सामाजिक न्याय को तरसते ‘दलित’ सिर्फ़ SC/ST में ही सीमित नहीं

एक तय परिपाटी के तहत मान लिया गया है कि तथाकथित ऊँची जाति में सब दूध की नदियों में नहा रहे हैं और 'निचली जाति' के लोगों को घोड़ों में बाँधकर घसीट रहे हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि दलित और वंचित जैसे शब्द जाति से परे हैं, निचली जाति के पर्याय नहीं।

बभनगामा गाँव का मुन्ना झा एक ब्राह्मण है। वो जनेऊ धारण करता है, कंठ में तुलसी के जड़ से बनी कंठी पहनता है, दिन में कई बार पूजा भी करता है। गाँव में घूम-घूमकर, कब एकादशी है, कब पूर्णिमा है, कब प्रदोष और कब कलश स्थापन का बेहतर मुहूर्त, मुन्ना झा सबको बताता है। रामनवमी में ध्वजा स्थापित करना हो, दुर्गा पूजा में दस दिन पाठ करना हो, या रक्षबंधन में ‘येन बद्धो बली राजा’ कहकर यजमानों के हाथ रक्षासूत्र बाँधना हो, मुन्ना झा हर काम करता है।

इसके बदले मुन्ना झा को हर फ़सल पर अपने यजमानों से दो बोझा गेहूँ, मकई या उनके खेतों की कुछ सब्ज़ियाँ मिलती हैं। अगर कोई विशेष पूजा कराई तो उसके लिए गाँव के हिसाब की दक्षिणा जो कि पेट भर भोजन और इक्यावन रुपए से आगे शायद ही जाती है। घर ईंट का है, छत छप्पर की, किवाड़ वही है जो पचास साल पहले उसके पिता ने लगवाई थी और पेंट न मिलने पर कोलतार से उसे रंग दिया था। घर में पत्नी है, पिता हैं, बच्चे हैं, माँ है, और कमाई का साधन पूजा-पाठ।

ये है बिहार के कई गाँवों का स्टीरियोटिपिकल ब्राह्मण जिसके नाम, दिल्ली के स्टूडियो में बैठे लोग, पाँच हज़ार साल पहले ‘घोड़े में बाँधकर घसीटने’ की बात कह जाते हैं, जबकि इस्लामी आक्रांताओं ने जो भी किताबें जलाने के बाद छोड़ दीं उनमें से किसी में भी ऐसा ज़िक्र नहीं है। विश्वास न हो तो ऐसे किसी गाँव में जाकर, ब्राह्मणों के घर का पता लीजिए और जाकर देखिए कि उनकी स्थिति घोड़ा तो छोड़िए अपना पेट पालने लायक भी है कि नहीं।

सामान्य वर्ग के लोगों के लिए 10% आरक्षण

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ऐसे में एक विधेयक आता है कि आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए और इनमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो कि हैं तो सामान्य वर्ग के, जिनमें ऊँची जातियाँ आती हैं, लेकिन आर्थिक रूप से विपन्नता में जी रहे हैं। चूँकि इस देश में हर साल पाँच-सात चुनाव होते ही हैं, तो हर योजना को चुनावी जुमला कहकर नकार दिया जाता है। ऐसे लोग वही लोग हैं जो नोटबंदी के समय भी मुँह बाए रह गए थे, और इतनी देर तक खुला रखा कि जबड़ों में ऐंठन आ गई।

आरक्षण की बात करने से पहले इन माओवंशी कामपंथी लम्पटों की बात करना भी ज़रूरी है जो स्टूडियो से प्राइम टाइम में चुनावी रैली करते रहते हैं। ये वो लोग हैं जिनको हर योजना में नुक़्स निकालना है। मोदी सरकार की जितनी बड़ी योजनाएँ हैं, सबको इन्होंने ये कहकर नकारा कि ‘ये तो कॉन्ग्रेस की ही योजना थी, मोदी ने बस नाम बदल दिया है’।

