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ईरान ने रची थी डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश, पत्रकार मसीह अलीनेजाद भी निशाने पर: फरहाद शकेरी सहित 3 पर आरोप तय, सुरक्षा में लगे रोबोट डॉग

अमेरिकी न्याय विभाग ने शुक्रवार (8 नवंबर 2024) को कहा कि ईरान नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रच रहा है। राष्ट्रपति चुनाव से पहले ट्रम्प की हत्या की नाकाम कोशिश हुई थी। इस मामले में 3 लोगों पर आरोप तय किया गया है। ईरानी अधिकारियों ने सितंबर में 51 वर्षीय फरहाद शकेरी को ट्रंप की हत्या की जिम्मेदारी दी थी। शकेरी फिलहाल फरार है और ईरान में है।

अब खबर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए 78 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लोरिडा के पाम बीच में स्थित अपने घर ‘मार-ए-लागो’ में सुरक्षा के लिए रोबोट कुत्तों को शामिल किया है। स्थानीय मीडिया आउटलेट ‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘रोबोट कुत्ते’ को शुक्रवार (8 नवंबर) को डोनाल्ड ट्रंप के बगीचों में घूमते देखा गया। इन रोबोट को बोस्टन की एक कंपनी ने बनाया है।

डोनाल्ड ट्रंप की हत्या में ईरानी साजिश का खुलासा करते हुए अभियोजकों ने कहा कि शकेरी को ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा अमेरिका में अमेरिकी और इजरायली नागरिकों की हत्या का काम सौंपा गया था। बाद में ईरान ने शकेरी को केवल ट्रम्प पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा था। ट्रंप की हत्या की योजना बनाने के लिए उसे सात दिन का समय दिया गया था।

ईरान की राजधानी तेहरान में रह रहा अफगान मूल का शकेरी उस समय सीमा में कोई योजना बनाने में असमर्थ था। इसके बाद उसने IRGC के अधिकारियों से समय सीमा को राष्ट्रपति चुनाव के बाद आगे बढ़ने का इंतजार करने का आग्रह किया था। फरहाद शकेरी का मानना था कि डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति चुनाव में हार जाएँगे।

न्याय विभाग के अनुसार, शकेरी संयुक्त राज्य अमेरिका में बस गया था, लेकिन डकैती के लिए जेल की सजा काटने के बाद साल 2008 में उसे निर्वासित कर दिया गया था। जेल में रहते हुए उसने साजिश में शामिल कार्लिसल रिवेरा और जोनाथन लोडहोल्ट से मिला था। शकेरी ने इन दोनों को ब्रुकलिन में रहने वाले एक ईरानी अमेरिकी कार्यकर्ता को निशाना बनाने के लिए उन्हें काम पर रखा।

शकेरी ईरानी तेल और ईंधन व्यवसाय से जुड़े अपने काम के माध्यम से IRGC के एक सीनियर कमांडर से मिला था। जब अधिकारी को पता चला कि शकेरी पहले न्यूयॉर्क में रहता था तो उसने अमेरिका में व्यक्तियों की जाँच के नाम पर उसकी मदद माँगी। शकेरी ने न्यूयॉर्क जेल में रहने के दौरान मिले अपराधियों के नेटवर्क के सहारे ईरानी अधिकारियों के लिए गुप्तचरी का काम शुरू कर दिया।

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, शकेरी अपने दो सह-षड्यंत्रकारियों जैसे अपराधिक सहयोगियों को निगरानी करने के लिए पैसे देता था। जिनकी निगरानी के लिए ईरानी अधिकारी कहते थे, दरअसल वे उनकी हत्या कराना चाहते थे। इनमें से एक ईरानी-अमेरिकी पत्रकार एवं राजनीतिक कार्यकर्ता मसीह अलीनेजाद भी थीं। अलीनेजाद ईरान के निशाने पर थीं। शकेरी ने इनकी भी निगरानी कराई थी।

शकेरी के अलावा, शुक्रवार को जिन दो अन्य लोगों पर आरोप तय किए गए हैं उनके नाम हैं कार्लिसल रिवेरा और जोनाथन लोडहोल्ट। ये दोनों अमेरिकी नागरिक हैं। दोनों को न्यूयॉर्क में गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों ने अलीनेजाद की निगरानी की थी। IRGC का ब्रिगेडियर जनरल रूहोल्लाह बाज़घन पत्रकार अलीनेजाद की हत्या करवाना चाहता था। इसके लिए ईरान शकेरी को भरपूर धन मुहैया कराता था।

दरअसल, अमेरिकी सरकार ने बार-बार चिंता जताई है कि ईरान साल 2020 के अमेरिकी ड्रोन हमले का बदला लेने की कोशिश कर सकता है। इस हमले में रिवॉल्यूशनरी गार्ड के शीर्ष कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराया गया था। इस हमले का आदेश डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए दिया था। इसके कारण ईरान द्वारा ट्रम्प या उनके पूर्व सलाहकारों को मारने की कोशिश का अंदेशा था।

बता दें कि साल 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों से पहले प्रचार के दौरान 13 जुलाई को पेंसिलवेनिया के बटलर में डोनाल्ड ट्रंप एक रैली को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान उन पर हमला किया था। हालाँकि, गोली उनके कान को छूकर निकल गई थी और इस हमले में वे बाल-बाल बच गए थे। इसके बाद ट्रंप को तुरंत यूएस सीक्रेट सर्विस एजेंटों द्वारा मंच से उतार दिया था।

इसके बाद सितंबर 2024 में उन पर दूसरी बार हमला हुआ था। ट्रंप 16 सितंबर की दोपहर गोल्फ खेल रहे थे, तभी गोलियों की आवाजें आने लगीं। आवाज सुनते ही सुरक्षाकर्मियों ने ट्रंप को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया और उसके बाद इलाका पूरा सील किया गया। गोलीबारी के बाद स्थानीय पुलिस ने एक संदिग्ध को हिरासत में लिया थी, जिसकी पहचान 58 वर्षीय रियान वेल्से राउथ के तौर पर हुई थी।

‘भारत ने अपने एक महान सपूत को खोया’ : रतन टाटा को याद कर भावुक हुए प्रधानमंत्री मोदी, ब्लॉग में लिखा- ये पीड़ा भुला पाना आसान नहीं

आज श्री रतन टाटा जी के निधन को एक महीना हो रहा है। पिछले महीने आज के ही दिन जब मुझे उनके गुजरने की खबर मिली, तो मैं उस समय आसियान समिट के लिए निकलने की तैयारी में था। रतन टाटा जी के हमसे दूर चले जाने की वेदना अब भी मन में है। इस पीड़ा को भुला पाना आसान नहीं है। रतन टाटा जी के तौर पर भारत ने अपने एक महान सपूत को खो दिया है…एक अमूल्य रत्न को खो दिया है।

आज भी शहरों, कस्बों से लेकर गाँवों तक, लोग उनकी कमी को गहराई से महसूस कर रहे हैं। हम सबका ये दुख साझा है। चाहे कोई उद्योगपति हो, उभरता हुआ उद्यमी हो या कोई प्रोफेशनल हो, हर किसी को उनके निधन से दुख हुआ है। पर्यावरण रक्षा से जुड़े लोग…समाज सेवा से जुड़े लोग भी उनके निधन से उतने ही दुखी हैं। और ये दुख हम सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में महसूस कर रहे हैं।

