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CM हिमंता के राज में असम में 480 से 84 पर आई मातृ मृत्यु दर, जानें- क्या होता है MMR और कैसे सरकारी योजनाओं-स्वास्थ्य कर्मियों के समर्पण ने पाई ‘मृत्यु पर विजय’

जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर राज्य की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी की जानकारी दी है। असम में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब तेजी से घटकर महज 84 पर आ गई है। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब असम का यह आँकड़ा देश के राष्ट्रीय औसत यानी 88 से भी नीचे चला गया है।

मुख्यमंत्री ने इस पल को अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे भावुक करने वाला क्षण बताया है। उन्होंने इस सफलता का पूरा श्रेय असम के हजारों डॉक्टरों, नर्सों, आशा बहुओं और स्वास्थ्य कर्मियों को दिया है। CM हिमंता ने बताया कि साल 2006 में जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग संभाला था, तब राज्य में मातृ मृत्यु दर 480 थी। उस समय इस स्थिति को सुधारना बिल्कुल नामुमकिन लगता था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के लगातार काम और त्याग से आज यह सच हो चुका है।

क्या है मातृ मृत्यु दर?

अगर हम आम लोगों की बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।

स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में इसे ठीक से मापने के लिए एक पैमाना बनाया गया है जिसे मातृ मृत्यु अनुपात कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि समाज में हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म लेने पर कितनी माताओं को अपनी जान गँवानी पड़ी है। यह विशेष आँकड़ा किसी भी राज्य या देश की अस्पताल व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और इलाज की असली मजबूती को दुनिया के सामने साफ-साफ दिखाता है।

असम में पहले और अब के आँकड़ों में अंतर

असम राज्य ने पिछले दो दशकों के भीतर गर्भवती माताओं की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अगर हम साल 2006 के पुराने आँकड़ों को देखें तो असम की स्थिति पूरे देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक और डरावनी मानी जाती थी। उस समय असम में हर एक लाख बच्चों के जन्म पर 480 माताओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती थी।

इसके बाद सरकार, अस्पतालों और जमीनी स्वास्थ्य कर्मियों ने मिलकर एक लंबा और कठिन सफर तय किया। इसी लगातार की गई मेहनत का नतीजा है कि साल 2026 में यह आँकड़ा बहुत तेजी से नीचे गिरकर केवल 84 पर टिक गया है। भारत सरकार के ताजा आँकड़ों के अनुसार इस समय पूरे देश की मातृ मृत्यु दर का औसत आँकड़ा 88 बना हुआ है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि असम अब देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची से बाहर निकलकर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा बेहतर और शानदार काम कर रहा है।

आखिर किन वजहों से होती है गर्भवती माताओं की मौत

गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की अचानक जान जाने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं। डॉक्टरों के अनुसार इनमें सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या डिलीवरी के तुरंत बाद महिला के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह जाना है। अगर इस खून के बहाव को समय पर नहीं रोका जाए तो महिला की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है। इसके अलावा प्रसव के समय या उसके बाद अस्पतालों या घरों में पूरी तरह साफ-सफाई न होने से महिला के शरीर में बहुत तेजी से इंफेक्शन यानी संक्रमण फैल जाता है।

गर्भावस्था के दिनों में अचानक ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप का बहुत ज्यादा बढ़ जाना भी दिमाग और दिल पर गहरा असर डालता है जिसे चिकित्सा की भाषा में एक्लेम्पसिया कहा जाता है। कई बार समाज में बिना डॉक्टरी सलाह के या दाइयों के जरिए गलत तरीके से कराया गया असुरक्षित गर्भपात भी सीधे मौत का कारण बन जाता है। इन सभी समस्याओं के साथ ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के शरीर में पहले से पोषण की कमी और खून की भारी कमी यानी एनीमिया का होना स्थिति को प्रसव के समय और ज्यादा नाजुक बना देता है।

माताओं की जान बचाने के सबसे सरल उपाय

चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गर्भवती माताओं की होने वाली इन अधिकांश मौतों को बहुत ही आसान उपायों से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी और प्राथमिक उपाय यह है कि बच्चे का जन्म हमेशा किसी अच्छे और मान्यता प्राप्त अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों की देखरेख में ही होना चाहिए। पुराने तौर-तरीकों से घरों पर प्रसव कराने से अचानक पैदा होने वाले खतरों को संभालना नामुमकिन हो जाता है।

इसके अलावा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों से ही महिला की कम से कम चार बार नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त जाँच होनी चाहिए और समय पर सभी जरूरी टीके लगने चाहिए। गर्भवती महिला के रोज के खान-पीने का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, दूध और सरकार द्वारा दी जाने वाली आयरन की गोलियाँ नियमित रूप से शामिल हों। इसके साथ ही किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस या गाड़ी की व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए ताकि बिना समय गँवाए मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके।

