फुटबॉल में सबसे ख़तरनाक टीम वह नहीं होती जिसके पास सबसे बड़े सितारे हों। सबसे ख़तरनाक टीम वह होती है, जिसे हारने का डर नहीं होता। विश्व कप का इतिहास बार-बार यही सिखाता आया है कि नॉकआउट फुटबॉल में प्रतिष्ठा, इतिहास और ट्रॉफियाँ केवल कागज़ पर लिखी बातें हैं। मैदान पर अंततः वही टीम जीतती है जो अंतिम सीटी तक उम्मीद नहीं छोड़ती।
एक ऐतिहासिक जापानी एनीमे सीरीज़ है, Neon Genesis Evangelion। उसमें एक यादगार किरदार है मिसातो कात्सुरागी। इस सीरीज़ में वह कहती हैं, “Giving up halfway is worse than never trying at all.” अर्थात, बीच रास्ते हार मान लेना, कभी कोशिश ही न करने से भी अधिक बुरा है।
बीती रात और आज खेले गए फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 32 के मुकाबलों ने इस एक पंक्ति को बार-बार सच साबित किया। कहीं आख़िरी मिनट में वापसी हुई, कहीं इतिहास बदल गया और कहीं हारने वाली टीम भी पूरे विश्व का दिल जीतकर मैदान से बाहर निकली। फुटबॉल के लिहाज़ से यह सिर्फ़ एक नॉकआउट राउंड ना होकर साहस, धैर्य और उम्मीद का उत्सव था।
इस कहानी की शुरुआत होती है ह्यूस्टन से, जहाँ पाँच बार की विश्व विजेता ब्राज़ील के सामने थी एशिया की सबसे अनुशासित और निडर टीम- जापान।
सबसे पहले बीती रात ह्यूस्टन के स्टेडियम में ब्राज़ील का सामना एशियाई महाद्वीप के ‘जाएंट स्लेयर’ जापान से था। स्टेडियम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे। पीली जर्सियाँ पहने ब्राज़ीलियाई समर्थक अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँचे थे, जबकि जापान इतिहास रचने की उम्मीद के साथ मैदान में उतरा था।
मैच शुरू होते ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। दोनों की कोशिश थी कि शुरुआती बढ़त हासिल कर मुकाबले को अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक जाने से रोका जाए। पहले हाफ में जापान ने अपेक्षाकृत अधिक संगठित और आत्मविश्वास भरा खेल दिखाया। उसके खिलाड़ी लगातार ब्राज़ील पर दबाव बनाए रखते रहे।
मैच के 29वें मिनट में 25 वर्षीय काएशू सानो ने शानदार गोल दागकर जापान को 1-0 की बढ़त दिला दी। यह जापान की राष्ट्रीय टीम के लिए उनका पहला अंतरराष्ट्रीय गोल था। विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में, वह भी ब्राज़ील जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ, अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए पहला गोल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए अविस्मरणीय क्षण होता। गोल होते ही स्टेडियम में सनसनी फैल गई।
इसके बाद विनीसियस जूनियर और उनके साथी खिलाड़ियों ने लगातार बराबरी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन जापान ने अनुशासित रक्षात्मक खेल का शानदार प्रदर्शन किया। गोलकीपर सुज़ुकी ने भी कई अहम बचाव करते हुए ब्राज़ील को निराश किया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 से जापान के पक्ष में रहा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का पीला समंदर चिंता में डूबा दिखाई दे रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही ब्राज़ील पूरी तरह बदली हुई टीम की तरह मैदान पर उतरा। खिलाड़ियों की ऊर्जा, आक्रामकता और प्रतिबद्धता पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही थी। इसका असर भी ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करवाता।
