Friday, July 10, 2020
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चाय से लिट्टी-चोखा तक: लिट्टी-फेस्ट तो बस बहाना है, मनुवाद से लेकर पूँजीवाद जो लाना है

बुद्धिजीवियों का कहना है देश में बुद्धि की भारी कमी हैं आजकल। जरूरी है कि लिट्-फेस्ट का आयोजन किया जाए, जहाँ हम भड़ास निकाल सकें, और अपनी पुस्तकें बेच सकें। लेकिन सरकार का ध्यान लिट्-फेस्ट की जगह लिट्टी-फीस्ट पर है। बुद्धिजीवी जाएँ तो कहाँ जाएँ?

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लोभी मीडिया पत्रकारिता के एक मात्र ठेकेदार के शो ‘पाँय-टाँय’ की स्क्रिप्ट हमें मिल गई है। उनको प्रधानमंत्री का लिट्टी-चोखा खाना पसंद नहीं आया। लीजिए आप भी पढ़ लीजिए;

अचानक आपका मन किसी हाट में जाने का करे तो आप क्या करेंगे? हो सकता है आप उठें और हाट बाजार घूमने निकल जाएँ। आपको खाने का मन करे तो खा लें। जरूरी तो नहीं कि आप लिट्टी भी खाएँ तो उसमे दर्शन शास्त्र छुपा हो अथवा चोखे में राजनीति ही छुपी हो। लेकिन, जब प्रधानमंत्री लिट्टी-चोखा खाते हैं, तो उसका कोई न कोई अर्थ निकाला जाना स्वाभाविक है। मन में कई तरह के प्रश्न आते हैं और आने भी चाहिए। प्रधानमंत्री चाहते तो दाल-बाटी या गांकर-भर्ता या दाल-बाफले भी खा सकते थे। लेकिन प्रधानमंत्री अपने लाव-लश्कर के साथ केवल विहार के उद्देश्य से हाट में तो जाते नहीं, उनके मन में बिहार का उद्देश्य हो, ऐसा क्यों नहीं समझा जाना चाहिए?

प्रधानमंत्री लिट्टी-चोखा खा रहे हैं, क्या समाज मे चोखावाद बढ़ता जा रहा है? देश में पहले भी प्रधानमंत्री हुए हैं और मौका मिलने पर कुछ न कुछ खाते रहे हैं। वो खाते तो थे लेकिन लिट्टी-चोखा खाते हुए फोटो नहीं खिंचवाते थे। राजनीति में चोखा अपनी जगह बनाने में लग गया है। चाय से शुरू हुआ प्रधानमंत्री का सफर, पकौड़े पर पहुँचा और अब निशाने पर लिट्टी-चोखा है।

आप लोग ‘पाँय-टाँय’ शो देखते रहिए। हम बताते हैं चोखे में कौन सा धोखा है। सबसे पहले तो प्रधानमंत्री ने जिस दुकान से चोखा खाया उसे कौन चला रहा था? वह किस जात का था? किसी ने बताया नहीं, न ही गोदी मीडिया ने ये सवाल उस दुकान वाले से पूछा। कहीं वो संघ के ही लोग तो नही थे? कहीं भाजपा के किसी कार्यकर्ता ने ही दुकान तो नहीं खोल रखी है?

ऐसे प्रश्न पूछे जाने चाहिए जो नहीं पूछे गए। तस्वीर देखने से पता चलता है कि प्रधानमंत्री ने प्लेट बाएँ हाथ में पकड़ रखी है। प्लेट किसी टेबल पर भी रख सकते थे, लेकिन शायद मकसद कुछ और रहा होगा। हो सकता है सिर्फ लिट्टी के साथ फोटो खिंचवाना चाहते हों। लेकिन क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि फोटो खिंचवाने के लिए लिट्टी-चोखा खाने भर से उन तमाम ग़रीबों को कुछ राहत मिलेगी जो रोज ही लिट्टी-चोखा खाते हैं? वो लोग मजबूरी में खाते हैं और पूँजीवाद के एक छोर पर फाइव स्टार खाट पर बैठे हुए प्रधानमंत्री सेवन स्टार लिट्टी-चोखा खा रहे हैं।

