Monday, May 10, 2021
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अब्दुल अब्दुल अब्दुल… सौ में लगा धागा, अब्दुल आग लगा कर भागा

आप ही बताइए कि सारे फैसले अल्पसंख्यकों के विरोध में ही जा रहे हैं तो वो क्या करेंगे? कहाँ जाएँगे? क्या उनके द्वारा फैसला सड़कों पर नहीं होना चाहिए? बिलकुल होना चाहिए क्योंकि सड़क का टैक्स तो सब भरते हैं, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े ही है?

अब्दुल के पीछे पुलिस, पुलिस के पीछे अब्दुल, अब्दुल-अब्दुल-अब्दुल… आगे आगे अब्दुल, पीछे पीछे अब्दुल… कहाँ जा रहा अब्दुल? अब्दुल के दो आगे अब्दुल, अब्दुल के दो पीछे अब्दुल… अक्कड़ बक्कड़ बैंग्लोर बो, अब्दुल शहर को फूँक दो! सौ में लगा धागा, अब्दुल मशाल ले के भागा! मशाल में डाला तेल, अब्दुल जाएगा जेल!

अटकन मटकन दही चटाकन, थाने में बस आग लगावन। अब्दुल अब्दुल अब्दुल… अब्दुल आग लगाएगा, फिर ह्यूमन चेन बनाएगा, फिर फोटो भी खिंचवाएगा, फिर अच्छा अब्दुल कहलाएगा! पर अब्दुल भाई ये तो बोलो, अपने दिल के राज तो खोलो, मंदिर को बचा रहे थे किस से? जलाने वाले थे किस मजहब के!

माँ, कह एक कहानी, बेटा क्या समझ लिया है तूने मुझको अपनी नानी? कह माँ, कह लेटी ही लेटी, अब्दुल था या थी सलमा रानी? माँ, कह एक कहानी! तू है हठी मानधन मेरे! सुन, बैंग्लोर में साँझ के बेरे, तात भ्रमण पर निकले तेरे, आई व्हाट्सएप्प पर वाणी। आई व्हाट्सऐप पर वाणी? टेक्नीकल हुई कहानी। व्हाट्सएप्प जब अब्दुल ने पाया, पढ़ कर उसका मन हर्षाया, उसने तब मशाल उठाया, जम कर उसको तेल पिलाया, तेल नहीं था पानी, अब बढ़ चली कहानी! अब्दुल ने तब भीड़ जुटाई, झूठी सबको बात बताई, बोला कर लो सब तैयारी, फूँकना है सब अबकी बारी, हिंसक हुई कहानी? हाँ, बेटे हिंसक हुई कहानी! एक हजार अब्दुल तब आए, कोई पत्थर-ईंट उठाए, पेट्रोल बम भी साथ में लाए, सबने तब दंगे भड़काए, खून बहा जैसे था पानी, रक्तिम हुई कहानी! खूनी हुई कहानी? नॉट अ गुड कहानी!

उठो लाल अब आँखें खोलो, पेट्रोल लाई हूँ मुँह को धो लो। बीती रात, सलमा है आई, कैसी तूने आग लगाई, कपड़े काले हुए हैं जल कर, लिबरल चहक रहे ट्विटर पर, ह्यूमन चेन लगे अतिसुंदर। बैंग्लोर ने क्या जली छवि पाई, अब्दुल तूने ही आग लगाई! भोर हुई सूरज अग आया, जल में है कलुषित सी छाया। तेरे मशाल की किरणें आईं, थाने जले, समुदाय मुस्काई। इतना सुंदर समय मत खोओ, अब्दुल प्यारे अब मत सोओ?

नमस्कार,
मैं बकैत कुमार! बैंग्लोर में दंगे हो गए, कॉन्ग्रेस के विधायक के भतीजे ने किसी हिन्दूघृणा से रिसते पोस्ट के नीचे कोई दूसरा कमेंट किया और अल्पसंख्यक समुदाय को बुरा लग गया। जिस हिसाब से आजकल रेखाएँ क्षीण और धुँधली होती जा रही हैं, भाजपा वालों के काम भी कॉन्ग्रेस वाले करते नजर आ रहे हैं। हालाँकि, हमारे चैनल या रिपोर्टरों की फौज ने उस भतीजे के बचपन के दोस्तों के फेसबुक पोस्ट निकालने शुरु कर दिए हैं कि कोई भाजपाई या बजरंग दल का निकल आए तो हम आपको कह सकें कि वास्तव में भतीजा तो ठीक-ठाक था, लेकिन उसी भाजपाई के संगत में आ कर साम्प्रदायिकता फैलाने लगा था। हम लगे हुए हैं, जैसा भी होगा, कभी भी फेसबुक आदि पर सूचित करेंगे आपको।

