Monday, February 26, 2024
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जब 4 दिन में स्मॉग से मरे 12000 लोग: वे सॅंभल गए, लेकिन हम दिल्ली वाले कब सीखेंगे

ये पहली बार नहीं है जब दिल्ली का प्रदूषण विमर्श का विषय बना हो, इससे पहले भी ऐसी गंभीर स्थिति दिल्ली ने देखी है। बहुत दूर न भी जाया जाए तो अभी 2 साल पहले साल 2017 में ही हवा की गुणवत्ता सूचकांक 460 दर्ज किया गया था। अब हालात उससे भी बदतर हैं।

बीते कुछ सालों में दिल्ली में प्रदूषण रोक-थाम मामले को लेकर केवल एक मजाक हुआ हैं। आँकड़े दर्शाते हैं कि दिल्ली की हवा की गुणवत्ता का स्तर कुछ सालों में केवल खतरे के निशान पर रहा है। स्थिति ये हो गई है कि अब लोगों ने इसी माहौल को राज्य की आबो-हवा समझ लिया है।

ताजा हालातों के मुताबिक प्रदूषण के मामले में दिल्ली पूरे विश्व में 3 नंबर पर सबसे ज्यादा प्रदूषित राज्य है। जिन्हें घर में बैठकर गलतफहमी है कि वे सुरक्षित हैं। तो उन्हें जानने की जरूरत हैं कि लोगों को आँखों में जलन की शिकायत, साँस लेने में दिक्कत और त्वचा पर खराशें होना शुरू हो गई है और ये प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के कोई आम लक्षण नहीं हैं, ये उस खतरे के निशान हैं जिसने साल 1952 में केवल चार दिन के भीतर कई हजारों लोगों को मौत की आगोश में सोने पर मजबूर कर दिया।

जी हाँ, साल 1952 में 5 दिसंबर से 9 दिसंबर वो तारीखे हैं, जब लंदन का आसमान एक अजीब से स्मॉग की चादर में ढक गया। हालाँकि, 4 दिन बाद ये धुआँ आसमान से छटाँ लेकिन अफसोस अपने साथ कई हजार लोगों को तड़पने के लिए छोड़ गया। ये वाकया लंदन के सबसे बड़े नागरिक संकटों में गिना गया। जिसके कारण 2 लाख से ज्यादा लोग बीमार पड़े और 12,000 लोगों से ज्यादा की जानें गईं। तबाही के इस धुएँ को वहाँ ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन का नाम दिया गया।

बताया जाता है कि लंदन में सर्दी से बचने के लिए वहाँ के लोग कोयला जलाया करते थे। जिस कारण कार्बन डाइक्साइड की मात्रा वायु में बढ़ गई। इसके अलावा कोयले से चलने वाले पावर स्टेशनों से भी प्रदूषण काफी बढ़ा। देखते ही देखते 4 दिसंबर 1952 को मौसम ऐसा बदला कि आसमान की घुँध और घरों-फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआँ एक साथ मिल गए। जिससे निर्मित हुई घनी परत की चादर। जो हवा के अभाव में 4 दिनों तक शहर के ऊपर जमी रही।

हालत ये हो गई कि लोगों को सड़कें नजर आना बंद हो गईं, गाड़ी चलाना असंभव हो गया और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम और ऐम्बुलेंस सर्विस भी ठप्प हो गए। लोगों की जिंदगी इतने दिनों में इस कदर बदहाल हो गई कि वे दिन के सूरज को देखने के लिए तड़प गए। इस स्मॉग से धीरे-धीरे लोगों का स्नायु तंत्र बुरी तरह से प्रभावित होने लगा, फेफड़े संक्रमित हो गए, सांस की बीमारियां हो गई, गले में समस्या हो गई। नतीजतन इस स्मॉग के 4 दिनों तक रहने से 4 हजार लोग मरे, और बाद में भी लोगों के मरने का दौर जारी रहा।

हालाँकि, इस घटना के बाद लंदन संभल गया। ‘द ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन’ के बाद वहाँ प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए गए, और दोबारा इस गलती को दोहराने की कल्पना भी नहीं हुई। इस संबंध में राइट टू क्लीन एयर कानून बना और लंदन समेत सभी यूरोपीय देशों ने वाकये से सीख ली।

आज दिल्ली की स्थिति लंदन के उन 4 दिनों जैसी ही हैं। हर तरफ धुँध हैं। लोगों के आँखों में जलन है, तरह-तरह की परेशानियाँ हैं। प्रदूषण अपने चरम पर है। फर्क सिर्फ़ ये हैं कि लंदन एक बार की गलती से सुधर गया, लेकिन दिल्ली वाले कब सुधरेंगे ये बड़ा सवाल है।

धड़ल्ले से संसाधनों का प्रयोग बताता है कि प्रकृति के उपहारों के प्रति हम लापरवाह हो गए हैं और मानव निर्मित संसाधनों को अपनी जरूरत समझते हैं। ये पहली बार नहीं है जब दिल्ली का प्रदूषण विमर्श का विषय बना हो, इससे पहले भी ऐसी गंभीर स्थिति दिल्ली ने देखी है। बहुत दूर न भी जाया जाए तो अभी 2 साल पहले साल 2017 में ही हवा की गुणवत्ता सूचकांक 460 दर्ज किया गया था। अब हालात उससे भी बदतर हैं।

एक खबर के मुताबिक दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए इस समय 300 टीमें काम कर रही हैं। जरूरी मशीनरियों को बाँटा गया है और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों, कचरों को जलाए जाने और निर्माण गतिविधियों पर खासतौर से नजर रखी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र सरकारों को फटकार लगाई है। साथ ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के मुख्य सचिवों को बुधवार को पेश होने का आदेश दिया है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा शुरू किए गए ऑड-ईवन पर कोर्ट ने पूछा है कि इससे क्या फायदा होगा? और कहा है कि अब जो लोग निर्माण कार्य पर लगी रोक का उल्लंघन करेंगे उनपर 1 लाख रुपए और कूड़ा जलाने पर 5 हजार रुपए का जुर्माना वसूला जाएगा।

गौरतलब है कि प्रशासन द्वारा दिखाई जा रही सख्तियाँ निस्संदेह ही बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के लिए जरूरी हैं, लेकिन ये भी आवश्यक है कि हम अपनी गलतियों को सुधारने के लिए दूसरे देशों से सीख लें, जिन्होंने इस समस्या के समाधान पर अच्छा काम किया है। लंदन जहाँ 1952 में स्मॉग ने अपना कहर बरसाया था। वहाँ अब ‘टॉक्सिक चार्ज’ नाम से दस पाउंड का कर शुरू कर दिया गया है। 2003 से यहाँ मध्य लंदन में अगर कोई पेट्रोल-डीजल से चलने वाला वाहन प्रवेश करता है तो उसे ये जुर्माना देना पड़ता है। इसी तरह नीदरलैंड में भी भी पर्यावरण की रोकथान के लिए लोग साइकिल चलाते हैं। उनका मकसद 2025 तक सभी वाहनों को बिजली और हाइड्रोजन वाहनों में बदलना है। दिल्ली में चालू हुए सम-विषम योजना को भी प्रदूषण रोकने के लिए चीन और पेरिस जैसे देशों में अपनाया गया है और साथ ही अन्य कोशिशे भी जारी हैं।

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