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गढ़वा में कट्टरपंथियों ने रोकी माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा, बवाल के बाद झारखंड पुलिस ने दागी गोलियाँ और आँसू गैस के गोले: हिंदुओं ने लगाया मुस्लिमों की तरफदारी का आरोप

झारखंड के गढ़वा में माँ दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन जुलूस को मुस्लिम समुदाय द्वारा रोके जाने पर सांप्रदायिक तनाव फैल गया। यहाँ 2 अलग-अलग घटनाओं में दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। हिन्दू पक्ष जिस रास्ते से जुलूस निकालना चाह रहा था, उस पर मुस्लिम समुदाय ने ऐतराज जताया। नाराज हिन्दुओं ने प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया है। वहीं, मतगढ़ी में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प भी हुई है।

पहला मामला गढ़वा के मतगढ़ी का है। यहाँ रविवार (13 अक्टूबर) को हिन्दू समुदाय के लोग हर वर्ष की तरह प्रतिमा लेकर विसर्जन के लिए निकले थे। रास्ते में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने प्रतिबंधित रास्ता बताकर उन्हें रोक दिया। इसके बाद दोनों पक्षों में तनातनी हो गई। वाद-विवाद के बीच हालात बिगड़ गए और पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस दौरान पुलिस ने मामले को सँभालने की कोशिश की।

आखिरकार, पुलिस ने भीड़ पर लाठी चार्ज कर दिया और आँसू गैस के गोले भी छोड़े। इस दौरान पुलिस ने फायरिंग भी की। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हिन्दू पक्ष ने पुलिस पर मुस्लिमों की तरफदारी का आरोप लगाया। इसको लेकर पुलिस और हिन्दू संगठनों में झड़प हो गई। पुलिस का कहना है कि जिस रास्ते से विसर्जन यात्रा निकाली जा रही है, वहाँ पहले भी विवाद हो चुका है।

हालाँकि प्रदर्शनकारी इसे अपनी पुरानी परम्परा बताते हुए यात्रा ले जाने पर आमादा थे। इस हिंसक झड़प के दौरान एक व्यक्ति के पैर में गोली भी लगने की बात कही जा रही है। इस घटना में कुछ पुलिसकर्मी भी चोटिल हो गए हैं। वहीं, कई श्रद्धालुओं को पुलिस ने हिरासत में लिया गया है। हालात को देखते हुए इलाके में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है। प्रतिमा विसर्जन नहीं होने से तनाव और बढ़ गया है।

लखना गाँव में भी रास्ते में रुकावट

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दूसरा मामला गढ़वा जिले के ही लखना गाँव का है। यहाँ हिन्दू समुदाय ने हर वर्ष की भाँति इस बार भी दुर्गा पूजा कार्यक्रम का आयोजन किया था। आयोजन के बाद शनिवार (12 अक्टूबर 2024) को श्रद्धालु प्रतिमा को विसर्जन करने जा रहे थे। रास्ते में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने विसर्जन जुलूस को रोक दिया। उनका कहना था कि उस रास्ते से विसर्जन यात्रा नहीं निकाली जा सकती है।

इस बात को लेकर दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ गए। दोनों पक्षों की भीड़ जुटते देखकर मौके पर पुलिस व अन्य प्रशासनिक अधिकारी पहुँचे। प्रशासन ने दोनों पक्षों से लम्बी वार्ता की जो देर रात तक चली। हालाँकि, इस बातचीत का कोई हल नहीं निकला। घंटों प्रतिमा रास्ते में ही रुकी रही। इससे श्रद्धालु आक्रोशित हो गए। उन्होंने प्रशासन पर ढिलाई का आरोप लगाते हुए नारेबाजी शुरू कर दी।

घटनास्थल पर पहुँचे भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने मुस्लिम पक्ष पर जोर-जबरदस्ती करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जिस मार्ग पर प्रतिमा का विसर्जन रोका गया है, उसको पक्की सड़क के तौर पर सरकार ने अपने पैसों से बनवाया है। बीजेपी MLA का यह भी दावा है कि इस मार्ग पर हर साल माता सरस्वती की प्रतिमा विसर्जन होता रहा है।

बकौल तिवारी, उसी राह पर जब ताजिया निकलता है तो हिन्दू मुस्लिमों को शर्बत पिलाते हैं। तिवारी ने सरकार की एकतरफा धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल खड़ा किया। उन्होंने दावा किया कि जिस इलाके में मुस्लिम पक्ष ने माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा रोकी है, वहीं पर एक हिन्दू ने कब्रिस्तान के लिए अपनी जमीन दान कर दी थी।

झारखंड के पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी ने भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली झारखंड सरकार की आलोचना की है। उन्होंने इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किया है। इसके साथ ही उन्होंने अपने X हैंडल पर लिखा, “पुलिस विसर्जन रोककर धार्मिक उन्माद फैलाने वाले लोगों पर कारवाई करने की बजाय सिर्फ चिरौरी कर रही है।”

बाबूलाल मरांडी ने झारखंड के DGP से कहा कि वो प्रतिमा विसर्जन रोकने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें, अन्यथा सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ सकता है। पुलिस ने बताया कि दोनों पक्षों की आपसी बातचीत के बाद मामले का समाधान निकाल लिया गया है। पुलिस ने यह भी कहा कि विवाद की स्थिति कुछ बाहरी लोगों द्वारा पैदा की गई थी, जिस पर कार्रवाई की जाएगी।

घुसपैठ कर हरियाणा में बसे ही नहीं हैं रोहिंग्या मुस्लिम, चला रहे मदरसे भी: मौलवी बोले- हम ब्लैक में म्यांमार से आए, भारत में मेहमान बनकर रह रहे

हरियाणा के मुस्लिम बहुत मेवात क्षेत्र के नूहं में बाहर से आए हुए रोहिंग्या मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी अवैध रूप से रह रही है। ये सभी म्यामांर से अवैध रूप से भारत में आए और यहाँ से नूहं में स्थापित हो गए। इन अवैध घुसपैठियों के रहने वाले अस्थायी आवास बनाया गया है। ये सभी साल 2016 में ही भारत आ गए थे और तभी से यहाँ रह रहे हैं। इनमें रहने के साथ-साथ मदरसा भी संचालित किया जा रहा है।

दरअसल, ऑर्गनाइजर ने हरियाणा विधानसभा चुनावों के दौरान इन अवैध घुसपैठियों से बात की थी। इसका वीडियो अब जारी किया गया है। ऑर्गेनाइजर की ओर से पत्रकार शुभी विश्वकर्मा ने यहाँ मदरसे में पढ़ाने वाले मौलाना और यहाँ पढ़ने वाले बच्चों से बात की। यहाँ पढ़ाने वाले यूनुस ने कहा कि यहाँ 400 रोहिंग्या रहते हैं। हालाँकि, उनकी जुबानी ये संख्या है, लेकिन वास्तविक संख्या कितनी है, ये किसी को नहीं पता।

ये वही क्षेत्र है, जहाँ से हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरन कॉन्ग्रेस नेता मामन खान से रिकॉर्ड जीत हासिल की है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में उन्हें एकतरफा मत मिले। चुनाव प्रचार के दौरान मामन यहाँ के हिंदुओं को धमकाते हुए कहा था कि जिन लोगों ने मुस्लिमों के खिलाफ अन्याय किया है, उन्हें कॉन्ग्रेस की सरकार बनते ही मेवात छोड़ना पड़ेगा। मामन का नाम 2023 के मेवात दंगों में आया था।

नूहं के नांगली गाँव में पत्रकार पहुँचे। यहाँ बाँस आदि से छप्पर के रूप में एक अस्थायी ढाँचा बनाया गया है, जिस पर लिखा है ‘मदरसा इस्लामिया दारूल उलूम इल्यासिया’। ये ढाँचा एक बड़े भूभाग पर बनाया गया है। इसमें नमाजी टोपी पहने हुए बहुत सारे बच्चे और किशोर दिखाई देते हैं। इसमें जियाउर रहमान नाम के एक व्यक्ति है, जो खुद को मौलवी बताता है।

रहमान कहता है कि वह नहूँ में रहता है कि मदरसे में बच्चों को पढ़ाने के लिए वह गाँव में आता है। रहमान खुद भी म्यामांर (बर्मा) का रहने वाला है। रहमान ने बताया कि साल 2016 से यह मदरसा चल रहा है। यहाँ पढ़ने वाले सारे बच्चे म्यामांर के ही है। मदरसे में ही बच्चों को खाना भी मिलता है। रात में रहते भी हैं। उसने बताया कि यहाँ कभी रेड नहीं पड़ी और ना ही किसी ने पूछा कि वे कहाँ के रहने वाले हैं।

