भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर उतरे विद्यार्थियों और पुलिस की झड़प में 105 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। लगातार हिंसा और आगजनी के बाद दंगा को नियंत्रित करने के लिए सेना को लगा दिया गया है। वहीं, ये भी कहा जा रहा है कि बांग्लादेश में हो रही हिंसा में विदेशी ताकतों का हाथ है, क्योंकि वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने उनके हाथों की कठपुतली बनने से मना कर दिया था।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश जारी हिंसा के बीच शुक्रवार (19 जुलाई 2024) को 52 से ज़्यादा लोग मारे गए। शुक्रवार को प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के नरसिंगडी जिले की एक जेल से सैकड़ों कैदियों को छुड़ा लिया। इसके बाद उन्होंने जेल में आग लगा दी। सभी सार्वजनिक समारोहों, रैलियों और जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके साथ ही इंटरनेट सेवा भी बंद कर सेना को उतार दिया गया है।
इससे एक दिन पहले कोटा विरोधी प्रदर्शनकारियों ने राजधानी ढाका में सरकारी प्रसारक बांग्लादेश टेलीविजन (बीटीवी) के मुख्यालय में आग लगा दी थी। इस हिंसा में अब तक 105 की लोगों की मौत हो गई है, जबकि 1500 से अधिक लोग घायल हैं। वहीं, ढाका में मेट्रो, पूरे देश में ट्रेन सेवा और न्यूज का प्रसारण रोकना पड़ा। सेंट्रल बैंक और प्रधानमंत्री ऑफिस की वेबसाइट हैक कर ली गई।
दरअसल, 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को 30% कोटा बहाल करने के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ था। यह आंदोलन लगभग एक महीने से ज़्यादा समय से चल रहा था। इस कोटा को बहाल करने को लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना की नेतृत्व वाली बांग्लादेश आवामी लीग की सरकार का कहना है कि स्वतंत्रता सेनानी के परिवार इसके हकदार हैं।
वहीं, कट्टर इस्लामी छवि रखने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की प्रमुख खालिदा जिया इसका विरोध कर रही हैं। खालिदा को चीन का करीबी माना जाता है, जबकि हसीना को भारत का। अभी कुछ दिन पहले ही चीन की यात्रा पर गई शेख हसीना ने अपनी आधिकारिक यात्रा को बीच में खत्म करके वापस बांग्लादेश लौट आई थीं। वहीं, अमेरिका भी हसीना सरकार का विरोधी है।
हाल ही में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक चौंकाने वाला दावा किया कि बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर ‘पूर्वी तिमोर जैसा एक ईसाई देश’ बनाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने कहा कि वह ऐसा नहीं होने देंगी। उन्होंने कहा, “पूर्वी तिमोर की तरह… वे बांग्लादेश (चटगाँव) और म्यांमार के कुछ हिस्सों को लेकर बंगाल की खाड़ी में एक ईसाई देश बनाएँगे।”
उन्होंने दावा किया कि इस वर्ष जनवरी में बांग्लादेश चुनावों से पहले उनसे मिलने आए एक ‘अंग्रेज’ ने उन्हें आश्वासन दिया था कि यदि वह उन्हें बांग्लादेश की धरती पर एक एयरबेस बनाने की अनुमति देंगी तो ‘कोई समस्या नहीं होगी’। दरअसल, शेख हसीना का इशारा स्पष्ट तौर पर अमेरिका की ओर की था। वहीं, इस हिंसा में अब चीन का नाम भी लिया जा रहा है।
हिंसा को लेकर भारत ने कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन कहा है कि पड़ोसी देश में रहने वाले लगभग 15,000 भारतीय नागरिक ‘सुरक्षित और स्वस्थ’ हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित मीडिया ब्रीफिंग में हिंसक विरोध प्रदर्शनों को लेकर भारत के नज़रिए से पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा, “हम इसे बांग्लादेश का आंतरिक मामला मानते हैं।”
हिंसा का कारण
दरअसल, बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में कुछ समूहों के लिए 2018 तक 56% आरक्षण का प्रावधान था। इन्हें बांग्लादेश में बेहद आकर्षक माना जाता है। इन समूहों में विकलांग व्यक्ति (1%), स्वदेशी समुदाय (5%), महिलाएँ (10%), अविकसित जिलों के लोग (10%) और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार (30%) शामिल हैं।
इससे योग्यता के आधार पर चयन के लिए केवल 44% सीटें बचीं। साल 2018 में छात्र समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण हसीना सरकार ने कोटा पूरी तरह से खत्म कर दिया। फिर जून 2024 में हाई कोर्ट फिर बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को पलट दिया और स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए 30% आरक्षण को खत्म करने को अवैध ठहराया।
ट्रेनिंग के दौरान ही VIP सुविधाओं के लिए नखरा करने वाली IAS पूजा खेडकर की मुश्किलें बढ़ गई है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने पूजा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। वहीं, दिल्ली पुलिस ने उनकी मेडिकल कॉलेज में नामांकन को लेकर भी जाँच शुरू कर दी है। पूजा खेडकर ने MBBS में नाम लिखवाने से लेकर IAS की नौकरी पास करने तक में नाम, उम्र, फोटो, हस्ताक्षर, माता-पिता का नाम, अपनी झूठी दिव्यांगता, UPSC अटेंप्ट, जाति और आय प्रमाण पत्र में फर्जीवाड़ा किया।
पूजा खेडकर को लेकर खुलासा हुआ है कि उन्होंने अपनी शिक्षा से लेकर नौकरी तक के हर कदम पर फर्जीवाड़े का सहारा लिया। उन्होंने IAS बनने से पहले घुमंतू जनजाति या गुलगुलिया का सर्टिफिकेट के जरिए मेडिकल कॉलेज में नामांकन लिया। UPSC में शारीरिक दिव्यांगता का फर्जी डॉक्यूमेंट दिया। इतना ही नहीं, अपनी उम्र को लेकर भी झूठ बोला है। हर बार अलग-अलग जानकारी दी।
पूजा खेडकर ने ‘घुमंतू जनजाति-3’ श्रेणी में आरक्षण का लाभ उठाकर पुणे के श्रीमती काशीबाई नवले मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में नामांकन लिया था। घुमंतू या खानाबदोश जाति-समुदाय को बिहार-झारखंड में आम बोलचाल में गुलगुलिया कहा जाता है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच इस बात की जाँच करेगी कि ये सब कैसे हुआ। सिविल सेवा में चयनित होने के लिए पूजा ने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा और जालसाजी की है।
जाँच रिपोर्ट में बताया गया है कि पूजा खेडकर ने न केवल अपना नाम बदला, बल्कि अपने पिता और माता का भी नाम बदला। उन्होंने अपनी तस्वीर, हस्ताक्षर, ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर और पता बदलकर अपनी पूरी पहचान बदली और यूपीएससी की परीक्षा दी। यही नहीं, पूजा खेडकर ने आयोग के नियमों के तहत मान्य अधिकतम सीमा से अधिक बार परीक्षा दी है और उसका लाभ उठाया।
UPSC में अनुचित लाभ लेने के लिए पूजा खेडकर नेएक या दो बार नहीं, बल्कि तीन बार मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाया था। उसके आधार पर उन्होंने परीक्षा में मिलने वाले कोटे का लाभ उठाया था। पूजा खेडकर ने साल 2019 में व्हिज्युअली इम्पेयर्ड यानी दृष्टिबाधा का सर्टिफिकेट बनवाया था। यह सर्टिफिकेट अहमदनगर जिला अस्पताल से बनवाया गया था।
इसके बाद साल 2021 की परीक्षा में बैठने से पहले पूजा खेडकर ने मेंटल इलनेस (मानसिक बीमारी) का भी सर्टिफिकेट बनवा लिया। पूजा ने पहले से बनवाए गए दृष्टिबाधा के साथ-साथ अपनी नई मेडिकल सर्टिफिकेट में मानसिक बीमारी भी दर्ज करा ली। साल 2022 में UPSC परीक्षा देने के लिए उन्होंने मल्टीपल डिसेबिलिटी यानी एक से अधिक अंग में परेशानी बताई।
इसके लिए पूजा खेडकर ने महाराष्ट्र के पिंपरी चिंचवाड़ के यशवंतराव चव्हाण मेमोरियल अस्पताल में ऑनलाइन फॉर्म भर दिया। इसके बाद अस्पताल ने उनके बाएँ घुटने में लिगामेंट टेअर बताया, जो Locomotor Disability में लगभग 7% दिव्यांगता के अंतर्गत आता है। यहाँ के सर्टिफिकेट के आधार पर केंद्र सरकार ने पूजा को प्रमाणपत्र दिया। इसी प्रमाण-पत्र के आधार पर उन्होंने एक बार फिर UPSC दिया और पास हो गईं।
