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बलिया में ट्रकों से करोड़ों रुपए की अवैध वसूली, योगी सरकार ने चलाया हंटर: SP और ASP हटाए गए, CO सहित 18 पुलिसकर्मी निलंबित

बलिया के नरही थाना स्थित यूपी-बिहार बॉर्डर पर ट्रकों से अवैध वसूली मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कड़ी कार्रवाई की है। दो पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी और सीओ समेत 18 पुलिसकर्मियों के निलंबन के साथ ही जिले के पुलिस अधीक्षक और एएसपी को भी पद से हटा दिया गया है। वहीं, इस मामले में 7 पुलिसकर्मियों समेत 23 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है।

बलिया के एसपी देवरंजन वर्मा और एएसपी दुर्गा तिवारी को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया गया है। देवरंजन वर्मा और दुर्गा तिवारी को पद से हटाने के बाद उन्हें कहीं तैनाती नहीं दी गई है। उन्हें प्रतीक्षारत रखा गया है। वहीं, नरही के सीओ शुभ सुचित को निलंबित कर दिया गया है। वहीं, 32वीं वाहिनी पीएसी में कमांडेंट रहे विक्रांत वीर को बलिया का नया एसपी बनाया गया है। 

दरअसल, बुधवार (24 जुलाई 2024) की देर रात एडीजी वाराणसी पीयूष मोर्डिया और डीआईजी आजमगढ़ वैभव कृष्ण के नेतृत्व में आजमगढ़ पुलिस ने नरही थाना के भरौली पिकेट और कोरंटाडीह चौकी पर छापा मारा था। यहाँ ट्रकों से अवैध वसूली की जा रही थी। इस मामले में दो पुलिसकर्मियों और 16 दलालों को गिरफ्तार किया गया था। वहीं, 5 पुलिसकर्मी और कुछ दलाल फरार हो गए थे। 

दबिश के दौरान लगभग 25 मोबाइल, 14 बाइक और 37500 रुपए भी बरामद किए गए हैं। इस मामले में सात पुलिसकर्मियों और दलालों समेत 23 के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। दरअसल, यूपी-बिहार बार्डर पर पुलिसकर्मियों द्वारा ट्रकों से अवैध वसूली की शिकायतें उच्च अधिकारियों को मिली तो उनके कान खड़े हो गए। इसके बाद इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया।

नरही थाने के कर्मियों पर भी टीम ने कार्रवाई की। एसओ का कमरे को सील कर दिया गया। सभी बैरकों और उसमें रखे एक-एक बक्से को खँगाला गया। घंटों तक चली कार्रवाई के दौरान मीडिया को अंदर नहीं जाने दिया गया। बाद में डीआईजी वैभव कृष्ण ने बताया कि बक्सर पुल से होकर रोजाना दो से तीन हजार ट्रक गुजरते थे। हर ट्रक से 500 रुपए की वसूली की जाती थी।

उन्होंने बताया कि इस तरह रोजाना 10 से 15 लाख रुपए की वसूली होती थी। उन्होंने आशंका जाहिर की कि ये पूरा पैसा नरही थाने का स्टाफ अकेले नहीं पचा पाता होगा। कहा जाता है कि पन्नेलाल यहाँ दो साल से तैनात था और उसे कोई हिला नहीं पाता था। वह अक्सर किसी ना किसी थाने में ही तैनात रहता था। पुलिस लाइन बहुत कम देखा गया है।

कहा जाता है कि वसूली के 500 रुपए में से 400 रुपए पन्नेलाल रखथा था और 100 रुपए पिकेट ड्यटी पर रहने वाले सिपाही को दिया जाता था। उनका हिसाब थानाध्यक्ष पन्नेलाल महीने में करता था। यह भी बताया जा रहा है कि अवैध वसूली का एक बड़ा हिस्सा बिहार पुलिस के थानों को भी जाता था। यह इलाका बक्सर जिला से सटा हुआ है।

इस बारे में एडीजी जोन पीयूष मोर्डिया को जानकारी दी गई और कार्रवाई की गई। जिन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है वे हैं- थाना प्रभारी नरही पन्नेलाल, चौकी प्रभारी कोरंटाडीह राजेश प्रभाकर, नरही के सिपाही हरिदयाल सिंह, विष्णु यादव, दीपक मिश्रा, बलराम सिंह, कोरंटाडीह के सिपाही सतीश गुप्ता, भरौली के रविशंकर यादव, कोटवा नरायनपुर के विवेक शर्मा, भरौली के जितेश चौधरी, अर्जुनपुर बिहार के विरेंद्र राय, कथरिया के सोनू सिंह, भरौली के अजय पांडेय, सारिमपुर बिहार के विरेंद्र सिंह यादव, भरौली के अरविंद यादव, रमाशंकर चौधरी, जवाहिर यादव, अमांव के धर्मेंद्र यादव, चंडेश बिहार के विकास राय, भरौली के हरेंद्र यादव, सलाम अंसारी, आनंद ठाकुर, राजापुर गाजीपुर के दिलीप यादव। 

नरही थाने के जिन पुलिसर्मियों को निलंबित किया है उनके नाम हैं- थानाध्यक्ष पन्नेलाल, एसआई मंगला प्रसाद, मुख्य आरक्षी विष्णु यादव, सिपाही हरिदयाल सिंह, सिपाही दीपक मिश्रा, सिपाही बलराम सिंह, सिपाही उदयवीर, सिपाही प्रशान्त सिंह और चालक ओम प्रकाश। इनमें थानाध्यक्ष पन्नेलाल, सिपाही विष्णु यादव, सिपाही दीपक मिश्रा और सिपाही बलराम सिंह फरार हैं।

चौकी कोरंटाडीह के जिन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है उनमें शामिल हैं- प्रभारी राकेश प्रभाकर, मुख्य आरक्षी चन्द्रजीत यादव, मुख्य आरक्षी औरंगजेब खां, सिपाही परविन्द यादव, सिपाही सतीश चन्द्र गुप्ता, सिपाही पंकज कुमार यादव, सिपाही ज्ञानचन्द्र और सिपाही धर्मवीर पटेल। वहीं, प्रभारी राकेश प्रभाकर फरार है। थाना प्रभारियों और सिपाहियों के आवासों को सील कर दिया गया है।