रहमान ने बताया कि उसे भारत में किसी तरह का खतरा नहीं है, क्योंकि वह यहाँ मेहमान के हिसाब से रह रहा है। बर्मा से आया और व्यक्ति मोहम्मद यूनुस नाम का मिला। उसने बताया कि वह बच्चों को अरबी और अंग्रेजी पढ़ाता है। यूनुस ने बताया कि यहाँ रहने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों की आबादी लगभग 400 है। यूनुस ने बताया कि भारत में आने के लिए उन सबों के पास कुछ भी नहीं है।

यूनुस ने कहा, “ना हमारे पास पासपोर्ट है, ना वीजा है। हम कैसे-कैसे करके यहाँ आ गए, यह बहुत मुश्किल काम है। हम ब्लैक में आ गए।” ब्लैक से संभवत: यहाँ पैसे देकर अवैध तरीके से घुसपैठ करने से संबंधित है। यूनुस ने बताया कि वह बांग्लादेश बॉर्डर के जरिए भारत में घुसा। उन्होंने कहा कि वहाँ कुछ लोग उसे मिले, जिन्होंने उसे बॉर्डर पार कराया और वहाँ से वह बंगाल में रहने लगा।

यूनुस ने बताया कि बॉर्डर पार कराने वालों ने कुछ लोगों से पैसा भी लिया और कुछ लोगों को बिना पैसे का ही बॉर्डर पार करा दिया। यूनुस ने बताया कि वह उसके साथ अधिकांश लोग म्यामांर में लड़ाई शुरू होने के बाद 2016 में भारत में आए। उसका कहना है कि कुछ लोग तो भारत में साल 2012 में ही आ गए थे और तभी वे यहाँ रह रहे हैं। यूनुस का दावा है कि उसके पास UN का रिफ्यूजी कार्ड है।

हालाँकि, जब पत्रकारों ने उससे रिफ्यूजी कार्ड दिखाने के लिए कहा तो वह बोला कि वह घर पर है और घर कहीं और है। यूनुस ने बताया कि इलाके में कुछ भी होता है तो उसे खबर कर दिया जाता है कि घर से बाहर नहीं निकलना है। यूनुस ने बताया कि म्यामांर से भागे हुए रोहिंग्या हैदाराबाद, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में रह रहे हैं।

इस मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों से जब पूछा गया कि वे पढ़ाई करके क्या करेंगे तो 99 प्रतिशत ने कहा कि वे हाफिज बनेंगे और अल्लाह की सेवा करेंगे। इन बच्चों को जाकिर नाईक के बारे में अच्छे से पता है। लगभग 12 साल के एक बच्चे ने कहा कि जाकिर नाईक इसलिए अच्छा लगता है, क्योंकि वह लोगों को दीन (इस्लाम) के रास्ते पर लाता है। यानी लोगों का इस्लाम में धर्मांतरण कराता है।

किशोर ने कहा कि जो अल्लाह को नहीं मानता है कि वह दोजख की आग में जलेगा। एक छोटे से बच्चे ने कलमा पढ़ कर सुनाया और कहा कि इसका मतलब है कि अल्लाह के सिवा और कोई भगवान नहीं है। यही बात एक किशोर ने भी कहा है। हालाँकि, बच्चे हर शब्द बोलने से पहले अपने मौलवी या हाफिज की तरफ देख रहे थे। जाहिर है कि वो काफी सोचकर बोल रहे थे।

दरअसल, इस मदरसे में पढ़ाने वाले यूनुस ने दावा किया कि रोहिंग्या मुस्लिम UN के रिफ्यूजी कार्ड पर भारत में आकर रह रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ वह कह रहा है कि बांग्लादेश सीमा के जरिए पैसे देकर कुछ लोगों की सहायता से भारत में घुसा था। इस तरह की विरोधाभासी बातें संदेह पैदा करती है। अगर यूनुस स्वयं स्वीकार करता है कि यहाँ 400 रोहिंग्या रहते हैं तो वास्तविक संख्या कितनी होगी, इसकी सही जानकारी शायद ही किसी को होगी।

पंचायत के लिए डासना मंदिर जा रहे हिन्दुओं पर लाठीचार्ज; गाजियाबाद पुलिस का कड़ा पहरा: भाजपा MLA ने कमिश्नर को बताया तानाशाह

गाजियाबाद के डासना मंदिर में हिन्दू संगठनों ने रविवार (13 अक्टूबर 2024) को महापंचायत बुलाई गई थी। इस पंचायत का आयोजन महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद के समर्थन में किया गया था। भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर समेत कई साधु-संतों ने इस पंचायत को समर्थन दिया था। पुलिस ने इस ऐलान को देखते हुए निषेधाज्ञा लागू कर दी थी। अब इस आयोजन को हर हाल में पूरा करने में जुटे हिन्दू संगठनों और पुलिस के बीच झड़प की खबर है। इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया और भीड़ को मंदिर तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंचायत में शामिल होने के लिए गाजियाबाद की ही लोनी विधानसभा से भाजपा विधायक नन्द किशोर गुर्जर अपने कई साथियों के साथ डासना मंदिर की तरफ जा रहे थे। रास्ते में उन्हें पुलिस ने रोका, तो उनके समर्थक बहस करने लगे। कुछ ही देर में यह बहस नोकझोक में बदल गई। विधायक के समर्थक पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड को तोड़ कर मंदिर की तरफ जाना चाह रहे थे। हालाँकि पुलिस उनको किसी भी रूप में आगे नहीं बढ़ने दे रही थी।

लाठीचार्ज का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। भीड़ का दबाव बढ़ता देख कर थोड़ी ही देर बाद पुलिस ने बल प्रयोग किया और लाठीचार्ज कर दिया। लाठीचार्ज के बाद भीड़ तितर-बितर हुई। लाठीचार्ज से नाराज हिन्दू संगठन के सदस्यों ने हाइवे पर जाम लगाने की कोशिश की। इस बीच डासना मंदिर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात कर मंदिर के चारों तरफ से बैरिकेड लगा दिए गए।

भाजपा विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को तानाशाह बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि लाखों लोगों को रास्ते में ही रोक दिया गया। कई लोगों के नजरबंद होने का दावा करते हुए नन्द किशोर गुर्जर ने कहा कि पुलिसकर्मियों द्वारा महिलाओं के कपड़े तक फाड़े गए हैं। बकौल नंदकिशोर गुर्जर मंदिर पर हमला कर के कई लोगों की हत्याओं की साजिश रचने वालों के बजाय पुलिस सिर्फ हिन्दुओं पर जोर दिखा रही है।

नन्द किशोर गुर्जर ने कहा कि पंचायत का फैसला साफ है कि पहले तो रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को बाहर किया जाए। दूसरी माँग के तौर पर उन्होंने डासना मंदिर पर हमला करने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई माँगी। तीसरी और अंतिम माँग के तौर पर उन्होंने कहा कि मंदिरों पर हमला करने वालों, खाने-पीने की चीजों में थूक और मूत्र मिला कर जेहाद करने वालों का केस फ़ास्टट्रैक कोर्ट में चला कर जल्द से जल्द सजा दिलाई जाए। इस दौरान उन्होंने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर की गिरफ्तारी की भी माँग की।

मंदिर के मुख्य द्वारा पर तैनात एक पुलिसकर्मी द्वारा किसी संत को माँ की गाली देने का भी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिस ने इस वीडियो की जाँच व आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। कुछ लोग पुलिस की हिरासत में भी बताए जा रहे हैं।

कबाड़ का काम करने गया पुणे, अब मुंबई में बाबा सिद्दीकी की हत्या में धराया: कूरियर से शूटर्स को मिले हथियार-पैसे, लॉरेंस बिश्नोई के गुर्गे ने फेसबुक पोस्ट से ली जिम्मेदारी

मुंबई के एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की निर्मम हत्या ने पूरे शहर में सनसनी फैला दी है। बांद्रा (ईस्ट) में 12 अक्टूबर को हुई इस हत्या के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपितों की पहचान कर ली है, और चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। हत्या को अंजाम देने वाले अपराधियों का संबंध कुख्यात लॉरेंस बिश्नोई गैंग से है, जो पहले भी कई गंभीर अपराधों में शामिल रहा है। बिश्नोई गैंग से जुड़े व्यक्ति ने फेसबुक पर हत्याओं की जिम्मेदारी ली है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में जिन तीन आरोपितों की पहचान हुई है, उनमें से एक हरियाणा का रहने वाला गुरमैल सिंह है। तो बाकी के दोनों उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले धर्मराज कश्यप और शिवा गौतम। शिवा गौतम अभी फरार है।

