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एक रात… चार कहानियां: फ्रांस की हैट्रिक, स्पेन की जीत और काबो वर्दे का चमत्कार

फ्रांस ने डेम्बेले की हैट्रिक के दम पर नॉर्वे को 4-1 से हराया, स्पेन ने उरुग्वे को बाहर का रास्ता दिखाया और काबो वर्दे ने अपने पहले ही विश्व कप में इतिहास रच दिया।

गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने One Hundred Years of Solitude में लिखा था, “There is always something left to love.”

शायद यही बात फुटबॉल पर सबसे ज़्यादा लागू होती है। क्योंकि हर विश्व कप में कुछ सपने टूटते हैं, कुछ राष्ट्र इतिहास लिखते हैं, कुछ खिलाड़ी अमर हो जाते हैं और कुछ कहानियाँ ऐसी जन्म लेती हैं जिन्हें स्कोरलाइन से नहीं, भावनाओं से याद रखा जाता है। यह खेल केवल नब्बे मिनट का नहीं होता। यह करोड़ों लोगों की उम्मीदों, पीढ़ियों की तपस्या और एक पूरे राष्ट्र की पहचान का उत्सव होता है। इसीलिए विश्व कप का हर दिन किसी महाकाव्य के नए अध्याय जैसा लगता है।

अब फीफा विश्व कप अपने उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां हर बीतते दिन के साथ कुछ सपने हमेशा के लिए टूटने वाले थे, तो कुछ कहानियां अमर होने जा रही थीं। जैसे-जैसे टूर्नामेंट आगे बढ़ रहा था, कई देशों को अपना सामान समेटकर वतन लौटना पड़ रहा था, जबकि कुछ टीमें इतिहास की नई इबारत लिखने से बस एक कदम दूर थीं। यही विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है; यहां एक टीम की जीत, किसी दूसरी टीम के सपनों की आखिरी शाम भी होती है।

जहाँ एक ओर फ्रांस जैसी दिग्गज टीम ने अपनी ताक़त का शानदार प्रदर्शन किया, वहीं अटलांटिक महासागर के बीच बसे एक छोटे से द्वीप-समूह काबो वर्दे ने पूरी दुनिया को याद दिला दिया कि फुटबॉल में चमत्कार अभी मरे नहीं हैं।

जैसे-जैसे फीफा विश्व कप अपने निर्णायक दौर की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कई देशों की यात्रा समाप्त होती जा रही है। दक्षिण कोरिया, कुराकाओ, स्वीडन और कांगो जैसी टीमों ने आख़िरी मिनट तक संघर्ष किया। वहीं तुर्की जैसी टीमों को अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद उम्मीद से पहले टूर्नामेंट छोड़ना पड़ा।
लेकिन एक बात तय है; इन कुछ हफ़्तों में हर टीम ने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का सम्मान और स्नेह अर्जित किया।

क्या आपने हैती को खेलते देखा?

विश्व कप से बाहर होने के बावजूद उन्होंने ऐसा निडर और आकर्षक फुटबॉल खेला कि हर तटस्थ दर्शक उनका प्रशंसक बन गया। ब्राज़ील, मोरक्को और स्कॉटलैंड जैसी मज़बूत टीमों वाले कठिन ग्रुप में भी उन्होंने अपने स्वाभाविक खेल से किसी के सामने घुटने नहीं टेके। विशेषकर एटलस लायंस के विरुद्ध उनका मुकाबला लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
और यही तो विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

कई देशों के लिए इस मंच तक पहुँचना ही एक सपना होता है।

दूसरी ओर इटली जैसा देश है, जहाँ फुटबॉल केवल खेल नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। कभी अवसर मिले तो नेपल्स की गलियों में जाइए या वहाँ के फुटबॉल इतिहास को पढ़िए। महसूस होगा कि यह खेल वहाँ लोगों की धड़कनों में बसता है। चार बार का विश्व विजेता इटली पिछली दो विश्व कप प्रतियोगिताओं (2018 और 2022) में जगह नहीं बना पाया था, लेकिन इस बार उसने वापसी करते हुए 2026 विश्व कप में अपना स्थान सुनिश्चित किया है। यही विश्व कप की खूबसूरती भी है; यह किसी महान परंपरा को हमेशा के लिए खत्म नहीं होने देता। और इसी वजह से हैती, काबो वर्दे और ऐसे तमाम छोटे देशों को इस मंच पर बेख़ौफ़ खेलते देखना मन को एक अलग ही संतोष देता है।