रिपोर्ट के मुताबिक, यशवंतराव चव्हाण मेमोरियल अस्पताल से सर्टिफिकेट लेते समय पूजा ने अपना गलत पता दिया था। उन्होंने पिंपरी चिंचवाड़ की निवासी होने का फर्जी राशन कार्ड दिखाया था। उस राशन कार्ड पर पता- प्लॉट नंबर 53, तलवड़े, देहु आलंदी रोड, पिंपरी चिंचवाड़ लिखा था। इस एड्रेस पर थर्मोवेरिटा नाम की बंद कंपनी है और ये कंपनी की प्रॉपर्टी उनकी माँ मनोरमा खेडकर के नाम पर है।
मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने इस प्रॉपर्टी को जब्त कर लिया है। वहीं, हाथ में पिस्टल लहराते हुए किसानों को धमकाने का वीडियो वायरल होने के बाद मनोरमा खेडकर को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, उनके पूर्व IAS पिता दिलीप खेडकर फरार हैं। मनोरमा खेडकर के खिलाफ आर्म्स ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसके साथ ही उनका आर्म्स लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया है।
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह पूजा खेडकर ने फर्जी आवास प्रमाण देकर मल्टीपल डिसेबिलिटीज सर्टिफिकेट लिया था। इंडस्ट्रियल एरिया होते हुए इस एड्रेस पर दिलीप खेडकर के नाम से फर्जी राशन कार्ड बनवाया गया था। इसी तरह नाम और उम्र के साथ भी फर्जीवाड़ा किया है। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल एप्लीकेशन फॉर्म 2020 और 2023 में पूजा के नाम और उम्र में अंतर है।
साल 2020 के आवेदन में उनका नाम डॉक्टर पूजा दिलीपराव और उम्र 30 वर्ष लिखी है। इसके बाद 2023 के आवेदन में उनका नाम मिस पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर और उम्र 31 वर्ष है। इस तरह तीन साल में उन्होंने अपने उम्र में सिर्फ एक साल की बढ़ोतरी दिखाई है। पूजा ने साल 2020 और 2023 के कैट आवेदन फॉर्म में खुद के लिए दिव्यांगता के तहत ऊपरी आयु सीमा में छूट माँगी थी।
इसके साथ ही 2020 में पूजा ने पहले अपने नाम के साथ पिता का नाम दिलीप राव जोड़कर लिखा। वहीं, साल 2023 में उन्होंने पिता का नाम हटाकर माता का नाम जोड़कर मिस पूजा मनोरमा लिखा। पूजा खेडकर ने अपने नाम से डॉक्टर का टाइटल भी हटा दिया था। वहीं, यूपीएससी की FIR में उनका नाम मिस पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर बताया गया है।
साल 2021 में पूजा खेडकर ने UPSC की मुख्य परीक्षा पास कर ली। इसके बाद उन्हें AIIMS दिल्ली में मेडिकल टेस्ट देना था। इसमें वह दिव्यांगता का नाटक करते हुए पकड़े जाने से बचने के लिए भाग गई थीं। यूपीएससी की शिकायत के हवाले से एक अधिकारी ने कहा, “अगले साल, वह फिर से फर्जी प्रमाण पत्र का उपयोग करके परीक्षा में बैठी। परिणाम आने से पहले ही उसने यूपीएससी 2023 के लिए आवेदन कर दिया।”
UPSC की शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पूजा खेडकर ने अपने माता-पिता दिलीप और मनोरमा खेडकर को अलग-अलग रहना दिखाया था, ताकि उनकी संपत्ति अलग-अलग हो सके और वह फर्जी आय प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सके। इस तरह पूजा ने नाम, उम्र, फोटो, हस्ताक्षर, माता-पिता के नाम, अपनी झूठी दिव्यांगता, UPSC अटेंप्ट, जाति और आय प्रमाण पत्र में फर्जीवाड़ा किया।
इस तरह ट्रेनिंग के दौरान ही VIP सुविधाओं के लिए नखरा करने वाली IAS पूजा खेडकर की मुश्किलें बढ़ गई है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने पूजा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। इसके साथ ही उन्हें नोटिस देकर पूछा है कि उनकी यूपीएसी क्वॉलिफिकेशन रद्द करते हुए भविष्य में किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने पर क्यों ना रोक लगाई जाए। वहीं, दिल्ली पुलिस ने उनकी मेडिकल कॉलेज में नामांकन को लेकर भी जाँच शुरू कर दी है।
अमेरिकी विदेश विभाग के पब्लिक डिप्लोमेसी सेक्शन (पीडीएस) ने ‘मीडिया के प्रति जागरूक युवाओं को सशक्त बनाने’ के अपने अभियान के तहत भारत में फैक्ट चेकर्स की भर्ती के लिए 2,00,000 डॉलर (लगभग 1.67 करोड़ रुपए) की घोषणा की है। इस योजना के माध्यम से अमेरिकी सरकार ‘ऑनलाइन मैनिपुलेशन’, बाहरी ताकतों के असर से निटने, डिजिटल माध्यमों की सुरक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने का दावा करता है। यूएस स्टेट डिपार्टमेंट इस साल 1 सितंबर से भारत के पाँच शहरों कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई और दिल्ली में इस काम को अंजाम देने वाला है।
भारत के अंदर अपने नरेटिव को बढ़ावा देने के लिए कथित ‘फैक्ट चेकर्स’ की फौज को तैयार करने की योजना को चतुराई से ‘डिजिटल लिटरेसी’ का नाम दे रहा है, लेकिन इनका काम होगा भारत में अमेरिकी नरेटिव को बढ़ावा देना। यूएस स्टेट डिपार्टमेंट इस बारे में अपनी मंशा और अपना एजेंडा दोनों ही साफ कर चुका है।
यूएस स्टेट डिपार्टमेंट की तरफ से ग्रांट का प्रपोजल
यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ने इस काम के पीछे की वजह बताते हुए कहा, “भारत में युवा आबादी के बीच सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल होता है। हाल ही में भारतीय, यूरोपीय और अमेरिकी थिंक टैंक्स ने अपने रिसर्च में पाया है कि भारत में ‘जोड़-तोड़’ वाली सामग्री यानि एडिटेड आईटम्स सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा रही हैं और संस्थागत विश्वास को खत्म कर रही हैं। इसकी वजह से भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा हो रहा है, जिसके चलते भारत-अमेरिका के बीच सहयोग के प्रयासों और कूटनीतिक संबंधों के लिए खतरा पैदा हो रहा है।”
वैसे, ये भी बता दें कि भारत में अमेरिकी दूतावास और काउंसुलेट पहले से ही ‘फेक न्यूज’ से निपटने के नाम पर ‘लर्निंग टू डिस्कर्न (L2D)’ जैसे ट्रेनिंग प्रोग्राम चला रहे हैं।
फैक्ट चेक की आड़ में अमेरिकी असर को बढ़ाना
ऑपइंडिया ने पाया है कि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ‘मीडिया सेवी युवाओं के सशक्तिकरण’ प्रोजेक्ट के नाम पर 160 युवाओं को यूथ मास्टर ट्रेनर (YMT) के तौर पर ट्रेनिंग देने की तैयारी कर रहा है, जिसके लिए 320 सत्र आयोजित होंगे और वो फिर आगे इन्फ्लूएंसर के तौर पर 32000 लोगों को प्रभावित करेंगे। इनमें से 60 लोगों को आगे की ट्रेनिंग के लिए चुना जाएगा, जिनके टारगेट पर 36 हजार लोग होंगे। ये सभी लोग भारत के अंदर अमेरिका के पक्ष में माहौल बनाने के लिए तैयार किए जाएँगे, ताकि भारत के अंदर अमेरिका को लेकर निगेटिव ‘फीलिंग्स’ को खत्म किया जा सके।
साफ है कि अमेरिकी प्रोजेक्ट का मकसद भारतीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर अमेरिकी तरीके से सोचने और अमेरिका के पक्ष में सोचने के लिए तैयार किया जाएगा। भले ही अमेरिका इसे कोई भी नाम दे, लेकिन हकीकत यही रहेगी कि ये कथित इन्फ्लूएंसर या फैक्ट चेकर अमेरिकी बोली बोलने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। मकसद साफ है कि अगर कभी भारत और अमेरिका के बीच किसी तरह का तनाव भी हो, तो इन इन्फ्लूएंसर्स का इस्तेमाल कर भारत में भारत के ही खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश की जाएगी। जैसा कि कई देशों में अमेरिका पहले से भी करता आया है। खासकर युद्ध ग्रसित देशों में, जहाँ स्थानीय लोगों को सरकारों के खिलाफ खड़ा कर बड़े-बड़े आंदोलन चलाए जाते हैं और सरकारों को अमेरिकी इशारे पर गिराया तक जाता है।
इस प्रोजेक्ट की खास बातें भी समझ लीजिए
भारत में इस तरह की ट्रेनिंग देने वाले किसी एक संगठन को चुना जाएगा, जिसे 12-18 महीने में अमेरिकी सोच को बढ़ावा देने में तैयार रहने वाले इन्फ्लूएंसर्स की फौज तैयार करनी होगी और उसे 1.50 लाख डॉलर से लेकर 2 लाख डॉलर तक की रकम दी जाएगी। इस काम के लिए इन 5 तरह से संगठनों में से कोई एक चुना जाएगा
1-एनजीओ, 2-सिविल सोसायटी, 3-थिंक टैंक, 4-सार्वजनिक या निजी शैक्षणिक संस्थान, और 5- कोई भी इंटरनेशनल संस्था या सरकारी संस्थान
क्या काम करना होगा?
