Friday, May 14, 2021
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‘ललुआ का सब आदमी इसके साथ हो गया है’: वह सीट जो बार-बार कह रही थी सरकार एनडीए की ही बनेगी

दरभंगा से मैं उसी दिन दोपहर बाद हसनपुर के लिए निकला। हाइवे पर डेढ़-दो किमी चलने के बाद हमने गाड़ी दाईं तरफ नीचे की एक सड़क पर उतार दी। यह हमारे प्लान का हिस्सा नहीं था। असल में केवटी सीट पर जाना कभी भी हमारे प्लान में नहीं था। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह सीट बीजेपी को मिली है।

तारीख थी: 26 अक्टूबर 2020। बिहार में घूमते हुए मुझे एक पखवाड़ा हो गया था। पहले चरण का चुनाव नहीं हुआ था। लेकिन, समझ में आ गया था;

  • पहले चरण में एनडीए को खासा नुकसान हो रहा है
  • महागठबंधन बहुमत से पीछे रह जाएगी

हालाँकि, ऐसा कोई सूत्र हाथ नहीं लगा था, जिससे दिमाग के साथ-साथ दिल को भी यह सुकून हो कि मैं जो सोच रहा हूँ, वही सत्य है। अब तक की यात्रा में मुझे श्रेयसी सिंह, एकमात्र ऐसी उम्मीदवार मिली थीं जिनकी जीत के लिए मैं 110 फीसदी आश्वस्त था। दामोदर रावत, सुमित सिंह, विजय सिन्हा, प्रह्लाद यादव, चेतन आनंद जैसों की जीत के लिए 80 से 90 फीसदी आश्वस्त था। अब तक की यात्रा में मात्र एक उम्मीदवार मिले थे जो खुद अपनी जीत के प्रति 110 फीसदी आश्वस्त थे। ये थे गया शहर से बीजेपी के उम्मीदवार प्रेम सिंह। इसके अलावा जितने भी एनडीए, खासकर बीजेपी के उम्मीदवार मिले सबने ऑफ द रिकॉर्ड कहा कि इस बार मुकाबला कड़ा है। मोदी जी की सभा के बाद माहौल बदलने की उम्मीद है।

ऐसे माहौल में मैं 26 अक्टूबर 2020 को दरभंगा शहर से बीजेपी के उम्मीदवार संजय सरावगी से मिला था। वे भी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थे। मोदी की रैली के आसरे थे। दरभंगा में घूमने पर आपको भी एहसास हो जाता कि सरावगी का डर हवा-हवाई नहीं था।

दरभंगा से मैं उसी दिन दोपहर बाद हसनपुर के लिए निकला। हाइवे पर डेढ़-दो किमी चलने के बाद हमने गाड़ी दाईं तरफ नीचे की एक सड़क पर उतार दी। यह हमारे प्लान का हिस्सा नहीं था। असल में केवटी सीट पर जाना कभी भी हमारे प्लान में नहीं था। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह सीट बीजेपी को मिली है। मेरे पास जो जानकारी थी, उसके हिसाब से बीजेपी ने यह सीट वीआईपी को दे दी है। वीआईपी की तरफ से हरि सहनी जो दरभंगा बीजेपी के अध्यक्ष भी रहे हैं, उम्मीदवार होंगे।

इस सीट से पिछली बार राजद के फराज फातमी विधायक चुने गए थे। वे चुनाव से पहले जदयू में आ गए थे और अपनी सीट बदल ली थी। असल में फातमी ने जब राजद को आँखें दिखानी शुरू की, तब से ही यहाँ राजद के बड़े नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी सक्रिय हो चुके थे। सिद्दीकी की छवि अली अशरफ फातमी की तरह कट्टर भी नहीं है। सो, राजनीति की सामान्य समझ कहती थी कि अब्दुल बारी सिद्दीकी ही जीतेंगे।