फ्रांस बनाम नॉर्वे | डेम्बेले का तूफ़ान

अब बात करते हैं आज के पहले मुकाबले की, जो बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप I के अंतर्गत फ्रांस और नॉर्वे के बीच खेला गया। दोनों टीमें अपने शुरुआती दोनों मुकाबले जीतकर पहले ही नॉकआउट चरण में जगह बना चुकी थीं। ऐसे में दोनों कोचों ने जोखिम लेने के बजाय अपने कई प्रमुख खिलाड़ियों को आराम दिया और बेंच स्ट्रेंथ को मौका दिया।

लेकिन फ्रांस की बेंच भी आखिर फ्रांस की ही बेंच थी। मैच की शुरुआती सीटी बजते ही फ्रेंच टीम ने गेंद पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेम्बेले, देज़िरे दोऊ और माइकल ओलिसे लगातार नॉर्वे के गोलपोस्ट पर हमले बोल रहे थे। शुरुआती बीस मिनट के भीतर ही नॉर्वे के गोलकीपर एगिल सेल्विक को कई कठिन बचाव करने पड़े।

लेकिन दबाव कब तक झेला जाता?

बीस मिनट पूरे होने से पहले ही उस्मान डेम्बेले ने दो शानदार गोल दागकर फ्रांस को 2-0 की बढ़त दिला दी। दोनों गोल लगभग किसी कलाकार की पेंटिंग जैसे थे।

दाहिने किनारे से गेंद लेकर भीतर की ओर कट करना, डिफेंडर को पीछे छोड़ना और फिर गेंद को शानदार कर्ल के साथ दूर वाले कॉर्नर में पहुँचा देना, ऐसे गोल किसी भी राइट विंगर का सपना होते हैं। दोनों बार सेल्विक ने पूरा प्रयास किया, लेकिन गेंद केवल उनकी निगाहों के सामने से निकलती हुई जाल में जा समाई।

हालाँकि नॉर्वे ने भी हार नहीं मानी।

डेम्बेले के दूसरे गोल के कुछ ही क्षण बाद क्रिस्टोफ़र ऑसगार्ड ने शानदार व्यक्तिगत प्रयास करते हुए चार फ्रांसीसी खिलाड़ियों को छकाया और माइक मैन्याँ को कोई मौका दिए बिना गेंद गोलपोस्ट में पहुँचा दी। स्कोर 2-1 हो चुका था और स्टेडियम में मौजूद नॉर्वे के समर्थक अपने पारंपरिक ‘वाइकिंग क्लैप’ से पूरी टीम का उत्साह बढ़ाने लगे।

लेकिन फ्रांस की आंधी अभी थमी नहीं थी।

32वें मिनट में एक बार फिर डेम्बेले ने लगभग उसी अंदाज़ में अपना तीसरा गोल दाग दिया। यह केवल हैट्रिक नहीं थी, बल्कि तकनीक, गति और आत्मविश्वास का अद्भुत प्रदर्शन था।

इस हैट्रिक के साथ डेम्बेले 2026 विश्व कप में लियोनेल मेसी और जोनाथन डेविड के बाद हैट्रिक लगाने वाले तीसरे खिलाड़ी बने। साथ ही यह विश्व कप इतिहास के सबसे यादगार पहले हाफ़ प्रदर्शनों में से एक बन गया।

पहले हाफ़ की समाप्ति तक फ्रांस 3-1 से आगे था।

दूसरे हाफ़ में भी फ्रांस ने अपना दबदबा बनाए रखा। इस बार देज़िरे दोऊ ने शानदार फिनिश के साथ टीम का चौथा गोल दाग दिया और मुकाबला पूरी तरह फ्रांस की मुट्ठी में चला गया।

अंतिम सीटी बजते ही स्कोरबोर्ड पर 4-1 चमक रहा था।

तीनों मुकाबले जीतकर फ्रांस ने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और अब अगले दौर में उसका सामना स्वीडन से होगा। वहीं नॉर्वे भी दूसरे स्थान पर रहते हुए नॉकआउट चरण में पहुँच गया, जहाँ उसकी टक्कर आइवरी कोस्ट से होगी।

सेनेगल बनाम इराक | एक रेड कार्ड जिसने मैच की दिशा बदल दी

उधर, टोरंटो में इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में अफ्रीका की मजबूत टीम सेनेगल का सामना इराक से था। दोनों टीमों के लिए यह मुकाबला प्रतिष्ठा के साथ-साथ उम्मीदों की आख़िरी डोर भी था। शुरुआती दो मैचों में निराशाजनक प्रदर्शन के कारण दोनों लगभग टूर्नामेंट से बाहर मानी जा रही थीं, लेकिन फुटबॉल में अंतिम सीटी बजने से पहले कोई कहानी पूरी नहीं होती।