दोनों अपराधी पुणे में कबाड़ का काम करते थे। इन अपराधियों का संबंध सीधे तौर पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग से बताया जा रहा है, जिन्होंने 50 हजार रुपए लेकर सिद्दीकी की हत्या की। बिश्नोई गैंग का नाम पहले भी हाई-प्रोफाइल हत्याओं और अंडरवर्ल्ड गतिविधियों में आ चुका है। खासकर बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान की हत्या की साजिश में इस गैंग का नाम प्रमुखता से सामने आया था।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग से कनेक्शन

पुलिस की जाँच में खुलासा हुआ है कि बाबा सिद्दीकी की हत्या का पूरा षड्यंत्र लॉरेंस बिश्नोई गैंग के इशारे पर रचा गया था। आरोपितों ने सिद्दीकी की हत्या से पहले इस गिरोह से जुड़े कई लोगों से संपर्क किया था और हत्या की योजना को अंजाम देने के लिए बिश्नोई गैंग से ही हथियार और अन्य संसाधन प्राप्त किए। बिश्नोई गैंग का नाम पहले भी मुंबई में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिशों के कारण चर्चाओं में रहा है, और इस हत्या से यह साफ हो गया है कि यह गैंग राजनीतिक हत्याओं में भी लिप्त हो सकता है।

आरोपितों ने दो महीने तक सिद्दीकी की दिनचर्या पर नजर रखी और उनकी हत्या के लिए सही समय और स्थान का चुनाव किया। उन्होंने बांद्रा में उनके घर के आसपास बार-बार आकर उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी। 12 अक्टूबर की रात, जब सिद्दीकी अपने घर के पास टहल रहे थे, तब आरोपियों ने हमला किया। खास बात यह है कि हमले को दीपावली के पटाखों की आवाज के बीच अंजाम दिया गया, ताकि गोलियों की आवाज सुनाई न दे।

धर्मराज और शिवा ने हत्या के लिए आवश्यक हथियारों को कुछ दिन पहले ही हासिल कर लिया था। इन हथियारों का इंतजाम लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने किया था। आरोपितों को इस हत्या के लिए पहले ही एडवांस में मोटी रकम दी गई थी, ताकि वे इसे सफलतापूर्वक अंजाम दे सकें। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों को पिस्तौल के साथ-साथ बमों का भी इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी गई थी, ताकि वे हमले को बड़ी आसानी से अंजाम दे सकें।

गोलियों की बरसात में हुई हत्या

हमले के दौरान आरोपितों ने बाबा सिद्दीकी पर 6 राउंड गोलियाँ चलाईं, जिनमें से तीन गोलियाँ सीधे सिद्दीकी को लगीं। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। पटाखों की आवाज में गोलियों की आवाज दब गई, जिसके कारण आसपास के लोग तुरंत कुछ समझ नहीं पाए।

हत्या के तुरंत बाद पुलिस ने इलाके के सीसीटीवी फुटेज खंगाले और आरोपितों की पहचान की। यूपी पुलिस की मदद से धर्मराज कश्यप और शिवा गौतम को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ में उन्होंने हत्या की पूरी योजना को कबूल किया और बताया कि यह पूरी साजिश लॉरेंस बिश्नोई गैंग के इशारे पर रची गई थी। इस बारे में बिश्नोई गैंग से जुड़ा एक फेसबुक पोस्ट भी सामने आया है। हालाँकि पोस्ट जिसके नाम से किया गया, वो फरार बताया जा रहा है। इस पोस्ट में काफी कुछ कहा गया है।

फेसबुक पोस्ट ‘शुबू लोंकर महाराष्ट्र’ नाम के अकाउंट से किया गया है। बिश्नोई गैंग ने फेसबुक पोस्ट में कहा, “सलमान खान हम ये जंग चाहते नहीं थे, पर तुमने हमारे भाई (लॉरेंस बिश्नोई) का नुकसान करवाया। आज जो बाबा सिद्दीकी की शराफत के पुल बाँधे जा रहे हैं, वो एक टाइम में दाऊद के साथ मकोका एक्ट में था। इसके मरने का कारण दाऊद को बॉलीवुड, राजनीती, प्रॉपर्टी डीलिंग से जोड़ना था।” इनके अलावा अनुज थापन का नाम भी पोस्ट में है, जिसने सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग की थी, और पुलिस कस्टडी में उसकी मौत हो गई थी। गैंग का कहना है कि यह मौत उसका बदला है।

फोटो साभार:आजतक

लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम पहले भी कई हाई-प्रोफाइल मामलों में आ चुका है। सलमान खान की हत्या की साजिश से लेकर अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से जुड़े कनेक्शन तक, इस गैंग ने मुंबई के आपराधिक जगत में एक गहरी पैठ बना ली है।

पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस हत्या में और कौन-कौन लोग शामिल थे, और क्या इसके पीछे कोई और बड़ा कारण था। बाबा सिद्दीकी की हत्या इस बात की तसदीक करती है कि यह गैंग अब राजनीतिक हत्याओं में भी शामिल हो गया है।

जिसे दिग्विजय सिंह ने कहा ‘शांति का मसीहा’, उसे ‘घटिया-घिनौना-बीमार’ कह रहीं सुप्रिया श्रीनेत: जाकिर नाइक के पुराने फैन रहे हैं कॉन्ग्रेसी

शनिवार (12 अक्टूबर) को कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस्लामिक कट्टरपंथी और नफरत फैलाने वाले उपदेशक ज़ाकिर नाइक की महिलाओं पर की गई यौन उत्पीड़न संबंधी टिप्पणी को लेकर कड़ी आलोचना की।

सुप्रिया ने ट्वीट किया, “इतनी घटिया घिनौनी सोच, बीमार असल में यह खुद हैं।” उन्होंने ज़ाकिर नाइक की उस ताजा टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें नाइक ने महिलाओं, खासकर एंकरों को लेकर अपमानजनक बातें कही थीं।

यह जानना जरूरी है कि कॉन्ग्रेस में शामिल होने से पहले सुप्रिया श्रीनेत ने 17 साल तक बतौर पत्रकार काम किया था, और उन्होंने ईटी नाउ पर न्यूज एंकर के तौर पर भी सेवाएँ दी थीं।

सुप्रिया श्रीनेत के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हाल ही में पाकिस्तान में एक इंटरव्यू के दौरान ज़ाकिर नाइक ने महिलाओं को उन प्रोफेशन्स से दूर रहने की सलाह दी थी, जहां उन्हें कैमरे के सामने आना पड़ता है। नाइक का कहना था कि ऐसा करने से महिलाएँ पुरुषों की वासना का शिकार बनती हैं। इस्लामिक प्रचारक ने कहा, “अगर कोई मर्द महिला एंकर को देख कर वासना महसूस नहीं करता, तो वह मेडिकल रूप से ठीक नहीं है।”

ज़ाकिर नाइक ने यह भी कहा, “अगर आप 20 मिनट तक किसी लड़की को देखकर वासना महसूस नहीं करते, तो आप स्वस्थ नहीं हैं,” और इस दौरान उन्होंने क़ुरान की आयतों का हवाला दिया।

हाल ही में ज़ाकिर नाइक को पाकिस्तान में तीखी आलोचना झेलनी पड़ी थी, जब उसने स्वतंत्र और अविवाहित महिलाओं को ‘बाज़ारू औरत’ कहा था।

सुप्रिया श्रीनेत की ज़ाकिर नाइक पर की गई आलोचना को कॉन्ग्रेस की आधिकारिक राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, भले ही वह पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। यह ज्यादा से ज्यादा उनकी व्यक्तिगत राय है, क्योंकि नाइक ने उनके पुराने प्रोफेशन (धंधे) को खास तौर पर निशाना बनाया था।

किसी भी अन्य कॉन्ग्रेस नेता ने ज़ाकिर नाइक के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है, भले ही उसकी यौन उत्पीड़न संबंधी टिप्पणियाँ जगजाहिर हों। असल में, पार्टी ने कभी औपचारिक रूप से इस नफरत फैलाने वाले इस्लामी कट्टरपंथी की आलोचना नहीं की।

इसके उलट, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ज़ाकिर नाइक को ‘शांति का मसीहा’ कहकर उसकी तारीफ की थी।

उन्होंने कहा था, “अस्सलाम वालेकुम। मैंने डॉ. ज़ाकिर नाइक के बारे में बहुत सुना था। अंततः मुझे उनसे मिलने का मौका मिला। मैं खुश हूँ कि वह दुनिया भर में शांति का संदेश फैला रहे हैं।”

