Wednesday, November 25, 2020
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‘द क्विंट’ के राघव बहल को पान की दुकान पर कैसेट रिकॉर्डिंग का धंधा ज़्यादा सूट करता है

प्रोपेगेंडा यह है कि एक अक्षम, मानसिक रूप से ढीला और आम तौर पर राजनैतिक परदृश्य से गायब रहने वाले व्यक्ति में आपको एक परिपूर्ण पोलिटिशियन दिखता है। प्रोपेगेंडा यह है कि जिस व्यक्ति के पास न तो कोई विजन है, न रोडमैप है, न ब्लूप्रिंट है, न समझाने के लिए शब्द हैं, उनमें आपको कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन दिखता है।

ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर पत्रकारिता के जो खोखे कुछ लोगों ने खोल रखे हैं, वहाँ टाटा 407 से लेकर महिन्द्रा कमांडर और ऑटोरिक्शा में बजने वाले ढिच्चिक-ढाँय वाले गानों की रिकॉर्डिंग के अलावा और कुछ काम का हो नहीं रहा। आप अगर बिहार, यूपी से लेकर दिल्ली तक की सवारी गाड़ियों में बैठेंगे तो पाएँगे कि ये लोग एक ही तरह के गाने बजाते हैं, एकदम से दिलजले टाइप के। इनके भाव से लेकर गानों का चुनाव तक बिलकुल एक ही होता है।

आज कल चुनाव चल रहे हैं, और चुनाव के दौर में नेता भी चल रहे हैं। नेता चल रहे हैं, तो पत्रकार भी चलायमान हैं। नरेन्द्र मोदी ने पिछले पाँच सालों में जितने इंटरव्यू नहीं दिए, उतने पिछले पाँच सप्ताह में दे दिए हैं। फिर राहुल गाँधी की भी लोगों को याद आई कि देश का असली भविष्य तो वही हैं, तो उनको कैसे टच अप-वच अप दे कर आइकॉनिफाय किया जाए।

इसी संदर्भ में उनके मूर्खतापूर्ण बयानों को ऐसे दिखाया गया जैसे राहुल गाँधी दार्शनिक हो गए हैं, और बुद्धों में गौतम के बाद अब राहुल ही आए हैं। ‘मैं उनके दिल से नफ़रत निकालना चाहता हूँ, प्यार बाँटना चाहता हूँ’, इस वाक्य में मूर्खता इतनी भरी हुई है कि आप सोचने लगेंगे कि आखिर कहा क्या जा रहा है। ‘चाहे जो भी हो जाए, मैं उनके माता पिता पर कोई कमेंट नहीं करूँगा’, इस बात को मीडिया ने ऐसे दिखाया जैसे कितनी मैच्योरिटी आ गई है इस व्यक्ति में जबकि यही आदमी ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाता फिरता है, वो भी बिना किसी सबूत के।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष में क्विंट की भी अपनी एक जगह है। इसके सरगना राघव बहल हैं। राघव बहल ने हाल ही में राहुल गाँधी से बातचीत की। बातचीत में क्या हुआ यह जानने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गिरोह किस तरीके से काम करता है, वो आप सबको मालूम है। राघव बहल ने इंटरव्यू लेने के बाद जो ट्वीट किया है, वो ज़्यादा चिंता का विषय है।

यूँ तो क्विंट जैसे संस्थान पान की दुकान पर फटे पन्ने पर रिकॉर्डिंग की रिक्वेस्ट लेने वाला कार्य ही करते हैं, लेकिन ट्विटर पर मॉरल हाय ग्राउंड लेने में एक पैसा नहीं हिचकिचाते। इनके सारे सवाल वही होते हैं, जो तीन दिन पहले किसी और ने किए होते हैं। इनकी पूरी पत्रकारिता यही कहने में निकल जाती है कि मोदी से ‘कड़े सवाल’ नहीं पूछे जा रहे, लेकिन राहुल गाँधी के क्यूट डिम्पल देखते ही इनका वैचारिक स्खलन हो जाता है।