मोदी ने बस नाम नहीं बदला, मोदी ने देश की सूरत बदल दी। जो योजना काग़ज़ पर नेहरू बाबू दिस योजना से चलते हुए इंदिरा देवी दैट योजना होते हुए राजीव बाबू एवरी योजना तक पहुँचती थी, उसका प्लेन बनाकर राहुल बेबी संसद में उड़ाते पाए जाते हैं। क्योंकि योजनाओं पर अमल हो या न हो, नाम का रजिस्ट्रेशन तो पहले ही हो जाता था कि योजना तो परिवार से बाहर जानी ही नहीं है। न तो कोई उससे बाहर पैदा हुआ, न किसी को पैदा होकर साँस लेने दिया गया।

मोदी ने आधारभूत संरचनाओं को ख़ुमारी से बाहर निकाला, ढाँचागत विकास किया और ऐतिहासिक क़दम लेकर समाज के सोचने की दिशा बदल दी। चाहे वो जीएसटी जैसा एक टैक्स हो, डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम हो, जन-धन का बैंक अकाउंट हो, या अभूतपूर्व गति से इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लगातार बनते रहने की बात हो, सामान्य मानव के जीवन को हर योजना ने प्रभावित किया है।

इसी क्रम में पिछले दिनों सामान्य वर्ग के वंचितों और पिछड़े लोगों के लिए लोकसभा और राज्यसभा में दस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाला विधेयक पास हुआ। चूँकि बात आरक्षण की थी, और ये मुद्दा इतना संवेदनशील है कि न चाहते हुए भी लगभग सारी पार्टियों को इसके समर्थन में आना पड़ा। ये बात और है कि हाशिए तक पहुँचा दिए गए कई नेताओं की नींद में सर पर हथौड़ा बनकर गिरने वाले इस विधेयक ने उन्हें उलूल-जुलूल बयान देने को बाध्य कर दिया।

कुछ ने कहा कि पास ही नहीं हो पाएगा, एक ही दिन में लोकसभा में पास हो गया। फिर कहा गया कि राज्यसभा में पास नहीं होगा, दूसरे दिन वहाँ भी पास हो गया। अब कहा जा रहा है सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकेगा क्योंकि संविधान में 50% तक के ही आरक्षण का प्रावधान है। लेकिन, वो प्रावधान जातिगत आरक्षण के लिए है, और ये आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला है। अतः, अगर 124वाँ संविधान संशोधन हो जाता है, तो इस क़ानून का लाभ लाखों वंचित लोग उठा पाएँगे जो कि सिर्फ़ अपनी जाति के कारण इसके दायरे से बाहर थे।

झूठ फैलाने की संगठित साज़िश

अब, जबकि यह लग रहा है कि ये क़ानून हक़ीक़त बन जाएगा, कुछ चिरकुट लोग इसके बारे में तमाम भ्रांतियाँ फैला रहे हैं जिनमें से प्रमुख ये सब हैं: ऊँची जाति के लिए है यह आरक्षण; इस विधेयक का आधार बनाकर मोदी ख़त्म कर देगा आरक्षण; इस आरक्षण ने 50% की लिमिट ख़त्म कर दी है; ₹8 लाख से कम कमाने वाले ‘व्यक्ति’ इसका लाभ ले सकेंगे।

इन चारों झूठ के आधार पर सिवाय अफ़वाहजनित हिंसा करवाने के और कुछ उद्देश्य नहीं दिखता। ये नुस्ख़ा आज़माया हुआ है। अफ़वाह फैलाओ, लोगों को सड़कों पर इकट्ठा करो और बाज़ारों में आग लगाओ, घरों में घुसकर निजी दुश्मनी निकालो, और लोगों की जान तक ले लो। अप्रैल 2018 का वो ख़ौफ़नाक मंज़र अभी भी ताजा है हमारी स्मृतियों में। दलितों को यह कहकर इकट्ठा कराया गया कि आरक्षण समाप्त किया जा रहा है, जबकि बात इतनी-सी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान और नैसर्गिक न्याय के आदर्शों के हवाले से यह निर्णय दिया था कि SC/ST क़ानून के तहत सीधे गिरफ़्तारी के बजाय, जाँच होना चाहिए। बिहार और उत्तर प्रदेश चुनावों के समय भी वोट को पलटने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल हुआ था।

