कि पुरुष के तौर पर युवा हुआ है और बाद में महिला बना है, महिलाओं के क्रिकेट में भाग नहीं ले सकता। ऐसे ही नियम ECB ने लागू किए थे। अनाया इंग्लैंड में ही खेलती थीं।
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि झारखंड में जनजातीय लड़कियों को फंसा कर निकाह करने वाले घुसपैठियों को जमीन नहीं लेने दी जाएगी। गृह मंत्री शाह ने राज्य में भाजपा सरकार आने पर इसको लेकर कानून बनाने का वादा किया है। गृह मंत्री ने इसी के साथ घुसपैठियों को राज्य से भगाने का भी वादा किया है।
झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार करते हुए सरायकेला में अमित शाह ने यह वादा किया है। अमित शाह ने कहा कि राज्य में जनजातीय बच्चियों से शादी करके जमीनें हड़पने का षड्यंत्र चल रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में भाजपा सरकार बनने पर कानून लाया जाएगा कि शादी के बाद भी महिला की जमीन घुसपैठिए के नाम ट्रांसफर नहीं होगी।
Tamar, Jharkhand: Union Home Minister Amit Shah says, "…We will introduce laws ensuring that land grabbed under the pretext of marriage cannot be claimed by infiltrators. Any such land will be returned. Trust us; we deliver on our promises…" pic.twitter.com/4aZoxTTKli
अमित शाह ने यहाँ यह भी वादा किया कि जो जमीन पहले घुसपैठिए कब्जा चुके हैं, उसे भी कमिटी बनाकर खाली करवाया जाएगा और इन घुसपैठियों को बाहर भगाया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन की कुर्सी घुसपैठ के खिलाफ काम करने के चलते गई।
सरायकेला में अमित शाह ने यह भी आरोप लगाया कि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार घुसपैठियों को बढ़ावा देने में मदद कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार घुसपैठियों को संरक्षण दे रही है। गृह मंत्री अमित झारखंड के लोगों से वादा किया कि वह सभी घुसपैठियों को सरहद के उस पर डालने का काम भाजपा करेगी।
झारखंड में घुसपैठ को बढ़ावा देने वाली JMM के जाते ही प्रदेश से एक-एक घुसपैठिया बाहर होगा और जनजातीय माताओं-बहनों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। झारखंड की जनता प्रदेश में परिवर्तन कर जनजातीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए संकल्पित भाजपा को लाने जा रही है। सरायकेला के… pic.twitter.com/Qs0WsfWPZv
अमित शाह ने यहाँ जनजातियों के आरक्षण का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस मुस्लिमों को आरक्षण देने का विचार बना रही है जो ओबीसी, जनजाति और SC का आरक्षण काट कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह किसी का आरक्षण कम नहीं होने देंगे।
चम्पई सोरेन के इस्तीफे को अमित शाह ने पूरे जनजातीय समुदाय का अपमान करार दिया है। अमित शाह ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य की हेमंत सोरेन सरकार घोटालों में लिप्त है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राज्य सरकार पर घुसपैठियों को शह देने का आरोप लगाया था।
गौरतलब है कि आजतक ने भी मार्च, 2024 में एक रिपोर्ट में बताया था कि बांग्लादेशियों को झारखंड में गरीब जनजातीय लड़कियों को फँसाने का टार्गेट मिला हुआ है। इसके बाद उनसे निकाह करवाया जाता है और फिर जमीन हड़प ली जाती है। आजतक की रिपोर्ट में बताया गया था कि कहीं-कहीं निकाह करके मुखिया पद पर तक कब्जा जमाया गया है।
राजस्थान के झुंझनू में रफीक उर्फ अली खान नाम के मुस्लिम ‘आलिम’ को गिरफ्तार किया गया है। उसके ऊपर महिलाओं को बरगलाकर उनका शरीरिक शोषण करने का आरोप है। रिपोर्ट्स में बताया गया कि रफीक पहले भूत-प्रेत का डर दिखाकर उन्हें झांसे में लेता, फिर बाद में उन्हें निशाना बनाता था। पुलिस ने एक पीड़िता की शिकायत मिलने के बाद उसे गिरफ्तार किया है।
जाँच में सामने आया है कि बंगाल का रहने वाला रफीक पहले लड़कियों को बहलाकर उनसे उनके सारी जानकारी लेता था फिर उनका शारीरिक और आर्थिक शोषण करता था। पड़ताल में पता चला कि युवतियों और महिलाओं को निशाना बनाने वाले रफीक की पहले से दो बीवियाँ हैं। वह अपने साथ हमेशा हड्डियाँ रखता था ताकि किसी को भी बेवकूफ बना सके।
गौरतलब है कि जहाँ इस रिपोर्ट में साफ तौर पर बताया गया है कि महिलाओं का शोषण करने वाले का नाम रफीक उर्फ अली खान है तो वहीं मीडिया इस मामले को रिपोर्ट करते हुए उसे ‘तांत्रिक’ बता रही है और तंत्र-मंत्र जैसे शब्दों का प्रयोग कर रही है। इसके अलावा हेडलाइन में भी उसने बंगाली बाबा लिखा हुआ है।
नवभारत टाइम्स का स्क्रीनशॉट
मालूम हो कि ये तांत्रिक, तंत्र-मंत्र, बाबा… ये सारे वो शब्द हैं जो हिंदू धर्म से संबंधित हैं। अन्य मजहब में ऐसे झाड़-फूँक काम करने वालों के लिए अलग शब्द होते है और इसलिए सालों से दक्षिणपंथी किसी मुस्लिम आलिम के अपराधी होने पर तांत्रिक शब्द के इस्तेमाल का विरोध करते रहे हैं। लेकिन बावजूद इन विरोधों के मीडिया बाज हीं आया।
पत्रिका का स्क्रीनशॉट
