वो मुग़ल बादशाह, जो बेटे की याद में रोते-रोते मरा… जबकि बेटा था ‘इस्लाम का दूत’

"आपकी बीमारी के दौरान दारा शिक़ोह ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था। उसने इस्लाम को ख़त्म करने और हिंदुत्व को बढ़ावा देने की ठान ली थी।"

सत्रहवीं शताब्दी के मध्य का समय था। 70 साल का एक बीमार और बूढ़ा आदमी रोज़ उठता, खिड़की से ताज़महल को निहारता और फिर अपने बिस्तर पर लेट जाता। यह क्रम रोज़ चलता। पास में क़ुरानशरीफ़ की एक पुस्तक रखी होती, जिसकी आयतें पढ़ते-पढ़ते उसके दिन गुजरते। कभी-कभार कुछ मौलवी भी आया करते थे, जो उसके लिए क़ुरानशरीफ़ का पाठ करते। देखभाल करने के लिए बूढ़े की बेटी उसके साथ रहती थी। बूढ़े को एक ऐसी बीमारी ने जकड़ रखा था जो काफ़ी दर्दनाक थी। उसका पेशाब बूँद-बूँद कर गिरता था और उसे काफ़ी दर्द सहना पड़ता था। अपने भाग्य को कोसते हुए बेचारा बूढ़ा किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुज़र-बसर कर रहा था।

ऐसा नहीं था कि बूढ़े के बेटे नहीं थे। उसके चार बेटे थे, जिनमें से अब सिर्फ़ एक ही ज़िन्दा बचा था। जिस बेटे को वो सबसे ज़्यादा प्यार करता था, जिसे अपने वारिस के रूप में देखता था- उसका कटा हुआ सर एक दिन उसके पास पहुँचा था। अपने बेटे के कटे हुए सर को याद कर वो हर दिन रोया करता था। उसे अपने सबसे प्यारे बेटे के मारे जाने से भी ज्यादा दुःख इस बात का था कि उसे मारने वाला भी उसका ही बेटा था। वो लाचार और बीमार बूढ़ा व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि तीस साल दिल्ली की गद्दी पर राज करने वाला शहंशाह था। वही जिसने ताज़महल बनवाया। मुग़ल आक्रांताओं के वंश का एक बड़ा नाम- शाहजहाँ।

22 जनवरी, 1666- क़रीब साढ़े तीन सौ साल पहले वो आज का ही दिन था, जब शाहजहाँ ने अंतिम साँस ली थी। लेकिन उस से पहले जो भी हुआ वो इस्लामिक सत्ता संघर्ष का ख़ून से रंगा वो अध्याय है, जिस पर भारतीय इतिहास कभी गर्व नहीं करेगा। मरने से पहले 74 वर्षीय शाहजहाँ के दिमाग में वो बातें जरूर कौंधी होंगी, जो उसने ठीक 38 साल पहले किया था। उसके दिमाग में वो काण्ड याद आए होंगे, जिसे उसने ख़ुद सत्ता पाने के लिए अंजाम दिया था। आज वो सब लौट कर उसके पास वापस आ गया था। जो भी उसने किए, उसकी सज़ा उसे जीते-जी मिल गई थी। सारा हिसाब चुकता हो गया था।

जब इतिहास ने ख़ुद को दोहराया

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इस्लामिक साम्राज्यवाद में सत्ता के हस्तांतरण के लिए कभी कोई नियम नहीं रहा। भारतीय राजतन्त्र में सबसे बड़े बेटे को सत्ता देने का चलन था, अगर वो अयोग्य हो तो दूसरे बेटे को सत्ता सौंप दी जाती थी। लेकिन दुनियाभर में जहाँ भी इस्लामिक सत्ता के हस्तांतरण की बात आती है- वहाँ खून से सनी एक ऐसी कहानी भी मिलती है, जो बाद में महान कहलाने वाले बादशाहों के चेलों को रास न आए। महान कहे जाने वाले अकबर ने दिल्ली के लोगों को मार-मार कर उनकी खोपड़ियों का पहाड़ बना डाला और उसी पर चढ़ कर सत्ता के क्षितिज पर पहुँचा। शाहजहाँ ने भी कुछ ऐसा ही किया था।

