Tuesday, May 18, 2021
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‘गायों का चरवाहा’ बना बम क्रांति का जनक, जिसके धमाकों से हिल गए थे अंग्रेज

उल्लासकार का पहला रुझान क्रांति या बम बनाने के विज्ञान और तकनीक की ओर नहीं था। उन्होंने कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज में फाइन आर्ट्स में दाखिला लिया था। लेकिन जैसा कि इतिहास में होता आया है कि दुराचारी शासक का अत्याचार ही उसके दुश्मन खड़े करता है, कलाकार उल्लासकार को बम विशेषज्ञ अंग्रेजी राज की क्रूरता और नस्लभेद ने बनाया।

अप्रैल का महीना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ख़ासा महत्व रखता है। इस महीने के अंत में (30 अप्रैल को) मुजफ्फरपुर के किंग्सफोर्ड बम कांड को अंजाम दिया गया था। इसके चलते भारत की ब्रिटिश गुलामी के इतिहास का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुकदमा अलीपुर बम केस हुआ और बंगाल के क्रांतिकारियों की निर्भीक आत्मोत्सर्ग की क्रांतिकारी विचारधारा पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गई। अंग्रेजों ने इसके जवाब में जो दमनचक्र चलाया, उससे देश में अंग्रेजी राज का चेहरा अधिकाधिक लोगों की नजरों में बेनकाब होने लगा।

यही महीना भारत के महानतम क्रांतिकारी नेता ऑरोबिंदो घोष (महर्षि अरबिंदो) के अनुज बारीन्द्र ‘बारिन’ घोष की पुण्यतिथि (18 अप्रैल) का भी है। भारतीय क्रांतिकारियों में ‘बम क्रांति के जनक’ कहे जाने वाले उनके साथी उल्लासकार दत्ता के जन्मदिन का भी महीना यही है।

दुर्भाग्यपूर्वक हम महर्षि अरबिंदो का नाम अपने स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में महज़ एक पंक्ति में पढ़ते हैं। बारिन घोष, उल्लासकार दत्ता, इंदुभूषण रॉय, हेमेन्द्र घोष, बाघा जतीन आदि के बारे में हमारी जानकारी निल-बटा-सन्नाटा ही होती है।

फाइन आर्ट्स से बम की केमिस्ट्री

इतिहास के धूल-भरे पन्नों को खॅंगालने की अगर हम ज़हमत उठाएँ, तो हम पाएँगे कि भारतीय सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन में उल्लासकार दत्ता की भूमिका की तुलना भारतीय पौराणिक देवता विश्वकर्मा से की जा सकती है। जैसे, भगवान विश्वकर्मा देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करने वाले माने जाते हैं, वैसे ही उल्लासकार दत्ता क्रांतिकारियों के बम विशेषज्ञ थे। मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड के काफिले पर हमले में जिस बम का इस्तेमाल खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किया था, उसे बनाने वाले उल्लासकार दत्ता ही थे।

लंदन यूनिवर्सिटी से कृषि विशेषज्ञता हासिल करने वाले ब्रह्मसमाजी पिता द्विजदास दत्ता की सन्तान उल्लासकार का जन्म 16 अप्रैल, 1885 को वर्तमान बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया जिले में एक वैद्य परिवार में हुआ था। उनका परिवार वहाँ कालिकच्चा नामक स्थान से आकर बसा था।

उल्लासकार का पहला रुझान क्रांति या बम बनाने के विज्ञान और तकनीक की ओर नहीं था, बल्कि उन्होंने कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज में फाइन आर्ट्स में दाखिला लिया था। लेकिन जैसा कि इतिहास में होता आया है कि दुराचारी शासक का अत्याचार ही उसके दुश्मन खड़े करता है, कलाकार उल्लासकार को बम विशेषज्ञ अंग्रेजी राज की क्रूरता और नस्लभेद ने ही बनाया।

