Thursday, May 13, 2021
Home विविध विषय अन्य स्थिर आँखों की एक हलचल जब जीवन की सबसे बड़ी ज़रूरत बन जाती है

स्थिर आँखों की एक हलचल जब जीवन की सबसे बड़ी ज़रूरत बन जाती है

ICU में बैठी एक माँ हर मिनट एक उम्मीद से एक शांत से चेहरे को देखती रहती है कि अब वो बोल उठेगा, छोटी बहन रोना चाहती है, लेकिन रोती नहीं कि शायद भाई की आँखें देख लेंगी, पिता अपने पिता होने का बोझ लिए अपने भीतर ही भटकता रहता है, कुछ खोजता रहता है।

मित्र हैं, बड़े भाई हैं, ज़िंदादिल और संवेदनशील व्यक्ति हैं। नाम नहीं लिख सकता क्योंकि ये पीड़ा हम में से बहुतों ने झेली होगी, और नाम रहने से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। मुझे दो बार टीबी हुआ, एक बार दोनों फेफड़ों में कैविटी बन गई (छोटा छेद), दूसरी बार लीवर नाराज़ हो गया क्योंकि आँखों में घुसे कीड़े को मारने के लिए जिस ज़हरीली दवाई का प्रयोग किया गया था, उसने लीवर पर बहुत अत्याचार कर दिया।

पहली बार जब टीबी हुआ था तो मैं ख़ून की उल्टियाँ करता था, और लगभग 200-300 मिलीलीटर एक बार में। चूँकि मैं मरीज़ था तो मेरे लिए उल्टी करना और देखना, दोनों ही सामान्य बातें थी। फिर दिल्ली के कुछ दोस्तों ने उपचार में साथ रहकर हर संभव सहायता की। डैमेज इतना हो चुका था कि डॉक्टर ने सीटी स्कैन देखकर कहा था, “एक्सट्रीम केस में तो सर्जरी होती है, लेकिन दोनों लंग्स में कैविटी है, तो वो संभावना भी नहीं। अगर जीने की इच्छा होगी तभी बचेगा।”

ज़ाहिर है कि इच्छा थी, और बच गए। इसी समय में मेरी माँ, बिहार छोड़ कर पहली बार कहीं बाहर आई। गरीब घर की महिला ने बहुत कष्ट देखे और झेले होते हैं। लेकिन, अपनी संतान को ख़ून की उल्टी करते देख, वो बेहोश होकर गिर गई। जबकि मुझे सँभालने वाले लोग थे, पर उसने ख़ून देखा तो दरवाजा पकड़ कर बेहोशी में गिरी और बैठ गई।

साल भर बाद, मैं ठीक हुआ और फिर दूसरी बार इसी रोग ने लीवर के माध्यम से हमला बोला। सप्ताह भर में लगभग 22 किलो वज़न घट गया। मैं अपने पाँव पर खड़ा नहीं हो पाता था। शरीर का हर एक ज्वाइंट दर्द करता था। इस हालत में मैं अपने गाँव वापस गया। पहले से ही दुबले व्यक्ति के शरीर से आप 22 किलो और निकाल लीजिए, शरीर से ख़ून बस ज़िंदा रहने लायक ही बचा हो, चेहरा पीला पड़ जाए, तो वैसी संतान को घर पहुँचता देख किसी भी पिता को ख़ास ख़ुशी नहीं होती।

ये कहानी मैं पहले भी कह चुका हूँ, लेकिन आज फिर से बता रहा हूँ। संतान को खरोंच भी लगती है तो माँ-बाप के लिए उससे बड़ा दुःख नहीं होता। ऐसे मौक़ों पर, जब डॉक्टर ही आपका एकमात्र सहारा हो, आप अपनी संतान को तड़पते देखते हैं, और हर पल भीतर से मर रहे होते हैं।

सवालों के जवाब नहीं मिलते। कर्म फल के चक्कर में याद करते हैं कि आख़िर किस कर्म की सज़ा इस रूप में मिल रही है। याद करते हैं तो याद नहीं आता कि किसी का नुकसान किया हो। आदमी ऐसे समय में तर्क ढूँढने की कोशिश करता है, और तर्क होते नहीं। इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता कि ‘मेरे साथ ही क्यों?’