डीआईजी वैभव कृष्ण ने बताया कि इस प्रकरण की जाँच आजमगढ़ के एएसपी शुभम अग्रवाल को सौंपी गई है। शासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीओ, एसओ व चौकी प्रभारी के विरुद्ध संपत्तियों की विजिलेंस जाँच कराने का आदेश भी दिया है। जाँच के बाद अवैध बालू ढुलाई और बिहार में शराब की तस्करी से जुड़े बड़े सिंडिकेट भी सामने आ सकते हैं।

 

 

2004 से 2009 तक कारगिल विजय दिवस नहीं मनाती थी कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार, मानती थी ‘BJP की लड़ाई’

आज ही के दिन यानी 26 जुलाई को साल 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल की लड़ाई जीती थी। पाकिस्तान को करारी हार का मुँह देखना पड़ा था। पाकिस्तान हमेशा की तरह डिनायल के मोड में रहा, तो भारत में कॉन्ग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए कारगिल की लड़ाई सिर्फ बीजेपी की लड़ाई रही। इसकी वजह से आधिकारिक तौर पर साल 2004 से 2009 तक सेना की इतनी बड़ी जीत को कभी सेलिब्रेट ही नहीं किया गया। जी हाँ, भारतीय सेना और भारत की जीत को सिर्फ इसलिए श्रेय नहीं दिया गया, क्योंकि कॉन्ग्रेस और यूपीए की नजर में ये भारत और भारतीय सेना की लड़ाई नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की लड़ाई थी।

ये हम नहीं कह रहे, बल्कि ऐतिहासिक बयान, यूपीए सरकार के कार्यकाल के आधिकारिक पत्र कह रहे हैं। साल 2017 में बीजेपी के सांसद राजीव चंद्रशेखर ने आधिकारिक तौर पर दावा किया कि कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार ने साल 2004 से 2009 के बीच कारगिल विजय दिवस को कोई तवज्जो नहीं दी और न ही आधिकारिक तौर पर भारतीय सेना के विजय दिवस का कोई जश्न ही आयोजित किया।

संयोग से 2009 में कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद राशिद अल्वी ने कहा था कि उन्हें कारगिल की जीत का जश्न मनाने का कोई कारण नहीं दिखता। रिपोर्ट के अनुसार, अल्वी ने कहा कि कारगिल कोई जश्न मनाने वाली बात नहीं है क्योंकि यह युद्ध हमारे अपने क्षेत्र में लड़ा गया था। उन्होंने आगे कहा कि यह एनडीए ही है जो इसका जश्न मना सकता है (युद्ध तब लड़ा गया था जब एनडीए सत्ता में थी)।

यदि सांसद राजीव चंद्रशेखर के प्रयास न होते तो सरकार शायद इसे मनाना बंद कर देती। 21 जुलाई 2009 को उन्होंने राज्य सभा के महासचिव को पत्र लिखकर सभापति से 23 जुलाई को उच्च सदन में कारगिल विजय दिवस को सार्वजनिक महत्व के मामले के रूप में उल्लेखित करने की अनुमति माँगी थी।

राजीव चंद्रशेखर ने अपने पत्र में संसद सदस्यों का ध्यान कारगिल विजय की 10वीं वर्षगाँठ की ओर आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यह दिन न केवल देश की जीत का प्रतीक है, बल्कि यह सशस्त्र बलों के हजारों सैनिकों के कर्तव्य और बलिदान की प्रेरणादायक भावना का भी प्रतीक है। उन्होंने रक्षा मंत्रालय और भारत सरकार से अपील की कि वे इस दिन को यादगार बनाएँ और हर साल इसे मनाएँ। उन्होंने अपने सहयोगियों से भी अपील की कि वे इसे ‘बीजेपी युद्ध या कुछ और’ कहकर इसका विरोध करके इसका मज़ाक उड़ाना बंद करें।

उनके प्रयासों को फल तब मिला जब 2010 में उन्हें तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी का पत्र मिला, जिसमें उन्होंने इस घटना को ध्यान में रखते हुए और शहीदों के सम्मान में कहा कि उस वर्ष अमर जवान ज्योति पर एक श्रद्धांजलि समारोह भी आयोजित किया जाएगा।

गौरतलब है कि 3 मई 1999 को ये बात पता चली थी कि पाकिस्तान ने कारगिल की पहाड़ियों पर 5 हजार से ज्यादा सैनिकों को आतंकवादियों के वेश में भेजा है और उन्होंने पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया था। इसके बाद घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ चलाया। इस लड़ाई में 2 लाख से ज्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया और 2 माह से ज्यादा समय की लड़ाई के बाद कारगिल को मुक्त कराया। 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक तौर पर कारगिल युद्ध समाप्त हुआ और सारी दुनिया में पाकिस्तान एक्सपोज हुआ। तब से हर साल 26 जुलाई के दिन को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, सिवाय 2004 से 2009 के समय को छोड़कर, जब यूपीए-1 सरकार सत्ता में रही थी।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में साल 2017 में प्रकाशित किया गया था। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पंडित की मत सुनो बात… न सिंदूर लगाओ न मंगलसूत्र पहनो: राजस्थान में जनजातीय महिलाओं को भड़का रही थी सरकारी टीचर, शिक्षा विभाग ने किया सस्पेंड

राजस्थान में जनजातीय महिलाओं को हिंदू न होने का ज्ञान देने वाली सरकारी टीचर को सस्पेंड कर दिया गया है। टीचर का नाम मेनका डामोर है। उनके खिलाफ राजस्थान आचरण नियम के तहत एक्शन लिया गया है।

बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम में 19 जुलाई को आयोजित एक विशाल रैली में मेनका ने एक सार्वजनिक सभा में जनजातीय महिलाओं से पंडितों की बातों का पालन करने की बात कही थी।

उन्होंने कहा था, “जनजातीय परिवार सिंदूर नहीं लगाते, मंगलसूत्र नहीं पहनते। जनजातीय समाज की महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। आज से सभी व्रत-उपवास बंद कर दें। हम हिंदू नहीं हैं।”

उनके इसी बयान के खिलाफ पहले जनजातीय समाज की महिलाओं ने आपत्ति जताई और उसके बाद सरकार के शिक्षा विभाग ने इस पर एक्शन लेते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया। रिपोर्ट्स में बताया गया कि राजस्थान शिक्षा विभाग ने जनजातीय महिलाओं को सिंदूर न लगाने और मंगलसूत्र न पहनने के लिए कहने वाली महिला शिक्षिका मेनका डामोर को निलंबित कर दिया है।

