Monday, April 19, 2021
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व्यंग्य: अल्पसंख्यकों को खुश नहीं देखना चाहती सरकार: बकैत कुमार दुखी हैं टिकटॉकियों के जाने से

आपने गौर किया है कि किस तरह के लोग टिकटॉक पर हुआ करते थे? आपने देखा होगा कि कैसे एक चुटकी बजा कर किसी आमिर के प्यार में संगीता हिजाब पहन लिया करती थी। पंद्रह मिनट में प्यार हो जाया करता था, और जब दिल मिल जाते थे, तो चुटकी बजाते ही संगीता सलमा बन जाती थी। क्या यही इन संघियों को पसंद नहीं आया? प्यार करने वाले धर्म बदल रहे हैं तो एप्प ही बंद करा दिया!

टिकटॉक को आखिरकार सरकार ने बैन करवा दिया। एक फासीवादी सरकार ये कर सकती है, क्योंकि वो वाकई ऐसा कर सकती है। आप ही ने तो चुन कर भेजा था न? मैंने तो कहा था कि सब ढोंग है, मेरी नहीं माने। मेरे चैनल को टॉप टेन से भी बाहर कर दिया। खैर, मुझे आपसे बैर नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ कि आपमें मजहबी टार भरा गया है। मैं जानता हूँ कि सरकार ने आपके भीतर धीरे-धीरे जहर घोला है।

ये तो होना ही था क्योंकि एक आम शांतिप्रिय समुदाय को दो खास लोग फूटी आँखों नही सुहाते। वरना क्या मजाल था कि हमारे कॉन्ग्रेस की जमाने में किसी भी शांतिप्रिय समुदाय के बलात्कारी का नाम पूरी खबर में आ जाता! क्या हिम्मत थी किसी की कि वो अपने रिपोर्ट की हेडलाइन में असलम या आरिफ लिख देता… डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार में तो… खैर रहने दीजिए, मैं लाइव टीवी पर रोना तो चाहता हूँ पर रो नहीं सकता क्योंकि कुमार सानू जी ने भी कहा है कि सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं!

प्यार करने में क्या सोचना! खैर, विषयांतर हो रहा है। मुझे नाजियों का दौर याद आता है। मैंने यूट्यूब पर एक डॉक्यूमेंट्री देखी थी जिसमें उन्होंने कन्सन्ट्रेशन कैम्प दिखाए थे। वहाँ एक लाउडस्पीकर होता था, उसी से सायरन बजता था, सब कुछ नियंत्रण में। आज कल वही हो रहा है।

खबर आपने सुनी ही होगी, उसके बाद के रिएक्शन्स भी आपने देखे ही होंगे। जो मुझे देखते हैं, वो तो निहायत ही दुखी और क्षुब्ध होंगे कि कैसे अलग-अलग तरीकों से एक समुदाय विशेष को मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

कई लोगों ने कई तरह के सवाल किए हैं। हमने एक टिकटॉकर से बात की तो उन्होंने बताया कि कैसे देश का पूरा टैलेंट विदेश चला जाएगा। वो यूथ की बात कर रही हैं, उदास हैं लेकिन यंग हैं तो ‘डू नॉट केयर’ वाला एटीट्यूड है। हें हें हें… थोड़ा बहुत अंग्रेजी आती है भाई! खैर, आप वीडियो देखिए।

इस टिकटॉकर की चिंता जायज है। देश में 12 करोड़ लोग हर महीने सक्रिय रूप से टिकटॉक चला रहे थे। यह संख्या भाजपा को वोट देने वालों की संख्या की लगभग आधी है। आने वाले दिनों में यह शायद उसे क्रॉस भी कर जाती। क्या सरकार को इसी का डर था कि टिकटॉक पर का युवा चुनावों में खड़ा हो जाएगा और प्यार का संदेश बाँटेगा जिससे तानाशाही और फासीवादी सरकारों का सच सामने आ जाएगा!