अब भी जिन शब्दों का लेना-देना हिंदू धर्म से है उनका इस्तेमाल किसी दूसरे मजहब के लोगों के अपराध को बताने के लिए किया जाता है। ये पहली बार नहीं है जब मीडिया ने ऐसी हरकत की हो। बीते समय में तमाम ऐसे मामले आए हैं जिन्हें ऑपइंडिया ने समय-समय पर रिपोर्ट किया है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार में वक्फ एवं आवासन मंत्री जमीर अहमद खान ने केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी पर नस्लीय टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘कालिया कुमारस्वामी’ कहा है। इसको लेकर जनता दल (सेक्युलर) या JDS ने मंत्री का इस्तीफा माँगा है। वहीं, हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ टिप्पणी करने के एक मामले में राज्यपाल ने जमीर के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है।
यह घटना एक चुनावी रैली की है। रामनगर में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए जमीर अहमद ने कहा कि चन्नपटना से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार सीपी योगीश्वर पार्टी के अंदरूनी मतभेदों के कारण भाजपा में शामिल हो गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि योगीश्वर ने JDS में शामिल होने से परहेज किया, क्योंकि उन्हें ‘कालिया कुमारस्वामी’ भाजपा से ज़्यादा ख़तरनाक लगे।
जमीर अहमद ने इस दौरान एक तस्वीर भी दिखाई। इसके साथ ही एक ऑडियो क्लिप चलाई, जिसमें कथित तौर पर कुमारस्वामी कह रहे थे, “मेरी राजनीति मुस्लिम वोटों पर निर्भर नहीं है। मैं यह स्पष्ट कर रहा हूँ। मुझे हिजाब या पजामा की ज़रूरत नहीं है।” अब लोगों का कहना है कि कुमारस्वामी की रंगत काला होने के कारण जमीर अहमद ने जानबूझकर नस्लीय टिप्पणी की है।
जमीर अहमद के इस बयान को लेकर जेडीएस ने प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया साइट X पर जेडीएस ने लिखा, “एचडी कुमारस्वामी के खिलाफ ज़मीर अहमद की अपमानजनक और नस्लीय टिप्पणी की देश कड़ी निंदा करता है। इस प्रकार की घृणित भाषा राजनीतिक विमर्श में नई गिरावट का प्रतीक है और सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं है।”
भाजपा नेता किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर लिखा, “मैं कॉन्ग्रेस के मंत्री ज़मीर अहमद द्वारा केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कुमारस्वामी को ‘कालिया कुमारस्वामी’ कहने की कड़ी निंदा करता हूँ। यह एक नस्लवादी टिप्पणी है, ठीक उसी तरह जैसे राहुल गाँधी के सलाहकार ने दक्षिण भारतीयों को अफ्रीकी, उत्तर पूर्व को चीनी, उत्तर भारतीयों को अरब जैसा बताया था।”
The nation vehemently condemns the disgraceful and racially charged remarks by Zameer Ahmed against HD Kumaraswamy. This kind of hateful language marks a new low in political discourse and has no place in a civilized society. We demand accountability from leaders who choose… https://t.co/teH4kZbzmN
इस सीट से कुमारस्वामी के बेटे निखिल कुमारस्वामी मैदान में हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस ने सीपी योगेश्वर को मैदान में उतारा है। इस सीट पर डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार और एचडी कुमारस्वामी, दोनों की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है। दोनों ही वोक्कालिगा समुदाय आते हैं और दोनों ही अपने समुदाय को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि इस सीट पर 13 नवंबर को वोट डाले जाएँगे।
झारखंड और महाराष्ट्र के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी सियासी पारा चढ़ा हुआ है। यूपी की 9 विधानसभा सीटों पर वर्तमान में उपचुनाव चल रहा है। इनमें से अधिकांश सीटें विधायकों के सांसद बनने के कारण खाली हुई हैं। यह उपचुनाव सत्ताधारी भाजपा के लिए एक मौके की तरह सामने आया है।
यूपी की जिन सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, उनमें से आधे से ज्यादा भाजपा पिछले चुनावों में नहीं जीत पाई थी। इसके अलावा यह उपचुनाव, लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को सही करने का एक मौका भी होगा। हाल ही में इन उपचुनाव के लिए वोटिंग की तारीख भी बदली गई है। इससे पहले 13 नवम्बर, 2024 को इन सीटों के लिए मतदान होना था जबकि अब यह 20 नवम्बर को होगा।
पिछली बार क्या था हाल, इस बार कौन आगे?
गाजियाबाद: यूपी उपचुनाव में महानगर गाजियाबाद की सदर सीट भी शामिल है। यह सीट भाजपा के विधायक अतुल गर्ग के सांसद बनने के चलते खाली हुई है। इस सीट पर भाजपा ने संजीव शर्मा को अब टिकट दिया है। सपा ने उनके सामने राज सिंह जाटव को उतारा है। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहाँ बम्पर वोट बटोरे थे।
यहाँ भाजपा को 60% से अधिक वोट मिले थे। वहीं सपा के विशाल वर्मा को मात्र 18% जबकि बसपा के कृष्ण कुमार तीसरे नम्बर पर 13% वोट के साथ थे। भाजपा के लिए गाजियाबाद की सीट ज्यादा कठिन नहीं लग रही। बसपा ने यहाँ परमान्द गर्ग को उम्मीदवार बनाया है लेकिन भाजपा सांसद अतुल गर्ग के प्रभाव के चलते वैश्य वोट पर फर्क की बड़ी संभावना नहीं दिखती।
मीरापुर: मुजफ्फरनगर जिले की मीरापुर सीट पर भी उपचुनाव हो रहा है। यह सीट भी रालोद के विधायक चंदन चौहान के बिजनौर लोकसभा सीट से सांसद बनने के कारण खाली हुई है। यहाँ 2022 में भाजपा को हार झेलनी पड़ी थी। तब रालोद, सपा के साथ गठबंधन में थी।
भाजपा यहाँ तब दूसरे नम्बर पर रही थी और उसे लगभग 37% वोट मिले थे। इस बार के उपचुनाव में यह सीट भाजपा ने रालोद को ही दी है। रालोद ने यहाँ से मिथिलेश पाल जबकि सपा ने सुम्बुल राणा को टिकट दिया है। वह पूर्व बसपा सांसद कादिर राणा की बहू हैं। बसपा ने यहाँ शाहनजर को टिकट दिया। ऐसे में यहाँ मुस्लिम वोट बंट सकता है जिससे RLD फायदे में रहेगी।