जानकारी के अनुसार मेनका डामोर जनजातीय परिवार संस्था की संस्थापक भी हैं और सादा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पदस्थ हैं। उन्होंने जिस कार्यक्रम में अपना विवादित बयान दिया है वहाँ हजारों जनजातीय महिलाएँ उपस्थित थीं।

काँवड़ियों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखना और दंगा रोकना उद्देश्य: यूपी सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, अदालत ने रोक बढ़ाई

उत्तर प्रदेश सरकार ने काँवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों में नाम प्रदर्शित करने के अपने निर्देशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर बचाव किया है। राज्य सरकार ने कहा कि यह निर्देश काँवड़ियों की धार्मिक भावनाओं को गलती से भी ठेस न पहुँचे तथा शांति बनी रहे, इसे ध्यान में रखकर जारी किया गया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश पर रोक को बढ़ा दिया।

राज्य सरकार ने अपने जवाब में कहा, “निर्देशों के पीछे का विचार पारदर्शिता और उपभोक्ता/काँवड़ियों की यात्रा के दौरान उनके द्वारा खाए जाने वाले भोजन के बारे में सूचित करना था, ताकि गलती से भी उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस ना पहुँचे। ऐसी स्थितियों से जाहिर तौर पर तनाव पैदा होगा, जहाँ लाखों-करोड़ों लोग पवित्र जल लेकर नंगे पैर चल रहे हैं।”

उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि ये निर्देश भेदभावपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि ये काँवड़ यात्रा मार्ग पर सभी खाद्य विक्रेताओं पर समान रूप से लागू होते हैं। चाहे उनका धार्मिक या सामुदायिक जुड़ाव कुछ भी हो। इसका उद्देश्य काँवड़ यात्रा के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रतिभागी होते हैं और सांप्रदायिक तनाव की आशंका बनी रहती है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में आगे कहा है, “शांतिपूर्ण और सौहार्द्रपूर्ण तीर्थयात्रा सुनिश्चित करने के लिए निवारक उपाय करना अनिवार्य है। पिछली घटनाओं से पता चला है कि बेचे जा रहे खाद्य पदार्थों के प्रकार के बारे में गलतफहमी के कारण तनाव और अशांति पैदा हुई है। निर्देश ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एक सक्रिय उपाय है।”

सरकार ने कहा है कि काँवड़ियों को दिए जाने वाले भोजन के बारे में छोटी-सी आशंका भी उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती हैं। इससे मुजफ्फरनगर जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाके में अशांति फैलने की आशंका रहती है। सरकार ने कहा है कि ये निर्देश संविधान के अनुच्छेद 51A में निहित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के अनुरूप हैं। इसमें सभी लोगों के बीच शांति बहाली की बात है।

दरअसल, हाल में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टी की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार के इन निर्देशों पर रोक लगा दिया था। बेंच ने कहा था कि खाद्य विक्रेताओं को ‘मालिकों के नाम/पहचान प्रदर्शित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए’। इसके बाद शुक्रवार (26 जुलाई 2024) की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन पर लगाए गए रोक को बढ़ा दिया है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 22 जुलाई 2024 को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के काँवड़ रूट पर दुकानदारों एवं वहाँ करने वालों के नाम दर्शाने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसी के साथ ही दोनों राज्यों को नोटिस जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वे मांसाहार बेचते हैं या शाकाहारी खाना।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के फैसले के खिलाफ कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका दाखिल की थी। सिंघवी ने दावा किया था कि यात्रा के दौरान नाम दिखाने वाला यह आदेश अल्पसंख्यकों के बॉयकाट का जरिया बनेगा। सिंघवी ने कोर्ट में यह भी दलील दी कि इस संबंध में स्पष्ट आदेश नहीं है, बल्कि आदेश को अस्पष्ट भाषा में लिखा गया है।

इसके बाद कोर्ट ने कहा कि अगर किसी को स्वेच्छा से अपना नाम दुकान पर बताने को कहा गया है कि तो इसमें क्या समस्या है। कोर्ट ने कहा कि मामले को तूल देने की जरूरत नहीं है। जस्टिस रॉय ने कहा कि वह केरल में एक मुस्लिम द्वारा चलाए जाने वाले मुस्लिम रेस्टोरेंट में जाते थे जबकि हिन्दू द्वारा चलाए जाने वाले में जाने कतराते थे। उन्होंने इसके पीछे साफ़ सफाई का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि दुकानों को शाकाहारी या मांसाहारी खाने का प्रकार और उसकी कैलोरी बतानी होगी। साथ ही अपना लाइसेंस भी प्रदर्शित करना होगा। कोर्ट ने कहा था कि अगर दोनों राज्यों के इस आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो इससे सेक्युलरिज्म और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा। प्रशासन काँवड़ रूट पर शुद्ध भोजन के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आदेश जारी कर सकता है। 

RSS को बिना किसी रिपोर्ट, सर्वे या आँकड़े के बिना इंदिरा गाँधी ने किया था बैन, हाई कोर्ट ने लताड़ते हुए कहा – फिर से न हो संविधान का उल्लंघन

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सदस्य बनने पर लगी रोक हटाने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को अपनी गलती सुधारने में पाँच दशक का समय लग गया। कोर्ट ने RSS के राष्ट्रनिर्माण में योगदान को गिनाया और कहा कि इसे साम्प्रदायिक संगठन बताने के गंभीर परिणाम हुए।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के जस्टिस सुश्रुत धर्माधिकारी और जस्टिस गजेन्द्र सिंह की बेंच ने केंद्र सरकार के एक पूर्व कर्मचारी पुरुषोत्तम की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणियाँ की हैं। पुरुषोत्तम गुप्ता ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के RSS में सदस्य बनने पर लगी रोक को लेकर याचिका दायर की थी।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस संबंध में 11 जुलाई, 2024 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसको 25 जुलाई, 2024 को सुनाया गया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इसमें हाल ही में केंद्र सरकार के RSS में भाग लेने पर प्रतिबंध को हटाने को लेकर भी टिप्पणियाँ की और इसे पाँच दशक की देरी से आया फैसला बताया।