हमारे कृषि और अन्य सभी विषयों के विशेषज्ञ विनोदवा का कहना है कि चोखा खाते हुए प्रधानमंत्री स्वाद तो लेते हैं लेकिन उन्हें यह ध्यान नहीं आता कि वह बैगन, जिसका चोखा बनाया गया है, किसी ग़रीब किसान ने उगाया होगा, उसके हुनर का क्या? क्या हुनर हाट में उसे एक-दो एकड़ जमीन नहीं दी जा सकती थी? क्या हो जाएगा अगर इंडिया गेट पर खाली पड़ी जमीन पर बैगन, टमाटर और आलू उगाने के लिए किसानों को अनुमति मिल जाए?

उनका कहना सही है, यह हुनर हाट जैसे आयोजन पूँजीवाद का दिखावा मात्र हैं। बहकावे में मत आइए। क्या किसी ने उस लिट्टी-चोखा का भाव पूछा? हमने अपनी फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट ‘फॉल्ट न्यूज़’ को पड़ताल पर लगाया। जल्द ही जाने-माने व्यर्थशास्त्री धूरा एक यूट्यूब वीडियो भी लेकर प्रस्तुत होंगे। लेकिन तब तक उनकी पड़ताल से जो निकलकर आया है, उसे मोटा-मोती आपको बता दें;

उड़ती-उड़ती खबर आई है कि लिट्टी में जो सत्तू भरा गया था, ख़ास तौर पर बनवाया गया था। लिट्टी को सोने की सिगड़ी में चाँदी के अंगारों पर सेका गया था। दोने में जिस चटनी में डुबोकर प्रधानमंत्री लिट्टी खा रहे हैं, उसमें जो धनिया डाली गई है, वो बहुत महँगी है, उसकी कीमत लगभग 0.00060 लाख रुपए किलो बताई जाती है और उसे खाने से चेहरे पर चमक आ जाती है। मन हराभरा रहता है। ‘फॉल्ट न्यूज़’ के हवाले से खबर तो ऐसी आ रही है कि उसमें गुजरात की आनंद डेरी की एक खास गाय के दूध का घी डाला गया था। उसकी कीमत भी लाखों मे है।

घी कम से कम 0.00600 से 0.00800 लाख रुपए प्रति किलो होने की बात सामने आ रही है। बताइए किस ग़रीब को ऐसा घी मिलता है? प्रधानमंत्री घी मे डूबी हुई लिट्टी खाकर कौन सा संदेश देना चाहते हैं? सब नेता घी खाएँगे और जनता हुनर हाट मे घुमते हुए दूर से ही सूँघती रहे? लिट्टी जब उस लाखों के घी में ‘डुबुक डुबुक डुबुक डूड़ो’ करते हुए डूब जाती होगी, तब उसे अर्थव्यवस्था का ध्यान कहाँ से आता होगा? उसे तो घी पीने को मिल गया।

आपको उस प्लेट को गौर से देखना चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री ने बड़ी चतुराई से एक प्याज भी रखवाई है। शायद कहना चाहते हों- देखो अब प्याज तीस रुपये किलो मिल रहा है। जैसे दीवार बनाकर ट्रंप से झुग्गी छुपाने की जद्दोजहद चल रही है, वैसे ही लहसुन को चतुराई से छिपा लिया गया। लहसुन जो NRC के डर से दो सौ रुपए किलो बिक रहा था, अब भी दो सौ रुपए किलो ही बिक रहा है, इसलिए प्लेट में रखवाया ही नहीं। यही पूँजीवाद है। यही इस देश की विडंबना है।

