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मुस्लिम युवती से मंदिर की की शादी तो उसके परिजनों ने घर में घुस कर हिन्दू युवक को पीटा, लड़की को भी उठा ले गए: FIR में ज़फर और दिलशेर का नाम

अमरोहा के बछरायूँ में हिंदू लड़के को मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया। दोनों ने 9 मई 2024 को आर्य समाज के मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर ली। इसके बाद से लड़की का परिवार लड़के को धमकी दे रहा था। इस बीच, बीते 19 जुलाई को लड़की के भाईजान, अब्बू जान और चचा जान ने लड़के के घर पर हमला कर दिया और मारपीट करने के बाद लड़की को अपने साथ ले गए। इस मामले में पीड़ित ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। बताया जा रहा है कि पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। युवती बालिग है और अपने अब्बू जान के घर नहीं रहना चाहती, जिसके बाद पुलिस ने युवती को अपनी सुरक्षा में रखा है।

जानकारी के मुताबिक, पीड़ित युवक का नाम विपिन सिंह है। उसने पुलिस को शिकायत दी है कि उसके ससुर अली जफर, साले साहुन और चचिया ससुर दिलशेर ने 19 जुलाई 2024 की रात 9 बजे उसके घर पर धावा बोल दिया और उसकी पत्नी को उठा ले गए। विपिन और उसकी मुस्लिम प्रेमिका ने 9 मई को आर्य समाज मंदिर में विवाह करने के बाद से एक साथ रह रहे थे, लेकिन ससुराल पक्ष को ये रास नहीं आ रहा था। इस पूरे मामले की एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें पूरा घटनाक्रम दर्ज कराते हुए युवक ने पुलिस से कार्रवाई की माँग की है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने विपिन की तहरीर पर युवती के पिता आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए युवती को कोर्ट में पेश किया। बुधवार (24 जुलाई 2024) को युवती ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने बयान दर्ज कराए। फिलहाल युवती को जिला अस्पताल में बनाए गए सेफ हाउस में रखा गया है।

सीओ श्वेताभ भास्कर ने बताया कि युवती द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान का अवलोकन किया जाएगा। युवती के बयान के आधार पर उसकी सुपुर्दगी दी जाएगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि युवती अब अली जफर के घर नहीं जाना चाहती, वो बालिग है। ऐसे में उसे उसके पति के पास भेजा जा सकता है।

देशद्रोही, पंजाब का सबसे भ्रष्ट आदमी, MeToo का केस… खालिस्तानी अमृतपाल का समर्थन करने वाले चन्नी की रवनीत बिट्टू ने उड़ाई धज्जियाँ, गिरिराज बोले – ये देश की संप्रभुता पर हमला

केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने संसद में खड़े होकर खालिस्तानी अमृतपाल सिंह का समर्थन करने वाले कॉन्ग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी की बखिया उधेड़ दी है। पंजाब के मुख्यमंत्री रहे चरणजीत सिंह चन्नी जालंधर से जीत कर आए हैं। उन्होंने कहा कि अमृतपाल को जेल में रखना आपातकाल वाला फैसला है। वहीं उन्होंने रवनीत सिंह बिट्टू से कहा कि आपके दादा उस दिन नहीं मरे जिस दिन उनकी हत्या हुई, बल्कि जिस दिन आपने कॉन्ग्रेस छोड़ी उस दिन उनकी मौत हुई।

इस पर रवनीत सिंह बिट्टू ने स्पष्ट जवाब दिया कि उनके दादा ने कॉन्ग्रेस नहीं, बल्कि देश के लिए बलिदान दिया था। बता दें कि पंजाब के CM रहे बेअंत सिंह की अगस्त 1995 में खालिस्तानी आतंकियों ने बम ब्लास्ट में मार डाला था। उनके पोते रवनीत सिंह बिट्टू लुधियाना से 20,942 वोटों से हार गए थे, फिर भी तीसरी मोदी सरकार में उन्हें रेलवे और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया। 2021 में मार्च से जुलाई के बीच वो बतौर कॉन्ग्रेस सांसद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे थे।

रवनीत सिंह बिट्टू ने लोकसभा में चरणजीत सिंह चन्नी को करारा जवाब देते हुए कहा, “कोई चन्नी की जायदाद पूछे, ये गरीबी की बात कर रहे हैं। अगर सारे पंजाब का सबसे अमीर और भ्रष्टाचारी आदमी ये न हो तो मैं अपना नाम बदल दूँगा। हजारों करोड़ रुपयों का मालिक है ये चरणजीत सिंह चन्नी। और ये गोरा किसको कह रहे हैं? ये बताएँ कि सोनिया गाँधी कहाँ से हैं? MeToo में ये, सारे केसों में ये।” संसद में बिट्टू के इस आक्रामक जवाब का वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है।

उधर केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने भी ‘कॉन्ग्रेस का हाथ, खालिस्तानियों के साथ’ कह कर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी का हत्यारा खालिस्तानी था और कॉन्ग्रेस उसी खालिस्तानी का समर्थन कर रही है। उन्होंने इसे भारत की संप्रभुता पर हमला बताते हुए कार्रवाई की माँग की। वहीं रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि एक पूर्व मुख्यमंत्री देशद्रोही की तरह व्यवहार कर रहा है, देश को गुमराह कर रहा है। उन्होंने कहा कि NSA किसानों पर नहीं, देश को तोड़ने की साजिश रचने वालों पर NSA लगा है। उन्होंने कहा कि अपने दावे के पक्ष में चन्नी सबूत नहीं दिखा पाए।

‘ये शेरो-शायरी नहीं चलेगी’: स्कूल में संस्कृत श्लोक पढ़ने पर प्रिंसिपल ने छीन ली माइक, सिस्टर कैथरीन के खिलाफ ABVP का प्रदर्शन

मध्य प्रदेश के गुना जिले में स्थित वंदना कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों द्वारा संस्कृत श्लोक का पाठ किए जाने पर प्रिंसिपल नाराज हो गई और बच्चों के साथ से माइक छीन लिया। जिसके बाद वहाँ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं ने गुना में वंदना कॉन्वेंट स्कूल में विरोध प्रदर्शन किया। कथित तौर पर प्रिंसिपल ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि उस दिन भाषणों के लिए केवल अंग्रेजी की अनुमति थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (15 जुलाई 2024) को गुना के वंदना कॉन्वेंट स्कूल में छात्र असेंबली कार्यक्रम हो रहा था। उस कार्यक्रम में एक छात्र ने संस्कृत का श्लोक बोल दिया, जिस पर स्कूल की प्रिंसिपल भड़क गईं और छात्र के हाथ से माइक छीन लीं। इस घटना के बाद विद्यार्थी परिषद के सक्षम दुबे, ध्रुव सिंह किरार ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है।