युवाओं के लिए, श्री रतन टाटा एक प्रेरणास्रोत थे। उनका जीवन, उनका व्यक्तित्व हमें याद दिलाता है कि कोई सपना ऐसा नहीं जिसे पूरा ना किया जा सके, कोई लक्ष्य ऐसा नहीं जिसे प्राप्त नहीं किया जा सके। रतन टाटा जी ने सबको सिखाया है कि विनम्र स्वभाव के साथ, दूसरों की मदद करते हुए भी सफलता पाई जा सकती है।

रतन टाटा जी, भारतीय उद्यमशीलता की बेहतरीन परंपराओं के प्रतीक थे। वो विश्वसनीयता, उत्कृष्टता औऱ बेहतरीन सेवा जैसे मूल्यों के अडिग प्रतिनिधि थे। उनके नेतृत्व में, टाटा समूह दुनिया भर में सम्मान, ईमानदारी और विश्वसनीयता का प्रतीक बनकर नई ऊंचाइयों पर पहुँचा। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी उपलब्धियों को पूरी विनम्रता और सहजता के साथ स्वीकार किया।

दूसरों के सपनों का खुलकर समर्थन करना, दूसरों के सपने पूरा करने में सहयोग करना, ये श्री रतन टाटा के सबसे शानदार गुणों में से एक था। हाल के वर्षों में, वो भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम का मार्गदर्शन करने और भविष्य की संभावनाओं से भरे उद्यमों में निवेश करने के लिए जाने गए। उन्होंने युवा आंत्रप्रेन्योर की आशाओं और आकांक्षाओं को समझा, साथ ही भारत के भविष्य को आकार देने की उनकी क्षमता को पहचाना।

भारत के युवाओं के प्रयासों का समर्थन करके, उन्होंने नए सपने देखने वाली नई पीढ़ी को जोखिम लेने और सीमाओं से परे जाने का हौसला दिया। उनके इस कदम ने भारत में इनोवेशन और आंत्रप्रेन्योरशिप की संस्कृति विकसित करने में बड़ी मदद की है। आने वाले दशकों में हम भारत पर इसका सकारात्मक प्रभाव जरूर देखेंगे।

रतन टाटा जी ने हमेशा बेहतरीन क्वालिटी के प्रॉडक्ट…बेहतरीन क्वालिटी की सर्विस पर जोर दिया और भारतीय उद्यमों को ग्लोबल बेंचमार्क स्थापित करने का रास्ता दिखाया। आज जब भारत 2047 तक विकसित होने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तो हम ग्लोबल बेंचमार्क स्थापित करते हुए ही दुनिया में अपना परचम लहरा सकते हैं। मुझे आशा है कि उनका ये विजन हमारे देश की भावी पीढ़ियों को प्रेरित करेगा और भारत वर्ल्ड क्लास क्वालिटी के लिए अपनी पहचान मजबूत करेगा।

रतन टाटा जी की महानता बोर्डरूम या सहयोगियों की मदद करने तक ही सीमित नहीं थी। सभी जीव-जंतुओं के प्रति उनके मन में करुणा थी। जानवरों के प्रति उनका गहरा प्रेम जगजाहिर था और वे पशुओं के कल्याण पर केन्द्रित हर प्रयास को बढ़ावा देते थे। वो अक्सर अपने डॉग्स की तस्वीरें साझा करते थे, जो उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। मुझे याद है, जब रतन टाटा जी को लोग आखिरी विदाई देने के लिए उमड़ रहे थे…तो उनका डॉग ‘गोवा’ भी वहाँ नम आँखों के साथ पहुँचा था।

रतन टाटा जी का जीवन इस बात की याद दिलाता है कि लीडरशिप का आँकलन केवल उपलब्धियों से ही नहीं किया जाता है, बल्कि सबसे कमजोर लोगों की देखभाल करने की उसकी क्षमता से भी किया जाता है।

रतन टाटा जी ने हमेशा, नेशन फर्स्ट की भावना को सर्वोपरि रखा। 26/11 के आतंकवादी हमलों के बाद उनके द्वारा मुंबई के प्रतिष्ठित ताज होटल को पूरी तत्परता के साथ फिर से खोलना, इस राष्ट्र के एकजुट होकर उठ खड़े होने का प्रतीक था। उनके इस कदम ने बड़ा संदेश दिया कि – भारत रुकेगा नहीं…भारत निडर है और आतंकवाद के सामने झुकने से इनकार करता है।

व्यक्तिगत तौर पर, मुझे पिछले कुछ दशकों में उन्हें बेहद करीब से जानने का सौभाग्य मिला। हमने गुजरात में साथ मिलकर काम किया। वहाँ उनकी कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर निवेश किया गया। इनमें कई ऐसी परियोजनाएं भी शामिल थीं, जिसे लेकर वे बेहद भावुक थे।

जब मैं केन्द्र सरकार में आया, तो हमारी घनिष्ठ बातचीत जारी रही और वो हमारे राष्ट्र-निर्माण के प्रयासों में एक प्रतिबद्ध भागीदार बने रहे। स्वच्छ भारत मिशन के प्रति श्री रतन टाटा का उत्साह विशेष रूप से मेरे दिल को छू गया था। वह इस जन आंदोलन के मुखर समर्थक थे। वह इस बात को समझते थे कि स्वच्छता और स्वस्थ आदतें भारत की प्रगति की दृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण हैं। अक्टूबर की शुरुआत में स्वच्छ भारत मिशन की दसवीं वर्षगाँठ के लिए उनका वीडियो संदेश मुझे अभी भी याद है। यह वीडियो संदेश एक तरह से उनकी अंतिम सार्वजनिक उपस्थितियों में से एक रहा है।

कैंसर के खिलाफ लड़ाई एक और ऐसा लक्ष्य था, जो उनके दिल के करीब था। मुझे दो साल पहले असम का वो कार्यक्रम याद आता है, जहाँ हमने संयुक्त रूप से राज्य में विभिन्न कैंसर अस्पतालों का उद्घाटन किया था। उस अवसर पर अपने संबोधन में, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वो अपने जीवन के आखिरी वर्षों को हेल्थ सेक्टर को समर्पित करना चाहते हैं। स्वास्थ्य सेवा एवं कैंसर संबंधी देखभाल को सुलभ और किफायती बनाने के उनके प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि वो बीमारियों से जूझ रहे लोगों के प्रति कितनी गहरी संवेदना रखते थे।

मैं रतन टाटा जी को एक विद्वान व्यक्ति के रूप में भी याद करता हूँ- वह अक्सर मुझे विभिन्न मुद्दों पर लिखा करते थे, चाहे वह शासन से जुड़े मामले हों, किसी काम की सराहना करना हो या फिर चुनाव में जीत के बाद बधाई सन्देश भेजना हो।

अभी कुछ सप्ताह पहले, मैं स्पेन सरकार के राष्ट्रपति श्री पेड्रो सान्चेज के साथ वडोदरा में था और हमने संयुक्त रूप से एक विमान फैक्ट्री का उद्घाटन किया। इस फैक्ट्री में सी-295 विमान भारत में बनाए जाएँगे। श्री रतन टाटा ने ही इस पर काम शुरू किया था। उस समय मुझे श्री रतन टाटा की बहुत कमी महसूस हुई।