वैसे भी इस सीट से गैर मुस्लिम तीन बार ही जीते थे। बीजेपी का उम्मीदवार तो एक बार केवल 29 वोट से जीत पाया था। इस सीट के समीकरण भी ऐसे हैं कि एक ब्राह्मण उम्मीदवार के जीतने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में मेरे पास यह जानकारी आई कि बीजेपी ने यहाँ से एक ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है। यह भी कि दरभंगा से किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं देने को लेकर नाराजगी की खबर जब बीजेपी शीर्ष नेतृत्व को मिली तो उसने वीआईपी से यह सीट वापस ले ली। हरि सहनी को चुनाव लड़ने से मना कर दिया और मुरारी मोहन झा को उतारा। यह भी पता चला कि सीट वापस लेने से लेकर मुरारी मोहन झा को उम्मीदवार बनाने तक का फैसला खुद अमित शाह ने किया है।

इस जानकारी के बाद पहला सवाल दिमाग में आया यह मुरारी मोहन झा कौन हैं? मधुबनी-दरभंगा के एक नेता जिस मुरारी मोहन झा के बारे में मुझे पता था वह कॉन्ग्रेस में थे। जब मधुबनी के सांसद रहे शकील अहमद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हुआ करते थे तो एक बार दिल्ली यात्रा के दौरान उनके आवास पर ही झा जी को देखा ​था। मुझे बहुत प्रभावशाली नहीं लगे थे। उसके बाद मैंने उनके बारे में कभी सुना भी नहीं और उनमें ऐसा कुछ खास लगा भी नहीं था, जिससे आप किसी से मिलने के बाद उसके संपर्क में रहना चाहें या उसके बारे में सूचनाएँ जुटाते रहें।

इस सवाल का जवाब फौरन मिल गया। पता चला ये वही मुरारी मोहन झा हैं। करीब 5 साल पहले ही बीजेपी में आए हैं। यह भी पता चला कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें ही मधुबनी सीट का प्रभारी बनाया था और अशोक यादव रिकॉर्ड अंतर से जीते थे। इतना कुछ जानने के बाद ‘झा प्रेम’ में मैंने आधे घंटे के लिए केवटी जाने और मुरारी मोहन झा से मिलने का फैसला रास्ते में ही किया था। इसलिए हसनपुर जाते वक्त हमने अपनी गाड़ी हाइवे से उतार ली थी।

हाइवे से उतरते ही एक सड़क पर कुछेक सौ मीटर चलने पर बीजेपी का कार्यालय है। यूँ तो बीजेपी के दफ्तर अब आलीशान होते हैं, लेकिन इस दफ्तर की हालत से पता चल रहा था कि अभी निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। यहाँ तक कि हाइवे से कार्यालय तक जाने की कुछेक सौ मीटर का रास्ता भी दुरुस्त नहीं था। कार्यालय से पता चला कि मुरारी मोहन झा क्षेत्र में जनसंपर्क कर रहे हैं और कार्यालय वापस नहीं आएँगे। हमने उन्हें क्षेत्र में ही फटाक से पकड़ने, फटाफट एक इंटरव्यू कर वापस हसनपुर लौटने का फैसला किया।

उनकी तलाश में हम हाजीपुर चौक की तरफ गए। पता चला कि वहाँ वे एक बैठक के लिए आने वाले हैं। हमारे पहुँचने के थोड़ी देर बाद उनका भी काफिला आया। बैठक शुरू हुआ। झा जी मुझे किसी भी तरह से प्रभावशाली नहीं लग रहे थे। मैं बैठक से दूर हटकर सड़क किनारे खड़ा हो गया। मन ही मन केवटी आने के अपने फैसले को कोस रहा था।

इसी दौरान नशे में धुत दो-तीन लोग जहाँ हम खड़े थे वहीं बगल में आकर खड़े हो गए। वे आपस में बात करने लगे- ललुआ के सब आदमी अकरा संगे लाइग गेल छै। यानी, लालू के सभी लोग इसके साथ लगे हुए हैं। शराबबंदी वाले राज्य में नशे में धुत लोगों की बात पर भरोसा कर लेना या उन्हें ज्यादा कुरेदना सही नहीं लगा। मैं वहाँ से आगे बढ़ गया। चौक पर कुछ लोगों से बात की। कुछ दुकानदारों को भी टटोला। इससे पता चला कि नशे में धुत लोग गलत नहीं थे। पता चला कि मुरारी मोहन झा ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करते हैं। सज्जन आदमी हैं। मुसीबत के वक्त इलाके के लोगों के सालों से काम आते रहे हैं। यह भी कि उस बैठक में मौजूद ज्यादातर लोग कॉन्ग्रेस और राजद के ही स्थानीय नेता-कार्यकर्ता हैं।