छात्रों का कहना है कि सुबह स्कूल में छात्र असेंबली कार्यक्रम हो रहा था। स्कूल के छात्र धुर्ब पलिया और गौरव किरार ने हिंदू संस्कृति के अनुसार संस्कृत में स्पीच की शुरुआत की। छात्रों ने संस्कृत श्लोक सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संतु निरामया का वाचन किया, जिसके बाद स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर कैथरीन ने नाराज होकर बच्चों से माइक छीन लिया और उसे स्पीच देने से रोक दिया। बच्चों से सिस्टर कैथरीन ने बोला कि यह सब शायरियाँ यहाँ नहीं चलेंगी, इंग्लिश में बोलो।

इस मामले में, जिला शिक्षा अधिकारी चंद्र शेखर सिसोदिया ने स्कूल प्रिंसिपल को नोटिस जारी किया। स्कूल प्रबंधन ने बताया कि सुबह की सभा में चुने हुए छात्र आमतौर पर हिंदी और अंग्रेजी में भाषण देते हैं। उस दिन भाषण अंग्रेजी में होना था, लेकिन छात्र ने हिंदी में बोलना शुरू कर दिया। शिक्षक ने उसे हिंदी में बोलने के लिए कहा।

प्रदर्शनकारियों ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग की। वे यह भी चाहते थे कि जिस संस्कृत श्लोक को पढ़ने से छात्र को रोका गया था, उसे दैनिक स्कूल प्रार्थना में शामिल किया जाए और उन्होंने प्रिंसिपल को बर्खास्त करने की माँग की। विरोध प्रदर्शन करीब दो घंटे तक चला। जिला शिक्षा अधिकारी मौके पर पहुँचे और आश्वासन के बाद स्थिति शांत हुई।

‘दरबार हॉल’ अब कहलाएगा ‘गणतंत्र मंडप’, ‘अशोक हॉल’ बना ‘अशोक मंडप’: महामहिम द्रौपदी मुर्मू का निर्णय, राष्ट्रपति भवन ने बताया क्यों बदला गया नाम

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में स्थित ‘दरबार हॉल’ और ‘अशोक हॉल’ का नाम बदल दिया गया है। जहाँ ‘दरबार हॉल’ को अब ‘गणतंत्र मंडप’ के नाम से जाना जाएगा, वहीं ‘अशोक हॉल’ अब ‘अशोक मंडप’ कहलाएगा। स्वयं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ये निर्णय लिया है। उनके दफ्तर द्वारा जारी की गई विज्ञप्ति में कहा गया है कि राष्ट्रपति भवन देश का प्रतीक है, साथ ही जनता के लिए एक बहुमूल्य विरासत है। कहा गया है कि आम लोगों की यहाँ तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की प्रेस सलाहकार नाविका गुप्ता द्वारा हस्ताक्षरित विज्ञप्ति को गुरुवार (25 जुलाई, 2024) को जारी किया गया। इसमें लिखा है, “इसके लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं कि राष्ट्रपति भवन का वातावरण भारत की संस्कृति, मूल्यों एवं लोकाचार का प्रतिनिधित्व करे। इसी क्रम में राष्ट्रपति भवन के 2 हॉल्स ‘दरबार हॉल’ और ‘अशोक हॉल’ का नया नामकरण करने का निर्णय द्रौपदी मुर्मू ने किया है। ‘दरबार हॉल’ अब ‘गणतंत्र मंडप’ के रूप में जाना जाएगा, वहीं ‘अशोक हॉल’ अब ‘अशोक मंडप’ कहलाएगा।”

बता दें कि राष्ट्रपति भवन में सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रम ‘दरबार हॉल’ में ही होते रहे हैं। जैसे, राष्ट्रीय पुरस्कार यहीं पर दिए जाते हैं। राष्ट्रपति भवन ने बताया है कि ‘दरबार’ का अर्थ हुआ कोर्ट, जैसे भारतीय शासकों या अंग्रेजों के दरबार। बताया गया है कि अब जब भारत गणतंत्र बन गया है तो ये शब्द अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। बताया गया है कि गणतंत्र की अवधारणा भारतीय समाज एवं प्राचीन इतिहास में रचा-बसा है, इसीलिए इस स्थल का नाम ‘गणतंत्र भवन’ रखा गया है।

वहीं ‘अशोक हॉल’ पहले सामूहिक नृत्य के लिए इस्तेमाल किया जाता था। राष्ट्रपति भवन ने प्रेस विज्ञप्ति में समझाया है कि अशोक शब्द का अर्थ है जो सभी दुःखों से रहित हो, ये भारत के प्राचीन सम्राट का नाम है, ऐसे में ये एकता एवं सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय चिह्न भी सम्राट अशोक के स्तम्भ से लिया गया शेरों का समूह है। इसी तरह भारतीय संस्कृति में अशोक वृक्ष का भी महत्व है। राष्ट्रपति भवन ने कहा कि ‘अशोक मंडप’ भाषा की मर्यादा के हिसाब से सही नाम है।

जिसका इंजीनियर भाई एयरपोर्ट उड़ाने में मरा, वो ‘मोटू डॉक्टर’ मारना चाह रहा था हिन्दू नेताओं को: हाई कोर्ट से माँग रहा था रहम, मिली फटकार

कर्नाटक हाई कोर्ट ने आतंकी मोटू डॉक्टर उर्फ़ सबील अहमद की याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया है। मोटू डॉक्टर पर कर्नाटक और महाराष्ट्र में हिन्दू नेताओं की हत्या की साजिश में शामिल होने का मामला चल रहा है। मोटू डॉक्टर चाहता है कि उसे कोर्ट इस आरोप से बरी कर दे।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने सबील अहमद की याचिका पर बुधवार (24 जुलाई, 2024) को सुनवाई की। कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि उसे NIA द्वारा दर्ज इस मामले में कोई राहत नहीं दी जा सकती। सबील अहमद ने दावा किया कि ऐसे ही एक मामले में उसे दिल्ली की एक अदालत से राहत मिल चुकी है जिसे इस मामले में भी लागू हो किया जाए।

सबील अहमद के इस दलील को कोर्ट ने नहीं माना और कहा कि दोनों मामले एक जैसे दिख सकते हैं और दोनों में कुछ गवाह भी समान हो सकते हैं, लेकिन मामला अलग है और यह चलता रहेगा। कोर्ट ने इस मामले में सबील अहमद की याचिका खारिज कर दी।

गौरतलब है कि सबील अहमद उर्फ़ मोटू डॉक्टर पर आरोप है कि उसने 2012 में एक साजिश में हिस्सा लिया था। इसके अंतर्गत लश्कर ए तैयबा में जुड़ कर हिन्दू नेताओं, पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों को मारने की योजना रची जा रही थी। सबील अहमद इस योजना के अंतर्गत हथियार और पैसा जुटा रहा था।

