Thursday, August 5, 2021
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जब मार डाले गए 10000 हिंदू, पहचान के लिए उनकी संपत्तियों पर लिखा गया ‘H’: मजहबी पहचान बता ‘सेफ’ थे मुस्लिम और ईसाई

हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी फौज के इस अभियान को ‘फरीदपुर कैम्पेन’ कहा जाता है। यह कैम्पेन शुरू हुआ 21 अप्रैल 1971 को जब पाकिस्तानी फौज ने फरीदपुर में प्रवेश किया था।

बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की फौज ने जो वीभत्स अत्याचार किए थे उनके बारे में पढ़कर आज भी लोग सिहर उठते हैं। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तानी फौज ने भयानक लूटमार मचाई थी। महिलाओं का बलात्कार किया गया, उनकी हत्या की गई। संपत्तियों को लूटा गया, घर जलाए गए, यहाँ तक कि बच्चों को भी नहीं छोड़ा था। ऐसे ही एक नरसंहार के बारे में दुनिया को 4 जुलाई 1971 को खबर लगी थी, जब न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) में इस संबंध में रिपोर्ट छपी। फरीदपुर में अंजाम दिए गए इस नरसंहार में पाकिस्तानी फौज ने हिन्दुओं को विशेष तौर पर चिह्नित कर उनका कत्लेआम किया था।

तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के केंद्र में स्थित फरीदपुर में हिंदुओं के दमन की एक व्यवस्थित मुहिम चलाई गई थी। 50 साल पहले आज ही के दिन (04 जुलाई 1971) न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमें फरीदपुर में हुए हिंदुओं के नरसंहार के बारे में बताया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तानी फौज ने हिंदुओं की पहचान करने के लिए उनकी संपत्तियों पर पीले रंग में बड़े अक्षरों में ‘H’ लिखा था। इस रिपोर्ट के मुताबिक फरीदपुर में 10,000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था।

हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी फौज के इस अभियान को ‘फरीदपुर कैम्पेन’ कहा जाता है। यह कैम्पेन शुरू हुआ 21 अप्रैल 1971 को जब पाकिस्तानी फौज ने फरीदपुर में प्रवेश किया था। शाम का समय था। पाकिस्तानी फौज फरीदपुर पहुँच चुकी थी। फरीदपुर में प्रवेश करने के बाद जब पाकिस्तानी फौज स्थानीय गोलचामोट इलाके में पहुँची तब उन्हें श्री आँगन आश्रम से भजन-कीर्तन की आवाज सुनाई दी। पाकिस्तानी फौज ने आश्रम को घेर लिया।

फौज को देखकर कई साधु वहाँ से निकल गए, लेकिन 9 ब्रह्मचारी संतों ने भागना स्वीकार नहीं किया। सेना उन सभी 9 संतों को खींचकर बाहर लाई। उनमें से एक संत नबकुमार ब्रह्मचारी किसी तरह बचने में सफल रहे और नजदीकी झाड़ियों में छुप गए। नबकुमार के अनुसार सभी संतों को एक लाइन में खड़ा करके पाकिस्तानी फौज ने एक-एक को 12 गोलियाँ मारी थी। संतों ने ‘जय जगतबंधु हरि’ का उद्घोष करते हुए अपने प्राण गँवा दिए। यही श्री आँगन हत्याकांड हिंदुओं के खिलाफ फरीदपुर कैम्पेन की शुरुआत थी।

उसके बाद से तो जैसे पाकिस्तानी फौज हिंदुओं के खून की प्यासी सी हो गई थी। हालाँकि उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान के दूसरे समुदायों को भी पाकिस्तानी फौज से खतरा था। खासकर उन लोगों को, जो पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति के पक्षधर थे और शेख मुजीबुर्रहमान की विचारधारा का अनुसरण कर रहे थे। लेकिन फिर भी यह तथ्य है कि मुस्लिम और ईसाइयों को हिंदुओं से कम खतरा था। फरीदपुर में मुस्लिमों ने अपने घरों और दुकानों पर बड़े अक्षरों में अपनी पहचान लिखी थी। इसके अलावा जो थोड़ी बहुत संख्या में ईसाई थे उन्होंने भी अपने घर में क्रॉस लगा दिया था और अपने कपड़ों पर भी क्रॉस सिलवा लिया था।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों ने खुद ही अपने मजहबी प्रतीकों को अपनी रक्षा के लिए उपयोग किया था, लेकिन हिंदुओं की संपत्तियों की पहचान के लिए पाकिस्तानी फौज ने अभियान चलाया और उन पर पीले रंग में बड़े अक्षरों में ‘H’ लिखा ताकि हिंदुओं की पहचान की जा सके।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार फरीदपुर कैम्पेन के दौरान पाकिस्तानी फौज के द्वारा लगभग 10,000 हिन्दू मौत के घाट उतार दिए गए थे। यह संख्या अधिक भी हो सकती है। मारे गए इन हिंदुओं में बूढ़े, बच्चे, नौजवान और महिलाएँ सभी शामिल थे। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अंदर की हिंदुओं के बयान दर्ज हैं जो पाकिस्तानी फौज के हाथों अत्याचार की कहानी कहते हैं।

फरीदपुर में पाकिस्तानी फौज के हिन्दू विरोधी अभियान के दौरान कई नरसंहार हुए जैसे, मध्यमपारा नरसंहार, ईशानगोपालपुर नरसंहार, सेंदिया नरसंहार, चार भद्रासन हत्याकांड आदि। इन सभी नरसंहारों में निहत्थे हिंदुओं को मारा गया, उनके घरों को जलाया गया। सबसे बड़ी बात थी कि इन क्रूर नरसंहारों के दौरान हिंदुओं की पहचान की गई।

फरीदपुर से संबंधित रिपोर्ट्स में यह बताया गया है कि पाकिस्तानी फौज गाँवों में घुसकर हिंदुओं के घरों के बारे में पूछताछ किया करती थी। इसके बाद हिंदुओं के घरों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया जाता था। पाकिस्तानी फौज ने अपने विश्वासपात्र नियुक्त किए हुए थे जो हिंदुओं की जानकारी सेना को देते थे। सेना भी हिंदुओं की संपत्तियों को इन्हीं विश्वासपात्रों को सौंप देती थी। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में यहाँ तक बताया गया था कि पाकिस्तानी फौज ने हिंदुओं के कत्लेआम के लिए दूसरे लोगों को हथियार मुहैया कराए थे। इनमें गैर बंगाली मुस्लिम भी शामिल थे।

फरीदपुर में आज भी हिंदुओं के नरसंहार के कई निशान मौजूद हैं। भारत के सहयोग से पूर्वी पाकिस्तान मुक्त हो गया और बांग्लादेश का निर्माण हुआ लेकिन इस संघर्ष में हिंदुओं ने जो कत्लेआम झेला था वह शायद ही किसी के भूलना आसान हो। दुखद यह है कि बांग्लादेश में बचे-खुचे हिंदू इस्लामी कट्टरपंथ के उस खतरे से आज भी जूझ रहे थे।

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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