Friday, October 23, 2020
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प्रिय सुप्रीम कोर्ट, हिन्दुओं को निशाना बनाने के लिए इतना समय कहाँ से लाते हो?

'सेकुलर' के नाम पर जो बेहूदगी इस देश में हो रही है, और इस लॉबी के कारण न्यायपालिका का जितना समय हर रोज बर्बाद होता है, वो न जाने किस मजबूरी में जजों को नहीं दिख रहा। ऐसे वकीलों को कोर्ट और पब्लिक में बेइज़्ज़त किया जाना चाहिए कि इस क़िस्म की याचिका वो क्यों लेकर आता है।

आज एक विचलित करने वाली ख़बर पढ़ी। ख़बर थी कि सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की संवैधानिक पीठ इस बात पर फ़ैसला करेगी कि केन्द्रीय विद्यालयों में हर सुबह होने वाली प्रार्थनाएँ, ख़ासकर संस्कृत वाली, संविधान निर्दिष्ट मूलभूत धर्मनिरपेक्ष अवधारणा के विरोध में है या नहीं। 

यह बात विचलित करने वाली नहीं है, विचलित करने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के जज ने इस याचिका को इस लायक समझा कि इसे पाँच जजों की बेंच के लिए लिस्ट कर दिया। जब आप इसमें दिए जाने वाले तर्क सुनेंगे तो आपको लगेगा कि लगभग दो करोड़ लम्बित मामले वाले इस देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के पास किस-किस तरह की बातों के लिए समय है। 

पहले तो याचिकाकर्ता का कहना है कि वह नास्तिक व्यक्ति है, और केन्द्रीय विद्यालय में संस्कृत की ‘धार्मिक प्रार्थना’ के कारण इस देश के बहुत लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं। हालाँकि, भावना आहत होने के आँकड़ों के लिए कोई शोध किया गया हो, ऐसा कहीं भी बताया नहीं गया है। भावनाएँ आहत होना हमारा राष्ट्रीय उद्योग बन चुका है, और सुप्रीम कोर्ट का हर भावना को बचाने के लिए समय निकाल कर दही हाँडी की ऊँचाई से लेकर जलीकट्टू के सांड की सींग और होली के पानी तक के प्रयास का आम जनता जबरदस्ती सम्मान करती रही है।

(इस लेख का वीडियो आप नीचे देख सकते हैं।)

वापस आते हैं प्रार्थना के ऊपर। जो भी प्रार्थना होती है, जिसमें संस्कृत के कुछ श्लोक हैं जैसे कि ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्मय, मृत्योर्मामृतं गमय’ आदि हैं। ये एक बेहूदी दलील है कि ये धार्मिक है। यहाँ, धार्मिक मतलब ‘हिन्दू धर्म’ से संबंधित। इस कोर्ट के जज को क्या इतनी समझ नहीं है कि इस तरह की याचिकाओं को फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए? क्योंकि इस बात से समस्या विद्यार्थियों को होनी चाहिए, न कि किसी मलिन विचारों वाले व्यक्ति को।

प्रार्थना हम क्यों करते हैं, और क्या होता है इसमें? क्या सुविचार के संस्कृत में होने से धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं? फिर स्कूलों की प्रार्थनाओं को ही क्यों, ‘सत्यमेव जयते’ लिखे राष्ट्रीय प्रतीकों से लेकर संस्कृत की सारी किताबों में आग लगा देनी चाहिए। फिर तो, संस्कृत भाषा की पढ़ाई भी बंद करा देनी चाहिए। फिर तो, हमें मदरसों और मिशनरी स्कूलों से जीसस, अल्लाह की बातों पर भी ग़ौर करना चाहिए कि क्या वो धार्मिक हैं या नहीं?

इस तरह की याचिका का सुप्रीम कोर्ट के जज की टेबल पर पहुँचना बताता है कि लोगों के पास कितना खाली समय है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट का जज किसी प्रोग्राम में जाकर रोने लगता है कि जुडिशरी पर बहुत दबाव है! अरे भाई, जब इस तरह की बेहूदगी को बर्दाश्त करोगे, तो रोना ही नहीं, शर्म भी आनी चाहिए कि जिस कुर्सी पर आप बैठे हैं वहाँ आख़िर कर क्या रहे हैं? 