दिग्विजय सिंह ने 2012 में अपने भाषण में कहा था, “डॉ. ज़ाकिर नाइक ने सभी धर्मों की किताबें पढ़ी हैं। अब यह जरूरी है कि आपका शांति का संदेश भारत के हर कोने में पहुँचे।”

कॉन्ग्रेस, ज़ाकिर नाइक और एक छिपा हुआ रिश्ता

हालाँकि उस समय ज़ाकिर नाइक को भगोड़ा घोषित नहीं किया गया था, लेकिन उसके हिंदू धर्म पर हमला करने वाले और कट्टर इस्लामिक भाषण ऑनलाइन उपलब्ध थे।

इसके बावजूद, मुस्लिम तुष्टिकरण के लंबे इतिहास वाली कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह को ज़ाकिर नाइक की तारीफ करने से कोई हिचक नहीं हुई।

यह जानकर कई लोग चौंक सकते हैं कि ज़ाकिर नाइक की इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (IRF) और राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट (RGCT) के बीच गहरे संबंध हैं। IRF ने दो बार RGCT को 50 लाख और 25 लाख रुपये का दान दिया है। और RGCT के ट्रस्टी कोई और नहीं बल्कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी हैं।

भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक उत्थान के लिए संघर्ष के 100 वर्ष: RSS की इस गौरवमयी यात्रा में संघ ने देश के हर पहलू को छुआ

भारत की स्वतंत्रता और उसके बाद के राष्ट्र निर्माण में कई संगठनों ने अपनी भूमिका निभाई, लेकिन जो संगठन निरंतरता और समर्पण के साथ पिछले सौ वर्षों से राष्ट्र की सेवा कर रहा है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)। संघ की यात्रा केवल संगठनात्मक नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा की यात्रा है, जो समाज के हर वर्ग को एकजुट कर भारत को सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से एक सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्यरत है।

RSS की स्थापना: राष्ट्र की सेवा का एक महान विचार

सन 1925 का वर्ष भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने उस समय देश के सामने आ रही चुनौतियों को समझते हुए आरएसएस की स्थापना की। हेडगेवार का यह स्पष्ट विचार था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही भारत को पूर्णरूपेण स्वतंत्र नहीं बना सकती, जब तक कि समाज का संगठनात्मक, सांस्कृतिक और नैतिक पुनरुत्थान न हो।

सन 1925 में विजयदशमी के दिन शुरू हुआ आरएसएस इस विजयदशमी पर अपने 99 वर्ष पूरे करके 100वे वर्ष में प्रवेश कर गया है। डॉक्टर हेडगेवार के अनुसार, समाज को संगठित और सशक्त करने के लिए एक दीर्घकालिक और अनुशासित आंदोलन की आवश्यकता थी, जिसे आरएसएस के माध्यम से साकार किया गया। भारतीय समाज में कई ऐसे तत्व थे, जो इसे भीतर से कमजोर कर रहे थे।

उनका मानना था कि जातिवाद, सांप्रदायिकता और बाहरी सांस्कृतिक प्रभावों ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर दिया था। इनका समाधान केवल संगठित और अनुशासित समाज से ही संभव था, जो देश के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित हो। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए RSS ने एक सशक्त, संगठित और अनुशासित समाज की नींव रखी, जो राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सहायक हो।

संघ का प्रारंभिक स्वरूप और विचारधारा

आरएसएस की शुरुआत बहुत ही छोटे स्तर पर हुई थी। हेडगेवार ने कुछ युवा लोगों को संगठित किया और उन्हें राष्ट्र सेवा, अनुशासन और संगठन के सिद्धांतों से प्रेरित किया। प्रारंभिक शाखाओं में शारीरिक प्रशिक्षण, बौद्धिक चर्चाएँ और राष्ट्रभक्ति की शिक्षा दी जाती थी। संघ की शाखाएँ एक प्रकार से प्रशिक्षण केंद्र थीं, जहाँ हर स्वयंसेवक को राष्ट्रहित में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जाता था।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन और नेतृत्व

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1889 में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा के दौरान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था। कॉन्ग्रेस से जुड़े होने के बावजूद, उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक पुनरुत्थान है। यही विचार उनके जीवन के केंद्र में रहा और आरएसएस की स्थापना में भी इसे ही प्राथमिकता दी गई।

डॉक्टर हेडगेवार ने एक ऐसे संगठन का सपना देखा जो समाज को एकजुट कर सके और हर व्यक्ति को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित कर सके। आखिरकार डॉक्टर हेडगेवार के नेतृत्व में आरएसएस का प्राथमिक लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जो अपने अंदर किसी भी प्रकार की विभाजनकारी मानसिकता को जगह न दे।

उनके विचारों में स्पष्ट था कि भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनने के लिए समाज के सभी वर्गों के बीच समरसता और एकता की आवश्यकता है। इसी विचार के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कार्य करना शुरू किया और धीरे-धीरे यह संगठन पूरे भारत में अपनी शाखाओं के माध्यम से फैलने लगा।

RSS का विस्तार और विकास: गुरुजी का नेतृत्व (1940-1973)

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी के नाम से जाना जाता है, सन 1940 में डॉक्टर हेडगेवार के निधन के बाद संघ के दूसरे सरसंघचालक बने। गुरुजी का कार्यकाल संघ के लिए विस्तार और विचारधारा के सुदृढ़ बनाने का समय था। डॉक्टर हेडगेवार ने जिस नींव पर संघ की स्थापना की थी, गोलवलकर उर्फ गुरुजी ने उसे एक व्यापक रूप दिया।

उन्होंने संघ को न केवल संगठनात्मक रूप से बल्कि वैचारिक रूप से भी सशक्त बनाया। गुरुजी का मानना था कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसकी जड़ें उसकी प्राचीन सभ्यता और मूल्यों में हैं। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने और उसे आधुनिक भारत की पहचान बनाने की दिशा में कार्य किया।

उनके नेतृत्व में संघ ने समाज के हर वर्ग तक पहुँचने और उन्हें राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेरित किया। गुरुजी ने स्वयंसेवकों को यह सिखाया कि राष्ट्र सेवा का अर्थ केवल राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना नहीं है, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में अपना योगदान देना है। चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, ग्रामीण विकास हो या सामाजिक सुधार – स्वयंसेवक हर क्षेत्र में पुनर्निर्माण के लिए कार्य करना है।

संघ पर पहला प्रतिबंध: गाँधी जी की हत्या और संघ का संघर्ष

सन 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद संघ को पहली बार प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद तत्कालीन पंडित नेहरू की अगुवाई वाली सरकार ने आरोप लगाया कि इस घटना के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है। इस आरोप के आधार पर आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और संघ के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 

हालाँकि, संघ का इस हत्या से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रतिबंध लगाया गया। संघ ने इस आरोप को न केवल नकारा, बल्कि अपनी निर्दोषता को साबित करने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी। जाँच आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि संघ का महात्मा गाँधी की हत्या में कोई हाथ नहीं था और इस आधार पर प्रतिबंध हटा लिया गया।

संघ का समाजिक सेवा कार्य और विस्तार

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ गुरुजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी शाखाओं का विस्तार किया और पूरे भारत में अपने कार्यों को फैलाया। संघ के स्वयंसेवक देश के कोने-कोने में समाज सेवा के विभिन्न कार्यों में जुट गए। संघ के सेवा कार्य केवल आपातकालीन परिस्थितियों तक सीमित नहीं थे। संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और समाज कल्याण जैसे क्षेत्रों में भी अहम योगदान दिया।

संघ के स्वयंसेवकों ने आपदा प्रबंधन में भी अग्रणी भूमिका निभाई। विद्या भारती जैसी संस्थाओं के माध्यम से संघ ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दिया। विद्या भारती के तहत संचालित स्कूलों में न केवल शिक्षा दी जाती है, बल्कि भारतीय संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों का भी प्रचार-प्रसार किया जाता है। इसी प्रकार, सेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में सेवा कार्यों को बढ़ावा दिया।

बाला साहेब देवरस: सामाजिक सुधार और दलित उत्थान (1973-1994)

गुरुजी के बाद बाला साहेब देवरस ने सन 1973 में संघ का नेतृत्व सँभाला। उनके कार्यकाल में संघ ने सामाजिक सुधारों की दिशा में बड़े कदम उठाए। बाला साहेब का मानना था कि समाज में जातिवाद और भेदभाव को समाप्त किए बिना सच्चे राष्ट्र निर्माण का सपना साकार नहीं हो सकता। उन्होंने समाज के पिछड़े और दलित वर्गों के उत्थान के लिए कई कार्यक्रम चलाए।