कुंदरकी: यूपी उपचुनाव में मुरादाबाद जिले की कुंदरकी विधानसभा भी हॉट सीट है। यह सीट सपा विधायक जिया उर रहमान के संभल से सांसद बनने के चलते खाली हुई है। इस सीट पर भाजपा को 2022 चुनाव में हार झेलनी पड़ी थी। भाजपा उम्मीदवार कमल कुमार को 30% वोट मिले थे।
कुंदरकी सीट पर भाजपा ने रामवीर सिंह ठाकुर को उतारा है जबकि उनके सामने सपा के हाजी रिजवान हैं। यह सीट मुस्लिम बहुल है। यहाँ पर लगभग 60% से अधिक आबादी मुस्लिम है। यहाँ बसपा ने रफतउल्ला को उतारा है। भाजपा यहाँ अभी टक्कर ले रही है। यदि मुस्लिम वोटों में बिखराव होता है, तो भाजपा यह सीट जीत भी सकती है।
खैर: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा बृज क्षेत्र में अलीगढ़ जिले की खैर सुरक्षित सीट पर भी उपचुनाव होना है। खैर सीट पर 2022 में भाजपा ने जीत हासिल की थी। 2022 में जीतने वाले अनूप प्रधान वाल्मीकि अब सांसद बन चुके हैं। भाजपा ने इस बार सुरेन्द्र सिंह दिलेर जबकि सपा ने चारू कैन को उतारा है। बसपा ने यहाँ डॉ पहल सिंह को उतारा है।
इस सीट पर भाजपा मजबूत दिख रही है। पिछले चुनाव में भी उसे 50% से अधिक वोट मिले थे। यहाँ जाट समुदाय के वोट अहम हैं। भाजपा के साथ इस चुनाव में RLD है जिसके कारण भाजपा को फायदा हो सकता है। इस सीट पर सपा-बसपा के बीच वोटों का बंटवारा भाजपा को और भी बढ़त दिला सकता है।
करहल: मैनपुरी जिले की करहल सीट भी विधायक अखिलेश यादव के सांसद बनने के कारण खाली हुई है। यह सीट सपा का गढ़ रही है। 2022 विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने यहाँ से मंत्री एसपी सिंह बघेल को उतारा था। वह इस सीट पर ठीकठाक वोट पाने में सफल रहे थे।
यहाँ लड़ाई परिवार के भीतर ही है। भाजपा ने अनुजेश यादव जबकि सपा ने परिवार से ही तेजप्रताप यादव को उतारा है। दोनों के बीच फूफा-भतीजे का रिश्ता है। भाजपा इसके चलते यादव वोट में सेंध लगाना चाहती है। उसे गैर यादव वोट में अच्छी बढ़त हासिल है। दोनों फैक्टर अगर काम कर गए तो यहाँ इतिहास बदल भी सकता है।
सीसामऊ: यूपी उपचुनाव में कानपुर की सीसमाऊ सीट भी शामिल है। यह सीट सपा विधायक इरफ़ान सोलंकी की विधायकी रद्द होने के चलते खाली हुई है। इरफ़ान सोलंकी की पत्नी नसीम सोलंकी यहाँ से सपा की उम्मीदवार हैं। भाजपा ने नसीम सोलंकी के सामने सुरेश अवस्थी को उतारा है। अवस्थी 2017 में इरफ़ान के हाथों मात्र 5500 वोट से हारे थे।
इस सीट पर वीरेंद्र कुमार शुक्ला को उतारा है। बसपा की रणनीति है कि यहाँ ब्राम्हण वोटों में सेंध लगाई जाए। इस सीट पर 2022 में भाजपा उम्मीदवार लगभग 43% वोट पाए थे। इस बार इरफ़ान सोलंकी के खुद चुनाव में ना होने चलते उनकी पत्नी की स्थिति कमजोर हो सकती है।
फूलपुर: प्रयागराज जिले की फूलपुर सीट विधायक प्रवीण पटेल के सांसद बनने के चलते खाली हुई है। भाजपा ने यहाँ दीपल पटेल जबकि सपा ने मुजतबा सिद्दीकी को उतारा है। बसपा ने यहाँ जितेन्द्र सिंह को उतारा है। फूलपुर में भाजपा ओबीसी वोटर को लामबंद करने में लगी हुई है। यहाँ भाजपा हिन्दू वोट बंटने नहीं देना चाहती जबकि सपा मुस्लिम वोट जुटाने में लगी है।
कटेहरी: यूपी विधानसभा उपचुनाव में अम्बेडकर नगर की कटेहरी सीट भी है। यह एक हाई प्रोफाइल सीट है। कटेहरी विधानसभा सपा विधायक लालजी वर्मा के सांसद बनने के चलते खाली हुई है। सपा ने यहाँ लालजी वर्मा की पत्नी सोभावती वर्मा को उतारा है। लालजी वर्मा सपा के बड़े चेहरे हैं। भाजपा ने यहाँ धर्मराज निषाद जबकि बसपा ने अमित वर्मा को उतारा है।
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा की सहयोगी NISHAD पार्टी ने यहाँ अच्छे वोट बटोरे थे। इस बार भाजपा को यहाँ बढ़त है। एक तो कुर्मी वोटों में यहाँ बंटवारा सपा-बसपा के बीच हो रहा है। वहीं भाजपा ने निषाद उम्मीदवार देकर बढ़त बना ली है।
मंझवा: जिला मिर्जापुर की सीट मंझवा भी 2022 में NISHAD पार्टी से विधायक बने रमेश बिंद के जीतने के बाद खाली हुई है। भाजपा ने 2017 में यहाँ से जीती सुचिस्मिता मौर्या को उम्मीदवार बनाया है। वहीं सपा ने बढ़त लेने के लिए यहाँ से ज्योति बिंद को उतारा है। बसपा ने ब्राम्हण वोट बटोरने के लिए दीपक तिवारी को टिकट दिया है।
2022 चुनाव में भी बिंद और ब्राम्हण वोटों में बंटवारा हुआ था। इस बार भाजपा चाहती है कि वह ओबीसी और ब्राम्हण वोट जुटा ले, जिससे उसको बढ़त हासिल हो।
इन सभी सीटों पर 20 नवम्बर, 2024 को वोटिंग होगी। इनके अलावा अयोध्या की मिल्कीपुर सीट पर भी उपचुनाव होना है, इसकी अभी तारीख घोषित नहीं हुई है। यह सीट 2022 में सपा के खाते में गई थी। इस सीट के विधायक अवधेश कुमार 2024 में फ़ैजाबाद लोकसभा सीट से सांसद बने हैं।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी में मंदिर जाने और सुंदरकांड का पाठ करने पर हॉस्टल की छात्राओं को प्रताड़ित करने और उनसे माफानामा लिखवाया गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने इसका विरोध किया है। छात्राओं का आरोप है कि हॉस्टल की चीफ वार्डन आयशा रईस ने कहा कि अगर मंदिर जाना है तो पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन से इजाजत लेनी होगी।