बहरहाल, राहुल गाँधी की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा तो जनता को है ही, लेकिन राघव बहल ने जो ट्वीट किया है, वो पढ़ कर आपको लग जाएगा कि ये लोग पत्रकार किस हिसाब से कहते हैं खुद को। इन्होंने लिखा कि ‘हमने राहुल गाँधी से लगातार पूछा कि वो गठबंधन बनाने के लिए कितना समझौता करने को तैयार हैं, और उनका यह कहते रहना कि जनता जो कहेगी हम वही करेंगे, बताता है कि वो एक पूर्ण राजनेता बन गए हैं।’

राघव बहल जी, अगर इस स्टेटमेंट से राहुल गाँधी आपको पूर्ण राजनेता लगने लगे हैं तो बेलचा उठाइए और कहीं ट्रकों से गिट्टी-बालू उतारने का काम शुरु कर लीजिए। दो ऐसे वाक्य जिनका एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है, कोई संबंध नहीं, लेकिन राहुल गाँधी को कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन कहना था तो एक बेकार से बयान पर उन्हें यह कह दिया गया।

क्या राघव बहल का चुनावी विश्लेषण यह कहता है कि राहुल गाँधी किसी भी दृष्टिकोण से ‘कॉलिंग द शॉट्स’ की स्थिति में हैं? क्या उन्हें यह लगता है कि कॉन्ग्रेस आज के दौर में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है? क्या राघव बहल को देश के कई राज्यों में कॉन्ग्रेस द्वारा छोटी पार्टियों के साथ किसी भी तरह, बिना शर्त के सरकार में होने या गठबंधन के लिए लालायित होने में कॉन्ग्रेस की स्थिति ऐसी लगती है कि उन्हें समझौता नहीं करना पड़ेगा?

एक जानकार पत्रकार यह सवाल करेगा ही नहीं। लेकिन वैसा पत्रकार यह सवाल भी करेगा, बार-बार करेगा, और फिर उसके लिए जो जवाब आएगा उसे ऐसे बता देगा जैसे मूसा टेन कमांडमेंट्स लेकर आ गया हो। राहुल गाँधी से हर पत्रकार यही सवाल करता है कि ‘क्या वो खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं’, और राहुल का यही जवाब आता है कि वो तो जनता तय करेगी।

इन लगातार, रिपीट मोड पर चल रहे राहुली बयानों से क्या पत्रकारों को यह पता नहीं चल रहा कि कॉन्ग्रेस कुछ भी कर ले, वो इस स्थिति में तो बिलकुल नहीं होगी कि महागठबंधन के नेता बन कर राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे करे। हाल ही में मायावती से लेकर केसीआर तक ने अपने आप को प्रधानमंत्री के रूप में आगे किया है, और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने यह बयान दिया है कि वो प्रधानमंत्री पद पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हैं।

सवाल जो पूछे नहीं गए, सवाल जो पूछे नहीं जाते

क्विंट सरगना बहल साहब ने दूसरे ट्वीट में यह ज्ञान दिया कि ‘राहुल गाँधी ने उनसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी, और जब उन्होंने कहा कि वो यह कार्यक्रम लाइव करेंगे तो राहुल सहजता से तैयार थे। यह आज के समय में काफी अलग है जबकि बाक़ियों के इंटरव्यू कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा होते हैं।’

यहाँ पर राघव बहल दो तरीके से गलत हैं, पहला तो यह कि जिनके पत्रकार टिकटॉक के विडियो का विश्लेषण कर के ‘डेन्जरस हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा‘ की बात निकाल लाते हैं, उन्हें दूसरों की पत्रकारिता पर ज्ञान बाँचने की आवश्यकता है नहीं। दूसरी यह कि इंटरव्यू के लिए सवालों की लिस्ट माँगना पत्रकारिता में सामान्य शिष्टाचार और सहज भाव से बेहतर इंटरव्यू संचालन के लिए होता है।