जिस भी संस्था या उपरोक्त लिस्ट में से किसी को इस काम के लिए चुना जाएगा, उसे अपने टारगेटेड ग्रुप के लिए एक ‘ट्रेनिंग बुक’ तैयार करनी होगी। इस ट्रेनिंग बुक को हिंदू, तमिल, तेलुगू, मराठी और बंगाली भाषा में ट्रांसलेट भी किया जाएगा।
इसके लिए हर शहर से 32 ग्रेजुएट युवकों-युवतियों को ‘लर्निंग टू डिस्कर्न (L2D) के लिए चुना जाएगा, ताकि उन्हें ‘यंग मास्टर ट्रेनर’ बनाया जा सके और फिर उन्हें बतौर ट्रेनर काम करने के लिए तैयार होने के लिए भी एक ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसे ट्रेनर्स के लिए ट्रेनिंग (ToT) कार्यक्रम कहा जाएगा।
इस तरह से 320 युवकों-युवतियों को स्कूलों, एनजीओ, कॉलेजो और यूनिवर्सिटीज में जाकर कम से कम 32 हजार युवाओं तक अपने विचार पहुँचाने होंगे, यानी इन्फ्लूएंस करना होगा, उनके साथ संपर्क बनाना होगा। इसके लिए कई शहरों में ‘मीडिया लिटरेसी’ प्रोग्राम का आयोजन कराया जाएगा।
कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई और दिल्ली जैसे पांच शहरों से 12 लोगों को चुना जाएगा, जिन्हें और भी ज्यादा अच्छे तरीके से ट्रेन्ड करने के लिए कम से कम 1 लाख फॉलोवर्स वाले सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स के साथ काम करने का मौका मिलेगा।
अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने बयान में कहा है कि “ट्रेंनिंग करने वाले युवा भारतीय समाज में मीडिया लिटरेशी और ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया अभियान चलाएँगे।” इसे इस बात से समझा जा सकता है कि वो अमेरिकी नजरिए से सही मानी जाने वाली चीजों को लेकर भारतीय लोगों का नजरिया बदलने का काम करेंगे। इसी प्रोजेक्ट के तहत 36 हजार युवाओं को एक खास ‘कम्युनिटी’ के तौर पर तैयार किया जाएगा। (अब कोई बात 36 हजार लोग पूरे देश से एक साथ कहें, तो सोचिए कि उस बात का कितना असर पहुँचेगा।)
यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ने आगे कहा, “यूथ ट्रेनिंग बुक में अमेरिकी शिक्षा और भारत में ‘अमेरिकी स्पेस’ को लेकर एक खास पाठ होगा। जो अलग-अलग सोच रखने वाले लोगों तक पहुँचाई जाएगी।” खास बात ये है कि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट कह रहा है कि वो पक्षपात वाली राजनीतिक गतिविधियों, खास धार्मिक गतिविधियों या खास कानूनों के पक्ष में माहौल बनाने से जुड़ी बातों का समर्थन नहीं करता है। (लेकिन सोचिए, कल को अमेरिका भारत में एनआरसी या सीएए जैसे कानूनों का विरोध करने के लिए और उसके विरोध में हवा बनाने के लिए इन ‘पेड’ युवाओं को काम पर चला दे तो?)”
‘गलत जानकारी’ को रोकने के नाम पर दुष्प्रचार की रणनीति
इस प्रोजेक्ट के लिए जिस ग्रुप, संस्था का चुनाव किया जाएगा, उसे ‘मीडिया प्रेमी युवाओं को सशक्त बनाने’ के लिए तैयार किए जाने वाले युवाओं को लुभाने के लिए एक स्पेशल डिजिटल या ऑफलाइन तैयारी करनी होगी, ताकि वो इन युवाओं को अपनी ओर खींच सके। इससे जुड़ने वाले युवाओं को स्थानीय सरकारी एजेंसियों, निजी क्षेत्रों और एनजीओ से भी संबंध बनाकर चलने होंगे। यही नहीं, एक सोशल मीडिया प्रोजेक्ट भी बनाना होता, ताकि इस पूरे ‘काम’ पर निगरानी यानी नजर रखी जा सके। इस पूरे प्रोजेक्ट के बारे में समय-समय पर यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के अनुदान अधिकारी (जो पैसे देगा), उसके प्रतिनिधि या अमेरिकी डायरेक्टर्स को ई-मेल, फोन, वीडियो कॉन्फ्रेंस कॉल या फिर निजी रूप से मिलकर रिपोर्ट करना होगा। यानी पूरी तरह से उनकी मनमर्जी के मुताबिक काम चल रहा है या नहीं, इसकी जानकारी समय-समय पर देनी होगी।
आकाश बनर्जी जैसे वामपंथी फेक न्यूज पेडलर को अमेरिकी दूतावास का निमंत्रण
गुरुवार (17 जुलाई) को भारत में अमेरिकी दूतावास ने भारतीय सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को ‘एक्टिव सिटिजन’ के बारे में जानकारी देने के लिए आमंत्रित किया गया है, जिन्हें सामाजिक मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया में ‘जागरुकता’ लाने की ट्रेनिंग दी जाएगी और इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए अमेरिकी दूतावास ने यूट्यूबर “देशभक्त” आकाश बनर्जी को चुना है, जिसे वामपंथी कूड़े को सर्कुलेट करने और बीजेपी को निशाना बनाने के लिए जाना जाता है।
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बता दें कि मार्च माह की शुरुआत में ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें अमेरिकी दूतावास ने महिला इतिहास को लेकर खास महीने में कथित जागरुकता फैलाने के लिए सायमा नाम की हिंदू विरोधी इस्लामिक कट्टरपंथी महिला को आमंत्रित किया था। हालाँकि लोगों ने सायमा के हिंदू-विरोधी और कट्टर इस्लामिक विचारों को लेकर अमेरिकी दूतावास को चेताया भी था, फिर भी वो सायमा को अपने सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से प्रमोट करने में बाज नहीं आया।
अपना नरेटिव आगे बढ़ाने के लिए ‘फैक्ट चेकर्स’ के साथ काम करता है अमेरिका
मई 2023 में ‘अमेरिका फर्स्ट लीगल’ (एएफएल) ने खुलासा किया कि कैसे यूएस स्टेट डिपार्टमेंट का ग्लोबल एंगेजमेंट सेंटर (जीईसी) निजी मीडिया आउटलेट्स के साथ मिलकर डीप स्टेट प्रोपेगेंडा को बढ़ावा दे रहा था। एएफएल ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (एफओआईए) के तहत जीईसी के खिलाफ दस्तावेज हासिल किए। जिसमें खुलासा हुआ कि वैक्सीन के खिलाफ माहौल बनाने, चुनाव को प्रभावित करने और कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर अमेरिकी लोगों को टारगेट किया गया और उनके ‘मन’ को बदला गया।
इस संगठन ने खुलासा किया कि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट का ग्लोबल एंगेजमेंट सेंटर (जीईसी) ग्लोबल मीडिया नरेटिव को कंट्रोल करने के लिए इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क (आईएफसीएन) से जुड़े जॉर्ज सोरोस के पैसों पर पलने वाले ‘फैक्ट चेकर्स’ के साथ भी मिलकर काम करता है।
अमेरिका फर्स्ट लीगल ने बताया कि फैक्ट-चेकर, जो इस समय जीईसी के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें ओमिडयार नेटवर्क, गूगल, फेसबुक और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से भी पैसे मिलते हैं। यही नहीं, अमेरिका फर्स्ट लीगल ने खुलासा किया है कि अमेरिका का ग्लोबर एंगेजमेंट सेंटर ट्यूनीशिया जैसे देशों में ठीक उसी तरह का प्रोपेगेंडा चला रहा है, जिसका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं।
/2 The GEC routinely coordinates with a global cartel of “independent” “fact-checkers” led by the Poynter Institute for Media Studies (which operates Politifact) and members of its International Fact-Checking Network (IFCN).