बिना सबूत के RSS में भाग लेने पर लगा प्रतिबंध

हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि RSS में भाग लेने पर प्रतिबंध इंदिरा सरकार ने इसलिए लगाया था क्योंकि उसकी इस संगठन की गतिविधियाँ साम्प्रदायिक और सेक्युलरिज्म के विरुद्ध लगती थीं। हाई कोर्ट ने प्रश्न उठाए कि आखिर RSS को इस तरह का संगठन मानने के पीछे क्या आधार था। कोर्ट ने पूछा कि इसके पीछे कोई रिपोर्ट, कोई आँकड़े या कोई भी शोध था जो ऐसा सिद्ध करते हों कि सरकार को इसमें सदस्यता पर प्रतिबंध लगाना पड़ जाए।

कोर्ट ने प्रश्न खड़ा किया कि आखिर सरकार ने यह कैसे मान लिया कि इसका कोई कर्मचारी यदि RSS की गतिविधियों में भाग लेता है तो वह सेक्युलरिज्म के खिलाफ हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि उसने बार-बार इस निर्णय के आधार प्रश्न पूछा लेकिन उसे किसी भी सुनवाई में केंद्र सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। कोर्ट ने इसके बाद इंदिरा सरकार के इस फैसले को लताड़ा।

कोर्ट ने कहा कि जहाँ तक केंद्र सरकार के पास कोई ऐसा शोध, रिपोर्ट, सर्वे या आँकड़े थे ही नहीं जिनके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँची हो कि देश में सेक्युलरिज्म बनाए रखने के लिए RSS की गैरराजनीतिक गतिविधियों में केंद्र के कर्मचारियों की भागीदारी पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई आधार नहीं था तो क्या केवल तब की सरकार ने RSS को कुचलने के लिए ही यह निर्णय ले लिया था।

RSS अकेला बड़ा स्वयंसेवक संगठन, समाजसेवा में जुटा

हाई कोर्ट ने RSS में सदस्य बनने पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय की सुनवाई के दौरान इसके देश में योगदान पर भी बात की। हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में RSS सरकार से इतर एकमात्र राष्ट्रीय स्तर का स्वयंसेवक संस्थान है। कोर्ट ने कहा कि इसके देश के हर जिले और तालुकों से सबसे अधिक संख्या में सदस्य हैं और वहधार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और कई गैर-राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि RSS से जुड़े संगठन देश में अलग-अलग कामों में जुटे हुए हैं, जो गैर राजनीतिक हैं।

कोर्ट ने कहा RSS की शाखा सेवा भारती है। कोर्ट ने कहा, “सेवा भारती पूरे देश में 45 संगठनों के माध्यम से काम कर रहा है, जिसमें सेवा भारती और 1200 अन्य ट्रस्ट और NGO शामिल हैं। सेवा भारती ने देश भर में अखिल भारतीय स्तर पर नेटवर्क स्थापित किया है, जिसमें सभी राज्यों से आए लाखों स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं।” कोर्ट ने प्रश्न उह्ताया कि क्या ऐसे किसी संगठन को राजनीतिक करार दिया जा सकता है। कोर्ट ने चेताया कि ऐसे किसी भी संगठन पर प्रतिबन्ध लगाने से पहले सरकारों को सावधान रहना होगा।

कोर्ट ने कहा कि RSS देश में सरस्वती शिशु मंदिर के जरिए लाखों बच्चों को शिक्षा देता है। कोर्ट ने कहा इन स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चे काफी कम पैसे में या मुफ्त शिक्षा पाते हैं। कोर्ट ने कहा कि हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो किसी भी राजनीतिक विचारधारा से परे, केवल RSS शैक्षिक उद्यम से सक्रिय रूप से जुड़ने का इरादा रखते हैं, ताकि समाज के गरीब बच्चों के साथ अपने ज्ञान को साझा किया जा सके।

कोर्ट ने इसके बाद कहा, “RSS की सदस्यता लेने का उद्देश्य संगठन की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होना नहीं हो सकता सांप्रदायिक या राष्ट्र-विरोधी या धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों में शामिल होना तो दूर की बात है।” कोर्ट ने कहा कि इस बात को 45-50 साल तक नजरअंदाज किया गया।

RSS को वापस लिस्ट में डालना होगा संविधान का उल्लंघन

RSS को सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रतिबंध वाली सूची में दोबारा डालने को लेकर भी टिप्पणियाँ की। कोर्ट ने कहा कि अगली बार इसे इस सूची में डालने के पहले गंभीर स्टडी, रिपोर्ट और डाटा चाहिए होगा। कोर्ट ने कहा कि RSS को भविष्य में सूची में रखना और हटाना रातोंरात नहीं किया जा सकता। इसके लिए सरकार के उच्च स्तर पर गंभीर चिन्तन की आवश्यकता होगी। कोर्ट ने कहा कि केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और जनता के हितों की स्थिति में ही इसे इस सूची में वापस रखा जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि यदि इस परिस्थिति के अलावा RSS को इस सूची में रखा जाता है तो यह स्पष्ट रूप से उस कर्मचारी के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन होगा, जिसका RSS के साथ भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव है। कोर्ट ने कहा कि इसलिए, एक बार जब सरकार ने प्रतिबंधित संगठनों की सूची से RSS का नाम हटाने का फैसला कर लिया है, तो इसका उस लिस्ट से बाहर रहना केवल उस सरकार की दया पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

RSS पर लगा प्रतिबंध गलत, यह जानने में केंद्र को लगे 50 साल

कोर्ट ने इस बात पर गुस्सा जताया कि केंद्र सरकार को अपनी गलती का एहसास होने में लगभग पाँच दशक लग गए। कोर्ट ने कहा कि यह जानने में केंद्र सरकार को 50 साल लगे RSS जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगठन को देश के प्रतिबंधित संगठनों में गलत तरीके से रखा गया था और उसे इससे हटाया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि इस कारण कई केंद्र सरकार कर्मचारी देशसेवा की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर पाए।

गौरतलब है कि 9 जुलाई, 2024 को मोदी सरकार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के RSS की गतिवधियों में भाग लेने पर लगी रोक हटा दी थी। यह रोक इंदिरा गाँधी की सरकार ने 1966 में लगाई थी और तबसे ही यह चली आ रही थी। इसका कभी भी पुनरावलोकन नहीं किया गया था।

कारगिल के 25 साल, पीएम मोदी ने दी बलिदानियों को श्रद्धांजलि: बोले- आतंक को कुचल देगा भारत, पाकिस्तान को हमेशा मुँह की खानी पड़ी

