‘बहनोई’ आतंकवादी के लिए BBC हिंदी का उमड़ा प्यार, पत्रकारिता को किया तौबा-तौबा!

जिन आतंकवादियों को हम दशकों से झेलते आए हैं, जिनके हाथ न जाने कितने मासूमों के खून से रंगे हैं उसके लिए ऐसी हमदर्दी! ऐसे शब्द! तौबा-तौबा!

पुलवामा हमले के बाद भारत की सरकार ने और सरकार के आदेश पर काम करने वाली हमारी सेना ने पाकिस्तान में घुस कर बदला लिया। दुश्मन देश की सामरिक ‘शक्ति’ वाली गीदड़भभकी को भारतीय वायु सेना ने चकनाचूर कर दिया। इस ख़बर को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सभी मीडिया ने कवर किया। कुछ ने खुल कर, कुछ ने चोरी-चोरी, कुछ ने तो खैर अपना ‘चरित्र हनन’ ही करवा लिया।

खुद का चरित्र हनन!

हाँ। ऐसा होता है। कुछ अलग करने के चक्कर में, कुछ का या किसी का हित साधने के चक्कर में अक्सर ऐसा हो जाता है। BBC हिंदी ने यह काम बखूबी कर दिखाया। एकदम दिल खोलकर किया। जिन आतंकवादियों को हम दशकों से झेलते आए हैं, जिनके हाथ न जाने कितने मासूमों के खून से रंगे हैं उसके लिए ऐसी हमदर्दी! ऐसे शब्द! तौबा-तौबा!

BBC के ‘बहनोई’

इस आर्टिकल को लिखने वाले पत्रकार पाकिस्तान से मालूम पड़ते हैं। लेकिन BBC हिंदी का एडिटोरियल ऑफिस तो दिल्ली में ही है, ऐसा ‘गुप्त सूत्रों’ से पता चला है। पत्रकार रहीमुल्ला ने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, यह कुछ हद तक समझा जा सकता है लेकिन आप दिल्ली में बैठ कर इसे काट-छांट सकते थे। लेकिन नहीं। ‘बहनोई’ की इज्जत में लिखे गए शब्दों पर संपादकीय कैंची कैसे?

स्टाइलशीट का गोरखधंधा

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आम आदमी के लिए यह भारी-भरकम शब्द हो सकता है शायद। शायद इसलिए क्योंकि हम जैसे छोटे पत्रकार अपने पाठकों को 4G-5G और Jio के युग में मानसिक तौर पर समृद्ध मानते हैं। लेकिन BBC तो ठहरी बिगBC… वो शायद ऐसा न समझती हो। वरना ‘आतंकी बहनोई’ और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के लिए दो अलग-अलग स्टाइलशीट वाला गोरखधंधा शायद नहीं अपनाती।

पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है। मीडिया हाउस ही सिर्फ पत्रकारिता करती है, कर सकती है, ऐसा कॉन्सेप्ट नहीं रहा अब। सोशल मीडिया पर भीड़ है, जो फेक को सच मान लेती है। लेकिन उसी सोशल मीडिया पर वैसे लोग भी हैं, जिनके पास बाँस है। मीडिया हाउसेज को इन्हीं बाँसों से डरना चाहिए। दोहरे मापदंड वालों पर इनकी नज़र रहती है। बचिए BBC हिंदी।

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