Friday, July 19, 2024
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स्थिर आँखों की एक हलचल जब जीवन की सबसे बड़ी ज़रूरत बन जाती है

ICU में बैठी एक माँ हर मिनट एक उम्मीद से एक शांत से चेहरे को देखती रहती है कि अब वो बोल उठेगा, छोटी बहन रोना चाहती है, लेकिन रोती नहीं कि शायद भाई की आँखें देख लेंगी, पिता अपने पिता होने का बोझ लिए अपने भीतर ही भटकता रहता है, कुछ खोजता रहता है।

मित्र हैं, बड़े भाई हैं, ज़िंदादिल और संवेदनशील व्यक्ति हैं। नाम नहीं लिख सकता क्योंकि ये पीड़ा हम में से बहुतों ने झेली होगी, और नाम रहने से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। मुझे दो बार टीबी हुआ, एक बार दोनों फेफड़ों में कैविटी बन गई (छोटा छेद), दूसरी बार लीवर नाराज़ हो गया क्योंकि आँखों में घुसे कीड़े को मारने के लिए जिस ज़हरीली दवाई का प्रयोग किया गया था, उसने लीवर पर बहुत अत्याचार कर दिया।

पहली बार जब टीबी हुआ था तो मैं ख़ून की उल्टियाँ करता था, और लगभग 200-300 मिलीलीटर एक बार में। चूँकि मैं मरीज़ था तो मेरे लिए उल्टी करना और देखना, दोनों ही सामान्य बातें थी। फिर दिल्ली के कुछ दोस्तों ने उपचार में साथ रहकर हर संभव सहायता की। डैमेज इतना हो चुका था कि डॉक्टर ने सीटी स्कैन देखकर कहा था, “एक्सट्रीम केस में तो सर्जरी होती है, लेकिन दोनों लंग्स में कैविटी है, तो वो संभावना भी नहीं। अगर जीने की इच्छा होगी तभी बचेगा।”

ज़ाहिर है कि इच्छा थी, और बच गए। इसी समय में मेरी माँ, बिहार छोड़ कर पहली बार कहीं बाहर आई। गरीब घर की महिला ने बहुत कष्ट देखे और झेले होते हैं। लेकिन, अपनी संतान को ख़ून की उल्टी करते देख, वो बेहोश होकर गिर गई। जबकि मुझे सँभालने वाले लोग थे, पर उसने ख़ून देखा तो दरवाजा पकड़ कर बेहोशी में गिरी और बैठ गई।

साल भर बाद, मैं ठीक हुआ और फिर दूसरी बार इसी रोग ने लीवर के माध्यम से हमला बोला। सप्ताह भर में लगभग 22 किलो वज़न घट गया। मैं अपने पाँव पर खड़ा नहीं हो पाता था। शरीर का हर एक ज्वाइंट दर्द करता था। इस हालत में मैं अपने गाँव वापस गया। पहले से ही दुबले व्यक्ति के शरीर से आप 22 किलो और निकाल लीजिए, शरीर से ख़ून बस ज़िंदा रहने लायक ही बचा हो, चेहरा पीला पड़ जाए, तो वैसी संतान को घर पहुँचता देख किसी भी पिता को ख़ास ख़ुशी नहीं होती।

ये कहानी मैं पहले भी कह चुका हूँ, लेकिन आज फिर से बता रहा हूँ। संतान को खरोंच भी लगती है तो माँ-बाप के लिए उससे बड़ा दुःख नहीं होता। ऐसे मौक़ों पर, जब डॉक्टर ही आपका एकमात्र सहारा हो, आप अपनी संतान को तड़पते देखते हैं, और हर पल भीतर से मर रहे होते हैं।

सवालों के जवाब नहीं मिलते। कर्म फल के चक्कर में याद करते हैं कि आख़िर किस कर्म की सज़ा इस रूप में मिल रही है। याद करते हैं तो याद नहीं आता कि किसी का नुकसान किया हो। आदमी ऐसे समय में तर्क ढूँढने की कोशिश करता है, और तर्क होते नहीं। इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता कि ‘मेरे साथ ही क्यों?’