कारगिल युद्ध के 25 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शुक्रवार (26 जुलाई, 2024) को कारगिल युद्ध स्मारक पहुँचे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यहाँ युद्ध में बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी और यहाँ तैनात सैनिकों से भी मिले।

पीएम नरेन्द्र मोदी गुरुवार सुबह ही लदाख के द्रास में स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पहुँचे। पीएम नरेन्द्र मोदी के साथ सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी भी कारगिल वार मेमोरियल पहुँचे। पीएम मोदी यहाँ कई विकास कार्यों की भी आधारशिला रखेंगे।

पीएम मोदी ने यहाँ सैनिकों और देशवासियों को संबोधित करते हुए कह़ा, “कारगिल विजय दिवस हमें बताता है कि राष्ट्र के लिए दिए गए बलिदान अमर होते हैं। दिन, महीने, वर्ष और सदियाँ गुजर जाती हैं, मौसम बदल जाते हैं लेकिन राष्ट्र की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वालों के नामा अमिट रहते हैं।”

पीएम मोदी ने यहाँ पाकिस्तान पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान ने अतीत में जितने प्रयास किए, उसमे सबमें उसको मुंह की खानी पड़ी है। लेकिन पाकिस्तान ने इनसे कुछ नहीं सीखा, वह क्षद्म युद्ध और आतंकवाद के जरिए अपने आपको प्रासंगिक बनाने का प्रयास कर रहा है।”

पीएम मोदी ने कहा, “मैं जहाँ से बोल रहा हूँ वहाँ से आतंक के आका मुझे सीधे सुन सकते हैं। मैं आतंकवाद के इन सरपरस्तों को कहना चाहता हूँ कि उनके नापाक मंसूबे कभी कामयाब नहीं होंगे। आतंकवाद को हमारे जांबाज पूरी ताकत से कुचलेंगे। दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।”

पीएम मोदी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख के विकास को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि इन दोनों प्रदेश में विकास के सामने आने वाली हर चुनौती को भारत परास्त करके रहेगा। पीएम मोदी ने कहा कि दशकों बाद जम्मू कश्मीर में सिनेमाघर खुला है, साढ़े तीन दशक बाद ताजिया निकला है। धरती का स्वर्ग विकास के रास्ते पर बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि 1999 में पाकिस्तान के घुसपैठियों ने कश्मीर के कारगिल और द्रास इलाके में कई जगहों पर कब्जा कर लिया था। घुसपैठिए कारगिल, सियाचीन और बाकी हिस्से का भारत से सम्पर्क काटने की जुगत लगा रहे थे। भारत ने इन घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय लॉन्च किया था।

सेना ने लगातार कई महीने चले ऑपरेशन में इन पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया था। जबरदस्त ठंड और पहाड़ी इलाके में चली इस लड़ाई के कारण बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक बलिदान हुए थे। उन्होंने सैकड़ों पाकिस्तानी घुसपैठियों और आतंकियों को मार गिराया था और अपनी जमीन पर वापस कब्जा कर लिया था। भारत को 26 जुलाई, 1999 को इस लड़ाई में निर्णायक जीत मिली थी। तब से ही इस दिन कारगिल विजय दिवस मनाया जा रहा है

कर्नाटक की ठेके वाली नौकरियों में भी अब आरक्षण, कॉन्ग्रेस सरकार ने बिना चर्चा पास किया बिल: निजी नौकरी में कन्नड़ भर्ती पर खींचे थे कदम

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार अब ठेके वाली नौकरियों में भी आरक्षण लागू करेगी। कॉन्ग्रेस सरकार ने इसके लिए कर्नाटक विधानसभा में बिल भी पास कर दिया है। सरकार में ठेके पर रखे जाने वाले लोगों को अब आरक्षण के आधार पर रखा जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कॉन्ग्रेस सरकार ने गुरुवार (25 जुलाई, 2024) को राज्य विधानसभा में 6 बिल बिना चर्चा पास करवाए। इस दौरान भाजपा और जेडीएस ने विधानसभा में चर्चा की माँग की। इन 6 बिल में एक राज्य की ठेके वाली नौकरियों में SC/ST और OBC को आरक्षण का प्रावधान करने वाला बिल भी था।

यानी अब जो भी लोग सरकार के लिए ठेके पर काम करेंगे, उनको भी आरक्षण के आधार पर भर्ती किया जाएगा। कर्नाटक में वर्तमान में लगभग 55,000 लोग सरकार के लिए ठेके पर काम करते हैं। इनकी भर्ती निजी रोजगार एजेंसियाँ करती हैं।

अब इन एजेंसियों को लोगों की भर्ती में आरक्षण लागू करना पड़ेगा। हालाँकि, इन भर्तियों के जरिए जिन लोगों को नौकरियाँ दी जाएँगी, उनको स्थायी ना करने की बात भी बिल में कही गई है। इसी के साथ इन नौकरियों की सँख्या विभाग के 10% से अधिक ना होने की बात भी बिल में कही गई है।

कर्नाटक सरकार के इस बिल के पास किए जाने से पहले मई, 2024 में इसको लेकर कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि जो नौकरियाँ 45 दिनों से कम के लिए दी जाएंगी, उन पर यह नियम लागू नहीं होगा। इसके अलावा आरक्षण वाली भर्तियों में कम से कम 33% महिलाएँ भर्ती की जानी चाहिए।

कर्नाटक विधानसभा में इस बिल के पास होने के दौरान JDS और भाजपा चर्चा की माँग करते रहे। JDS और भाजपा ने इस दौरान कर्नाटक सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। भाजपा ने MUDA, वाल्मीकि और अन्य मामलों की जाँच की माँग भी की।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार का आरक्षण को लेकर एक महीने के भीतर यह दूसरा निर्णय है। इससे पहले कर्नाटक कैबिनेट ने निर्णय लिया था कि राज्य की प्राइवेट नौकरियों में कर्नाटक के लोगों को 50-75% आरक्षण मिलेगा। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने ऐलान किया था कि कनिष्ठ नौकरियों में 75% जबकि वरिष्ठ नौकरियों में 50% आरक्षण कन्नड़ भाषियों को मिलेगा।

हालाँकि, IT समेत अन्य उद्योगों के भारी विरोध और राज्य से बाहर जाने की चेतावनी के बाद इस निर्णय को स्थगित कर दिया गया था। कर्नाटक सरकार ने कहा था कि वह इस बिल को लेकर सबकी आशंकाओं का समाधान करेंगे।

