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दशकों तक असम में असमिया और बंगाली की रही लड़ाई, फिर हिमंता बिस्वा सरमा ने एकजुट किए हिंदू: पढ़ें- एक बंगाली हिंदू का नजरिया

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कभी झिझक नहीं दिखाई और असम में भाषा और जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर समुदाय को एकजुट करने के लिए लगातार काम किया। उन्होंने असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच की दूरियों को कम करने और उन्हें करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है।

31 अगस्त 2025 का दिन था। असम के सिलचर शहर के रंगीरखारी इलाके में हिमंता बिस्वा सरमा की एक झलक पाने के लिए लाखों बंगाली लोग जुटे थे। हर तरफ लोग ही लोग थे, चेहरे पर उत्साह और आंखों में इंतजार। एक असमिया भाषी मुख्यमंत्री के लिए बंगाली समाज का इतना बड़ा और गर्मजोशी भरा स्वागत, राज्य में पहले कभी नहीं देखा गया था।

यह कोई सामान्य राजनीतिक रोड शो नहीं था बल्कि रिश्तों के लिहाज से एक अहम पल था। उस दिन असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच सालों से चली आ रही दूरी कम होती दिखी। ऐसा लगा कि दोनों समुदायों के रिश्तों में एक नया बदलाव शुरू हो रहा है।

हिमंता बिस्वा सरमा उस समय सच में ‘मामा’ बनकर उभरे थे। वो भी सिर्फ ब्रह्मपुत्र घाटी के असमिया बहुल इलाकों के युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि बराक घाटी के बंगाली बहुल समाज के लिए भी। दोनों इलाकों में उन्हें एक अपने जैसा अपनापन मिल रहा था। कुछ दशक पहले तक ऐसा दृश्य सोचना भी मुश्किल था। उस समय की राजनीति में ऐसी एकजुटता ना तो संभव लगती थी और ना ही किसी ने इसकी कल्पना की थी।

इतिहास पर एक नजर

पिछली एक सदी में तीन बड़ी घटनाओं ने बंगालियों और असमियों के रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया- 1905 में बंगाल का बँटवारा, 1947 में भारत का विभाजन और 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध।

हालाँकि, खाने-पीने, भाषा (लिखने की लिपि) और संस्कृति में बंगाली और असमिया लोगों के बीच काफी समानताएँ हैं लेकिन बड़ी संख्या में लोगों का आना और आबादी का बदलना दोनों समुदायों के बीच झगड़े की वजह बन गया।

1947 और 1971 की घटनाओं के दौरान बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू शरणार्थी असम आए। ये लोग मुस्लिम अलगाववादियों के धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पहले ईस्ट पाकिस्तान से और बाद में बांग्लादेश से यहाँ पहुँचे थे।

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद भी बंगाली हिंदू शरणार्थियों का असम आना जारी रहा। इससे जमीन, संसाधनों के बँटवारे और राजनीति में हिस्सेदारी को लेकर स्थानीय असमिया समुदाय के साथ तनाव बढ़ गया। 1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक के बीच यह जातीय टकराव काफी ज्यादा बढ़ गया जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर हिंसा और भाषा को लेकर दंगे हुए।

स्थिति को और खराब करने का काम कुछ स्वार्थी राजनीतिक दलों ने किया, जिन्होंने साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया और हिंदू वोटों को असमिया और बंगाली जैसे अलग-अलग समूहों में बाँटने की कोशिश की।

हिमंता ने खत्म की असमिया और बंगाली हिंदुओं को बाँटने की राजनीति

दिलचस्प बात यह रही कि कुछ स्वार्थी समूहों ने ईस्ट पाकिस्तान/बांग्लादेश से आए बंगाली मुसलमानों को खुश करने की राजनीति की जो आर्थिक मौके की तलाश में अवैध रूप से असम में घुस आए थे और इससे डेमोग्राफी बदलने का संकट और बढ़ गया।

इसे एक चालाक चुनावी रणनीति की तरह इस्तेमाल किया गया। पहले हिंदुओं को असमिया और बंगाली में बाँटकर भाषा और पहचान के मुद्दे पर आपस में लड़ाया गया। फिर ‘मिया’ (बंगाली मुसलमानों द्वारा खुद के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) वोट बैंक को एक साथ जोड़कर चुनाव जीतने का रास्ता बनाया गया।

इसके चलते बंगाली हिंदुओं और असमिया हिंदुओं के बीच का तनाव समय-समय पर भड़काया जाता रहा… कभी भड़काऊ भाषणों से, कभी बाँटने वाली नीतियों से और कभी नफरत भरी राजनीति से। यह सिलसिला 2016 में असम में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद बदलना शुरू हुआ पहले सर्बानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनने पर और फिर हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में यह बदलाव और तेज हुआ।

असम की राजनीति में पहले कभी न देखे गए तरीके से एक साफ और ठोस दृष्टिकोण अपनाया गया। इसमें बंगाली हिंदू शरणार्थियों (जो उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए) और बंगाली मुस्लिम घुसपैठियों (जो आर्थिक अवसरों के लिए असम में घुस आए) के बीच जरूरी फर्क बताया गया। खास तरीके से संदेश देकर लोगों को यह समझाया गया कि इन दोनों समूहों में कितना बड़ा अंतर है और इनका जनसंख्या बदलाव पर क्या असर पड़ा।