मेरे पिता ने जन्म से लेकर अभी तक बस मेहनत ही की है। आधे से अधिक जीवन वैष्णव होकर पूजा-पाठ और गृहस्थी में बीता है। मैंने अगर किसी का भला नहीं किया, तो बुरा भी नहीं किया है। फिर मुझे दो बार मृत्यु तक पहुँचाना किस कर्म का फल है? इसका जवाब न मेरे पिता के पास था, न मेरी माँ के। लेकिन प्रारब्ध को स्वीकार कर, जितना संभव हो सका, संतान की चलती साँसों में ही आधार ढूँढा और फिर मैं दोनों बार ठीक हो गया।

जिन बड़े भाई का ज़िक्र ऊपर किया है, उनके दुःख के सामने मेरे पिता का दुःख कहीं नहीं टिकता। हमेशा ज़िंदादिल रहने वाला व्यक्ति चाह कर भी हँस नहीं पाता, बोलता है तो एक अजीब तरह का भाव सुनाई देता है जिसे आप निराशा या नकारात्मकता नहीं कह सकते। वो भाव शायद वही है जो एक पिता या माता का अपने बच्चे की पीड़ा को देखकर उपजता है।

वह स्थिति जब आपके पास ‘मैं क्या करूँ’ का जवाब नहीं होता, जब जो चल रहा है, उस पर आपका वश नहीं, आप स्थिति को एक पैसा प्रभावित नहीं कर सकते, तब मजबूत व्यक्ति भी गिरने लगता है। लेकिन, वही अंत नहीं है। एक माँ हर मिनट एक उम्मीद से एक शांत से चेहरे को देखती रहती है कि अब वो बोल उठेगा, छोटी बहन रोना चाहती है, लेकिन रोती नहीं कि शायद भाई की आँखें देख लेंगी, पिता अपने पिता होने का बोझ लिए अपने भीतर ही भटकता रहता है, कुछ खोजता रहता है।

ऐसे समय में हम या आप उस व्यक्ति को क्या सलाह दे पाएँगे? कुछ नहीं। बात कर सकते हैं लेकिन एक अनुभवी व्यक्ति को, जिसने आप से अधिक दुनिया देखी और झेली है, ढाढ़स भी नहीं दे सकते। लगता है कि खानापूर्ति हो रही है। उन मौक़ों पर हम या आप भावनाओं के आदान-प्रदान से ही जुड़े रह सकते हैं, उसके अलावा हमारे हाथ में कुछ नहीं।

मौन का स्तर वैसा हो जाता है कि पिता और माता बिना कुछ कहे बात कर रहे होते हैं। दोनों का डर कि कहीं दूसरा न टूट जाए। माताएँ घर को घर और परिवार को परिवार बनाती हैं, पिता उसका ठोस आधार और ईंट होते हैं। संतान वो छोटे पौधे हैं जिन्हें हवा हिला देती है, बारिश का झोंका उनके पत्ते तोड़ देता है, दूसरा जीव नोंच लेता है।

माँ-बाप की बाँहों का दायरा हमें बचपन से लेकर उनकी मृत्यु तक रक्षा कवच की तरह घेरे रहता है। मेरी दादी का देहांत हुआ था तो मेरे पिता, 56 साल की उम्र में फूट-फूट कर रो रहे थे। मेरी समझ में नहीं आया कि मेरे पिता जैसा विरक्त आदमी, मेरी जर्जर और अशक्त दादी की मृत्यु पर रो क्यों रहे हैं। मैंने पूछा तो उनका जवाब था, “वो जैसी भी थी, माँ थी। उसके पास मैं अभी भी अपने भाई-बहन के झगड़े, उनकी कटु बोलियाँ, उनकी बातों को लेकर शिकायत करने जाता था। अब किसके पास जाऊँगा?”

