विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर ताजा जानकारी संसद में दी है। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर इन यात्राओं पर हुए खर्च को लेकर बहस शुरू हो गई। जानकारी सामने आने के कुछ ही घंटों में विपक्षी नेताओं और मोदी विरोधी लोगों ने अलग-अलग खर्च के आँकड़े साझा करने शुरू कर दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर जनता के टैक्स का बहुत पैसा खर्च हो रहा है।
लेकिन पूरी जानकारी देखने पर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। सिर्फ कुछ आँकड़ों को अलग से देखने के बजाय अगर पूरी जानकारी देखी जाए तो पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले प्रधानमंत्री की तुलना में ज्यादा विदेश यात्राएँ की हैं लेकिन इन यात्राओं पर कुल खर्च लगभग उसी स्तर पर रहा है। कुछ मामलों में खर्च पहले से कम भी रहा है।
यह जानकारी राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और CPI(M) सांसद डॉ. वी. शिवदासन के सवालों के जवाब में दी गई। दोनों सांसदों ने 2021 से अब तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं, हर यात्रा पर हुए खर्च, दूसरे देशों के साथ हुए समझौतों और इस दौरान भारत में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की जानकारी माँगी थी।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लगभग ₹74.5 करोड़ खर्च हुए। इन छह महीनों में ही उन्होंने मलेशिया, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, इटली, फ्रांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित 13 देशों की यात्रा की।
Total expenditure incurred on PM Modi's foreign visits this year
— Sidhant Sibal (@sidhant) August 6, 2026
From Parliamentary papers: pic.twitter.com/OX3bLkzy8v
जाहिर तौर पर, आलोचकों ने पूरी तस्वीर देखने के बजाय अलग-अलग विदेश यात्राओं पर हुए खर्च को ही मुद्दा बनाया। कुछ आलोचकों ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री की यूरोप यात्रा के दौरान सिर्फ नॉर्वे जाने पर 17 करोड़ रुपए से ज्यादा कैसे खर्च हो गए। उन्होंने इस आँकड़े को ज्यादा खर्च और फिजूलखर्ची साबित करने की कोशिश की।
Modi was in Norway for just one day.
— Kapil (@kapsology) August 6, 2026
It cost taxpayers ₹17 crore.
Aisa kya hua wahan par? 😲😲😲 pic.twitter.com/m35xjZM0Eu
यह आलोचना प्रधानमंत्री की आधिकारिक विदेश यात्राओं की असली प्रकृति को नजरअंदाज करती है।
आँकड़ों के अंदर की बात
सरकार की ओर से बताए गए खर्च में सिर्फ प्रधानमंत्री को एक देश से दूसरे देश ले जाने वाली फ्लाइट का खर्च शामिल नहीं है। इसमें चार्टर्ड विमान, सुरक्षा व्यवस्था, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, सरकारी प्रतिनिधिमंडल, संचार व्यवस्था, आने-जाने और रहने से जुड़ी व्यवस्थाएँ, प्रोटोकॉल और विदेश दौरों से जुड़े कई दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं। कई देशों की यात्रा वाले दौरों में प्रधानमंत्री कई देशों के नेताओं से मुलाकात करते हैं और इसलिए ऐसे दौरों का खर्च सामान्य यात्रा से ज्यादा होना स्वाभाविक है।
अगर किसी एक देश की यात्रा पर हुए खर्च को अलग से देखा जाए और पूरे दौरे को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इससे खर्च की एक गलत तस्वीर बनती है। सबसे अहम बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से खर्च की तुलना करने पर यह आलोचना कमजोर पड़ जाती है।
संसद में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 से 2014 के बीच 10 साल में 73 विदेश यात्राएँ की थीं। इन यात्राओं के दौरान केवल हवाई यात्रा पर करीब 795.18 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। यहाँ ‘केवल हवाई यात्रा’ शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं।
तुलना, जो आलोचक नहीं कर पाते
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के लिए जारी किए गए आंकड़ों में चार्टर्ड फ्लाइट, सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाओं का खर्च भी शामिल है। इसके उलट, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 795.18 करोड़ रुपए का आँकड़ा सिर्फ हवाई यात्रा का खर्च बताता है।