बाला साहेब के नेतृत्व में संघ ने समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाने की दिशा में प्रयास किए। उन्होंने समाज के हर व्यक्ति को समान अधिकार और सम्मान दिलाने के लिए संघ के कार्यों को गति दी। उनके नेतृत्व में संघ ने एक ऐसा समाज बनाने की दिशा में काम किया, जहाँ हर व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं बल्कि उसके गुणों और कार्यों के आधार पर सम्मान मिले।

आपातकाल और दूसरा प्रतिबंध: लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघ का संघर्ष (1975)

सन 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस की सरकार ने आपातकाल की घोषणा की। इसमें संविधान के कई प्रावधानों को निलंबित कर दिया गया और विपक्षी दलों, संगठनों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस समय राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए गुप्त रूप से आंदोलन चलाया। 

संघ के स्वयंसेवकों ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की बहाली के लिए कठिन संघर्ष किया। इस समय संघ के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया, लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष को जारी रखा। सन 1977 में जब आपातकाल समाप्त हुआ और लोकतंत्र की बहाली हुई, तब संघ की भूमिका को व्यापक स्तर पर सराहा गया। 

प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया का नेतृत्व (1994-2000)

प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह को रज्जू भैया के नाम से जाना जाता था। रज्जू भैया संघ के चौथे सरसंघचालक बने। रज्जू भैया एक महान शिक्षाविद् और विद्वान थे, जिन्होंने संघ के कार्यों को शिक्षा और बौद्धिक क्षेत्रों में विस्तार दिया। उनके नेतृत्व में संघ ने शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयास किए और युवाओं को संघ के विचारों से जोड़ने का कार्य किया।

रज्जू भैया का मानना था कि राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी में निहित होता है। उन्होंने संघ के कार्यों को युवाओं तक पहुँचाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेरित करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए। उनके नेतृत्व में संघ ने शैक्षिक सुधार, नैतिक शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

बाबरी मस्जिद विध्वंस और तीसरा प्रतिबंध (1992)

सन 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और संघ पर इस घटना के पीछे होने का आरोप लगा था। इस समय भी संघ ने संयमित रुख अपनाया और कानूनी प्रक्रिया के तहत अपनी निर्दोषता साबित की। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा यह स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य समाज में शांति, समरसता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है। इस घटना के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने समाज को जोड़ने और सांप्रदायिक सद्भावना को पुनः स्थापित करने के लिए कई कदम उठाए।

सुदर्शन जी का नेतृत्व (2000-2009): स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की दिशा में

कुप्प. सी. सुदर्शन, जिन्हें सुदर्शन जी के नाम से जाना जाता है, ने सन 2000 से सन 2009 तक संघ का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में संघ ने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उनका मानना था कि भारत को सशक्त बनने के लिए स्थानीय संसाधनों और परंपराओं का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता के लिए कई कार्यक्रम चलाए।

सुदर्शन जी के कार्यकाल में संघ ने पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग की दिशा में जागरूकता फैलाने के लिए कई अभियान चलाए। उनका नेतृत्व संघ के लिए आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाने का समय था। उन्होंने भारतीय ज्ञान, विज्ञान, और परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने की दिशा में काम किया।

मोहन भागवत: वर्तमान में संघ का नेतृत्व (2009-वर्तमान)

वर्तमान में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत हैं, जिन्होंने साल 2009 में यह पदभार सँभाला। उनके नेतृत्व में संघ ने समाज के हर वर्ग तक पहुँचने के लिए कई नई पहल की। मोहन भागवत का मानना है कि समाज में समरसता, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उनके नेतृत्व में संघ ने समाज के हर वर्ग को एक साथ लाने का प्रयास किया।

उनके नेतृत्व में संघ ने समाज में व्याप्त जातिवाद एवं भेदभाव को समाप्त करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए। इस वर्तमान दौर में महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता प्रमुख मुद्दे हैं, जिन पर संघ विशेष ध्यान दे रहा है। मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ का यह प्रयास है कि भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरे, जहाँ हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले।

संघ का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक योगदान

आरएसएस ने अपने सेवा कार्यों के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक पहुँचने का प्रयास किया है। संघ के सेवा कार्य केवल किसी आपदा या संकट के समय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि यह समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत है। संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुधारों के क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान दिया है।

विद्या भारती जैसे संगठन के माध्यम से संघ ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की है। विद्या भारती के तहत संचालित विद्यालयों में लाखों छात्रों को न केवल शिक्षित किया जाता है, बल्कि उन्हें नैतिक शिक्षा और भारतीय संस्कृति से भी जोड़ा जाता है। इसी प्रकार, सेवा भारती के माध्यम से संघ ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

संघ ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए भी अद्वितीय कार्य किए हैं। संघ ने योग, आयुर्वेद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय ज्ञान और विज्ञान की प्राचीन विधाओं को पुनर्जीवित किया है। संघ के विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भारतीय संगीत, नृत्य, और कला के माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया जाता है। 

संघ एक गैर-राजनीतिक संगठन है, लेकिन इसका प्रभाव भारतीय राजनीति पर दिखता है। संघ ने राजनीति में नैतिकता, सेवा, और राष्ट्रप्रेम के मूल्यों को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। संघ से जुड़े कई राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं और राष्ट्र हित में कार्य कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जैसी राजनीतिक पार्टियों के निर्माण और विकास में संघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

संघ की वैश्विक पहचान और राष्ट्र निर्माण में बढ़ते कदम

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पहचान विश्व स्तर पर स्थापित हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित होकर कई संगठन विदेशों में भी भारतीय संस्कृति, योग और सामाजिक सेवाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। 

संघ 100 वर्षों की यात्रा पूरी करने के बाद भी अपने लक्ष्य और उद्देश्यों के प्रति उतना ही समर्पित है, जितना कि अपने प्रारंभिक दिनों में था। संघ का उद्देश्य समाज के हर व्यक्ति को राष्ट्र सेवा की दिशा में प्रेरित करना और भारत को एक सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना है।

पुलिस वाले का बेटा कैसे बना गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई, जेल में बंद फिर कैसे करवाता है हत्या, क्या सलमान खान से करीबी में गई बाबा सिद्दीकी की जान: सारे सवालों का जवाब एक साथ

एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की शनिवार (12 अक्टूबर 2024) को मुंबई में हत्या कर दी गई। बाबा सिद्दीकी को 6 गोलियाँ मारी गई, जिसमें से तीन उन्हें लगी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। बाबा सिद्दीकी को मुंबई की राजनीतिक और फिल्मी दुनिया में अपने कनेक्शनों की वजह से जाना जाता था। वो कॉन्ग्रेस पार्टी से 3 बार विधायक और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी रहे थे। बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में 2 हमलावर पकड़े गए, जो हरियाणा और यूपी के रहने वाले बताए जा रहे हैं। इनकी पहचान लॉरेंस बिश्नोई गैंग के शूटरों के तौर पर हुई है।

लॉरेंस बिश्नोई का नाम आज भारत में अपराध और गैंगस्टरों की दुनिया में बहुत ऊपर आ चुका है। वह एक ऐसे गैंगस्टर के रूप में उभरा है, जिसने न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने आपराधिक साम्राज्य का विस्तार किया है। उसकी कहानी एक साधारण पुलिस कॉन्स्टेबल के बेटे से शुरू होती है, जो अंततः भारत का सबसे खतरनाक अपराधी बन गया। इस रिपोर्ट में लॉरेंस बिश्नोई के जीवन, उसकी आपराधिक गतिविधियों और उसके गिरोह के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है।

लॉरेंस बिश्नोई की शुरुआती जिंदगी और पढ़ाई-लिखाई

लॉरेंस बिश्नोई का जन्म 12 फरवरी 1993 को पंजाब के फिरोजपुर जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। उसके पिता हरियाणा पुलिस में कॉन्स्टेबल थे, जो 1992 में पुलिस में शामिल हुए थे, लेकिन कुछ साल बाद नौकरी छोड़कर खेती करने लगे। बचपन में लॉरेंस का सपना था कि वह एक बड़ा अधिकारी बने। उसकी माँ को भी उम्मीद थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक सफल व्यक्ति बनेगा। लॉरेंस ने पंजाब विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की और चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल गई जब वह कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में हार गया।