अनुभवी मिडफील्डर कैसेमीरो ने जापानी रक्षा पंक्ति को चकमा देते हुए एक शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और ब्राज़ील ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली। पूरे स्टेडियम में फिर से जान लौट आई।
इसके बाद मुकाबला लगातार रोमांचक होता गया। ब्राज़ील ने आक्रमणों की रफ्तार और तेज कर दी, जबकि जापानी खिलाड़ी पूरे समर्पण के साथ रक्षा करते रहे। सुज़ुकी लगातार बेहतरीन बचाव करते हुए अपनी टीम को मुकाबले में बनाए हुए थे। समय बीतने के साथ ऐसा लगने लगा कि मैच अतिरिक्त समय में जाएगा।
लेकिन फुटबॉल का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। ब्राज़ील लगातार हमले कर रहा था। दाएँ फ्लैंक से आया एक आक्रमण जापानी रक्षा पंक्ति से टकराकर उछला और गेंद जर्सी नंबर 22 पहने गैब्रिएल मार्टिनेली के सामने आ गिरी। उनके सामने दो जापानी डिफेंडर मौजूद थे। मार्टिनेली ने एक पल भी गंवाए बिना शानदार नियंत्रण दिखाया और गोलकीपर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के दाएँ कोने में पहुँचा दिया।
ह्यूस्टन का स्टेडियम खुशी से गूंज उठा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का उत्साह चरम पर था। कुछ ही मिनट बाद रेफरी ने अंतिम सीटी बजाई और ब्राज़ील ने 2-1 से मुकाबला जीतकर अगले दौर (राउंड ऑफ 16) में अपनी जगह पक्की कर ली।
उधर, जापानी खिलाड़ियों के चेहरों पर निराशा साफ झलक रही थी। कई खिलाड़ियों की आँखें नम थीं। उनके समर्थकों के लिए भी यह हार बेहद भावुक करने वाली थी। मैच समाप्त होते ही मुख्य कोच हाजिमे मोरियासु मैदान पर पहुँचे और अपने खिलाड़ियों को गले लगाकर उनके साहस, अनुशासन और जुझारूपन की सराहना की। स्टैंड्स में मौजूद जापानी समर्थकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी टीम का उत्साह बढ़ाया। जवाब में खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने झुककर अपने समर्थकों का अभिवादन किया।
दरअसल, जापान के लिए यह विश्व कप शुरू होने से पहले ही चुनौतियों से भर गया था। टूर्नामेंट से पहले उसके कई प्रमुख खिलाड़ी चोटों से जूझ रहे थे। काओरू मितोमा और ताकुमी मीनामिनो पहले ही बाहर हो चुके थे। टूर्नामेंट शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले कप्तान वातारू एंडो भी चोटिल होकर पूरी प्रतियोगिता से बाहर हो गए। इसके बाद स्टार खिलाड़ी टाकेफुसा कुबो भी पहले ही मैच के दौरान चोटिल हो गए और आगे नहीं खेल सके।
इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जापान ने जिस साहस, अनुशासन और सामूहिक खेल का प्रदर्शन किया, उसने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का दिल जीत लिया। वे भले ही यह मुकाबला हारकर घर लौटेंगे, लेकिन अपने प्रदर्शन से उन्होंने सम्मान, प्रशंसा और असंख्य शुभकामनाएँ जरूर अर्जित कर ली हैं।
आज खेले गए राउंड ऑफ 32 के बाकी तीनों मुकाबले किसी बेहतरीन मलयाली क्राइम थ्रिलर से कम रोमांचक नहीं थे। ब्राज़ील को जापान के खिलाफ अंतिम क्षणों तक संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वह तो मानो इस नाटकीय दिन की भूमिका भर थी। असली कहानी अभी बाकी थी।
अगला मुकाबला बोस्टन में खेला जाना था, जहाँ चार बार की विश्व विजेता और खिताब की प्रबल दावेदार जर्मनी का सामना दक्षिण अमेरिकी टीम पराग्वे से था।