आखिर जो व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान बचाने के लिए असम आया हो, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे की जा सकती है जिसने पहले एक इस्लामिक देश बनाया और फिर मौके का फायदा उठाने के लिए भारत आ गया? न्याय के नजरिए से ऐसी तुलना बिल्कुल ठीक नहीं है। जिस असमिया हिंदू समाज को कुछ राजनीतिक समूहों ने यह विश्वास दिलाया था कि बंगाली हिंदू उनके दुश्मन हैं वो अब इस सच्चाई को समझ चुका है।

सालों तक लोगों को आपस में लड़ाने के लिए की गई ‘बाँटो और राज करो’ वाली राजनीति को हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में काफी हद तक खत्म कर दिया गया है। अब राज्य और वहाँ के लोग इस बात पर एकमत होते जा रहे हैं कि असली समस्या वो अवैध घुसपैठिए हैं जो 24 मार्च 1971 (असम समझौते की तय तारीख) के बाद असम आए ताकि यहाँ आर्थिक फायदे ले सके और इस खूबसूरत पूर्वोत्तर राज्य की संस्कृति को बदल सके।

बंगालियों को पसंद है ‘मामा’

हिमंता लगातार घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच फर्क को लेकर खुलकर बोलते रहे हैं। अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद और पीढ़ियों की संपत्ति तक खो देने वाले बंगाली हिंदुओं को अब वह पहचान मिल रही है जिसके वे हकदार थे।

असम के मुख्यमंत्री ने बार-बार यह भरोसा दिलाया है कि किसी भी बंगाली हिंदू को विदेशी नहीं कहा जाएगा और न ही उन्हें किसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पिछले साल सितंबर में उन्होंने साफ कहा था, “हिंदू बंगालियों को विदेशी मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि वे 1971 से पहले ही आ चुके हैं। असम में CAA का कोई खास महत्व नहीं है।”

जब 2019 में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का मसौदा जारी हुआ और उसमें करीब 12 लाख बंगाली हिंदू बाहर रह गए, तब हिमंता बिस्वा सरमा ने इस प्रक्रिया को ‘मूल रूप से खामियों से भरा’ बताया और नए सिरे से NRC कराने की माँग की।

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कभी झिझक नहीं दिखाई और असम में भाषा और जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर समुदाय को एकजुट करने के लिए लगातार काम किया। उन्होंने असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच की दूरियों को कम करने और उन्हें करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है।

इसी का असर था कि ‘मामा’ को 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वेस्ट बंगाल में जोरदार स्वागत मिला। उनके भाषणों को सुनने के लिए हजारों बंगाली मतदाता पहुँचे। बंगाली भाषी राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी असमिया मुख्यमंत्री को स्थानीय लोगों से इतना बड़ा समर्थन मिला हो।

दिलचस्प बात यह रही कि हिमंता ने स्थानीय लोगों के लिए बंगाली में भाषण भी दिया। कुछ दशक पहले अगर ऐसा हुआ होता तो स्वार्थी समूह इसे लेकर असम की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर देते लेकिन इस बार ये कमजोर पड़ चुके लोग कोई असर नहीं डाल सके।

असम के मुख्यमंत्री के लगातार प्रयासों का ही असर है कि असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच के पुराने मतभेद धीरे-धीरे खत्म होते दिख रहे हैं। अब राज्य एक स्थायी मेल-मिलाप की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

‘अवसरवाद’ को पहचानने का एक निजी अनुभव

मुझे साफ तौर पर याद है कि 2020 की शुरुआत में मेरे अपने ट्विटर अकाउंट पर एक मुस्लिम एक्टिविस्ट से बहस हुई थी, जो खुद को असमिया राष्ट्रवादी बता रहा था। यह बहस असम में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने को लेकर थी।

ऑनलाइन बहस के दौरान उस एक्टिविस्ट ने अपने असमिया फॉलोअर्स के बीच शेखी बघारने के लिए यह जताने की कोशिश की कि मैं ‘सीमा के उस पार’ से आया हूँ और लोगों को मुझसे सावधान रहना चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि मेरा परिवार 1947 में पूर्वी पाकिस्तान से स्वतंत्र भारत में आया था।

पहली बार किसी स्थानीय असमिया मुस्लिम राष्ट्रवादी को देखकर मुझे हैरानी हुई। इसलिए मैंने उसके अकाउंट को और ध्यान से देखना शुरू किया। जब मैंने उसकी ट्विटर टाइमलाइन देखी तो पाया कि उसने असम में अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की आलोचना करते हुए कई लेख पोस्ट किए थे।

इससे एक बात साफ हो गई कि वह एक्टिविस्ट एक तरफ अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को असम में बनाए रखने की वकालत कर रहा था और दूसरी तरफ खुद को ‘असमिया राष्ट्रवादी’ बताकर एक दूसरी पीढ़ी के बंगाली हिंदू प्रवासी पर सवाल उठा रहा था।

क्या यह अजीब नहीं है? भेड़ की खाल में भेड़िया जो अपनी धार्मिक सोच को आगे बढ़ाते हुए जातीय पहचान का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन यह बात आज से 6 साल पुरानी है।

इतिहास ने जैसे करवट ली है, वैसे ही आज ऐसे एक्टिविस्ट्स का प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा ने अब इस मामले में कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। उन्होंने एक बात साफ कर दी है कि असम में कौन है जो यहाँ का है और कौन नहीं है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Dibakar Dutta
Dibakar Duttahttps://dibakardutta.in/
Centre-Right. Political analyst. Assistant Editor @Opindia. Reach me at [email protected]

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