इतनी सूचना हाथ लगने के बाद अब ‘झा प्रेम’ के अलावा एक और दबाव काम करने लगा। राजनीति में ऐसे कम ही लोग दिखते हैं जिनकी सज्जनता की जमीन पर इतनी चर्चा हो। सो, दोबारा से फैसला किया कि इस आदमी का एक इंटरव्यू तो कर ही लेंगे। लेकिन, तब तक अँधेरा हो चुका था। हम जहाँ खड़े थे वहाँ इतनी रोशनी नहीं थी कि इंटरव्यू शूट किया जा सके। बैठक समाप्त होने के बाद हमने झा जी से समय का आग्रह किया। बातचीत से लगा कि वे बहुत इच्छुक नहीं हैं। शायद बोलने की अपनी क्षमता को वे बखूबी जानते होंगे, इसलिए सवाल-जवाब से बचना चाह रहे हों। हमारे काफी आग्रह करने और यह बताने पर कि हमें रोशनी की जरूरत होगी वे अपना जनसंपर्क पूरा कर वापस कार्यालय आने के लिए राजी हो गए।

मैं भी बीजेपी दफ्तर लौट आया। मच्छरों के बीच झा जी का इंतजार हो रहा था। झा जी आए। दफ्तर में रोशनी तो थी, लेकिन बैकग्राउंड सही नहीं था। हमारे साथी मुरली जी ने तय किया कि कैंपस में ही शूट करेंगे, मच्छरों को थोड़ी देर बर्दाश्त करना पड़ेगा। इंटरव्यू शुरू हुआ तो लाइट चली गई। जेनरेटर शुरू किया गया तो इतना शोर होने लगा कि शूट करना संभव नहीं था। जेनरेटर बंद करवा कर मुरली जी ने गाड़ियों की हेडलाइट जलवाई। अब सारे कीड़े-मकोड़ों के टार्गेट पर मैं और झा जी थे। मुँह खोलते ही दो-चार प्रवेश कर जाते। एक लाइन भी पूरा नहीं कर पाया। धैर्य जवाब दे गया। झा जी के साथियों ने कहा कि आप सुबह इंटरव्यू कर लीजिएगा। लेकिन, छह घंटे से ज्यादा बर्बाद करने के बाद हम और समय जाया नहीं करना चाहते थे, एक ऐसी सीट और एक ऐसे उम्मीदवार पर जिसका नतीजा हमें पहले से पता था। इसलिए कार्यालय के अंदर एक कमरा जिसमें खाना बनता था वहाँ हमने दो कुर्सी रखने की जगह बनाई। पीछे कार्यालय में लगे कुछ पोस्टर डाल दिए। किसी तरह इंटरव्यू खत्म किया।

रात के 12 बज चुके थे। हम हाइवे पहुँचे। रहने का ठिकाना खोजा। खाने का जुगाड़ किया। इन सब चक्कर में डेढ़ बज गए। सुबह 5 बजे हसनपुर के लिए निकलना था। मुरली जी और सूरज जी सो गए। मैं बार-बार उस इंटरव्यू को देख रहा था जिसे हम शूट करके लाए थे।

अब मैं एक नए सवाल से जूझ रहा था। इसे अपने संपादक अजीत भारती के पास दिल्ली भेजूँ या नहीं? यह इंटरव्यू किसी भी लिहाज से प्रभावशाली नहीं था। मेरा दावा था कि यह सीट और यह उम्मीदवार अमित शाह ने विशेष रूप से चुना है, लेकिन उम्मीदवार के जवाब अमित शाह की प्रभावशाली छवि से मेल नहीं खा रहे थे। एक तरफ कागज पर केवटी के समीकरण थे और यहाँ आने से पहले मैं भी उसे ही सत्य मान रहा था और अब यहाँ सुनी सज्जनता की कहानियाँ, दिल्ली में बैठा आदमी शायद ही जिस पर विश्वास करें। यह डर था कि संपादक इसे मेरा ‘झा प्रेम’ समझेंगे, जिसके कारण मैं अक्सर भावुक हो जाता हूं और जिससे वे भली-भाँति परिचित भी हैं। लेकिन जितनी बार इस इंटरव्यू को देखता बार-बार अहसास होता कि इसमें एक ईमानदारी तो है। एक सज्जन व्यक्तित्व को केवल इसलिए ही अनदेखा नहीं​ किया जा सकता, क्योंकि आज मेरे पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई तथ्य नहीं है। इसी उधेड़बुन में सुबह के 5 बज गए। मुरली जी और सूरज जी को उठाया। हम हसनपुर निकलने की तैयारियों में लग गए। गाड़ी में बैठते ही मुरली जी से कहा कि इसे एडिट कर रास्ते से ही भेज देना है।