इसी पर हमारी टीम ने रिसर्च किया तो पाया कि इंग्लैंड के नामी अखबार ‘द गार्डियन’ में एक लेख छपा है जिसमें बताया गया है कि लाखों युवा पैदल ही विदेशों की ओर निकल गए हैं। इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि अंग्रेजी अखबार पढ़ा कीजिए। ‘द स्किन डॉक्टर’ नामक ट्विटर हैंडल ने यह कटिंग शेयर की है जिसमें साफ लिखा हुआ है कि क्या हो रहा है।

मैं आपकी सुविधा के लिए हिन्दी में अनुवाद कर रहा हूँ: “भारत सरकार द्वारा टिकटॉक को प्रतिबंधित करने का निर्णय दक्षिण एशियाई देश के लिए भारी पड़ गया क्योंकि लाखों नवयुवक और नवयुवतियाँ रातों-रात यूरोप के लिए पलायन कर चुके हैं। यूरोपीय देशों में इस बात को ले कर गहमागहमी बढ़ गई है कि इन टैलेंटेड टिकटॉकियों पर सबसे पहले किसका अधिकार है।

बरतानी एयरफोर्स ने जर्मनी पर आक्रमण तब कर दिया जब एंगेला मर्कल ने कहा कि सारे टैलेंटेड भारतीय टिकटॉकर्स सिर्फ जर्मनी में ही रहेंगे। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ऐसे समय में रोते पाए गए। उनका कहना है कि वो टैलेंटेड यूथ को भारत वापस लाना चाहते हैं, पर अब देर हो चुकी है।”

यह पहली बार नहीं है कि सरकारी की नीतियों के कारण राष्ट्र का नुकसान हुआ हो। लेकिन यह सरकार इस अघोषित आपातकाल और कोरोना के लॉकडाउन का फायदा उठाते हुए, लगातार एक के बाद एक ऐसे फैसले कर रही है जो अल्पसंख्यकों पर हमले की तरह देखा जा रहा है।

आपने गौर किया है कि किस तरह के लोग टिकटॉक पर हुआ करते थे? आपने देखा होगा कि कैसे एक चुटकी बजा कर किसी आमिर के प्यार में संगीता हिजाब पहन लिया करती थी। पंद्रह मिनट में प्यार हो जाया करता था, और जब दिल मिल जाते थे, तो चुटकी बजाते ही संगीता सलमा बन जाती थी। क्या यही इन संघियों को पसंद नहीं आया? प्यार करने वाले धर्म बदल रहे हैं तो एप्प ही बंद करा दिया!

वो लाल-पीले, जले बालों वाले लड़कों को याद कीजिए कि कैसे लड़कियों के रेप करने का, उनके द्वारा स्वयं को ब्लोजॉब देने के वीडियो बनाया करते थे। बताइए, कोई जॉब तो दे रहा है, भले ही किसी भी तरह का हो। मैंने तो नौकरी सीरीज पर इतना काम किया है लेकिन सरकार मेरी नहीं सुनती, पर कोई किसी भी तरह का जॉब दे रहा है तो उस पर बवाल क्यों?

ये सब तो सही नहीं है। किस तरह के समाज में जी रहे हैं हम? हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? क्या अब कुछ छोटे बच्चे ‘जब चली हैदर की तलवार’ और ‘मैदाँ भरा था काफिर की लाशों’ से पर नाच कर अपने मजहब पर गौरव नहीं कर सकते?

आप सोचिए कि उनमें से कई लोग पहले कोई काम करते होंगे। फर्ज कीजिए कि कोई जुबैर होगा जो काला चश्मा लगा कर अजय देवगन बनना चाहता होगा। वो दो सायकिलों के कैरियर पर लात रख कर एंट्री लेता होगा… पंद्रह सेकेंड की खुशी तो आपको मिलती होगी! अब वो क्या करेगा? किसी ने कहा कि पंचर की दुकान लगा लेगा।

अब ये बात भी सही नहीं है कि हर किसी को पंचर की ही दुकान दे दी जाए। उसके लिए सायकिलें भी तो होनी चाहिए! साथ ही, यह भी एक भेदभावपूर्ण बात है कि जुबैर के बारे में हमेशा पंचर का ही विकल्प दिया जाता है चाहे वो कम्प्यूटर चलाने में इतना दक्ष हो कि नवजात शिशुओं की जानकारी, किशोर लड़कों की जानकारी इस्लामी कट्टरपंथियों को दे देता हो। अब आप ही बताइए कि जुबैर आईपी अड्रेस निकालेगा या पंचर साटेगा? क्या ये सही है किसी भी तरह से?