— America First Legal (@America1stLegal) May 24, 2023
अमेरिका फर्स्ट लीगल के अनुसार, ईमेल की जाँच से पता चला है कि आईएफसीएन मिस्र में अपने कार्यक्रमों के लिए और अधिक ‘पैसों’ करने के लिए यूएस स्टेट डिपार्टमेंट पर प्रेशर डाल रहा है। वैसे, बीते 15 सालों को देखें तो मिस्र राजनीतिक रूप से कितना अस्थिर रहा है, और उसमें अमेरिका का कितना हाथ हो सकता है, ये सारा खेल समझ में आ जाएगा। यही नहीं, अमेरिका फर्स्ट लीगल की टीम ने कुछ ऐसे ई-मेल भी हासिल किए हैं, जिससे साफ होता है कि यूएस स्टेट डिपार्टमेंट अपने जीईसी के माध्यम से ‘पैसे पाने वाले’ पत्रकारों को धमका रहा है कि वो जल्द से जल्द उसके नरेटिव के हिसाब से खबरों, कहानियों, सूचनाओं को प्रसारित करें, ताकि जिस काम के लिए उन्हें रखा गया है, वो आगे बढ़ाया जा सके।
यूएस स्टेट डिपार्टमेंट पूरी दुनिया में जो डर्टी ट्रिक अपनाता रहा है, वो अब तक भारत में करीब-करीब फेल ही रहा है। हालाँकि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका ने भारत में ऐसी कोशिशें न की हो, लेकिन अब वो अपनी कोशिशों को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में न सिर्फ लोगों को, बल्कि भारत सरकार को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि ऐसे भाड़े के टट्टू ‘फैक्ट चेकर’ कब भारत के खिलाफ ही अमेरिकी इशारे पर आग उगलना शुरू कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता।
मेडिकल कॉलेजों में नामांकन के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा NEET-UG पेपरलीक मामले में केंद्रीय जाँच एजेंसी CBI ने गुरुवार (18 जुलाई 2024) को दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक लड़की राँची स्थित RIMS मेडिकल कॉलेज की सेकेंड ईयर की छात्रा है। वहीं, हजारीबाग से भी एक शख्स को गिरफ्तार किया गया है। छात्रा सॉल्वर गैंग से ताल्लुक रखती है।
राँची के RIMS मेडिकल कॉलेज से गिरफ्तार छात्रा का नाम सुरभि कुमारी है। वह सॉल्वर गैंग से जुड़ी हुई है। इस साल 5 मई को प्रवेश परीक्षा के दिन सुरभि हजारीबाग में पेपर सॉल्व करने के लिए OASIS स्कूल गई थी। ओएसिस वही स्कूल है, जहाँ NEET का परीक्षा सेंटर था। सीबीआई ने इस स्कूल के प्रिंसिपल डॉक्टर एहसान-उल-हक और वाइस प्रिंसिपल इम्तियाज को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है।
ओएसिस स्कूल झारखंड के हजारीबाग में स्थित है। हजारीबाग से ही सीबीआई ने दूसरे आरोपित सुरेंद्र को भी गिरफ्तार किया है। सुरेंद्र ने हाल में गिरफ्तार हुए पंकज की पेपर चुराने में मदद की थी। सुरेंद्र को 18 जुलाई 2024 को हजारीबाग से गिरफ्तार किया गया और 4 दिन की पुलिस कस्टडी ली गई है। वहीं, सुरभि को अभी पटना कोर्ट में पेश किया गया है।
In NEET-UG Patna paper leak case, CBI arrested Surbhi Kumar, a second-year student of RIMS Ranchi. She has solved question paper for candidates: CBI Sources
हाल में AIIMS पटना से चार मेडिकल छात्र गिरफ्तार हुए थे। ये सभी सॉल्वर गैंग से जुड़े थे और सुरभि कुमारी उन्हीं के साथ थी। सुरभि बिहार के आरा की रहने वाली है। सुरभि ने साल 2023 में एमबीबीएस में नामांकन लिया था और वह ऑल इंडिया 56वाँ रैंक हासिल की थी। वहीं, पटना एम्स से चार छात्रों सहित सुरभि कुमारी को भी पेपर सॉल्व करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है।
नीट पेपरलीक मामले में संलिप्तता के बाद गिरफ्तारी को देखते हुए RIMS प्रबंधन ने भी सुरभि कुमारी पर कार्रवाई की है। रिम्स के निदेशक ने उसे सस्पेंड कर दिया है। निदेशक ने बताया कि यदि आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो छात्रा को कॉलेज से निकालने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता है। सीबीआई की टीम गुरुवार की सुबह छात्रा को उसके हॉस्टल से पूछताछ के लिए उठाया था।
रिम्स प्रबंधन ने बताया कि छात्रा को गुरुवार की सुबह पूछताछ के लिए सीबीआई की टीम ले गई थी। उससे आठ घंटे तक पूछताछ के बाद शाम को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद सुरभि को मेडिकल जाँच के लिए सदर अस्पताल ले जाया गया। वहाँ उसकी जाँच नहीं हो सकी। कुछ जाँच के बाद भी कोविड जाँच होना देर शाम तक बाकी रह गया था।
AIIMS पटना के जिन चार मेडिकल छात्रों को हिरासत में लिया गया है, उनके नाम करन जैन, कुमार सानू, राहुल आनंद और चंदन सिंह है। चंदन सिंह सिवान का, कुमार शानू पटना का, राहुल आनंद धनबाद और करण जैन अररिया का रहने वाला है। पेपर लीक के आरोपित पंकज ने इन चारों को पेपर सॉल्व करने के लिए पैसे दिए थे।
बोकारो निवासी पंकज कुमार को 16 जून को सीबीआई ने पटना से गिरफ्तार किया था। पंकज कुमार उर्फ आदित्य नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) जमशेदपुर के 2017 बैच का सिविल इंजीनियर छात्र था। उस पर आरोप है कि उसने हजारीबाग में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के बक्से से नीट-यूजी पेपर चुराया था। इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड संजीव मुखिया अभी भी फरार है।
पिछले कुछ दिनों से एक नया विवाद पैदा कर दिया गया है। असल में मुज़फ्फरनगर जिला प्रशासन ने सड़क पर दुकान लगाने वालों, खासकर फल के ठेले वालों को निर्देश दिया है कि वो दुकान अथवा ठेला पर अपने नाम भी प्रदर्शित करें। सावन के महीने में काँवड़ियों के लिए विक्रेताओं की पहचान स्पष्ट हो, इसीलिए ये निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके बाद काँवड़ियों वाले रूट में सबको दुकान वालों को ऐसा करने का निर्देश दिया। इसके बाद गिरोह विशेष को मिर्ची लग गई।
इनलोगों ने इसे नरसंहार के लिए उकसाने और भेदभाव वाला फैसला करार दिया। उनका कहना है कि ये निर्णय इसीलिए लिया गया है, ताकि काँवड़िए केवल हिन्दू दुकानदारों से सामान खरीदें और मुस्लिमों को नज़रअंदाज़ करें। कुछ हिन्दू संगठनों ने इस फैसले की माँग की थी। कारण ये है कि फलों पर थूके जाने से लेकर पेशाब वाले पानी में उन्हें धोने तक के वीडियो सामने आए थे। ये मामला शुद्धता और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है, क्योंकि काँवड़िए ऐसी कोई भी चीज से बचने चाहिए जो उनकी तीर्थयात्रा को अपवित्र कर सकते हैं। इसका कारण ये है कि इसमें कई नियम-कानूनों का पालन करना होता है। लेकिन, गिरोह विशेष ने इसे मजहबी भेदभाव और रूढ़िवादिता का मुद्दा बना दिया। इसके बाद प्रशासन को पीछे हटना पड़ा और कहना पड़ा कि दुकान-ठेले वाले स्वैच्छिक रूप से ऐसा कर सकते हैं।
हाँ, हो सकता है कि हिन्दू कार्यकर्ताओं की माँग में रूढ़िवाद हो, लेकिन जैसा कि कट्टरपंथी कहेंगे, “उनमें से सारे बुरे नहीं है। 98% के कारण बाकी भी बदनाम होते हैं।” जैसा कि सभी ने कहा, काँवड़िए अगर केवल हिन्दू विक्रेताओं से ही खाने-पीने की चीजें खरीदना चाहते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। आखिर काँवड़ियों के पास ये विकल्प क्यों नहीं होना चाहिए, अगर वो सिर्फ हिन्दू विक्रेताओं से ही सामान खरीदना चाहते हैं तो? आखिर मुस्लिम भी तो हलाल प्रमाण-पत्र वाले उत्पाद खरीदते हैं। इसके तहत निर्माण से लेकर बिक्री तक हर स्तर पर मुस्लिमों की सक्रिय भूमिका के लिए हलाल सर्टिफिकेट अनिवार्य है? अगर बाजार के लिए मांस को हलाल सर्टिफिकेट दिलाना है तो इसके लिए नियम है कि पशु को काटते समय पुरुष मुस्लिम कसाई इस्लामी दुआ पढ़ते रहे। हलाल धीरे-धीरे सर्वव्यापी और वैश्विक होता जा रहा है, यानी गैर-मुस्लिमों के लिए मांस की दुकानों में कोई जगह ही नहीं है। अगर ‘केवल मुस्लिम कसाई’ ठीक है, तो ‘केवल मुस्लिम फल विक्रेता’ गलत कैसे?