सेनेगल ने शुरुआत से ही आक्रामक तेवर अपनाए।

मैच के चौथे ही मिनट में मिले कॉर्नर पर हबीब दियारा ने शानदार हेडर लगाकर गेंद को सीधे जाल में पहुँचा दिया। शुरुआती बढ़त ने सेनेगल का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया, जबकि इराक पर दबाव साफ़ दिखाई देने लगा। लेकिन असली मोड़ आया तेरहवें मिनट में।

इराकी डिफेंडर रेबिन सुलाका ने एक बेहद लापरवाह और खतरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। अब इराक को लगभग अस्सी मिनट तक दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था। किसी भी टीम के लिए यह किसी पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन काम होता है।

इसके बावजूद इराक ने पहले हाफ़ में अनुशासित रक्षण का परिचय दिया। दस खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद उन्होंने सेनेगल को लगातार गोल करने से रोके रखा। पहला हाफ़ समाप्त होने तक स्कोर 1-0 ही था और इराक अभी भी मुकाबले में बना हुआ था।

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही सेनेगल के कोच ने एक साथ चार बदलाव किए। यही फैसला मैच का निर्णायक क्षण साबित हुआ।

नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतरी सेनेगल की टीम ने मानो आक्रमण की रफ्तार कई गुना बढ़ा दी। अगले पच्चीस मिनट के भीतर उन्होंने लगातार तीन गोल दागकर स्कोर 4-0 कर दिया। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित किया पापे गुएये ने, जिन्होंने दो बेहतरीन गोल किए। उनकी टाइमिंग, मूवमेंट और फिनिशिंग ने इराकी रक्षा पंक्ति को पूरी तरह बिखेर दिया। दस खिलाड़ियों के साथ संघर्ष कर रही इराकी टीम अब मानसिक रूप से भी टूटती दिखाई दे रही थी।
फिर भी सेनेगल यहीं नहीं रुका।

उन्होंने आख़िरी मिनट तक वही तीव्रता बनाए रखी और लगातार इराकी गोलपोस्ट पर हमले करते रहे। मैच समाप्त होने से पहले उन्होंने एक और गोल जोड़ दिया और अंतिम स्कोर 5-0 पर जा पहुँचा। यह जीत केवल तीन अंक भर नहीं थी। यह सेनेगल की आक्रामक क्षमता का भी प्रदर्शन थी।

हालाँकि ग्रुप की दूसरी भिड़ंत में फ्रांस की जीत के कारण फ्रांस और नॉर्वे ने सीधे अगले दौर में जगह बना ली। नॉर्वे अब राउंड ऑफ़ 32 में आइवरी कोस्ट से भिड़ेगा, जबकि सेनेगल की उम्मीदें अब दूसरे ग्रुपों के परिणामों पर टिकी थीं। अगले चौबीस घंटों में तय होना था कि उनका सफ़र यहीं समाप्त होगा या अभी कहानी में एक और मोड़ बाकी है।

स्पेन बनाम उरुग्वे | अनुभव बनाम जिद

भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े पाँच बजे ग्रुप H के दो मुकाबले शुरू हुए। एक ओर ग्वाडलाहारा में स्पेन का सामना मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे से था। दूसरी ओर, ह्यूस्टन में काबो वर्दे और सऊदी अरब आमने-सामने थे। इन दोनों मैचों पर पूरे ग्रुप की तस्वीर टिकी हुई थी।

स्पेन और उरुग्वे से एक-एक अंक हासिल कर चुकी काबो वर्दे की टीम इतिहास रचने से केवल एक कदम दूर थी। यदि वह सऊदी अरब से हारने से बच जाती और उधर उरुग्वे स्पेन के खिलाफ जीत दर्ज नहीं कर पाता, तो पहली बार विश्व कप के नॉकआउट चरण में पहुँचने का सपना सच हो जाता।

दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के सामने भी एक बेहद कठिन लेकिन संभव समीकरण था। अगर वह काबो वर्दे को हरा देता और उरुग्वे स्पेन के खिलाफ़ अंक हासिल कर लेता, तो कहानी पूरी तरह बदल सकती थी। यही गणित दोनों मैदानों पर एक साथ खेला जा रहा था।