उनके क्रांतिकारी साथी हेमंत सरकार ने अपनी किताब Revolutionaries of Bengal में उल्लासकार के हवाले से लिखा है कि अंग्रेजी शासन के अत्याचार से उनका पहला सामना तब हुआ जब राष्ट्रवादी नेता बिपिन चन्द्र पाल का भाषण सुनने जाने के ‘गुनाह’ के लिए पुलिस के सिपाहियों ने उनके साथ मारपीट और बदसलूकी की। उसके बाद जब सिपाहियों ने उन्हें इंस्पेक्टर के सामने पेश किया तो उलटे तोहमत लाद दी कि उल्लासकार ने उनके साथ हाथापाई की। बकौल उल्लासकार दत्ता, “इस घटना के बाद से पुलिस और उसके पीछे खड़ी सरकार के तौर-तरीकों को लेकर मेरे मन में स्पष्ट छवि और विचार उभरने लगे।” इस घटना के कुछ ही समय बाद प्रेसिडेंसी कॉलेज के ही एक अंग्रेज शिक्षक प्रोफ़ेसर रसेल ने जब कलकत्ता के बंगाली छात्र वर्ग पर नस्ली और अपमानजनक टिप्पणी की तो उल्लासकार ने मिस्टर रसेल को तमाचा जड़ दिया। इसके बाद उन्हें कॉलेज से निलंबित कर दिया गया।

उन दिनों स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, इसलिए उल्लासकार ने बम्बई के एक टेक्सटाइल संस्थान में प्रवेश ले लिया, ताकि वे स्वदेशी कपड़ा बनाने की तकनीक सीख सकें और देश को गुलाम बनाने वाले विदेशी शासकों की जेबें भरने से रोकने में योगदान कर सकें। यहीं उन्होंने रसायन-विज्ञान (केमिस्ट्री) के वह मूलभूत पाठ पढ़े, जो आगे जाकर उन्हें खुद से बम की केमिस्ट्री समझने में सहायक साबित हुए। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह कालखण्ड मोहनदास ‘महात्मा’ गाँधी के भारत-आगमन से भी पहले का है, जबकि इतिहासकार और मीडिया गिरोह स्वदेशी आंदोलन का श्रेय प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गाँधी को देते हैं।

उन्हीं दिनों विदेश से आईसीएस अधिकारी बनने के मौके को लात मारकर देश लौटे ऑरोबिंदो घोष बंगाल में अनुशीलन समिति नामक एक संगठन चला रहे थे। समिति एक ओर जाहिरी तौर पर नवयुवकों में हिन्दू धर्म, गीता, चरित्र-निर्माण, स्वामी विवेकानंद और श्री रामकृष्ण परमहंस के विचारों का प्रचार-प्रसार आदि कर रही थी। लोगों को देशप्रेम, पहलवानी, आत्मरक्षा आदि सिखा रही थी। वहीं जुगांतर नामक एक पत्रिका का प्रकाशन कर इशारों-इशारों में सशस्त्र क्रांति की वैचारिक जमीन भी तैयार कर रही थी। महर्षि अरबिंदो द्वारा पत्रिका में लिखे ऐसे ही एक सम्पादकीय लेख से प्रभावित दत्ता ने उनसे सम्पर्क किया। महर्षि अरबिंदो के जीवन और उनके सहयोगियों पर शोध करने वालों का दावा है कि अक्टूबर 1907 आते-आते दत्ता एक समूची ट्रेन को जला देने लायक बम बनाना सीख चुके थे।

बाल-बाल बचा फ्रेज़र

यह समय बंग-भंग के ठीक बाद का है, जब साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर एक अलग मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की अंग्रेजी नीति के विरोध में बंगाल धधक रहा था। जनता के विरोध को दबाने के लिए बंगाल के गवर्नर लॉर्ड कर्जन ने मानों पूरे बंगाल की आबादी को ही अंग्रेजी बूट के नीचे कुचल कर मार डालने की नीति अपना रखी थी। अपने आपको ‘जेंटिलमैन’ कहने वाले ब्रिटिश शासन की नृशंसता क्रूरतम मुगल जनरल को मात देती थी।

अनुशीलन समिति के क्रांतिकारी इस दमन-चक्र की कीमत अंग्रेजी शासन से वसूलने को अडिग थे। इसके लिए उन्होंने पहला निशाना चुना प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रू फ्रेज़र को, जो लॉर्ड कर्ज़न का दाहिना हाथ माना जाता था और उसके गुनाहों में उतना ही सहभागी था (आगे जाकर उसके कुकर्मों के ही इनाम के रूप में अंग्रेजी शासन ने उसे पश्चिमी बंगाल प्रांत का गवर्नर बना दिया था)। उल्लासकार दत्ता को उसकी ट्रेन उड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। यह उनके क्रांतिकारी जीवन का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी बम होना था।