सबील अहमद इस मामले का भंडाफोड़ होने के बाद 2010 में सऊदी अरब चला गया था। उसे 2020 में वापस भारत प्रत्यर्पित किया गया था। इसके बाद उसे NIA ने गिरफ्तार कर लिया था। सबील अहमद की गिरफ्तारी के बाद से उसके खिलाफ मुकदमा चल रहा है।

सबील अहमद के खिलाफ NIA ने कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली में उसके विरुद्ध दर्ज किया गया मामला साजिश रचने का है जबकि बेंगलुरु में चल रहा मामला साजिश का हिस्सा लेने है। ऐसे में दोनों मामले अलग हैं और दिल्ली के मामले के आधार पर उसे कोई राहत ना दी जाए। NIA ने आरोप लगाया कि वह लगातार उन बैठकों का हिस्सा था जहाँ यह साजिश रची जाती थी।

बेंगलुरु का रहने वाला सबील अहमद आतंकी कफील अहमद का भाई है। एयरोनॉटिकल इंजीनियर कफील अहमद ने 2007 में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर के एयरपोर्ट पर खुद को उड़ा लिया था। इस आत्मघाती हमले में और कोई नहीं मरा था जबकि कफील के चीथड़े उड़ गए थे।

समतल कर दिया पैगंबर मुहम्मद की अम्मी-अब्बू का कब्र, बीवी खदीजा का घर बना डाला शौचालय, वो मस्जिद भी बंद… जहाँ पढ़ते थे नमाज: मक्का, मदीना पर वहाबी इस्लाम की पकड़

इस्लाम मजहब के सबसे पाक जगहों मक्का और मदीना सऊदी अरब का हिस्सा है। सऊदी अरब में हर साल लाखों लोग हज यात्रा के लिए पहुँचते हैं। आम तौर पर इस्लाम में मूर्ति पूजा की मनाही है, लेकिन जितनी कट्टरता से वहाबी और सऊद घराना मूर्तिपूजा से नफरत करता है, उतना शायद ही कोई करता हो। सऊदी अरब में कई ऐसे इस्लामिक केंद्र रहे थे, जो मूर्ति पूजा को बढ़ावा दे सकते थे, सऊदी अरब की सरकार और वहाबियों ने उन्हें जब से ही तबाह कर दिया या फिर उनके इस्तेमाल के तरीके को ही बदल दिया।

इससे पहले कि हम इस बात पर को बताएँ कि ‘मूर्ति पूजा’ का दमन करने के लिए किस तरह से ऐतिहासिक ढाँचों को बर्बाद किया जा रहा है, उससे पहले ये जानना जरूरी है कि वहाबी कौन हैं और सऊद घराने का अस्तित्व किस बात से जुड़ा है।

वहाबी सुन्नी इस्लाम का सबसे रूढ़िवादी शाखा है। इस्लाम की इस कट्टरपंथी शाखा को वहाबिज्म कहा जाता है, जिसकी स्थापना 18वीं शताब्दी में मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने की थी। वहाबी पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रचलित और प्रचारित इस्लाम के “शुद्ध” रूप की ओर ‘वापस लौटने’ का प्रयास करते हैं। वहाबीवाद सख्त एकेश्वरवाद पर जोर देता है और मूर्ति पूजा जैसी प्रथाओं का कड़ा विरोध करता है क्योंकि यह उसे शिर्क ‘पाप’ बताता है। यही नहीं, वहाबी तो संतों/सूफियों और इस्लाम से जुड़े प्रतीकों को भी मानने से इन्कार करता है। यानी वहाबियों के हिसाब से दरगाहों पर जाकर अपने पुरखों को भी याद करना ‘शिर्क’ है।

इस्लाम की कट्टर वहाबी शाखा की शुरुआत करने वाले मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने दिरियाह में पनाह ली थी, जो आज के दिनों में रियाद शहर के बाहरी इलाके में स्थित छोटा सा शहर नखलिस्तान कहा जाता है। दिरियाह पर अल सऊद के सरदार मुहम्मद इब्न सऊद का शासन था। सऊद ने न सिर्फ वहाब को हिजाज़ (इसी में मक्का-मदीना आते थे) से बाहर निकाले जाने के बाद उसे रहने की जगह दी, बल्कि उसके साथ साल 1744 में एक समझौता भी किया। इस “वहाबी-सऊदी समझौते” के तहत पहले सऊदी राज्य की स्थापना हुई, जिसमें मुहम्मद इब्न सऊद को अमीर की पदवी मिली, जबकि वहाब को “इमाम” की उपाधि दी गई।

ये समझौता मजबूत रहे, इसके लिए इब्न सऊद के सबसे बड़े बेटे ने अल-वहाब की बेटी से निकाह किया और इसके बाद अल सईद ने सार्वजनिक रूप से वहाबिज्म को स्वीकार कर लिया। वहाब के इस कट्टरपंथी इस्लाम ने मजहबी सुधारों का तीखा विरोध किया और सूफी कार्यक्रमों, संतों की इबारत पर रोक लगा दी। यही नहीं, नजद के बाहर जब सऊद ने जीत दर्ज की, तो उसके नेतृत्व में शिया मस्जिदों को ध्वस्त कर दिया गया। यही नहीं, शियाओं को अलग दिखाने के लिए उन्हें ‘रफीदा’ (अस्वीकार करने वालों) का अपमानजनक टैग दिया, जो आज भी जारी है। पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश में शियाओं को काफिर मान कर उनका दमन किया जाता है।

वहाबी विचारधारा के कट्टरपंथी विचारों की नवजह से सऊदी अरब के कई ऐतिहासिक स्मारकों को व्यवस्थित तरीके से बर्बाद कर दिया गया। वहाबियों का मानना था कि ऐसी ऐतिहासिक जगहों को बचाने से मूर्ति पूजा को बढ़ावा मिलेगा और लोग प्रतीकों को मानने लगेंगे, जोकि इस्लाम के खिलाफ है। ऐसे में उन्होंने कई ऐतिहासिक और धार्मिक ढाँचों को नष्ट कर दिया। इसके साथ ही किसी भी तरह की इबादत और मजहबी यात्रा पर बैन लगा दिया गया, जिसमें अल्लाह के अलावा किसी को भी मानने की बात हो।

कर्बला में हुसैन इब्न अली की कब्र को किया तबाह

साल 1802 में सऊद बिन अब्दुल-अजीज की अगुवाई में वहाबियों की सेना ने कर्बला शहर पर हमला किया। कर्बला उस समय तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य में आता था। कर्बला आज भी शिया मुस्लिमों के लिए पाक शहर है, लेकिन दिरिया पर हमले के दौरान अब्दुल अजीज की अगुवाई वाली सेना ने हुसैन इब्न अली की कब्र को नष्ट कर दिया, हजारों शिया मुस्लिमों को मार डाला और शहर को लूट लिया। वहाबियों ने मुहर्रम के महीने से ठीक पहले दो से पाँच हजार से अधिक शियाओं का नरसंहार किया।