एक पक्ष यह भी है कि बिहार में चुनाव आने वाला है और लिट्टी खाकर बिहार के प्रचार की शुरुआत हो चुकी है। इतनी जल्दी प्रचार शुरू करना कहाँ का न्याय है? जनता को अभी से चुनाव में झोंक देने की साजिश है यह। अब बिहार मे इतने लंबे समय तक कौन धरने पर बैठेगा? जब घर से निकले ही थे तो थोड़ा आगे शाहीन बाग मे भी जा सकते थे लेकिन वहाँ नहीं गए। वहाँ बैठे हुए लोग प्यार से बुला रहे हैं, लेकिन लिट्टी-चोखा खा रहे प्रधानमंत्री की तरफ से उत्तर नहीं आ रहा है।

शाहीन बाग़ के लोग तो अब मनुवादी होते हुए कह रहे हैं, “हम देवता हैं, आकर हमारी पूजा करो तो हम मान जाएँगे। लेकिन आकर पूजा तो करो।” और प्रधानमंत्री के समर्थक उन्हे बार बार कह रहे हैं, “बुलाती है, मगर जाने का नहीं।” इस पर प्रधानमंत्री एकदम ‘सख़्त’ हुए जा रहे हैं। वो पिघलने का नाम ही नहीं ले रहे।

अब तो शाहीन बाग़ का संचालन करने वाली कमेटी भी सामने आ गई है। तीस्ता जी से तो प्रधानमंत्री का पुराना रिश्ता है। अब वो शाहीन बाग़ को चला रही हैं तो क्या बुरा है? उन्होंने अच्छे-खासे NGO सालों तक चलाए हैं। क्या हुआ अगर थोड़े पैसे भी बना लिए। मान लिया जाए कि तीस्ता सीतलवाड़ प्रधानमंत्री से बेहिसाब चिढ़ती हैं और उन्हें गिराने के लिए कुछ भी कर सकती हैं। शाहीन बाग़ के करेले में तीस्ता सीतलवाड़ नाम की नीम चढ़ी हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री वहाँ चले जाएँगे तो क्या हो जायेगा? वो लोग थोड़ा झुकाकर बेइज्जत ही तो करना चाहते हैं।

शाहीन बाग़ को कुल मिला कर प्रधानमंत्री ने अपनी लिट्टी-चोखा की प्लेट में रखी हुई हरी मिर्च की तरह ही नज़रअंदाज़ कर दिया। हरी मिर्च बड़ी उम्मीद से प्लेट मे पड़ी रही कि प्रधानमंत्री खाएँगे। लेकिन उन्होने खाई नहीं। हरी मिर्च को मुँह से लगा भर लेते तो तसल्ली हो जाती। हाथ में मिर्च लेकर फोटो ही खिंचवा देते।

यही इस मिर्च के जीवन की विडंबना है। आप लोग ऐसी जगहों पर जाने से बचिए, कहीं ऐसा न हो कि आप प्रधानमंत्री की किसी योजना का शिकार हो जाएँ और सड़क के किनारे बीस रुपए में मिलने वाली लिट्टी को साठ रुपए में खा आएँ और फिर आप गाली देते रहें। हाँ, बिरयानी मुफ्त है। इसलिए अभी बिरयानी खा आइए। सैर-सपाटा भी हो जाएगा।

बुद्धिजीवियों का कहना है देश में बुद्धि की भारी कमी हैं आजकल। जरूरी है कि लिट्-फेस्ट का आयोजन किया जाए, जहाँ हम भड़ास निकाल सकें, और अपनी पुस्तकें बेच सकें। लेकिन सरकार का ध्यान लिट्-फेस्ट की जगह लिट्टी-फीस्ट पर है। बुद्धिजीवी जाएँ तो कहाँ जाएँ? आप लोग सोचिए, लेकिन लिट्टी पर ज्यादा ध्यान मत दीजिए वरना वोट बीजेपी को चला जाएगा।

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