स्पेन ने 4-3-3 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। उरुग्वे के तेज़ और शारीरिक खेल को ध्यान में रखते हुए कोच ने मार्कोस ल्योरेंटे को प्राथमिकता दी, जबकि मिडफ़ील्ड में मिकेल मेरिनो को मौका मिला। यह बदलाव शुरुआत से ही स्पेन के खेल में दिखाई भी दिया।

मैच की पहली सीटी के साथ उरुग्वे ने अपनी पहचान के अनुरूप बेहद आक्रामक और फिजिकल फुटबॉल खेलना शुरू किया। शुरुआती कुछ मिनटों तक स्पेन दबाव में दिखाई दिया, लेकिन धीरे-धीरे उसने गेंद पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। दोनों टीमें लगातार मौके बना रही थीं, लेकिन दोनों ओर रक्षण भी उतना ही मजबूत था। ऐसा लग रहा था कि पहला हाफ़ बिना गोल के समाप्त होगा।

लेकिन 42वें मिनट में स्पेन ने वह दरवाज़ा खोल दिया जिसकी उसे तलाश थी।

दाहिने फ्लैंक से मार्कोस ल्योरेंटे ने सटीक क्रॉस भेजा। बॉक्स के भीतर मौजूद एलेक्स बाएना ने उरुग्वे के दो डिफेंडरों के बीच से शानदार शॉट लगाया। गोलकीपर फर्नांडो मुसलेरा गेंद को रोक तो पाए, लेकिन उसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सके। गेंद उनके हाथों से फिसलती हुई गोललाइन पार कर गई।

स्पेन ने बढ़त बना ली थी।

उरुग्वे की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। पहले हाफ़ की समाप्ति से ठीक पहले मैनुएल उगार्ते चोटिल हो गए और उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। उनकी जगह निकोलस डे ला क्रूज़ को उतारा गया।

लेकिन क्या यह बदलाव मैच की दिशा बदल पाएगा?

दूसरा हाफ़: उरुग्वे की आख़िरी जंग

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही यह साफ़ हो गया कि उरुग्वे अब खोने के लिए नहीं, लड़ने के लिए मैदान में उतरा है। स्पेन की कोशिश थी कि गेंद को अधिक से अधिक समय अपने कब्ज़े में रखा जाए और खेल की रफ़्तार अपने अनुसार नियंत्रित की जाए। दूसरी ओर उरुग्वे के सामने केवल एक ही रास्ता था, जल्द से जल्द बराबरी का गोल।

क्योंकि उसी समय ह्यूस्टन में खेले जा रहे दूसरे मुकाबले में काबो वर्दे सत्तर मिनट बीत जाने के बाद भी सऊदी अरब को गोल करने से रोक चुका था। अगर दोनों मैचों के नतीजे ऐसे ही रहते, तो उरुग्वे का विश्व कप अभियान यहीं समाप्त हो जाता।

यही बेचैनी अब उनके हर आक्रमण में दिखाई देने लगी थी।

मैक्सिमिलियानो अराउजो लगातार बाएँ छोर से स्पेनिश रक्षा पंक्ति को चुनौती दे रहे थे। उनके क्रॉस और तेज़ रन बार-बार स्पेन के डिफेंडरों की परीक्षा ले रहे थे। दूसरी ओर उनाई सिमोन लगातार एकाग्रता के साथ अपने गोलपोस्ट की रक्षा कर रहे थे। कई मौकों पर उन्होंने शानदार बचाव करते हुए स्पेन की बढ़त बरकरार रखी।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, उरुग्वे की हड़बड़ाहट बढ़ती चली गई।

आख़िरी बीस मिनटों में मैच पूरी तरह भावनाओं और दबाव का खेल बन चुका था। स्पेन गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, जबकि उरुग्वे हर कीमत पर बराबरी चाहता था।

इसी बीच स्पेन के पास मैच समाप्त करने का सुनहरा अवसर आया। फेरान टोरेस गोलकीपर के सामने लगभग अकेले थे, लेकिन उनका शॉट उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा और मुसलेरा ने राहत की साँस ली। यह मौका चूकने के बाद भी स्पेन ने संयम नहीं खोया।

दूसरी ओर उरुग्वे का धैर्य अब जवाब देने लगा था।

मैच के अंतिम क्षणों में अगुस्तीन कानोबियो ने युवा डिफेंडर पाऊ कुबार्सी पर बेहद ख़तरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना देर किए उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। निर्णय से नाराज़ कानोबियो कुछ देर तक रेफरी से बहस करते रहे, लेकिन फैसला बदलने वाला नहीं था।