हालाँकि मौजूदा समय में कर्बला इराक में है, लेकिन शियाओं के इस पवित्र स्थल पर वहाबी-सऊदी हमले से वहाबियों की कट्टरपंथी मानसिकता को एक्सपोज कर दिया। वहाबी लोग शफ़ाअत (शफ़ाअत) जैसे कर्मकांडों को शिर्क (बहुदेववाद/मूर्तिपूजा) के संकेत मानते हैं। शफ़ाअत का मतलब है, मुस्लिम संत (सूफियों) के ज़रिए अल्लाह से प्रार्थना करना, कब्रों पर इमारतें (दरगाह) बनाना, तीर्थयात्रा (ज़ियाराह) और तवस्सुल (अल्लाह के नजदीक जाने के लिए की जाने वाली इबारत), जिसका वहाबी कड़ा विरोध करते हैं।

कर्बला को तबाह करने के महज 4 साल के भीतर ही साल 1806 तक वहाबियों ने मदीना शहर पर कब्ज़ा कर लिया और उन इमारतों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया, जिनसे उन्हें डर था कि वे मूर्तिपूजा को बढ़ावा देंगी। वहाबी ताकतों ने जन्नत-अल-बाकी कब्रिस्तान के अंदर और बाहर सभी गुंबदों और ढाँचों को नष्ट कर दिया। यह कोई साधारण कब्रिस्तान नहीं था, बल्कि मदीना के हिजाज़ में पहला इस्लामी कब्रिस्तान था। उन्होंने इस्लामी महत्व की अन्य इमारतों के अलावा फातिमा अल-ज़हरा की मस्जिद, अल-मनरतैन की मस्जिद और क़ुब्बत अल-थानाया को भी नष्ट कर दिया।

अल बाक़ी कब्रिस्तान की एक ताज़ा तस्वीर (स्रोत: अल अरबिया)

साल 1816 में दिरिया के अमीर अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन सऊद के खिलाफ़ ओटोमन सेना का नेतृत्व करने वाले मिस्र के वली मुहम्मद अली पाशा के बेटे तुसुन पाशा की मौत हो जाने के बाद साल 1818 में सुल्तान महमूद द्वितीय के नेतृत्व में ओटोमन खिलाफत ने वहाबियों को कुचलने का फैसला किया। इसी क्रम में तुसुन पाशा के बेटे इब्राहिम पाशा ने दिरिया में सेना का नेतृत्व किया और वहाबियों को बुरी तरह से हराकर मक्का-मदीना पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके साथ ही सऊद की पहली सल्तनत यानी राज खत्म हो गया। सऊद कबीले की हार और वहाबियों की हार के बाद ओटोमन साम्राज्य ने फिर से मस्जिदों को बनवाया। ओटोमन साम्राज्य ने पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा अल-ज़हरा, ज़ैनुल ‘अबिदीन (‘अली बिन अल-हुसैन), मुहम्मद इब्न ‘अली अल-बाकिर और जाफ़र अल-सादिक की कब्रों पर गुंबद का निर्माण भी कराया।

ओटोमन साम्राज्य द्वारा इन मस्जिदों, दरगाहों के फिर से निर्माण का सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल पाया, क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद सऊद कबीला फिर से उभरा और उसने साल 1924 में फिर से मक्का और मदीना पर कब्ज़ा कर लिया। वहाबी-सऊद ने जन्नत उल बक़ी कब्रिस्तान पर फिर से हमला बोलकर कब्रों, मस्जिदों, गुंबदों और अन्य ढाँचों को तबाह कर दिया। 25 अप्रैल 1925 को राजा इब्न सऊद की अनुमति से वहाबी ताकतों ने मकबरों, गुंबदों और कब्रों को नष्ट कर दिया। यहाँ नष्ट की गई कब्रों में पैगंबर मुहम्मद की अम्मी अमीना, अब्बू अब्दुल्ला इब्न अब्दुल-मुत्तलिब और प्रमुख इमामों के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों की कब्रें भी शामिल थीं।

जन्नत-उल-बकी कब्रिस्तान की एक पुरानी तस्वीर स्रोत: Cities from Salt

आज भी वहाबी मौलवी ऐसे कई ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी जगहों को बर्बाद करने को उचित ठहराते हैं कि जो लोग मर गए, उनकी इबादत से अल्लाह की इबादत में खलल पड़ती है।

मक्का-मदीना के विकास और विस्तार की आड़ में कई प्राचीन संरचनाओं को किया गया तबाह

उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने ग्रैंड मस्जिद में ज्यादा लोगों के आने के लिए 4 प्रमुख विस्तार परियोजनाएँ शुरू की। किंग अब्दुल अजीज ने साल 1955 में ऐसा पहला प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें नए फ्लोर्स का निर्माण, नया बड़ा आँगन, बिजली की रोशनी और पंखे लगाए जाने थे। ऐसा दूसरा प्रोजेक्ट साल 1988 में किंग फहद ने शुरू किया, जिसमें ग्रैंड मस्जिद के पूर्वी और पश्चिम किनारों पर नए पंखे लगाने, मीनारों के निर्माण, एक्सेलेटर और एसी सिस्टम लगाने जैसी सुविधाएँ बनाई गई।

साल 2008 में किंग अब्दुल्ला इब्न अब्दुलअजीज के नेतृत्व वाली सऊदी सरकार ने ग्रैंड मस्जिद के विस्तार को मंजूरी दी, जिसमें इसके उत्तर और उत्तर-पश्चिम में 3,200,000 वर्ग फीट भूमि का अधिग्रहण शामिल था। 2011 में किंग अब्दुल्ला की सरकार ने घोषणा की कि 21 बिलियन डॉलर की लागत वाली “किंग अब्दुल्ला विस्तार परियोजना” के तहत मीनारों सहित कई नई संरचनाएँ खड़ी की जाएंगी और 2.5 मिलियन हज तीर्थयात्रियों की जगह के लिए परिक्रमा (मताफ़) क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। इसके बाद से मक्का-मदीना के कई ऐतिहासिक स्थलों को बर्बाद कर दिया गया।

मक्का-मदीना में जो चीजें नष्ट की गई, उसमें ऑटोमन साम्राज्य द्वारा बनवाया गया महत्वपूर्ण वास्तुशिल्प पोर्टिको भी शामिल है। इसे 17वीं शताब्दी में बनाया गया था, जो अपने शानदार मेहराबों और खंबों के लिए मशहूर थी। ऑटोमन पोर्टिको को तोड़े जाने की वजह से साल 2013 में तुर्की में काफी विरोध हुआ। यही नहीं, अब्बासियों को बनाए गए ग्रैंड मस्जिद के कुछ अहम हिस्सों को भी इस दौरान नष्ट कर दिया गया।

ऑटोमन पोर्टिको (स्रोत: सीएनएन)