खैर, बुरा इसलिए लगा क्योंकि बुरा लगने पर सिर्फ उनका ही हक है। ‘आहत होना’ या ‘संवेदनशील मैटर’ आदि का मसला भारतीय समाज के उन संसाधनों जैसा है जिस पर मनमोहन सिंह ने कहा था कि इस पर पहला हक अल्पसंख्यकों का ही है। हिन्दू लोग कट्टर होते हैं। अब किसी ने कृष्ण को थोड़ा सा बलात्कारी कह ही दिया तो क्या हो गया? अनभिज्ञ होगा, पढ़ता-लिखता नहीं होगा, कह दिया थोड़ा सा। अब कह ही दिया तो बात बढ़ाने की क्या जरूरत थी? क्या एक अल्पसंख्यक संविधान प्रदत्त अधकारों का प्रयोग नहीं कर सकता?

क्या वो एक पोस्ट भी नहीं कर सकता? थोड़ा सा कह दिया तो क्या हो गया? मैं भी हिंदू हूँ, दिन भर फेसबुक पर ही बकैती लिखता रहता हूँ, लेकिन मुझे आपने देखा कहीं लिखते हुए कि किसकी कितनी बीवियाँ थीं, कौन किस बीवी के साथ, कब क्या कर रहा था? नहीं, लिखा क्योंकि मैं 2014 के बाद से कटवा-छिलवा के लिबरल हो गया हूँ। मैंने तय कर लिया कि कब लिखना है, क्या लिखना है। ऐसे ही मगशैसे नहीं मिल जाता है, आत्मा बेचनी पड़ती है। हें, हें, हें…

आप ही बताइए कि अब्दुल कहाँ जाएगा? तीन तलीक छीन लिया, उसके कौमी भाइयों के नरसंहार की छूट पर पाबंदी लगा दी 370 हटा कर, राम मंदिर में ये मान लिया कोर्ट ने कि नीचे मंदिर था, फिर CAA ले आए… ये सारी बातें अब्दुल को पसंद नहीं इसलिए अब्दुल भारत के बड़े शहरों को अपनी मशाल से जला देगा।

आप ही बताइए कि सारे फैसले अल्पसंख्यकों के विरोध में ही जा रहे हैं तो वो क्या करेंगे? कहाँ जाएँगे? क्या उनके द्वारा फैसला सड़कों पर नहीं होना चाहिए? बिलकुल होना चाहिए क्योंकि सड़क का टैक्स तो सब भरते हैं, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े ही है?

कुछ लोग कह रहे हैं कि घंटे भर में भीड़ जुटा ली गई! वाह मोदी जी, वाह! मतलब कोई समुदाय व्यवस्थित है, ऑर्गेनाइज्ड है, व्हाट्सऐप पर संगठित है, डिसिप्लिन में रहता है, एक आवाज लगाने पर लोगों के सुख-दुख में निकल आते हैं सड़कों पर इंसाफ की उम्मीद में… इससे भी दिक्कत है लोगों को? ये फासीवाद नहीं है तो और क्या है? ये आपातकाल नहीं है तो और क्या है? ये अत्याचार हो रहा है… बचाओ, बचाओ… बिनोद-बिनोद… बिनोद को बचाओ! नहीं-नहीं, अब्दुल को बचाओ!

सताया हुआ अब्दुल, डरा हुआ अब्दुल, खौफजदा अब्दुल, सलमा का आशिक अब्दुल, अहमद का जानूँ अब्दुल… अब्दुल ही अब्दुल, तकिए ही तकिए, अल तकिया ही अल तकिया, फ्लोर ही फ्लोर, तौलिए ही तौलिए…

आखिर अब्दुल के सामने विकल्प क्या थे इस फासीवादी समाज में? जब सारे तंत्र आपके विचारों के विपरीत हो जाएँ तो मन के विकार बाहर आएँगे ही। अब्दुल ने आत्मनिर्भर भारत के नारे को शब्दशः लिया और घर ही में बम बनाया, तौलिए को तेल से भिगा कर मशाल बना ली, वाइपर के डंडे पर तौलिए को लपेट दिया और बताया कि शांतिप्रिय मजहब के खिलाफ कोई पोस्ट-कमेंट बर्दाश्त नहीं की जाएगी, भले ही वो हिन्दुओं के खिलाफ लिखे पोस्ट के जवाब में हो।