मुख्य कोच जूलियन नागेल्समान ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। पिछले मुकाबले में इक्वाडोर से मिली हार को पीछे छोड़ते हुए जर्मनी जीत के साथ क्वार्टर फाइनल में जगह बनाना चाहता था। दूसरी ओर पराग्वे की टीम पर किसी तरह का अतिरिक्त दबाव नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी थी और जानती थी कि यदि उसने शुरुआती दबाव झेल लिया, तो जर्मनी की बेचैनी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
मैच की शुरुआत अपेक्षा के अनुरूप हुई। जर्मनी ने गेंद पर नियंत्रण बनाए रखा और लगातार छोटे-छोटे पासों के जरिए खेल को आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन उसके अधिकांश आक्रमण अंतिम तिहाई तक पहुँचते-पहुँचते बिखर जाते। पराग्वे ने अपनी रक्षापंक्ति को बेहद अनुशासित रखा और जर्मन खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया।
जर्मनी के पास गेंद जरूर अधिक थी, लेकिन उसके खेल में वह धार दिखाई नहीं दे रही थी जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। पेनाल्टी बॉक्स के आसपास पहुँचने के बाद भी निर्णायक पास और सटीक फिनिशिंग का अभाव साफ़ नज़र आ रहा था। दूसरी ओर पराग्वे हर अवसर का धैर्यपूर्वक इंतज़ार कर रहा था।
फिर आया मैच का 42वाँ मिनट।
पराग्वे को कॉर्नर किक मिली। गेंद बॉक्स के भीतर पहुँची और महज़ साढ़े पाँच फ़ुट लंबे 22 वर्षीय जूलियो इनसिसो ने ऊँची छलांग लगाते हुए शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और पराग्वे ने 1-0 की अप्रत्याशित बढ़त हासिल कर ली।
गोल होते ही पराग्वे के खिलाड़ी खुशी से झूम उठे, जबकि जर्मन डगआउट में सन्नाटा पसर गया। स्टेडियम में मौजूद हजारों जर्मन समर्थक कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए। पहले हाफ की समाप्ति तक यही स्कोर बना रहा।
हाफ टाइम के दौरान नागेल्समान अपने खिलाड़ियों से लंबी चर्चा करते दिखाई दिए। स्पष्ट था कि अब केवल गेंद पर कब्ज़ा बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा। जर्मनी को परिणाम चाहिए था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही जर्मन टीम ने अपने खेल की गति बढ़ा दी। लगातार दबाव का असर आखिरकार 56वें मिनट में दिखाई दिया। फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने शानदार विज़न का परिचय देते हुए सटीक पास काई हावर्ट्ज़ तक पहुँचाया। हावर्ट्ज़ ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया और जर्मनी ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली।
इसके बाद ऐसा लगा कि अब मैच पूरी तरह जर्मनी की ओर झुक जाएगा। लेकिन पराग्वे ने हार नहीं मानी। उसकी पूरी टीम एकजुट होकर रक्षण करती रही। जर्मनी लगातार गोल की तलाश में आक्रमण करता रहा, लेकिन हर बार पराग्वे का कोई न कोई खिलाड़ी उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। कई मौकों पर जर्मनी बेहद करीब पहुँचा, लेकिन अंतिम स्पर्श या तो चूक गया या फिर पराग्वे की रक्षापंक्ति ने खतरे को टाल दिया।
90 मिनट का निर्धारित समय समाप्त हुआ और स्कोर 1-1 पर बराबर रहा। मुकाबला अतिरिक्त समय में पहुँच गया।
एक्स्ट्रा टाइम शुरू होते ही पराग्वे ने रणनीतिक बदलाव किया। अनुभवी मिडफील्डर मिगुएल अलमिरोन को बाहर बुलाकर एक अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतारा गया। संदेश बिल्कुल साफ़ था; अब हर हाल में मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक ले जाना है।