इस घटना को लेकर हिंदू संगठनों ने गहरी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि अगर इस मामले में उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे सड़कों पर उतरेंगे। उनका कहना है, “मोहन यादव के राज में सुंदरकांड और धार्मिक आयोजनों पर रोक नहीं सहन की जाएगी।” वहीं, भाजपा की छात्र इकाई ABVP ने इसको लेकर यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन किया है।
ABVP से जुड़े छात्र-छात्राएँ विश्वविद्यालय के मेन गेट पर एकत्रित हुए और रामधुन का आयोजन कर प्रशासन को सदबुद्धि देने की प्रार्थना की। ABVP के एक नेता ने बताया कि छात्राओं को मंदिर जाने और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने से रोकने की यह कार्रवाई निंदनीय है और वॉर्डन के निर्देश इस तुगलकी निर्देश के खिलाफ उनका विरोध जारी रहेगा।
ABVP के राष्ट्रीय महामंत्री ने ट्वीट करके मुख्यमंत्री मोहन यादव से कहा कि यह फरमान उनकी आस्था और मान्यताओं पर सीधा प्रहार है। उन्होंने विषय की गंभीरता को ध्यान में रखकर अविलंब कार्यवाई सुनिश्चित करने की माँग की। हिंदुस्तान में इस तरह का फरमान क़तई स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके बाद ABVP ने विरोध में पोस्टर भी जारी किया।
वहीं, विवाद बढ़ता देखकर चीफ वॉर्डन आयशा रईस ने कहा कि छात्राओं को कैंपस में आयोजित सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी जाती है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि उनकी उपस्थिति और गतिविधियाँ नियमानुसार दर्ज हों। कभी-कभी छात्राओं के समय पर नहीं लौटने पर चिंता होती है। उन्होंने कहा कि यह अनुशासन और सुरक्षा से संबंधित मामला है।
उन्होंने आगे कहा, “यह मजहबी मुद्दा नहीं है। यह मुद्दा निपटा दिया गया था। मुद्दा कहीं जाने का नहीं है, मुद्दा अनुशासन का है। वाइस चांसलर ने एक कमिटी बना दी है, वह तहकीकात करेगी। बच्ची हमारी औलाद की तरह हैं। उन्हें कुछ नहीं होना चाहिए। वे अपने माँ-बाप से दूर रहते हैं। हम उन्हें इतना प्यार देते हैं। हम उन्हें सेफ्टी देते हैं, ताकि वह खुशहाली से अपनी पढ़ाई करें।”
वॉर्डन ने कहा, “इतना ही मामला है। इससे ‘बच्चियाँ’ नाराज हो गईं। हमारा काम ही है कि हम गार्जियन की तरह पेश आएँ। छात्राओं के आने-जाने के समय को लेकर हम रजिस्टर मेंटेन करते हैं। हमारी इस पर भी नजर रहती है कि बच्चियाँ समय से हॉस्टल लौट आ जाएँ। उनसे कहा जाता है कि बेटा लेट हो रहे हो, टाइम पर आ जाओ। मामला सुलझ गया है बच्चियाँ मान गई हैं। उनकी एंट्री हो चुकी है।”
कहा जा रहा है कि हाल ही में यूनिवर्सिटी परिसर में सुंदरकांड का आयोजन किया गया था। उसमें छात्राएँ भी शामिल हुई थीं। आयोजन के चलते छात्राएँ देर से हॉस्टल पहुँची थीं। इसके बाद हॉस्टल की वॉर्डन आयशा ने उन्हें आगे से तय समय यानी की शाम 7:00 से 7:30 बजे के बीच हॉस्टल लौट आना है। इससे अधिक देरी होनेे पर यूनिवर्सिटी से परमिशन लेने की हिदायत दी थी।
कॉन्ग्रेस के नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से देश के राजा-महाराजाओं पर लगातार ओछी टिप्पणी करते आ रहे हैं। वे उन राजा-महाराजाओं के इस देश के निर्माण में दिए गए योगदान को अपने पूर्वजों- पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी की तरह ही भूल गए हैं। यही कुछ ऐसी बातें हैं, जिसने राहुल गाँधी को राजनीति का जोकर साबित कर दिया है और वे पिछले तीन दशक से इस तमगे को ढो रहे हैं।
राहुल गाँधी ये बातें अपने मन से बोल रहे हों, इसकी संभावना बेहद कम है, क्योंकि उन्हें वर्तमान की उतनी समझ नहीं है तो इतिहास की समझ क्या ही होगी। राहुल गाँधी को राजनीति का जोकर साबित करने में उनके सलाहकारों की बड़ी भूमिका नजर आ रही है, जो उन्हें कुछ इस तरह के मुद्दे थमा रहे हैं जो कॉन्ग्रेस की ताबूत में आखिरी कील साबित होते हुए नजर आ रही है। इन्हीं में से एक है भारत के राजा-महाराजाओं पर ओछी टिप्पणी।
पिछले दिनों राहुल गाँधी ने 6 नवंबर 2024 को विभिन्न समाचार पत्रों में ‘समान अवसर की माँग करता व्यापार जगत’ शीर्षक से एक लेख लिखा। इसके पहले ही पैराग्राफ में उन्होंने लिखा, “ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की आवाज अपनी व्यापारिक शक्ति से नहीं बल्कि अपने शिंकजे से कुचली थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के राजा-महाराजाओं को डराकर-धमकाकर और उन्हें घूस देकर भारत पर राज किया।”
राहुल गाँधी का लेख यह उनकी इतिहास की समझ को दर्शाता है। हालाँकि, इस लेकर भाजपा एवं अन्य दलों ने राहुल गाँधी पर खूब निशाना साधा, लेकिन क्षत्रियों संगठनों ने उनकी समझ को समझकर इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी। आजादी के बाद सत्ता में आते ही अधिनायकवादी रवैया अपनाने वाली कॉन्ग्रेस की इस नई-नवेली पीढ़ी से इसकी अपेक्षा तो की ही जा सकती है।
इससे पहले अप्रैल 2024 में राहुल गाँधी ने कहा था, “राजा-महाराजा गरीबों को लूटा करते थे। उन्हें जो चीज पसंद आ जाती थी, उस पर कब्जा कर लिया करते थे।” तब पीएम ने कहा था कि राहुल गाँधी ने राजाओं-महाराजाओं को लुटेरा बताकर भारत की विरासत का अपमान किया है। पीएम ने कहा था, “तुष्टिकरण की आदत कॉन्ग्रेस को नवाबों, निजामों, सुल्तानों और बादशाहों के अत्याचारों को लेकर ऐसा ही बोलने से रोकती है।”