छात्र राजनीति से अपराध की दुनिया तक का सफर

कॉलेज चुनाव में हार ने लॉरेंस के जीवन को पूरी तरह बदल दिया। हार का अपमान वह सहन नहीं कर पाया और उसने अपराध की दुनिया की ओर कदम बढ़ा दिया। इस दौरान उसने छात्र राजनीति के माध्यम से गोल्डी बराड़ से मुलाकात की, जिसने उसे अपराध की दुनिया में खींच लिया। लॉरेंस के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उसने अपना पहला अपराध 2011 में चंडीगढ़ में किया, जब एक लड़ाई के दौरान उसने गोली चला दी। इसके बाद उसके खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज हुई और यहीं से उसका आपराधिक सफर शुरू हो गया।

लॉरेंस की खतरनाक गैंग, कई हाई-प्रोफाइल मामलों में आया नाम

लॉरेंस बिश्नोई ने धीरे-धीरे अपना गिरोह खड़ा करना शुरू किया। उसका सबसे करीबी सहयोगी संपत नेहरा था, जो एक पुलिस इंस्पेक्टर का बेटा था और एक बेहतरीन एथलीट भी था। लॉरेंस की खासियत यह थी कि वह खुद कभी हिटमैन नहीं बना, बल्कि उसने अपने गिरोह के लिए शार्प शूटरों को शामिल किया। बिश्नोई का गैंग उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में सक्रिय है, जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। उसके गैंग में लगभग 700 से ज्यादा शार्प शूटर शामिल हैं, जो उसकी हर योजना को सफल बनाने में सक्षम हैं।

लॉरेंस बिश्नोई का नाम उस समय चर्चा में आया जब उसने 2018 में बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता सलमान खान को जान से मारने की धमकी दी। उसने अपने साथी संपत नेहरा को मुंबई भेजा, ताकि वह सलमान खान को मार सके। हालाँकि, नेहरा को पुलिस ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया, जिससे यह योजना नाकाम हो गई।

सलमान खान को धमकी और बाबा सिद्दीकी पर हमले का कनेक्शन?

लॉरेंस बिश्नोई की सलमान खान से दुश्मनी का कारण 1998 का काले हिराण के शिकार का मामला है, जिसमें सलमान आरोपित थे। बिश्नोई समुदाय ब्लैकबक को पवित्र मानता है और इसी के चलते बिश्नोई ने सलमान को जान से मारने की धमकी दी थी। सवाल उठता है कि क्या बाबा सिद्दीकी की हत्या का संबंध सलमान खान से उनकी नजदीकी के कारण है? बाबा सिद्दीकी और सलमान खान के अच्छे संबंध किसी से छिपे नहीं थे। यह भी संभव है कि लॉरेंस बिश्नोई ने बाबा सिद्दीकी को सलमान खान से नजदीकी के कारण टारगेट किया हो, हालांकि पुलिस की जाँच अभी इस दिशा में स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है।

इसके अलावा, लॉरेंस का नाम पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या में भी आया। 2022 में मूसेवाला की हत्या की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह ने ली। यह हत्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में रही। इसके बाद से ही लॉरेंस और उसके गिरोह पर कानून का शिकंजा कसता चला गया।

सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बढ़ाया दबदबा

लॉरेंस बिश्नोई का एक और अहम पहलू उसकी सोशल मीडिया पर सक्रियता है। जेल में रहते हुए भी उसने सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने डर और आतंक को फैलाने के लिए किया। वह अक्सर अपने गैंगस्टर जीवन की तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करता था, जिससे उसकी छवि और भी डरावनी हो गई। फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर उसकी बढ़ती लोकप्रियता ने उसकी अपराधी छवि को और मजबूत किया। इसके माध्यम से वह नई भर्तियों को आकर्षित करता और अपना आपराधिक नेटवर्क फैलाता था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपराधिक साम्राज्य

लॉरेंस बिश्नोई का गिरोह केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार विदेशों तक फैले हुए हैं। उसके करीबी सहयोगी गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा जैसे अपराधी विदेश से बैठकर भारत में अपराधों को अंजाम देते हैं। लॉरेंस का गैंग न केवल रंगदारी और हत्या जैसे अपराध करता है, बल्कि अवैध हथियारों की तस्करी, फिरौती, और अन्य संगठित अपराधों में भी शामिल है। उसके गैंग का नेटवर्क इतना मजबूत है कि जेल में रहते हुए भी वह अपने गैंग को कंट्रोल करता है और नए अपराधों की योजना बनाता है।

आतंकवाद के भी आरोप, UAPA का केस

लॉरेंस बिश्नोई के खालिस्तानी समर्थकों और आईएसआई से संबंधों की भी जाँच हो रही है। उसकी गतिविधियों पर नजर रखने वाली राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने उसके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामले दर्ज किए हैं। इस आरोप के पीछे की वजह यह है कि बिश्नोई के गिरोह के लोग खालिस्तानी समर्थक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही उसके आईएसआई से भी संबंध होने के आरोप लगे हैं, जो भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है।

लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह की सबसे बड़ी खासियत है कि उसके पास एक मजबूत नेटवर्क और पेशेवर शूटरों की टीम है। ये शूटर किसी भी बड़ी सुपारी को अंजाम देने में सक्षम होते हैं। लॉरेंस की खासियत यह है कि वह जेल में रहते हुए भी अपना अपराधी साम्राज्य चला रहा है। वह कई छोटे गिरोहों के साथ मिलकर बड़े अपराधों को अंजाम देता है, जो उसके गिरोह को और भी खतरनाक बनाता है।

जुर्म की दुनिया का बड़ा नाम

लॉरेंस बिश्नोई का जीवन अपराध और हिंसा से भरा रहा है। वह एक साधारण कॉलेज स्टूडेंट से लेकर भारत के सबसे खतरनाक गैंगस्टर के रूप में उभरा है। उसकी कहानी यह दिखाती है कि किस प्रकार एक साधारण इंसान अपराध की दुनिया में जाकर कितना खतरनाक बन सकता है। उसका गिरोह आज भी सक्रिय है, और भारतीय कानून व्यवस्था के लिए यह एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। उसकी गिरफ्तारी और जेल में बंद होने के बावजूद, उसका आपराधिक नेटवर्क देश और विदेश दोनों जगह सक्रिय है, जो यह साबित करता है कि वह जुर्म की दुनिया का एक बड़ा नाम बन चुका है।

काली मंदिर में चोरी करने वाले 4 संदिग्ध गिरफ्तार, PM मोदी का दिया मुकुट अब तक नहीं मिला: बांग्लादेश के हिंदुओं में असंतोष, भारत सरकार ने जाहिर की थी चिंता

बांग्लादेश के सतखीरा में एक हिन्दू मंदिर में चोरी के मामले में पुलिस ने चार संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। इन संदिग्धों पर श्यामनगर स्थित जेशोरेश्वरी मंदिर से देवी काली की प्रतिमा का मुकुट चुराने का आरोप है। पकड़े गए चोरों की पहचान सार्वजानिक नहीं की गई है। यह मुकुट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2021 में अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान भेंट किया था। चाँदी के इस मुकुट पर सोने का पानी चढ़ा हुआ था जिसे गुरुवार (10 अक्टूबर 2024) को चुरा लिया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला सतरीखा के थानाक्षेत्र श्यामनगर का है। यहाँ स्थित जेशोरेश्वरी माँ काली का मंदिर आसपास के हिन्दू लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर के पुजारी ज्योति प्रकाश चट्टोपाध्याय हैं जिन्होंने गुरुवार को पुलिस में तहरीर दी थी। तहरीर में उन्होंने बताया कि माँ काली की मूर्ति का मुकुट किसी ने चोरी कर लिया है। यह चोरी महज 10-12 सेकेंड के अंदर तब हुई जब मंदिर परिसर में कई श्रद्धालु नवरात्रि के अवसर पर मौजूद थे।

चोरी की घटना CCTV में कैद भी हो गई। इस फुटेज में लगभग 25 वर्षीय एक संदिग्ध मंदिर से मुकुट चुरा कर ले जाता दिख रहा है। मंदिर में आराम से घूमते टहलते हुए इस संदिग्ध ने चोरी के बाद मुकुट को अपनी टी शर्ट में छिपा लिया था। प्रथम दृष्टया में यह माना जा रहा है कि चोर ने इस घटना को पूरी तैयारी करके अंजाम दिया है और उसे मंदिर की भौगोलिक स्थिति के बारे में पूरी जानकारी थी। चोरी का खुलासा तब हुआ जब दिन भर की पूजा अर्चना के बाद मंदिर को बंद किया जा रहा था।