अब पारदर्शिता और ‘ब्रांडिंग’ का भी मुद्दा है। कोई व्यक्ति ‘शिवा ढाबा’ नामक ढाबे में जाता है क्योंकि उसके इष्टदेव शिव हैं, लेकिन जब वह UPI QR कोड के ज़रिए भुगतान करता है, तो उसे पता चलता है कि उसका पैसा ज़ुबैर नामक किसी व्यक्ति के पास जा रहा है, जो निश्चित रूप से शिव भक्त नहीं है। ऐसे समय में वो ठगा हुआ महसूस करे तो क्या आप इसे कट्टरता कहेंगे? क्या यह जल्दबाजी में मिनरल वाटर की बोतल खरीदने जैसा नहीं है, यह सोचकर कि आप बिसलेरी खरीद रहे हैं, लेकिन प्यास बुझाने के बाद आपको पता चलता है कि यह वास्तव में बिल्सेरी थी? अगर कोई आपसे कहे कि जब तक पानी शुद्ध है, तब तक परेशान न हों, तो क्या आप उस तर्क से सहमत होंगे? मूल मामले को भी इसी तरह भ्रामक ब्रांडिंग के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए?
हालाँकि, इन मुद्दों से परे एक और मुद्दा है जिसे बड़े पैमाने पर छुआ नहीं गया है – यह है कम कौशल वाली नौकरियों या ‘असंगठित क्षेत्र’ में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व। यहाँ तक कि मुस्लिमों को भारत के सबसे हाशिए पर और कमजोर सामाजिक-मजहबी समूह के रूप में चित्रित करने वाली 2006 की सच्चर समिति की रिपोर्ट ने दर्ज किया था कि असंगठित क्षेत्र में मुस्लिमों की हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से ऊपर थी, खासकर जब हिंदू एससी/एसटी और ओबीसी के साथ तुलना की जाती है।
सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है, “सबसे खास बात यह है कि स्वरोजगार गतिविधि में लगे मुस्लिम श्रमिकों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक है।” और इस तरह की और भी टिप्पणियाँ की हैं, जैसे- “अन्य SRC की तुलना में, अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमों में मुस्लिम श्रमिकों की भागीदारी बहुत अधिक है।” रिपोर्ट में कहा गया है कि मुस्लिम गैर-कृषि असंगठित क्षेत्रों में काम करना पसंद करते हैं, यानी तकनीशियन, मैकेनिक, छोटे उद्योग श्रमिक आदि के रूप में काम करना। स्वरोजगार वाले क्षेत्रों के लिए मुस्लिमों की प्राथमिकता भी स्ट्रीट वेंडिंग या अन्य छोटे व्यवसायों का मालिक होना, अन्य समूहों की तुलना में कहीं अधिक थी। उदाहरण के लिए, नीचे दिए गए चार्ट को देखें, जो आधिकारिक सच्चर समिति की रिपोर्ट से लिया गया है:
और ध्यान रहे, यह लगभग दो दशक पहले का डेटा है, इसलिए इन नंबरों को दर्ज किए जाने के समय से अब तक चीजें बहुत बदल गई होंगी। ऐसे दावे और रिपोर्टें हैं कि ये आँकड़े और इसके परिणामस्वरूप होने वाला वर्चस्व समय के साथ बढ़ता ही गया है।
अब सच्चर समिति ने स्पष्ट रूप से इस डेटा को मुस्लिमों के संदर्भ में रखा है, जिन्हें ऐसी नौकरियाँ लेने के लिए ‘मजबूर’ किया जाता है, क्योंकि उन्हें सरकारी या संगठित निजी क्षेत्र में नौकरी नहीं मिलती है। यह प्रयास भेदभाव की ओर इशारा करने की बजाए, इसे विभिन्न समुदायों द्वारा विभिन्न आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक कारकों के कारण शिक्षा, परिवार नियोजन, कौशल विकास आदि को प्राथमिकता देने के परिणाम के रूप में प्रस्तुत करने का है।
कारण चाहे जो भी हों, नतीजा यह है कि मुस्लिम समुदाय अनौपचारिक क्षेत्र और ब्लू-कॉलर नौकरियों पर हावी है। सोशल मीडिया पर ‘कट्टरपंथियों’ द्वारा कई बार यही किस्से सुनाए गए हैं, जब वे विलाप करते हैं कि उन्हें हिंदू एसी मैकेनिक, बढ़ई, प्लंबर, दर्जी आदि नहीं मिल रहे हैं।
अगर हिंदू एससी/एसटी और ओबीसी किसी अन्य क्षेत्र में इतने कम प्रतिनिधित्व वाले होते तो कोटा लागू करने की तत्काल माँग होती। एक मिनट रुकिए, क्या होगा अगर मुजफ्फरनगर प्रशासन सड़क पर विक्रय करने वालों के लिए कोटा के रूप में अपने आदेश को फिर से लागू करता है, जिससे हिंदू एससी और OBC का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो? मैं पॉपकॉर्न के मजे लेने के लिए ऐसा होना चाह सकता हूँ, लेकिन हम इसमें नहीं पड़ेंगे।
मुद्दा यह है कि सच्चर समिति के विपरीत, जो असंगठित और स्वरोजगार वाले क्षेत्रों में इस ट्रेंड का उपयोग मुस्लिमों के लिए रियायतों की माँग करने के लिए एक हथियार के रूप में करती है, इस बारे में ईमानदार विश्लेषण की आवश्यकता है कि हिंदू सामाजिक-आर्थिक समूह मुस्लिमों की तरह ‘उद्यमी’ क्यों नहीं हैं। क्या मुस्लिम वर्चस्व उनके लिए अन्य अवसरों की कमी का परिणाम है या यह दूसरों के लिए अवसरों को बंद करने का परिणाम है, जैसे कि हलाल हिंदू एससी कसाइयों के लिए अवसरों को बंद कर देता है? या यह किसी और चीज का परिणाम हो सकता है जिसे हम अनदेखा कर रहे हैं?