गद्दी पर बैठने के बाद सबसे पहला काम जो उसने किया था- वो था अपनी सौतेली माँ नूरजहाँ को कारावास में डालना। ये महज़ एक संयोग ही था कि 22 जनवरी 1666 को उसकी मृत्यु हुई और 23 जनवरी 1628 को उसने अपने भाई-भतीजे सहित कई रिश्तेदारों को मार कर सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की थी। जिस तरह उसने अपने भाइयों को मारा था, ठीक उसी तरह आज उसके बेटे एक दूसरे के ख़ून के प्यासे बन बैठे थे, जिसका अंत उसके तीन बेटों की मौत के साथ हुआ।

अब इतिहास के ख़ुद को दोहराने की बारी थी। शाहजहाँ की मृत्यु से पहले क़रीब 15 सालों तक उसका बेटा औरंगज़ेब उस से मिलने तक नहीं आया। मिलना तो दूर, उसने अपने बीमार बाप की हाल-चाल की ख़बर लेने तक की भी ज़हमत नहीं उठाई। जो उसने अपनी माँ के साथ किया था, उसका बेटा आज वही अपने बाप के साथ कर रहा था। आठ सालों तक एक किले में बंद रहते-रहते उसे अपना इतिहास तो याद आता ही होगा।

धन के लालची औरंगज़ेब ने अपने पिता को कंगाल कर दिया था। सत्ता सँभालने के कुछ दिनों बाद ही उसने आगरा के धनालय को अपने कब्ज़े में लिया। उसने शाहजहाँ से उसकी हीरे की अँगूठी तक छीन ली। दिल्ली का नया बादशाह मानसिक तौर पर इतना दरिद्र था कि उसने अपने पिता के सारे जवाहरात जबरदस्ती ले लिए। उसने शाहजहाँ से उसकी मोतियों की माला भी माँगी लेकिन शाहजहाँ ने कहा कि वो इस से ख़ुदा को याद करता है। शाहजहाँ ने कहा कि वो इसे औरंगज़ेब को देने की बजाय मिटटी में फ़ेंक देना ज्यादा बेहतर समझेगा।

जिस ख़ुदा का वास्ता देकर शाहजहाँ ने औरंगज़ेब को अपनी 100 मोतियों से बनी माला देने से मना कर दिया, उसी ख़ुदा का बहाना बना कर औरंगज़ेब ने उसकी सारी दौलत छीन ली।

बेटे का पत्र, पिता के नाम

औरंगज़ेब के शासन को अपनी लेखनी में समेटने वाले खाफ़ी ख़ान ने लिखा था कि जब शाहजहाँ आगरा किले में रहता था तब उसके और औरंगज़ेब के बीच कई पत्रों के आदान-प्रदान हुए थे। उन पत्रों में औरंगज़ेब की उसके पिता के प्रति सोच पता चलती है। यहाँ हम औरंगज़ेब के पत्रों की भाषा और विचार का उल्लेख करेंगे ताकि पता चले कि जिस क़ुरानशरीफ़ को शाहजहाँ अपने ढलते दिनों में पढ़ रहा था, उसी क़ुरानशरीफ़ को अपने जवानी के दिनों में पढ़ कर औरंगज़ेब ने क्या सीखा था?

अपने पत्र में औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को लिखा- “आपकी बीमारी के दौरान दारा शिक़ोह ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था। उसने इस्लाम को ख़त्म करने और हिंदुत्व को बढ़ावा देने की ठान ली थी।” औरंगज़ेब ने इन पत्रों में अपने आपको इस्लाम का दूत बताया था। उसने अपनी हिंसात्मक करतूतों की वज़ह ‘दिव्य आज्ञा’ बताया था। उसका दावा था कि ये दिव्या आज्ञा उसे सीधे अल्लाह द्वारा मिल रही थी। इसका कारण बताते हुए उसने शाहजहाँ को लिखा कि अगर अल्लाह ने उसके कार्यों को स्वीकृति नहीं दी होती तो उसे इतने सारे युद्धों में जीत कैसे मिलती?