पीएम मोदी ने कहा था, “कॉन्ग्रेस औरंगजेब के घोर अत्याचारों को भूल गई है, जिसने हमारे हजारों मंदिरों को नष्ट कर दिया था। शहजादे (राहुल गाँधी) उसके और अन्य लोगों के बारे में बात नहीं करते, जिन्होंने हमारे तीर्थ स्थलों को नष्ट कर दिया… उन्हें लूट लिया… हमारे लोगों को मार डाला…। कॉन्ग्रेस अब उन पार्टियों के साथ गठबंधन कर रही है, जो औरंगजेब का महिमामंडन करती हैं।”
दरअसल, उत्तराधिकार में मिली राजनीति वाले राहुल गाँधी भूल जाते हैं कि राजा-महाराजा इस देश की धरोहर हैं। यहाँ की विरासत का हिस्सा हैं। भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा हैं। भारत की विरासत को नकारना हिंदू संस्कृति को नकारना है और राहुल गाँधी लगातार इस संस्कृति को नकारते आ रहे हैं। राहुल गाँधी राजा-महाराजा की बात तो करते हैं, लेकिन बादशाहों-नवाबों की बातें नहीं करते।
कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है अधिनायकवादी
कॉन्ग्रेस पर कब्जा: कॉन्ग्रेस का भारतीय संस्कृति एवं उसके महत्वपूर्ण अध्याय का हिस्सा रहे राजा-महाराजाओं से खानदानी नफरत है। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस और उसके नेता अधिनायकवादी चरित्र को जी भरकर जिए हैं। आजादी से पहले 1939 में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष चुने गए तो पंडित नेहरू को यह बात नहीं पची। वह महात्मा गाँधी के बेहद करीबी थे। उन्होंने महात्मा गाँधी को आगे करके नेताजी बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। ये चरित्र है कॉन्ग्रेस का।
महाराजा हरि सिंह से घृणा: पंडित नेहरू को भी राजा-महाराजाओं से घृणा थी। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह को बदनाम करने के लिए शेख अब्दुल्ला का भरपूर साथ दिया। भारत में विलय करने के लिए बार-बार नेहरू को सूचित करने वाले हरि सिंह की बातों पर पंडित नेहरू ने कभी ध्यान नहीं दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के पाले में चला गया।
याद रहे, महाराजा हरि सिंह के पूर्वज महाराजा गुलाब सिंह ने एक पैदल सैनिक के रूप में अपनी मातृभूमि के लिए सेवाएँ दी थीं और बाद में वे जम्मू-कश्मीर के शासक बने थे। हरि सिंह ने कश्मीर में शुद्रों को मंदिर में प्रवेश की सबसे पहले इजाजत दी थी। उनके शिक्षा के लिए प्रबंध किया था। हालाँकि, नेहरू को विकास आदि से क्या मतलब था, उन्हें तो राजनीति करनी थी।
भारत में विलय के सिंध के प्रस्ताव को खारिज किया: इतना ही नहीं, अपनी अकड़ में मस्त पंडित नेहरू ने सिंध के शासक के भारत में सम्मिलित होने के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। उन्हें प्रधानमंत्री बनने की इतनी जल्दी थी कि वे भारत का जल्द से जल्द विभाजन करके किसी तरह प्रधानमंत्री बन जाना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तमाम तरीके अपनाए। इसके लिए उन्होंने वायसराय लॉर्ड माउंट बेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन तक का सहारा लिया।
पंडित नेहरू ने विलय करने वाले रियासतों के प्रमुखों का समझौता तोड़ा: स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही कुछ रियासतों को छोड़कर देश के राजा-महाराजाओं ने भारत में विलय का ऐलान कर दिया था। कई लोगों ने देश के निर्माण में अपनी सेना से लेकर संपत्ति और लाखों एकड़ भूमि तक दान दी। यह सब कुछ बिना किसी लालच के किया गया था।
उस दौरान नेहरू ने कहा था कि इन राजाओं के साथ एक समझौता किया था कि उनका राजप्रमुख का पद बरकरार रहेगा। हालाँकि, नेहरू ने इन समझौते तोड़ते हुए 1956 में राजाओं के राजप्रमुख का पद छीन लिया। इससे जयपुर के महाराजा के साथ-साथ अन्य राजा काफी खिन्न हो गए और नेहरू के असली चरित्र को पहचान गए।
जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह की रहस्यमय मौत: जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह कॉन्ग्रेस और नेहरू से इत्तेफाक नहीं रखते थे। उन्होंने देश के पहले आम चुनाव 1952 में मारवाड़ क्षेत्र से कॉन्ग्रेस को धाराशायी कर दिया। इस क्षेत्र के 26 सीटों में से एक भी सीट कॉन्ग्रेस को नहीं मिली। इसके बाद वे कॉन्ग्रेस और नेहरू के निशाने पर आ गए। 26 जनवरी 1952 को एक प्लेन क्रैश में उनकी मौत हो गई। इस मौत को लेकर आज भी कॉन्ग्रेस पर सवाल उठाए जाते हैं।
इंदिरा गाँधी में भी अधिनायकवादी रवैया
राष्ट्रपति पद की गरिमा का मर्दन: पंडित नेहरू ने अपनी विरासत को कॉन्ग्रेस के किसी अन्य नेता को नहीं, बल्कि अपनी बेटी इंदिरा गाँधी को सौंपी। पंडित नेहरू की तरह ही इंदिरा गाँधी अधिनायकवादी रूख के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने राजा-महाराजाओं को मिलने वाले ना सिर्फ प्रिवी पर्स को खत्म को किया, बल्कि कई नजदीकियों की विरोध की राजनीति करने पर उनका सार्वजनिक जीवन तक खत्म करवा दीं।
इंदिरा गाँधी ने इस देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की गरिमा को खंडित किया। ज्ञान जैल सिंह के राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने उस पद की गरिमा का ध्यान तक नहीं रखा। इंदिरा गाँधी का अधिनायकवादी कुछ ऐसा रवैया था, उनके खिलाफ चंद्रशेखर सिंह को छोड़कर कोई बोलने तक को तैयार नहीं था।