दूसरी ओर जर्मनी किसी भी कीमत पर शूटआउट से बचना चाहता था।
जोशुआ किमिख, निक वोल्टेमाडे, फ्लोरियन विर्ट्ज़ और काई हावर्ट्ज़ लगातार अवसर बनाने की कोशिश करते रहे। गेंद बार-बार पराग्वे के पेनाल्टी क्षेत्र में पहुँचती, लेकिन हर बार कोई न कोई लाल-सफेद जर्सी उसके सामने आ खड़ी होती। पराग्वे का सामूहिक रक्षण पूरे मुकाबले में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा।
एक अवसर पर काई हावर्ट्ज़ ने फिर शानदार हेडर लगाया, लेकिन वह भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। धीरे-धीरे अतिरिक्त समय भी समाप्ति की ओर बढ़ा। पूरे 120 मिनट बीत गए, लेकिन दोनों टीमें एक-दूसरे की बराबरी पर रहीं।
अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।
पहली कुछ पेनाल्टियों के बाद मुकाबला बराबरी पर चलता रहा, लेकिन फिर दबाव ने जर्मनी का साथ छोड़ दिया। काई हावर्ट्ज़, निक वोल्टेमाडे और जोनाथन ताह अपनी-अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील नहीं कर सके। दूसरी ओर पराग्वे ने संयम बनाए रखा और आखिरकार शूटआउट 4-3 से अपने नाम कर लिया।
अंतिम पेनाल्टी गोल में जाते ही पराग्वे के खिलाड़ी मैदान पर दौड़ पड़े। बेंच से पूरा कोचिंग स्टाफ खुशी में मैदान के भीतर आ गया। खिलाड़ियों की आँखों में अविश्वास और खुशी एक साथ दिखाई दे रही थी। उन्होंने विश्व फुटबॉल की सबसे सफल टीमों में से एक को विश्व कप से बाहर कर दिया था।
इसके साथ ही एक नया इतिहास भी दर्ज हुआ।
यह पहली बार था जब जर्मनी विश्व कप के किसी पेनाल्टी शूटआउट में पराजित हुआ। वर्षों तक शूटआउट में अजेय रहने वाली जर्मन टीम आखिरकार इस बार दबाव के आगे टिक नहीं सकी।
मैच के बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रशंसकों ने मज़ाकिया अंदाज़ में इसे ‘मेसुत ओज़िल का श्राप’ तक कहना शुरू कर दिया। हालांकि यह केवल प्रशंसकों की प्रतिक्रिया थी, लेकिन इतना तय है कि लगातार तीसरे विश्व कप में अपेक्षाकृत कमज़ोर मानी जा रही टीम के हाथों जर्मनी की विदाई उसके फुटबॉल ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़े करेगी।
कप्तान जोशुआ किमिख सहित कई वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए यह शायद विश्व कप का आख़िरी अध्याय साबित हो। आने वाले वर्षों में जर्मन फुटबॉल को बड़े बदलावों से गुजरना पड़ सकता है।
उधर, पराग्वे में जश्न का माहौल था। खिलाड़ियों ने अपने समर्थकों के साथ इस ऐतिहासिक जीत का भरपूर उत्सव मनाया। विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास, प्रतिष्ठा और पिछले रिकॉर्ड तभी तक मायने रखते हैं, जब तक रेफरी पहली सीटी नहीं बजाता।
अब बारी थी दिन के तीसरे और अंतिम मुकाबले की। मेक्सिको के नुएवो लिओन प्रांत के खूबसूरत स्टेडियम में नीदरलैंड्स और मोरक्को आमने-सामने थे। एक ओर युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण लिए टीम ओरांजे थी, तो दूसरी ओर वह मोरक्को, जिसने पिछले कुछ वर्षों में अपने जुझारू खेल से दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में खास जगह बना ली थी। ‘एटलस लायंस’ के नाम से मशहूर यह टीम एक और बड़े उलटफेर के इरादे से मैदान में उतरी थी।
रेफरी की सीटी बजते ही मुकाबले की शुरुआत हुई। शुरुआती कुछ मिनटों में नीदरलैंड्स ने आक्रामक रुख अपनाया और मोरक्को के पाले में लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ा, मोरक्को ने लय पकड़नी शुरू कर दी। उसके खिलाड़ी आत्मविश्वास के साथ गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने लगे और धीरे-धीरे खेल की रफ्तार अपनी शर्तों पर तय करने लगे।