इसमें सुरक्षा व्यवस्था, रहने का खर्च, आने-जाने की व्यवस्था, संचार सुविधाएँ, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, प्रोटोकॉल और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के साथ होने वाले कई दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं। इसलिए, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर हुआ वास्तविक कुल खर्च उपलब्ध 795.18 करोड़ रुपए से काफी ज्यादा रहा होगा।
डॉ. सिंह की कई व्यक्तिगत यात्राओं का खर्च प्रधानमंत्री मोदी की हालिया यात्राओं से भी अधिक रहा है
व्यक्तिगत दौरों की जाँच करने पर यह तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। डॉ. सिंह की जून 2012 में मैक्सिको और ब्राजील की यात्रा पर अकेले हवाई यात्रा पर लगभग ₹26.94 करोड़ का खर्च आया। उनकी 2010 में वाशिंगटन डीसी और ब्राजील की यात्रा पर विमान संचालन पर लगभग ₹22.70 करोड़ खर्च हुए जबकि उनकी नवंबर 2009 में अमेरिका और त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर लगभग ₹21.27 करोड़ का खर्च आया।
2013 में अमेरिका की एक अन्य यात्रा में हवाई यात्रा पर लगभग ₹23.30 करोड़ का खर्च आया। इनमें से प्रत्येक आँकड़ा केवल विमान की लागत से संबंधित है।
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कई बहु-देशीय यात्राओं का खर्च जिसमें सुरक्षा, रसद और आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के खर्च शामिल हैं पिछली सरकार के हवाई यात्रा बिलों से कम या लगभग बराबर रहा है। इससे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यय के अलग-अलग आँकड़ों से सनसनीखेज निष्कर्ष निकालना बौद्धिक रूप से बेईमानी है। व्यापक तुलना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अधिक कूटनीति, लगभग उतना ही खर्च
2015 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 से ज्यादा विदेश यात्राएँ कीं। यह संख्या डॉ. मनमोहन सिंह की 10 साल में की गई 73 विदेश यात्राओं से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर कुल खर्च करीब 800 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है।
दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री मोदी ने ज्यादा बार विदेश यात्रा की, ज्यादा देशों का दौरा किया और कई देशों के नेताओं के साथ मुलाकात की लेकिन उनकी विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सिर्फ हवाई यात्रा पर हुए 795.18 करोड़ रुपए के खर्च से भी कम है।
यह मानना मुश्किल है कि डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, होटल, आने-जाने की व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और स्थानीय परिवहन पर कोई खर्च नहीं हुआ होगा। इसलिए साफ है कि UPA सरकार के दौरान प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च सिर्फ हवाई यात्रा के उपलब्ध आँकड़े से काफी ज्यादा रहा होगा।
PM मोदी ने एक बड़ा खर्च खत्म किया: पत्रकारों के ‘सरकारी खर्च पर विदेश दौरों’ पर लगी रोक
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक अक्सर एक अहम अंतर का जिक्र नहीं करते। यह अंतर विदेश यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री के साथ जाने वाले आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल से जुड़ा है।
UPA सरकार के दौरान बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों का प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरों पर जाना आम बात थी। वे आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा होते थे। ऐसे में उनके लिए विशेष विमान में सीट और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाएँ करनी पड़ती थीं।
2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया। अब पत्रकार आम तौर पर प्रधानमंत्री के साथ सरकारी विमान में विदेश यात्रा नहीं करते। अगर मीडिया संस्थान प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को कवर करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी तरफ से यात्रा और दूसरी व्यवस्थाएँ करनी होती हैं।