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1985 से अब तक 98% ऐतिहासिक और इस्लामी विरासत स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया है। आलोचकों का आरोप है कि सऊदी सरकार इतिहास को “मिटाना” चाहती है। ऐसी ही एक खास विरासत, जो पैगंबर मुहम्मद के चाचू हमजा का घर था, उसे होटल बनाने के लिए तोड़ दिया गया।

यही नहीं, वहाबियों और सऊद की जोड़ी ने पैगम्बर मुहम्मद की बीवी खदीजा का घर भी तोड़ दिया गया। खदीजा के घर की जगह पर एक दशक पहले 1400 सार्वजनिक शौचालय बना दिए गए। ब्रिटिश इतिहासकार जियाउद्दीन सरदार ने अपनी किताब मक्का: द सेक्रेड सिटी में भी इसकी पुष्टि की है।

सरदार ने लिखा, “यह परिसर अल-अयाद किले के ऊपर बना था, जिसे 1781 में बनाया गया था और अब यह मक्का को हमलावरों से बचाने का अपना काम नहीं कर सकता। ग्रैंड मस्जिद कॉम्प्लेक्स के दूसरे छोर पर, जैसा कि इसे अब कहा जाता है, पैगम्बर मुहम्मद की पहली पत्नी खदीजा का घर शौचालयों के एक ब्लॉक में बदल दिया गया है। रॉयल मक्का क्लॉक टॉवर पवित्र मस्जिद के ऊपर मँडराती एकमात्र इमारत नहीं है। यहाँ रैफल्स मक्का पैलेस है, जो एक लग्जरी होटल है, जहाँ चौबीसों घंटे बटलर सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा मक्का हिल्टन भी है, जो पैगम्बर के सबसे करीबी साथी और पहले खलीफा अबू बकर के घर के ऊपर बना है। यहाँ इंटरकॉन्टिनेंटल मक्का जैसे कई ढाँचे हैं। इस ब्लॉक में कई अन्य पाँच सितारा होटल और ऊँचे-ऊँचे अपार्टमेंट ब्लॉक हैं।”

उन्होंने आगे लिखा है, “अगले दशक के दौरान पवित्र मस्जिद के नीचे की ओर 130 स्काईस्क्रैपर (बहुमंजिली इमारतें) बनाए जाएँगे, ताकी इसमें 5 मिलियन लोग यानी 50 लाख हज यात्री एक साथ आ सकें। इतिहास को तबाह करने के लिए सऊदी अरब ऑटोमन-जमाने के निर्माण को ध्वस्त कर रहा है, खासकर वो हिस्सा, जो सबसे पुराना है। 1553 से 1629 तक ओटोमन सुल्तानों – सुल्तान सुलेमान, सुल्तान सलीम I, सुल्तान मुराद III और सुल्तान मुराद IV और उनके उत्तराधिकारियों ने जो शानदार मस्जिद बनवाए, उन सबको तोड़ दिया जाएगा और एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग का निर्माण किया जाएगा।”

सरदार ने आगे लिखा है, “पैगंबर के साथियों के नाम जिन खंबों पर लगे हैं, उन्हें भी ध्वस्त कर दिया जाएगा। वास्तव में पुरानी मस्जिद को पूरी तरह से बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जाएगा। इतिहास इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर इब्न जुबैर से शुरू होता है, जिन्होंने काबा के पुनर्निर्माण के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था, और अब्बासी खलीफाओं तक, जिन्होंने मौजूदा मस्जिद बनाई थी। वो सबकुछ तोड़ दिया जाएगा। उसकी जगह पर 12 फ्लोर की नई बिल्डिंग बनाई जाएगी, ताकी हज पर आने वाले लोग ‘शैतानों को पत्थर मार’ सकें। ऐसा लगता है कि कुछ ही समय में पैगंबर मोहम्मद के घर को भी ढहा दिया जाएगा, जो भव्य रॉयल पैलेस के सामने है। उसे जमींदोज कर कार पार्किंग की जगह पर बदल दिया जाएगा।”

जियाउद्दीन सरदार की पुस्तक मक्का: द सेक्रेड सिटी का पेज

इसी कड़ी में 13 अगस्त 2002 को मदीना में मस्जिद-ए-नबवी से चार किलोमीटर दूर स्थित पैगंबर मुहम्मद के वारिसों में नौंवें नंबर पर आने वाले सैयद इमाम अल-उरैदी इब्न जाफर अल-सादिक की 1,200 साल पुरानी मस्जिद और मकबरे को धमाके से उड़ा दिया गया और पूरी तरह से तबाह कर दिया गया।

यही नहीं, साल 2003 में एक ऐतिहासिक ओटोमन अज्याद किला जो कभी मक्का को हमलों से बचाता था और 200 साल से भी ज़्यादा पुराना था, उसे ध्वस्त कर दिया गया। इसकी जगह पर 601 मीटर ऊँचा मक्का रॉयल होटल क्लॉक टॉवर बना दिया गया। यह क्लॉक टॉवर ‘बिन लादेन ग्रुप’ ने बनाया है, जिसमें पाँच मंज़िला शॉपिंग मॉल, लग्जरी होटल, पार्किंग आदि शामिल हैं।

अज्याद किला (स्रोत: विकिपीडिया)

तुर्की ने अज्याद के किले को बचाने के लिए यूनेस्को से हस्तक्षेप की माँग की थी, लेकिन यूनेस्को ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। यही नहीं, मक्का-मदीना में सड़कों को बनाने के लिए कई पहाड़ों को भी काट दिया गया। साल 2013 में मदीना के उत्तर में उहुद पहाड़ी में दरार को कंक्रीट से भर दिया गया था। रिपोर्ट्स कहती हैं कि 625 ई. में कुरैश के खिलाफ उहुद की लड़ाई में घायल होने के बाद पैगंबर मुहम्मद को वहाँ ले जाया गया था। इतना ही नहीं, आज हिल्टन होटल जिस जगह पर है, उस जगह पर इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर हुआ करता था, उस जगह को भी समतल किया जा चुका है।

मदीना में हिल्टन होटल (स्रोत: हिल्टन की वेबसाइट)

इस्लामिक हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक, इतिहासकार और पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. इरफान अल-अलावी ने एक अनुमान के तौर पर बताया है कि विकास कार्यों की आड़ में सऊदी सरकार ने पिछले कुछ सालों में 300 से ज्यादा इस्लामिक ऐतिहासिक विरासत के ढाँचों को नष्ट कर दिया है।

