Friday, June 5, 2020
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अंग्रेज तो इसे जन्मस्थान मान चुके थे, रिकॉर्ड में घपला कर जुड़ा ‘बाबरी मस्जिद’: ऑपइंडिया से इतिहासविद् मीनाक्षी जैन की बातचीत

जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर के लिए इतिहास और पुरातत्व के स्पष्ट समर्थन के अलावा इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, अंग्रेज़ों द्वारा उस स्थल को जन्मभूमि मान लिए जाने के बाद ऐतिहासिक, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर हुई बातचीत के अंश

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती से बातचीत में अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद को लेकर कई ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (Indian Council of Historical Research, ICHR) की सदस्या डॉ. जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya (2017) लिखीं हैं। उन्होंने जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर के लिए इतिहास और पुरातत्व के स्पष्ट समर्थन के अलावा इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, अंग्रेज़ों द्वारा उस स्थल को जन्मभूमि मान लिए जाने के बाद ऐतिहासिक, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। नीचे प्रस्तुत है उनके साक्षात्कार का सारांश:

ASI पर सवाल उठाना हास्यास्पद, हिन्दू-मुस्लिम पक्ष की मौजूदगी में खुदाई

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) पर मुस्लिम पक्ष के वकीलों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उठाए गए सवालों को जैन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने साफ़ किया कि कमल का फ़ूल, वराहमूर्ति, संस्कृत में दीवारों पर शिलालेख आदि से साफ़ तौर पर उस स्थल के हिन्दू होने को प्रमाणित करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि न तो ASI के खुदाई और सर्वेक्षण कार्य में कोई कमी थी, न ही उनकी रिपोर्ट में। साथ ही, उनकी खुदाई इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशानुसार हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की गई थी। खुदाई में मिली एक-एक चीज़ का हिसाब उसी दिन रजिस्टर में लिखा गया, और उस दिन के अंत में दोनों पार्टियों ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।

उस खुदाई में मिली चीज़ों के महत्व पर भी वे प्रकाश डालतीं हैं। उनके मुताबिक खुदाई में मिले साक्ष्यों से यह साफ़ है कि न केवल मस्जिद मंदिर तोड़कर बनी, बल्कि यह स्थल मस्जिद के सैकड़ों, हज़ारों साल पहले से धार्मिक स्थल यानि मंदिर रहा है। उस स्थान पर लगातार किसी-न-किसी मंदिर के उपस्थित होने के सबूत ASI की खुदाई ने दिए हैं।

बाबरी ध्वंस के ही समय मिल गया था मंदिर का प्रमाण

मीनाक्षी जैन ने यह भी बताया कि 1992 में हुए बाबरी ध्वंस के समय ही उस स्थान पर मंदिर होने का प्रमाण मिल गया था। उसी समय वहाँ बाबरी के मलबे में मस्जिद के पूर्ववर्ती मंदिर पर लगा हुआ ‘विष्णु हरि’ शिलालेख गिरा। 5 फुट X 2 फुट के इस शिलालेख में साफ़ तौर पर 12वीं सदी में उस जगह पर मंदिर होने की बात लिखी गई थी, जिससे “लेकिन बाबर ने तो खाली जगह देख कर मस्जिद बनाई थी” का ‘क्यूट’ प्रोपेगंडा, जो आगे जाकर आज अदालत में दलील भी बन गया है, ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया था।

ऐसे में ‘मदद’ को आए वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उस समय कार्यरत हबीब ने खटराग अलापना शुरू किया कि यह शिलालेख एक ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, जिसे बाबरी ध्वंस के समय गुपचुप वहाँ ‘तस्करी कर’ लाया गया, और मलबे के बीच रख दिया गया। मीनाक्षी जैन बतातीं हैं कि जब हबीब से सवाल पूछा गया कि वह शिलालेख आखिर किस व्यक्ति के ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, तो उन्होंने रंग बदल कर इसे ‘त्रेता के ठाकुर’ नामक अयोध्या में ही स्थित एक दूसरे मंदिर से मिला शिलालेख बता दिया। (‘त्रेता के ठाकुर’ मंदिर हालाँकि अयोध्या में ही स्थित है,लेकिन उसका जन्मभूमि से कोई सरोकार नहीं है। यह औरंगज़ेब द्वारा तोड़ा गया एक दूसरा मंदिर है/) उनके मुताबिक लखनऊ संग्रहालय से ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख को जन्मभूमि स्थल पर लाया गया, और मलबे में ‘विष्णु हरि’ शिलालेख के नाम से ‘प्लांट’ कर दिया गया।