इन चारों झूठों की परिणति उसी अफ़वाह को हवा देने से होगी, और इसके जवाब में दंगे होंगे क्योंकि व्हाट्सएप्प पर कुछ भी मिले, उसे सत्य मानने वालों की बाइकों में पेट्रोल डालकर, हाथ में डंडे और मशाल देकर सड़कों पर उतारना बहुत आसान है। ये हुआ है, और उसका सीधा प्रभाव सरकार को हिला देने तक पहुँचता है। चूँकि संख्याबल बहुत ज़्यादा है, तो इनके आंदोलन को झेलना किसी भी सरकार या कोर्ट के लिए नामुमकिन है। यही कारण है कि संविधान के मूलभूत अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन के बावजूद उस निर्णय को सरकार ने पलट दिया।

सामाजिक न्याय की अवधारणा और जातिगत व्यवस्था की जड़ में अर्थ

सामाजिक न्याय का हक़दार सिर्फ निचली जाति के लोग नहीं है, उस पर हर नागरिक का हक़ है। साथ ही, हर उस नागरिक का हक़ है जो वास्तव में दलित और शोषित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, और सामाजिक भेदभाव कई जगह अपने सबसे विकृत रूप में व्याप्त है। लेकिन इस तथ्य से दूसरा तथ्य नहीं बदलता कि तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों में, जो सामान्य वर्ग में आते हैं, बहुत ऐसे हैं जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बदतर है।

इसी विषय पर मेजर जनरल (रिटायर्ड) एस आर सिन्हो कमिटी का गठन हुआ था, जिस पर यूपीए सरकार बैठी रही क्योंकि जो आँकड़े सामने आए थे वो एक ऐसा सच बताते थे, जो नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बैठे लोगों समेत न्यूज़ स्टूडियो से रैली करने वाले एंकरों के लिए अविश्वसनीय हो सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया कि साक्षरता और प्राथमिक शिक्षा, भूमि जोत, आवास आदि पर दोनों सामाजिक समूहों के निचले स्‍तर पर कमज़ोर वर्ग की स्थिति बहुत अलग नहीं है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि सामान्य वर्ग की कुल आबादी का 31.2 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग है। साथ ही, यह जानना भी ज़रूरी है कि इसी रिपोर्ट से पता चला कि सामान्य वर्ग के एक तिहाई से ज़्यादा लोगों के पास कोई भूमि नहीं है और 18.2 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा से नीचे अपना जीवनयापन करते हैं।

तो क्या सामाजिक न्याय की व्यवस्था और हमारी सरकारों के लिए लगभग पाँच करोड़ से ज़्यादा ग़रीबों की संख्या का कोई औचित्य नहीं? क्या वो लोग सरकार की उन योजनाओं का हिस्सा लाभ न लें जो कि जाति के आधार पर है लेकिन उसके मूल में आर्थिक विपन्नता है? क्या उन्हें आर्थिक पैमाने पर सरकारी मदद न की जाए ताकि वो बेहतर शिक्षा पाने के लिए थोड़ी मदद पाएँ?

अगर जातिगत आरक्षण से आपको समस्या नहीं है, तो फिर आर्थिक आरक्षण से तो बिलकुल ही नहीं होनी चाहिए क्योंकि जातिगत आरक्षण की जड़ में यही अवधारणा है कि इन जातियों के लोग ग़रीब और वंचित हैं। तो अंततः क्रायटेरिया ग़रीबी ही है, जो कि कुछ जातियों में शुरु से ही ज़्यादा है। जब आरक्षण का हक़ ग़रीबों और वंचितों के लिए है, तो फिर सत्तर साल बाद भी जो ग़रीबी का दंश झेल रहे हैं, उन्हें समान अवसर क्यों न दिए जाएँ?