चोरी का केस दर्ज होने के बाद सतखीरा जिला पुलिस ने शुक्रवार (11 अक्टूबर 2024) को अपने फेसबुक पेज पर घटना की CCTV फुटेज शेयर की। तब पुलिस ने लोगों से अपील की थी कि वो संदिग्ध की पहचान करने में मदद करें। इस मदद की एवज में उचित इनाम दिए जाने की भी घोषणा की गई थी। घटना के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के युवा और खेल सलाहकार आसिफ महमूद शोजिब भुइयां ने जेशोरेश्वरी मंदिर का दौरा किया।

आसिफ महमूद शोजिब भुइयां ने पुलिस को निर्देश दिया है कि वो चोर को जल्द से जल्द गिरफ्तार करके मुकुट बरामद करे। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने चोरी की इस घटना पर गहरी चिंता जाहिर की है। इन सभी ने बांग्लादेश के अधिकारियों से अपील की है कि वो चोरी हुआ मुकुट जल्द ही बरामद करें। बताते चलें कि जेशोरेश्वरी मंदिर हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक है।

चोरी के इस मामले में अब तक गिरफ्तार किए गए 4 लोगों लोगों से पूछताछ की जा रही है। फ़िलहाल मुकुट को अभी बरामद नहीं किया जा सका है। मुकुट की बरामदगी में हो रही देरी से बांग्लादेश के हिन्दुओं में निराशा बढ़ रही है। गौरतलब है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 मार्च 2021 को यहाँ स्थापित प्रतिमा पर खुद मुकुट चढ़ाया था। मुकुट के चोरी होने के बाद से अब तक मंदिर में कोई पूजा नहीं हुई है।

सुशांत-दिशा सालियान पर जो रहे चुप, वे बाबा सिद्दीकी पर बेचैन क्यों… जिस हत्या पर मची राजनीतिक रार, उसकी विद्रूप सच्चाइयों को एक नेता ने ही खोला

भारत का भगोड़ा दाऊद इब्राहिम कब का मुंबई से भागकर पाकिस्तान चला गया, लेकिन उसकी दुम के बाल जगह-जगह सफेदपोश बनकर तो कहीं कारोबारी या ड्रग-हवाला-माफिया-अंडरवर्ल्ड रैकेट के एजेंट और बॉलीवुड दुनिया के सितारे बनकर आज तक जीवंत हैं।दिलचस्प है कि मुंबई की महानगरीय एलीट या संभ्रांत समाज-संस्कृति ने इन सभी को बहुत अच्छे से अपने में समाहित कर प्रासंगिक बनाया है। ऊपर से इनको सेलिब्रिटी स्टेट्स भी बखूबी प्रदान किया है, जिनके पीछे देशभर के लोग दीवानगी करते नजर आते हैं। इन फिल्मी सेलिब्रिटीज के कपड़े-घर-गाड़ियों एवं रहन-सहन की चकाचौंध में इनके चाल-चरित्र-चेहरे के बड़े ही घटिया स्तर के ऐब भी छुप जाते हैं।

सुशांत सिंह राजपूत और दिशा सालियन की संदेहास्पद मृत्यु पर कितनी भी परदेदारी क्यों न की जाए, लेकिन सच तो मुंबई की इन चमकीली बदनाम गलियों में गोल-गोल घूम ही रहा है। इस मामले में पुलिस-प्रशासन या सीबीआई कानूनन सत्य को कभी साबित कर पाएगा, इस पर आम लोगों को गंभीर संदेह है। सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं तो इन शातिर गिरोहों से कौन लड़ेगा? सहमति के सिद्धांत पर आधारित सब अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए जुगाड़ लगाने-भिड़ाने में लगे हैं।

भारत में बड़ी संख्या में खाॅंटी मुस्लिमपरस्त, राष्ट्रविरोधी एवं सत्य सनातन हिंदू विरोधी भी सफेदपोश राजनीतिक, व्यवसायी, बॉलीवुड स्टार बनकर एक अलग तरह का घेटो सिस्टम वाला कूप- मंडूक समाज खड़ा कर चुका है। यह जो दूर से दिखता जन्नत वाला समाज है वो नैतिकता के तकाजे पर नरक से कम नहीं है। बाहर से तो लोगों को उनका चमकीला स्वार्गिक सुख दिखाई देता है और लोग उनकी नकल उतारने में भी लगे रहते है। इस फिल्मी दुनिया में सब कुछ स्टेज मैनेज्ड सा लगता है या फिर ऐसा लगता है कि सब कुछ स्पॉन्सर्ड है या फिर प्री प्लांड पीआर (पब्लिक रिलेशन)-ब्रांडिंग-एडवर्टाइजमेंट का मकसद है।

बॉलीवुड में कुछ भी ऐसे ही नहीं होता और ना ही ये स्टार्स कुछ भी बिना मकसद के करते हैं। इनके लिए पीआर एजेंट या कंपनियाँ, यहाँ तक तय करती हैं कि किसी के मरने पर कौन स्टार कब जाएगा, नहीं जाएगा या फिर जाना चाहिए कि नहीं। यह सब कुछ सेलिब्रिटीज की छवि से जुड़े नफा-नुकसान पर आधारित पर पीआर स्टंट की तरह है। सुशांत सिंह राजपूत के मरने पर अस्पताल या शमशान कौन-कौन पहुँचा और फिर बाबा सिद्दीकी के मरने पर कौन-कौन पहुँचा, यह भी एक बड़ा सवाल है! इन सब के पीछे क्यों और किसलिए जोड़कर सवाल की गंभीर पड़ताल करने पर दिलचस्प तथ्य जरूर निकाल सकते हैं।

भारत देश की त्रासदी है कि आजादी के बाद देश के तमाम सामाजिक-राजनीतिक क्रांति करने वाले पुरोधाओं के ऊपर महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू का चेहरा थोप दिया गया और उसके आगे-पीछे मौजूद तमाम पुरोधाओं और महानायकों को भुला दिया गया। आज भारत में बहुत देर से ही सही महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, बीपी मंडल की प्रासंगिकता स्थापित हो सकी है तो यह गैर- कॉन्ग्रेसी सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की देन है।

दिलचस्प है कि आजादी के लगभग 60 सालों तक तो किसी भी दलित-आदिवासी-पिछड़ा नायकों को मान-सम्मान तक नहीं मिला और ना ही उनकी प्रासंगिकता स्थापित हो सकी थी। देश की आजादी के ऐसे महानायक जिनको दोहरी काला पानी की सजा दी गई थी, ऐसे वीर सावरकर जी को स्वतंत्रता सेनानी मानने से इनकार करने वालों की एक बड़ी जमात इस देश में 70 सालों तक राज करती रही थी। यह महज संयोग नहीं था, बल्कि गंभीर प्रयोग था जो भारत को आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान जैसा बनाने की ओर अग्रसर था।

इसी बुनियाद पर सारे साहित्य, शैक्षणिक कोर्स करिकुलम या सिलेबस बनाए गए थे जिसका कोर्स करेक्शन अत्यंत ही जरूरी था। अब कालांतर में प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति अथवा राजनीतिक दल अपनी पार्टियों के नेताओं को स्वयंभू भारत रत्न घोषित करने की परंपरा बना चुके हों तो उस देश को उनके हकीकत के आदर्श पुरोधाओं से वंचित रखने की साजिश भी नजर आती है। आज भारत में एक ओबीसी-अति पिछड़ा समाज के व्यक्ति श्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामाजिक-राजनीतिक और खास धार्मिक समूह की ओर से व्यक्त की जाती है, इसका अध्ययन हमें कई बेहतर निष्कर्ष की ओर ले जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की राजनीतिक सफलताएँ साबित करती है कि राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय एक समानांतर चलने वाली वैचारिक धारा है जिसकी आवश्यकता भारत को है। अबतक समाजवाद, वामपंथ और कॉन्ग्रेस की राजनीति में जिस तरीके से धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को अति-प्रमुखता देकर सामाजिक न्याय की धारा को कुंद करने का काम हुआ, वह दलित-आदिवासी-पिछड़ा समाज के लिए अफीम के नशे से कम नहीं है। पूरे भारतीय सबाल्टर्न समाज को 70 सालों तक छद्म धर्मनिरपेक्षता की घुट्टी पिलाकर सामाजिक न्याय की पूरी राजनीति को मुस्लिमपरस्ती, राष्ट्रविरोध और सत्य सनातन हिंदू विरोध की धारा पर स्थापित करने का काम किया गया है। अब भारत निश्चित तौर पर हर घटना-दुर्घटना और हर पल स्थापित प्रचलित धारणा पर नए तरीके एवं नई दृष्टि से विमर्श की जरूरत को महसूस करने लगा है।