मैं यह मानता हूँ कि हो न हो, सरकारों ने देखा होगा कि किन इन्फ्लूएन्सर्स की हैशटैग स्कर्ट वाली पोस्ट पर ज्यादा लाइक्स आते हैं… किनके फॉलोवर मिलियन्स में हैं… और तब एक खास वर्ग को, जो वंचित है, शोषित है, टैलेंटेड है, उसकी लोकप्रियता जब असह्य हो गई तो अपनी फासीवादी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उसे ब्लॉक कर दिया।

मैंने एक ऐसे ही युवा के छोटे भाई से बात की जो कश्मीर में आजादी के आंदोलन में आज सुबह शामिल हुआ था और दोपहर को भारतीय सेना ने उसे मार गिराया। आजकल सेना भी बहुत फास्ट हो गई है। खैर… उसके भाई ने जो बताया वो विचारणीय है, “मेरा भाई टिकटॉक का स्टार बनना चाहता था। उसे लगता था कि वो इसी तरीके से अनुराग कश्यप जी द्वारा नोटिस कर लिया जाएगा।”

आगे की बात कहते हुए वह रो पड़ा, तो मैंने उसे अपनी निजी जेब से निजी रुमाल निकाल कर ढाढस बँधाया, “भैया चाहते थे कि पॉकिट में लम्बी गन ले कर गीत गाएँ कि ‘अरे आओ न, ये जाँ गई, जहाँ गया, सो जाओ’, ताकि अनुराग या विशाल कोई ध्यान दे दें। कल शाम खबर आई कि टिकटॉक बैन हो रहा है। रात में ही वो एरिया कमांडर से मिले और कहे कि अब सच में ही बेरोजगार हो गए। उनको सलीम भाई ने रात में ट्रिगर दबाने की ट्रेनिंग दी और सुबह के लिए तैयार किया। लेकिन…”

आगे की बात कहने की जरूरत है नहीं। आप सोचिए कि एक अल्पसंख्यक न सिर्फ राह भटका, बल्कि रात भर में आजादी की मुहिम में शामिल हुआ और सुबह में मार दिया गया। क्या हम उसे बचा सकते थे? क्या टिकटॉक होता तो उसके हाथ में बंदूक की जगह किसी नगमा के लिए ब्यूटी मोड में ‘कॉल करें क्या, अरे कॉले न की हो’ वाला गाना हो सकता था…

शायद हाँ… या शायद कोई और गाना होता… मैं उसके पीले बालों को मिस करता हूँ। कभी देखा नहीं था, कभी मिला नहीं, लेकिन वो मुझे कोई अपना सा लगता है। मैं तो उससे ‘कौन जात हो’ भी पूछ नहीं पाया… खैर उनमें तो जात होता भी नहीं, बस अशरफ, ऐलाफ, अरजल होते हैं जिसका किसी को पता नहीं। मुझे लगता है एक समाज के तौर पर हम हार गए हैं।

हँसी तो तब आती है जब पता चलता है कि टिकटॉक के तीस करोड़ ले लिए सरकार ने उसी PM CARES में जिस पर सोनिया जी के कहने के बाद भी उन्हें भाव नहीं दिया गया। आप सोचिए कि आज के दौर में तो कोई दो रुपया भी दे दे, तो धन्यवाद कहना चाहिए, वैसे में तीस करोड़ देने वाले को बैन कर दिया। क्या पता वो परसों साठ करोड़ दे देता!

