Friday, June 21, 2024
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अब्दुल मलिक पर सपा के मुस्लिम नेता की हत्या का आरोप, पुलिस पर हमले के लिए दुश्मनी भूले दोनों परिवार: हल्द्वानी के वरिष्ठ पत्रकार ने बताया – 1998 में भी भड़के थे दंगे

उन्होंने बताया कि उस दौरान भी मुस्लिमों ने पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ी थी, जलाई थी। कई जवानों के अलावा एक सिटी एसपी भी घायल हुए थे।

उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में जम कर हिंसा हुई। पुलिस थाना फूँक दिया गया और पेट्रोल पंप को भी आग के हवाले कर दिया गया। पत्रकारों तक को नहीं छोड़ा गया। पीड़ितों का कहना है कि इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ नाम पूछ-पूछ कर पीट रही थी, मुस्लिम होने पर छोड़ दिया जा रहा था। एक पत्रकार को आग में झोंक दिया गया। महिला पुलिसकर्मियों को बदहवास अवस्था में जान बचा कर भागते हुए देखा गया। अस्पताल में हिन्दू कार्यकर्ताओं ने घायल पुलिस वालों का इलाज कराया।

अब इस मामले में नया खुलासा हुआ है। 20 वर्षों से हल्द्वानी में पत्रकारिता कर रहे जर्नलिस्ट अरविंद मलिक से ऑपइंडिया ने बातचीत की। उन्होंने इस दौरान अब्दुल मलिक के बारे में भी बताया, जो इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता है और जिसने मलिक का बगीचा में अवैध मदरसा और मस्जिद बना रखा था। उन्होंने बताया कि 26 वर्ष पहले भी इसी तरह की एक घटना हुई थी जब अब्दुल मलिक पर पकड़ने गई टीम पर मुस्लिम भीड़ ने हमला बोल दिया था।

उन्होंने बताया कि उस दौरान भी मुस्लिमों ने पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ी थी, जलाई थी। कई जवानों के अलावा एक सिटी एसपी भी घायल हुए थे। अरविंद मलिक ने बताया कि अब्दुल मलिक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी, दोनों का ही करीबी है। उसने एक मुस्लिम नेता की ही हत्या करवाई थी, जो सपा में तेज़ी से उभर रहा था। अब्दुल मलिक को ये पसंद नहीं आया। 26 साल पहले यूपी से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य नहीं बना था।

बड़ी बात ये है कि अब जब इस हत्याकांड के 26 वर्ष बाद पुलिस पर हमला किया गया है, तब अब्दुल मलिक के परिजन और जिस मुस्लिम शख्स की उसने हत्या करवाई थी उसके परिजन साथ हैं। दंगाइयों में दोनों ही शामिल थे। अब्दुल मलिक देवबंदी है, जबकि जिसकी उसने हत्या करवाई थी वो बरेलवी मुस्लिम था। इसके बावजूद आज हत्या की दुश्मनी भूल कर दोनों ने दंगे में हाथ बँटाया। देवबंदी और बरेलवी की मस्जिदें भी अलग-अलग होती हैं, लेकिन दंगे में दोनों साथ हैं।

अरविन्द मलिक ने बताया, “हल्द्वानी में 20% देवबंदी हैं, जबकि 80% बरेलवी। एक अब्दुल्ला थे, जो नगरपालिका के चेयरमैन रहे। अब्दुल मलिक फरीदाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ चुका है, जहाँ उसे सफलता नहीं मिली। फिर वो कूड़ा के कारोबार में जुट गया। अब्दुलरउफ सिद्दीकी 26 साल पहले सपा में उभर रहे थे। तब अब्दुल मलिक के पास पार्टी में कोई बड़ा पद नहीं था। उसे सिद्दीकी का आगे बढ़ना कचोट रहा था। 19 मार्च, 1998 को वो लखनऊ जा रहे थे, उसी दौरान बरेली के भोजीपुरा थाना क्षेत्र में उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट करा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि बरेली में इसका मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें अब्दुल मलिक भी नामजद था। उन्होंने बताया कि इस हत्याकांड के कारण हल्द्वानी के बाजार कई दिनों तक बंद रहे। बरेली और हल्द्वानी की पुलिस ने मिल कर जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया, लेकिन अब्दुल मलिक अपने संबंधों के बूते बच निकला। पुलिस बैकफुट पर आ गई और मामला सीबी-सीआईडी के पास चला गया। बकौल अरविन्द मलिक, ईद के समय यहाँ के एसपी नासिर भी नमाज पढ़ने गए थे, वो युवा नेता की हत्या से दुखी थे।

वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि इस दौरान उनका आमना-सामना अब्दुल मलिक से हुआ और फिर उन्होंने हत्यारों को सबक सिखाने की ठानी। ईद के अगले दिन उन्होंने एक मामले में अब्दुल मलिक के खिलाफ वॉरंट ले लिया। उस समय कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे और सूरजभान को राज्यपाल बनाया गया था। सूरजभान जब राज्यपाल बन कर लखनऊ पहुँचे तो उनके साथ विमान में अब्दुल मलिक भी आया था, मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने राज्यपाल की अगवानी की। तब हत्या आरोपित का सीएम-राज्यपाल के साथ होना अख़बारों की सुर्खियाँ बनी थीं।

अरविंद मलिक ने बताया, “उस समय सीबी-सीआईडी की संस्तुति निरस्त कर दी गई। अब्दुल मलिक को गिरफ्तार कर के बरेली भेज दिया गया। उसे उसके आज़ाद नगर स्थित घर से उठाया गया था। उसके बाद आगजनी-पत्थरबाजी शुरू हो गई। जिस युवा सपा नेता की हत्या हुई, वो बरेलवी थे। लेकिन, ये ईगो की लड़ाई थी। मुकदमा चलता रहा, ये लोग कोर्ट से बरी भी हो गए। जिनकी हत्या हुई, उनके भाई आज सपा के नेता हैं। दोनों परिवार दुश्मन थे, लेकिन ताज़ा मामले में दोनों फिरके एक साथ हैं। अब्दुलरउफ का भाई जावेद सिद्दीकी गिरफ्तार हुआ है।”

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राहुल पाण्डेय
राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com
धर्म और राष्ट्र की रक्षा को जीवन की प्राथमिकता मानते हुए पत्रकारिता के पथ पर अग्रसर एक प्रशिक्षु। सैनिक व किसान परिवार से संबंधित।

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