ज्ञानी ज़ैल सिंह ने तो एक बार यहाँ तक कह दिया था कि अगर इंदिरा गाँधी कहें तो वो सड़क पर झाड़ू लगाने को भी तैयार हैं। कहा जाता है कि राष्ट्रपति से मिलने के लिए इंदिरा गाँधी कभी नहीं जाती थीं, लेकिन जरूरत पड़ने पर ज्ञानी जैल सिंह को बुलवा लेती थीं। इस वह पद के साथ-साथ सामान्य शिष्टाचार का भी पालन नहीं करती थीं।
आपातकाल: राहुल गाँधी आज संविधान की किताब लेकर घूम रहे हैं और मोदी सरकार को लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि उनकी ही दादी ने इस देश से लोकतंत्र खत्म करने की कोशिश की। इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगातार जनता के अधिकारों को रौंद दिया। हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया और घोर यातनाएँ दी गईं, जो कभी अंग्रेज भारतीयों को दिया करते थे।
संजय गाँधी का समानांतर सत्ता: इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री थीं, लेकिन उनके छोटे बेटे संजय गाँधी देश में समानांतर सरकार चलाते थे। यह लोकतंत्र के सर्वथा विरूद्ध है। कहा जाता है कि अधिकारियों एवं मंत्रियों तक की नियुक्ति में भी उनका बड़ा दखल होता है। कई योजनाओं को वो जबरन लागू करवाते थे। संजय गाँधी के अधिनायकवादी रुख को लेकर कई घटनाएँ हैं।
जबरन नसबंदी: ये संजय गाँधी ही थे, जिन्होंने देश में जनता को विश्वास में लिए बिना हजारों लोगों का जबरन नसबंदी करवा दिया था। साल 1976 के सितंबर महीने में उन्होंने देश भर में पुरुष नसबंदी का करवाने का आदेश दिया। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि एक साल में 60 लाख से ज्यादा लोगों की जबरन नसबंदी की गई, जिनमें 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्गों तक शामिल थे।
झुग्गियों पर जबरन बुलडजोर चलवाया: संजय गाँधी का रवैया इतना तानाशाही था कि ‘उनका वचन ही शासन’ था। उनके मन में जो आ जाता उसे लागू हो जाता। आपातकाल के दौरान उन्होंने दिल्ली की झुग्गियों पर बुलडोजर चलाने का निर्देश दिया। दिल्ली के तुर्कमान गेट पर खुद खड़े होकर उन्होंने बुलडोजर चलवाया। लोगों ने विरोध किया था तो उन पर गोलियाँ चलवाई गईं, जिनमें दर्जनों लोग मारे गए।
इस पुलिस फायरिंग में कितने लोग मारे गए, इसका सही आँकड़ा आज भी लोगों के पास नहीं है। उस दौरान कॉन्ग्रेस के भी कई नेता उस घटनास्थ पर मौैजूद थे। उस समय मीडिया को इस इवेंट को कवर करने की इजाजत नहीं दी गई थी। ऐसा कुछ तानाशाही रुतबा था संजय गाँधी का, जो उन्हें इंदिरा गाँधी से विरासत में मिली थी।
इंदिरा गाँधी और उनके उत्तराधिकारियों ने विरोधियों को खत्म करने के लिए हर हथकंडे अपनाए
महाराजा प्रवीर भंजदेव की हत्या: कॉन्ग्रेस की आदिवासी विरोधी नीतियों के खिलाफ बस्तर के महाराजा प्रवीर भंजदेव खुलकर खड़े हो गए। उन्होंने आदिवासियों के साथ होने वाले अन्याय को असहनीय बताया। वे कॉन्ग्रेस से अलग लगातार चुनाव जीत रहे थे। उनका प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर था। इससे नाराज होकर कॉन्ग्रेस की सरकार ने 1966 में पुलिस फायरिंग में उनकी हत्या करवा दी।
उन्होंने नौ आदिवासियों को विधानसभा भेजकर उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में लेकर आए थे। उस समय मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा थे। कहा जाता है कि राजा प्रवीर भंजदेव को 25 गोलियाँ उनके महल में मारकर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद उनके परिवार की अनुमति के बिना उनके शव को जला दिया गया था। उनके परिवार के सदस्यों को आमंत्रित तक नहीं किया गया था।
महारानी गायत्री देवी का उत्पीड़न: जयपुर की महारानी गायत्री देवी एक समय इंदिरा गाँधी की सहेली हुआ करती थीं, लेकिन इंदिरा गाँधी के तानाशाही रवैये ने महारानी को उनका विरोधी बना दिया। 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल महारानी गायत्री देवी ने विरोध किया था। इसके बाद इंदिरा ने आयकर विभाग से राजघराने की आय और संपत्ति की जाँच का आदेश दिया।
इंदिरा गाँधी ने सेना भेजकर राजस्थान में उनके महल की खुदाई कराकर कई ट्रकों में उनकी संपत्तियों को निकाला लिया गया। यहाँ तक महारानी गायत्री देवी को इंदिरा गाँधी ने तिहाड़ जेल में डलवा दिया और वह 6 महीने तक यहाँ रहीं। बाद में इंदिरा गाँधी से व्यवहार से दुखी होकर राजमाता के नाम से विख्यात गायत्री देवी ने राजनीति ही छोड़ दी।
भरतपुर के महाराजा और सीटिंग MLA का पुलिस एनकाउंटर: 20 फरवरी 1985 को भरतपुर के महाराजा और सीटिंग निर्दलीय MLA राजा मान सिंह को राजस्थान तत्कालीन कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने पुलिस एनकाउंटर में हत्या करवा दी थी। कहा जाता है कि माथुर के सामने डीग से राजा मान सिंह निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। इससे माथुर नाराज थे।
माथुर के समर्थक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने डीग के किले पर लगा राजशाही झंडा उतारकर कॉन्ग्रेस का झंडा लगा दिया था। इस हरकत से राजा मान सिंह नाराज हो गए और अपनी जीप से माथुर की चुनावी सभा में जा पहुँचे। उन्होंने माथुर के हेलीकॉप्टर में टक्कर मार दी। इसके बाद उनके खिलाफ FIR दर्ज करवाकर माथुर ने उनका पुलिस एनकाउंटर करा दिया।
राजा-महाराजाओं ने जो इस देश को अपना सर्वस्व दिया