औरंगज़ेब को इस्लामिक साहित्य का ज्ञाता माना जाता था। असल में आज भारत में जो इस्लामिक कट्टरवाद की आधुनिक धारा बह रही है, उसका काफ़ी श्रेय औरंगज़ेब को भी दिया जा सकता है। औरंगज़ेब का ‘इस्लाम’ ऐसा था, जिसने उसे अपने भाई की गर्दन काट कर पिता के पास भेजने को प्रेरित किया था। औरंगज़ेब का इस्लामिक ज्ञान इतना ‘अच्छा’ था कि उसने अपने बीमार बाप को मरने के लिए छोड़ दिया और नज़रबंद कर डाला। आज जिस ताज़महल की कीमत $100 करोड़ डॉलर से भी अधिक आँकी जाती है, उसका निर्माण कराने वाला बादशाह एक दशक से भी अधिक तक उपेक्षित जीवन जी कर मर गया।

औरंगज़ेब ने अपने पत्र में शाहजहाँ को इस बात की भी याद दिलाई कि कैसे उसने सत्ता पाने के लिए अपने भाई-भतीजों की हत्या की थी। औरंगज़ेब ने अपने पिता को उसके कुकर्मों की याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने अपने पिता को याद दिलाया कि उसने उन लोगों की हत्याएँ की, जिन्होंने उसे चोट तक नहीं पहुँचाई थी। इन पत्रों में लिखी बातें इस बात का गवाह है कि आपके कुकर्म आपका पीछा नहीं छोड़ते और कभी न कभी लौट कर वापस आते ही हैं। नज़रबंदी के दौरान हालत यह थी कि शाहजहाँ से कोई मिलने भी आता तो औरंगज़ेब की आज्ञा से।

एक उपेक्षित बादशाह की मौत

आख़िरकार कलमा पढ़ते-पढ़ते और मौलवियों के नमाज़ के बीच शाहजहाँ ने आज (जनवरी 22) के ही दिन सन 1666 में अंतिम साँस ली थी। हिन्दुस्तान पर तीस सालों तक राज करने वाले मुग़ल बादशाह को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तक नसीब न हुआ। उसकी बेटी जहाँनारा बेगम, जिसने सालों तक उसकी देखभाल की थी, ने ही उसकी अंतिम क्रिया संपन्न की। औरंगज़ेब अपने बाप के मरने की ख़बर सुन कर भी वहाँ नहीं आया, उसने अपने बेटे को भेजा लेकिन वह भी समय पर न पहुँच सका।

1666 में वो आज की ही तारीख़ थी जब आगरा के किले में नज़रबंद एक बूढ़े मुग़ल बादशाह ने आख़िरी साँस ली। उसके सारे कुकर्म लौट कर वापस उसके ही पास आए और इतिहास ने अपने-आप को फिर से दोहराया।
शाहजहाँ की मौत को दर्शाती अवनींद्र नाथ टैगोर की पेंटिंग: मुग़ल बादशाह और उसकी बेटी जहाँनारा (फोटो साभार: विकीमीडिया)

1652 से शाहजहाँ के मरने तक- 14 सालों तक औरंगज़ेब अपने पिता से नहीं मिला। जिस ताज़महल को निहारते-निहारते शाहजहाँ ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष गुजारे थे, जिस ताज़महल की कब्र में उसकी बेग़म मुमताज़ दफ़न थीं- उसी ताज़महल में उसकी भी क़ब्र बनाई गई।

सोर्स 1: (‘Emperors of the Peacock Throne: The Saga of the Great Mughals’ By Abraham Eraly)

सोर्स 2: (‘Illustrated Dictionary of the Muslim World’ By Marshall Cavendish)

सोर्स 3: (‘Travels in the Mogul Empire’ By Francois Bernier)

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