मेरे पिता ने जन्म से लेकर अभी तक बस मेहनत ही की है। आधे से अधिक जीवन वैष्णव होकर पूजा-पाठ और गृहस्थी में बीता है। मैंने अगर किसी का भला नहीं किया, तो बुरा भी नहीं किया है। फिर मुझे दो बार मृत्यु तक पहुँचाना किस कर्म का फल है? इसका जवाब न मेरे पिता के पास था, न मेरी माँ के। लेकिन प्रारब्ध को स्वीकार कर, जितना संभव हो सका, संतान की चलती साँसों में ही आधार ढूँढा और फिर मैं दोनों बार ठीक हो गया।

जिन बड़े भाई का ज़िक्र ऊपर किया है, उनके दुःख के सामने मेरे पिता का दुःख कहीं नहीं टिकता। हमेशा ज़िंदादिल रहने वाला व्यक्ति चाह कर भी हँस नहीं पाता, बोलता है तो एक अजीब तरह का भाव सुनाई देता है जिसे आप निराशा या नकारात्मकता नहीं कह सकते। वो भाव शायद वही है जो एक पिता या माता का अपने बच्चे की पीड़ा को देखकर उपजता है।

वह स्थिति जब आपके पास ‘मैं क्या करूँ’ का जवाब नहीं होता, जब जो चल रहा है, उस पर आपका वश नहीं, आप स्थिति को एक पैसा प्रभावित नहीं कर सकते, तब मजबूत व्यक्ति भी गिरने लगता है। लेकिन, वही अंत नहीं है। एक माँ हर मिनट एक उम्मीद से एक शांत से चेहरे को देखती रहती है कि अब वो बोल उठेगा, छोटी बहन रोना चाहती है, लेकिन रोती नहीं कि शायद भाई की आँखें देख लेंगी, पिता अपने पिता होने का बोझ लिए अपने भीतर ही भटकता रहता है, कुछ खोजता रहता है।

ऐसे समय में हम या आप उस व्यक्ति को क्या सलाह दे पाएँगे? कुछ नहीं। बात कर सकते हैं लेकिन एक अनुभवी व्यक्ति को, जिसने आप से अधिक दुनिया देखी और झेली है, ढाढ़स भी नहीं दे सकते। लगता है कि खानापूर्ति हो रही है। उन मौक़ों पर हम या आप भावनाओं के आदान-प्रदान से ही जुड़े रह सकते हैं, उसके अलावा हमारे हाथ में कुछ नहीं।

मौन का स्तर वैसा हो जाता है कि पिता और माता बिना कुछ कहे बात कर रहे होते हैं। दोनों का डर कि कहीं दूसरा न टूट जाए। माताएँ घर को घर और परिवार को परिवार बनाती हैं, पिता उसका ठोस आधार और ईंट होते हैं। संतान वो छोटे पौधे हैं जिन्हें हवा हिला देती है, बारिश का झोंका उनके पत्ते तोड़ देता है, दूसरा जीव नोंच लेता है।

माँ-बाप की बाँहों का दायरा हमें बचपन से लेकर उनकी मृत्यु तक रक्षा कवच की तरह घेरे रहता है। मेरी दादी का देहांत हुआ था तो मेरे पिता, 56 साल की उम्र में फूट-फूट कर रो रहे थे। मेरी समझ में नहीं आया कि मेरे पिता जैसा विरक्त आदमी, मेरी जर्जर और अशक्त दादी की मृत्यु पर रो क्यों रहे हैं। मैंने पूछा तो उनका जवाब था, “वो जैसी भी थी, माँ थी। उसके पास मैं अभी भी अपने भाई-बहन के झगड़े, उनकी कटु बोलियाँ, उनकी बातों को लेकर शिकायत करने जाता था। अब किसके पास जाऊँगा?”