आज जब हम उन्हें याद कर रहे हैं, तो हमें उस समाज को भी याद रखना है जिसकी उन्होंने कल्पना की थी। जहाँ व्यापार, अच्छे कार्यों के लिए एक शक्ति के रूप में काम करे, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता को महत्व दिया जाए और जहाँ प्रगति का आँकलन सभी के कल्याण और खुशी के आधार पर किया जाए। रतन टाटा जी आज भी उन जिंदगियों और सपनों में जीवित हैं, जिन्हें उन्होंने सहारा दिया और जिनके सपनों को साकार किया। भारत को एक बेहतर, सहृदय और उम्मीदों से भरी भूमि बनाने के लिए आने वाली पीढ़ियां उनकी सदैव आभारी रहेंगी।

‘तेरी बहन को मुसलमान बनाऊँगा’: चाकू दिखाकर फैज़ान ने शौच करने गई शादीशुदा दलित महिला का किया अपहरण, UP पुलिस ने दबोचा

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में एक शादीशुदा दलित महिला पर धर्मान्तरण के दबाव का मामला सामने आया है। रविवार (3 नवंबर 2024) को पीड़िता का चाकू की नोक पर अपहरण किया गया था। मामले में मुख्य आरोपित फैज़ान है जिसे शुक्रवार (8 नवंबर) को गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़िता के परिजनों ने फैज़ान के भाई और अम्मी-अब्बा को इस साजिश में शामिल बताया है। पुलिस ने पीड़िता को सकुशल बरामद कर लिया है। मामले में अन्य आरोपितों की संलिप्तता की जाँच चल रही है।

यह घटना एटा जिले के थानाक्षेत्र जलेसर की है। यहाँ सोमवार (4 नवंबर) को एक दलित महिला के पिता ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि एक दिन पहले रविवार की सुबह 6 बजे उनकी बेटी अपनी छोटी बहन के साथ शौच के लिए खेतों में गई थी। तभी किरी कस्बा जलेसर का ही रहने वाला फैज़ान वहाँ पहुँच गया। फैज़ान पीड़ित की बड़ी बेटी का अपहरण करने की कोशिश करने लगा। इस बात का पीड़िता की छोटी बहन ने विरोध किया।

शिकायतकर्ता के मुताबिक तब फैज़ान ने पीड़िता की छोटी बहन का गला दबाया। उसने लड़की को चाकू दिखा कर कहा, “तेरी बहन को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर करूँगा और तेरी बहन को मुसलमान बनाऊँगा।” इसके बाद फैज़ान ने तमंचा निकाला और पीड़िता को अपने साथ बाइक पर जबरन बिठाकर ले गया। दलित परिवार का आरोप है कि फैज़ान की इस करतूत में न सिर्फ उसके भाई बल्कि अम्मी-अब्बा का भी पूरा सहयोग है।

तब शिकायतकर्ता ने आशंका जताया कि फैज़ान उनकी बेटी के साथ कोई अनहोनी कर सकता था। इसी के साथ आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की गई। पुलिस ने यह केस भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87, 131, 351 (2) और 61 (2) के साथ SC/ST एक्ट व उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत दर्ज किया। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। फ़ौरन ही पुलिस टीमों का गठन कर के फैज़ान की तलाश शुरू कर दी गई।

पीड़िता को सही सलामत बरामद करने और फैज़ान की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीमों का गठन कर दिया गया। मामले में ताबड़तोड़ दबिश दी गई। पुलिस के प्रयास अंत में सार्थक रहे और शुक्रवार (8 नवंबर) को फैज़ान दबोच लिया गया। फैज़ान एटा में ही एक पुलिया के नीचे छिपा था और कहीं भागने की फिराक में था। पुलिस ने महिला को भी सही सलामत बरामद कर लिया है। मामले में अन्य आरोपितों की संलिप्तता की जाँच व अन्य कानूनी कार्रवाई जारी है।

‘कनाडा में रहते हैं खालिस्तानी समर्थक’ : PM जस्टिन ट्रुडो ने आखिरकार खुद खोली अपनी पोल, PM मोदी के प्रति नफरत दिखाने से नहीं चूँके

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हाल ही में यह स्वीकार किया है कि कनाडा में खालिस्तान समर्थक मौजूद हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब भारत पहले ही कनाडाई सरकार पर आरोप लगा चुकी है कि वह खालिस्तान समर्थकों को पनाह देते हैं।

ट्रूडो ने खालिस्तानियों की मौजूदगी की बात स्वीकारते हुए थोड़ी लीपापोती भी की। उन्होंने आगे कहा कि कनाडा में खालिस्तान समर्थक है लेकिन ये खालिस्तानी सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं ठीक वैसे ही जैसे कनाडा में मोदी समर्थक हैं लेकिन वो हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

बता दें कि जस्टिन ट्रुडो की यह टिप्पणी भारत और कनाडा के संबंधों पर असर डालने वाली है। वैसे ही 2023 में दोनों के पबीच संबंधों में उस वक्त से खटास है जब से ट्रुडो सरकार ने निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की भूमिका होने की बात कही थी और भारत ने ऐसे आरोपों को खारिज कर दिया था।

इसके बाद भारतीय उच्चायुक्तों को निशाना बनाया गया तो भारत ने ओटावा में अपने उच्चायुक्तों को वापस बुला लिया। साथ ही कनाडाई राजनयिकों को निष्कासित भी कर दिया। मगर ट्रुडो सरकार द्वारा भारत पर आरोप लगाने का सिलसिला थमा नहीं। वो खुलकर खालिस्तानियों को समर्थन देते रहे।

हाल में हिंदुओं पर जब ब्रैम्पटन में हमला हुआ तो ये एकदम साफ था कि हमला खालिस्तानियों ने किया है लेकिन ट्रुडो ने इस हमले के मामले में खालिस्तानियों की आलोचना नहीं की। ट्रूडो ने कहा कि हिंसा करने वाले लोग किसी भी समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने कहा, “यहाँ हिंसा, असहिष्णुता या धमकी के लिए कोई जगह नहीं है।”

जिस जगह पर भगवान राम ने की महादेव की पूजा, वहाँ मंदिर के पास खड़ी कर दी मस्जिद-मजार: हिंदू संगठन बोले- कोरोना के दौरान छिपकर हुआ निर्माण, इलाके में ‘टोपी वालों’ की गतिविधि बढ़ी

उत्तर प्रदेश के बाँदा में जिस जगह पर भगवान राम ने भगवान शंकर को जलाभिषेक की थी, वहाँ अवैध रूप से एक मस्जिद बना दी गई है। इसको लेकर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने विरोध प्रदर्शन किया है और उस अवैध मस्जिद को गिराने की माँग करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा है। बाम्बेश्वर पर्वत पर स्थित उस शिवलिंग को बमदेव भोलेनाथ की मंदिर के नाम से जाना जाता है।

विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल का आरोप है कि कोरोना काल के जब हर तरफ लॉकडाउन था, उस दौरान इस पर्वत पर मुस्लिमों ने चुपके से एवं अवैध रूप से मस्जिद का निर्माण कर लिया था। VHP के मंडल अध्यक्ष अशोक ने कहा कि वहाँ पर आधा दर्जन मजारें भी बना ली गई हैं। पहाड़ पर रोज फतिहा और हर शुक्रवार को जुमे की नमाज पढ़ी जाती है।

हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस जगह पर कोई मुस्लिम बस्ती नहीं थी, लेकिन अब काफी तादाद में यहाँ मुस्लिम हने लगे हैं। इससे सुरक्षा को लेकर खतरा पैदा हो गया है। ऐसे में मस्जिद और अवैध ढाँचों को गिराने के लिए विश्व हिंदू परिषद के अधिकारियों ने जिला कलेक्टर और पुलिस कप्तान के साथ-साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा है।

पत्र में कहा गया है कि इस्लाम धर्म के लोग भारत का इस्लामीकरण करा रहे हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि वे इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। अगर सरकार ने इसे नहीं हटाया तो वे इस मस्जिद को गिरा देंगे। हिंदू संगठनों की माँग है कि अवैध मस्जिद एवं मकबरे का बनाने वालों को तत्काल जेल में डाला जाना चाहिए और अवैध ढाँचों एवं उसे बनाने वालों के मकानों पर बुलडोज़र चलना चाहिए।

विश्व हिंदू परिषद के चंद्रमोहन बेदी ने कहा कि यह पर्वत बहुत पुराना है। यहाँ पर पीछे की तरफ कुछ लोगों ने अवैध रूप से मजार बनाई और फिर उसे धीरे-धीरे मस्जिद में बदल दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को अंधविश्वास में डाल दिया और जगह हथिया ली। उन्होंने पूछा कि जब सतह पर पत्थर ही पत्थर हैं तो मजार कैसे बन सकती है। मजार बनाने के लिए खुदाई होती है, लेकिन पत्थर पर खुदाई कैसे होगी।

VHP के महामंत्री दीपू दीक्षित ने बताया कि शुरू में मुस्लिमों ने पर्वत के एक पत्थर को हरे रंग से पोता फिर धीरे-धीरे इस पर मजार बनाई। फिर इस पर एक बड़ी मस्जिद बना दी। इसके बाद काफी लोग यहाँ टोपी लगाकर आना शुरू हो गए। दीपू ने कहा कि यह एक कैंसर का रूप है। इसे तत्काल जड़ से काटकर फेंक देना चाहिए, वरना यह पूरे शरीर को खराब कर देगा।

बाम्बेश्वर पर्वत पर बने प्राचीन मन्दिर के पुजारी पुत्तन महाराज ने और मंदिर कमिटी के अध्यक्ष ने भी मस्जिद का विरोध किया है। उनका कहना है यह यह स्थिति अयोध्या और काशी मथुरा जैसी बन सकती है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान यहाँ के शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। इस दौरान भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिया था।

‘मैं हिंदू हूँ इसलिए प्रोफेसर एहतेशाम 3 साल से जान-बूझकर कर रहे हैं फेल’: छात्रा के आरोप पर AMU का दावा- नकल करते पकड़ी गई थी, अब जाँच कमिटी बताएगी सच्चाई

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) की एक हिन्दू छात्रा ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम ना होने के कारण उसके साथ भेदभाव हो रहा है। छात्रा ने कहा है कि उसे गैर मुस्लिम होने के कारण लगातार तीन साल से फेल किया जा रहा है। AMU ने इस मामले में छात्रा के आरोपों को नकारते हुए जाँच के लिए एक कमिटी बना दी है।

AMU में BA LLB कर रही छात्रा अवंतिका गौर ने यह आरोप लगाए हैं। अवंतिका पहले वर्ष की छात्रा हैं। अवंतिका ने कहा है कि उन्होंने 2021 में एडमिशन लिया था लेकिन उन्हें लगातार 3 बार फेल किया गया। अवंतिका ने फेल करने का आरोप इतिहास के प्रोफ़ेसर एहतशाम पर लगाया है।

एहतशाम इसी विभाग के प्रोफ़ेसर हैं। अवंतिका ने इस संबंध में 3 नवम्बर, 2024 को AMU परिसर के भीतर धरना भी दिया था। छात्रा का कहना था कि उसको फेल किए जाने कि वजह यह है कि मुस्लिम नहीं है। अवंतिका के आरोपों को लेकर अब AMU प्रशासन ने भी जवाब दिया है।

AMU के प्रॉक्टर मोहम्मद वसीम और डिप्टी प्रॉक्टर मोहम्मद हशमत अली ने इन आरोपों को नकारा है। AMU के कंट्रोलर मुजीबुल्लाह जुबेरी ने कहा अवंतिका 2021 में AMU में आईं थी और पहले साल वह फेल हो गईं थी। जुबेरी ने बताया कि 2022 में अवंतिका को नक़ल करते हुए पकड़ा गया था।

जुबेरी का कहना है कि 2023 में भी अवंतिका 3 विषयों में फेल हो गईं थी क्योंकि उन्होंने 5 में से 3 विषयों के जवाब लिखे थे। जुबेरी ने कहा है कि अवंतिका के आरोपों को लेकर AMU ने इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर मानवेन्द्र कुमार पुंडीर की अध्यक्ष में एक कमिटी का गठन कर दिया है जो इस मामले की जाँच करेगी।

अवंतिका ने माँग की थी कि उनकी कॉपी किसी और प्रोफ़ेसर से चेक करवाई जाए। जुबेरी ने कहा कि इस संबंध में उन्हें कोई आवेदन नहीं मिला है। उन्होंने कहा है कि कमिटी जैसी रिपोर्ट पेश करेगी, वैसा ही एक्शन अवंतिका के मामले में लिया जाएगा।

लोकसभा की तरह महाराष्ट्र चुनाव में भी ‘वोट जिहाद’ की तैयारी, मुस्लिमों को साधने में जुटे 180 NGO: रोहिंग्या-बांग्लादेशियों के बढ़ते दखल पर TISS भी कर चुका है आगाह

मुंबई की जानी-मानी यूनिवर्सिटी टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में हाल में एक अध्य्यन हुआ था जिससे ये पता चला कि मुंबई में रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी घुसपैठियों का प्रभाव बढ़ रहा है। अब इसी के बाद एक जानकारी और सामने आई जिससे ये खुलासा हुआ है कि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम वोटों को बीजेपी के खिलाफ लामबंद करने के लिए 180 से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं। इन एनजीओ ने केवल मुंबई में 9 लाख मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ा है।

रिपोर्टों के अनुसार, ये एनजीओ के लोग मुस्लिम समुदाय के बीच जाते हैं, उन्हें समझाते हैं और फिर इनका इस्तेमाल वोटिंग टर्नआउट बढ़ाने के लिए किया जाता है। कहने को ये एनजीओ इसलिए जागरूकता फैला रही हैं ताकि मुस्लिम मतदाता अपने अधिकारों का सहीं इस्तेमाल करें। लेकिन, ये सभी जानते हैं कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए वोट का सही इस्तेमाल असल में भाजपा को सत्ता से बाहर निकालने से अधिक कुछ भी नहीं है।

इन इस्लामी संगठनों ने पिछले कुछ महीनों में मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच पहुँच बनाने के लिए कई अभियान चलाए हैं। इस दौरान इन्होंने सैंकड़ों बैठकें की, सूचना सत्र आयोजित किए और सामुदायिक कार्यक्रम किए…। हाल में कुछ ऐसी कुछ बैठकों की वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आई। वीडियोज में देखा जा सकता है कि कि कैसे मुस्लिमों को भाजपा के खिलाफ भड़काया और इंडी के समर्थन में वोट देने के लिए कहा जा रहा है।