टाइम मैगज़ीन की 2014 की रिपोर्ट में बताया गया, “मदीना में छह छोटी मस्जिदें, जहाँ माना जाता है कि मुहम्मद ने नमाज़ पढ़ी थी, बंद कर दी गई हैं। इस्लाम के पहले खलीफ़ा अबू बकर की सातवीं मस्जिद को एटीएम बनाने के लिए ढहा दिया गया है।” यही नहीं, पैगंबर मुहम्मद की बेटी और उनके चार “सबसे खास साथियों” बनाए गए मशहूर “सात मस्जिदों” में से पाँच को ध्वस्त कर दिया गया है। इसमें मस्जिद अबू बक्र, मस्जिद सलमान अल-फारसी, मस्जिद उमर इब्न अल-खत्ताब, मस्जिद सय्यदा फातिमा बिन्त रसूलिल्लाह, और मस्जिद अली इब्न अबी तालिब शामिल हैं, जो अब मौजूद नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि 75 साल से भी ज़्यादा पहले काबा के पास पैगंबर मुहम्मद की जन्मस्थली को ‘जानवरों के बाजार’ में बदल दिया गया। मौजूदा समय में सुक अल-लैल स्ट्रीट पर स्थित उनके जन्मस्थान को सऊदी सरकार ‘मक्का अल मुकर्रमाह लाइब्रेरी’ नाम की लाइब्रेरी में बदल चुकी है।

सऊदी सरकार द्वारा विरासत स्थलों को ध्वस्त किये जाने पर यूनेस्को की चुप्पी

सऊदी अरब में छह यूनेस्को विरासत स्थल हैं: मक्का और मदीना का एंट्री गेट, दिरियाह में अत-तुरैफ़ जिला, हेल क्षेत्र की रॉक आर्ट, अल-हिज्र पुरातत्व स्थल (मदैन सालेह), अल अहसा ओएसिस और हिमा सांस्कृतिक क्षेत्र। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र यूनेस्को के माध्यम से दुनिया भर के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण की वकालत करता रहा है, लेकिन सऊदी अरब में वो पूरी तरह से विफल रहा है।

अफ़गानिस्तान में बामियान बुद्ध प्रतिमाओं का विनाश तथा तालिबान और वहाबी मानसिकता में समानताएं

बता दें कि मार्च 2001 में अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार ने बामियान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया, जो छठी शताब्दी में बामियान घाटी में बनाई गई थी। तालिबान नेता मुल्ला मोहम्मद उमर ने बामियान बुद्ध को ईशनिंदा और इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ घोषित करते हुए उन्हें उड़ाने का हुक्म दिया था। इसकी वजह ये है कि सुन्नी मुस्लिम देवबंदी (हन्फी) समुदाय और तालिबान मूर्तियों को हराम मानता है। इन्हें पूरी दुनिया के विरोध के बावजूद बम लगाकर उड़ा दिया गया।

तालिबान का ऐसा (बामियान को नष्ट करना) करना वहाबी (सलाफी) चरमपंथी विचारधारा से जोड़ता है, जो इस्लाम की शुद्धतावादी स्वरूप को मानता है।

ठीक इसी तरह से, सऊदी अरब भी ऐतिहासिक रूप से इस्लामी विरासत स्थलों को संरक्षित करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखता है। उसका मानना ​​है कि ऐसी जगहें मूर्ति पूजा या शिर्क को बढ़ावा दे सकते हैं। हालाँकि भारतीय सूफियों ने इस साल मई में सऊदी अरब सरकार से मदीना में नष्ट हो चुके जन्नत अल-बकी कब्रिस्तान को फिर से बनाने की अपील की थी, जिसके लिए अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में एक बैठक का भी आयोजन किया गया था। इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं कि सऊदी अरब को इनकी अपील से कोई फर्क नहीं पड़ा, जोकि पड़ना भी नहीं था।

खालिस्तानी अमृतपाल के लिए संसद में पूर्व CM चन्नी की बैटिंग, सिख किसान नेताओं के साथ राहुल गाँधी की बैठक: क्या पका रही है कॉन्ग्रेस?

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने संसद में खालिस्तानी अमृतपाल के लिए धुआँधार बल्लेबाजी की है। बता दें कि जहाँ चरणजीत सिंह चन्नी जालंधर से जीत कर सांसद बने हैं, वहीं अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की है। अमृतपाल सिंह ने वहाँ से कॉन्ग्रेस, भाजपा, AAP और अकाली दल जैसी 4 बड़ी पार्टियों को हराया। बता दें कि वो फ़िलहाल असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद है। फ़िलहाल संसद का बजट सत्र चल रहा है।

चरणजीत सिंह चन्नी लोकसभा में खड़े तो हुए बजट पर अपनी बात रखने, लेकिन अपनी और पार्टी की खालिस्तान को लेकर सोच सबके सामने रख दी। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार पर किसानों के साथ धोखेबाजी का भी आरोप लगाया। इस पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने उन पर गलत बातें बोल कर भ्रमित करने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूंजीपतियों के कर्ज माफ़ किए जा रहे हैं, जबकि किसानों के नहीं।उन्होंने आरोप लगाया कि धरने पर बैठने के कारण 4 किसानों पर NSA लगाया गया।

चरणजीत सिंह चन्नी ने इस दौरान अमृतपाल सिंह को लेकर कहा कि 20 लाख लोगों द्वारा उसे सांसद चुना गया है। बता दें कि खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र में उसे 4.04 लाख वोट पड़े हैं और कुल पोलिंग ही 10.47 लाख की हुई है। चरणजीत सिंह चन्नी ने कहा कि NSA लगा कर अमृतपाल सिंह को अंदर रखा गया है, वो अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों की बात यहाँ नहीं रख पा रहे। बकौल चन्नी, ये ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के खिलाफ है।

बता दें कि राहुल गाँधी ने भी 1 दिन पहले बुधवार (24 जुलाई, 2024) को सिख किसान नेताओं से मुलाकात की थी। पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार किसानों को संसद में उनसे मिलने के लिए नहीं आने दे रही है। और अब चन्नी ने अमृतपाल का समर्थन किया है। वो अमृतपाल सिंह की गिरफ़्तारी को आपातकाल बता रहे हैं। हाल ही में अमृतपाल का भाई हरप्रीत और उसका दोस्त लवप्रीत ड्रग्स के साथ धराया था। अमृतपाल सिंह ने भारत देश के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था, वो पंजाब को खंडित करने की बातें करता था।

जज के खिलाफ सोशल मीडिया पर डाला वीडियो, हाईकोर्ट ने लगाया ₹1 लाख रुपए का जुर्माना: अदालत की ‘सच्चाई’ को दिखाना चाहता था ‘जनता की अदालत’ में

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अवमानना के आरोपित एक शख्स पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही उक्त शख्स की बिना शर्त माफ़ी भी उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर ली। इसके बाद हाईकोर्ट ने उसे आरोपों से बरी भी कर दिया। उदयपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि जज अवैध कृत्यों में लिप्त हैं। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस मनोज जैन ने फैसला सुनाया। अब उदयपाल सिंह पर अवमानना का मामला नहीं चलेगा, उनकी सशर्त माफ़ी स्वीकार करते हुए जुर्माना लगाते हुए छोड़ दिया गया है।

