वह सावरकर ही थे जिन्होंने पहले मराठी और फिर अंग्रेजी में प्रकाशित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’/The Indian War of Independence के ज़रिए इस लड़ाई के असली रूप को जनचेतना में पुनर्जीवित किया।
देश के लिए जान देने वाले, दंगाइयों के हाथों मारे जाने वाले और अपना पूरा जीवन जनता की सुरक्षा में खपा देने वाले जवान के लिए कोई नेता आवाज़ क्यों नहीं उठा रहा? हिंसा करने वालों का नाम क्यों नहीं ले रहा?
अलीगढ़ में भीम आर्मी, पीएफआई और एएमयू के एक छात्र संगठन के लोगों के बीच बैठक हुई। इसके बाद हिंसा भड़की। ठीक उसी पैटर्न पर दिल्ली में हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया गया है। इससे पहले दिल्ली के जामिया और यूपी में हुई हिंसा में भी पीएफआई की संलिप्तता सामने आई थी।
ट्रंप और मोदी की बैठक में तकनीक और रक्षा जैसे अहम मसलों पर चर्चा हुई। रक्षा डील के अंतर्गत भारत को अपाचे और एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर मिलेंगे, जो दुनिया में सबसे उत्तम तकनीक वाले हेलीकॉप्टर हैं। दोनों देशों के बीच कुल तीन करार पर हस्ताक्षर हुए हैं।
एक तरफ अघोषित नीति के तहत फेल होने वाले बच्चों का एडमिशन नहीं लिया जाता। दूसरी तरफ कहानियॉं सुनाकर उनको खुश दिखाने का प्रोपेगेंडा रचा जा रहा है। पर दुर्भाग्य से यह कसरत भी आधी-अधूरी ही है।
अपने इस फर्जी सूचना वाले ट्वीट में राजदीप ने केवल छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों को ही भ्रमित नहीं किया। बल्कि ये भी बताना चाहा कि स्थानीय नेता और अपराधिक गैंग मिलकर हिंसा कर रहे हैं, जिससे नागरिक प्रताड़ित हो रहे हैं।
दंगाइयों ने जिस हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की जान ली वह मूलरूप से राजस्थान के रहने वाले थे। दो दिन पहले ही माँ से फोन पर बात की थी। उनसे एक वादा किया था। लेकिन, मॉं को क्या पता था यह बेटे से आखिरी बात है।
दिल्ली की हिंसा छत्तीसिंहपुरा के नरसंहार की याद दिला रही है। तब भी केंद्र में बीजेपी की सरकार थी। भारत-अमेरिका संबंध नया मोड़ ले रहा था। देश की छवि खराब करने की साजिशें तब भी रची गई थी।
नार्थ-ईस्ट दिल्ली में हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं। मौजपुर और ब्रह्मपुरी इलाके में पत्थरबाजी की खबर है। कई वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया। दिल्ली पुलिस और आरएएफ के जवान इलाके में मार्च कर रहे हैं।
ओवैसी, शरजील इमाम, हुसैन हैदरी, इकबाल, जिन्ना, लादेन की फेहरिश्त में आप नाम जोड़ते जाइए उन सबका भी जो शायद आपके आसपास बैठा हो, जो आपके साथ काम करता हो, जिनका पेशा कुछ भी क्यों न हो लेकिन वो लगे हों उम्मत के लिए ही।