इस देश की आजादी का इतिहास सिर्फ 1947 से नहीं शुरू होता। इस देश का इतिहास 700 ईस्वी से पहले भी शुरू होता है, जब मुस्लिम आक्रमण की शुरुआत नहीं हुई थी। बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप ने विदेशी आक्रांताओं से मुकाबला किया और इस देश के जनमानस को सुरक्षित रखा। राहुल गाँधी भले ही राजा-महाराजाओं को गाली दें, लेकिन इस देश के कण-कण में उनका त्याग और बलिदान छिपा है।
जब देश आजाद नहीं हुआ, तब भी राजाओं ने अपनी प्रजा के लिए जो काम किए, वो आज भी चमत्कार से कम नहीं है। कॉन्ग्रेस की सरकार 70 साल में देश के लोगों के पीने के लिए स्वच्छ जल नहीं उपलब्ध करा पाई, लेकिन राजा-महाराजाओं ने एक-एक मील पर कुँआ, तालाब, बावड़ी, नहर, धर्मशालाएँ आदि बनवाए, ताकि प्रजा को बेसिक चीजों की कमी ना हो।
आज गरीब मर जाए, लेकिन उसे हर चीज में टैक्स देना होता है। राजा-महाराजाओं के काल में कभी भूख से मौत नहीं होती थी। अकाल के समय राजा-महाराजा अपने गोदाम खोल देते थे और जनता को तब तक भोजन उपलब्ध कराते थे, जबकि अगली बार फसल ना हो जाए। लगान एवं मालगुजारी उस साल माफ कर दी जाती थी। आज आधुनिक उपकरण होने के बावजूद एक पूल 2 महीने में गिर जाता है।
शायद राहुल गाँधी ने इस देश के इतिहास एवं मिट्टी की गंध को महसूस करने की कोशिश नहीं की। इसी देश में राजा-महाराजाओं ने असंभव को संभव करके दिखाया है। रेगिस्तान में गंग नहर बनाने का काम कोई प्रजापालक ही कर सकता है। कहा जाता है कि पानी को संचित करने और उस साल आए भयंकर अकाल में लोगों को रोजगार देने के लिए गंग नहर का निर्माण शुरू हुआ था और राजा गंगा सिंह खुद इसमें हाथ बँटाते थे।
इसी तरह अकाल में रोजगार देने के लिए मारवाड़-राठौर राजवंश के महाराजा उम्मेद सिंह ने अपनी उम्मेद भवन महल का निर्माण शुरू करवाया था। यह महल सन 1943 में बनकर तैयार हुआ था। जब यह बना था, तब यह दुनिया के सबसे बड़े राजपरिसरों में से एक था। इसी तरह मध्य प्रदेश के कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने 1924 के अकाल के समय कोरिया पैलेस का निर्माण कराया, ताकि लोगों को रोजगार मिले।
इससे पहले यह राजपरिवार मिट्टी के घरों में रहता था। इस पैलेस के निर्माण से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला। इसकी पहली मंजिल का काम लगभग सात साल बाद यानी 1930 में पूरा हुआ। इसके बाद राजपरिवार के सदस्य महल में रहने आ गए। इससे पहले राजपरिवार के सदस्य बैकुंठपुर स्थित धौराटीकरा में मिट्टी के बने घर में रहते थे। 1942 में फिर से अकाल पड़ा दो मंजिला पैलेस बनने के बाद ऊपर कुछ कमरे और बनवाए गए।
भारत के इतिहास में ऐसी लाखों कहानियाँ भरी पड़ी हैं। बस राहुल गाँधी को इनकी जानकारी नहीं है। जब देश आजाद हुआ था तो इन्हीं राजाओं ने लाखों एकड़ भूमि सरकार को मुफ्त में दी थी। इतना ही नहीं जब भूदान आंदोलन शुरू हुआ तो लोगों को इन्हीं राजाओं ने जमीनें दान दीं। आज उन्हीं दान की हुई जमीनों पर भारत के विकास की नींव खड़ी है, लेकिन राहुल गाँधी में उसे देखने की दूरदर्शिता नहीं है।
अपनी प्रजा के लिए पहले के राजाओं की क्या सोच थी, इसका उदाहरण जोधपुर नरेश महाराज हनुवंत सिंह की सरदार पटेल के साथ एक घटना से समझा जा सकता है। सन 1949 में जब सरदार पटेल अपने सहोयगी वीपी मेनन के साथ जोधपुर के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर के लिए पहुँचे तो उन्होंने कहा जोधपुर की जनता को खाने की दिक्कत ना हो ऐसे में भारत यहाँ, खासकर अकाल के समय में अनाज की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी लेगा।
इसके साथ ही जोधपुर को काठियावाड़ से रेल द्वारा जोड़ा जाएगा, ताकि जोधपुर में व्यापार फल-फूल सके। इसके लिए सरदार पटेल और मेनन तैयार हो गए। इसी दौरान युवा हनवंत सिंह ने पेन वाली अपनी रिवॉल्वर मेनन की करके चेतावनी देते हुए कहा कि अपनी बात से पीछे हटने का अब रास्ता नहीं बचा है। इसी दौरान माउंटन बेटन वहाँ आ गए और महाराजा ने आग्रह किया तो उन्होंने अपनी पिस्तौल नीचे कर दी।
राहुल गाँधी को ना इतिहास की जानकारी और संस्कृति की समझ
राहुल गाँधी ने इस देश की जनता, उसकी संस्कृति से लेकर उसके व्यवहार को समझने की कोशिश नहीं की। ना ही एलीट वर्ग में पैदा हुए मोतीलाल नेहरू से लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी ने ऐसी कोशिश की। इन लोगों ने इस देश की निरीह जनता को जैसे चाहा, वैसे हाँका। कभी जातियों में बाँटा तो कभी धर्म की राजनीति की और समाज में भेदभाव पैदा किया।
कॉन्ग्रेस की राजनीति कभी देश को जोड़ने वाली रही ही नहीं। देश की आजादी से पहले वह मुस्लिमों से अलग रूख अपनाकर सांप्रदायिक राजनीति की। जब देश आजाद होकर बँटवारा हो गया तो जाति की राजनीति की और 70 सालों तक इस देश को गरीब लोगों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा और खुद घोटाले पर घोटाले करके मलाई खाते रहे।
बिजली-पानी-सड़क-स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों का समाधान शुरूआती 2 दशक में पूरे हो जाने चाहिए थे, लेकिन कॉन्ग्रेस के नेताओं पर अधिनायकवाद का ऐसा नशा सवार था कि वे अपने विरोधियों को निपटाने पर तुले थे और देश की जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया। आज राहुल गाँधी इस देश के कण-कण में विद्यामान राजा-महाराजाओं को क्रूर बताने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