उन्होंने खुद कहा कि वो 1 लाख रुपए जमा कराना चाहता है, जिसका इस्तेमाल जनहित के कार्यों में किया जा सके। उसका कहना था कि इस सुनवाई के दौरान जो समय और धन नष्ट हुआ है, उसके एवज में वो ये रुपए देना चाहता है। हाईकोर्ट ने उसे आदेश दिया कि वो 2 सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री के समक्ष 1 लाख रुपया जमा कराए। इसमें से 25,000 रुपए दिल्ली हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज कमिटी को दिया जाएगा। साथ ही दिल्ली इंडीजेन्ट एन्ड डिसेबल्ड लॉयर्स लंड को भी इतनी ही रकम मिलेगी।

बाकी के 50,000 रुपए में से आधा-आधा महिलाओं-बच्चों की मदद करने वाली संस्था ‘निर्मल छाया’ और भारतीय सेना के परिजनों की देखभाल करने वाले ‘भारत के वीर’ फंड को जाएगा। हाईकोर्ट ने चेताया कि आरोपित ने अगर भविष्य में दोबारा इस तरह की हरकत की तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उक्त शख्स ने कहा कि जब उसने सोशल मीडिया पर वीडियो डाला तब उसका उद्देश्य न्यायपालिका को नीचा दिखाना नहीं था।

उसने बताया कि एक केस को लेकर उसने सिर्फ अपने विचार रखने के उद्देश्य से ऐसा किया था। बता दें कि न्यू अशोक नगर में स्थित एक संपत्ति विवाद को लेकर ये मामला चल रहा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उदयपाल सिंह ने ऐसा कर के न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप किया है। वीडियो में उसने अदालत की ‘सच्चाई’ को ‘जनता की अदालत’ में लाने का दावा किया था। एडवोकेट गगन गाँधी ने उदयपाल सिंह का प्रतिनिधित्व किया, जबकि विपक्षी वकील योगेश वर्मा थे।

अखलाक की मौत हर मीडिया के लिए बड़ी खबर… लेकिन मुहर्रम पर बवाल, फिर मस्जिद के भीतर तेजराम की हत्या पर चुप्पी: जानें कैसे हुई बरेली में मॉब लिंचिंग

बरेली में एक गाँव गौसगंज में तेजराम नाम के एक युवक की मुस्लिम भीड़ ने मॉब लिंचिंग कर दी। इलाज के दौरान तेजराम की मौत हो गई। पूरा विवाद घर की महिलाओं के साथ अभद्रता से जुड़ा था, जिसका तेजराम ने विरोध किया था। तेजराम की लिंचिंग की खबर मीडिया से लगभग गायब है।

लिंचिंग के बाद आरोपितों के अवैध निर्माण पर चले बुलडोजर को जरूर दिखाया जा रहा है, जिससे उनके लिए सहानुभूति बने। तेजराम की मौत की खबर गूगल में सर्च करने पर नहीं मिल रही जबकि कुछ साल पहले अखलाक के मारे जाने पर आसमान सर पर उठाया गया था।

तेजराम: मुहर्रम के बाद हुई हिंसा का शिकार

बरेली का एक थाना है, शाही। इसका एक गाँव है गौसगंज। गौसगंज गाँव में 19 जुलाई, 2024 की बड़ा बवाल हुआ। इस बवाल की शुरुआत 16 जुलाई, 2024 से हो चुकी थी। 16 जुलाई को मुहर्रम जुलूस के दौरान गाँव में मुस्लिमों और हिन्दुओं के बीच विवाद हुआ था। बताया गया विवाद का कारण एक ऐसी जगह ताजिया रखा जाना था जो नई थी। यहाँ पहले कभी ताजिया नहीं रखा गया था। हालाँकि, इस विवाद के बाद शान्ति हो गई थी।

19 जुलाई, 2024 को विवाद की शुरुआत अब्दुल के गाँव के पूर्व प्रधान हीरालाल के पक्ष की एक महिला पर लेजर लाईट मारने से हुई। हीरालाल ने इसका विरोध किया और लाईट ना जलाने को कहा। इसके बाद अब्दुल ने आसपास से अपने साथियों को बुला लिया और इलाके में तोड़फोड़ और पथराव चालू कर दिया। लगभग 60-70 की संख्या में लोग हीरालाल और आसपास के लोगों को घरों में घुसने लगे और लोगों को मारने पीटने लगे। महिलाओं पर भी हमला किया गया।

इस हमले में कई लोग घायल हो गए। इसके बाद हीरालाल का बेटा तेजराम मुस्लिम पक्ष के लोगों को झगड़ा ना करने के लिए समझाने गया। झगड़ा शांत करने के बजाय मुस्लिम भीड़ तेजराम पर हमलावर हो गई। तेजराम को भीड़ में शामिल युवक गाँव की मस्जिद में उठा ले गए और लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से पीटा। तेजराम को मस्जिद में ले जाने की पुष्टि परिजनों और स्थानीय लोगों ने की है। यह खुलासा आप इस वीडियो में 5:00 से 10:00 के बीच सुन सकते हैं।

घटना में तेजराम गंभीर रूप से घायल हो गया। उसको ऐसे फेंक दिया गया। तेजराम को इसके बाद परिजन बरेली के एक अस्पताल में ले गए। यहाँ उसका इलाज करवाया गया लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। तेजराम की 22 जुलाई, 2023 की रात मौत हो गई। इसके बाद उसके शव का पोस्टमार्टम कर परिजनों को सौंप दिया गया। घटना में घायल हुए बाक़ी लोगों का इलाज चल रहा है। तेजराम की मौत के परिजन और ग्रामीण आक्रोशित हो गए।

आरोपितों पर बुलडोजर की कार्रवाई

घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस गौसगंज गाँव में पहुँची। यहाँ उसने दोनों पक्षों के बीच मामला शांत करवाया। पुलिस ने इस संबंध में दो FIR दर्ज की हैं। पुलिस ने मामले में 70 से अधिक लोगों को आरोपित बनाया है। पुलिस ने 35 उपद्रवियों को गाँव में छापा मार कर पकड़ा है। 2 आरोपितों को पुलिस ने एनकाउंटर के बाद पकड़ा। कई लोगों को तलाश जारी है। पुलिस ने राजस्व विभाग से गाँव में आरोपितों के निर्माण की नापजोख भी करवाई, इसमें 10 से अधिक निर्माण अवैध मिले।

प्रशासन ने बख्तावर, इशारत, मुकीम, यासीन, युसूफ, इश्तियाक और अशफाक समेत कई अवैध निर्माण सोमवार को बुलडोजर की मदद से ढहा दिए। कार्रवाई के डर से हिंसा के कई आरोपित अभी फरार हैं। कई अपना घर छोड़ चुके हैं और बाहर के इलाकों में छुपे हुए हैं। अशरफ और आसिफ नाम के दो आरोपितों पर पुलिस ने ₹25,000 का इनाम भी रखा हुआ है।