आपको पता हो कि ये एनजीओ सिर्फ मुस्लिमों को इकट्ठा करके उन्हें वोटिंग के अधिकार का इस्तेमाल करने को नहीं कहते बल्कि वो किसे वोट दें इस बात को भी सुनिश्चित किया जाता है। मजहबी उलेमा बताते हैं कि उनके अनुयायी किसे वोट दें और किसे बिलकुल नहीं नहीं।

बता दें कि चुनावों से पहले भाजपा के खिलाफ मुस्लिमों को एकत्रित करने का काम जो ये एनजीओ कर रहे हैं वो चिंताजनक है।

क्यों? अगर इसे समझना है जो TISS की स्टडी में क्या कहा गया इसे जानना होगा।

मुंबई में बढ़ रही रोहिंग्या और मुस्लिमों की घुसपैठ

हाल में TISS ने ‘मुंबई में अवैध अप्रवासी: सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण’ शीर्षक से किए गए अध्य्यन में जो निष्कर्ष आए, उन्हें सबके आगे पेश किया था। हैरानी की बात यह है कि इस रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि कुछ राजनीतिक संस्थाओं ने वोट बैंक की राजनीति के लिए अवैध घुसपैठियों का इस्तेमाल करके लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित की और घुसपैठियों के फर्जी पहचान पत्र बनवाकर उन्हें चुनाव का हिस्सा बनवाया।

इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र के इलाकों में हुए जनसांख्यिकी बदलाव की ओर ध्यान उजागर किया गया है।बताया गया है कि मुंबई में 1961 में हिंदुओं की आबादी 88% थी, जो 2011 में घटकर 66% रह गई। इस दौरान, मुस्लिम जनसंख्या 8% से बढ़कर 21% तक पहुँच गई। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अनुमान है कि 2051 तक हिंदू आबादी 54% से कम हो जाएगी और मुस्लिम आबादी लगभग 30% तक बढ़ सकती है।

टिस की स्टडी का शीर्षक

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले अवैध प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेष रूप से, बांग्लादेशी और रोहिंग्या समुदाय के लोग झुग्गी क्षेत्रों में बस रहे हैं, जिससे मुंबई के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा मुंबई के स्थानीय लोगों और अप्रवासी समुदायों के बीच आर्थिक असमानताओं की वजह से समाजिक तनाव, हिंसा की घटनाएँ , महिलाओं की तस्करी के मामले, देह व्यापार में भी वृद्धि हो रही है।

लोकसभा चुनावों में एनजीओ की बैठकों का दिखा था असर

गौरतलब है कि एक ओर मुंबई में बढ़ रही घुसपैठ की रिपोर्टें हैं और दूसरी ओर विधानसभा में मुस्लिमों को एकजुट करने की… दोनों खबरें एकदूसरे से अलग नहीं हैं। महाराष्ट्र में बढ़ती मुस्लिम घुसपैठियों की आबादी, उन्हें मिलते संरक्षण का परिणाम क्या होता है ये मई-जून में हुए लोकसभा चुनावों में हमने देखा था। मुस्लिमों को इसी तरह एकजुट करके, समझाकर उन्हें भाजपा के विरोध में वोट डालने के लिए कहा गया था।

खुलेआम फतवे निकाले गए थे कि मुस्लिमों को पुणे, शिरुर, बारामती और मावल निर्वाचन क्षेत्रों से क्रमशः कॉन्ग्रेस, एनसीपी (शरद पवार) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवारों को ही वोट देना है। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तो एक कार्यक्रम में कहा था कि आज वोट देने वाले हर मुसलमान को अपने समुदाय के पक्ष में अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने मुसलमानों के मन में यह डर भी भर दिया कि अगर मोदी सत्ता में आए तो सभी मज़ार और मदरसे जमींदोज कर दिए जाएँगे। मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) द्वारा आयोजित रैली में इस्लामी झंडे भी लहराए गए।

नतीजे क्या हुए ये सबने देखा। लोकसभा चुनावों में मुस्लिम क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत काफी बढ़ गया था। उदाहरण के लिए, शिवाजी नगर, मुम्बादेवी, बायकुला, और मालेगाँव सेंट्रल जैसे क्षेत्रों में मतदान की दर 60% से अधिक रही। वहीं अंतिम नतीजों की बात करें तो एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना ने लोकसभा चुनावों में 7 सीटें हासिल कीं, बीजेपी ने 9 सीटें जीतीं, जबकि एनसीपी (शरद पवार), कॉन्ग्रेस और उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना की पार्टियों ने मुस्लिम और वामपंथी समर्थन हासिल करके क्रमशः 8, 13 और 9 सीटें हासिल कीं।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में मुस्लिम इस बार भी लोकसभा चुनावों की तरह वोटिंग करने के लिए तैयार हैं। उनके पास पहले अलग-अलग विकल्प थे कि वो शरद पवार की एनसीपी को वोट दें या कॉन्ग्रेस को, एआईएमआईएम को दें या फिर उद्धव ठाकरे की शिवसेना को… लेकिन इस बार उन्हें पहले ही समझाया जा चुका है कि उन्हें अपने वोट बँटने नहीं देना नहीं है। संगठित होकर एक उम्मीदवार को जिताना है जो उनके हित में काम करे। वो चाहे इंडी गठबंधन का हो या फिर उनका चुना कोई अन्य।

जो बीदर किला ASI की संपत्ति, उसके 17 ‘स्मारकों’ को अपनी प्रॉपर्टी बता रहा है कर्नाटक वक्फ बोर्ड: किसानों की 1200 एकड़ जमीन पर भी ठोक चुका है दावा

देश के विभिन्न राज्यों के वक्फ बोर्डों का मुँह सुरसा की फैलता जा रहा है। कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने अब राज्य के ऐतिहासिक बीदर किले के अंदर स्थित 17 स्मारकों को अपनी संपत्ति के रूप में चिन्हित किया है। ये संपत्तियाँ किले के प्रमुख स्थलों में से शामिल हैं। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तहत है। हालाँकि, ASI को अभी तक इसकी जानकारी नहीं है।

बीदर किला परिसर में स्थित 60 संपत्तियों में से 17 पर राज्य वक्फ बोर्ड ने अपना दावा किया है। इन संपत्तियों में प्रसिद्ध 16 खंबा (सोलह खंभे वाली) मस्जिद, बहमनी शासकों और उनके परिवार के सदस्यों की 14 कब्रें शामिल हैं। इन कब्रों में अहमद शाह-IV, उसकी बीवी, अलाउद्दीन, हसन खान, मोहम्मद शाह-III, निज़ाम, सुल्तान अहमद शाह वली और सुल्तान महमूद शाह की कब्र शामिल हैं।

वक्फ बोर्ड के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर PTI को बताया कि इस संबंध में ASI को नोटिस नहीं दिया गया है। उसने कहा, “बोर्ड ASI को नोटिस कैसे जारी कर सकता है, जो कई दशकों से ऐतिहासिक स्मारकों का संरक्षक है।” उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड के नाम पर बहुत सारी शरारतें और गलत सूचनाएँ फैलाई जा रही हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय का नाम खराब हो रहा है।

उस अधिकारी ने कहा, “जब से विवाद शुरू हुआ है, हमने सभी नोटिस वापस लेने का फैसला किया है, क्योंकि बहुत लंबे समय से जमीन पर बैठे लोगों को बेदखल करना अन्यायपूर्ण और अवैध है।” बता दें कि इससे पहले कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने यहाँ के किसानों की 1200 एकड़ (लगभग 2000 बीघा) जमीन पर अपना हक जता चुका है। इसको लेकर किसानों को नोटिस भी जारी किया गया है।