माँ-बाप का जीवन संतानोत्पत्ति के बाद पूरी तरह से बदल जाता है। उसके जीवन का हर महत्वपूर्ण पल उनके बच्चों की ओर हो जाता है। उनका निजी जीवन वहीं खत्म हो जाता है क्योंकि उस निजी जीवन से बड़े आनंद का पल बच्चे बनकर आते हैं। उस बच्चे के नन्हें पाँवों की मालिश से लेकर उनके मल-मूत्र तक में आप निर्विकार भाव से एक आनंद पाते हैं। निजी जीवन को आप कभी भी मिस नहीं करते, क्योंकि एक तरह से, आपका निजी जीवन व्यापक हो जाता है। किसी दूसरे की खुशी आपकी अपनी हो जाती है।

वही संतान जब दो महीने से आईसीयू में हो, बोलना चाहे और आवाज न निकले, लगातार सर्जरी होती रहे, डॉक्टर आपको बताते रहे कि इसमें समय लगेगा। आप धैर्य दिखाते हैं, आप पत्नी का हाथ पकड़ते हैं, दूसरे बच्चों को गोद में सुलाते हैं, उसे सरल शब्दों में बताते हैं कि उसका भाई कल की अपेक्षा आज बेहतर है।

मैं अभी भी किसी का बेटा और भाई हूँ, मैं पिता या माता की पीड़ा को देख तो सकता हूँ, लेकिन समझ नहीं सकता। उसके लिए उस स्थिति में होना पड़ता है। हर बार, अपने दोस्तों, उनके माता-पिता आदि को ऐसी स्थिति से गुज़रते देखता हूँ तो मनाता हूँ कि किसी को ऐसा समय न देखना पड़े। लेकिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, और आप तक ऐसी खबरें पहुँचती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में एक दोस्त बन पाने के सिवा हमारे हाथ में कुछ भी नहीं होता। दोस्त की कोई तय परिभाषा नहीं होती। वो आपके तमाम रिश्तों का एक मिश्रण होता है। इसलिए दोस्त कभी पिता की तरह बोलता है, कभी बड़े भाई की तरह, कभी पत्नी की तरह सहृदय होता है, कभी छोटी बहन की तरह जिद करता है, कभी माँ की तरह आपका ख़्याल रखता है। दोस्त अहित नहीं करता।

एक-दूसरे की शारीरिक पीड़ा को हम भले न बाँट सके, लेकिन मानसिक पीड़ा को अवश्य बाँटें। कई बार पति अपनी पत्नी या परिवार से वो बातें नहीं कह पाता, जो वो एक दोस्त से कहना चाहता हो। ऐसे मौक़ों पर, एक बेहतर दोस्त बना जा सकता है। बात की जा सकती है। सर के भीतर उस चौबीस घंटे बजने वाली घंटी से ध्यान दूसरी तरफ लाया जा सकता है।

और बाकी तो हमारे हाथ में कुछ भी नहीं, भावनाओं के जाल में हम उलझे हुए वो लोग हैं, जो मूलतः प्रेम करना जानते हैं। जब डॉक्टर ने मेरे सीटी स्कैन को देखकर यह कहा था कि मेरी इच्छा होगी तो मैं बच जाऊँगा, तो उसका मतलब यह था कि सिर्फ़ दवाई ही हमें स्वस्थ नहीं करती, हमारा प्रेम, हमारी जिजीविषा हमें भी ज़िंदा रखती है, और हमारे साथ के लोगों को भी। अतः, किसी की जिजीविषा को अपने प्रेम से सींचने की कोशिश कीजिए, यह सोच कर मत रुकिए कि आपके होने या कुछ करने से क्या होगा।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

जहाँ CISF पर हमला-BJP वर्करों की हत्या, उस कूच बिहार में बंगाल के गवर्नर: असम भी जाएँगे, ममता नाराज

राज्यपाल हिंसा प्रभावित इलाकों का जायजा लेंगे। हिंसा के कारण असम के शिविरों में रह रहे लोगों से भी मुलाकात करेंगे।

कोरोना के कारण अनाथ हुए बच्चों को शिवराज सरकार देगी ₹5000 प्रति माह, फ्री शिक्षा और राशन भी

शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि कोरोना काल में अनाथ हुए बच्चों को मध्य प्रदेश सरकार हर माह 5000 रुपए देगी।