सवाल: अखलाक की मौत पर हल्ला, तेजराम की मौत पर चुप्पी

तेजराम की मॉब लिंचिंग के कारण मौत हो गई। उसकी मौत की खबर को मीडिया में कोई ख़ास जगह नहीं मिली। मीडिया ने भी एक हिन्दू व्यक्ति के मरने को तरजीह नहीं दी। हालाँकि, तेजराम की मौत के बाद आरोपितों के अवैध निर्माण गिराए जाने को खूब मीडिया कवरेज मिली। कब्जा करने वालों के घरों की महिलाओं के रोते हुए विजुअल चलाए गए। भारत में यदि किसी की मॉब लिंचिंग हो जाए, तो मौत पर कितना विरोध हो और कितनी आवाज उठाई जाए, यह धर्म देखकर तय होता है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तेजराम है। तेजराम को मात्र अपने पक्ष के लोगों की आवाज उठाने के लिए मार दिया गया है। एक और घटना याद कीजिए, एक तबरेज नाम का व्यक्ति था, जिसकी मौत हो गई थी। आरोप था कि उसकी हत्या की गई। झारखंड में 2019 में हुई इस मौत पर खूब बवाल हुआ था जबकि तबरेज पर चोरी का आरोप था। बाद में सामने आया था कि तबरेज की मौत का कारण हृदयाघात था। ऐसी ही 2015 की एक और घटना में उत्तर प्रदेश के ही चरखी दादरी में अखलाक नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।

तब मीडिया ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अखलाक की मौत का मुद्दा उठा था। मीडिया ने महीने भर तक गाँव में डेरा डाल दिया। गाँव वालों ने त्रस्त हो कर मीडिया को भगाना चालू कर दिया था। अखलाक की मौत का कारण पिटाई बताया गया था जो कि गौमांस पकाने के आरोप में हुई थी। अखलाक के मामले में करोड़ों का मुआवजा दिया गया। मीडिया कवरेज इसके सालों बाद तक जारी है। भारत पर प्रोपेगेंडा चलाने वाले चैनलों ने इसके ऊपर पूरी सीरिज चलाई। लेकिन तेजराम की मौत पर सन्नाटा है।

‘वन्दे मातरम’ न कहने वालों को सेना के जवान और डॉक्टर ने Whatsapp ग्रुप में कहा – पाकिस्तान जाओ: सिद्दीकी ने करवा दी थी FIR, हाईकोर्ट ने रद्द किया

बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर शाखा ने एक डॉक्टर और सेना के एक जवान के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। इन दोनों पर आरोप था कि इन्होंने ‘वन्दे मातरम बोलो या फिर पाकिस्तान जाओ’ वाला बयान देकर मुस्लिमों की भावनाओं को आहत किया है। जस्टिस विभा कंकणवाडी और वृषाली जोशी ने बुधवार (24 जुलाई, 2024) को इस पर दुःख जताया कि आजकल हर कोई अपने मजहब और अपने खुदा को बाकी सबसे ऊपर दिखाना चाहता है।

दोनों जजों ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सभी को एक-दूसरे के मजहब का सम्मान करना चाहिए। जजों के अनुसार, वो ये कहने को बाध्य हैं कि आजकल लोग अपने मजहबों को लेकर कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं, पहले से भी बहुत अधिक। उन्होंने कहा कि हम एक लोकतांत्रिक सेक्युलर देश में रहते हैं जहाँ सबको एक दूसरे के मजहब-जाति-नस्ल का सम्मान करना चाहिए। हालाँकि, हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई कहता है कि उसका मजहब और खुदा सर्वोच्च है तो फिर कोई इस पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सकता, इसके लिए और भी तरीके और साधन हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ 41 वर्षीय सेना के जवाब प्रमोद शेंद्रे और 47 साल के डॉक्टर सुभाष वाघे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला 2017 के एक Whatsapp ग्रुप चैट का है, जिसमें 150-200 सदस्य मौजूद थे। शिकायतकर्ता शबाज़ सिद्दीकी का कहना है कि दोनों ने पहले मुस्लिम समाज को लेकर कुछ सवाल पूछे, जो आपत्तिजनक थे। जब ग्रुप में कुछ मुस्लिमों ने ‘वन्दे मातरम’ कहने से इनकार कर दिया तो शेंद्रे और वाघे ने उन्हें पाकिस्तान चले जाने को कह दिया था।

शाहबाज़ सिद्दीकी ने कहा कि ‘वन्दे मातरम’ का अर्थ होता है माँ की पूजा करना, इसीलिए उन्होंने इसे कहने से इनकार कर दिया था। उनका कहना है कि ऐसे करने पर इस्लाम से निकाल दिया जाता। बकौल शाहबाज़ सिद्दीकी, मुस्लिम सिर्फ ‘हिंदुस्तान ज़िंदाबाद’ कह सकते हैं। नागपुर में सिद्दीकी द्वारा FIR भी दर्ज करवाई गई थी। आरोपितों के वकील समीर सोनवणे का कहना था कि सिद्दीकी को जानबूझकर ग्रुप का सदस्य बनाया गया था ताकि ऐसी स्थिति आ जाए।

उन्होंने कहा कि प्रमोद और सुभाष को ये चिंतनीय लगा था कि भारत के ही कुछ लोग ‘वन्दे मातरम’ का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपित सम्मानित व्यक्ति हैं और अपने देश से प्यार करते हैं, ऐसे में उन्हें कोर्ट में घसीटना अन्याय होगा। जबकि मुस्लिम पक्ष के वकील का कहना था कि वो दोनों हिंदू धर्म को श्रेष्ठ दिखाना चाहते थे और उनके मन में मुस्लिमों के प्रति दुर्भावना थी। हाईकोर्ट ने जाँच को त्रुटिपूर्ण बताते हुए FIR रद्द करने का आदेश दिया। चैट वाले दिन सिद्दीकी डॉ सुभाष के क्लिनिक भी पहुँच गया था और वहाँ लड़ाई की थी।

जजों ने नोट किया कि ग्रुप में 150-200 सदस्य होने के बावजूद पुलिस ने सिर्फ 4 मुस्लिमों के ही बयान दर्ज किए। उन्होंने खुद बताया कि वो ग्रुप में ज़्यादा सक्रिय भी नहीं थे। उच्च न्यायालय ने कहा कई ये एक राजनीतिक बहस थी और ऐसी बहस को गर्मागर्मी हो जाती है। पुलिस ने ये तक पता नहीं किया कि उक्त ग्रुप का एडमिन कौन था। ग्रुप में कितने मुस्लिम थे, ये भी पुलिस नहीं बता पाई। साथ ही ये IPC के 295A का भी मामला नहीं था, क्योंकि व्हाट्सएप्प में मैसेज एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्टेड होते हैं।