पहले हाफ में दोनों टीमों ने कुछ अच्छे मौके बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। मोरक्को का मिडफील्ड लगातार गेंद पर नियंत्रण बनाए हुए था, जबकि नीदरलैंड्स जवाबी हमलों के जरिए अवसर तलाश रहा था। निर्धारित 45 मिनट समाप्त होने तक स्कोर 0-0 ही रहा, लेकिन मैच का रोमांच लगातार बढ़ता जा रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के बाद भी मुकाबले का स्वरूप बहुत अधिक नहीं बदला। मोरक्को ने गेंद पर अपना प्रभाव बनाए रखा और लगातार डच रक्षा पंक्ति को परखता रहा। दूसरी ओर नीदरलैंड्स अपेक्षाकृत नीरस और बिखरा हुआ फुटबॉल खेलता दिखाई दिया। उसकी ओर से वह धार नज़र नहीं आ रही थी जिसने पूरे टूर्नामेंट में उसे खिताब का दावेदार बनाया था।
डच गोलकीपर ने हालांकि कुछ बेहद महत्वपूर्ण बचाव किए और अपनी टीम को मुकाबले में बनाए रखा। ऐसा लगने लगा था कि यदि किसी टीम को गोल मिलेगा तो वह मोरक्को होगी।
लेकिन फुटबॉल अक्सर वही कहानी लिखता है जिसकी सबसे कम उम्मीद होती है।
72वें मिनट में नीदरलैंड्स ने तेज़ जवाबी हमला बोला। गेंद को तेजी से आगे बढ़ाया गया और आखिरकार कोडी गाक्पो ने सटीक फिनिश करते हुए नीदरलैंड्स को 1-0 की बढ़त दिला दी।
गोल होते ही उनके साथी खिलाड़ी खुशी से उनकी ओर दौड़े, लेकिन गाक्पो की आँखों में मुस्कान नहीं थी। वह भावुक होकर मैदान पर रो पड़े। दरअसल, कुछ ही दिन पहले गाक्पो और उनकी साथी ने अपने अजन्मे शिशु को खो दिया था। उस निजी पीड़ा के बीच विश्व कप के मंच पर आया यह गोल उनके लिए केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि गहरे व्यक्तिगत भावनाओं का विस्फोट भी था। उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें घेर लिया और पूरे स्टेडियम में कुछ क्षणों के लिए एक अलग ही भावनात्मक वातावरण बन गया।
इसके बाद मुकाबला और तेज़ हो गया। मोरक्को ने बराबरी के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लगातार हमले होने लगे और डच खिलाड़ी अपनी बढ़त बचाने में जुट गए। समय तेजी से बीत रहा था और ऐसा लगने लगा था कि नीदरलैंड्स किसी तरह यह मुकाबला जीत लेगा।
लेकिन फिर आया इंजरी टाइम।
90+1वें मिनट में मोरक्को ने शानदार मूव तैयार किया। तेज़ पासिंग के बाद गेंद डच पेनाल्टी बॉक्स में पहुँची और उसे गोल में बदल दिया गया। स्कोर 1-1 हो गया। पूरे स्टेडियम में मौजूद मोरक्को के समर्थक खुशी से झूम उठे, जबकि नीदरलैंड्स के खिलाड़ियों के चेहरे पर अविश्वास साफ दिखाई दे रहा था।
निर्धारित समय समाप्त हुआ और मुकाबला अतिरिक्त समय में चला गया।
एक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने जीत हासिल करने की पूरी कोशिश की। मोरक्को का आत्मविश्वास बढ़ चुका था, जबकि नीदरलैंड्स लगातार दबाव में दिखाई दे रहा था। दोनों ओर से कुछ अवसर बने, लेकिन कोई भी निर्णायक साबित नहीं हुआ। 120 मिनट पूरे होने के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।
शूटआउट शुरू हुआ। दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी से पेनाल्टी लेने लगे। लेकिन इस बार मोरक्को के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी यासीन बोनू एक बार फिर दीवार बनकर खड़े हो गए। उनके शानदार बचावों ने नीदरलैंड्स की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