हमने उसे दिल्ली भेज दिया। वह इंटरव्यू हमारे संपादक ने बिना किसी सवाल-जवाब के जारी भी कर दिया। मेरी यात्रा भी चलती रही। लेकिन, मुरारी मोहन झा की सज्जनता के बारे में सुनी कहानियाँ मेरे दिमाग से नहीं निकल रही थी। मन कह रहा था कि इस सीट पर चमत्कार होगा। दिमाग कह रहा था अब्दुल बारी सिद्दीकी भारी अंतर से जीतेंगे। तय किया कि आखिरी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इस सीट पर दोबारा जाऊँगा (अपनी पूरी यात्रा में मैं किसी भी सीट पर दोबारा नहीं गया)। हालाँकि केवटी सीट तब भी लिखकर विपक्ष के खाते में ही रखा था।

31 अक्टूबर को केवटी के कुछ गाँव में घूमा। हर जगह एक सी बातें। दिल और दिमांग में द्वंद्व चलता रहा। अब मैं इस उम्मीदवार और इस सीट के बारे में खूब बात करना चाहता था। फेसबुक पर लिखना चाहता था। लेकिन डर रहा था। उम्मीदवार के नाम में ‘झा’ होना मुझे डरा रहा था। मुझे डर लग रहा था कि लोग मेरे काम में मेरी जाति खोजने लगेंगे। मन में द्वंद्व चलता रहा। लेकिन यह सीट मेरे नोटबुक में अब भी राजद के ही खाते में थी।

दूसरे जगहों पर घूमता रहा पर केवटी दिमाग से निकल नहीं रहा था। 2 नवंबर की सुबह निकला जाले के लिए पर चला गया केवटी। पता चला कि नित्यानंद राय की एक सभा होनी है। उधर के लिए ही निकल गया। रास्ते में एक जगह रास्ता पूछने उतरा। बगल के खेत में बाँस-बल्ली लग रहे थे। एक यादव जी मिले। राजद के स्थानीय नेता थे। बताया कि कल तेजस्वी यादव की रैली होनी है उसकी तैयारी चल रही है। उनसे बतियाने लगा। चुनावी माहौल पूछने लगा। इधर-उधर की बातें काफी देर तक होती रही। जब चलने के लिए उठा तो यादव जी बोले- “यहाँ से झा जी जीत जाएँगे। जादव (यादव) का भी वोट उनको मिलेगा।” पैर थम गए। कारण पूछा तो जवाब मिला- “आप भी तो इधरे के ही हैं न। आदमी केतना बढ़िया हैं जानते ही होंगे। वे तो केवटी से टिकट भी नहीं चाहते थे। ये उनका इलाका भी नहीं है। लेकिन, इधर के लोगों को भी जब संकट में मदद का जरूरत पड़ा है वे किए हैं। पूरा इलाका में कोई आदमी नहीं मिलेगा जिसको मुरारी मोहन झा ने दिक्कत-परेशानी में मदद नहीं किया हो।”

अब एक और सवाल था यह दरभंगा के भाजपाइयों से बात करके खड़ा हुआ ​था। भाजपा के इन नेताओं का दावा था कि बढ़िया छवि के बावजूद मुरारी मोहन झा नहीं जीतेंगे। वे इसका कारण मधुबनी के सांसद अशोक यादव को बता रहे थे। इन नेताओं का कहना था कि अशोक यादव को मुरारी मोहन झा हर जगह आगे रखते हैं, इसके कारण यादव लोग उनके साथ नहीं आ रहा है। असल में अशोक यादव केवटी से दो बार विधायक रहे थे और यहाँ पर उनको लेकर एक नाराजगी खासकर उनके स्वजातीय मतदाताओं में हमें भी दिखी थी। कई जगहों पर उनका प्रचार के दौरान विरोध भी हुआ था।