शौच के लिए बाहर गए व्यक्ति को निगलने लगा अजगर, कुल्हाड़ी से काटकर ग्रामीणों ने बचाया: जबलपुर की हैरतअंगेज घटना का वीडियो वायरल

मध्य प्रदेश के जबलपुर के ग्राम कल्याणपुर में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ पर एक ग्रामीण शौच के लिए जंगल में गया था, जब उस पर अचानक 15 फुट लंबे अजगर ने हमला कर दिया। अजगर ने अपनी पूँछ से ग्रामीण की गर्दन को पकड़कर उसे निगलने की कोशिश की। हालाँकि युवक ने खुद की होशियारी से अपनी जान बचा ली।

इस भयावह मंजर को देखकर ग्रामीण ने अजगर का मुँह पकड़कर मदद की गुहार लगाई। वहाँ से गुजर रहे अन्य ग्रामीणों ने चीखें सुनकर घटना स्थल पर पहुँचकर अजगर को देखा। अजगर ने उस ग्रामीण को पूरी तरह से जकड़ रखा था। ग्रामीणों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए तत्परता से अजगर को ग्रामीण से अलग करने की कोशिश की।

ग्रामीणों के पास कोई अन्य साधन न होने के कारण उन्होंने कुल्हाड़ी, पत्थर और अन्य धारदार हथियारों का उपयोग करके अजगर को मार डाला। इस घटना में अजगर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

वन विभाग के अधिकारी महेश चंद्र कुशवाहा का कहना है कि नियमों के मुताबिक अगर इंसान की जान बचाने के लिए किसी जानवर की हत्या की जाती है तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। वन विभाग अधिकारी महेश चंद्र कुशवाहा के मुताबिक, इस घटना में ग्रामीणों ने एक युवक जान बचाने के लिए ऐसा किया। अगर वह अजगर को नहीं मारते तो वह युवक को मार देता। ऐसे में इस मामले में किसी भी ग्रामीण पर कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

भिंडराँवाले के बाद कॉन्ग्रेस ने खोजा एक नया ‘संत’… तब पैसा भेजते थे, अब संसद में कर रहे खुला समर्थन: समझिए कैसे नेहरू-गाँधी परिवार की पार्टी ने पैदा किया था ‘खालिस्तान’

जरनैल सिंह भिंडराँवाले – ये नाम शायद ही किसी को न पता हो। भारत को खंडित करने के मंसूबे रखने वाला ये शख्स पंजाब को देश की शेष भूमि से काटने के लिए हथियार उठा चुका था, लेकिन ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में भारतीय सेना ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में घुस कर उसे मार गिराया। इसके बाद अक्टूबर 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, अगस्त 1986 में पूर्व सेनाध्यक्ष अरुण श्रीधर वैद्य और अगस्त 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या हुई।

क्रमशः दिल्ली, पुणे और चंडीगढ़ में ये हत्याएँ हुईं। खैर, इतिहास में झाँक कर देखने पर अब तक ये तो बिलकुल ही साफ़ हो चुका है कि एक घाव को नासूर बनाने वाली कॉन्ग्रेस ही थी। जरनैल सिंह भिंडराँवाले, जिसे आज भी खालिस्तानी कट्टरपंथी ‘संत’ कह कर संबोधित करते हैं, उसे इसी कॉन्ग्रेस पार्टी ने खड़ा किया था जो आज खुलेआम एक और खालिस्तानी अमृतपाल सिंह का समर्थन कर रही है। और तो और, अमृतपाल सिंह पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ (NSA) लगाए जाने को पूर्व कॉन्ग्रेसी CM चरणजीत सिंह चन्नी ने लोकसभा में खड़े होकर ‘आपातकाल’ बताया।

‘संविधान हत्यारी’ कॉन्ग्रेस अमृतपाल सिंह के समर्थन में

बड़ी बात तो ये है कि जून 1975 से लेकर मार्च 1977 तक, यानी पूरे 21 महीने देश पर आपातकाल थोपने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी ही थी और प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गाँधी। इस विषय पर काफी बातें की जा चुकी हैं, संविधान माथे पर लेकर नाचने वालों की पार्टी की इस करतूत को हर साल दुनिया को याद दिलाने के लिए मोदी सरकार ने प्रतिवर्ष 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का निर्णय लिया है। आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि खालिस्तान के समर्थन वाला पूरा माजरा क्या है।

अमृतपाल सिंह खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुना गया है। ये काफी भयावह है, क्योंकि बिना चुनाव प्रचार किए 2800 किलोमीटर दूर डिब्रूगढ़ के जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने कॉन्ग्रेस, भाजपा, अकाली दल और AAP – चरों बड़ी पार्टियों को निर्दलीय लड़ कर मात दे दी। इस लोकसभा क्षेत्र में अमृतसर, तरनतारन, कपूरथला और फिरोजपुर – 4 जिलों की 9 विधानसभा सीटें आती हैं। सोचिए, पंजाब के 4 जिलों के लोगों के मन में अमृतपाल को लेकर सहानुभूति 80 के दशक की याद दिलाती है या नहीं।

चरणजीत सिंह चन्नी, जो जालंधर से सांसद चुने गए हैं, वो लोकसभा में कहते हैं कि एक चुने हुए सांसद को जेल में बंद कर के रखा गया है, ये अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ है। अमृतपाल सिंह कौन है? आइए, जानते हैं। 19 वर्ष की उम्र में दुबई पहुँचने वाले अमृतपाल सिंह की पुरानी तस्वीरें आप देखेंगे तो उसने पगड़ी तक नहीं पहन रखी है। खैर, इस देश में ऐसा ही चलता है। जब 5 वक्त का नमाज न पढ़ने वाला मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिमों को भड़का कर इस देश को खंडित कर सकता है तो फिर अमृतपाल सिंह को छोड़ ही दीजिए।

अमृतपाल सिंह: नासूर बनने से पहले ही मोदी सरकार ने किया काबू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार किसानों के हित के लिए 3 कानून लेकर आई थी। इसके बाद पश्चिमी यूपी और पंजाब के किसानों ने 1 साल तक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमाओं को घेरे रखा। अंत में केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और तीनों कानूनों को वापस लेना पड़ा। बताया गया कि ‘किसान आंदोलन’ में खालिस्तानी तत्व घुस गए थे, इसीलिए देश की सुरक्षा को देखते हुए ये फैसला लिया गया। अमृतपाल सिंह उन नेताओं में शामिल था, जिसने सिखों को इन तीनों कानूनों के नाम पर मोदी सरकार के खिलाफ भड़काया।