इस बीच, वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल प्रभावित किसानों से बातचीत करने के लिए 7 नवंबर को कर्नाटक के हुबली और विजयपुरा का दौरा करेंगे। भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने पाल से कुछ दिन पहले ही अनुरोध किया था कि वे विजयपुरा जिले के किसानों को वक्फ बोर्ड के साथ उनके भूमि विवादों पर चर्चा करने के लिए गवाह के रूप में आमंत्रित करें।

बेंगलुरू दक्षिण से सांसद और समिति के सदस्य सूर्या ने मंगलवार (5 नवंबर) को कहा, “वक्फ पर JPC के अध्यक्ष ने वक्फ की हिंसक कार्रवाई से प्रभावित किसानों से बातचीत करने के लिए 7 नवंबर को हुबली और बीजापुर का दौरा करने के मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। अध्यक्ष किसान संगठनों, मठों से बातचीत करेंगे और उन्हें दी गई याचिकाएँ संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष रखी जाएँगी।”

कुछ दिन पहले किसानों से मिले तेजस्वी सूर्या ने कहा कि किसानों ने दावा किया है कि नोटिस भेजे जाने के अलावा कुछ भूमि खंडों के लिए आरटीसी (अधिकार, किरायेदारी और फसलों का रिकॉर्ड), ‘पहानी’ और म्यूटेशन रजिस्टर में कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना बदलाव किए गए हैं।

चीनी दूतावास में फिर हुई पाकिस्तानी PM शहबाज शरीफ की पेशी? अपने नागरिकों पर लगातार हमले से नाराज है बीजिंग, बता चुका है ‘असहनीय’

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस साल दूसरी बार बुधवार (6 नवंबर) को चीनी दूतावास का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कराची में चीनी नागरिकों पर गोलीबारी की निंदा की। इस गोलीबारी में दो चीनी नागरिक घायल हो गए थे। यह घटना मंगलवार (5 नवंबर) को कराची के SITE औद्योगिक क्षेत्र में हुई थी।

चीनी नागरिक कराची में लिबर्टी मील में नई मशीनरी लगाने के लिए गए थे। इस दौरान उन्होंने सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध नहीं किए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी नागरिक रोजाना बुलेटप्रूफ वाहन में आते थे। उन्हें एक निजी एजेंसी और सिंध पुलिस की विशेष सुरक्षा इकाई (एसपीयू) द्वारा सुरक्षा भी प्रदान की जाती थी।

शहबाज शरीफ ने पाकिस्तान में चीनी राजदूत जियांग जैदोंग से कहा, “मैं यहाँ चीनी नागरिकों पर हुए हमले की निंदा करने और घायलों का हाल-चाल जानने आया हूँ। मैं व्यक्तिगत रूप से इस घटना में शामिल लोगों को पकड़ने की प्रक्रिया की निगरानी कर रहा हूँ और यह सुनिश्चित कर रहा हूँ कि उन्हें उचित सजा मिले।”

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने दावा किया कि चीन पाकिस्तान का पुराना मित्र है, लेकिन ऐसा लगता है कि भारत से शत्रुता रखने वाला उशका पड़ोसी कुछ और नहीं, बल्कि चीन की कठपुतली और उपनिवेश है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में चीनी नागरिकों की सुरक्षा करने में विफल रहने पर पाकिस्तानी नेता को फटकार लगाने के लिए चीन द्वारा समय-समय पर बुलाया जाता है।

हालाँकि, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री कार्यालय ने चीनी राजदूत के साथ शरीफ की मुलाकात को संवेदना व्यक्त करने और कार्रवाई का आश्वासन देने वाला एक मुलाकात बताया है। हकीकत ये है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री आमतौर पर अन्य देशों के दूतावासों का दौरा नहीं करते हैं। राजदूतों को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तलब किया जाता है। इससे पता चलता है कि चीन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को तलब किया था।

CPEC प्रोजेक्ट पर काम कर रहे नागरिकों पर हमले से चीन चिंतित

अक्टूबर 2024 में बलूच विद्रोहियों ने हवाई अड्डे के पास एक कार पर घात लगाकर हमला कर दिया था, जिसमें कई चीनी नागरिक मारे गए थे। खबर है कि कराची के जिन्ना अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास हुए इन विस्फोटों में दो चीनी नागरिक मारे गए थे। बलूच लिबरेशन आर्मी के मजीद ब्रिगेड ने इस आत्मघाती विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी।

इस साल मार्च में खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में एक बाँध परियोजना पर काम कर रहे पाँच चीनी नागरिक एक आत्मघाती बम विस्फोट में मारे गए थे। बताया जा रहा है कि एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से लदे अपने वाहन को इन चीनी इंजीनियरों के काफिले में घुसा दिया था। उस समय चीनी नागरिक बख्त ज़हीर में CPEC से जुड़े बाँध परियोजना स्थल की ओर जा रहे थे।

इसके कुछ ही घंटों के भीतर ही प्रधानमंत्री शरीफ तनाव कम करने और अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए चीनी दूतावास पहुँचे। उल्लेखनीय है कि हाल के दिनों में पाकिस्तान में चीनी नागरिकों पर हमले बहुत बढ़ गए हैं और कई रिपोर्टों से पता चलता है कि इनके पीछे बलूच विद्रोहियों का हाथ है। बलूच इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

साल 2022 में कराची विश्वविद्यालय में एक वैन में विस्फोट हुआ था, जिसमें तीन चीनी प्रशिक्षक और उनके पाकिस्तानी चालक की मौत हो गई थी। इसी तरह साल 2021 में उत्तरी पाकिस्तान में एक बस में हुए विस्फोट में 13 लोग लोगों की मौत हो गई थी। इन मृतकों में 9 चीनी नागरिक भी शामिल थे।

हमलों को रोकने में पाकिस्तान की विफलता पर चीन नाराज़

पिछले महीने पाकिस्तान ने चीन के साथ एक संयुक्त बयान में कहा था कि उसने दक्षिण एशियाई देश में चीनी नागरिकों और परियोजनाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता है। उस दौरान बीजिंग ने बलूच विद्रोहियों द्वारा हमलों में वृद्धि के जवाब में तत्काल सुरक्षा कदम उठाने की माँग की थी। चीन ने पाकिस्तान में चीनी नागरिकों पर हमलों की गहन जाँच की भी माँग की थी।

चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, “(टीम ने) माँग की कि पाकिस्तानी पक्ष घटना के बाद की स्थिति को उचित तरीके से सँभाले और घायलों के इलाज में कोई कसर न छोड़े। इसके साथ ही घटना की सच्चाई की जाँच करे, अपराधियों को पकड़े और दंडित करे तथा पाकिस्तान में चीनी कर्मियों, संस्थानों एवं परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाए।”

चीनी नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के बार-बार के वादों के बावजूद पाकिस्तान अपनी धरती पर चीनी नागरिकों की सुरक्षा करने में विफल रहा है। इसको लेकर चीन की नाराजगी इस तथ्य से समझी जा सकती है कि 31 अक्टूबर 2024 को चीन ने पाकिस्तान को फटकारते हुए कहा कि यह चीन के लिए अस्वीकार्य है कि उसके नागरिकों पर पाकिस्तान में बार-बार हमला किया जाए।

क्या पाकिस्तान में आएगी चीनी सेना?

अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित चीन चाहता है कि पाकिस्तान में काम कर रहे उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए उसके अपने बख्तरबंद वाहन और सुरक्षा बल हों। इस साल सितंबर में कहा गया था कि पाकिस्तान में काम कर रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए चीन और पाकिस्तान संयुक्त सुरक्षा कंपनियाँ स्थापित करने के एक समझौते पर पहुँचने के करीब हैं।

प्रस्तावित समझौते में पाकिस्तान में चीनी सुरक्षा बल शामिल मौजूद रहेंगे, जिसका पाकिस्तान ने चीनी दबाव के बावजूद पहले विरोध किया था। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप चीनी नागरिकों को बख्तरबंद वाहनों में इधर-उधर ले जाया जा सकता है। प्रस्ताव में वाहन-माउंटेड मोबाइल सुरक्षा उपकरण और बैलिस्टिक-संरक्षित बख्तरबंद वाहनों जैसे उन्नत सुरक्षा उपायों को शामिल करना शामिल है।

जिनकी रथ की धूल ने बदल दी राजनीति, जिनकी सांगठनिक अग्नि में तप कर निखरे नरेंद्र मोदी: 97 के हुए ‘भारत रत्न’ स्वयंसेवक

देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भाजपा के पूर्व मुखिया और रामरथ यात्रा के नायक भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी शुक्रवार (8 नवम्बर, 2024) को 97 साल हो गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि उनका यह जन्मदिन इस बार इसलिए विशेष हैं क्योंकि इसी साल उन्हें भारत रत्न दिया गया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रमुख स्टेट्समेन में एक करार दिया है और कहा है कि उन्होंने देश के विकास के बड़ा योगदान दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बाकी नेताओं ने भी आडवाणी के जन्म दिन पर बधाई दी है।

लालकृष्ण आडवाणी भारत में राम मंदिर आंदोलन और भाजपा के प्रखर दक्षिणपंथी अवतार के लिए हमेशा ही जाने जाते रहेंगे। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर देश को कॉन्ग्रेस के अलावा एक राष्ट्रव्यापी मजबूत विकल्प दिया, जो कि वामपंथ जैसी विचारधारा 5 दशक में भी नहीं कर पाई थी।

लालकृष्ण आडवाणी का जीवन भी उत्तर चढ़ाव से भरा रहा है। वह अब उन कुछ गिने चुने नेताओं में से हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया है और सावरकर तथा गाँधी जैसे महान लोगों के समय के साक्षी रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी के जीवन परिचय में फ़िल्में-किताबें, अध्यात्म और हिंदुत्व की राजनीति, सब कुछ रही है।

कराची में जन्म, अंग्रेजी शिक्षा, पड़ोसी पारसी

लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर, 1927 को सिंध (जो अब पाकिस्तान में है) के कराची शहर में हुआ था। उनके परिवार में उनके अलावा सिर्फ उनके माता-पिता और बहन ही थे। उनके जन्म के तुरंत बाद उनके परिवार ने जमशेद क्वार्टर्स (पारसी कॉलोनी) मोहल्ले में ‘लाल कॉटेज’ नाम का एकमंजिला बँगला बनवाया था। उसी मोहल्ले में कई समृद्ध पारसी समाज के लोग रहते थे।

सिंधी हिन्दुओं की आमिल शाखा से उनका परिवार ताल्लुक रखता था। आमिल समाज के बारे में बता दें कि ये लोग लोहानो वंश के 2 मुख्य भागों में से जुड़े थे जो वैश्य समुदाय से आते थे। मुस्लिम बादशाह भी अपने प्रशासकीय तंत्र में इनकी सहायता लेते थे।

ये लोग नानकपंथी होते थे और सिख धर्म से इनकी नजदीकी थी। आगे चल कर सिंध में सरकारी नौकरियों में भी इनका दबदबा रहा। लालकृष्ण के दादा धरमदास खूबचंद आडवाणी संस्कृत के विद्वान थे और एक सरकारी हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक भी। उनके पिता किशिनचंद एक व्यापारी थे।

उनकी शिक्षा-दीक्षा ‘सेंट पैट्रिक्स हाईस्कूल फॉर बॉयज’ में हुई थी। एक ऐसे स्कूल में, जिसकी स्थापना सन् 1845 में आयरलैंड से आए कैथोलिक मिशनरियों ने की थी। वहाँ एक चर्च भी था। पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे परवेज मुशर्रफ भी उसी स्कूल से पढ़े थे। 1936-42 तक की अवधि लालकृष्ण आडवाणी के जीवन में इसी स्कूल में गुजरी। 

फिल्मों से प्रेम, किताबों का शौक

आपको ये जान कर सुखद आश्चर्य होगा कि लालकृष्ण आडवाणी बचपन में और युवावस्था में अंग्रेजी फ़िल्में देखा करते थे और खूब अंग्रेजी किताबें पढ़ते थे। सिनेमा और अंग्रेजी पुस्तकों से लालकृष्ण आडवाणी का लगाव उनके शुरुआती जीवन का एक विशेष हिस्सा है।

इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन‘ में भी किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे वो अपने 4 मामाओं में सबसे छोटे सुंदर मामा के साथ अक्सर फ़िल्में देखने निकल जाते थे। उन्होंने ‘फेंकेंस्टाइन’ नामक एक डरावनी फिल्म का जिक्र किया है, जो उन्होंने उस जमाने में देखी थी।

ये 1931 की एक हॉरर फिल्म थी, जिसे पेबी वेबलिंग के एक नाटक के आधार पर बनाई गई थी। ये नाटक मैरी शेली की 1818 में आए उपन्यास पर आधारित थी। इसी के नाम पर फिल्म का नाम भी रखा गया। ‘यूनिवर्सल स्टूइडियोज’ ने इस फिल्म का निर्माण किया, जिसके के रीमेक बन चुके हैं।

लालकृष्ण आडवाणी के जीवन में एक ऐसा समय भी आया जब उन्होंने 15 वर्षों तक 1942-56 के दौरान कोई फिल्म नहीं देखी। फिर वो जब मुंबई अपने सुंदर मामा के यहाँ गए तो उन्होंने ‘हाउस ऑफ वेक्स’ नामक फिल्म देखी। ये एक थ्रीडी फिल्म थी। ये भी एक मिस्ट्री हॉरर फिल्म थी।

लालकृष्ण आडवाणी का किताबों से प्रेम उनके कॉलेज पहुँचने के बाद चालू हुआ। आडवाणी ने 1942 हैदराबाद (पाकिस्तान) स्थित दयाराम गिदूमल कॉलेज में एडमिशन लिया। कॉलेज की लाइब्रेरी में वो पुस्तकें पढ़ने में समय व्यतीत करने लगे। उनकी रूचि विदेशी व्यवस्था में अधिक थी।

उन्होंने फ्रेंच लेखक जूल्स वर्न के सारे उपन्यास पढ़ डाले – ‘जर्नी टू द सेंटर ऑफ द अर्थ’, ‘ट्वेंटी थाउजेंड लीग्स अंडर द सी’, ‘अराउंड द वर्ल्ड इन 80 डेज’ इत्यादि किताबें पढ़ी हैं। इसके अलावा लालकृष्ण आडवाणी ने चार्ल्स डिकेंस का ‘अ टेल ऑफ टू सिटीज’ और एलेक्जेंडर ड्यूमा का ‘द थ्री मस्केटियर्स’ नामक उपन्यास भी पढ़ी थी। उनकी क्रिकेट में भी रूचि थी।