लेकिन उनका यह प्रोपेगंडा भी उनके दुर्भाग्य और हिन्दुओं के अच्छे कर्मों से तब ध्वस्त हो गया, जब किशोर कुणाल नामक एक संस्कृत विद्वान और रिटायर्ड आईपीएस ने लखनऊ के संग्रहालय में से वह शिलालेख खोज निकाला और उसकी तस्वीर प्रकाशित कर दी। ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख बेहद टूटा-फूटा और क्षतिग्रस्त है, जिसमें से बमुश्किल 2-3 शब्द पढ़े जा सकते हैं। वहीं ‘विष्णु हरि’ शिलालेख न केवल स्पष्ट और ठीक-ठाक हालत में है, बल्कि उसका अधिकाँश भाग पूरी तरह सुरक्षित और पठनीय भी है।

ब्रिटिश रिकॉर्ड किसने बदले?

मीनाक्षी जैन कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी करतीं हैं। वह बतातीं हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद बने ब्रिटिश राजस्व रिकॉर्डों में विवादित स्थल को केवल ‘जन्मभूमि’ के नाम से दर्ज किया गया था, जो बाद में (अदालत में रिकॉर्ड मँगाए जाने पर?) बदला गया। जहाँ-जहाँ पुराने रिकॉर्ड में केवल जन्मभूमि का उल्लेख था, वहाँ “*” लगाकर ऊपर की ओर “और बाबरी मस्जिद” लिखा गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि मुसलमानों का भी उस भूभाग पर दावा उतना ही पुराना रहा है, जितने समय पहले से हिंदू इसे मंदिर स्थल बताते हैं।

“Big Four” का प्रपंच

वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका पर भी डॉ. मीनाक्षी जैन ने तफ़सील से बात की। उन्होंने बताया कि न केवल वामपंथी इतिहासकारों ने ही मुस्लिमों को झूठा “तुम ये मुकदमा जीत सकते हो” का दिलासा देकर सुलझते-सुलझते मामले को दोबारा उलझा दिया, बल्कि उन्होंने अदालत को भी अपनी ‘राय’ को तथ्य बताकर बरगलाने की कोशिश की। हाई कोर्ट के पास समय की कमी नहीं थी, क्योंकि उस समय मामला ‘गर्म’ नहीं था- इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें आराम से सुनकर ख़ारिज कर दिया, और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने समय की कमी के चलते उन्हें दो टूक किनारे कर दिया।

इसके अलावा वे 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” माने जाने वाले रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आर एस शर्मा और डी एन झा के प्रपंच की भी पोल-पट्टी खोली। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

मथुरा, काशी पर भी किताब, गैर-वामपंथी इतिहासकार होना आसान नहीं

एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में डॉ. जैन ने यह भी बताया कि वह अयोध्या की ही तरह मथुरा और काशी पर भी वह अध्ययन कर रहीं हैं। इन मामलों पर भी वे किताब लिखेंगी। इसके अलावा एक दूसरे सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हालाँकि तथाकथित ‘दक्षिणपंथ’ ने राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, लेकिन भाजपा की सरकार में भी अकादमिक जगत जस-का-तस है। आज भी बौद्धिक वर्ग पर कब्ज़ा वामपंथियों का है, और दक्षिणपंथी या हिंदूवादी होना तो दूर, उनसे भिन्न, गैर-वामपंथी मत वाला तक होना आज भी अकादमिक जगत में मुश्किल है।

इस साक्षात्कार हेतु प्रश्नों की तैयारी एवं बाकी शोध मृणाल प्रेम स्वरुप श्रीवास्तव ने किया।

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