उससे पहले दीप सिद्धू ये सब काम कर रहा था, जिसने ‘वारिस पंजाब दे’ नामक संगठन भी बना रखा था। फरवरी 2022 में एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत के बाद अमृतपाल सिंह के पास संगठन की कमान आ गई। 2021 में गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर चढ़ कर खालिस्तानी झंडा फहराए जाने और राष्ट्रध्वज तिरंगे का अपमान करने वाली भीड़ को उकसाने वालों में दीप सिद्धू भी शामिल था। अमृतपाल सिंह खुद को जरनैल सिंह भिंडराँवाले से प्रेरित बताता था, उसकी तरह वेशभूषा रखता था। मोगा के रोड गाँव में भिंडराँवाले का जन्म हुआ था, वहाँ अमृतपाल ने रैली की

उस रैली में उसने कहा कि देश के सिख ‘गुलाम’ हैं और उन्हें ‘आज़ादी’ के लिए लड़ने की ज़रूरत है। 24 फरवरी, 2023 को हद ही हो गई जब अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने अजनाला में पुलिस थाने पर ही हमला बोल दिया। लवप्रीत सिंह नामक शख्स को छुड़ाने के लिए बंदूकें और तलवार लेकर थाने में घुसी सिख भीड़ ने ढाल के तौर पर पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब ले रखा था। उसने पंजाब के CM भगवांत मान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक को धमकी दी। इससे पहले कि वो भिंडराँवाले की तरह नासूर बनता, उसे धर-दबोचा गया।

कॉन्ग्रेस ने जरनैल सिंह भिंडराँवाले को पैदा किया: कहते हैं पूर्व सेना व ख़ुफ़िया अधिकारी

आखिर यही गलती कॉन्ग्रेस ने भी तो की थी, गलती नहीं बल्कि जानबूझकर ये सब किया गया था। भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी R&AW के स्पेशल सेक्रेटरी रहे GBS सिद्धू ने ANI की मुखिया स्मिता प्रकाश के साथ पॉडकास्ट में बताया था कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने हिन्दुओं को भयभीत करने के लिए जरनैल सिंह भिंडराँवाले को खड़ा किया था। उनकी मंशा थी कि देश की अखण्डता को लेकर लोगों में भय पैदा हो। GBS सिद्धू का स्पष्ट कहना था कि खालिस्तान का मुद्दा अस्तित्व में ही नहीं था, इसे लाया गया।

पूर्व ख़ुफ़िया अधिकारी ने आगे बताया था कि कॉन्ग्रेस अपने मोलभाव के लिए एक ‘ऊँचे दर्जे का संत’ पैदा करना चाहती थी। खुद कमलनाथ ने ये बात कही थी, जो बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। गाँधी परिवार के करीबी रहे कमलनाथ ने ये भी कहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी जरनैल सिंह भिंडराँवाले को पैसे भेजती थी। कट्टरवादी संगठन ‘दमदमी अक्साल’ के मुखिया जरनैल सिंह भिंडराँवाले को 6 जून, 1984 को 37 वर्ष की उम्र में मार गिराया गया था। अमृतपाल सिंह की उम्र अभी 31 वर्ष है।

जिस ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में उसे मार गिराने में सफलता प्राप्त हुई थी, उसका नेतृत्व करने वाले भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल (अब रिटायर्ड) कुलदीप सिंह बराड़ को भी सुन लेते हैं। उन्होंने बताया था कि तत्कालीन PM इंदिरा गाँधी ने जरनैल सिंह भिंडराँवाले को एक ‘राक्षस’ के रूप में विकसित होने में मदद की थी, और जब वो काबू से बाहर हो गया तो उसे खत्म कर दिया। उन्होंने बताया कि तब तक काफी देर हो चुकी थी। उन्होंने बताया कि 1982, 83, 84 में पंजाब में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी, पुलिस डरी हुई थी और पूरा राज्य सरकारी नियंत्रण से बाहर था।

कॉन्ग्रेस का ‘संत’ था भिंडराँवाले, अब अमृतपाल में वही खोज

दिवंगत पत्रकार कुलदीप नायर एक घटना का जिक्र करते हैं, जिससे आप समझ जाइएगा कि भिंडराँवाले को बनाने में कैसे कॉन्ग्रेस का रोल था। एक बार एक कमरे में वो कुर्सी पर बैठे हुए थे और साथ में भिंडराँवाले भी था। इसी दौरान स्वर्ण सिंह वहाँ पहुँचे। बता दें कि दिवंगत स्वर्ण सिंह सबसे लम्बे समय तक केंद्र में मंत्री रहने वाले शख्स हैं, उन्होंने विदेश, रक्षा, कृषि और रेलवे जैसे मंत्रालय सँभाले। स्वर्ण सिंह जब कमरे में घुसे तो कुलदीप नायर ने उन्हें अपनी कुर्सी देनी चाहिए।

हालाँकि, सिख समाज से आने वाले स्वर्ण सिंह ने जमीन पर बैठना पसंद किया और कहा कि एक ‘संत’ की मौजूदगी में यही होना चाहिए। लुधियाना में ‘पंजाब केसरी’ और ‘हिंदी समाचार’ के संस्थापक लाला जगत नारायण की हत्या इसी भिंडराँवाले ने की थी। उन्होंने खालिस्तान के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। उनके बेटे रोमेश चंदर को भी मार डाला गया। कुलदीप नायर पूरे घटनाक्रम को समझाते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस ने जरनैल सिंह भिंडराँवाले को खड़ा किया।

पूरा माज़रा शुरू होता है 1977 से, जब अकाली दल-जनता पार्टी गठबंधन पंजाब में जीत कर सत्ता में आया, जैल सिंह को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा और बतौर CM उनके कार्यकाल की जाँच के लिए गुरदयाल सिंह आयोग का गठन हुआ। बताते चलें कि यही जैल सिंह बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। आयोग ने उन्हें बतौर CM पद के दुरुपयोग का दोषी माना। फिर परिदृश्य में आए संजय गाँधी, जो आपातकाल के दौरान सत्ता के नियंत्रण में थे और अपनी माँ के सरकार के दौरान संविधान के विपरीत जाकर फैसले करने से भी नहीं हिचकते थे।