माँ-बाप का जीवन संतानोत्पत्ति के बाद पूरी तरह से बदल जाता है। उसके जीवन का हर महत्वपूर्ण पल उनके बच्चों की ओर हो जाता है। उनका निजी जीवन वहीं खत्म हो जाता है क्योंकि उस निजी जीवन से बड़े आनंद का पल बच्चे बनकर आते हैं। उस बच्चे के नन्हें पाँवों की मालिश से लेकर उनके मल-मूत्र तक में आप निर्विकार भाव से एक आनंद पाते हैं। निजी जीवन को आप कभी भी मिस नहीं करते, क्योंकि एक तरह से, आपका निजी जीवन व्यापक हो जाता है। किसी दूसरे की खुशी आपकी अपनी हो जाती है।

वही संतान जब दो महीने से आईसीयू में हो, बोलना चाहे और आवाज न निकले, लगातार सर्जरी होती रहे, डॉक्टर आपको बताते रहे कि इसमें समय लगेगा। आप धैर्य दिखाते हैं, आप पत्नी का हाथ पकड़ते हैं, दूसरे बच्चों को गोद में सुलाते हैं, उसे सरल शब्दों में बताते हैं कि उसका भाई कल की अपेक्षा आज बेहतर है।

मैं अभी भी किसी का बेटा और भाई हूँ, मैं पिता या माता की पीड़ा को देख तो सकता हूँ, लेकिन समझ नहीं सकता। उसके लिए उस स्थिति में होना पड़ता है। हर बार, अपने दोस्तों, उनके माता-पिता आदि को ऐसी स्थिति से गुज़रते देखता हूँ तो मनाता हूँ कि किसी को ऐसा समय न देखना पड़े। लेकिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, और आप तक ऐसी खबरें पहुँचती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में एक दोस्त बन पाने के सिवा हमारे हाथ में कुछ भी नहीं होता। दोस्त की कोई तय परिभाषा नहीं होती। वो आपके तमाम रिश्तों का एक मिश्रण होता है। इसलिए दोस्त कभी पिता की तरह बोलता है, कभी बड़े भाई की तरह, कभी पत्नी की तरह सहृदय होता है, कभी छोटी बहन की तरह जिद करता है, कभी माँ की तरह आपका ख़्याल रखता है। दोस्त अहित नहीं करता।

एक-दूसरे की शारीरिक पीड़ा को हम भले न बाँट सके, लेकिन मानसिक पीड़ा को अवश्य बाँटें। कई बार पति अपनी पत्नी या परिवार से वो बातें नहीं कह पाता, जो वो एक दोस्त से कहना चाहता हो। ऐसे मौक़ों पर, एक बेहतर दोस्त बना जा सकता है। बात की जा सकती है। सर के भीतर उस चौबीस घंटे बजने वाली घंटी से ध्यान दूसरी तरफ लाया जा सकता है।

और बाकी तो हमारे हाथ में कुछ भी नहीं, भावनाओं के जाल में हम उलझे हुए वो लोग हैं, जो मूलतः प्रेम करना जानते हैं। जब डॉक्टर ने मेरे सीटी स्कैन को देखकर यह कहा था कि मेरी इच्छा होगी तो मैं बच जाऊँगा, तो उसका मतलब यह था कि सिर्फ़ दवाई ही हमें स्वस्थ नहीं करती, हमारा प्रेम, हमारी जिजीविषा हमें भी ज़िंदा रखती है, और हमारे साथ के लोगों को भी। अतः, किसी की जिजीविषा को अपने प्रेम से सींचने की कोशिश कीजिए, यह सोच कर मत रुकिए कि आपके होने या कुछ करने से क्या होगा।

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अजीत भारती
अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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