अब उरुग्वे की उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं। कुछ ही मिनट बाद अंतिम सीटी बजी और स्पेन ने यह मुकाबला 1-0 से अपने नाम कर लिया। तीनों मैचों में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पेन ग्रुप में शीर्ष स्थान के साथ अगले दौर में पहुँच गया। उधर, कभी विश्व फुटबॉल की सबसे बड़ी ताक़तों में गिने जाने वाले मार्सेलो बिएल्सा के उरुग्वे का सफ़र एक बार फिर ग्रुप चरण में ही समाप्त हो गया।

वहीं… एक छोटे-से द्वीप ने इतिहास लिख दिया

लेकिन उस समय ग्वाडलाहारा से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर ह्यूस्टन में किसी और कहानी का जन्म हो रहा था। काबो वर्दे के खिलाड़ी अपने मैच के अंतिम क्षणों में बार-बार मोबाइल फोन और स्टेडियम की बड़ी स्क्रीन की ओर देख रहे थे। उनकी निगाहें अब अपने मुकाबले पर नहीं, स्पेन और उरुग्वे के स्कोर पर टिकी थीं।

जैसे ही ग्वाडलाहारा से अंतिम सीटी बजने की खबर पहुँची, पूरा स्टेडियम मानो भावनाओं से भर उठा। काबो वर्दे ने कर दिखाया था।

अटलांटिक महासागर के बीच बसे इस छोटे-से द्वीपीय राष्ट्र ने अपने पहले ही फीफा विश्व कप में नॉकआउट चरण में जगह बना ली थी। खिलाड़ी एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे। कोई घुटनों के बल बैठ गया।

कोई आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। यह केवल एक ड्रॉ नहीं था। यह वर्षों के संघर्ष, सीमित संसाधनों और अनगिनत सपनों की जीत थी।

कुछ ही क्षण बाद कैमरा काबो वर्दे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा पर गया। उनकी आँखें नम थीं। फिर प्रसारण में स्टैंड्स में बैठी उनकी माँ दिखाई दीं, जो खुशी से झूम रही थीं।

इसके बाद कैमरा सीधे काबो वर्दे की राजधानी प्राइया पहुँचा। सड़कों पर हजारों लोग जश्न मना रहे थे। ढोल बज रहे थे। राष्ट्रीय ध्वज हवा में लहरा रहे थे।

लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। शायद पूरे देश ने पहली बार महसूस किया कि विश्व फुटबॉल अब केवल बड़े देशों का मंच नहीं रहा। मैदान पर खिलाड़ी अपने कोच बूबिस्ता को कंधों पर उठाकर हवा में उछाल रहे थे। बूबिस्ता के चेहरे पर वर्षों की मेहनत का संतोष साफ़ दिखाई दे रहा था।

कहा जाता है कि बचपन में उन्होंने अपने गाँव में एक छोटे-से टेलीविज़न पर डिएगो माराडोना और लोथार मथायस को खेलते देखा था। वहीं से उन्होंने एक दिन अपने देश को विश्व कप तक पहुँचाने का सपना देखा।

वर्षों बाद वही सपना आज हक़ीक़त बन चुका था। यह विश्व कप के लिए काबो वर्दे का सातवाँ क्वालिफिकेशन प्रयास था। पहली बार वे सफल हुए। और पहली ही बार में उन्होंने नॉकआउट चरण में जगह बनाकर इतिहास रच दिया।

फुटबॉल बार-बार हमें यही सिखाता है; कभी-कभी चमत्कार भी मेहनत का दूसरा नाम होते हैं। लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

अब अगले दौर में काबो वर्दे के सामने विश्व विजेता अर्जेंटीना थी। मियामी में एक ओर होंगे लियोनेल आंद्रेस मेसी.. दूसरी ओर होंगे वोजिन्हा। एक तरफ़ विश्व फुटबॉल का सबसे बड़ा सितारा। दूसरी तरफ़ एक ऐसे छोटे देश का सपना, जिसने दुनिया को यकीन दिलाया कि साहस का कोई आकार नहीं होता।

क्या काबो वर्दे एक और उलटफेर कर पाएगा? या फिर अर्जेंटीना की ताक़त इस खूबसूरत कहानी का अंत लिख देगी? इन सवालों का जवाब हमें अगले दौर में मिलेगा।

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गौरव बडोला
गौरव बडोला
दिन में दिहाड़ी करता हूं, रात को कोरे कागज़ पर अपने ख्वाबों की दुनिया बुनता हूं। फुटबॉल और साहित्य को जीता हूं।

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