आरक्षण का आधार आर्थिक ही होना चाहिए

निजी तौर पर मैं आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था के ख़िलाफ़ हूँ। उसका कारण यह है कि इसका उद्देश्य समान अवसर देकर लोगों को एक समान स्थिति में लाने की बजाय वोटबैंक की राजनीति और इसके दायरे को घटाने की जगह बढ़ाने का होता जा रहा है। एक ही परिवार के लोग बेहतर स्थिति में आने के बाद भी इसका लाभ ले रहे हैं, जो कि कहीं न कहीं किसी सक्षम, कुशल या बेहतर व्यक्ति को हानि पहुँचाता है।

मेरी समझ इतनी है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ़ शिक्षा के क्षेत्र में मिलना चाहिए और वो भी बिलकुल मुफ़्त। हर ज़रूरतमंद को शिक्षित बनाना, उसे समान शिक्षा देकर, इस स्तर पर लाना कि वो बारहवीं कक्षा के बाद स्वयं को हीन बताकर नौकरी लेने की बजाय, अपनी क्षमता बताकर नौकरी ले और स्वाभिमानी जीवन जिएँ। बारहवीं के बाद भी अगर किसी को पढ़ाई करनी है तो वहाँ भी उसे मुफ़्त शिक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए क्योंकि ऐसी जगहों की फ़ीस बहुत ज़्यादा होती है।

कोई अगर शिक्षा या कौशल पाने के लिए आरक्षण चाहता है तो सरकार को हर संभव कोशिश करनी चाहिए कि आर्थिक अक्षमता उसके आड़े न आए। जब एक सामान्य नागरिक समान अवसर पाकर, अपनी क्षमता के बल पर नौकरी पाएगा तो उसे कहीं भी, किसी भी स्तर पर अपने आप को हीनभावना से देखने की ज़रूरत नहीं होगी। इसके साथ ही स्कूलों-कॉलेजों से लेकर ऑफ़िसों में होने वाले भेदभाव में कमी आएगी क्योंकि भेदभाव करने वालों की सीधी समस्या इस बात से होती है कि कोई कम नंबर पाकर भी उससे बेहतर स्थिति में पहुँच जा रहा है।

आरक्षण को कल्पवृक्ष न बनाएँ नेता

लगातार अपना पोलिटिकल कैपिटल गँवाते नेता इस दस प्रतिशत आरक्षण विधेयक के बारे में सही बात कर ही नहीं सकते क्योंकि उनके विरोधी विचारधारा के लोग इसके लिए संविधान संशोधन लेकर आए हैं। इसीलिए जिग्नेश मेवानी, अरविन्द केजरीवाल और लालू की पार्टी के लोग ट्वीट कर रहे हैं कि भाजपा की साज़िश है आरक्षण ख़त्म करने की। इनके तर्क का आधार ‘कुछ लोगों से मैंने बात की’ है।

हुकुमदेव नारायण यादव ने लोकसभा में इस विधेयक पर अपने भाषण में (विडियो नीचे संलग्न) एक पुरानी बातचीत का ज़िक्र किया जब वो लोहिया आंदोलन से जुड़े थे। तब उनके साथ कई ब्राह्मण और सवर्ण जाति के नेता भी थे। उनमें से एक नेता का नाम लेकर उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने कहा था कि जब एक दिन दलितों की सत्ता आएगी तब उन्हें ये बात याद करनी होगी कि सवर्णों में भी शोषित और वंचित हैं। तो ऐसा नहीं है कि नेताओं को यह बात मालूम नहीं थी कि ग़रीबी जाति देखकर नहीं आती, लेकिन हाँ, उस तरह के आरक्षण का समय तब नहीं आया था।

आर्थिक आधार पर आरक्षण, जिसकी शर्तें अभी भी निश्चित नहीं हैं, ऐसी व्यवस्था है जो कि सत्तर साल के दौरान जातिगत आधार पर दिए गए आरक्षण के मूल में निहित है। भविष्य ऐसा होना चाहिए कि किसी को इसकी ज़रूरत न पड़े, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत से शायद ये कभी नहीं जाएगा।


हुकुमदेव नारायण यादव लोकसभा में आरक्षण पर बोलते हुए
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