संघ ने बदली जीवन की दिशा

लालकृष्ण आडवाणी के राजनीति में आने की नीँव उसी दिन पड़ गई थी जब 14 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में शामिल हो गए थे। उनका RSS से जुड़ाव एक दोस्त के माध्यम से हुआ था। RSS के माध्यम से उनकी जान-पहचान पूर्णकालिक प्रांत प्रचारक राजपाल पुरी से हुई जो उनके मार्गदर्शन भी बने।

RSS में रहते हुए उन्हें द्विराष्ट्र वाले सिद्धांत के बारे में भी पता चला, जिसके तहत मुस्लिम नेता अपने लिए अलग इस्लामी मुल्क माँग रहे थे। विभाजन के बारे में सोच कर ही वो हैरान हो उठते थे। इसी दौरान उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह के बारे में पुस्तकें पढ़ीं।

न लालकृष्ण आडवाणी ने राजपाल पुरी की सलाह के बाद वीर विनायक दामोदर सावरकर की 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी पुस्तक पढ़ी। नवंबर 1947 में ऐसा समय भी आया जब आडवणी सावरकर से उनके बम्बई स्थित आवास पर मिले और विभाजन को लेकर दोनों के बीच चर्चा हुई। RSS में रहते हुए ही उनका झुकाव लगातार राष्ट्रवाद की तरफ होता चला गया।

देश का बँटवारा और मुंबई में जीवन की फिर से शुरुआत

लालकृष्ण आडवाणी और उनका परिवार 1947 के बँटवारे में भारत चला आया। यहाँ वह मुंबई में आकर बसे। उनके पिता ने यहाँ फिर से व्यापार करना चालू किया जबकि आडवाणी इस दौरान संघ के कराची क्षेत्र के प्रचारक के तौर पर संगठन के काम में तल्लीन हो गए।

1947 से लेकर 1951 के के बीच लालकृष्ण आडवाणी राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में RSS का काम करते रहे। इसके बाद जब भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई, तो वह उसके पहले कुछ सदस्यों में से एक थे। आडवाणी 1957 आते-आते पार्टी के महासचिव बन चुके थे और बाद में वह दिल्ली जनसंघ के अध्यक्ष भी बने।

इस दौरान उनकी नजदीकी अटल बिहारी वाजपेयी से बढ़ी। वह वाजपेयी और बाकी नेताओं को उनके संसदीय कामों में मदद करते थे। आडवाणी 1970 तक दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रहे। वह यहाँ के स्थानीय निकाय के मुखिया भी रहे। 1970 में वह पहली बार दिल्ली से राज्यसभा पहुँचे। उन्हें इंदिरा गाँधी सरकार में आपातकाल के विरोध के चलते जेल में भी डाला गया।

1977 में जब देश में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार आई तो वह उसमें सूचना प्रसारण मामलों के कैबिनेट मंत्री बने। 1980 आते-आते जब स्पष्ट हो गया कि समाजवादी देश को कॉन्ग्रेस के सामने एक विकल्प नहीं दे सकते तो उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिल कर भाजपा की नीँव रखी।

RSS का प्रचारक बना हिंदुत्व का नायक

लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के 1988 तक दो बार अध्यक्ष बन चुके थे। इसी दौरान देश में राम मंदिर आंदोलन तेज हो रहा था। अब तक सौम्य स्वभाव के माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने इस मंदिर आंदोलन को समर्थन देने का फैसला लिया। उन्होंने इसके लिए रामरथ यात्रा का ऐलान किया।

यह यात्रा 25 सितम्बर को सोमनाथ से निकली थी और इसको अलग-अलग प्रदेशों से होते हुए 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या पहुँचना था। उनका रामरथ जहाँ से गुजरता, उसकी धूल लोग माथे में लगाते। रथ के पीछे हिन्दुओं का रेला चलता। लोग एक ही बात रटते, “लाठी-गोली खाएँगे-मंदिर वहीं बनाएँगे।”

आडवाणी की इस रथ यात्रा का प्रभाव था कि पूरे देश से कारसेवक अयोध्या में जुटने लगे। कारसेवक इस बात पर अडिग थे कि मंदिर निर्माण तो होकर रहेगा चाहे तत्कालीन प्रदेश सरकार कितना भी जोर लगा ले। इसी कड़ी में 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में कारसेवकों पर गोली भी चली जिसमें कोठारी बन्धु समेत तमाम कारसेवक मारे गए।

एक कारसेवक ने मरते हुए अपने खून से सड़क पर ‘जय श्री राम’ लिखा। यात्रा शुरू होने के बाद एक ओर देश के करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के सेवक आडवाणी खड़े थे तो दूसरी तरफ वीपी सिंह, मुलायम सिंह और लालू यादव जैसे नेता कैसे अधिकाधिक मुस्लिम वोट बटोरे जाएं इसके लिए आपस में ही होड़ कर रहे थे।

इस यात्रा को रोक कर बिहार के समस्तीपुर में लालू यादव ने रोक लिया। लालू यादव इस कदम के जरिए अपने आप को मुस्लिमों का मसीहा स्थापित करना चाहते थे। इसके साथ ही वह दिखाना चाहते थे कि वही एक ताकत हैं जो देश में हिंदुत्व के उभार को रोक सकते हैं।

रामरथ यात्रा ने मंदिर आंदोलन को घर-घर में बहस का मुद्दा बना दिया। आडवाणी को इस मामले में निर्विवाद तौर पर आंदोलन का राजनीतिक नेता मान लिया गया। आडवाणी ने भी बिना पीछे हटे हुए कहा कि मंदिर वहीं बनाएँगे, उसको कौन रोकेगा। उन्होंने साफ़ कर दिया कि देश की अदालतें तय नहीं करेंगी कि करोड़ों के आराध्य का जन्म कहाँ हुआ।

इस आंदोलन और रामरथ यात्रा के बाद देश की राजनीति में मार्क्सवाद, वामपंथ, समाजवाद, और कॉन्ग्रेस के अवसरवाद के बराबर में हिंदुत्व और दक्षिणपंथ का एक विकल्प खड़ा हो गया। आडवाणी ने इस हिंदुत्व को देश के पटल पर ऐसी शक्ति बना दिया जिसकी काट आज तक कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियां नहीं खोज पाई।

उपप्रधानमंत्री, भारत रत्न और पार्टी का उदय

लालकृष्ण आडवाणी मात्र हिंदुत्व के नायक ही नहीं बल्कि देश की बड़ी राजनीतिक शख्सियतों में से भी एक हैं। आडवाणी देश के उप्रधानमंत्री रहे, गृह मंत्री रहे। भाजपा के अध्यक्ष रहे और साथ ही नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं को उनके ही सानिध्य में राजनीति की बारीकियाँ सीखने का मौक़ा मिला।

उनके सामने ही पार्टी अब तक 6 बार केंद्र में सत्तारूढ़ हो चुकी है। उनके ही सामने पार्टी का विस्तार 2 सीटों से लेकर 300 पार तक पहुँचा है। पार्टी गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी हार्टलैंड कहे जाने वाले राज्यों से निकल कर कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में विकल्प बनी है और उत्तर पूर्वी राज्यों में उसने कॉन्ग्रेस और वामदलों का सफाया कर दिया है।