जिस चीन से इतनी नफरत भारत के युवाओं में भरी जा रही है, क्या हम उस चीन से कभी जीत पाएँगे? मैंने कई सुरक्षा मामलों के जानकारों से बात की, उन्होंने मुझे निजी तौर पर कहा कि नहीं। मुझे तो उन्होंने यहाँ तक कहा कि मैं झोला-बिस्तर ले कर रोहिंग्या की बस्ती में चला जाऊँ जहाँ बम गिरने की आशंका बहुत कम है। लेकिन चीनियों का उईगर समुदाय को ले कर जो व्यवहार है, उस कारण मैं आश्वस्त नही हो पाया।

नेहरू जी ने 62 के युद्ध में भी भारतीय एयरफोर्स को, पूरी तरह से तैयार खड़ी होने के बाद भी चीन पर हमले की इजाजत नहीं दी थी। हाल में एक वीडियो में तब के एयरफोर्स अफसर ने ऐसा खुद ही कहा। आप ही सोचिए कि नेहरू जी ने कुछ कहा होगा तो ठीक ही कहा होगा न! वो तो पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, विदेशी लोगों के साथ उठना, बैठना, लाइटर जलाना आदि हुआ करता था उनका। उनकी सोच तो खास रही होगी। जैसे कि 2008 में ऑक्सफोर्ड के डॉक्टर मनमोहन सिंह की कि उन्होंने भी मुंबई हमलों के बावजूद पाकिस्तान पर हमले की इजाजत नहीं दी।

मैं इसीलिए मानता हूँ कि चीन को पूरी तरह से भारत को छूट दे देनी चाहिए। गुलजार साब ने भी कहा है कि ‘आँखों को वीजा नहीं लगता’। वो तो हर साल रोजा भी रखते हैं। क्यों न हम चीन बन जाएँ… क्या दिक़्क़त है? बॉर्डर हैं ही क्यों? क्या होता है बर्फीली सीमा पर सैनिकों को खड़ा रखने से? लड़ाई-झगड़े में क्या रखा है?

जब चीन ने ताइवान, हॉन्ग-कॉन्ग, मंचूरिया, पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, दक्षिणी मंगोलिया को चीन बना लिया है तो भारत को इसमें क्या समस्या हो सकती है? इतने लोगों को कोई समस्या है? जिनको समस्या है वो चले जाएँ पाकिस्तान… सोचिए कि कोई झगड़ा ही नहीं होगा, नई भाषा सीखेंगे, टिकटॉक भी चलेगा, धर्म-मजहब सब हटा दिया जाएगा…

लेकिन नहीं फासीवादियों को वामपंथी पसंद नहीं आते। चीन भले ही कितनी भी कमाल की बातें करें, जैसे कि कल ही पता चला कि वो जनसंख्या नियंत्रण के लिए महिलाओं के गर्भाशय में यंत्र लगा रहे हैं, हजारों के गर्भपात करवा रहे हैं, पीरियड्स को दवाई से बंद करना चाह रहे हैं, लेकिन भारत के राष्ट्रवादियों को समस्या हो जाएगी।

आज टिकटॉक बैन किया है, कल को वो आपका फोन छीन लेंगे। यही तो बाकी है अब। आप सोचिए कि आप सड़क पर जा रहे हों, चार पुलिस वाला आएगा और हाथ से फोन छीन लेगा। आप कुछ नहीं कर पाएँगे। वो आपके पीछे-पीछे घर तक जाएगा, चार्जर भी खोल लेगा प्लग से। फिर ईयरफोन माँगेगा जो आपने ठेले वाले से पैंतीस रुपए में खरीदे थे, जिसे गरीब लोग ‘लीड’ भी कहते हैं।

क्या आप वैसे समाज में जीना पसंद करेंगे? कोरोना नहीं हो रहा होता तो मैं शाहीन बाग की बहादुर दादियों से इस पर चर्चा कर लेता। मैं दस बारह और बाग-बगीचे खुलवा देता… मैं अपने घर के दरवाजे खोल देता कि आओ, और बनाओ मेरे साथ टिकटॉक… गाओ मेरे साथ ‘चालू कर जनरेटर, तोहर देखल जा थिएटर…’

आज दुखी हूँ, वो भी बहुत ज्यादा! नमस्कार!

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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