जाहिर है, ‘कट्टरपंथी’ इसे मुस्लिमों द्वारा अवसर मिलते ही एक के बाद एक स्थान पर ‘कब्जा’ करने का परिणाम मानेंगे, लेकिन इसके कई अन्य ‘सेक्युलर’ कारण भी हो सकते हैं। अब वे कर्मचारी अपने कम वेतन को ‘शोषण’ नहीं मानते क्योंकि नियोक्ता अक्सर उनके रिश्तेदार होते हैं, या गाँव के कोई बुजुर्ग जो उन्हें शहरी क्षेत्रों में जाने में मदद करते हैं, या कोई और जो मजहब का इस्तेमाल करके एक-दूसरे से जुड़ते हैं। चूँकि ऐसे सेवा प्रदाता सरकार द्वारा मानक माने जाने वाले वेतन से बहुत कम वेतन देते हैं, इसलिए अंतिम उपभोक्ताओं को दी जाने वाली उनकी कीमतें आकर्षक होती हैं, और यही कारण है कि वे सफल होते हैं और हावी होते हैं।
मेरे एक मित्र ने कहा कि यह बाजार की गतिशीलता का परिणाम है क्योंकि मुस्लिम तकनीशियन, मैकेनिक आदि अपनी सेवाओं के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दरों की पेशकश करने में सक्षम हैं और इस प्रकार वे अधिक सफल हैं। हालाँकि, उनके पास एक दिलचस्प सिद्धांत था कि वे इस प्रतिस्पर्धी मूल्य की पेशकश क्यों करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा इस तथ्य के कारण है कि ऐसे सेवा प्रदाता – जैसे कि गैरेज मालिक, फर्नीचर की दुकान के मालिक, आदि – बदले में साथी मुस्लिमों को बहुत सस्ती श्रम लागत पर काम पर रखते हैं।
इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि ब्लू-कॉलर या कम-कुशल नौकरियों को हिंदुओं के बीच बहुत बदनाम किया जा रहा है या फिर उनका मज़ाक बनाया जा रहा है – याद कीजिए कि कैसे पकौड़े बेचने को एक रोज़गार के रूप में बहुत मज़ाक बनाया गया था, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे नरेंद्र मोदी को चिढ़ाना चाहते थे – कि बहुत से लोग अपना हाथ भी नहीं आजमाते और अपना सारा जीवन स्व-रोज़गार या छोटी-मोटी नौकरियों की कोशिश करने की बजाए सरकारी नौकरी या कोई और ‘सम्मानजनक’ नौकरी पाने की कोशिश में बिता देते हैं।
यह एक बहुत ही दुःखद स्थिति है क्योंकि हम ऐसे समूहों से निपट रहे हैं जो बड़े पैमाने पर गरीब हैं और जिनके पास सीमित संसाधन हैं जिसके लिए वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। हालाँकि, यह – असंगठित क्षेत्रों और कम-कुशल नौकरियों में एक विशेष समूह का स्पष्ट वर्चस्व – ऐसा कुछ है जिसके लिए समाधान के रूप में राजनीतिक करेक्शन की आवश्यकता नहीं है, जो दुर्भाग्य से हमेशा प्रचुर मात्रा में प्रदान किया जाता है।
यह असमान प्रतिनिधित्व भविष्य में अन्य सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है। हम या तो ‘कट्टरपंथियों’ पर इसका दोष मढ़कर अपने बारे में अच्छा महसूस कर सकते हैं या इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जिसका समाधान किया जाना चाहिए।
(मूल रूप से अंग्रेजी में राहुल रौशन द्वारा लिखे गए इस लेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
झारखंड के पाकुड़ जिले में बांग्लादेशी घुसपैठियों का आतंक सामने आ रहे हैं। पाकुड़ के तारानगर में बांग्लादेशी घुसपैठियों की वजह से हिंदुओं को अपने घर छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा है, तो पाकुड़ के ही महेशपुर थाना इलाके में आने वाले गायबधान में जनजातीय लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठिए उनकी ही जमीनों से बेदखल कर रहे हैं। गायबधान का ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है, जिसमें बांग्लादेशी इस्लामिक घुसपैठिए जनजातीय लोगों को धमकाते सुने जा सकते हैं। बीजेपी ने इसे लैंड जिहाद का मुद्दा बताया है।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बांग्लादेशी घुसपैठिए खुलेआम धमकी देते हुए ‘जीना मुश्किल कर देंगे’ कह रहे हैं। इस मामले को लेकर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सोरेन पर हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि हेमंत सोरेन की सरकार में जनजातीय लोगों को मिटाया जा रहा है। उनकी जमीनों पर बांग्लादेशी घुसपैठिए कब्जा कर रहे हैं। इस विवाद को पूर्व मुख्यमंत्री ने ‘लैंड जिहाद’ का मामला बताया है। इस दौरान मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी जमकर निशाना साधा है। वीडियो सामने आने के बाद बाबूलाल मरांडी ने झारखंड में जनजातीय के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है।
बाबूल लाल मरांडी ने एक्स पर लिखा, “”जीना मुश्किल कर देंगे”: अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा झारखंड के आदिवासियों को दी जा रही इस खतरनाक धमकी को सुनिए और झारखंड के खौफनाक भविष्य का अंदाजा लगाइए! पाकुड़ जिला के महेशपुर थाना अंतर्गत गायबथान में ‘लैंड जिहाद’ का मामला सामने आया है, जहाँ घुसपैठियों ने जमीन मालिकों को मारपीट कर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। अबुआ राज और जल-जंगल-जमीन के स्वयंभू ठेकेदार हेमंत सोरेन ने अब आदिवासियों की पहचान को मिटाने का ठेका ले रखा है। हेमंत सोरेन की सरकार में यदि आदिवासियों ने अपनी जमीन बांग्लादेशी घुसपैठियों के हाथ में नहीं सौंपी, तो उनका जीना मुहाल कर दिया जाएगा। आदिवासी महानायकों की धरती पर आदिवासी महिलाओं बेटियों पर बढ़ता अत्याचार अत्यंत दुखद है।”
"जीना मुश्किल कर देंगे"
अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा झारखंड के आदिवासियों को दी जा रही इस खतरनाक धमकी को सुनिए और झारखंड के खौफनाक भविष्य का अंदाजा लगाईए!
पाकुड़ जिला के महेशपुर थाना अंतर्गत गायबथान में 'लैंड जिहाद' का मामला सामने आया है, जहां घुसपैठियों ने जमीन मालिकों… pic.twitter.com/oELW8fYF9P
शुक्रवार (19 जुलाई 2024) को इस घटना को लेकर सामने आए वीडियो को शेयर करते हुए मरांडी ने प्रदेश के जनजातीय लोगों के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है। इसके साथ ही उन्होंने प्रदेश में महिलाओं और बेटियों के खिलाफ हो रहे जुर्म पर भी हेमंत सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। मरांडी ने लिखा कि, “आदिवासी महानायकों की धरती पर आदिवासी महिलाओं बेटियों पर बढ़ता अत्याचार अत्यंत दुखद है।”
हिंदुओं को उनके घरों से भगाया
इससे पहले, 18 जुलाई 2024 को पाकुड़ के तारानगर गाँव, ईलामी और नवादा में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसक झड़प की घटना हुई। जिसमें हिंदुओं के घरों पर पथराव का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि कुछ दिन पहले पाकुड़ में एक मुस्लिम लड़के ने हिंदू लड़की का वीडियो बनाकर वायरल करने का प्रयास किया था, जिसके बाद हिंदुओं ने इस घटना का विरोध किया और लड़के की पिटाई भी हुई। इसी घटना से नाराज होकर मुस्लिम पक्ष के लोग हिंदुओं के घरों के बाहर आ खड़े हुए और दोनों पक्षों की ओर से जमकर ईट-पत्थर चलाए गए।
खबरों के मुताबिक, घटना में कई लोगों के गंभीर रूप से चोटिल होने और कई घरों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इस दौरान पुलिस को भी निशाना बनाया गया जिसके चलते तीन पुलिसकर्मी घायल होने की बात भी कही जा रही है। वहीं भाजपा नेताओं का दावा है कि इस घटना से भयभीत होकर हिंदू इलाके से पलायन करने को तैयार हैं। गाँव वीरान हो रहा है। भाजपा नेताओं ने इन हालातों के पीछे बंगाल से आए बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ बताया है। साथ ही वर्तमान सोरेन सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आदेश दिया है कि पूरे प्रदेश में काँवड़ यात्रा मार्ग पर के दुकानदारों को अपने दुकान पर नाम लिखना होगा। इसके पहले मुजफ्फरनगर के एसएसपी ने जिले के लिए यह आदेश जारी किया था। इसके बाद इसको लेकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया था। हालाँकि, सीएम योगी के आदेश के बाद अब काँवड़ मार्ग पर काफी कुछ बदला हुआ नजर आने लगा है।
मुजफ्फरनगर में दिल्ली-देहरादून नेशनल हाइवे-58 पर स्थित जो दुकान कुछ दिन पहले ‘चाय लवर पॉइंट’ के नाम से हुआ करती थी, अब वह ‘वकील अहमद टी स्टॉल’ हो गया है। पुलिस के आदेश के बाद दुकान को चलाने वाले फहीम ने अपनी दुकान का नाम बदल दिया है। फहीम ने बताया कि इस निर्देश के बाद काँवड़ यात्रा के दौरान उनके काम पर बड़ा प्रभाव पड़ने वाला है।