राहुल गाँधी अपने पूर्वज पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी के ही रास्ते पर ही जा रहे हैं, जिन्हें आम लोगों से नफरत थी। देश के लोगों के काम करने वालों से नफरत थी। जैसे कि महाराज प्रवीर भंजदेव इसके उदाहरण हैं। कॉन्ग्रेस को जी-हजूरी करने वाले दरबारियों से घिरे रहने की आदत सी थी। राहुल गाँधी आज भी जमीन पर उतरने के बजाय अपने दरबारियों के सलाह पर बयान दे रहे हैं। यह उनकी पार्टी की विनाश का संकेत है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना अब देश के नए मुख्य न्यायाधीश हैं। उन्होंने 11 नवंबर 2024 ही देश के 51वें सीजेआई के तौर पर पद की शपथ ली। उनके मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद लोग उनके जीवन की उपलब्धियाँ, पारिवारिक बैकग्राउंड, उनकी शिक्षा, करियर के अलावा उनसे जुड़े एक ऐसे किस्से की चर्चा कर रहे हैं जो बेहद भावुक करने वाला है।
ये किस्सा सीजेआई के पुराने घर से जुड़ा है जिसे आज भी वो अमृतसर जाने के बाद को तलाशते हैं और जो उनको बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिलता।
बता दें कि संजीव खन्ना के किसी करीबी ने इस किस्से का खुलासा किया था और अब उनके सीजेआई बनने के बाद हर जगह इस पर बात हो रही है। संजीव खन्ना का वो पुराना घर उनके बाऊजी यानी दादाजी सरव दयाल ने कटरा शेर सिंह में खरीदा था। लेकिन अब चूँकि इलाका बदल गया है तो वो उस घर को नहीं पहचान पाते।
जानकारी के मुताबिक, सीजेआई खन्ना के दादा एक मशहूर वकील थे। साथ ही 1919 के जलियांवाला बाग कांड के लिए गठित कॉन्ग्रेस की कमेटी में भी वो शामिल थे। उस जमाने में उन्होंने दो घर खरीदे थे। एक घर तो डलहौजी में था और दूसरा अमृतसर के कटरा शेर सिंह में।
डलहौजी वाला घर आज भी संजीव खन्ना ने संभालकर रखा है। वहाँ वह छुट्टियों में जाते भी है। मगर कटरा शेर सिंह वाला घर अब केवल यादों में है। स्वतंत्रता के समय 1947 में जब कटरा शेर सिंह वाले घर में तोड़फोड़ हुई तो उस घर को दोबारा से ठीक कराया। बाद में उनके बेटे देवराज खन्ना अपने पाँच साल के बेटे संजीव खन्ना को वहाँ लेकर गए और एक निशानी जिसपर बाऊजी लिखा था उसे लेकर भी आए।
बाद में 1970 के समय अमृतसर का वो घर बेच दिया गया। लेकिन सीजेआई खन्ना की स्मृतियों से वो घर नहीं निकला। आज भी जब संजीव खन्ना अमृतसर जाते हैं तो कटरा शेर सिंह जरूर जाते हैं और कोशिश करते हैं वो उसी घर को पहचान सकें। मगर नक्शा बदलने के बाद अब कुछ याद नहीं आता।
उत्तराखंड के हरिद्वार में सोमवार (11 नवम्बर, 2024) को दीपोत्सव के आयोजन में मुस्लिम विधायकों को न्योता दिए जाने पर विवाद हो गया है। मुस्लिम विधायकों को उस हर की पैड़ी पर आमंत्रित किया गया है, जहाँ गैर हिन्दू का जाना वर्जित है। यह न्योता देने पर हरिद्वार जिला प्रशासन पर प्रश्न उठे हैं। विवाद के बाद हर की पैड़ी पर गैर मुस्लिमों का प्रवेश रोक दिया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार शाम को हर की पैड़ी पर दीपोत्सव का आयोजन किया जाएगा। यह कार्यक्रम उत्तराखंड राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर रजत जयंती महोत्सव के अंतर्गत किया जा रहा है। इसमें हरिद्वार के लोगों को दीप जलाने के लिए कहा गया है।
इस कार्यक्रम में 3 लाख दीए जलाए जाने की योजना है। इसके साथ ही 500 ड्रोन से कार्यक्रम भी होगा। इसके अलावा भजन संध्या का आयोजन भी किया जाएगा। कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भी आमंत्रित किया गया है।
इसी कार्यक्रम में हरिद्वार जिला प्रशासन ने विधायकों को भी आमंत्रित किया है। हरिद्वार जिला प्रशासन ने इसी कड़ी में पिरान कलियर से कॉन्ग्रेस विधायक फुरक़ान अहमद, लक्सर से बसपा विधायक मोहम्मद शहज़ाद और मंगलौर से कॉन्ग्रेस विधायक क़ाज़ी निज़ामुद्दीन को न्योता भेजा था।
गंगा दीपोत्सव में पिरान कलियर से कांग्रेस विधायक फुरक़ान अहमद, लक्सर से बसपा विधायक मोहम्मद शहज़ाद और मंगलौर से कांग्रेस विधायक क़ाज़ी निज़ामुद्दीन पहुँचेंगे।
जब हरकी पैड़ी में ग़ैर-हिंदू का प्रवेश वर्जित है तो फिर ये तीन लोग यहाँ क्यों? pic.twitter.com/uQRv11kvTg
इन तीन विधायकों को न्योता भेजे जाने पर श्रीगंगा सभा ने ऐतराज जताया। यह सभा ही हर की पैड़ी पर गंगा आरती और बाकी कार्यक्रमों को आयोजित करती है। श्रीगंगा सभा ने कहा है कि हर की पैड़ी पर गैर हिन्दू नहीं आ सकते हैं, ऐसे में प्रशासन को उनका यहाँ बुलाना ठीक नहीं है।
सभा ने कहा है कि मुस्लिम विधायकों को बुलाया जाना नियमों का अपमान है और यह नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन को हर की पैड़ी के नियमों की जानकारी नहीं है और गैर मुस्लिमों को प्रतिबंधित करने का नियम 100 वर्षों से अधिक पुराना है।
इसी के चलते राज्य के पूर्व मुस्लिम राज्यपाल अजीज कुरैशी और ईसाई मारग्रेट अल्वा ने भी हर की पैड़ी से अलग दूसरी जगह से पूर्व के कार्यक्रम में भाग लिया था। बताया गया है कि यह नियम 1916 से ही लागू है और इसे मदन मोहन मालवीय ने आरती का प्रारम्भ करवाने के समय अंग्रेजो से लागू करवाया था।
वहीं मामले में स्थानीय सूत्रों ने बताया है कि आपत्ति के बाद प्रशासन ने हर की पैड़ी पर किए जाने वाले आयोजन में गैर हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी है। यह रोक हरिद्वार के जिलाधिकारी ने लगाई है। बजरंग दल ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया है।