प्रार्थना के शब्दों के लिए संस्कृत भाषा एक माध्यम भर है। क्या किसी बच्चे को स्कूल के आप भगवान का नाम लेने से मना कर सकते हैं? क्या किसी बच्चे को यह कहा जा सकता है कि संस्कृत में ‘हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधेरे से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो’ का मतलब हिन्दी, अंग्रेज़ी या उर्दू में किए गए अनुवाद से अलग होगा?

क्या मदरसे में नमाज़ पर प्रतिबंध लगा दिया जाए कि ये धार्मिक है? और अगर धार्मिक ही है, तो क्या यही संविधान हमें धर्म को चुनने, अनुसरण करने की अनुमति नहीं देता है? क्या केंद्रीय विद्यालयों के अस्सी प्रतिशत विद्यार्थी जो हिंदू हैं (एक औसत आँकड़ा ले रहा हूँ), वो कल को वकील भेजकर ये कहलवाएँ कि प्रार्थना करना उनका अधिकार है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट फिर से सात जजों की बेंच बनाएगी?

‘सेकुलर’ के नाम पर जो बेहूदगी इस देश में हो रही है, और इस लॉबी के कारण न्यायपालिका का जितना समय हर रोज बर्बाद होता है, वो न जाने किस मजबूरी में जजों को नहीं दिख रहा। ऐसे वकीलों पर न सिर्फ़ आर्थिक पैनल्टी लगनी चाहिए, बल्कि इन्हें कोर्ट और पब्लिक में बेइज़्ज़त किया जाना चाहिए कि इस क़िस्म की याचिका वो क्यों लेकर आता है। 

अगर धार्मिक शिक्षा के नाम पर, संस्कृत के श्लोक के नाम पर, ऐसी बातें सिखाई जाएँ जो मानवता और भाईचारे के सिद्धांतों से दूर हैं, बच्चों को बिगाड़ते हों, तो बेशक सुप्रीम कोर्ट को स्वयं ही दख़ल देकर पूछना चाहिए कि शिक्षा के नाम पर ये सब क्या हो रहा है। लेकिन, जब प्रार्थना का उद्देश्य सुविचार और दिन की शुरुआत एक शांत, गंभीर तरीके से करना हो, तो इसमें किसी को समस्या कैसे हो सकती है?

क्या बच्चों के अभिभावकों के पास स्कूल चुनने का हक़ नहीं है? क्या किसी भी स्कूल से लगातार ऐसी शिकायतें आई हैं कि वहाँ सारे बच्चों को संस्कृत प्रार्थना करने पर विवश किया जाता है? क्या किसी ने ऐसा कहा है कि उसे प्रार्थना करने का मन नहीं होता, लेकिन उसके धार्मिक पहचान के आधार पर उससे प्रार्थना करवाकर, उसे प्रताड़ित किया जा रहा है? 

ऐसे याचिकाकर्ता बहुत ही धूर्त लोग हैं जिनकी मंशा न तो देश की धर्मनिरपेक्षता है, न ही समाज की भलाई का। ये लोग दो मिनट की लोकप्रियता के लिए इस तरह की बेहूदगी करते हैं। हमें यह देखना चाहिए कि क्या इतनी छोटी उम्र के बच्चे संस्कृत की उस प्रार्थना को ‘धार्मिक’ रूप में देखते हैं? अगर ऐसा है तो उसके माँ-बाप को, उसके शिक्षकों का दोष है कि वह भाषा को धर्म से जोड़कर देखता है, वह शब्दों के अर्थ को न लेकर शब्दों पर ही सवाल कर रहा है।

आप बच्चों को किस-किस आधार पर एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े करने की बात कर रहे हैं? धर्मनिरपेक्ष का मतलब धर्म का लोप नहीं होता, बल्कि दूसरे धर्मों की बातों को सहजता से स्वीकारना होता है। धर्मनिरपेक्ष का मतलब यह नहीं है कि मैं ‘अल्लाहु अकबर’ या ‘जय श्री राम’ कहने से साम्प्रदायिक हो जाता हूँ, बल्कि इसका मतलब यह है कि किसी के ‘जय श्री राम’ या ‘अल्लाहु अकबर’ कहने से मुझे कोई समस्या नहीं है। 