आप यह सोचिए कि आपने किसी नेता से पूछ दिया कि उनके क्षेत्र में कितने मकान बने हैं, सड़कों की लंबाई कितनी है, पोखरों की खुदाई में कितने पैसे ख़र्च हुए, कितने बच्चों की टीकाकरण हुआ। और वो हर बार, अपने सचिव से पूछता है, फिर आपको कहता है कि उनके पास उत्तर है, अब रिकॉर्ड कर सकते हैं। इसमें समय की बर्बादी होती है। आप यह सोच कर नहीं चल सकते कि हर व्यक्ति को, हर बार, सारे आँकड़े याद रहते हैं। यही कारण है कि सवालों की लिस्ट पहले मँगा ली जाती है, ताकि दोनों पक्ष का समय बचे।

आपसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी गई, या आप बस राहुल गाँधी के लिए माहौल बनाने के लिए ऐसा कह रहे हैं, ये आप जानिए। लेकिन जो माँगते हैं, या जो देते हैं, वो किसी भी तरह से गलत नहीं होते। उसे कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा नहीं कहते। कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा क्या है, इसका उदाहरण राघव बहल ने इन्हीं दो ट्वीटों में दे दिया है, और इंटरव्यू देख कर आपको पता चल जाएगा कि कई बार, बहुत सारी बातें नहीं पूछना भी, प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा होता है।

प्रोपेगेंडा यह है कि एक अक्षम, मानसिक रूप से ढीला और आम तौर पर राजनैतिक परिदृश्य से गायब रहने वाले व्यक्ति में आपको एक परिपूर्ण पॉलिटिशियन दिखता है। प्रोपेगेंडा यह है कि आप चालाकी से सिर्फ फर्जी बातों में पूरा इंटरव्यू निकाल ले जाते हैं, जबकि दूसरे चैनलों के लिए आप प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल बस इसलिए करते हैं क्योंकि आपको वो इंटरव्यू नहीं मिला। प्रोपेगेंडा यह है कि जिस व्यक्ति के पास न तो कोई विजन है, न रोडमैप है, न ब्लूप्रिंट है, न समझाने के लिए शब्द हैं, उनमें आपको कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन दिखता है।

आपको पता है कि आप ये बात लिख देंगे, और जनता के विचार उस तरफ हो जाएँगे। इसलिए आपने उस व्यक्ति को दृश्य से गायब कर दिया और लेबल चिपकाने का काम शुरु कर दिया है। जो जनता कभी शोकेस में सजाए डब्बों को खोलती भी नहीं, उसे आपने गधे के खिलौने के डिब्बे पर घोड़े का चित्र चिपका कर ठग लिया है। ये जनता कभी भी पैसा देते वक्त तक उस डब्बे को खोलेगी भी नहीं, और जब खोलेगी तो उसे पता चलेगा कि राघव बहल ने उसे घोड़ा कह कर गधा थमा दिया। मुझे गधों से कोई समस्या नहीं, बहुत मेहनती होते हैं, जो कि राहुल गाँधी बिलकुल ही नहीं हैं, बस उदाहरण के लिए जो दिखाया जा रहा है और जो है, उसमें अंतर है, इस कारण से मैंने ये उपमा दी है।

कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा के नाम पर जो दो-चार पत्रकार तीतर बन रहे हैं, वो जानबूझकर, आम जनता की अनभिज्ञता का फायदा उठा रहे हैं। राहुल गाँधी से इस तीतर ने यह क्यों नहीं पूछा कि उसने राफेल को लेकर हाल ही में जो बोला कि ‘मुझे इस पर जानकारी नहीं, मैं IAF से पूछूँगा’, कि जब उसे पता ही नहीं है, और एयरफ़ोर्स ने अपना पक्ष इस पर स्पष्ट कर दिया है, फिर भी आप राफेल पर क्यों नाच रहे हैं?

राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर उनकी क्या सफ़ाई है? भले ही राहुल गाँधी यह जवाब देते कि मामला कोर्ट में है, और वो न्यायालय का सम्मान करते हैं, लेकिन सवाल क्यों नहीं पूछा गया। उनसे नेशनल हेरल्ड केस पर क्यों सवाल नहीं पूछा गया? उनसे यह क्यों नहीं पूछा गया कि उनकी पार्टी के नेता जब प्रज्ञा ठाकुर पर सवाल उठाते हैं, तो वो स्वयं और उनकी माताजी सोनिया गाँधी भी तो ज़मानत पर घूम रहे हैं, वो क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? दोनों में से तो कोई एक स्टैंड क्यों नहीं लेती इनकी पार्टी?

राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि 1984 के दंगों पर जब वो इतने मुखर हैं तो फिर कमलनाथ मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे बन जाता है? आपकी और आपके माताजी की पूरी राजनीति पिछले दस सालों में 2002 पर ही अटकी रही है, जो कि अब एक साल से राफेल पर पहुँची है, फिर कमलनाथ जैसे दंगाई को आपने मुख्यमंत्री बना कर क्या यह साबित नहीं किया कि आपके पिता के सहयोग हेतु सिखों की हत्या में हाथ बँटाने वाले को कॉन्ग्रेस पार्टी अवार्ड दे रही है?

राहुल गाँधी से क्विंट ने यह सवाल क्यों नहीं पूछा कि उनके दिमाग में जो डकवर्थ-लुई से भी कॉम्प्लेक्स गणित चलता रहता है उसका आधार क्या है? जिस 30,000 करोड़ और अम्बानी की वो बात करते हैं वो संख्या कहाँ से आई है? राहुल गाँधी ने जो रैलियों में बार-बार 15 उद्योगपतियों के कभी 3.5 तो कभी 5.5 लाख करोड़ रुपए की माफ़ी की बात मोदी के सर पर रखी है, वो आँकड़ा कहाँ से आया? ये 15 उद्योगपति कौन हैं, इनके नाम राहुल गाँधी क्यों नहीं बताते? शायद इस सवाल के लिए राघव बहल को राहुल को लिस्ट दे ही देनी चाहिए थी, ताकि वो नाम लिख लेते क्योंकि इस व्यक्ति को अपना ही नाम याद हो, देश को इस पर संदेह है।

प्रोपेगेंडा न करने की बात करने वाले क्विंट ने राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा कि मोदी द्वारा बनाया गया कानून कि आदिवासियों को कहीं भी गोली मारी जा सकती है, किस पीनल कोड में आया है? आखिर राहुल गाँधी आदिवासियों के बीच जा कर ये बातें कैसे कह देते हैं? राघव बहल को ये सवाल तो पूछना चाहिए था ताकि पता तो चलता कि मोदी ने कोई सीक्रेट मोदी पीनल कोल्ड और मोदी क्रिमिनल प्रोसीजर नामक दो कानूनी किताबें भी लिख रखी हैं जिनका पीडीएफ़ भाजपा शासित राज्यों की पुलिस के पास है। यूपीएससी की तैयारी करने वाले लोगों को इससे कितनी मदद मिल जाती!

राहुल गाँधी से क्विंटाचारी बहल ने ये क्यों नहीं पूछा कि तुमने जो दस दिन में किसानों की लोन माफ़ी और बेरोज़गारी भत्ते देने की बात की थी, और उँगलियाँ छूते हुए पूरे देश को एक दिन बताया था कि तुम्हें दस तक की गिनती आती है, वो इसी ग्रह के दस दिन थे, या फिर कहीं और के, क्योंकि दस दिन तो कब के बीत गए और भत्ता तो किसी को नहीं मिला। लोन किस तरह से, और कितने किसानों के माफ हुए हैं, उस पर भी क्विंट के क्यूट राघव बहल जी एक सवाल पूछ लेते।