उल्लासकार को बम बनाना था। उसे पहुँचाने का जिम्मा खुद बारिन घोष का था। पटरी के नीचे सही जगह गड्ढा खोद कर उसे लगाने का जिम्मा प्रफुल्ल चाकी (जिन्होंने आगे जाकर किंग्सफोर्ड धमाके में भी हिस्सा लिया) और बिभूतिभूषण सरकार का था। कई-एक बार ऐसा हुआ कि क्रांतिकारी बम लगा आए, लेकिन जिस ट्रेन से फ्रेज़र के आने की सूचना थी, वह आई ही नहीं, और प्लान असफ़ल हो गया।

अंत में किसी तरह सही ट्रैक पर बम लगाया गया, उसमें विस्फ़ोट हुआ, ट्रेन का इंजन हवा में उड़ गया लेकिन ट्रेन बेपटरी होने से बच गई। फ्रेज़र जिंदा बच गया। उसने तुरंत ही घटना की जाँच के आदेश दे दिए। इसके बाद क्रांतिकारी समझ गए कि फ्रेज़र को मारना तो अब असम्भव हो चुका है, अतः उन्होंने अगला निशाना चुना- मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड।

अनुशीलन समिति से विशेष ‘सौहार्द्र’

अलीपुर के प्रेसिडेंसी कोर्ट का चीफ़ मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड आम बंगालियों के प्रति अपने अंग्रेज माई-बाप की भॉंति क्रूर और दमनकारी तो था ही, अनुशीलन समिति और जुगांतर पत्रिका से उसे कुछ विशेष ही ‘लगाव’ था। उसने जुगांतर के लगभग पूरे सम्पादक मंडल, जिसमें स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त भी शामिल थे, को कठोर कारावास की सज़ा देकर जेल भेज दिया था। यही नहीं, जब इसके विरोध में जुगांतर में लेख प्रकाशित हुए ​तो उसने पत्रिका पर 5 और मुकदमे लाद दिए। इन सभी मुकदमों के आर्थिक बोझ और सम्पादकीय व बौद्धिक नेतृत्व के एक बड़े हिस्से के जेल चले जाने से 1908 आते-आते जुगांतर एक तरह से निष्प्राण हो गया था। बावजूद इसके उसकी विचारधारा इन मुकदमों के साथ और प्रख्यात हो रही थी। अधिक-से-अधिक लोग राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ कर अंग्रेजों को विदेशी आक्रांता के रूप में देख रहे थे। पुलिस की परवाह किए बिना जुगांतर के मामले में सुनवाई के दौरान विरोध-प्रदर्शन किसी के थामे नहीं थमता था।

इन्हीं विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक किशोर सुशील सेन को मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने सरेआम कोड़े मरवाए थे, ताकि बंगालियों में डर बैठाया जा सके। लेकिन क्रांतिकारियों की योजना पर उस समय पानी फिरता सा लगा जब सूचना मिली कि किंग्सफोर्ड की सुरक्षा को लेकर चिंतित सरकार ने उसे जिला जज के रूप में पदोन्नत कर वर्तमान उत्तरी बिहार के मुजफ्फरपुर में भेज दिया है। अंततः निर्णय हुआ कि किंग्सफोर्ड की मौत बन क्रांतिकारी ही उस तक मुजफ्फरपुर पहुँचेंगे। इस दुस्साहसिक कृत्य के लिए 19 वर्षीय लेकिन अनुभवी प्रफुल्ल चाकी के साथ युवा खुदीराम बोस को चुना गया।

एक ओर यह दोनों वहाँ पहुँचे। वहीं कहीं से कलकत्ता पुलिस को भी इस योजना की भनक लग गई। कलकत्ता के कमिश्नर हैलिडे ने मुजफ्फरपुर पुलिस के ज़रिए किंग्सफोर्ड को आगाह कर दिया। लेकिन अति-आत्मविश्वास में किंग्सफोर्ड ने बहुत ज़्यादा एहतियात नहीं बरती। हालाँकि उसके घर के बाहर पुलिस ने 4 सिपाही तैनात ज़रूर कर दिए, लेकिन उसने ब्रिज खेलने जाना जारी रखा।

इसी का फायदा उठाकर स्कूल छात्रों के वेश में घूम रहे क्रांतिकारियों ने 29 अप्रैल 1908 की शाम को उसकी बग्घी में उल्लासकार दत्ता का बनाया हुआ बम फेंक दिया। दुर्भाग्यवश वह बग्घी किंग्सफोर्ड की न होकर बिहार के अंग्रेज वकील प्रिंगल केनेडी की निकली, जिसकी बेटी और पत्नी ने बम-धमाके से दम तोड़ दिया। किंग्सफोर्ड हूबहू वैसी ही बग्घी में पीछे से आ रहा था और वह बच निकला।