आखिरकार मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट 3-2 से जीत लिया और लगातार एक और यूरोपीय दिग्गज को विश्व कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
कई लोग इसे दिन का एक और बड़ा उलटफेर कहेंगे, लेकिन जिसने पूरा मुकाबला देखा होगा, वह शायद इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत न हो। मोरक्को ने अधिकांश समय खेल की गति नियंत्रित रखी, गेंद पर बेहतर पकड़ दिखाई और पूरे मुकाबले में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ खेलता नज़र आया। उसके प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि यह जीत किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरे 120 मिनट के अनुशासित और धैर्यपूर्ण खेल का पुरस्कार थी।
इस हार के साथ नीदरलैंड्स का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया, जबकि मोरक्को लगातार दूसरी बार फुटबॉल जगत को यह याद दिलाने में सफल रहा कि अब उसे केवल ‘डार्क हॉर्स’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
खैर, अब नज़रें आज रात खेले जाने वाले मुकाबलों पर होंगी।
भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डलास में कोटे डी आइवोर का सामना नॉर्वे से होगा। नॉर्वे के पास एरलिंग हालांड की अगुवाई में बेहद मजबूत आक्रमण है, जबकि कोटे डी आइवोर पूरे टूर्नामेंट में अपने जुझारूपन और आक्रामक तेवर से प्रभावित करता आया है। ऐसे में यह मुकाबला किसी भी दिशा में जा सकता है।
इसके बाद भारतीय समयानुसार रात ढाई बजे फ्रांस और स्वीडन आमने-सामने होंगे। न्यू जर्सी में खेले जाने वाले इस मुकाबले में दोनों टीमों के पास कई खतरनाक गोल स्कोरर मौजूद हैं। हालांकि फ्रांस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। पिछले मुकाबले में उस्मान डेंबेले ने मात्र 32 मिनट के भीतर हैट्रिक लगाकर यह बता दिया था कि उन्हें थोड़ी-सी भी जगह देना किसी भी टीम के लिए कितना महंगा साबित हो सकता है। स्वीडन को यदि क्वार्टर फाइनल में पहुँचना है तो उसकी रक्षापंक्ति को पूरे मुकाबले में लगभग त्रुटिहीन प्रदर्शन करना होगा।
इसके बाद अपने घरेलू समर्थकों के बीच मेक्सिको का सामना उस इक्वाडोर से होगा जिसने पिछले दौर में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को बाहर का रास्ता दिखाकर पूरे फुटबॉल जगत को चौंका दिया था। भारतीय समयानुसार यह मुकाबला कल सुबह साढ़े छह बजे खेला जाएगा। इक्वाडोर ने पिछले दौर में अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, जबकि मेक्सिको को घरेलू दर्शकों का भरपूर समर्थन मिलेगा। ऐसे में यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है।
अब तक इस विश्व कप ने एक बात पूरी तरह स्पष्ट कर दी है; यह बड़े नामों का नहीं, बल्कि बड़े जज़्बे का टूर्नामेंट बन चुका है।
इक्वाडोर, पराग्वे और मोरक्को जैसी टीमों ने दिखा दिया है कि यदि विश्वास, अनुशासन और साहस साथ हों तो फुटबॉल के सबसे मजबूत किले भी ढहाए जा सकते हैं। इन टीमों का प्रदर्शन काबो वर्दे जैसी अन्य उभरती टीमों के लिए भी प्रेरणा बनेगा कि विश्व कप में कोई भी मुकाबला पहले से तय नहीं होता।
यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
यहाँ अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी संभव है।
वीवा ला फुटबॉल।