बंगाल-असम में कॉन्ग्रेस की हार ISF और AIUDF के कारण: CWC मीटिंग में हार का ठीकरा गठबंधन पार्टियों पर

CWC की बैठक में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के चुनाव पर भी बात हुई। कुछ लोगों ने दोबारा से राहुल गाँधी को ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनाने की बात कही।

कोरोना काल में पत्र लेखन प्रधान राजनीतिक चालें और विरोध की संस्कृति

जबसे तीसरे चरण के टीकाकरण की घोषणा हुई है, कोविड के विरुद्ध देश की लड़ाई में राजनीतिक दखल ने एक अलग ही रूप ले लिया है।

इजरायल में सौम्या की मौत पर केरल CM की श्रद्धांजलि… फिर किया पोस्ट एडिट: BJP ने लगाया ‘कट्टरपंथियों’ से डरने का आरोप

इजरायल में हमास के हमले में सौम्या की मौत के बाद केरल की राजनीति में उबाल, बीजेपी ने लेफ्ट, कॉन्ग्रेस पर लगाया कट्टरपंथियों से डरने का आरोप

फिलिस्तीनी आतंकी ठिकाने का 14 मंजिला बिल्डिंग तबाह, ईद से पहले इजरायली रक्षा मंत्री ने कहा – ‘पूरी तरह शांत कर देंगे’

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा, “ये केवल शुरुआत है। हम उन्हें ऐसे मारेंगे, जैसा उन्होंने सपने में भी न सोचा हो।”

प्रचलित ख़बरें

इजरायल पर इस्लामी गुट हमास ने दागे 480 रॉकेट, केरल की सौम्या सहित 36 की मौत: 7 साल बाद ऐसा संघर्ष

फलस्तीनी इस्लामी गुट हमास ने इजरायल के कई शहरों पर ताबड़तोड़ रॉकेट दागे। गाजा पट्टी पर जवाबी हमले किए गए।

इजरायल पर हमास के जिहादी हमले के बीच भारतीय ‘लिबरल’ फिलिस्तीन के समर्थन में कूदे, ट्विटर पर छिड़ा ‘युद्ध’

अब जब इजरायल राष्ट्रीय संकट का सामना कर रहा है तो जहाँ भारतीयों की तरफ से इजरायल के साथ खड़े होने के मैसेज सामने आ रहे हैं, वहीं कुछ विपक्ष और वामपंथी ने फिलिस्तीन के साथ एक अलग रास्ता चुना है।

इजरायल का आयरन डोम आसमान में ही नष्ट कर देता है आतंकी संगठन हमास का रॉकेट: देखें Video

इजरायल ने फलस्तीनी आतंकी संगठन हमास द्वारा अपने शहरों को निशाना बनाकर दागे गए रॉकेट को आयरन डोम द्वारा किया नष्ट

फिलिस्तीनी आतंकी ठिकाने का 14 मंजिला बिल्डिंग तबाह, ईद से पहले इजरायली रक्षा मंत्री ने कहा – ‘पूरी तरह शांत कर देंगे’

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा, “ये केवल शुरुआत है। हम उन्हें ऐसे मारेंगे, जैसा उन्होंने सपने में भी न सोचा हो।”

66 साल के शख्स की 16 बेगमें, 151 बच्चे, बताया- ‘पत्नियों को संतुष्ट करना ही मेरा काम’

जिम्बाब्वे के एक 66 वर्षीय शख्स की 16 पत्नियाँ और 151 बच्चे हैं और उसकी ख्वाहिश मरने से पहले 100 शादियाँ करने की है।

बांग्लादेश: हिंदू एक्टर की माँ के माथे पर सिंदूर देख भड़के कट्टरपंथी, सोशल मीडिया में उगला जहर

बांग्लादेश में एक हिंदू अभिनेता की धार्मिक पहचान उजागर होने के बाद इस्लामिक लोगों ने अभिनेता के खिलाफ सोशल मीडिया में उगला जहर
- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

295,373FansLike
93,110FollowersFollow
394,000SubscribersSubscribe