Friday, July 30, 2021
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अयोध्या मामला: ‘हिन्दू सूरज की पूजा करते हैं, पर इससे उस पर उनका हक़ तो नहीं हो जाता’

सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से धवन ने कहा कि लोगों का विश्वास है कि 11,000 साल पहले उस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था, लेकिन विवादित जमीन को श्रीराम जन्मभूमि पहली बार 1989 में कहा गया। इससे पहले कभी ऐसा दावा नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद की शुक्रवार को 23वें दिन की सुनवाई हुई। मुस्लिम पक्षकार ने विवादित स्थल पर अपने दावे को साबित करने का प्रयास किया। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से राजीव धवन ने कहा कि सुनवाई में हिंदू पक्षकार रामलला के तरफ से दलील दी गई थी कि हिंदू नदियों, पहाड़ों को पूजते आए हैं, इसी तर्ज पर रामजन्मस्थान भी वंदनीय है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पक्ष रखते हुए धवन ने कहा- “मेरा कहना है कि यह एक वैदिक अभ्यास है। हिंदू सूरज की पूजा करते हैं पर इससे उस पर उनका मालिकाना हक तो नहीं हो जाता। निर्मोही अखाड़े के पास ऐसे सबूत नहीं, जिससे साबित हो सके कि उनका शास्वत काल से सेवादार का हक रहा है। अखाड़े ने भी सिर्फ सेवादार/ प्रबंधन का अधिकार माँगा है, ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर दावा नहीं किया।”

सुनवाई के दौरान पूजा करने के आधार पर विवादित स्थल पर हिन्दू पक्ष के मालिकाना हक के दावे का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई सूर्य की पूजा करता है, तो इससे उसका अधिकार सूर्य पर नहीं हो जाता। धवन ने कहा कि लोगों का विश्वास है कि 11,000 साल पहले उस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था, लेकिन विवादित जमीन को श्रीराम जन्मभूमि पहली बार 1989 में कहा गया। उसी साल पहली बार कहा गया कि जन्मस्थान न्यायिक व्यक्ति है। इससे पहले कभी ऐसा दावा नहीं किया गया।

कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों ने कहा कि जन्मस्थान के लिए अदालत में याचिका दाखिल नहीं हो सकती। जन्मस्थान कोई कानूनी व्यक्ति नहीं है। उन्होंने प्रार्थना को एक वैदिक अभ्यास बताते हुए कहा कि अगर कल को चीन मानसरोवर में जाने से रोक देता है, तो क्या कोई पूजा के अधिकार का दावा कर सकता है?

मुस्लिम पक्ष की तरफ से सबसे पहले वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने बहस की शुरुआत की। जिलानी ने कहा कि वर्ष 1885 में निर्मोही अखाड़े ने जब कोर्ट में याचिका दायर की थी, तो उन्होंने अपनी याचिका में विवादित जमीन की पश्चिमी सीमा पर मस्जिद होने की बात कही थी। यह हिस्सा अब विवादित जमीन के भीतरी आँगन के नाम से जाना जाता है। निर्मोही अखाड़े ने 1942 के अपने मुकदमे में भी मस्जिद का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने तीन गुम्बद वाले ढाँचे को मस्जिद स्वीकार किया था।

जिलानी ने मुस्लिम पक्ष के गवाहों के बयान पर यह साबित करने की कोशिश की कि 1934 के बाद भी विवादित स्थल पर नामज़ पढ़ी गई। इसके लिए उन्होंने कोर्ट के सामने कुछ दस्तावेजों का संदर्भ पेश किया।

जिलानी ने PWD की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि 1934 के सांप्रदायिक दंगों में मस्जिद के एक हिस्से को कथित रूप से क्षतिग्रस्त किया गया था और PWD से उसकी मरम्मत करवाई गई थी। जिलानी ने बाबरी मस्जिद में 1945-46 में तरावीह की नमाज पढ़ाने वाले हाफ़िज़ के बयान का ज़िक्र भी किया। जीलानी ने एक गवाह का बयान पढ़ते हुए कहा कि उसने 1939 में मगरिब की नमाज़ बाबरी मस्जिद में पढ़ी थी। हिंदू पक्ष की तरफ से चर्चा के दौरान यह दलील दी गई थी कि 1934 के बाद विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी गई।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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