मुझे याचिकाकर्ता से समस्या नहीं है, क्योंकि वो तो अपनी हरकतों से चिरकुट लगता है। मुझे समस्या सुप्रीम कोर्ट के जजों से है कि उसकी समझ इतनी बेकार है संविधान या समाज को लेकर कि उसे इस मामले में संवैधानिक पीठ तक जाना पड़ रहा है? कुछ लोग कहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट को फ़ाइनल कर ही देना चाहिए कि ये सही है या गलत। 

फिर तो सुप्रीम कोर्ट तक कोई आदमी ‘भगवा’ रंग को लेकर धर्म देखते हुए पूरे देश से उसे हटवाने की अपील करेगा क्योंकि उससे उसकी धार्मिकता या नास्तिकता आहत हो रही है? कोई कल को मस्जिदों को हटाने की माँग कर सकता है कि उसे देखकर उसका हिन्दुत्व ख़तरे में पड़ रहा है?

देश धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब यह नहीं है कि धर्म के प्रतीकों को हटा दिया जाए, बल्कि उसका मतलब है कि हर धर्म के प्रतीकों के लिए नागरिक के मन में सम्मान हो। सम्मान न भी हो तो, वो दूसरों की धार्मिक भावनाओं पर आक्रमण न करे। उन्हें नीचा न दिखाए। 

याचिकाकर्ता की तरफ से दलील यह भी दी जा रही है कि ये केन्द्र संचालित हैं, तो उसमें इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए। केन्द्र संचालित बहुत सी चीज़ें हैं और उसमें धर्म के नाम पर बहुत सी बातें होती हैं। कार्यक्रमों का शुभारंभ दीप जलाकर किया जाता है, मंत्रालयों, विभागों, संस्थानों के नाम में, उनके प्रतीकों में संस्कृत के सुविचार हैं, तो क्या ये सब धार्मिक हैं?

ये धार्मिक नहीं हैं, ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है। संस्कृति का हिस्सा धर्म से जुड़ा हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि धर्म से जुड़ा है तो गलत है? अगर कहीं यह लिखा हो कि विधर्मियों को काट देना चाहिए, तो उस पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत है, न कि इस बात पर जो बेहतर जीवन जीने का उपदेश देता हो। 

किसी धर्म से जुड़ा होना उसे स्वयं ही गलत नहीं बना देता। आजकल का फ़ैशन है कि जो हिन्दू है, हिन्दू धर्म से जुड़ा है, हिन्दू विचारों की बात करता है, वो साम्प्रदायिक हो जाता है। चलन में आजकल है कि हिन्दुओं के हर प्रतीक को इस ‘सेकुलर’ नैरेटिव में खींचकर उसे नकार दिया जाए। यह स्थिति बहुत ख़तरनाक है क्योंकि देश की इतनी बड़ी आबादी के सब्र का इम्तिहान एक हद तक ही लिया जा सकता है।

जब जनता सड़क पर आ जाएगी तब न तो जज रहेंगे, न कोर्ट। इस तरह की याचिकाओं के लिए तीन सेकेंड से ज़्यादा समय देना बताता है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था विवेक की जगह ‘टेक्निकेलिटी’ से चलती है, और इसे वकीलों ने अपने मनमानी का अखाड़ा बना लिया है। जजों को अपनी और संस्थान की अहमियत समझनी चाहिए, तथा जजमेंट या निर्देश देते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। 

ऐसी तमाम बातों को देखकर ही लगातार अब यह नैरेटिव भी सामने आ रहा है कि न्यायालय का सहारा लेकर हिन्दुओं को टार्गेट किया जा रहा है। सबरीमाला से लेकर दही हांडी तक, दीवाली से लेकर होली तक, सरस्वती की संस्कृत प्रार्थना से लेकर दुर्गा की मूर्ति तक, हमेशा एक ही धर्म इनके निशाने पर रहे हैं। यह बात सोचने को विवश करती है कि जजों का बुद्धि-विवेक चंद वकीलों के हाथ में क्यों बंधक बना हुआ  है। 

लेख का वीडियो यहाँ देखें

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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