Monday, July 4, 2022
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‘1.5 करोड़ बच्चे औरंगजेब के बनवाए सिलेबस पर चल रहे’: मदरसा का महिमामंडन कर रहा था ‘पत्रकार’, NCPCR के मुखिया ने लगाई क्लास

“1.5 करोड़ से ज़्यादा बच्चों का वहाँ रखा गया है, जो औरंगज़ेब के बनवाए पाठ्यक्रम को मानते हैं। यह अधिकारिक रिपोर्ट का लिंक है। पत्रकार हैं, अध्ययन कर लीजिए। तार्किक बात करेंगे तो ट्रक के पीछे लिखी शायरी याद नहीं करनी पड़ेगी।”

हाल ही में ‘स्वतंत्र पत्रकार’ रणविजय सिंह को ट्विटर पर मदरसों का महिमामंडन करते देखा गया। जिसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने उसकी खिंचाई की।

रणविजय ने सोमवार (23 मई 2022) को एक ट्वीट में कहा कि मदरसा एक सामान्य स्कूल ही है, इसके अलावा और कुछ नहीं। उसने लिखा, “मदरसा का मतलब विद्यालय/ पाठशाला/ स्कूल होता है। मदरसा में इतिहास, नागरिक शास्त्र, गणित, विज्ञान और उर्दू/अंग्रेजी/हिंदी भी पढ़ाया जाता है। मदरसा से पढ़कर बच्चे IAS भी बनते हैं, आगे भी बनेंगे। अरबी शब्द देखकर कान खड़े मत कीजिए, थोड़ा पढ़िए-पढ़ाइए और पढ़ने दीजिए।”

‘पत्रकार’ के इस ट्वीट पर प्रियंक कानूनगो ने प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि मदरसा के नाम पर बच्चों को बुनियादी तालीम से वंचित करना उनके बाल अधिकार का हनन है,संविधान के अनुच्छेद 21 ‘क’ की अवहेलना है और वह जो कर रहे हैं वो झूठ का महिमामंडन है।

इसके बाद दोनों के बीच ट्विटर पर बहस छिड़ गई। प्रियंक के ट्वीट का जवाब देते हुए रणविजय ने लिखा, “मदरसा पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष का बयान। इनके बयान के हिसाब से सरकारों पर मुकदमा होना चाहिए, क्योंकि सरकार ही मदरसा चला रही। शौक़ बहराइची कह गए हैं- बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था। हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।”

सिंह के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कानूनगो ने स्पष्ट किया कि सरकार बिना मैपिंग वाले मदरसे नहीं चलाती है। उन्होंने आगे कहा, “1.5 करोड़ से ज़्यादा बच्चों का वहाँ रखा गया है, जो औरंगज़ेब के बनवाए पाठ्यक्रम (Syllabus) को मानते हैं। यह अधिकारिक रिपोर्ट का लिंक है। पत्रकार हैं, अध्ययन कर लीजिए। तार्किक बात करेंगे तो ट्रक के पीछे लिखी शायरी याद नहीं करनी पड़ेगी।” इस ट्वीट के साथ उन्होंने इस संबंध में NCPCR द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट का लिंक भी शेयर किया है।

हालाँकि यह बहस यहीं पर नहीं रुकी। रणविजय ने लिखा, “मतलब आप मान रहे हैं कि सरकारी मदरसे ठीक हैं। बाकी आपको अध्यक्ष इसीलिए बनाया गया है कि आप बिना मैपिंग वाले मदरसों को मैप में शामिल करें। इन बच्चों के लिए काम करें। आपको करीब 1 साल होने आए, आपने अब तक क्या किया? दो-ढाई साल का कार्यकाल और बचा है, काम पर ध्यान दीजिए। कुछ कीजिए।”

इस पर जवाब देते हुए प्रियंक कानूनगो ने लिखा, “गूगल सर्च ही कर लो पहले 3 साल मैं सदस्य रहा फिर 3 साल अध्यक्ष, फिर दोबारा अध्यक्ष हूँ NCPCR में। मैंने साढ़े चार साल की मेहनत में ये रिपोर्ट तैयार की है जो बताती है कि अनुच्छेद 29,30 व 15(5) में मिली छूट बच्चों के अधिकार का हनन कर रही है। कुतर्क करने के बजाए रिपोर्ट पढ़ लो।”

NCPCR की रिपोर्ट

एनसीपीसीआर की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 15 (5) के तहत छूट से अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को फायदा हुआ है। रिपोर्ट में अल्पसंख्यक स्कूलों डेटा विश्लेषण के साथ-साथ छात्रों, शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के साथ परामर्श को जोड़ा गया है।

इसमें कहा गया कि भारत के संविधान में 86वाँ संशोधन शिक्षा के अधिकार को 6-14 वर्ष के बीच के बच्चों का मौलिक अधिकार बनाता है। अनुच्छेद 15(5) सरकार को सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए नीति बनाने का अधिकार देता है। यह भारत में निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में सकारात्मक कार्रवाई को तेज करता है। हालाँकि, इसे आरटीई एक्ट के तहत छूट के साथ अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं किया गया है।

रिपोर्ट का अवलोकन

रिपोर्ट देश में अल्पसंख्यक स्कूली शिक्षा की स्थिति पर विस्तृत आँकड़ों के साथ बनाई गई है। इसके निष्कर्ष इस प्रकार हैं-

  1. ईसाई समुदाय, जो कुल धार्मिक आबादी का 11.54% है, उसकी देश के कुल मजहबी अल्पसंख्यक स्कूलों में हिस्सेदारी 71.96% है।
  2. देश में धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी में 69.18% की हिस्सेदारी का योगदान करने के बावजूद मुस्लिम समुदाय धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूलों में केवल 22.75% का योगदान देता है।
  3. 2006 के बाद से 85.33% अल्पसंख्यक स्कूलों ने अपना अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण-पत्र हासिल कर लिया है। 2006 में 93वें संशोधन के बाद प्रमाण-पत्र हासिल करने वाले स्कूलों में काफी तेजी से वृद्धि देखी गई।
  4. एक चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब यह पाया गया कि अल्पसंख्यक स्कूलों में 62.50% छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदायों के हैं। आंध्र प्रदेश, झारखंड, पंजाब, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, उत्तराखंड के केंद्र शासित प्रदेशों में यह 70% से अधिक है।

रिपोर्ट में कुछ प्रमुख सिफारिशें शामिल हैं जिन्हें अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा के कारण रखा गया था। इसमें शामिल है;

  1. स्कूल से ‘बाहर के बच्चों’ की पहचान करने के लिए सभी गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों की मैपिंग की सिफारिश करते हुए एनसीपीसीआर ने कहा है कि बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे स्कूलों/संस्थानों में पढ़ते हैं जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इसकी सिफारिश इसलिए की गई, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा का मौलिक अधिकार मिल सके।
  2. अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में RTE के प्रावधानों का विस्तार करने या अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों की आरटीई सुनिश्चित करने के लिए समान प्रभाव से कानून बनाने के लिए उपयुक्त कदमों की आवश्यकता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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