Sunday, May 22, 2022
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‘बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति, हम उसे मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार’

"एक मस्जिद में ‘वजू’ करने के लिए पानी की टंकी होनी चाहिए मगर यहाँ पर ऐसा कोई बंदोबस्त नहीं था। उन्होंने कहा कि मस्जिद में सजीवों की कोई तस्वीर, फूलों की डिजाइन आदि नहीं होनी चाहिए जबकि विवादित स्थल पर ये सारी चीजें थीं।"

शिया वक्फ बोर्ड ने शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को उच्चतम न्यायालय से कहा कि वह अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित जमीन का तिहाई हिस्सा मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार है, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुस्लिम संगठनों को आवंटित किया था। 

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वकील एमसी ढिंगरा ने शुक्रवार को अदालत में दलील देते हुए कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए 2010 के फैसले में, विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा समुदाय विशेष को दिया गया था, न कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इसलिए वो अपना हिस्सा हिन्दुओं को देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इसका एक आधार यह भी है कि बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति है। उन्होंने बताया कि विवादित संपत्ति शियाओं को बिना नोटिस दिए सुन्नी वक्फ के तौर पर पंजीकृत कर दी गई और बाद में शिया बोर्ड 1946 में अदालत में इस आधार पर मामले को हार गया कि उसने एक सुन्नी इमाम नियुक्त कर लिया था।

ढिंगरा ने कहा कि हिंदुओं ने जो दलीलें दी हैं, उनसे पूर्वाग्रह रखे बिना, शिया उस संपत्ति पर अधिकार का दावा नहीं करते। 1936 तक इस पर शियाओं का कब्जा था और इसके पहले तथा अंतिम मुतवल्ली शिया थे और किसी सुन्नी को कभी मुतवल्ली नियुक्त नहीं किया गया।

इसके साथ ही, अखिल भारतीय श्री राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने अपनी संक्षिप्त दलीलें रखीं और विवादित स्थल के जमीन रिकॉर्ड में हस्तक्षेप किए जाने का आरोप लगाया। मिश्रा ने कहा कि जमीन पर दावे को लेकर दूसरे समुदाय के पास कोई ठोस पक्ष नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘वाकिफ (वक्फ करने वाला) को जमीन का मालिक होना चाहिए। यहाँ बाबर जमीन का मालिक नहीं था।’’ उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून और परंपराओं के तहत जमीन को वैध तरीके से अल्लाह को सौंपा जाना चाहिए और बाबर यह काम मीर बकी के जरिए नहीं कर सकता था क्योंकि इस्लाम में एक एजेंसी के माध्यम से जमीन सौंपना निषिद्ध है। मिश्रा ने कहा कि मस्जिद होने के लिए दिन में दो बार अजान के बाद नमाज पढ़ी जानी चाहिए, जबकि विवादित स्थल के मामले में ऐसा नहीं था।

पी एन मिश्रा ने कहा कि एक मस्जिद में ‘वजू’ करने के लिए पानी की टंकी होनी चाहिए मगर यहाँ पर ऐसा कोई बंदोबस्त नहीं था। उन्होंने कहा कि मस्जिद में सजीवों की कोई तस्वीर, फूलों की डिजाइन आदि नहीं होनी चाहिए जबकि विवादित स्थल पर ये सारी चीजें थीं। अदालत आगे की सुनवाई 2 सितंबर को करेगी जब मुस्लिम पक्ष आगे की दलीलें रखेगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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