यही सवाल मैंने राजद वाले यादव जी से किया। उनका जवाब था- “हाँ, अशोक जादव का विरोध है। कल भी खूब बवाल हुआ है। इसलिए तो झा जी का जीतना जरूरी है। एक बार दूसरा आदमी जीत गया तो हुकुमदेव (अशोक यादव के पिता और पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव) के बाल-बच्चा को पता चल जाएगा कि केवटी का जादव लोग उसका गुलाम नहीं है। हम लोग दो बार उसको जिताए माथा पर चढ़कर #@ने लगा। जब से सांसद बना है ज्यादा हवा में रहता है। इस बार उसको बिसरा देंगे कि अब केवटी से उसके खानदान का कभी कोई विधायक बनेगा। इस बार झा जी जीत गए तो बीजेपी बाला उसके परिवार के किसी को टिकटो देगा? ई सीट उसके हाथ से निकल गया है, बुझ जाइए।”

इसके बाद यादव जी ने अपना एक कार्यकर्ता भी हमारी गाड़ी में बिठा दिया। कहा ले जाइए इसको वहाँ तक पहुँचा देगा। यादव लोगों का एकाध गाँव भी घूमा देगा। खुद समझ जाइएगा कि हवा किधर है। हम ने वह सभा कवर की। काफी लोगों से बात की। उस छोटी सी सभा से एहसास हो गया कि यादव जी सही कह रहे हैं। माई समीकरण टूट चुका है। योगी की सभा होनी बाकी थी, जिससे गोलबंदी और मजबूत होने की उम्मीद थी।

अब मैं एनडीए के आगे होने को लेकर 110 फीसदी आश्वस्त था। केवटी से निकलकर जाले पहुँचते- पहुँचते रात हो गई। वह रात जैसे-तैसे काटी। सोने का न समुचित ठिकाना मिला और न खाना। ज्यादा दूर नहीं जाना चाहता था, क्योंकि एक ही शख्स के पास दोबारा टाइम से नहीं पहुँच पाने का खतरा होता। अगले दिन यानी 3 नवंबर को जाले में पूरा दिन काम कर हम शाम में मधुबनी पहुँचे। दूसरे चरण का मतदान हो चुका था। अलग-अलग जगहों से सूचनाएँ इकट्ठा कर रहा था। सबसे हैरान करने वाली जानकारी मेरे लिए राजनगर से थी। जिस रामप्रीत पासवान को कल तक हारा हुआ मान रहा था, वह जीत रहे थे। मधुबनी सीट से सुमन महासेठ अचानक फाइट में मतदान के बाद दिखने लगे थे। सोने से पहले केवटी सीट राजद के खाते से काटकर एनडीए में डाल दी थी।

उस रात मुझे गहरी नींद आई थी। 4 तारीख को मैं होटल से भी बाहर नहीं निकला (यात्रा शुरू होने के बाद पहला दिन था जब मैं कहीं नहीं गया)। मैं आश्वस्त हो चुका था कि एनडीए को ही बहुमत मिलेगी। मैं महसूस कर रहा था कि एक मुश्किल चुनाव के सारे सूत्र पकड़ में आ चुके हैं। मुश्किल सीटें केवटी, बिस्फी और जाले से बीजेपी जीत रही है। दरभंगा और मधुबनी में मोदी-योगी फैक्टर काम कर चुका है। तेजस्वी को नतीजों के बाद ही अहसास होगा कि वे बाजी 28 के बाद ही हार गए थे। कुल मिलाकर वे सभी बिंदू जिनकी चर्चा 4 नवंबर की शाम संपादक अजीत भारती के साथ लाइव चर्चा में की थी।

केवटी नहीं जाता तो शायद एग्जिट पोल के बाद मैं भी बदल जाता। लेकिन, जब भी मन में कोई संदेह पैदा होता केवटी नाचने लगता। मैंने केवटी में जो महसूस किया उसे शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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