इसी हाइवे पर पिछले ‘संगम शुद्ध शाकाहारी भोजनालय’ नाम का एक ढाबा कुछ दिन पहले तक होता था। अब इस ढाबे का नाम बदल गया। संगम शुद्ध शाकाहारी भोजनालय की जगह यह ‘सलीम शुद्ध शाकाहारी भोजनालय’ है। सलीम ने खाद्य सुरक्षा विभाग में इसी नाम से इसका रजिस्ट्रेशन भी करवा दिया है। इस दुकान को सलीम पिछले 25 सालों से चला रहा था।
दिल्ली-देहरादून हाइवे पर ही स्थित ‘साक्षी होटल’ के मालिक लोकेश भारती ने बताया, “कल हमारे पास दो पुलिस वाले आए और कहा कि दुकान के आगे नाम लिखना है। इसके साथ ही होटल में काम करने वाले कर्मचारियों के भी नाम डिस्प्ले होना चाहिए। पुलिस के आदेश के बाद हमने दुकान पर काम करने वाले चार मुस्लिमों को फिलहाल हटा दिया है।”
दरअसल, काँवड़ यात्रियों की आस्था एवं शुद्धता की शुचिता को बनाए रखने के लिए सरकार ने यह सभी दुकानों, ढाबों, होटलों और ठेला वालों को आदेश दिया है कि वे अपनी दुकान के बाहर एक सूची लटकाएँ। उस पर दुकान के मालिक और वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों का नाम अंकित हो। इस आदेश के बाद कई दुकानों के नाम बदल गए।
आदेश हलाल सर्टिफिकेशन वाले प्रोडक्ट बेचने वालों पर भी कार्रवाई करने की बात कही गई है। आदेश में सभी दुकानों, ढाबा, ठेलों पर अपना नाम लिखना होगा, ताकि काँवड़ यात्री जान सकें कि वो किस दुकान से सामान खरीद रहे हैं। बता दें कि काँवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु शुद्धता को लेकर खानपान में काफी परहेज करते हैं। इसको लेकर ही योगी सरकार ने यह कदम उठाया है।
उत्तर प्रदेश वाली व्यवस्था उत्तराखंड में भी लागू की गई है। उत्तराखंड के हरिद्वार में बड़ी संख्या में काँवड़ में गंगाजल भरने के लिए काँवडिये आते हैं। इसको देखते हुए हरिद्वार के SSP ने आदेश दिया है कि जिले में सभी काँवड़ रूट पर दुकानदार का नाम और पहचान स्पष्ट रूप से लिखी जाए। यह आदेश हरिद्वार के SSP प्रमेन्द्र डोबाल ने दिया है।
SSP के अनुसार, जिले में जितने भी खाने-पीने के होटल-ढाबे या ठेला लगाते हैं उन्हें मालिक का नाम, QR कोड और मोबाइल नम्बर आवश्यक रूप से लिखना होगा। यदि कोई व्यक्ति इस आदेश का पालन नहीं करता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति पहचान छुपाएगा, उसकी दुकान हटा दी जाएगी।
उत्तर प्रदेश में इस आदेश का राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किए जाने पर राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कपिल देव अग्रवाल ने कहा कि लोग पहचान छिपाकर धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र करते हैं। देवी-देवताओं के नाम पर ऐसा नहीं होना चाहिए। खतौली के पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता विक्रम सैनी ने कहा है कि मुस्लिम के ढाबों में लहसुन-प्याज का प्रयोग होता है, जबकि इस दौरान शिवभक्त इससे परहेज रखते हैं।
विवादित ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर के खिलाफ संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने कई कार्रवाई शुरू की है। यूपीएससी ने पूजा से जुड़े मामले की जाँच करने के बाद कई अहम कदम उठाने की घोषणा की है, जिसमें पूजा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, उनकी यूपीएसी क्वॉलिफिकेशन रद्द करने और भविष्य में किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से डिबार करने की कार्रवाई तक शामिल है। इस बारे में यूपीएससी की तरफ से पीआईबी ने प्रेस रिलीज भी जारी कर पूरी जानकारी को सार्वजनिक किया है।
यूपीएससी द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, सिविल सेवा में चयनित होने के लिए पूजा ने बड़ी पैमाने पर फर्जीवाड़ा और जालसाजी की है। जाँच रिपोर्ट में बताया गया है कि पूजा खेडकर ने न केवल अपना नाम बदला बल्कि अपने पिता और माता का भी नाम बदला। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी तस्वीर, अपना हस्ताक्षर, अपनी ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर और पता बदलकर अपनी पूरी पहचान बदलकर यूपीएससी की परीक्षा दी। यही नहीं, पूजा खेडकर ने यूपीएससी परीक्षा में चयन के लिए आयोग के नियमों के तहत मान्य अधिकतम सीमा से भी अधिक बार परीक्षा दी है और उसका लाभ उठाया है।
आयोग ने बताया है कि सिविल सेवा परीक्षा-2022 की अनंतिम रूप से अनुशंसित उम्मीदवार पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर के दुर्व्यवहार की विस्तृत और गहन जाँच की गई है। इस जाँच में पता चला है कि उन्होंने अपना नाम, अपने पिता और माता का नाम, अपनी तस्वीर/हस्ताक्षर, अपनी ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर और पता बदलकर अपनी पहचान बदलकर परीक्षा नियमों के तहत अनुमेय सीमा से अधिक प्रयासों का लाभ उठाया है। वैसे, इसकी जानकारी ऑपइंडिया पहले ही दे चुका है।
इस जाँच के बाद यूपीएससी ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। आयोग ने अब पूजा खेडकर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का फैसला किया है। इस बावत उनके खिलाफ पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। इसके अलावा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा-2022 के नियमों के अनुसार उनकी उम्मीदवारी रद्द करने और भविष्य की परीक्षाओं में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाने के लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
माँ गिरफ्तार, पिता की तलाश जारी
महाराष्ट्र की महिला ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर का चिट्ठा खुलने के बाद अब उनके माता-पिता के खिलाफ जाँच जारी है। पुलिस ने उनकी माँ मनोरमा खेडकर को महाड के होटल से हिरासत में ले लिया है, तो पिता दिलीप खेडकर की तलाश चल रही है। उनके खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो अपनी जाँच कर रहा है। उन पर उनकी सर्विस में रहते हुए दो बार घूस लेने के आरोप हैं।
ओडिशा के पुरी में स्थित महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर के भीतरी रत्न भंडार में रखा खजाना गुरुवार (18 जुलाई) को निकाल लिया गया। पुरी के महाराजा गजपति दिव्यसिंह देव चतुर्थ की उपस्थिति में कमिटी के 11 सदस्य मौजूद थे। यह कमिटी राज्य सरकार द्वारा गठित की गई थी। यहाँ 7 अलमारियाँ और संदूकें मिली हैं। इनमें हीरे जवाहरात और सोने हैं।
यहाँ मोटे काँच की तीन और लोहे की एक (6.50 फुट ऊंची, 4 फुट चौड़ी) अलमारियाँ मिलीं। इसके अलावा 3 फीट ऊँचे और 4 फीट चौड़े लकड़ी के दो संदूक और एक लोहे का संदूक था। सभी के अंदर कई सारे बॉक्स रखे हुए थे, जिनमें सोना रखा गया था। इन सभी बॉक्स से खजाने को निकालकर महाप्रभु के शयन कक्ष में रखा गया। इसमें लगभग 7 घंटे लग गए।
इससे पहले 14 जुलाई को 46 साल बाद रत्न भंडार को खोला गया। बाहरी रत्न भंडार में 6 संदूक मिले थे। इन संदूकों में 95.325 किलोग्राम सोना और 19.480 किलोग्राम चाँदी मिली थीं। इन सभी को यहाँ से निकाल करके स्ट्रॉन्ग रूम में शिफ्ट कर दिया गया था। रविवार 14 जुलाई को भीतरी रत्न भंडार भी खोला गया था, लेकिन यहाँ घुप्प अंधेरा और मकड़ी के जाले आदि लगे हुए थे।
काफी संख्या में चमगादड़ भी निकले। अंधेरा और गंदगी को देखते हुए समिति ने चार दिन बाद खोलने का निर्णय लिया था। इसके बाद इसे 18 जुलाई 2024 को सुबह 9:15 बजे खोला गया। यहाँ से 50.6 किलोग्राम सोना और 134.50 किलोग्राम चाँदी मिली है। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ सोने-चाँदी के 12 बॉक्स मिले हैं। इनकी कुल कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है।
गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने बताया कि भंडार घर में ताला लगाकर चाबी सरकारी ट्रेजरी में दे दी है। बाहरी और भीतरी रत्न भंडार का सारा कीमती सामान भगवान जगन्नाथ के शयन कक्ष में है। दोनों भंडार ASI को सौंप दिए जाएँगे। वो दीवारों की लेजर स्कैनिंग करके इनकी मरम्मत का खाका तैयार करेगी। सोना और आभूषणों की लिस्टिंग और ऑडिट पर अभी फैसला नहीं हुआ है।
इसके पहले अफवाह उड़ी थी कि भीतरी रत्न भंडार में साँप और कई सुरंग देखे गए हैं। हालाँकि, यह अफवाह साबित हुआ। मंदिर प्रशासक और समिति सदस्य अरविंद पाढ़ी ने बताया कि भीतरी रत्न भंडार में न साँप दिखे और न ही किसी सुंरग का पता चला है। यह सब अफवाह थी। स्नेक हेल्पलाइन के सदस्य सुवेंदु मलिक ने बताया कि हम पूरे समय भंडार कक्ष के बाहर मौजूद रहे।
कब-कब खोला गया रत्न भंडार?
