Monday, April 22, 2024
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1300 साल पुराना माँ लक्ष्मी का मंदिर, जहाँ साल में दो बार सूर्य की किरणें गर्भगृह में माता का करती हैं अभिषेक

तिरुपति की यात्रा तब तक अपूर्ण मानी जाती है, जब तक कि कोल्हापुर में विराजित देवी महालक्ष्मी के दर्शन न किए जाएँ... क्योंकि तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर हर साल माता लक्ष्मी को मनाने के लिए एक विशेष शॉल भेजते हैं, जिसे...

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है महालक्ष्मी मंदिर जो कि हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र स्थानों में से एक है। धन और वैभव की देवी माता लक्ष्मी का यह मंदिर न केवल अपने आध्यात्मिक महत्व बल्कि एक दिव्य प्राकृतिक घटना के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसका साक्षात्कार करने के लिए हजारों भक्त भारत के कोने-कोने से आते हैं। तो आइए आपको ले चलते हैं एक ऐसे मंदिर की यात्रा में, जहाँ स्थित माता लक्ष्मी को मनाने के लिए हर साल भगवान वेंकटेश्वर, तिरुपति से एक शॉल भेजते हैं जो दीपावली को माता लक्ष्मी को समर्पित की जाती है।

महालक्ष्मी अंबाबाई और कोल्हापुर मंदिर का इतिहास

कई तथ्यों के अनुसार वर्तमान महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण आज से लगभग 1300 वर्ष पहले अर्थात 7वीं शताब्दी में चालुक्य शासक राजा कर्णदेव ने कराया था। इसके बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण 9वीं शताब्दी में शिलहार यादव नामक राजा ने कराया।

महालक्ष्मी मंदिर में उत्कीर्णित प्रतिमाएँ (फोटो साभार : महाराष्ट्र पर्यटन)

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माता लक्ष्मी की प्रतिमा लगभग 7,000 वर्ष पुरानी बताई जाती है। इसका वजन लगभग 40 किग्रा है और माता लक्ष्मी की इस प्रतिमा की ऊँचाई 4 फुट है। इस मंदिर में महालक्ष्मी चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं। स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित इस प्रतिमा के सिर पर एक स्वर्ण मुकुट विराजमान है। देवी के इस मुकुट में भगवान विष्णु के प्रिय शेषनाग का चित्र बना हुआ है।

गर्भगृह में स्थापित देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा (फोटो साभार : महाराष्ट्र पर्यटन)

महाराष्ट्र में देवी महालक्ष्मी को अंबाबाई के नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण यह मंदिर महालक्ष्मी अंबाबाई मंदिर भी कहलाता है।

तिरुपति से भगवान वेंकटेश्वर भेजते हैं अनमोल शॉल का उपहार

ऐसी मान्यता है कि देवी महालक्ष्मी तिरुपति में वेंकटाद्रि पर्वत पर विराजित अपने पति भगवान वेंकटेश्वर अर्थात भगवान विष्णु से किसी कारणवश रूठकर कोल्हापुर आ गईं। इसके बाद से हर साल भगवान वेंकटेश्वर माता लक्ष्मी को मनाने के लिए तिरुपति से एक विशेष शॉल उपहार स्वरूप भेजते हैं, जिसे माता लक्ष्मी दीपावली के दिन धारण करती हैं।

इसलिए ही कहा जाता है कि तिरुपति की यात्रा तब तक अपूर्ण मानी जाती है, जब तक कि कोल्हापुर में विराजित देवी महालक्ष्मी के दर्शन न किए जाएँ।

सूर्यदेव अपनी किरणों से करते हैं अभिषेक

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है वह समय, जब सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचती हैं। साल में दो बार ही ऐसा समय आता है, जब सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा को स्पर्श करती हैं। पहले दिन सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें महालक्ष्मी के चरणों पर पहुँचती हैं। दूसरे दिन मध्य भाग में और तीसरे दिन माता लक्ष्मी के मस्तक को सूर्य की पहली किरण स्पर्श करती है। उस दिन पूरा गर्भगृह असंख्य रोशनियों से प्रकाशित हो जाता है। यह साल में दो बार ही होता है। हालाँकि यह मंदिर की वास्तुकला है या कोई चमत्कार, यह शायद कोई नहीं जनता।

कैसे पहुँचे?

महाराष्ट्र में कोल्हापुर का सबसे नजदीकी हवाईअड्डा पुणे है, जो मंदिर से लगभग 240 किमी दूर है। हालाँकि कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर गोवा के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से 223 किमी ही दूर है। इसके अलावा कोल्हापुर शहर महाराष्ट्र समेत देश के कई बड़े शहरों से रेलमार्ग के माध्यम से जुड़ा हुआ है। महालक्ष्मी अंबाबाई मंदिर से कोल्हापुर रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 6 किमी है।

कोल्हापुर सड़क मार्ग से भी कई बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। एक दिव्य और सुंदर पर्यटन स्थल होने के कारण विभिन्न शहरों से कोल्हापुर पहुँचने के साधन भी अत्यंत सुलभ हैं। कोल्हापुर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH)-4 पर स्थित है। सड़क मार्ग से मंदिर की पुणे से दूरी लगभग 230 किमी और मुंबई से 374 किमी है। हालाँकि पणजी से मंदिर की दूरी 200 किमी ही है।   

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ओम द्विवेदी
ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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