ये सारी बातें राफेल की तरह नहीं हैं जो फर्जी हैं, या जिसे सुप्रीम कोर्ट तक ने नकार दिया है। ये सारी बातें राहुल गाँधी की रैलियों की पब्लिक स्पीच से हैं। इसे पूछने की हिम्मत तो क्विंट को हुई नहीं और ये प्रोपेगेंडा पर लेक्चर दे रहे हैं। राघव बहल, इसी को प्रोपेगेंडा कहते हैं। ये जो इमेज बिल्डिंग का ठेका लिया है न आपने और आपके गिरोह ने, इससे बेहतर था कि दीवारों पर ईंट जोड़ते, कम से कम वास्तव में किसी के घर की दीवार तो खड़ी हो जाती, यहाँ आप एक ग़ुब्बारे में हवा भर रहे हैं, जिसे कोई आम आदमी एक पिन मारेगा और वो फुस्स हो जाएगा।

विपक्ष में एक नेता की कमी जो कॉन्ग्रेस ही पूरा कर सकती है

राघव बहल जैसे धूर्त पत्रकारों का गिरोह यह जानता है कि उनके तारणहार कॉन्ग्रेस के युवराज ही हैं। भले ही उनकी मानसिक क्षमता कुछ भी हो लेकिन उनके कैबिनेट में अनुभवी लुटेरे हैं जो तंत्र को वापस अपने हिसाब से चला देंगे ताकि फोन पर से कैबिनेट चर्चा की जानकारी मिल जाया करे, विदेशों से बिना किसी हिसाब-किताब के चंदा मिलता रहे, राज्यसभा की सदस्यता से लेकर पद्म पुरस्कारों में इनके नाम आएँ।

सबको पता है कि महागठबंधन छुटभैये नेताओं की महात्वाकांक्षा की बलि चढ़ता आया है, चढ़ता रहेगा। आखिर ममता को यह कैसे गँवारा होगा कि वो प्रधानमंत्री न बने और मायावती बन जाए? आखिर केसीआर क्यों अपने आप को दूसरे देवगौड़ा की तरह नहीं देखेगा? आखिर स्टैलिन खुद को किंगमेकर की तरह क्यों नहीं देख सकता?

ऐसे में ज़रूरत है एक संयोजक की। लेकिन समय अब वैसा नहीं है जब कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी, और उनकी बात छोटे दल सहज रूप से सुनते थे। समय ऐसा बदला है कि कॉन्ग्रेस अपना मुँह छुपाती फिरती है, और छोटे दलों से कह रही है कि ‘हमसे गठबंधन कर लो’ और वो दल कहते हैं कि करेंगे लेकिन अपनी शर्तों पर।

यही कारण है कि दूसरे संस्थानों पर ‘कठिन सवाल नहीं पूछते’ और ‘स्क्रिप्टेड इंटरव्यू’ का लेबल लगाने वाले, राहुल गाँधी को ही पूर्ण राजनेता, परिपक्व लीडर, समझदार व्यक्ति और तमाम विशेषणों से नवाज़ते हुए लेख और हेडलाइन रच रहे हैं। ये बातें जितनी हास्यास्पद हैं, अब उतनी लगती नहीं क्योंकि इस गिरोह ने राहुल गाँधी के बेकार और मतलबहीन ट्वीट में कालिदास के मुक्के को पंच तत्व के आपसी सहयोग से मानव शरीर की रचना जैसे ज्ञान की बात खोज निकाली है।

राहुल गाँधी का दुर्भाग्य यह है कि वो भरी बारिश में काली माता के मंदिर में दिया जलाने जाते नहीं, और वो सिर्फ चुनावों के समय ही जनऊ पहनते हैं, चुनावों के समय ही राम भक्त और शिव भक्त बनते हैं। साथ ही, उनको एक्सिडेंटली भी, सर पर चोट लगने से ही सही, ज्ञान मिलने की संभावना दिखती नहीं क्योंकि उसके लिए भी पूर्व में अर्जित ज्ञान के लोप होने की बात ज़रूरी है। जिस व्यक्ति की आस्था का काँटा, उसके परिवार द्वारा कुछ शहरों में तीन घंटे के लिए पहुँचाई बिजली का घर के स्टेबलाइजर के वोल्टमीटर के काँटे की तरह 60 से 200 तक बढ़ता-घटता हो, उसे कोई राम, शिव या काली आशीर्वाद देंगी, यह मानना तर्कसंगत नहीं लगता।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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