बता दें कि इस मंदिर के रत्न भंडार को पहले 1805 में चार्ल्स ग्रोम की ओर से खजाने का डॉक्यूमेंटेंशन किया गया था, उस दौरान 64 सोने चांदी के आभूषण थे। साथ ही 128 सोने के सिक्के, 1,297 चांदी के सिक्के, 106 तांबे के सिक्के और 1,333 प्रकार के कपड़े थे। उसके बाद 1905 में खोला गया था। फिर साल 1926 में इस मंदिर के रत्न भंडार को खोला गया है।
इसके बाद 1978 में इसे फिर से खोला गया और आभूषणों एवं सोने-चाँदी की सूची बनाई गई। इस दौरान इसमें करीब 128 किलोग्राम सोना 222 किलोग्राम चाँदी मिले थे। इस दौरान सोने-चाँदी के कई वस्तुओं का आंकलन ही नहीं किया गया था। कहा जाता है कि साल 1985 में भी रत्न भंडार को खोला गया था, लेकिन लिस्ट को अपडेट नहीं किया गया।
ओडिशा हाईकोर्ट ने साल 2018 में राज्य सरकार को रत्न भंडार खोलने के लिए निर्देश दिए थे। हालाँकि, 4 अप्रैल 2018 को कोर्ट के आदेश पर जब 16 लोगों की टीम रत्न भंडार के कक्ष तक पहुँची थी। हालाँकि, उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा था, क्योंकि ये दावा किया गया कि रत्न भंडार की चाबी खो गई है। जब चाबी नहीं मिली तो हंगामा हुआ।
इसके बाद ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 4 जून 2018 को इस मामले में न्यायिक जाँच के आदेश दे दिए गए हैं। जाँच कमिटी ने 29 नवंबर 2018 को चाबी से जुड़ी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी, लेकिन सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। रत्न भंडार की चाबी का भी कुछ पता नहीं चल सका। बता दें कि रत्न भंडारे में दो कमरे हैं। एक बाहरी और आंतरिक कमरा है।
बाहरी कमरे की 3 चाबियाँ थीं, जिनमें से एक गजपति महाराज, दूसरी मंदिर प्रशासन और तीसरी एक सेवक को सौंपा गया था। वहीं आंतरिक कमरे की एक चाबी गायब थी। दरअसल, आंतरिक रत्न भंडार खोलने के लिए गठित कमिटी के अध्यक्ष सेवानिवृत न्यायमूर्ति विश्वनाथ रथ ने गजपति महाराजा दिव्य सिंह देव से अनुरोध किया था कि वे रत्न भंडार में उपस्थित रहकर प्रक्रिया की निगरानी करें।
किसने दिए मंदिर में इतने आभूषण
राजतंत्र में राजा-महाराजा विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए मंदिरों को दाना दिया करते थे। आम जनता और धनाढ्य लोग भी मंदिर में दान देते रहे हैं। कहा जाता है कि 9वीं सदी शुरू होकर 10वीं में बनकर तैयार हुए जगन्नाथ मंदिर में तत्कालीन क्षत्रिय महाराजा अनंग भीमदेव ने कई लाख माधा सोना दान किया था। एक तोला सोने में दो माधा होता है, यानी एक माधा पाँच ग्राम का होता है।
इस हिसाब से महाराजा ने करीब 5 किलोग्राम सोना मंदिर को दान किया था। इसके अलावा भी कई क्षत्रिय शासकों ने भगवान जगन्नाथ को सोना एवं बहुमूल्य रत्न अर्पित किया था। 15वीं सदी में सूर्यवंशी क्षत्रिय महाराजा कपिलेंद्र देव ने मंदिर में सोना, चाँदी और कई कीमती हीरे आदि दान किए थे। कहा जाता है कि इन सामानों को कई हाथियों पर लादकर मंदिर लाया गया था।
इनके अलावा महाराजा रणजीत सिंह ने भी इस मंदिर को काफी सोना दान किया था। महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी वसीयत में कोहिनूर हीरे को जगन्नाथ मंदिर को देने की बात कही थी। इसके बाद भी राजाओं ने यहाँ दान दिया। दान में सोना-चाँदी मिलने के बाद मंदिर में ‘सुना बेशा’ की परंपरा शुरू हुई। इस परंपरा के तहत भगवान जगन्नाथ का सोने से श्रृंगार किया जाता है।
अरब सागर में अपना दबदबा बढ़ाने और पड़ोसियों खासकर मालदीव जैसे देशों पर से निगरानी जैसी निर्भरता को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। भारत ने लक्षद्वीप में 2 हवाई पट्टियों के निर्माण की योजना बनाई है। ये हवाई पट्टियाँ सैन्य और नागरिक दोनों तरह की उड़ानों के लिए होंगी। खास बात ये है कि इनमें से एक हवाई पट्टी मिनिकॉय द्वीप पर तैयार की जाएगी, जो मालदीव की सीमा से महज 50 मील की दूरी पर है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने गुरुवार (18 जुलाई 2024) को एक उच्च स्तरीय बैठक में प्रस्तावों को मंजूरी दे दी। उन्होंने बताया कि सैन्य मामलों के विभाग के नेतृत्व में तीनों सेनाओं का प्रस्ताव मिनिकॉय द्वीप में एक नया एयरबेस बनाने और भारत के पश्चिमी हिस्से में अरब सागर में अगत्ती द्वीप पर मौजूदा एयरफील्ड का विस्तार करने का है। दोहरे उद्देश्य वाले ये हवाई अड्डे, जिनका उपयोग नागरिक एयरलाइनों द्वारा भी किया जाएगा, सभी प्रकार के लड़ाकू और परिवहन विमानों के साथ-साथ लंबी दूरी के ड्रोनों की तैनाती और संचालन करने में सक्षम होंगे और इस क्षेत्र में भारतीय सेनाओं को बढ़त प्रदान करेंगे।
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब चीनी नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है और इस क्षेत्र में पाकिस्तानी नौसेना के साथ मिलकर काम कर रही है। अब इन दोनों पट्टियों के निर्माण के बाद भारत की पकड़ इन इलाकों पर मजबूत हो जाएगी और वो आस-पास के इलाकों पर भी निगरानी में सक्षम हो जाएगा। इन पट्टियों का उपयोग सेना के तीनों अंगों के साथ ही तटरक्षक बल (कोस्ट गार्ड) भी करेगा। कोस्ट गार्ड ने ही इन पट्टियों को बनाने का सुझाव रक्षा मंत्रालय को दिया था।
सरकार द्वारा पास किए गए प्रस्ताव के मुताबिक, मिनिकॉल हवाई पट्टी का इस्तेमाल मूल रूप से एयरफोर्स करेगी। मिनिकॉय में हवाई अड्डा रक्षा बलों को अरब सागर में निगरानी के अपने क्षेत्र का विस्तार करने की क्षमता भी प्रदान करेगा। मिनिकॉय में हवाई अड्डा क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा देगा, जैसा कि सरकार ने योजना बनाई है।