संजय गाँधी ने ही कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सलाह दी कि किसी ‘सिख संत’ को पैदा किया जाए। इन सब में जरनैल सिंह भिंडराँवाले को चुना गया, क्योंकि वो इन्हें ‘साहसी’ लगा। जैल सिंह उससे लगातार संपर्क में थे। 13 अप्रैल, 1978 को बैशाखी के दिन निरंकारी सिखों के साथ सिखों के एक अन्य गुट की झड़प हुई। 16 सिख मारे गए। बता दें कि निरंकारियों को सिख अपने मजहब का नहीं मानते, वैसे ही जैसे मुस्लिम अहमदिया समाज को अपना नहीं मानते।

बस, फिर क्या था। इसी घटना का इस्तेमाल जरनैल सिंह भिंडराँवाले ने अकाली दल और जनता पार्टी की संयुक्त सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को भागे-भागे अमृतसर जाना पड़ा और निरंकारी समाज के मुखिया गुरबचन सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। पंजाब के शिक्षा मंत्री सुखजिंदर सिंह, जो चीन-पाकिस्तान की मदद से खालिस्तान बनाने की बातें करते थे, वो भिंडराँवाले की बैठकों का हिस्सा बनने लगे

आखिर क्यों स्थिति होती जा रही खराब

अब सवाल उठता है कि क्या कॉन्ग्रेस पार्टी फिर से पंजाब में सत्ता पाने और पूरे देश में आग लगाने के लिए अमृतपाल सिंह में अपना संत देख रही है? राहुल गाँधी ने सिख किसान नेताओं के साथ बैठक की है। प्रदर्शनकारी हरियाणा-पंजाब की शंभू सीमा पर बैठे हुए हैं। राहुल गाँधी विदेश जाकर कह चुके हैं कि पूरे देश में केरोसिन तेल छिड़का हुआ है, बस एक छोटी सी चिंगारी और सब कुछ जल उठेगा। तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के कारण इनका उत्साह और बढ़ा हुआ है, देखते हैं आगे क्या होता है। विपक्ष भी इस बार चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के कारण आक्रामक है।

स्थिति भयावह होती जा रही है। कनाडा में खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप वहाँ की सरकार के भारत पर मढ़ दिया, उसके लिए दुनिया के कई गुरुद्वारों में अरदास हुई। कनाडा में मंदिरों पर हमले हो रहे हैं। SFJ (सिख्स फॉर जस्टिस) का मुखिया गुरपतवंत सिंह पन्नू वीडियो जारी कर कनाडा के हिन्दुओं कोभारत लौटने की धमकी दे रहा है। ‘अकाल तख़्त’ हरमंदिर साहिब में खालिस्तानी आतंकियों की तस्वीरें लगाने के लिए प्रस्ताव पारित करता है, जिनमें निज्जर के अलावा भारतीय विमान हाईजैक करने वाला गजिंदर सिंह और ‘खालिस्तानी कमांडो फोर्स’ का मुखिया रहा परमजीत सिंह पंजवार शामिल है।

‘वनवासी महिलाओं से कर रहे निकाह, 123% बढ़ी मुस्लिम आबादी’: भाजपा सांसद ने झारखंड में NRC के लिए उठाई माँग, बोले – खाली हो रहे गाँव के गाँव

झारखंड में बांग्लादेशी और बंगाली मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, खासकर संथाल परगना में। ये मामला अब संसद में उठ रहा है, जिसे उठाया है झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने। उन्होंने संथाल परगने में एनआरसी लागू करने की माँग की। यही नहीं, दुबे ने झारखंड के संथाल परगना के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों को केंद्र शासित क्षेत्र बनाने की माँग की है। निशिकांत दुबे ने सदन में कहा कि झारखंड में वनवासी समुदाय की आबादी काफी तेजी से घट रही है। यहाँ मुस्लिम युवक वनवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ चुकी एक महिला नेता, नगर पालिका अध्यक्ष तक का रेफरेंस दिया।

लोकसभा में बोलते हुए सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, विपक्ष हमेशा यही बोलता रहता है संविधान खतरे में है पर सच तो ये है संविधान नही इनकी राजनीति खतरे में है। उन्होंने कहा झारखंड बिहार से अलग होकर जब अलग राज्य बना तब संथाल परगना क्षेत्र में 2000 में 36 प्रतिशत वनवासी जनसंख्या थी जो अब घटकर 26 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने सदन में सबसे पूछा कि ये 10 प्रतिशत आबादी कहाँ खो गई? लेकिन सदन में इसको लेकर कोई बात नही करता।

बेतहाशा बढ़ी मुस्लिमों की आबादी

सांसद निशिकांत दुबे ने कहा प्रत्येक जगह 15-17 प्रतिशत वोटर ही बढ़ता है, पर हमारे यहाँ 123 फीसद प्रतिशत बढ़ी है। मेरे लोकसभा क्षेत्र में आने वाले विधानसभा क्षेत्र में लगभग 267 बूथों पर मुसलमानों की आबादी 117 प्रतिशत बढ़ गई है। झारखंड में 25 ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहाँ की आबादी 123 प्रतिशत आबादी बढ़ी है, यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि पाकुड़ जिले में तारानगर इलाके में दंगा हो गया। इस दंगे की वजह यह है कि बंगाल की पुलिस और मालदा, मुर्शिदाबाद से लोग आकर हमारे लोगों को भगा रहे हैं। हिंदू गाँव का गाँव खाली हो रहा है।

निशिकांत दुबे ने चैलेंज देते हुए कहा, “यह मैं ऑन रिकार्ड कह रहा हूँ और सीरियस मामला है। अगर मेरी बात गलत साबित होती है तो मैं इस्तीफा दे दूँगा। बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद से लोगों ने हिंदुओं पर अत्याचार किया है। झारखंड पुलिस कार्रवाई करने में असमर्थ है।” उन्होंने आगे कहा कि पूरे मालदा, मुर्शिदाबाद, अररिया, कटिहार, किशनगंज से आए लोगों ने हिंदुओं पर अत्याचार किया है। उन्होंने कहा कि वे भारत सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने और इन इलाकों को यूनियन टेरिटरी मानने की माँग करते हैं।