TikTok बैन से ध्रुव राठी, कुणाल कामरा, केजरीवाल आदि के मानवाधिकार हनन की योजना बना रही है मोदी सरकार- सूत्र

हालाँकि, विशेषज्ञों, जानकारों, एक्सपर्ट्स, सर्वेक्षणों, जनमत संग्रह और सॉल्ट न्यूज़ फैक्ट चेकर्स का दावा है कि इनका काम अभी भी सस्ता मनोरंजन करना ही है, लेकिन इन्हें अभी इनकी योग्यतानुसार ठीक प्लेटफॉर्म नहीं मिल पा रहा है।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता के बाद अखंड भारत में सीधा आजादी के बाद 2 ऐसी सभ्यताओं का उदय हुआ था, जिनके कारण आम जनमानस का जीवन सुलभ हो सका था, पहली थी नेहरुवियन सभ्यता, जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं और यदाकदा पुरस्कार वापसी के दौरान खुदाई में वो नजर भी आते हैं और दूसरी है टिकटॉक सभ्यता। आम चुनावों के बीच टिकटॉक जैसे क्रिएटिव प्लेटफॉर्म पर प्रतिबन्ध लगाने जैसी ख़बरें निराशाजनक और निहायत ही दुखदायी हैं।

मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि टिकटॉक एप्लीकेशन की डाउनलोडिंग और मीडिया द्वारा प्रसारण पर भी प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। पिछले 4-5 सालों में तमाम तरह की कॉन्सपिरेसी थ्योरी का प्रतिपादन कर चुके तर्कशास्त्री भी ये बात नहीं जान पाए कि टिकटॉक को प्रतिबंधित करना फासिस्ट मोदी सरकार की एक दीर्घकालीन योजना है, जिसके जरिए वो विपक्ष को लगभग शोले फिल्म के ठाकुर जैसा बना देने पर उतर आई है। पत्थरबाजों की कुटाई और आतंकवादियों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर के लोकतंत्र की जमकर हत्या करने के कारण चर्चा में आई मोदी सरकार अब नई साजिश लेकर आई है, जिसे समझना जरुरी है।

वास्तव में, इस टिकटॉक नाम की एप्प ने जितना रोजगार सृजन का अवसर लोगों को दिया है, वो आँकड़े चकित करने वाले हैं। हालाँकि, ये आँकड़े विभिन्न भाषाओं में फेसबुक पोस्ट का अनुवाद करने वाले पत्रकारों के स्रोतों ने नहीं जारी किए हैं, इसलिए इनकी विश्वसनीयता पर शक करना गलत होगा। जिस उम्र में हम गाँव में मिट्टी घरों में खोदकर मिट्टी खाया करते थे उस उम्र में आज का युवा पेसिफिक मॉल की पार्किंग में अपने लायक स्पेस तलाश कर ‘तूतक तूतक तूतिया’ गाने पर कदमताल कर के दुनिया के सामने अपनी प्रतिभा साबित कर रहा है तो इसमें नरेंद्र मोदी सरकार का हाईकोर्ट के जरिए हस्तक्षेप करवाना क्या उन युवाओं की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर हमला नहीं है?

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जो युवा सप्ताह और महीने भर तक एक कमरे से दूसरे में उठकर नहीं जाते थे वो भी अब सुबह नहा-धोकर टिकटॉक पर अपने वीडियो पोस्ट करने के लिए मेकअप कर के, तरह-तरह के बालों डिजाइन से पिरामिड और मीनारें बनाकर लोगों को दिखाने लगे हैं, तो इस राष्ट्रवादी सरकार को इस तरक्की से समस्या होनी शुरू हो गई है। स्पष्ट है कि यह युवा विरोधी सरकार है।

टिकटॉक ने सिर्फ इन मनचले युवाओं को ही नहीं बल्कि कुछ ऐसे कॉमेडियंस को भी रोजगार और प्लेटफॉर्म दिया है, जिन्हें कभी अर्चना पूरण सिंह बात-बात पर टीवी पर ‘स्टैंडिंग ओवेशन्स’ दिया करती थी। जिस दिन स्टैंडिंग ओवेशन देने के तरीकों की शॉर्टेज पड़ी थी, उसी दिन से कॉमेडी के नाम पर चल रहे इन कॉमेडी प्रोग्राम्स को बंद करना पड़ा था।

लेकिन राजनीति के नजरिए से भी यह एप्प बहुत सहायक साबित होने वाली है। मई में आम चुनाव निपट जाने के बाद ये महागठबंधन के सामूहिक रोजगार के काम आ सकती है।

संकट की घड़ी में किन लोगों का सच्चा साथी साबित हो सकता है टिकटॉक

केजरीवाल एंड पार्टी के जमानत जब्त वालंटियर्स

वो सभी नेता, जिनकी इस बार भी जमानत जब्त होने के प्रबल आसार बन रहे हैं (यदि गठबंधन हो पाया तो) उनके लिए तो ख़ासतौर से अपनी प्रतिभा के विस्तार के लिए टिकटॉक ही एकमात्र क्रिएटिव जरिया बाकी रह जाएगा। देखा जाए तो टिकटॉक एप्प के आविष्कार की प्रेरणा चीन ने आम आदमी पार्टी और इसके अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल से ही ली होगी। गुप्त सूत्रों का तो यहाँ तक मानना है कि नई वाली राजनीति के नाम पर जो चकल्लस आम आदमी पार्टी ने जनता के बीच प्रस्तुत की है, असल में टिकटॉक का मूल वर्जन और प्रस्तावना उसी से प्रेरित है। लेकिन इस सरकार ने कभी क्रेडिट और दर्जा देना नहीं सीखा है।