सुरक्षा के लिए देश और राज्य में चलाई जा रही योजनाएँ

गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कई बेहतरीन और बेहद मजबूत योजनाएँ चला रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य गरीब से गरीब परिवार की महिला को भी बिना किसी खर्च के बड़े अस्पतालों में इलाज की सुविधा देना है।

जननी सुरक्षा योजना– इस दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की गर्भवती महिलाओं को सीधे नकद पैसे की मदद देती है ताकि वे पैसों की तंगी छोड़कर अस्पताल में आकर ही सुरक्षित डिलीवरी करवाएँ। इसी तरह जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को शुरू किया गया है, जिसका पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं के इलाज में जेब से होने वाले हर एक पैसे के खर्च को पूरी तरह खत्म करना है।

इस योजना के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में महिला का सीजेरियन ऑपरेशन, प्रसव, सभी जरूरी दवाइयाँ, जाँच, खून की जरूरत और डॉक्टर द्वारा बताया गया भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है। इतना ही नहीं, महिला को घर से अस्पताल लाने और डिलीवरी के बाद वापस घर सुरक्षित छोड़ने के लिए एम्बुलेंस की गाड़ी भी पूरी तरह बिना किसी पैसे के सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत पूरे देश में हर महीने की 9 तारीख को एक विशेष दिन तय किया गया है। इस दिन सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा हर एक गर्भवती महिला की व्यापक और बिल्कुल मुफ्त जाँच की जाती है। इस अभियान के तहत जिन महिलाओं की गर्भावस्था में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उनकी पहचान करके सुरक्षित प्रसव होने तक आशा वर्कर्स के जरिए लगातार उनकी व्यक्तिगत ट्रैकिंग की जाती है।

माताओं के स्वास्थ्य को और ज्यादा सम्मानजनक बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षित मातृत्व आश्वासन यानी ‘सुमन’ योजना भी शुरू की है, जिसमें अस्पताल आने वाली हर महिला को बिना किसी कोताही के गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज की गारंटी दी जाती है। लेबर रूम की कमियों को दूर करने के लिए ‘लक्ष्य’ नाम का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिससे अस्पतालों के प्रसव कक्षों को आधुनिक और पूरी तरह साफ-सुथरा बनाया जा सके।

पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के अच्छे खान-पान के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सीधे बैंक खाते में 5,000 रुपए भेजे जाते हैं, और मिशन शक्ति के तहत दूसरा बच्चा लड़की होने पर परिवार को 6,000 रुपए की मातृत्व सहायता दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में खून की कमी को खत्म करने के लिए एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत स्कूलों और गाँवों में आयरन की दवाइयाँ मुफ्त बाँटी जा रही हैं और RCH पोर्टल के जरिए हर गर्भवती महिला का नाम लिखकर ऑनलाइन कंप्यूटर पर उसकी हर जाँच का हिसाब रखा जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का वैश्विक नजरिया और 2030 का बड़ा संकल्प

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO पूरी दुनिया के स्तर पर मातृ मृत्यु दर को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या मानता है। इस वैश्विक संगठन के अनुसार साल 2023 के आँकड़ों को देखें तो दुनिया भर में हर दिन गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी रोकी जा सकने वाली कमियों के कारण 700 से अधिक महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ती थी, जिसका मतलब है कि हर दो मिनट में एक माँ दुनिया छोड़ देती थी।

WHO ने दुनिया के सभी देशों के साथ मिलकर सतत विकास लक्ष्य के तहत एक बड़ा संकल्प लिया है कि साल 2030 तक पूरी दुनिया में मातृ मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख जन्म पर 70 से भी नीचे लेकर आना है। WHO की रिपोर्ट साफ बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मातृ मौतों में से लगभग 92% मौतें सिर्फ कम आय वाले और पिछड़े देशों में होती हैं, जहाँ अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बड़ा अंतर है।

संगठन का मानना है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल प्रणालियों की खराब जवाबदेही, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी, दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महिलाओं के अधिकारों को कम प्राथमिकता देना जैसे बड़े सामाजिक कारण शामिल हैं। WHO लगातार अनुसंधान और तकनीकी दिशा-निर्देशों के जरिए भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर रहा है।

संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यदि गर्भावस्था और प्रसव के समय हर एक महिला को प्रशिक्षित डॉक्टर या दाई की सही देखरेख मिल जाए, तो दुनिया की अधिकांश माताओं को एक नया और सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।

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