क्रांतिकारियों की इस भयानक चूक का फायदा उठाकर अंग्रेज पुलिस ने भारतीयों पर अत्याचार का नया सिलसिला शुरू कर दिया। हालाँकि प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस से मुठभेड़ में पकड़े जाने की बजाय खुद को गोली मार ली, लेकिन खुदीराम बोस पुलिस के हाथ लग गए। पुलिस ने मुकदमे के एक संक्षिप्त प्रहसन के बाद उन्हें फॉंसी पर चढ़ा दिया। लेकिन यह पुलिसिया अत्याचारों का अंत नहीं, महज़ शुरूआत थी। असली ‘बड़ी मछली’ थे “अंग्रेज़ी शासन के लिए सबसे खतरनाक व्यक्ति” घोषित हो चुके, अनुशीलन समिति व जुगांतर पत्रिका के संचालक ऑरोबिंदो घोष। (सन्दर्भ: Peter Heehs की किताब The Lives of Sri Aurobindo)

नेता के लिए कुर्बानी

2 मई, 1908 को पुलिस ने क्रांतिकारियों के विभिन्न ठिकानों पर एक साथ छापेमारी कर कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें उल्लासकार दत्ता के अतिरिक्त बारिन घोष, इंदु भूषण रॉय, उपेन्द्रनाथ बनर्जी आदि समिति के लगभग सभी चोटी के नेता थे। इन सभी पर इंग्लैण्ड के राजा के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाकर अदालत में मामला शुरू हुआ, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘Emperor vs Aurobindo Ghosh and others’ और जनसामान्य के बीच अलीपुर बम केस, माणिकपुर षड्यंत्र या माणिकटोला बम षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है। कुल 49 जनप्रिय नेताओं को आम चोर-लुटेरों और हत्यारों-बलात्कारियों की तरह हाथ में हथकड़ियाँ और कमर में रस्सी बाँधकर कठघरे में खड़ा कर दिया गया।

जब मुकदमा चलना शुरू हुआ तो यह साफ़ था कि बारिन घोष समेत बाकी लोग तो सरकार के लिए ‘बोनस’ थे। असली नज़र तो थी ऑरोबिंदो घोष को दोषी करार देकर (और हो सके तो फाँसी पर चढ़ाकर) अंग्रेजी राज की राह के इकलौते सबसे बड़े काँटे को मिटाना। इसके लिए एक आरोपित नरेन्द्रनाथ गोस्वामी को पुलिस ने तोड़ भी लिया था कि यदि वह अदालत में गवाही दे दे कि मुजफ्फरपुर हत्याकाण्ड के आदेश सीधे महर्षि अरबिंदो ने दिए थे, उसके सामने, तो उसे माफ़ कर दिया जाएगा। यही नहीं, बचाव पक्ष के वकीलों को गोस्वामी से जिरह का मौका भी जज ने नहीं दिया।

लेकिन क्रांतिकारी भी ऑरोबिंदो पर आँच न आने देने के लिए कृतसंकल्प थे। एक ओर दो क्रांतिकारियों कनैलाल दत्त और सत्येन बोस ने जेल में ही नरेन गोस्वामी को मौत के घाट उतार दिया (जिसके लिए दोनों को आनन-फानन में फाँसी भी दे दी गई) और दूसरी ओर बारिन घोष ने पूरे मुजफ्फरपुर हत्याकाण्ड का जिम्मा अपने सिर ले लिया।

चूँकि उल्लासकार दत्ता, इंदुभूषण रॉय और बिभूतिभूषण सरकार को भी मुकदमे में फॉंसी ही होनी थी, अतः उन्होंने भी बाकी साथियों को मौत के मुँह से बचाने के लिए जिम्मेदारी बाँट ली। अंत में 6 मई, 1909 को जब मुकदमे का नतीजा आया तो उल्लासकार दत्ता और बारिन घोष को मुख्य षड्यंत्रकारी मानते हुए मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई। इंदुभूषण रॉय और बिभूतिभूषण सरकार सहित 13 अन्य को कालापानी में उम्र कैद और सम्पत्ति की कुर्की, और कइयों को अन्य अवधि के कारावास सज़ा सुनाई गई।