मौत किसी की भी हो दुखद है। वैसे भारत देश में तो किसी अपराधी या आतंकवादी की फाँसी की सजा पर भी प्रोपेगेंडा विमर्श और गंभीर सवाल उठाए जाने की परंपरा रही है। फिर इस सवाल में पीड़ित-मृतक-आरोपी एवं अपराधी की जाति और धर्म भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल बनते रहे हैं। बाबा सिद्दीकी की मौत से जुड़े रहस्यों का पर्दाफाश जरूरी है ही, अपराधियों को सख्त से सख्त सजा भी मिलनी चाहिए। इस बात की पूरी उम्मीद है कि मुंबई और महाराष्ट्र पुलिस का वह रवैया निश्चित ही इस मामले में नहीं होगा जो सुशांत सिंह राजपूत और दिशा सालियान के मामले में था। लेकिन मुंबई की बदनाम गलियों में देर-सवेर यह भी घूमना शुरू हो जाएगा कि किसके पैसे कौन लगाता था? कौन ब्लैक को व्हाइट करता था? किसके हवाला कारोबार थे? और फिर किस सेलिब्रिटीज या सफेदपोशों के कितने पैसे डूबे। बाबा सिद्दीकी की मौत के बाद सामने आ रहे राजनीतिक-सामाजिक-सेलिब्रिटी लोगों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाओं और व्यक्तिगत तौर पर इनकी सक्रिय या बेचैन गतिविधियों में इस बात का जवाब ढूँढने की कोशिश की जा सकती है।

जीवन सबका महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन के प्रति हर व्यक्ति का नजरिया अलग हो सकता है। जो बाबा सिद्दीकी के मौत पर बेचैन हैं, वह निश्चित तौर पर सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर बेचैन नहीं थे और दिशा सालियान की मौत पर तो वे मरघट जैसी चुप्पी साधे हुए थे। बुरा लग सकता है पर खुलकर कहना जरूरी है कि नाली में कीड़े भी तो बड़े मजे से जिंदगी जीते हैं और ये कीड़े मानव जीवन, समाज एवं राष्ट्र के लिए कितने खतरनाक है इसका अंदाजा हम लगा ही सकते हैं। इन कीड़ों को क्या हम अपने ड्राइंग रूम में एक्वेरियम के भीतर इस तरह रख सकते हैं जिस तरह छोटी रंगीन मछलियों को रखते हैं।

जाहिर है कि हर चमकने वाली चीज सोना-चाँदी या हीरा नहीं होती। हर जगह खुदाई करके सोना-चाँदी-हीरा नहीं निकाल सकते और इसकी असली पहचान बहुत हद तक खुदाई करने वाले से ज्यादा जौहरी पर भी निर्भर करता है। भारत का हर आम नागरिक देश-दुनिया में हो रही सभी घटना पर नजर रखे हुए है और पूरी तन्मयता से उसका विश्लेषण करने में जुटा है। सच सिर्फ वही नहीं होता जो कानून या पुलिस-प्रशासन साबित करता है, बल्कि सच वह भी है जो आम जनता जानती है जिसे कोर्ट में साबित नहीं किया जा सकता और कई बार कोर्ट सबूतों के अभाव में सच साबित भी नहीं कर पाती है।

सवाल है कि भारत का समाज 72 हूरों वाले जन्नत के फर्जी अवधारणा या ख्वाब के आधार पर चलेगा या फिर संविधान आधारित नीति-नैतिकता-सिद्धांत और सामाजिक-धार्मिक नैतिकता एवं मर्यादा के आधार पर चलेगा? भारत के भीतर ही यह मुंबई अलग क्यों दिखता है? मुंबई दिशा सालियान, सुशांत सिंह राजपूत और बाबा सिद्दीकी में फर्क क्यों महसूस करता है? इसी सवाल की तह में छुपा है कि यह मुंबई इतना खतरनाक क्यों है?

इस आलेख के लेखक डॉ० निखिल आनंद हैं। निखिल ने लगभग दो दशकों तक पत्रकारिता की है। वे बिहार भाजपा के प्रवक्ता रहे और वर्तमान में भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। ट्विटर/फेसबुक/ इंस्टाग्राम: @NikhilAnandBJP

हरियाणा चुनाव के बाद ‘बेइज्जती’ के पर्यायवाची बने राजदीप सरदेसाई, मुँह पर अंडा लेपने की आई नौबत: कॉन्ग्रेस का ‘प्रचार’ करने में करवाई फजीहत, 3 अनुमान गलत निकले

विवादित पत्रकार राजदीप सरसराई हरियाणा चुनाव से पहले तक हर जगह दावा कर रहे थे कि प्रदेश में कॉन्ग्रेस ही आएगी। नतीजे आए तो उनकी खूब फजीहत हुई। अब उनकी एक क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो ‘द लल्लनटॉप’ के ‘नेतानगरी’ एपिसोड की है। इसमें वो कबूलते नजर आ रहे हैं कि उनकी हरियाणा चुनावों में बहुत बेइज्जती हुई है।

वीडियो में राजदीप कहते हैं- “यहाँ एक अंडे की प्लेट रखी है। मैं इसे अपने चेहरे पर लगाने वाला हूँ ताकि आपका शो वायरल हो जाए। मैंने जो अनुमान लगाए थे उससे मेरी बड़ी बेइज्जती हुई कि लोग ये अंडा मेरे मुँह पर फेंके। गजब बेइज्जती हुई है।”

उनका ये बयान हरियाणा चुनाव के नतीजे देखने के बाद आया है जिसमें भाजपा ने तीसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज की। भाजपा की जीत के बाद सोशल मडिया पर नेटीजन्स राजदीप सरदेसाई जैसे ‘विशेषज्ञों’ को ट्रोल कर रहे थे और पूछ रहे थे कि आखिर उनके दावों का क्या हुआ। अपनी इसी ट्रोलिंग को देख शायद सरदेसाई का ये बयान आया।

राजदीप सरदेसाई की वीडियो

बता दें कि हरियाणा चुनाव से पहले कई बार सरदेसाई को कॉन्ग्रेस की वाहवाही करने अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्मों पर देखा गया था। इनमें से 3 बार का जिक्र हम नीचे कर रहे हैं।

न्यूज तक से बातचीत में सरदेसाई ने कहा था, “मैं दीपेंद्र सिंह हुड्डा के घर पर था। मैंने इतने लंबे समय में किसी कॉन्ग्रेस नेता के घर पर लोगों की इतनी बड़ी भीड़ नहीं देखी। कॉन्ग्रेस इस चुनावी दौड़ में बहुत आगे है। यह दौड़ जीतने में सबसे आगे है।” इस दौरान उन्होंने ये भी कहा था कि हरियाणा में चाहे किसानों का प्रदर्शन हो या महिला पहलवानों का.. सभी मुद्दे कॉन्ग्रेस के पक्ष में हैं।

इसी तरह एक अन्य वीडियो में उनका कहना था हरियाणा में कॉन्ग्रेस के प्रशंसक कम हो गए हैं। वह भाजपा को हार से नहीं बचा सकते। उन्होंने कहा था कि यहाँ तक ​​कि प्रधानमंत्री मोदी, जिन्हें एक दशक पहले तक हरियाणा में इतने प्रेम से देखा जाता था और जिनके दम पर 2014 में पहली बार भाजपा सत्ता में आई… वो मोदी भी अपनी पार्टी को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं और वे भी अब मतदाताओं को नहीं पसंद आ रहे।”

इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने एक प्रीति चौधरी नाम की पत्रकार से वीडियो में बात करते हुए भाजपा का मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि अगर भाजपा को हरियाणा में जीतना है तो उन्हें प्रार्थना करनी होगी। उन्होंने ये भी कहा था हरियाणा में भाजपा के साथ सब गलत हो रहा है चाहे तो कंगना रनौत का बयान देख लो, कैसे समय में आया।

उन्होंने यहाँ लोकसभा सीटों पर बात करते हुए कहा था, “हरियाणा में 90 सीट हैं। कॉन्ग्रेस हर सीट पर बढ़त बना रही है। सिर्फ भिवानी और करनाल ही सीटें जहाँ भाजपा उनसे आगे हैं। तो मेरा ख्याल एक दम साफ है। अगर कोई ऐसा राज्य है जो इस समय सत्ता विरोधी लहर को दर्शाता है जहाँ लोगों में गुस्सा और ऊबाऊपन दोनों हैं तो वो हरियाणा हैं।”