चिरयुवा नेता राहुल गाँधी एवं समस्त ईष्ट मित्रगण

विपक्ष के कद्दावर नेता और रॉबर्ट वाड्रा के साले राहुल गाँधी की चुनावी तैयारियों को देखकर तो अब तक यही लग रहा है कि वो अगले स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर के बजाए वो टिकटॉक की प्राचीर से राष्ट्र के नाम सम्बोधन देते हुए हुँकार भरते हुए देखे जाएँगे। क्योंकि जो तीव्र छटपटाहट सत्ता में बने रहने की नेहरुवियन सभ्यता में पली-बढ़ी गाँधी परिवार के भीतर है, मुझे नहीं लगता है कि एक और हार के बाद वो खुद को संभाल पाने की स्थिति में रहेंगे भी। ऐसे में टिकटोक पर तो कम से कम राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनने का अभिनय करने की अपनी तीव्र इच्छा पूरी कर सकेंगे। इसलिए मद्रास हाईकोर्ट को इस एप्प पर बैन लगाने का तुगलकी फरमान वापस लेना चाहिए।

महागठबंधन

अपनी सरकार बनाने से ज्यादा नरेंद्र मोदी को हराने के लिए लड़ रहे विपक्ष का सबसे बड़ा आविष्कार महागठबंधन नामक प्लेटफॉर्म है। लेकिन अगर नरेंद्र 2019 में फिर एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं, तो इस महागठबंधन के पदाधिकारी अपनी संतुष्टि के लिए एक-दूसरे को टिकटॉक पर आपस में विभाग बाँटकर आपस में किए गए अपने वायदों को पूरा कर सकते हैं। इस तरह से यह भी उनकी मनोवैज्ञानिक जीत ही मानी जाएगी, इसलिए सरकार को महागठबंधन के अरमानों का गला निर्ममता से नहीं घोंटना चाहिए।

सस्ते कॉमेडियंस और अनुवादक

कॉन्ग्रेस द्वारा हायर किए गए कुछ कॉमेडियन्स, जो कि मोदी सरकार के दौरान हुए काल्पनिक घोटालों को साबित करने के लिए दूसरी आकाशगंगाओं से आँकड़े जुटाकर लोगों का मनोरंजन करने के लिए कुख्यात हैं, उनके लिए भी टिकटॉक एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। क्योंकि जिस तरह के मनगढंत तथ्य और घटनाक्रम जुटाकर वो मोदी सरकार को घेरने का प्रयास करते हैं, उन पर हँसने और उन्हें सत्य मानने वाले तर्कशास्त्रियों की टिकटॉक जैसी कालजयी सभ्यता में कोई कमी नहीं है। इसलिए इन सस्ते कॉमेडियंस को डेडिकेटेड ‘फैनक्लब’ जो टिकटॉक पर मिल सकता है वो अन्यत्र कहीं संभव नहीं है।

पेड ट्रॉल ध्रुव राठी और कॉमेडी के नाम पर स्वयं कॉमेडी कुणाल कामरा

मोदी सरकार के दौरान अस्तित्व में आए कुछ नामों में ये 2 नाम लोगों के प्रिय बहुत प्रिय रहे हैं। कुणाल कामरा सड़कों पर लोगों द्वारा कूटे जाने के कारण, (जो कि निंदनीय व्यवहार था) और इंटरनेट पर दैनिक सस्ते इंटरनेट डाटा की मेहरबानी से वायरल हुए महागठबंधन के प्रॉपेगैंडा मंत्री ध्रुव राठी विशेष चर्चा में रहे हैं। इनकी ख़ास बात ये है कि इन लोगों को रोजगार सिर्फ इस बात को दिन में 5 बार पढ़ने और लोगों को रटाने के कारण मिला है कि मोदी सरकार में रोजगार नहीं मिला।

अगर टिकटॉक प्रतिबंधित कर दिया जाता है और विपक्ष मोदी सरकार को हराने में नाकामयाब रहता है, तो ऐसे हालातों में इनके अच्छे दिन सिर्फ टिकटॉक पर अपने सस्ते वीडियोज़ बेचकर और बैकग्राउंड में बादशाह और नेहा कक्कड़ के रैप संगीत बजाकर ही आ सकेंगे। हालाँकि, जनमत संग्रह और सॉल्ट न्यूज़ फैक्ट चेकर्स का दावा है कि इनका काम अभी भी मनोरंजन करना ही है, लेकिन इन्हें अभी इनकी योग्यतानुसार ठीक प्लेटफॉर्म नहीं मिल पा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि टिकटॉक पर इनके द्वारा जारी किए जाने वाले खुलासों के ज्यादा कद्रदान नेहरुवियन सभ्यता के दौरान अस्तित्व में आए समाचार चैनलों में नहीं, बल्कि टिकटॉक पर मौजूद हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो टिकटॉक सभ्यता को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रयास करे, ना कि इसके दमन पर।


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