लेकिन अंग्रेज सरकार लाख चाहकर भी महर्षि अरबिंदो को हाथ तक नहीं लगा पाई। सबूतों के अभाव में अरबिंदो समेत 17 आरोपितों को बरी करना पड़ा। बाद में उल्लासकार दत्ता और बारिन घोष के मृत्युदण्ड को सरकार ने कालापानी के उम्रकैद में तब्दील कर दिया। वहाँ वे 1920 में सरकार द्वारा सभी क्रांतिकारियों को आम माफ़ी दिए जाने तक रहे।

जेल की यातनाएँ, मानसिक रोगी हो जाना

अलीपुर मुकदमे में अपना पेशा ‘गायों का चरवाहा’ बताने वाले उल्लासकार दत्ता कालापानी जाने के पहले तक काफ़ी विनोदप्रिय माने जाते थे। उन्हें दूसरों की मिमिक्री करने और वेंट्रीलोक्विज़म (कठपुतली का करतब) में भी महारत हासिल थी। जेल में भी कुछ समय तक वह चुटकुले आदि से अपने साथियों का मनोरंजन करते रहे थे। लेकिन अरबिंदो के हाथ से निकल जाने से खिसियाई अंग्रेज सरकार ने अपना गुस्सा कैद क्रांतिकारियों पर बहुत बर्बरतापूर्वक निकाला और उन्हें रूह कॅंपा देने वाली यातनाएँ दीं। कैदी वहाँ की गर्म जलवायु में मलेरिया और हैजा आदि से ग्रस्त हो पड़े रहते थे और सुनने वाला कोई नहीं था। राजनीतिक कैदियों के हिस्से का राशन जेल कर्मचारी चुरा लेते थे। दस सालों के अंतराल में तिल-तिल कर इतना शोषण किया गया कि उल्लासकार दत्ता का मानसिक संतुलन ही जाता रहा। वे अकेले नहीं थे- कुछ ही समय पहले देश के लिए मौत को गले लगाने को उद्यत खड़े इंदुभूषण रॉय की आत्मा और शरीर को अंग्रेजी दमन के कोल्हू ने इतना बुरी तरह पीस दिया कि उस क्रांतिकारी ने एक फ़टी कमीज से खुद को फॉंसी लगा ली

1920 में जेल से निकल कर उल्लासकार कलकत्ता चले गए, जहाँ 1931 में उन्हें दोबारा हिरासत में लेकर 18 महीने के लिए जेल भेज दिया गया। वहाँ से निकलने के बाद के उनके जीवन के बारे में वृत्तान्त कम ही मिलते हैं। उनके जीवन के विषय में जानकारी का मुख्य स्रोत उनके लिखे हुए दो जेल वृत्तान्तों आमार काराजीबन (कारागार में मेरा जीवन, अंग्रेजी में Twelve years in prison life शीर्षक से अनुवादित) और द्वीपांतरेर कथा (अंग्रेजी में The Tale of Deportation शीर्षक से अनुवादित) के अलावा महर्षि अरबिंदो के जीवन पर शोध-साहित्य और क्रांतिकारी हेमंत सरकार की किताब Revolutionaries of Bengal प्रमुख हैं।

1947 में आजादी हासिल होने के बाद उल्लासकार अपने पैतृक स्थान कालिकच्चा चले गए। बाघबाड़ी हाउस नामक अपने घर में उन्होंने प्रवेश अंग्रेजी राज के अंतिम दिन 14 अगस्त, 1947 को किया। बाद में 1957 में उन्होंने विवाह कर लिया और वर्तमान असम के सिलचर चले गए, जहाँ 17 मई 1965 को उन्होंने अंतिम साँस ली।

ये भी पढ़ें: गुरु गोविन्द सिंह की वो सभा, जिसमें उन्होंने अपने ही 5 लोगों के शीश माँगे: खालसा और ‘पंज प्यारे’ का इतिहास

सारी सभा में हलचल मच गई। रौद्र रूप धरे गुरु गोविन्द सिंह की इस माँग के बाद जो लोग आए, उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बहादुरी से देश को गौरवान्वित किया बल्कि जाति-पाती के बंधनों को तोड़ने में भी अहम भूमिका निभाई। एक व्यक्ति आगे आया। गुरु गोविन्द सिंह उसे तम्बू में ले गए और खचाक…!

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