अब्दुल की सोच तो यह है कि हिन्दुओं के भगवान को अब्दुल के भाई या सलमा के जाने जिगर जानेमन सलीम ने बलात्कारी कह दिया तो उस पर प्रतिक्रिया देना हिन्दुओं का काम है, अब्दुल को इससे क्या? अब्दुल को बस इससे मतलब है कि उसके मजहब के किसी बात को ले कर तो किसी ने कुछ नहीं लिखा न। हिन्दू आग नहीं लगाते, बम नहीं बना सकते, तो ये उनकी समस्या है, अब्दुल की नहीं। अब्दुल तो मुद्रा लोन ले कर कुटीर उद्योग लगा कर मिनटों में मशाल और बम बना लेता है।

किसी किताब में पढ़ा था कि अगर आप कोई काम दस हजार घंटे करेंगे तो आप परफैक्ट हो जाएँगे। हिन्दुओं ने ये पूछने में परफैक्शन पाई है कि ‘आज लिबरल चुप क्यों हैं’, जबकि अब्दुल गुल के डिब्बे में बारूद रख कर, सुतली बाँध कर धीरे से रैक पर रख देता है! अब्दुल के घर में भले ही अँधेरा रहे, लेकिन वो कनस्तर का तेल मशाल पर डाल कर मजहब की रक्षा के लिए बाहर निकल जाएगा। हिन्दू का हेडेक अब्दुल काहे लेगा?

और हाँ, ये बैंग्लोर है कहाँ? है भी कि नहीं? क्या आप गए हैं देखने कि भारत में ऐसी जगह है या फिर बस एक समुदाय के लोगों को निशाना बनाने के लिए ऐसी एक जगह गढ़ दी गई, कुछ तस्वीरें दिखा दी गईं और आप एक समुदाय पर साम्प्रदायिक टिप्पणियाँ करने लगे? जैसा कि सोशल मीडिया यूजर डीके उर्फ धैर्यकांत ने लिखा है कि जब तक ऑल्ट न्यूज का फैक्टचेक इस पर नहीं आता, मैं, बैंग्लोर के दंगे क्या, बैंग्लोर इस देश में है भी कि नहीं, ये भी नहीं मानूँगा। बात करते हैं!

अंत में, ऐसे साहित्यिक ह्यूमन चेन मौके पर, दो गजलें सुनाना चाहूँगा। जैसा कि आहत इंदौरी कह कर गए हैं (ये मैं कर के दिखाऊँगा):

मेरे एक-एक शेर करोड़ों रुपयों के हैं, इसलिए किसी दो कौड़ी के दंगाई समुदाय का नाम ले कर जीभ गंदा नहीं करूँगा। अर्ज किया है… मेरा जहर आप तक पहुँचे विश्वास भाई तो हिन्दू होने के बाद भी दाद जरूर दीजिएगा कि…

मशाल लाए हो? इधर रख दो
देख रहे हो थाना? खाक कर दो

दस मंदिर जलाने के बाद,
ह्यूमन चेन दिखा कर सब साफ कर दो

बैंग्लोर हो कि दिल्ली या बंबई
मजहब के नाम पर ‘पाक’ कर दो

अरे! बुज्दिलों की कौम हो क्या?
राह में जो भी आए, हलाक कर दो

और इस गजल का अंतिम शेर देखें के…
हमारे भी बाप का है हिन्दोस्तान
जब जी चाहे, जला कर राख कर दो

एक और गजल देखिए कि,

सलमा बुलाती है, मगर जाने का नय
शहर फूँक देने का, पर उससे पहले इश्क लड़ाने का नय

प्यार, इक्स, प्रेम, मोहब्बत, सेस्क तो होतो रहेगो ससुर
चुपके से मंदिर जलाने का, पर कैमरे के सामने दिखाने का नय

वामपंथी तो अपनी मुट्ठी में है, लिब्रांडुओं की मर गई मैया
तुमको बस आग लगाने का, मीडिया से खौफ खाने का नय

ह्यूमन चेन बनाते रहने का, फोटो खिंचवाते रहने का
वायर, स्क्रॉल, NDTV खुद करेगा अपना काम, गिड़गिड़ाने का नय

विक्टिम कार्ड निकाल के, तलवार-मशाल ले कर उतर जा
कोई पुलिस आए, सरकार आए, इन सब से डर जाने का नय

और यहाँ, एक जहरीला शेर देखें के…
हाथ जल जाए अपना, तो जल जाने दे
लेकिन उनके घरों को राख किए बिना, अपने घर वापस आने का नय

और अम्मी कर रही होगी घर पर इंतज़ार
हलाल गोश्त खाने का, शर्माने का नय

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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