इस बदलाव से विदेश यात्राओं के खर्च का एक हिस्सा अपने आप कम हो गया, जो पिछली सरकारों के दौरान होता था। लेकिन दोनों सरकारों के बीच विदेश यात्रा के खर्च की तुलना करते समय आलोचक अक्सर इस अंतर का जिक्र नहीं करते।
इसके बजाय, वे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर हुए खर्च के चुनिंदा आँकड़ों को सामने रखते हैं और उनके बड़े कूटनीतिक एजेंडे के साथ-साथ आज विदेश यात्राओं के आयोजन के तरीके में आए बदलाव को नजरअंदाज कर देते हैं।
कूटनीतिक महत्व को सिर्फ खर्च से नहीं मापा जा सकता
आलोचना में मोदी सरकार के दौरान भारत की बढ़ी हुई अंतरराष्ट्रीय सक्रियता को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ सिर्फ दो देशों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं रही हैं। इनमें G20, क्वाड, BRICS, SCO, ASEAN, COP और कई दूसरे बहुपक्षीय सम्मेलनों में भारत की भागीदारी भी शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक पहुँच उन क्षेत्रों तक भी बढ़ी है, जिन्हें पहले के दशकों में प्रधानमंत्रियों की ओर से अपेक्षाकृत कम ध्यान मिला था।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल 2021 से दिसंबर 2025 के बीच भारत को करीब 381.8 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मिला। यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा निवेश सीधे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की वजह से आया। लेकिन अलग-अलग सरकारें हमेशा से मानती रही हैं कि बड़े स्तर की कूटनीति निवेश लाने, व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने और भारत के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान रक्षा सहयोग, नई तकनीक, सेमीकंडक्टर निर्माण, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, लोगों की आवाजाही से जुड़े समझौते, सप्लाई चेन और निवेश साझेदारी जैसे कई अहम मुद्दों पर बातचीत होती है। भू-राजनीतिक तनाव के दौर में दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ सीधे बातचीत का मौका भी इन यात्राओं से मिलता है।
यह उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है और साथ ही विकसित देशों के साथ अपने संबंध भी लगातार गहरे कर रहा है।
सार्वजनिक पैसे के इस्तेमाल पर सवाल उठाना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। आखिर संसद का एक बड़ा काम सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करना ही है। लेकिन किसी भी खर्च की जाँच पूरी और एक जैसी जानकारी के आधार पर होनी चाहिए, न कि संदर्भ से अलग किए गए कुछ आँकड़ों के आधार पर।
विदेश मंत्रालय की ताजा जानकारी यह साबित नहीं करती कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लापरवाही से बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया गया। इसके उलट, आँकड़े बताते हैं कि भारत ने पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय विदेश नीति अपनाई है लेकिन खर्च मोटे तौर पर उसी स्तर पर रहा है और संभव है कि पिछली सरकार के मुकाबले कम भी रहा हो जबकि विदेश यात्राओं की संख्या काफी ज्यादा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि संसद में सामने आए आँकड़े उन्हीं दावों को कमजोर करते नजर आते हैं, जिन्हें मोदी विरोधियों ने उठाया था। ये आँकड़े यह साबित करने के बजाय कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ फिजूलखर्ची वाली हैं, यह दिखाते हैं कि उन्होंने ज्यादा देशों की यात्रा की, भारत की कूटनीतिक पहुँच बढ़ाई, सरकारी विमान में मीडिया प्रतिनिधिमंडल ले जाने जैसी अतिरिक्त लागत वाली पुरानी व्यवस्था को खत्म किया और इसके बावजूद सरकारी खर्च में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई।
जब इन आँकड़ों को चुनिंदा सुर्खियों के बजाय पूरी तस्वीर के साथ देखा जाता है, तो कहानी फिजूलखर्ची की नहीं बल्कि ज्यादा सक्रिय विदेश नीति और आधिकारिक यात्रा पर खर्च को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने की दिखाई देती है।


